dhamm vs dharm

 

परम सत्य की खोज के समय मुझे ऐसा कोई तत्व नहीं मिला, जिसने इस संसार का निर्माण किया हो या जिसे ईश्वर कहते हैं. ऐसा कोई ईश्वर नहीं है, जिसने इस मानव- जाति का निर्माण किया हो. इस जगत में सभी अनित्य है. जिसका निर्माण होगा, वह नष्ट होगा, यही संसार का नियम है. तुमने जन्म लिया है तो तुम्हारी मृत्यु भी निश्चित है. संसार का निर्माण ईश्वर ने किया है, यदि इस घोर असत्य को मान भी लिया जाए तो जब तुम मरने वाले हो, तो तुम्हे बनानेवाला ये ईश्वर कैसे जीवित रहे सकता है. स्वयं को ईश्वर के भय से मुक्त करो, अपने मार्गदर्शक खुद बनो, तभी तुम्हारी मुक्ति का मार्ग खुलेगा. परंपरा सत्य नही है. जाति व्यवस्था मानव निर्मित असमानता की व्यवस्था है. जन्म से कोई शूद्र या ब्राहमण नहीं होता है. मानव अपने कुशल कर्मों से ही जाना जायेगा. जो सबके मंगल के लिए कर्म करता है वही मानव है. परंपरा को तोड़ने से ही मुक्ति संभव है, यही सर्वकालीन सत्य है….. तथागत बुद्ध


राजनीति क्या है? राज करने की नीति, इस नीति को बनाने और चलने वाले लोग शक्ति के भूखे और लालची किस्म के लोगों की लौबी होती है|

धर्म जनता की मानसिकता और सोच को नियंत्र्रण करने वाला राजनेतिक औज़ार होता है|

धम्म क्या है? धम्म धर्म के खिलाफ सुधार की क्रांति है|धम्म की जरूरत लोगों को कब लगती है? जब धर्म की अति हो जाती है और उनको अहसास हो जाता है की धर्म ही उनके दुखो का मूल कारन है| अगर लोगों को अहसास न हो और आप चलकर उसे धम्म सिखाने जायेंगे तो भी वो आपको दुत्कार देगा|वो कहेगा मैं खुश हूँ धर्म के नाम पर शोषित होने में तुझे क्या?

सारे संसार में दो ही तरह के लोग है एक शोषक दूसरे शोषित| कौन शोषक होगा कौन शोषित होगा ये इस बात से तय होता है की व्यक्ति या कौम की मानसिकता क्या है, ये मानसिकता उस कौम की नीतियों और साहित्य से पनपती है| शोषक का साहित्य और नीतियां आक्रामक होती हैं जो दमन करने की शिक्षा देती हैं वहीँ शोषित की नीतियां और साहित्य बचाव सिखातीं हैं|आप खुद बौद्ध धम्म और उसके विरोधी धर्म के साहित्य और उनके धर्मादेश या नीतियों की तुलना करो तो आप जान जायेंगे की क्यों बौद्ध लोग शोषित हैं वही अबौध लोग शोषक हैं, उद्धरण के लिए बौद्ध धम्म के चित्रों में हथियार कहीं नहीं है अधर्मी को मार डालने का आदेश कहीं नहीं है उल्टा ये शिक्षा है की क्रोध को प्रेम से विजय करो|बहुजन विरोधी दमन निति को अपने लोगों को समझाने में सदियाँ लग जातीं हैं पर फिर भी वो नहीं समझता और अगर समझ जाते हैं तो विरोधी कोई नई नीति ले आते हैं और शोषण जारी रहता है|बौद्ध लोग फिर उस नीति के विरोध में सदियाँ काट देते हैं जब तक वो उसकी काट दूंढ पाते हैं तब तक फिर कोई नई नीति|मैं बौद्ध धम्म के कमजोर पक्ष को ज्यों का त्यों अपनाने के पक्ष में नहीं हूँ| मेरा बौद्ध धम्म में  आत्म सुरक्षा सबसे पहले है क्योंकि ये सारे बहुजन समाज के बुनियादी सावल ‘अगर हम मर गए तो धम्म का क्या करेंगे?’ का जवाब है |

धर्म के पतन पर धम्म आता है और क्योंकि धम्म एक क्रांति होती है और ये क्रांति का नियम है की वो ज्यादा दिन नहीं चलती|मतलब साफ़ है की धम्म के स्थापना के बाद धर्म की बारी जल्दी ही आ जाती है| भारत में धर्म पिछले ढाई हज़ार साल से चल रहा है पर धम्म कुछ सदी ही चला था, अब इसकी दोबारा बरी आ रही है |आब जब धर्म की अति हो चली है तो लोग धम्म की तरफ जा रहे हैं|

ये असल में समय के दो कदम हैं -एक धर्म दूसरा धम्म, लगभग ढाई ढाई हज़ार साल के|हमें देखना ये है की धम्म को ढाई हज़ार साल तक चलाने लायक नीत बना पाएंगे हमारे लोग की नहीं|

धर्म का केंद्र इश्वर और पुरोहितों की सत्ता होती है वही धम्म के केंद्र में मानव और जीवों का भला और सत्य व् न्याय की स्थापना|धर्म ईश्वरवादी हैं वही धम्म अनीश्वरवादी, धर्म जहाँ अन्धविश्वास को बढ़ावा देता है वहीँ धम्म विज्ञानं को बढ़ावा देता है|

वी. आर. नरला, सुप्रसिद्ध तर्कवादी का कथन है, “ईश्वर कुछ नहीं है, ये सिर्फ मन की कल्पना और आस्था है, मन का भ्रम है, क्योकि ईश्वर का कोई भौतिक तथा दृश्य अस्तित्व नहीं होता. ईश्वर सिर्फ ईश्वर के प्रचारक पुरोहित वर्ग के लिए उपयोगी है. ईश्वर अपने अनुयाइयों / श्रद्धालुओं, जिनमें अधिकांश बहुजन (अनुसूचित जाति, जन-जाति तथा पिछड़ा वर्ग के लोग) हैं, के लिए अनुपयोगी है. ईश्वर केवल उनके लिए है, जो ईश्वर के नाम पर धन्धा करते हैं, दान-दक्षिणा लेते हैं. अन्य दूसरे लोगों को ईश्वर के लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं है क्योकि ईश्वर नहीं होता”.

अब भारत फिर धम्म क्रांति की तरफ जा रहा है पर हमें ये ध्यान रखना होगा की जनता को सत्य और सत्मार्ग ज्यादा दिनों के लिए नहीं चाहिए होता| क्रांति के बाद अमन के दिनों में उसे भाषण नहीं चाहिए उसे मस्ती चाहिए| धम्म का डिज़ाइन इस तरह नहीं करना है की हम जनता पर सत्य को थोपें बल्कि हमें ये देखना और समझना होगा की जनता क्या चाहती है हमें सत्य को या धम्म को उसकी चाहत के हिसाब से देना होगा, वर्ना धम्म ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा| जनता जरा सी भी नाराज हुई तो धम्म विरोधियों को मौका मिल जायेगी जनता को धम्म के खिलाफ क्रांति को भड़काने के लिए |

90 प्रतिशत जनता इश्वर चाहती है और आप उसे अनीश्वर वाद सिखाना चाहोगे, हो सकता है उनमे से कुछ समझ भी जाएँ, पर क्योंकि उस समय धर्म की बुराइयाँ नहीं होंगी तो उनको धम्म की अहमियत पता ही नहीं चलेगी| उस समय धर्म और ईश्वरवाद का ऐसा चमकदार प्रचार किया जाएगा की धम्म धरा रह जायेगा|जनता चमत्कार को नमश्कार करती है उसे सत्य नहीं मस्ती चाहिए|

हमें धम्म को बुद्धिजीवी प्रिये ही नहीं रहने देना है हमें इसको आम जनता का प्रिये बना होगा|हमें इसका अपने मूल्यों के दाएरे में रकार जनता के हिसाब से मोड़ना होगा|ये बातें दूर दृष्टी की बातें हैं शायद समझ में ना आयें पर फिर भी कुछ तो धम्म को समझने में मदत मिलेगी ही|

success-in-sight-cycle

PUROHIT SAMYAK

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