भगवान् बुद्ध ने कहा था कि “जिससे हम मोह करते हैं उसकी बुराई नहीं देख पाते”, तो क्या वाकई बौद्ध धम्म के मोह में हम इसकी बुराई नहीं देख पा रहे? जब देखेंगे नहीं तो समझेंगे कैसे? आईये देखें बौद्ध धम्म और इसके विरोध कि बातें| भड़किये नहीं ये आत्ममंथन के लिए है, जब तक हम अपनी कमी नहीं समझेंगे तब तक हम सुधार भी नहीं कर सकते|….Team SBMT


भगवान् बुद्ध ने कहा था कि

“अगर हम अपनी (या अपनी कौम) की दुर्दशा के लिए किसी दूसरे या (उसकी कौम) को जिम्मेदार ठहराते हैं तो इसका मतलब है हमें  (या हमारी कौम को) सुधार कि जरूरत है| अगर हम अपनी (या अपनी कौम) कि दुर्दशा के लिए खुद को (या अपनी कौम को)  जिम्मेदार ठहराते हैं तो इसका मतलब है कि सुधार शुरू हो चुका है| जब हम और हमारी कौम न खुद को और न दूसरों को जिम्मेदार ठहराए तो समझ लेना कि सुधार पूरा हो चुका है”….तथागत गौतम बुद्ध

बहुजन संत कबीर कहते हैं

निंदक नियरे रखिये आँगन कुटी छवाये 

बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुहाये

अर्थात अपनी निंदा करने वाले को अपने करीब रखना चाहिए इतना करीब कि अपने आँगन में ही उसके लिए एक कुटिया बनवा देनी चाहिए | ये निंदक हमारी गर्ल्शन का हमें अहसास करता कहेगा वो भी बिना खर्चे के| जब हम अपनी कल्टी सुचार लेंगे तो हमारी तरक्की निश्चित है|

hum khud jimmedar

ambedkar apne logone ne dhokha

बौद्ध धर्म-दर्शन का विकास एवं ह्रास: भारत के विशेष सन्दर्भ में….   -शालिनी पाण्डेय

    ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में धार्मिक आन्दोलन का उदात्त रूप हम बौद्ध धर्म की शिक्षाओं तथा सिद्धान्तों में पाते हैं जो कई शताब्दियों तक राजाश्रय पाकर भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी ख़ूब फला-फूला। अशोक एवं हर्ष के प्रयास से इस धर्म ने बाहर भी भारत की अमिट छाप छोड़ी विशेषतः दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में। सनातन वैदिक धर्म में आई विसंगतियों और कर्मकाण्ड-जनित विक्षोभ की प्रतिक्रिया स्वरूप उपजा यह धर्म आसानी से जनप्रिय होता चला गया।
    पिछली शताब्दी के सांस्कृतिक जागरण का एक परिणाम था बौद्ध धर्म से सम्बन्धित ज्ञान का विकास। भारतीयों के लिए यह एक गौरव और महिमा का प्रत्यभिज्ञान था। दक्षिण, मध्य और पूर्वी एशिया के बौद्ध देशों के लिए भी विद्या और साहित्य के इस उद्धार ने नवीन परिष्कार और प्रगति को दिशा दी। टर्नर और फाउसबाल चाइल्डर्स और ओल्देनबर्ग, श्रीमान् और श्रीमती राइज डेविड्स, धर्मानन्द कोशाम्बी और बरुआ एवं अन्यान्य विद्वानों के यत्न से पालि भाषा का परिशीलन, अपने प्रकांत रूप में विकसित हुआ। बर्नूफ, मैक्समूलर, कर्न और सिल्वॉलेबी, हर प्रसाद शास्त्री और राजेन्द्र मित्र आदि के प्रयत्नों से लुप्तप्राय बौद्ध संस्कृत साहित्य का पुनरुद्धार हुआ। क्सोमा द कोरोस, शरच्चन्द दास, विद्याभूषण और पुर्से आदि ने तिब्बती भाषा, बौद्ध न्याय, सर्वास्तिवादी अभिधर्म आदि के आधुनिक ज्ञान का विस्तार किया। कनिंघम और मार्शल, स्टाइन, फ्यूशेर तथा कुमारस्वामी आदि विद्वानों ने बौद्ध पुरातत्त्व और कलावशेषों की खोज़ तथा उनके सापेक्ष काल-निर्धारण किया। नाना भाषाओं और पुरातत्त्व के गहन परिशीलन के उपरान्त शताधिक वर्षों के इस आधुनिक प्रयास ने बौद्ध धर्म की जानकारी को एक विशाल और जटिल कलेवर प्रदान किया है।
    सदियों से आज तक विदेशों में अपना परचम लहराता यह धर्म धर्म-जगत की अगुवाई करता रहा है, किन्तु इसके उत्स-केन्द्र भारत में ही इसकी वर्णनातीत दयनीय दशा का कारण इसके अन्ध भक्त ही हो सकते हैं, क्योंकि आजकल भारत में यह प्रथा अधिक प्रचलित है कि सनातन धर्म के विरोध स्वरूप बौद्ध धर्म अपना लो चाहे इसके सिद्धान्तों का किंचित भी ज्ञान न हो। आज तो भारत में बौद्ध धर्मानुयायी सरकार द्वारा प्रदत्त अल्पसंख्यकों के लिए अनुदान का भी लाभ उठा रहे हैं भले ही हिन्दू रीति-रिवाजों का पालन कर रहे हों। एक हाथ में दो-दो लड्डू। यह प्रथा इस धर्म के गुणात्मक ह्रास का कारण है। फलतः वह मुक्ति का साधन न होकर विरोध का साधन ज्यादा हो गया है। वैसे तो सभी धर्म हमें उच्चतम मूल्यपरक नैतिक जीवन जीने की कला बताते हैं पर जब कोई धर्म विरोध का पर्याय बन जाय तो उसकी अधः गति सुनिश्चित है। भारत में बौद्ध धर्म की यही नियति बनी। जो दुःखद है। फाहियान, सुंगयुन, युवानच्वांग, इ-कुंग के विवरणों से बौद्ध धर्म के मध्य एशिया और भारत में क्रमिक ह्रास की सूचना मिलती है जिसकी अन्य साहित्यिक और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से पुष्टि होती है। प्रमाण है कि अनेक बौद्ध सूत्रों में सद्धर्म की अवधि 500 अथवा 1000 अथवा 1500 वर्ष बताई गयी है। कपिलवस्तु, श्रावस्ती, गया और वैशाली में इसका ह्रास गुप्त युग में ही दिखायी पड़ने लगा था। गान्धार और उड्डियान में हूणों के कारण सद्धर्म की क्षति हुई प्रतीत होती है। युवांगच्वांग ने पूर्वी दक्षिणापथ में बौद्ध धर्म को लुप्तप्राय देखा। इत्सिंग ने अपने भाषा में केवल चार सम्प्रदायों- महासांघिक, स्थविर, मूलसर्वास्तिवादी एवं सम्मतीय, को भारत में प्रचारित पाया। विहारों में हीनयानी एवं महायानी मिश्रित थे। सिन्ध में बौद्ध धर्म अरब शासन के युग में क्रमशः क्षीण और लुप्त हुआ। गान्धार और उड्डियान में बज्रयान और मन्त्रयान के प्रभाव से बौद्ध धर्म का आठवीं शताब्दी में कुछ उज्जीवन ज्ञात होता है किन्तु अल्बेरूनी के समय तक तुर्की प्रभाव से वह ज्योति लुप्त हो गयी थी। कहने में गुरेज़ नहीं कि बज्रयानी-कदाचार ही इसका प्रमुख कारण बना। कश्मीर में भी इस्लाम के प्रभुत्व की स्थापना के कारण उसका लोप मानना चाहिए। पश्चिमी एवं मध्य भारत में राजकीय उपेक्षा, ब्राह्मण तथा जैन धर्मों के प्रसार के कारण सद्धर्म का लोप प्रतीत होता है। मध्य प्रदेश में गुप्त काल से ही राजकीय पोषण के अभाव के कारण इसका क्रमिक ह्रास देखा जा सकता है। मगध और पूर्व देश में पाल नरेशों की छत्र-छाया में बौद्ध धर्म और उसके शिक्षा केन्द्र नालन्दा, विक्रमशिला, ओदन्तपुरी अपनी ख्याति के चरम शिखर पर पहुँचे परन्तु इस प्रदेश में इसके ह्रास का कारण तुर्कों का विजय अभियान हुआ।
    यह स्पष्ट है कि बौद्ध धर्म के ह्रास का मुख्य कारण उसका अपने को लौकिक-सामाजिक जीवन का अनिवार्य अंग न बना पाना था। वैसे भी बौद्ध धर्म एक दर्शन है न कि जीवन जीने की आदर्श नियम संहिता, जिसको अपेक्षा थी एक विद्वत समाज की जो धर्म और दर्शन को भली-भांति समझ सके। अतः यह धर्म लोक जीवन से कटता गया। राजकीय उपेक्षा अथवा विरोध से विहारों के संकटग्रस्त होने पर उपासकों में सद्धर्म अनायास लुप्त होने लगता था। यह स्मरणीय है कि उदयनाचार्य के अनुसार ‘‘ ऐसा कोई सम्प्रदाय न था कि सांवृत्त कहकर भी वैदिक क्रियाओं के अनुष्ठान को स्वीकार न करता हो।‘‘ उपासकों के लिए बौद्ध धर्म केवल शील अथवा ऐसी भक्ति के रूप में था जिसे ब्राह्मण धर्म से मूलतः पृथक् कर सकना जनता के लिए उतना ही कठिन था जितना शून्यता तथा नैरात्मवाद के सिद्धान्तों को समझ सकना। कदाचित ही आज की बुद्धिवादिनी जनता के लिए शील, प्रज्ञा एवं समाधि का धर्म पहले की अपेक्षा अधिक उपयुक्त हो। वैसे भी जनसामान्य को सच्चा, शालीन और सहज जीवन-दर्शन चाहिए न कि गूढ़, रहस्यवादी योगतन्त्र और विज्ञानवाद।
सन्दर्भ ग्रन्थ-
  • विकिपीडिया, बुद्ध और बौद्ध धर्म
  • शिंसौ हानायामा: बिब्लियोग्राफी ऑन बुद्धिज्म
  • विंटरनित्स: हिस्ट्री ऑव् इंडियन लिट्रेचर, जि. 2, कलकत्ता, 1933.
  • हेल्ड, दॉइचे: बिब्लियोग्राफी देस बुद्धिज्म्स: लाइ-पज़िग, 1916 मार्च.
  • ए बुद्धिस्ट बिब्लियोग्राफी, लन्दन, 1935.
  • बिब्लियोग्राफी ऑव् इण्डियन ऑर्कियोलॉजी (लाइडेन) विण्टरनित्स, पूर्वोद्धृत, पृ. 507.
  • केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑव् इण्डिया, जि. 1, रायचौधरी, पोलिटिकल हिस्टी ऑव् एंशेंट इण्डिया.
  • मैकडॉनेल एण्ड कीथ: वैदिक इण्डेक्स.
  • बरुआ: हिस्ट्री ऑव् प्री बुद्धिस्टिक इण्डियन फिलॉसफी.
  • दत्त एवं चटर्जी: एन इण्ट्रोडक्शन टू इण्डियन फिलॉसफी.
                                                           -शालिनी पाण्डेय
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!! अहिंसा परमो धर्म की निति के कारण देश हुआ गुलाम !!…

भारत लगभग एक हज़ार वर्ष विदेशियों का गुलाम रहा जिसमे मुस्लिम शासको ने लम्बी  अवधि तक भारत पर शासन किया, क्या कारण था की भारत जो प्राचीन काल में वीरो की भूमि कहलाता  था  उनकी संताने इतनी आसानी से हार मान गयी थी? इसका मूल कारण बौध और जैन धर्म का अति अहिंसावादी होना था|
बौध और जैन धर्म मूल शिक्षा ‘अहिंसा ‘ है , जैन धर…्म तो ‘अहिंसा परमो धर्म ‘ मन गया है |
सम्राट अशोक के बौध धर्म अपनाने के बाद उसने युद्ध करना बिलकुल छोड़ दिया था और अहिंसा का प्रचार-प्रसार करने लगा था यहाँ तक की उसने शिकार खेलने तक पर रोक लगा दी थी| युद्ध न करने के कारण सैनिक कमजोर पड़ते गए और  वो अपनी सैन्य कलाएं  भूलते गए और इसी प्रकार से अहिंसा का प्रजा  के बीच अधिक प्रचार करने से प्रजा भी अहिंसक हो गयी जो आसानी से किसी भी आक्रमणकारी का शिकार बन सकती थी|
यही कारण था की ७११ में जब मुहम्मद बिन कासिम ने  मात्र ३००० सैनिको के साथ  सिंध पर आक्रमण किया तो उसने आसानी से दाहिर को हरा दिया जो उस समय सिंध का राजा हुआ करता था क्यूँ की वहाँ  बौधो की संख्या अधिक थी| उसके बाद गौरी-गजनवी आये और उन्होंने अफगानिस्तान जहाँ बौधो का शासन था उन्होंने वहा से  बौधो का नामोनिशान मिटा दिया|
इसी तरह से जैन धर्म भी अति अहिंसा वादी होने के कारण विदेशी आक्रमणकारियों का मुकाबला नहीं कर सका चूँकि ये दोनों ही धर्म सनातन धर्म की शाखांए मानी जाती है और  इनकी शिक्षाओं का प्रभाव हिंन्दुओ पर पड़ा और वो भी अहिंसक हो गए जिस कारण वो भी मुगलों का सामना नहीं कर पायें और गुलामी सही |
पर प्रशन यह भी उठाता है की जब लाडाकू जाती के हाथ में सता आ गयी फिर देश क्यों गुलाम हुआ ???

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हमने पिछली बार यह चर्चा की थी कि किस तरह बौद्ध धर्म पर भी सनातन धर्म की कुरीतियां हावी हो गईं, और वह छाया कितनी बड़ी हो गई. बौद्ध धर्म के श्रावयकयान से सहजयान बनने तक की दूरी बहुत ज़्यादा है और इन दोनों के रूप भी परस्पर मेल नहीं खाते हैं. दरअसल हीनयान ही बुद्ध का मौलिक धर्म था और बाद को महायान हो या सहजयान, दरअसल वे बौद्ध धर्म के पतन के ही प्रतीक थे. मौलिक तौर पर बुद्ध ने भोग के त्याग एवं आचारों की पवित्रता को ही प्रधान माना था, लेकिन बाद के काल में जिन सांसारिक सुखों को बुद्ध ने निर्वाण पाने में बाधा बताया था, वही सुख बौद्ध धर्म और आचार के प्रधान हो गए.

बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा पर तो शाक्त और वामाचारी प्रभाव बुरी तरह हावी हो गए. शाक्तों में तंत्र-मंत्र और योग की प्रधानता है. उनका भी दर्शन दरअसल अद्वैत दर्शन से प्रभावित है. जब परमात्मा और तत्व एक हो जाते हैं, तो दरअसल उनके बीच का भेद भी मिट जाता है, वामाचार असल में शून्य से शून्य की यात्रा है. इस दर्शन के अनुसार पुरुष और प्रकृति (नारी) का मिलन ही असल में मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति का रास्ता है.

बुद्ध ने नारियों का प्रवेश निषिद्ध बताया था, लेकिन जब स्त्रियां भी मठों और संघों में (अक्सर युवतियां) प्रवेश करने लगीं, तो भिक्षुओं का ब्रह्मचारी रहना लगभग असंभव हो गया. अपने स्खलन को जायज़ ठहराने के लिए ही फिर उन्होंने तरह-तरह के तर्क गढ़े. बौद्ध धर्म शास्त्र चूंकि उनके कार्यों का समर्थन नहीं करते थे, इसीलिए इन लोगों ने अपने समाज को गुह्य समाज का नाम दिया. इसी तरह जब उनके समाज में अधिक लोग हो गए, तो उन्होंने अपना धर्मशास्त्र तक बना लिया. इनके पहले धर्मशास्त्र का नाम ही गुह्य-समाज तंत्र था. मज़े की बात तो यह कि इसमें ख़ुद बुद्ध के मुंह से कहलवा दिया गया कि तंत्र-मार्ग का बौद्ध धर्म से कोई विरोध नहीं है.

कुल मिलाकर, बौद्ध धर्म तो महायान की शुरुआत से ही तंत्र-मार्ग की ओर झुकने लगा था. हां, चौथी शताब्दी के बाद तो यह मुख्य तौर पर तंत्र-मार्ग का ही अनुसरण करने लगा. इसके बाद वज्रयान के आते-आते तो बौद्ध धर्म की तमाम मान्यताओं को ही सिर के बल खड़ा कर दिया. पहली बार, इसमें बताया गया कि समाधि और योग में सफलता पाने के लिए शक्ति यानी स्त्री की उपस्थिति ज़रूरी है. तंत्रमार्ग का सार यह है कि विष ही विष को काट सकता है. इसी तरह जब मानव अद्वैतवादी हो जाता है, तो फिर खाद्य, अखाद्य, पेय-अपेय का तो प्रश्न ही नहीं उठता. पंच मकारों-मत्स्य, मांस, मदिरा, मुद्रा और मैथुन-के उपयोग से तंत्रमार्गी साधना का जन्म भी इसी तर्क पर हुआ. हालांकि, इसके बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़े और तांत्रिकों को भय की नज़र से ही देखा जाने लगा. इस पर चर्चा और विस्तार से करेंगे, फिलहाल तो बौद्ध धर्म के पतन की बात.

गुह्य-समाज तंत्र से वज्रयान की यात्रा तक तो बुद्ध के तमाम सिद्धांतों की क़ब्र खोद दी गई. जिस शारीरिक कष्ट और त्याग की शिक्षा बुद्ध ने दी थी, उसे ही नकार दिया गया. गुह्य समाज वालों ने खुली घोषणा की कि कृच्छाचार (शरीर को कष्ट देना) से निर्वाण नहीं मिलता, बल्कि वह तो प्रकृति के ख़िला़फ जाना है. इस समाज की मान्यता थी कि वज्रयानी साधुओं को नियमों से सर्वथा स्वाधीन होकर विचरने से भी पाप नहीं लगता है. जब उस तंत्र का बोलबाला हुआ, तो बौद्ध साधक औघड़ों को भी मात देने लगे. यहां तक कि वज्रयान के प्रसिद्ध चौरासी सिद्ध अद्‌भुत प्रकार से रहा करते थे. इनके नाम भी अजब होते थे. ये शराब में मस्त, श्मशानवासी लोग खुलेआम स्त्रियों का उपभोग करते थे. इन सबके बाद बौद्ध धर्म के पतन में शेष ही क्या रह गया था?

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  1. बौद्ध समाज सेवा संस्था बोदवड यांचे डाँ बाबासाहेब आंबेडकर वाचनालयासाठि पुस्तकांची आवश्यकता आहे .कृपया मदत करा सुरेन्द्र पालवे 9860520535

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