भगवन बुद्धा, धम्म, सम्राट अशोक महान और बाबा साहब आंबेडकर केवल भारत बहुजनों के प्रेरणा स्रोत नहीं हैं सारा विश्व इनसे प्रेरित है।…Satyajit Maurya


भगवन बुद्धा, धम्म, सम्राट अशोक महान और बाबा साहब आंबेडकर केवल भारत बहुजनों के प्रेरणा स्रोत नहीं हैं सारा विश्व इनसे प्रेरित है।

bahujan

 सम्राट अशोक के प्राचीन प्रबुद्ध भारत के शिलालेखो के बौद्ध विधानों का प्रभाव दक्षिण कोरिया के सविधान और जनमानस पर पिछले 2300 वर्षो से दिखाई देता है। दक्षिण कोरिया में सम्राट अशोक की पहचान King Ayuk (Muwa) की है। विश्व्जगत में दक्षिण कोरिया सातवा अमिर राष्ट्र है। और यहाँ के साधारण व्यक्ति की प्रति महा औसत आमदनी 900 $ डालर है। दक्षिण कोरिया की महिलाए, पुरुषो से काफी हद तक आगे निकल चुकी है, यहाँ शादियों का प्रितिशत कम और अविवाहित का प्रतिशत जादा है। और कामकाजी महिलाओं का प्रितिशत 75 % है। यहाँ महिलाओं और पुरुषो में भेदभाव कही पर भी नहीं है। यहाँ की महिलाये अपने स्वातंत्रअधिकारों के प्रति पुरुषो से जादा जागृत है। ठीक वैसे ही है जैसे सम्राट अशोक के प्रबुद्ध भारत के समय में थी। सामाजिक कार्यो में महिलाओ का प्रतिशत पुरुषो से जादा है जिससे यहा गुनाहों का प्रतिशत ना के बराबर है….
1) जपान, चीन, ताइवान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया (East Asia) के लोग हमें मिलते है तब इन्हें हमेशा एक सवाल करता हूँ की आप के देशो में बुद्ध और उसके धम्म की शिक्षा को जनमानस क्यों अनुकरण कर रहा है ? और सम्राट अशोक को आप के देशो में विभिन्न्य नामो की उपाधियो से क्यों सन्मानित किया गया है ? तब पूर्व एशिया के नागरिको का एक ही जवाब होता है ‘बुद्ध की शिक्षा हर एक राष्ट्र के नागरिक को अपने राष्ट्रों के स्वत्रंतअधिकारों के तहत धम्म को अपनाने की विशेष स्वायत्तता (Special Autonomie) के अधिकार देती है, बुद्ध की शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्रों को संक्रिन और संकुचित मानसिकता के बंधन में नहीं बांधती’। सम्राट अशोक को पूर्व एशिया में विभिन्न्य नामो की उपाधियो से इस लिए सन्मानित है क्योंके सम्राट अशोक ने बुद्ध के शिक्षा के सामाजिक स्वरूप (social engaged Buddhism) के सामजिक दाइत्व को निर्वाह करने के लिए एशिया में बौद्ध विधानों के नैतिक आचार संहिता का विकास किया है इसलिए पूर्व एशिया में सम्राट अशोक विभिन्न्य नामो से पूर्व एशिया में उपाधियो से सन्मानित है….2) बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर की पहचान जपान, चीन, ताइवान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया पूर्व एशिया (East Asia) में बुद्ध के शिक्षा को पुनर्जीवित और बौद्ध नैतिक आचार संहिता के आधार पर सम्राट अशोक के बाद ‘बुद्ध के सामाजिक पथ में परिवर्तन’ के महानायक के रूप में है! पूर्व एशिया के बौद्ध सामाजिक संघटन भारत के बौद्धों के साथ एक रूप होना चहाते है ताकि मिलकर भारत में बुद्धिज्म के सामजिक आर्थिक दृष्टी से विकास हो सके|साहू जी महाराज ने सही कहा था की आंबेडकर के रूप में पिछड़े बहुजनों को अपना नेता मिल गया है | आज आंबेडकर और भगवान् बुद्धा ऐसे झंडे का काम कर रहे हैं जिनके लिए सारा बहुजन समाज संगठित हो रहा है एक दूरे के सुख दुःख को समझ रहा है, साथ दे रहा है |

satyajitgc@yahoo.co.in
मानवप्राणी के जीवन-स्तर को सुधारने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अधिक पढ़ाई करने के लिए अच्छी किताबे पड़नी चाहिए और प्रभावशाली तर्क देने चाहिए! बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने यही किया और इन्होने यह भी कहा कि एशिया के इतिहास का फिर से अनुसन्धान होना चाहिए, यह वक्तव्य “बुद्ध के वास्तविक इतिहास के सच्चाई और शिक्षा को संचारित करने के लिए प्रबल सहयोग दर्शाता है! हर एक व्यक्ति पड़े और लिखे, किन्तु हर एक व्यक्ति कि पड़ने-लिखने कि अपनी एक क्षमता होती है और उसके अपने तर्क होते है! तर्को कि अन्यो के साथ तुलना करना वास्तविक स्वादिष्ट भोजन को स्वादहीन करने के जैसा होता है!

बुद्ध और बुद्धिज्म के इतिहास का 2500 साल का उत्सव-समारोह बड़े हर्ष के साथ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशो में मनाया गया और हर साल मनाया जाता है इसमें अरब देश के बौद्ध साहित्य और इतिहास के मुस्लिम विद्धवान अपना प्रतिनिधित्व दर्ज करते है! लेकिन बुद्ध कि धरती इस उत्सव को लेकर ओझल थी और है! किसी को दोष देने से समस्याओ का समाधान नहीं होता क्योंकि कुछ हद तक इस स्थिति के लिए हम स्वयं भी दोषी है! ‘अरब के मरुभूमि में बुद्ध’ इस विषय के लेखन पर अरब के चर्चित मुस्लिम विद्धवानो के संदर्भ देकर उनके तर्क दे सकता हूँ लेकिन लेखनी में तर्क मेरे है, ना कि उनके फिर संदर्भ कि आवश्कता क्यॉ है ?

अरब, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम के विश्व के जानेमाने और चर्चित विद्धवानो के बुद्ध के शिक्षा और उनके इतिहास पर लिखित अनेको विवरण पड़ने के बाद यह दिखाई दिया कि विश्व के बौद्ध साहित्कार या इतिहासकार इन्होने कही पर भी उल्लिखित नहीं किया कि अंत: बुद्ध के प्रचार कि प्रणाली (system) कैसे थी? और सम्राट अशोक को 84000 स्तूप निर्माण करने कि आवश्कता क्यों थी ? बुद्ध के शिक्षा और इतिहास को लेकर दुनिया भर का साहित्य का लेखा उपलब्ध है! लेकिन बुद्ध के प्रचार प्रणाली (system) और सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 84000 स्तूपो से सामाजिक-आर्थिक विकास के संदर्भ में दस पुष्टो कि साधारण किताब उपलब्ध नहीं होती यह विश्व शोध-कर्ताओं का शोध कार्यो का लेखा है!

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