इस धरती पर मानवता ही नहीं सारे जीवों का एकमात्र तारक है बौद्ध धम्म…डीडी बंदिष्टे


buddhist flagवैश्विक दृष्टि रखने वाले किसी भी इंसान को दिखाई देगा कि मानव का अस्तित्व खतरे में है। वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव जैविक विकास की प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मानव का अस्तित्व न अनादि है, न ही अनंत। हमारे सूर्य की ऊष्मा कम हो रही है और कुछ अब्ज वर्षों बाद वह इतना ठंडा पड़ जाएगा कि किसी भी प्राणी के जिंदा रहने लायक ऊष्मा उससे किसी को भी मिलेगी ही नहीं। 

तब मानव ही नहीं, बल्कि कोई भी प्राणी जिंदा नहीं रहेगा, परंतु वह संकट की घड़ी काफी दूर है। इस बीच में मानव की मूर्खता के कारण दो तरह से मानव का अस्तित्व संकट में है। इस संकट की घड़ी में बुद्ध या बुद्ध का धम्म हमारी कैसे मदद कर सकते हैं? अपितु वह मदद कोई और नहीं, बल्कि केवल धम्म ही कैसे कर सकता है?

धम्म’ यह बुद्ध द्वारा प्रस्तावित बुद्धिवादी नैतिकता है। वह नया धर्म नहीं है। धम्म यह शब्द धर्म शब्द का अपभ्रंश नहीं है। बुद्ध ने हमें नए प्रकार की धम्म नाम की एक नई नैतिकता दी है, नया धर्म नहीं दिया। दुर्भाग्य से बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात बुद्ध के शिष्यों ने बुद्ध को भी भगवान बना दिया और धम्म को भी धर्म बना दिया। अन्य धर्मों के जैसी ही बुद्ध की मूर्तियाँ पूजी जाती हैं, संकट निवारण हेतु मन्नतें मानी जाती हैं आदि, परंतु ये सब बुद्ध की मूल शिक्षा के विपरीत है।

बुद्ध द्वारा प्रणीत धम्म का स्वरूप ही ऐसा है कि वह हमारी हर संकट में मदद करेगा। धम्म इस नैतिकता के विषय में बुद्ध स्वयं कहते हैं कि उनकी बताई नैतिकता अंतिम शब्द नहीं है। समाज तथा परिस्थिति बदलने के साथ लोग अपनी बुद्धि के आधार पर उसमें आवश्यक परिवर्तन कर सकते हैं। वे यह भी कहते थे- लोगों ने उनकी बताई नैतिकता की हर तरह से परीक्षा कर लेने के बाद वह समाज के लिए हितकारक है, यह देखने के बाद ही उस पर चलना चाहिए। इन कारणों से बुद्ध का धम्म कभी भी कालबाह्य नहीं होगा, न ही उसके नाम पर, धर्मों के नाम पर होते हैं ऐसे झगड़े भी होने चाहिए। एक और महत्व की बात जो धम्म को कालजयी बना देती है, वह है कि वह तथ्यों पर आधारित है।

बुद्ध के अनुसार सब अस्तित्व क्षणिक मात्र होते हैं। अतः प्राणियों में तथा इंसानों में अजन्म, अचल, अपरिवर्तनशील, अमर आत्मा नहीं होती। हर अस्तित्व में कोई स्वाभाविक शक्ति होती है, जो अपने जैसे ही एक अस्तित्व को जन्म देती है। इस तरह कोई भी अस्तित्व क्षणिक होने के बावजूद अपने परिणाम के रूप में बना रहता है। पूरी तरह से स्थायी और पूरी तरह से उच्छेद के बीच का यह मध्यम मार्ग है। हर अस्तित्व, कारण के रूप में क्षणभर टिकने के बाद परिणाम के रूप में बना रहता है। कारण-परिणाम की यह श्रृंखला अनादि है और अनंत भी है।

 
हर अस्तित्व का कोई न कोई कारण अवश्य होता है भले ही कभी-कभी वह अज्ञात हो, परंतु कारण-परिणाम की श्रृंखला का अनादि होना विश्वनिर्माता ईश्वर को निरस्त कर देता है। इस तरह के वैज्ञानिक सोच के कारण बुद्ध ईश्वर, आत्मा आदि को अमान्य कर देते हैं तथा शुद्ध रूप से लौकिकवादी बन जाते हैं। आत्मा के अभाव में पुनर्जन्म भी निरस्त हो जाता है। हमें जीने के लिए बुद्ध के अनुसार केवल वर्तमान एक ही जन्म उपलब्ध है।

तो क्या हम इस एक जन्म को खाने-पीने और मौज उड़ाने में बिता दें! बुद्ध ऐसा करने को मना करते हैं। वे कहते है कि ऐसा करने से अस्तित्व के ही अन्य पहलुओं की ओर दुर्लक्ष तथा अन्याय होगा। विश्व में केवल कोई एक ही अस्तित्व तो नहीं है। पास-पड़ोस में अनेक अस्तित्व भी होते हैं। हर अस्तित्व का संबंध जिस तरह अपने-अपने कारण-परिणाम से आता है, उसी तरह पड़ोस के कितने ही अन्य अस्तित्वों से भी आता है, कभी वह मित्रता का, कभी शत्रुता का तो कभी तटस्थता का भी हो सकता है। कोई भी अस्तित्व एक अकेला ही नहीं होता।

मनुष्य का ही उदाहरण हम लें। वह अपने अस्तित्व तथा विकास के लिए कितने ही अन्य अस्तित्वों पर निर्भर होता है। जितने लोगों को आप दुःखी करोगे, उतने ही आपको दुःखी करने का मौका ढूँढेंगे और जितने लोगों का दुःख आप दूर करेंगे, उतने ही ज्यादा लोग आपकी मदद करेंगे। स्वार्थी और दुष्ट व्यक्ति हर समय आशंकित रहते हैं। स्वार्थ और लालच दुःखों की जड़ें हैं। प्रबुद्ध व्यक्ति को प्रज्ञा, उपेक्षा, करुणा तथा मुदिता का संवर्द्धन करना चाहिए। बुद्ध कहते थे कि जन्म-विकास-क्षण और मृत्यु ये जैविक प्रक्रिया के वैश्विक तथा अनिवार्य अंग हैं। बुढ़ापा और मृत्यु के लिए तैयार रहना चाहिए तथा लालच को रोक दिया तो दुःख भी निरस्त हो जाएँगे। यही बुद्धप्रणीत धम्म है।

यह बुद्धप्रणीत धम्म हमें अस्तित्व संकट से कैसे बचाएगा? स्पष्ट है कि प्रबुद्धता आने से ‘हम और वे’ वाला दृष्टिकोण जाएगा और ‘हम-सब’ वाला दृष्टिकोण आएगा। अणुयुद्धों की संभावना निरस्त होगी। मस्तीभरे जीवन की जगह अगर हमने प्रबुद्ध व आत्मसंयमभरा जीवन जीना शुरू किया तो प्रदूषण, जनसंख्या विस्फोट व तत्संबद्ध बुराइयाँ कम होंगी। बुद्ध के समय पड़ोसी निकटस्थ व्यक्ति होते थे तथा सद्गुण-दुर्गुण भी व्यक्ति निष्ठ थे, परंतु अब दुर्गुण-सद्गुणों से सामाजिक पहलू भी जुड़ गए हैं। यही वास्तविकता है। अब चीन, जापान, इंग्लैंड, अमेरिका भी अपने पड़ोसी हैं। या तो सब रहेंगे या सब नष्ट होंगे। धम्म, उसको चाहे जो नाम हम दें, प्रबुद्धता पर आधारित जिंदगी जीने का एक रास्ता है। जिंदा रहना हो तो हमें उसे अपनाना ही होगा। न अन्य पंथः विधते अयनाय।

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