बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है, बौद्ध होने का मतलब ऐसा इंसान होना है जो जागृत है अर्थात सत्य कि सत्य और असत्य को असत्य समझने में सक्षम है और बुद्ध मार्ग द्वारा अपने दुखों से मुक्ति पाने के प्रयास में लगा हुआ है// ओशो प्रवचन ” जो ‘जागा’, वही ‘बुद्ध’ ”……ओशो

DHAMMA or DHARMA

” जो ‘जागा’, वही ‘बुद्ध’ ” ~ ओशो : –
” ‘बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है’| ‘गौतम बुद्ध एक नाम है’| ‘ऐसे और अनेंकों नाम हैं|’ धम्मपद के अंतिम सूत्रों का दिन आ गया!
लंबी थी यात्रा, पर बड़ी प्रीतिकर थी। मैं तो चाहता था-सदा चले। बुद्ध के साथ उठना, बुद्ध के साथ बैठना; बुद्ध की हवा में डोलना, बुद्ध की किरणों को पकड़ना; फिर से जीना उस शाश्वत पुराण को; बुद्ध और बुद्ध के शिष्यों के बीच जो अपूर्व घटनाएं घटीं, उन्हें फिर से समझना-बूझना-गुन ना; उन्हें फिर हृदय में बिठालना-यात्रा अदभुत थी।
पर यात्रा कितनी ही अदभुत हो, जिसकी शुरूआत है, उसका अंत है। हमकितनी ही चाहें, तो भी यहां शाश्वता नहीं हो सकता। यहां बुद्ध भी अवतरित होते हैं और विलीन हो जाते हैं। औरों की तो बात ही क्या! यहां सत्य भी आता है, तो ठहर नहीं पाता। क्षणभर को कौंध होती है, खो जाता है। यहां रोशनी नहीं उतरती, ऐसा नहीं। उतरती है। उतर भी नहीं पाती कि जाने का क्षण आ जाता है।
बुद्ध ने ठीक ही कहा है-यहां सभी कुछ क्षणभंगुर है। बेशर्त, सभी कुछ क्षणभंगुर है। और जो इस क्षणभंगुरता को जान लेता है, उसका यहां आना बंद हो जाता है। हम तभी तक यहां टटोलते हैं, जब तकहमें यह भ्रांति होती है कि शायदक्षणभंगुर में शाश्वत मिल जाए! शायद सुख में आनंद मिल जाए। शायदप्रेम में प्रार्थना मिल जाए। शायद देह में आत्मा मिल जाए। शायद पदार्थ में परमात्मा मिल जाए। शायद समय में हम उसे खोज लें, जो समय के पार है।
पर जो नहीं होना, वह नहीं होना। जो नहीं होता, वह नहीं हो सकता है।
यहां सत्य भी आता है, तो बस झलक दे पाता है। इस जगत का स्वभाव ही क्षणभंगुरता है। यहां शाश्वत भी पैर जमाकर खड़ा नहीं हो सकता! यह धारा बहती ही रहती है। यहां शुरुआत है; मध्य है; और अंत है। और देर नहीं लगती। और जितनी जीवंत बात हो, उतने जल्दी समाप्त हो जाती है। पत्थर तो देर तक पड़ा रहता है। फूल सुबह खिले, सांझ मुरझा जाते हैं।
यही कारण है कि बुद्धों के होने का हमें भरोसा नहीं आता। क्षणभर को रोशनी उतरती है, फिर खो जाती है। देर तक अंधेरा-और कभी-कभी रोशनी प्रगट होती है। सदियां बीतजाती हैं, तब रोशनी प्रगट होती है। पुरानी याददाश्तें भूल जाती हैं, तब रोशनी प्रगट होती है। फिरहम भरोसा नहीं कर पाते।
यहां तो हमें उस पर ही भरोसा ठीक से नहीं बैठता, जो

रोज-रोज होता है। यहां चीजें इतनी स्वप्नवत हैं! भरोसा हो तो कैसे हो। और जो कभी-कभी होता है सदियों में, जो विरल है, उस पर तो कैसे भरोसा हो! हमारे तो अनुभव में पहले कभी नहीं हुआ था, और हमारे अनुभव में शायद फिर कभी नहीं होगा।
इसलिए बुद्धों पर हमें गहरे में संदेह बना रहता है। ऐसे व्यक्ति हुए! ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं? और जब तक ऐसी आस्था प्रगाढ़ न हो कि ऐसे व्यक्ति हुए हैं, अब भी हो सकते हैं, आगे भी होते रहेंगे-तब तक तुम्हारे भीतर बुद्धत्व का जन्म नहीं हो सकेगा। क्योंकि अगर यह भीतर संदेह हो कि बुद्ध होते ही नहीं, तो तुम कैसे बुद्धत्व कीयात्रा करोगे? जो होता ही नहीं, उस तरफ कोई भी नहीं जाता।
जो होता है-सुनिश्चित होता है-ऐसी जब प्रगाढ़ता से तुम्हारे प्राणों में बात बैठ जाएगी, तभी तुम कदम उठा सकोगे अज्ञात कीosho36 ओर।
इसलिए बुद्ध की चर्चा की। इसलिए और बुद्धों की भी तुमसे चर्चा कीहै। सिर्फ यह भरोसा दिलाने के लिए; तुम्हारे भीतर यह आस्था उमगआए कि नहीं, तुम किसी व्यर्थ खोज में नहीं लग गये हो; परमात्मा है। तुम अंधेरे में नहीं चल रहे हो, यह रास्ता खूब चला हुआ है। औरभी लोग तुमसे पहले इस पर चले हैं। और ऐसा पहले ही होता था-ऐसा नहीं। फिर हो सकता है। क्योंकि तुम्हारे भीतर वह सब मौजूद है, जोबुद्ध के भीतर मौजूद था। जरा बुद्ध पर भरोसा आने की जरूरत है।

और जब मैं कहता हूं: बुद्ध पर भरोसा आने की जरूरत, तो मेरा अर्थगौतम बुद्ध से नहीं है। और भी बुद्ध हुए हैं। क्राइस्ट और कृष्ण, और मुहम्मद और महावीर, और लाओत्सू और जरथुस्त्र। जो जागा, वही बुद्ध। बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है। गौतम बुद्ध एकनाम है। ऐसे और अनेंकों नाम हैं।
गौतम बुद्ध के साथ इन अनेक महीनों तक हमने सत्संग किया। धम्मपद के तो अंतिम सूत्र का दिनआ गया, लेकिन इस सत्संग को भूल मतजाना। इसे सम्हालकर रखना। यह परमसंपदा है। इसी संपदा में तुम्हारा सौभाग्य छिपा है। इसी संपदा में तुम्हारा भविष्य है।
फिर-फिर इन गाथाओं को सोचना। फिर-फिर इन गाथाओं को गुनगुनाना। फिर-फिर इन अपूर्व दृश्यों को स्मरण में लाना। ताकिबार-बार के आघात से तुम्हारे भीतर सुनिश्चित रेखाएं हो जाएं। पत्थर पर भी रस्सी आती-जाती रहतीहै, तो निशान पड़ जाते हैं।

इसलिए इस देश ने अनूठी बात खोजी थी, जो दुनिया में कहीं भी नहीं है। वह थी-पाठ। पढ़ना तो एक बात है। पाठ बिलकुल ही दूसरी बात है।पढ़ने का तो अर्थ होता है: एक किताब पढ़ ली, खतम हो गयी। बात समाप्त हो गयी। पाठ का अर्थ होताहै: जो पढ़ा, उसे फिर पढ़ा, फिर-फिर पढ़ा। क्योंकि कुछ ऐसी बातें हैं इस जगत में, जो एक ही बार पढ़ने से किसकी समझ में आ सकती हैं! कुछ ऐसी बातें हैं इस जगत में, जिनमेंगहराइयों पर गहराइयां हैं। जिनको तुम जितना खोदोगे, उतने ही अमृत की संभावना बढ़ती जाएगी। उन्हीं को हम शास्त्र कहते हैं। किताब और शास्त्र में यही फर्क है। किताब वह, जिसमें एक ही पर्त होती है। एक बार पढ़ ली और खतम हो गयी। एक उपन्यास पढ़ा और व्यर्थ हो गया। एक फिल्म देखी और बात खतम हो गयी। दुबारा कौन उस फिल्मको देखना चाहेगा! देखने को कुछ बचा ही नहीं। सतह थी, चुक गयी।

शास्त्र हम कहते हैं ऐसी किताब को, जिसे जितनी बार देखा, उतनी बार नए अर्थ पैदा हुए। जितनी बारझांका, उतनी बार कुछ नया हाथ लगा।जितनी बार भीतर गए, कुछ लेकर लौटे। बार-बार गए और बार-बार ज्यादा मिला। क्यों? क्योंकि तुम्हारा अनुभव बढ़ता गया। तुम्हारे मनन की क्षमता बढ़ती गयी। तुम्हारे ध्यान की क्षमता बढ़ती गयी।

बुद्धों के वचन ऐसे वचन हैं कि तुम जन्मों-जन्मों तक खोदते रहोगे, तो भी तुम आखिरी स्थान पर नहीं पहुँच पाओगे। आएगा ही नहीं।गहराई के बाद और गहराई। गहराई बढ़ती चली जाती है।

 

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भारत में बौद्ध धर्म का क्षय…दामोदर धर्मानंद कोसांबी द्वारा लिखित किताब ‘भारत में बौद्ध धर्म की क्षय’, 2007

भारत में बौद्ध धर्म का क्षय…दामोदर धर्मानंद कोसांबी द्वारा लिखित किताब ‘भारत में बौद्ध धर्म की क्षय’, 2007buddha india land of buddha
      चीनी यात्री ह्वेन सांग (630 ईसा पश्चात) ने अपनी भारत यात्रा के दौरान जब देखा कि, भारत की इस भूमि में बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ क्षत-विक्षत स्थिति में दबी पड़ी हुई हैं तो उसने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि, उस महान शिक्षक द्वारा स्थापितधर्म तथा उनकी शिक्षाएँ शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगी। बंगाल के शासक शशांक ने बौद्ध प्रतिमाओं को ध्वस्त कर दिया था। यहाँ तक कि उस पवित्र बोधिवृक्ष को काटकर जला दिया था, जिसके नीचे बैठकर बुद्ध को 12 सदियाँ पहले ज्ञान प्राप्त हुआ था।
     

बाद में सम्राट अशोक के अंतिम वंशज पूमावर्मन ने उस बोधिवृक्ष की एक टहनीका पता लगाया और उसे लगाकर पल्लवित और पोषित किया। इसी प्रकार सम्राट हर्ष ने बंगाल के शासक शशांक को पराजित करके बौद्ध धर्म से संबंधित नष्ट हुए प्रतिष्ठानों का पुनरूद्धार किया तथा कई नए मठों और विहारों का निर्माण किया। हजारों बौद्धभिक्षु इन्हीं मठों में रहा और पढ़ा करते थे। उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान करने वाला समृद्ध नालंदाविश्वविद्यालय अपनी प्रतिष्ठा के चरम पर था। सब ठीक लगता था।
      क्षति अन्दरूनी कारणों से हुई। धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के पतन की शुरुआत होने लगी।चीनी यात्री  ह्वेन सांग की रिपोर्ट की बातें सच साबित होने लगी। हालांकि स्वयं ह्वेन सांग को भी इस बात का भान नहीं होगा कि उसकी भविष्यवाणी इतनी जल्दी सच होगी,जब उन्होंने लिखा था-
     

“इस काल में, ऐसे बौद्ध विद्वान जो बौद्ध धर्म की पावन रचनाओं की तीन शिक्षाओं की व्याख्या कर सकते थे, उनकी सेवाओं के लिए विभिन्न प्रकार के सेवकों को नियुक्त किया जाता था। उसे हाथी वाहन दिया जाता था। जो छह शिक्षाओं की व्याख्या करता था उसे सशस्त्र रक्षक दल दिया जाता था। जो सभासद परिमार्जित भाषा में अपनेविचार (तर्क-वितर्क) प्रस्तुत करता था, सघन अध्येयता होता था तथा अपने विषय मेंमाहिर होता था एवं तार्किक होता था, उसे बहुमूल्य आभूषणों से सजे हाथी में बिठाया जाता था। उसके लिए मठों के द्वार सदा खुले रहते थे। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति अपने तर्कों में असफल हो जाता था, तुच्छ और अश्लील मुहावरों का प्रयोग करता था या तार्किक नियमों की अवहेलना करता था तो उसके चेहरे पर लाल तथा सफेद रंग पोत दिया जाता था और उसके शरीर पर धूल तथा मिट्टी का लेप लगा दिया जाता था। या उसे रेतीली जगह पर गहरे खंदक में छोड़ दिया जाता था। इस प्रकार योग्य और अयोग्य,बुद्धिमान तथा मूर्ख की पहचान की जाती थी।” यह किस हालत के लक्षण थे?
     

बुद्ध के समय में योग्यता निर्धारण की यह प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती थी। हमेशा भ्रमण करने वाले बौद्ध भिक्षुओं का कार्य सरल शब्दों में तथा आम भाषा में धर्मपरायणता(सदाचार-संयम) का प्रसार करना था। समृद्ध मठ उन साधारण ग्रामीणों की चिंता नहीं करते थे जिनके श्रम के उत्पादों पर ही इन मठाधीशों की ऐय्याशी चलती थी, और आडंबरी शास्त्रार्थ होते थे।
      बुद्ध द्वारा संचालित नियमों, संयमों और उनके अनुपालन को ध्यान में रखते हुए बौद्ध भिक्षुओं को साधारण वेश-भूषा में रहने की अनुमति थी। उन्हें सोने और चांदी केआभूषणों को छूने तक की मनाही थी। जबकि, बाद में अजंता की बुद्ध मूर्तियों के सिर पर आभूषण दिखाए गए हैं, या उन्हें बहुमूल्य आसन पर बैठा दिखाया गया है!
     

बौद्ध धर्म के विचारों से प्रभावित होकर ही सम्राट अशोक ने रक्त-पात का रास्ताछोड़ दिया था और वह शांति-प्रिय हो गया था। उसने फरमान निकाल दिया था कि आगेसेना का उपयोग सिर्फ समारोह और परेड के दौरान ही किया जाएगा। धर्मपरायण सम्राटहर्ष ने बौद्धवाद के साथ किसी तरह अपनी युद्धनीतियों के समाधान की व्यवस्था की थी। उसी तरह वह बाद में भगवान सूर्य और महेश्वर, दोनों का आराधक हो गया था। हर्ष की सेना में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई। उसकी सेना में 60 हजार हाथी, 1 लाख घुड़सवार तथा बड़ी संख्या में पैदल सेना थी। वह बौद्ध था, यहाँ तक कि उसकी खुद की हत्या करने आयाहत्यारा पकड़ा गया, और दरबारी लोग एकत्र होकर उसके लिए मृत्युदंड की सजा की माँग रहे थे, तो सम्राट हर्ष उसे छोड़ देने के हिमायती थे। जबकि आम जनता जो युद्धों में जान देने के लिए मजबूर थी और चाहती थी कि लड़ाइयां कम लड़ी जाएँ, ताकि जन-धन की क्षति न हो हर्षवर्धन का इनसे कोई वास्ता नहीं था।
     

दूसरे शब्दों में, बौद्धवाद बहुत खर्चीला साबित हुआ। असंख्य मठ और उनमें रहने वाले ऐय्याशों पर, और सैनिकों पर, दोहरी लागत आने लगी। अपने प्रारंभ काल से ही बौद्धवाद एक सार्वभौमिक राजतंत्र के विकास का हिमायती था जो छोटे-मोटे युद्धों को रोकता था। स्वयं बुद्ध चक्रवर्ती थे, वे राजा के अध्यात्मिक प्रतिरूप थे। किंतु ऐसी महान विभूतियों ने जिन साम्राज्यों को चलाया वे बहुत महँगी व्यवस्थाएँ साबित हुई। भारत में हर्ष इस प्रकार के अंतिम सम्राट थे। इसके बाद छोटे-छोटे टुकड़ों में राज्यों का विभाजन हो गया। यह प्रक्रिया नीचे से उपजी सामंतवादी व्यवस्था के उदय तक चलती रही। धीरे-धीरे प्रशासन सामंती तंत्र के हाथों में चला गया। इस व्यवस्था का जन्म, भूमि पर संपत्ति के नए उपजे अधिकारों को लेकर हुआ।
    

  गाँवों ने साम्राज्यों और उनसे जुड़े संगठित धर्म को खंडित कर दिया। अब अपने मेंपरिपूर्ण गाँव उत्पादन तंत्र के मानक बन गए। करों की वसूली मुद्रा के बजाय वस्तुओं में होने लगी क्योंकि खपत भी स्थानीय थी। दूरगामी व्यापार की गुंजाइश कम थी। इसलिए आपसी टकराहट भी नहीं होती थी।
     

मध्यकालीन भारतीय परिस्थितियों में खाद्य और कच्ची सामग्री को दूरस्थ स्थानों में पहुँचाने के लिए परिवहन की व्यवस्था नहीं थी। सम्राट हर्ष ने अपने पूरे साम्राज्य का भ्रमण किया था, उसके दरबारी और सैनिक भ्रमण में साथ होते थे। चीनी तीर्थ यात्री ने लिखा है कि भारतीय लोग व्यापार में सिक्कों का उपयोग नहीं करते थे। इस काल में वस्तु विनिमय की प्रथा थी। प्रमाण के तौर पर देखा जा सकता है कि हर्ष काल के कोई सिक्के उपलब्ध नहीं हैं। इसके विपरीत मौर्य कालीन पंचमार्का वाले सिक्कों की भरमार पाई जाती है।
   

   प्रारंभ में बौद्धधर्म बहुत सफल रहा, क्योंकि तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में यह सफल रहा। ईसा पूर्व छठी शदी के गांगेय क्षेत्र का समाज अपने में परिपूर्ण शांतिमय गाँवों के रूप में संगठित नहीं था। आबादी बहुत कम थी। किंतु वह भी आपस में लड़ते हुए अर्ध जनजातीय प्रदेशों में बंटी हुई थी। कई जनजातियां ऐसी थी जो हल जोतकर कृषि उत्पादन काम नहीं करती थी। वैदिक ब्राह्मणवाद चरागाही संस्कृति वाले आस पास के पड़ोसी कबीलों के साथ लगातार युद्ध में लगे कबीलों के लिए उपयुक्त था। उभरती कृषि अर्थव्यवस्था के विकास में पशुबलि की प्रथा बाधक हो गई थी। मौर्यपूर्व व्यवस्था में धातु, नमक और कपड़े का व्यापार लंबी दूरी तक अपेक्षित था किंतु सक्षम राज्य के संरक्षण के बिना ऐसा संभव नहीं था। अतः आदिवासी समूहों और सार्वभौमिक साम्राज्य के बीच की दूरी को तय करने के लिए एक नए सामाजिक दर्शन की आवश्यकता थी।
     

सार्वभौमिक राजतंत्र और सार्वभौमिक समाजिक धर्म समानांतर थे, यह इस बात सेसाबित हो जाता है कि उसी समय मगध का उदय हुआ। न केवल बौद्धधर्म बल्कि मगध राज्य के कई समकालीन मत- चाहे वे जैन हों, आजीविक हों, सभी वैदिक यज्ञों और पशुबलि का विरोध कर रहे थे। बौद्धधर्म वन्य देश और जंगली आदिवासियों के क्षेत्रों मेंबढ़ते व्यापार को संरक्षण दे रहा था। प्राचीन व्यापार मार्गों जूनार, कार्ला, नासिक, अजंता के स्मारक और अवशेष इस बात को प्रमाणित करते हैं।
    

  बौद्धधर्म का सभ्यता-निर्माण का काम ईसा की सातवीं सदी तक खत्म हो गया था।अहिंसा का सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से स्वीकार तो कर लिया गया था किंतु व्यवहार मेंउसका पालन नहीं हो रहा था। वैदिक पशु बलिप्रथा समाप्त हो गई थी। कुछ छोटे-छोटे राज्य इसके अपवाद थे किंतु इन पुनर्जागरणवादी प्रयासों का सामान्य अर्थव्यवस्था पर बहुतकम प्रभाव पड़ रहा था।
     

अब नई समस्या थी गाँवों के किसानों पर अत्यधिक ताकत न इस्तेमाल करते हुए उनको दब्बू बनाए रखने की। इस शिक्षा का काम धर्म ने संभाल लिया। लेकिन बौद्धधर्म ने नहीं। अब गाँवों में वर्ग संरचना जाति के रूप में उजागर होने लगी, और बौद्धधर्म हमेशाजाति से नफरत करता था।
      आदिवासी नई उपजातियों में शामिल

कर लिए गए। आदिवासी और कृषकवर्ग कर्मकांडों के जंजाल में फंसने लगा, जिसे बौद्ध भिक्षुओं ने निषिद्ध कर दिया था। कर्मकांडों पर ब्राह्मणों का एकछत्र अधिपत्य स्थापित हो गया।
     

इस समय ब्राह्मण पथप्रदर्शक के रूप में सामने आया, और उत्पादन के लिए प्रेरक की भूमिका निभाने लगा। क्योंकि खेतों की जुताई, बीज बोने, तथा फसल उगाने का मुहूर्त कब होगा, आदि इन सबके समय तय करने का पंचाग उनके पास रहता था। पंडित नई फसल और व्यापार की संभावनाओं की विधि बताने लगे। ब्राह्मण उत्पादन पर बोझ नहीं बनता था जैसा कि उसके वैदिक पूर्वज या बौद्धमठों द्वारा किया जाता था। इस काल में बुद्ध को विष्णु का ही अवतार मानकर समझौता किया गया। इसलिए औपचारिक बौद्ध धर्म धीरे-धीरे लुप्त होने लगा।

किंतु बौद्ध धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षा का ह्रास नहीं होना चाहिए- अच्छे विचारों के लिए हर व्यक्ति को अपने दिलो-दिमाग के पोषण और प्रशिक्षण की जरूरत होती है, जैसे अच्छे गायन के लिए गले का रियाज और अच्छी दस्तकारी के लिए हाथों का अभ्यास जरूरी है। लेकिन विचारों का मूल्य और महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि उनसे कितनी सामाजिक प्रगति हो पाती है।
 
भारत ज्ञान विज्ञान समिति से प्रकाशित एवं धर्मानंद दामोदर कोसांबी के पुत्र दामोदर धर्मानंद कोसांबी द्वारा लिखित किताब ‘भारत में बौद्ध धर्म की क्षय’, 2007
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बहुजनों के त्यौहार ‘बहुजन विरोधी साहित्य दहन दिवस 25 दिसंबर’ // डॉ अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन का इतिहास(मूल लेख “मनुस्मृति दहन दिवस….एस आर दारापुरी) // मनुस्मृति और अन्य बहुजन विरोधी दमन साहित्य के उदाहरण…Team SBMT

२५ दिसंबर बहुजनों के त्यौहार बहुजन विरोधी साहित्य दहन दिवस पर विशेष- मनुस्मृति दहन का इतिहास और अम्बेडकर, मनुस्मृति और अन्य बहुजन विरोधी दमन साहित्य के उदाहरण

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मूल लेख “मनुस्मृति दहन दिवस….एस आर दारापुरी”

आज 25 दिसम्बर है। यह बहुजनों के लिए ” मनुस्मृति दहन दिवस” के रूप में अति महतवपूर्ण दिन है। इस दिन ही सन 1927 को ” महाड़ तालाब” के महा संघर्ष के अवसर पर डॉ बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने खुले तौर पर मनुस्मृति जलाई थी। यह ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बहुजनों के संघर्ष की अति महतवपूर्ण घटना है। अतः इसे गर्व से याद किया जाना चाहिए।

डॉ आंबेडकर के मनुस्मृति जलाने के कार्यक्रम को विफल करने के लिए सवर्णों ने यह तै किया था कि उन्हें इस के लिए कोई भी जगाह न मिले परन्तु एक फत्ते खां नाम के मुसलमान ने इस कार्य हेतु अपनी निजी ज़मीन उपलब्ध करायी थी। उन्होंने यह भी रोक लगा दी थी कि आन्दोलनकारियों को स्थानीय स्तर पर खाने पीने तथा ज़रूरत की अन्य कोई भी चीज़ न मिल सके। अतः सभी वस्तुएं बाहर से ही लानी पड़ी थीं। आन्दोलन में भाग लेने वाले स्वयं सेवकों को इस अवसर पर पांच बातों की शपथ लेनी थी:-
1. मैं जन्म आधारित चातुर्वर्ण में विशवास नहीं रखता हूँ।
2. मैं जाति भेद में विशवास नहीं रखता हूँ।
3. मेरा विश्वास है कि जातिभेद हिन्दू धर्म पर कलंक है और मैं इसे ख़तम करने की कोशिश करूँगा।
4. यह मान कर कि कोई भी उंचा – नीचा नहीं है, मैं कम से कम हिन्दुओं में आपस में खान पान में कोई प्रतिबन्ध नहीं मानूंगा।
5. मेरा विश्वास है कि बहुजनों का मंदिर, तालाब और दूसरी सुविधाओं में सामान अधिकार हैं।
डॉ आंबेडकर दासगाओं बंदरगाह से पद्मावती बोट द्वारा आये थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं बस वाले उन्हें ले जाने से इनकार न कर दें।

कुछ लोगों ने बाद में कहा कि डॉ आंबेडकर ने मनुस्मृति का निर्णय बिलकुल अंतिम समय में लिया क्योंकि कोर्ट के आदेश और कलेक्टर के मनाने पर महाड़ तालाब से पानी पीने का प्रोग्राम रद्द करना पड़ा था। यह बात सही नहीं है क्योंकि मीटिंग के पंडाल के सामने ही मनुस्मृति को जलाने के लिए पहले से ही वेदी बनायीं गयी थी। दो दिन से 6 आदमी इसे तैयार करने में लगे हुए थे। एक गड्डा जो 6 इंच गहरा और डेढ़ फुट वर्गाकार था खोद गया था जिस में चन्दन की लकड़ी रखी गई थी। इस के चार किनारों पर चार पोल गाड़े गए थे जिन पर तीन बैनर टाँगे गए थे जिन पर लिखा था:

1. मनुस्मृति दहन स्थल
2. छुआ -छुत का नाश हो और
3. ब्राह्मणवाद को दफ़न करो।
25 दिसम्बर, 1927 को 9 बजे इस पर मनुस्मृति को एक एक पन्ना फाड़ कर डॉ आंबेडकर, सहस्त्रबुद्धे और अन्य 6 बहुजनसाधुओं द्वारा जलाया गया।

पंडाल में केवल गाँधी जी की ही एकल फोटो थी। इस से ऐसा प्रतीत होता कि डॉ आंबेडकर और बहुजनलीडरोँ का तब तक गाँधी जी से मोहभंग नहीं हुआ था।

मीटिंग में बाबा साहेब का ऐतहासिक भाषण हुआ था। उस भाषण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित लिखित थे:-

हमें यह समझाना चाहिए कि हमें इस तालाब से पानी पीने से क्यों रोक गया है। उन्होंने चतुर्वर्ण की व्याख्या की और घोषणा की कि हमारा संघर्ष चातुर्वर्ण को नष्ट करने का है और यही हमारा समानता के लिए संघर्ष का पहला कदम है। उन्होंने इस मीटिंग की तुलना 24 जनवरी, 1789 से की जब लुइस 16वें ने फ्रांस के जन प्रतिनिधियों की मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में राजा और रानी मारे गए थे, उच्च वर्ग के लोगों को परेशान किया गया था और कुछ मारे भी गए थे। बाकी भाग गए और अमिर लोगों की सम्पति ज़ब्त कर ली गयी थी तथा इस से 15 वर्ष का लम्बा गृह युद्ध शुरू हो गया था। लोगों ने इस क्रांति के महत्त्व को नहीं समझा है। उन्होंने फ्रांस की क्रांति के बारे में विस्तार से बताया। यह क्रांति केवल फ्रांस के लोगों की खुशहाली का प्रारंभ ही नहीं था, इस से पूरे यूरोप और विशव में क्रांति आ गयी थी।
तत्पश्चात उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य न केवल छुआ -छुत को समाप्त करना है बल्कि इस की जड़ में चातुर्वर्ण को भी समाप्त करना है। उन्होंने आगे कहा कि किस तरह पैट्रीशियनज़ ने धर्म के नाम पार प्लेबिअन्स को बेवकूफ बनाया था। उन्होंने ललकार कर कहा था कि छुअछुत का मुख्य कारण अंतरजातीय विवाहों पर प्रतिबन्ध है जिसे हमें तोडना है। उन्होंने उच्च वर्णों से इस “सामाजिक क्रांति” को शांतिपूर्ण ढंग से होने देने, शास्त्रों को नकारने और न्याय के सिद्धांत को स्वीकार करने की अपील की। उन्होंने उन्हें अपनी तरफ से पूरी तरह से शांत रहने का आश्वासन दिया। सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गए और समानता की घोषणा की गयी। इस के बाद मनुस्मृति जलाई गयी जैसा कि ऊपर अंकित किया गया है।

ब्राह्मणवादी मीडिया में इस पर बहुत तगड़ी प्रतिक्रिया हुयी। एक अखबार ने उन्हें “भीम असुर” कहा। डॉ आंबेडकर ने कई लेखों में मनुस्मृति के जलाने को जायज़ ठहराया। उन्होंने उन लोगों का उपहास किया और कहा कि उन्होंने मनुस्मृति को पढ़ा नहीं है और कहा कि हम इसे कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने उन लोगों का ध्यान बहुजनों पर होने वाले अत्याचार की ओर खींचते हुए कहा कि वे लोग मनुस्मृति पर चल रहे हैं जो यह कहते हैं कि यह तो चलन में नहीं है, इसे क्यों महत्व देते हो। उन्होंने आगे पूछा कि अगर यह पुराणी हो गयी है तो फिर आप को किसी द्वारा इसे जलाने पर आपात्ति क्यों होती है? जो लोग यह कह रहे थे कि मनुस्मृति जलाने से बहुजनों को क्या मिलेगा इस पर उन्होंने उल्टा पूछा कि गान्धी जी को विदेशी वस्त्र जलाने से क्या मिला? “ज्ञान प्रकाश” जिसने खान और मालिनी के विवाह के बारे में छापा था को जला कर क्या मिला? न्युयार्क में मिस मेयो की ” मदर इंडिया ” पुस्तक जला कर क्या मिला? राजनैतिक सुधारों को लागू करने के बनाये गए “साइमन कमीशन” का बाईकाट करने से क्या मिला? यह सब विरोध दर्ज कराने के तरीके थे ऐसा ही हमारा भी मनुस्मृति के विरुद्ध था।

S R DARAPURIउन्होंने आगे घोषणा की अगर दुरभाग्य से मनुस्मृति जलाने से ब्राह्मणवाद ख़त्म नहीं होता तो हमें या तो ब्राह्मणवाद से ग्रस्त लोगों को जलाना पड़ेगा या फिर हिन्दू धर्म छोड़ना पड़ेगा। आखिरकार बाबा साहेब को हिन्दू को त्याग कर बौद्ध धम्म वाला रास्ता अपनाना पड़ा। मनुस्मृति का चलन आज भी उसी तरह से है। अतः बहुजनों को मनुस्मृति दहन दिवस मना कर इसे तब तक जलाना पड़ेगा जब तक चातुर्वर्ण ख़तम नहीं हो जाता।

http://dalitmukti.blogspot.in/2012/12/blog-post.html

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मनुस्मृति और अन्य बहुजन विरोधी दमन साहित्य के उदाहरण:

डॉ. भदंत आनन्द कौशल्यायन की एक पुस्तक है ” मनुस्मृति जलाई क्यों गई” उसमें से कुछ उदाहरण भारत के डरावने इतिहास के लिए बिलकुल उपयुक्त है| बहुजन साहित्य की एक पुस्तक है  “धर्म एक अफीम” प्रकाशक स्वाभिमान जाग्रति मिशन, दिल्ली,जहाँ मुझे सभी तरह के धार्मिक ग्रंथों में फैले धार्मिक आतंक के कानून एक ही जगह मिल गए| मैं सुक्रगुज़र हूँ इस पुस्तक के लेखक  शकील प्रेम का जिनहोने इस पुस्तक की सामग्री इस्तेमाल करने की कॉपी राईट परमिशन दी |इस पुस्तक में जिसमें सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यान किया गया है और धर्म व उसके ठेकेदारों को सारी अव्यवस्था और दुखों के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से  कारण पाया है|ये पुस्तक बहुजन साहित्य का नगीना है मैं  इसे पढने की सलाह अवस्य  देना चाहूँगा|  मनुस्मृति अर्थात उस समय का संविधान में लिखे कुछ कानूनों को देखिये जिनका कड़ाई से पालन होता था :

 

–          संसार में जो कुछ भी है सब ब्राह्मणों  के लिए ही है क्यूंकी वो जन्म से ही श्रेष्ठ है(मनुस्मृति 1/100)

–          राजा का ये कर्त्तव्य है की वह ब्राह्मणों की जीविकी निश्चित करे|जिस तरह पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है उसी प्रकार राजा को भी ब्रह्मण की आजीविका के साधन का ध्यान रखना चाहिए (मनुस्मृति 7/135)

–          किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्ये होता है , सौ वर्ष का वृद्ध क्षत्रीय भी १० वर्ष के बालक ब्रह्मण को पिता के बराबर ही समझे (मनुस्मृति 2/138)

–          धार्मिक मनुष्या इन नीच जाती वालों के साथ बातचीत ना करें उन्हें ना देखें (मनुस्मृति 10/52)

–          यदि कोई नीची जाती का व्यक्ति ऊंची जाती का कर्म करके धन कमाने लगे तो राजा को यह अधिकार है की उसका सब धन छीन कर उसे देश से निकल दे (मनुस्मृति 10/95)

–          बिल्ली नेवला चिड़िया मेंडक उल्लू और कौवे की हत्या में जितना पाप लगता है उतना ही पाप शूद्र यानि SC/ST/OBC की हत्या में है (मनुस्मृति 11/131 )

–          शूद्र यानि SC/ST/OBC  द्वारा अर्जित किया हुआ धन ब्रह्मण उससे जबरदस्ती छीन सकता है क्यूंकि उसे धन जमा करने का कोई अधिकार ही नहीं है (मनुस्मृति 8/416 )

–          स्वामी के द्वारा छोड़ा गया शूद्र भी दासत्व से मुक्त नही क्यूंकी यह उसका कर्म है जिससे उसे कोई नही छुड़ा सकता (मनुस्मृति 8/413)

–          चाहे वो खरीदा गया हो या नहीं लेकिन शूद्रों से सेवा ही करनी चाहिए क्योंकि शूद्रों की उत्पत्ति ब्रहमा  ने  ब्राह्मणों की  सेवा के उद्देश्य से ही की है (मनुस्मृति 8/412)

–          इन शूद्रों को शमशान,पहाड़ और उपवनों  में ही अपनी जीविका के कर्म करते हुए निवास करना चाहिए (मनुस्मृति 10/49)

–          इन नीच जाती वालों के लिए कफ़न ही इनका वस्त्र है, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें,इनके आभूषण लोहे के हों और वे सदा भ्रमन की करते रहे तथा एक स्थान पर बहुत दिनों तक न रहें  (मनुस्मृति 10/52)

 आधुनिक संविधान के निर्माता अंबेडकर ने सबसे पहले 25 दिसंबर 1927 को हज़ारों लोगों के सामने इस ”मनुस्मृति” नामक संविधान को जला दिया ,क्यूंकी ऐसे अन्यायी  संविधान की कोई आवश्यकता नही थी| भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए दिया गया क्यूंकी इस देश की 85 प्रतिशत शूद्र जनसंख्या को कोई भी मौलिक अधिकार तक प्राप्त नही था,सार्वजनिक जगहों पर ये नही जा सकते थे मंदिर में इनका प्रवेश निषिध था सरकारी नौकरियाँ इनके लिए नहीं थी , ये कोई व्यापार नही कर सकते थे , पढ़ नहीं सकते थे , किसी पर मुक़दमा नही कर सकते थे , धन जमा करना इनके लिए अपराध था , ये लोग टूटी फूटी झोपड़ियों में, बदबूदार जगहों पर, किसी तरह अपनी जिंदगिओं को घसीटते हुए काट रहे थे|और यह सब ”मनुस्मृति” जैसे अन्य कई हिंदू/ब्राह्मण धर्मशास्त्रों के कारण ही हो रहा था कुछ उदाहरण देखिए-

 –          अगर कोई शूद्र वेद मंत्र सुन ले तो उसके कान में धातु पिघला कर डाल देना चाहिए- गौतम धर्म सूत्र 2/3/4….

–          सब वर्णों की सेवा करना ही शूड्रों का स्वाभाविक कर्तव्य है (गीता,18/44)

–          जो अच्छे कर्म करतें हैं वे ब्राह्मण ,क्षत्रिय वश्य, इन तीन  अच्छी जातियों को प्राप्त होते हैं जो बुरे कर्म करते हैं वो कुत्ते, सूअर, या शूद्र जाती को प्राप्त होते हैं (छान्दोन्ग्य उपनिषद् ,5/10/7)

 –          पूजिए विप्र ग्यान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ग्यान प्रवीना,(रामचरित मानस)

–          ब्राह्मण दुश्चरित्र भी पूज्यहनीए है और शूद्र जितेन्द्रीए होने पर भी तरास्कार योग्य है (पराशर स्मृति 8/33)

–          धोबी , नई बधाई कुम्हार, नट, चंडाल, दास चामर, भाट, भील, इन पर नज़र पद जाए तो सूर्य की ओर देखना चाहिए इनसे बातचीत हो जाए तो स्नान करना चाहिए (व्यास स्मृति 1/11-13)

–          निर्माण,चित्रकारी,कारीगरी,कृषी तथा पशुपालन यह सब नीच कर्म है(अनुशासन पर्व अ० २३श्लोक १४और२४—) (अनुशासन पर्व अ०90श्लोक६/८/9) (अनुशासन पर्व अ०135श्लोक 11)

 ये उन असंख्य नियम क़ानूनों के उदाहरण मात्र थे, जो आज़ाद भारत से पहले देश में लागू थे| ये अँग्रेज़ों के बनाए क़ानून नहीं थे ये हिंदू धर्म द्वारा बनाए क़ानून थे जिसका सभी हिंदू राजा पालन करते थे| इन्ही नियमों के फलस्वरूप भारत में यहाँ की विशाल जनसमूह के लिए उन्नति के सभी दरवाजे बंद कर दिए गये या इनके कारण बंद हो गये, सभी अधिकार, या विशेष-अधिकार, संसाधन, एवं सुविधायें कुछ लोगों के हाथ में ही सिमट कर रह गईं, भारत के जनता में आपसी फूट इतनी बहुतायत में हो गई की विदेशी आक्रमण जैसे महा संगठन कारक के आगे भी  लोग संगठित होने को तयार नहीं हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारत गुलाम हुआ| हाय! विशुद्ध भारतीय मौर्य साम्राज्य की हार के साथ ही भारत का भाग्य फूट गया|

 चंद  बुद्धिमान मनुवदिओ ने जिन्दगी का नियम “अगर आपकी संख्या कम है तो बहुसंख्य लोगों में फूट डालो शाशन करो”  पर चलकर केवल अपने निजी फायदे के लिए भारत में वर्ण व्यस्था फैलाई अर्थात देश को जातिओं में बाँट दिया| ये समाज का  एक ऐसा बटवारा था जिसकी वजह से भारत वर्ष में चाहे कहीं से कोई भी विदेशी आ जाये शाशन करने और हराने में कामयाब रहा, और ये मनुवादी उनके राजदरबार में उनके सहयोगी रहे | केवल  सौ-दौसो  घुडसवार लुटेरों का जत्था अता था और भारतवर्ष को लूट कर चला जाता था,टैक्स लेने वाले राजा सुरक्षा तक प्रदान नहीं कर पाते थे|इनके डर से लोगों ने अपना धन मंदिरों में रखना शुरू किया  तो विदेशी लुटेरों ने मंदिरों को लूटना शुरू कर दिया |इनमे से कुछ लुटेरों ने ये भांप लिए था की इस देश को हराना कितना आसान है फलस्वरूप भारत पर कई बड़े आक्रमण हुए और विदेशिओं के गुलाम रहे, ये तो शायद हम सभी जानते और मानते है| ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि वर्ण व्यस्था की वजग से भारत की आबादी का तीन चौथाई हिस्सा (ब्रह्मण,वैश्य  और शूद्र) को तो पहले ही न लड़ने का धर्म आदेश था बाकि बचे एक चौथाई क्षत्रिये वे आपस में ही लड़ कर इतने कमजोर  हो चुके थे की उनमे विदेशी आक्रमण का सामना करने की क्षमता नहीं थी | आज जब हमारी सेना में सभी धर्म जाती वर्ग प्रदेश के लोग हैं तो क्या ये लड़ने योग्य सेना नहीं है? भारत का इतिहास विदेशी आक्रमणों की हार और लूटपाट से भरा पड़ा है, ऐसे डरावने इतिहास की वजह  महास्वार्थी मनुवादी लोग और उनके  धर्म शास्त्र हैं यही भारत की गुलामी का मूल कारन है | मनुवदिओ का सारा धर्म शास्त्र केवल उनके खुद के भले के लिए है उससे किसी का कभी कोई भला नहीं हुआ न ही कभी होगा | शकील प्रेम ने कहा है 

“हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें यह तो बताती है की हम दो हजार वर्षो से गुलाम थे परन्तु इस बात पर मौन हो जाती है की गुलाम क्यूँ थे ,हमारी गुलामी का कारन विदेशी आक्रमण नहीं थे बल्कि इसका कारण था हमारा धर्म और हमारी धर्मभीरुता ,जब जब हमारे ऊपर संकट आये तब तब हमने उनका सामूहिक हल ढूंढने के बजाये किसी अवतार के आने की प्रतीक्षा में भजन गाते रहे|”

 http://naidakhal.blogspot.in/2010/04/blog-post_11.html

http://www.youtube.com/watch?v=pyhkpMvTD-Q

जब तुम तड़प तड़पकर दम तोड़ देते थे तब तुम्हारा ईश्वर कहाँ था? आज जब तुम पर थोडा पैसा आ गया तब इसने तुमको क्यों अपनाया ?….जे के मौर्य

shoodra

आज संविधान और आंबेडकर मिशन के चलते दलित लोग जब थोडा सक्षम हो गए तब बजाये आंबेडकर मिशन को मजबूत करने के ये लोग मन्दिरबाजी और पुरोहित पालन कर रहे हैं| ये वो दिन भूल गए जब इनको मंदिर में गुसने और पुरोहित को चूने पर मार मार कर मार डाला जाता था| अरे अगर अम्बेडकरमीशन का साथ नहीं दे सकते तो कम से कम अपने शोषक को पालना तो बंद करो वर्ना वही स्तिथि दोबारा आ जायेगी| वह रे अहसान फरामोश कौम…..

देखिये श्री जे के मौर्या जी का ये बेतरीन लेख:

1. जब तुमको गाँव से बाहर बस्ती बनाकर रहने के लिए मजबूर किया गया था । तब 5000 साल तक आपका ईश्वर कहाँ था ?

2. जब आपको 5000 साल तक शिक्षा से वंचित रखा गया तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

3. जब 5000 साल तक आपको संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था तब आपका ईश्वर कहाँ था ?…

4. जब आपको गले में हांड़ी लटकाकर चलने के लिए मजबूर किया गया तब पाँच हजार साल तक आपका ईश्वर कहाँ सोया हुआ था ?

5. जब पाँच हजार साल तक आपको पीछे झाड़ू बाँधकर चलने के लिए मजबूर किया गया तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

6. जब आपके प्राणों का मूल्य कुत्ते, बिल्ली, मेंढक के प्राणों के बराबर समझा जाता था तब पाँच हजार साल तक आपका ईश्वर कहाँ था ?

7. जब आपको सुबह शाम चलने पर प्रतिबन्ध था सिर्फ दोपहर को कोई थाली वगैरह बजाते हुए चलने दिया जाता था तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

8. जिस पानी में कुत्ते बिल्ली मल मूत्र विसर्जित करते रहते थे उसी पानी को आपको पीने नहीं दिया जाता था । तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

9. जब आपकी बहू बेटियों को किसी जानवर की तरह कोई भी ले जा सकता था तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

10. जब आपको सिर्फ काम कराने के लिए बंधुआ मजदूर की तरह प्रयोग किया जाता था तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

11. जब आपको मंदिर में नहीं घुसने दिया जाता था तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

12. जब आपको धर्म कर्म से वंचित रखा गया था तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

13. जब आपके छूने से ही ये लोग अपवित्र हो जाते थे तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

14. जब कोई तुम्हारी बीमारी का इलाज तुम्हारी जाति की वजह से करने से इंकार कर देता था और तुम इलाज के आभाव में तड़प तड़पकर दम तोड़ देते थे तब आपका ईश्वर कहाँ था ?

15. जब पानी के अभाव में तुम प्यासे ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देते थे तब तुम्हारा ईश्वर कहाँ था ?

आज जब भारतीय संविधान के वजह से जब आपको इन सबसे मुक्ति मिल गयी और अधिकार मिल गए तो तुम्हारे करोडो ईश्वर पैदा हो गए ?

jk maurya 

Shri J K MAURYA

http://ibnlive.in.com/news/orissa-dalit-mp-denied-entry-in-temple/162457-37-64.html

17-Dec-2013 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: “लोग वैसी दुनिया चाहते हैं जैसी बुद्ध बनाना चाहते थे,भारत ही नहीं समस्त विश्व बुद्ध कि तरफ चल पड़ा है,”…समयबुद्धा

dhamm vs dharmeinstien

महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने  कहा था कि :

“बुद्ध धम्म में वे लक्षण हैं जो भविष्य के सार्वभौमिक धर्म में अपेक्षित है : यह वैयक्तिक ईशवर से परे है , हठधर्मिता और ईशवरवादी धर्म धाराणाओं से मुक्त है ; यह प्राकृतिक और आध्यात्मिक दोनों तत्वों को समावेशित करता है , यह सभी चीजों के अनुभव की धार्मिक भावना की अभिलाषा पर आधारित है , प्राकृतिक और आधात्मिक दोनों , एक अर्थपूर्ण एकत्व । यदि ऐसा कोई धर्म है जो आधुनिक वैज्ञानिक आवशयकताओं के साथ सुसंगत हो सकता है , तो वह बुद्ध धम्म ही होगा, ।”…अल्बर्ट आईनस्टीन

भारत का इतिहास बौद्धों और विरोधियों के संगर्ष कि कहानी के सिवा और कुछ नहीं, बस समय के साथ धर्म  नाम और रूप  बदलते रहते हैं पर विचारधारा वाही रहती है|ये संगर्ष है मानवता का और ईश्वरवादिता का या यूं कहें जियो और जीने दो कि नीति का और उंच नीच के षड्यंत्र का|इसमें विदेशी आक्रमणकारी एक पात्र का काम करते हैं बस, इस बात को समझने के लिए इतिहास का ज्ञान होना जरूरी है|खेर इसी संगर्ष में बौद्ध राजाओं कि हार के कारन भारत में बौद्ध धम्म सात सौ सैलून तक सुप्तावस्था में रहा| फिर अंग्रेजों ने खुदाई की धर्मोत्थान को नया  पञ्च रंगिये झंडा बनाया और बौद्ध धम्म को पुनरस्तापित करने कि कोशिश की| बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने बहुजन जनता को वापस अपने बौद्ध धम्म में लौटाया और इस तरह भारत में बौद्ध धम्म के पुनरुत्थान की शुरुआत हुई|

ये जिंदगी का बुनियादी नियम है की जिस तरह दिन के बाद  रात आती है फिर रात के बाद दिन आता है उसी प्रकार धर्म के बाद अधर्म आता है अधर्म के बाद धर्म आता है या कहें ईश्वरवाद के चरम पर मानवता आती है मानवता के चरम पर ईश्वरवाद आता है ये चक्र यूं ही चलता रहता है|मानवता बहाल होने से पुरोहितवादी लोग जो अपनी श्रेस्टता खोने से तिलमिलाए होते हैं,षड्यंत्र में लग जाते हैं|ये लोग निरंतर मानवता विरोधी दया शून्य षड्यंत्र करते रहते हैं यहाँ तक की अपने श्रेस्टता को वापस पाने हेतु नरसंघार और महायुद्ध तक करवाने से नहीं हिचकते इतिहास में ऐसा कई बार हो चुका है|जब युद्ध होता है तब मानवता और विज्ञानं सदियों पीछे चले जाते है| ऐसे में ईश्वर वाद का फिर उदय होता है पुरोहितवाद का फिर उदय होते हैं और फिर ईश्वर के नाम पर आम जनता का शोषण होना शुरू हो जाता है| आस्तिकता के चरम पर नास्तिकता आती है और नास्तिकता के चरम पर आस्तिकता| अब ईश्वरवाद का चरम हो चुका है अब मानवतावाद को आना ही होगा इसे कोई नहीं रोक सकता|

धम्म विरोधी लोग हमेशा धम्म को हराने की नीतियां खोज ही लेते हैं जैसे जब बुद्ध की बातें लोगों की समझ में आने लगी तो इन्होने कहना शुरू कर दिया की ये सब वो बाते हैं जो कानों को अच्छी लगती हैं इसकिये उन्होंने ऐसे सभी मानवतावादी महापुरुषों को चरुवाक कहा अर्थात वो लोग जिनके वाक्य कानों को भायें| फिर भी जब लोगों ने नहीं माना तो इन लोगों ने षड्यंत्र और युद्ध से जनता के राजाओं को हराया|और फिर हारे हुई जनता और उसके राजाओं को राक्षश अधर्मी नीच आदि अदि लिखवाकर इतिहास में उनको घृणा का पात्र बना डाला| दिन रात मीडिया में ऐसे मानवता समर्थक लोगों की बुराई कर कर  के जनता को जिनका भला असल में जिन लोगों से था वो उसे से घृणा करने लगी|

भगवान् बुद्धा ने कितना सच कहा था की – “हम जससे घृणा करते हैं उसकी अच्छाई देख ही नहीं पाते”

यही कारन है की धम्म विरोधियों की धम्म और बुद्धा और उसके लोगों के प्रति जो घृणा फैलाई इसीलिए लोग बुद्ध की तरफ नहीं गए और अपना शोषण सदियों तक करवाते रहे|पर अब लोग जाग रहे हैं

धन और मीडिया कि शक्ति के बिना भी जनता द्वारा सबसे ज्यादा चाहे जाने वाले भारतीय हैं  तथागत गौतम बुद्ध और बोधिसत्व डॉ आंबेडकर| ये दोनों किसी धन बल पर चलने वाली मीडिया फैक्ट्री से बनकर निकले जबरदस्ती के रेडीमेड लीडर नहीं हैं ये भारत कि जनता के ह्रदय सम्राट हैं, जनता के मन में बसते हैं|आज भारत कि हालत ये है कि बहुजन विरोधी लोग दिन रात मीडिया,राजसत्ता और धन बल से पता नहीं किसे किसे जनता का लीडर बना रहे हैं या बनाये रखना चाहते हैं जबकि जनता की उनमें रूचि नहीं | पर तथागत गौतम बुद्ध और डॉ आंबेडकर ऐसे भारतीय लीडर हैं जिनसे बिना धन,मीडिया और राजसत्ता बल के भी रोज हज़ारों लोग जुड़ जाते हैं, इनकी बढ़ती लोकप्रियता इस बात का सबूत है| अगर धम्म विरोधी अपने तथाकथित महापुरुषों के महिमा मंडन पर धन खर्च करना बंद कर दे तो वो जनता के मन से जल्द ही गायब हो जायेंगे|

भारत देश कि जमीन पर इसके सच्चे सपूतों का नाम और काम कभी नहीं मिट सकता ये जमीन भी अपने सपूतों को और अपने आक्रमण कारियों  को जानती जानती है| ये बुद्ध कि धरती है ये भारतीये बहुजनों की धरती है|ये अप्रत्याशित जनता समर्थन भारत में बौद्ध धम्म के पुनुरुत्थान को बहुत बल दे रही है|आप खुद देखिये बुद्ध की धरती पर कोई भी नयी कॉलोनी बनती है तो उसका नाम या तो कोई अंग्रेजी रखा जाता है या फिर विहार हैसे निर्माण विहार राहुल विहार आदि| अब जगह के नाम फलानागढ़ या फलानाबाद नहीं रखा जाता| विहार और पुर ये बौद्ध नाम हैं विहार का मतलब है जहाँ बुद्ध घूमे और पुर का मतलब है आराम महल|ये सब अपने आप हो रहा है ये सब भारत को बोधमय बना राह है|

लोग अंध श्रद्धा और तर्क, कर्मकांड और विज्ञानं में फर्क समझने लगे हैं अब लोग समझने लगे हैं की सिर्फ प्रार्थना करना वाले होठों से मदत करने वाले हाथ बहुत ज्यादा बेहतर होते हैं| लोग धीरे धीरे व्यक्ति पूजा से ज्यादा उनके सिद्धांतों पर जोर देने लगे हैं| विज्ञानं और तकनिकी के बढ़ने से धार्मिक आडम्बर और अंधविश्वासों को गहरा धक्का  लगा है| बहुत से पुराने ज़माने के धार्मिक विश्वासों की ग़लतफ़हमी साफ़ हो चली है| ये सब बौद्ध धम्म के पक्ष में है|

लोग समझने लगे हैं की बाकि विरोधी धर्म में केवल मरे हुए पुराने राजाओं और बाबाओं की महिमा गाने के आलावा और कुछ नहीं इससे उनका कोई भला नहीं होता|अगर किसी चीज़ से भला होता है तो उन पुराने लोगों की आदर्शों से बातों की अपने जीवन में इस्तेमाल करने से|लोग समझने लगे हैं की बिना प्रमाण के कुछ भी स्वीकारना मतलब अपना नुक्सान करना ही होगा|

आज सारी दुनिया में गणराज्य या रिपब्लिक देश बनाने का चलन है जिसमें किसी एक राजा की मनमानी नहीं चलती बल्कि जनता के चुनावों द्वारा फैसला होता है|जैसे कौन राजा होगा और कौन सी नीतियां चलेंगी| ये गणराजय जिसे पश्चिम बाले पिछली सदी से ही जाने हैं ये बोधमय भारत में हज़ारों साल से प्रचलित थी|तथागत गौतम बुद्ध के पिता के राज्ये को शाक्य गणराजय कहते थे|विश्व के हर मामले में अग्रणी लोग जिन्हें हम अंग्रेज के नाम से जानते हैं वे तेज़ी से बौद्ध धम्म कि तरफ जा रहे हैं| आपको ये जानकार थोडा आश्चर्य होगा कि पश्चिम में करुणामयी  इसा मसीह के बौद्ध भिक्कू होने कि चर्चा चल रही है| ऐसी चर्चाओं को आप यू टूयब  पर खूब देख सकते हो|खेर सत्य जो भी हो कहने का तात्पर्य ये है कि बुद्धिजीवी वर्ग बौद्ध धम्म को अपना रहा है|इतिहास गवाह है कि बदलाव केवल बुद्धिजीवी वर्ग ही लाता है और ये बदलाव दिख रहा है संयुक्त रास्त्र जैसी संस्थाएं गणराजय देश बनने पर जोर दे रही हैं|

आपको ये जान कर ख़ुशी होगी कि सात एसियन देश मिल कर बिहार में बहुत बढ़ी और भव्य नालंदा यूनिवर्सिटी बनाने का करार किया है| बहुजन शाशक मायावती के शाशन से बहुत से बौद्ध शिक्षण संसथान पहले ही कार्यरत हैं| बहुत तेज़ी से रिसर्च हो रही है | हम सब बोधमय भारत कि तरफ चल रहे हैं|

अब जनता बेवाक होती जा रही है वो ज्यादा धर्म के चक्कर में नहीं पड़ती| जनता बस खुशाल जीना चाहती है|बस कमान खाना और शती चाहती है| कर्मकांड अब कम होते जा रहे हैं लोग इन्हें छोड़ते जा रहे हैं| ये सब भी भारत को बौद्धमय बना रहा है| क्योंकि बौद्ध धम्म के प्रति धरना फैलाई गई है इसलिए लोग बौद्ध का नाम नहीं लेते पर असक में उनकी मानसिकता बौद्धमय  हो चली है|

उदाहरण के लिए किसी भी पूजास्थान में भगदड़ या प्राकृतिक आपदा से लोग मरते हैं तब जनता ये सवाल करने लगी है कि तथाकथित ईश्वर के दरवाजे पर भी सुरक्षित नहीं तो ऐसा ईश्वर शक के दायरे में आने लगा है| लोग अब सत्य जानने को उत्सुक हैं, ज्यादा दिन तक इनकी आँखों पर अंधश्रद्धा का पर्दा नहीं डाले रख सकते ये पुरोहित लोग| धम्म के लिए भारत कि जामीन अब तैयार है|अब वो समय आ गया है कि जब लोग धार्मिक बाबाओं गुरुओं और इसके ठेकेदारों को शक कि नज़र से देखने लगे हैं|लोग अपने कार्य स्थलों में अपने सर्कल में धर्म कि चर्चा करने से बचने लगे हैं क्योंकि ये अप्ससी मन मिटाव पैदा करता है जो कि सभी के लिए घातक होता है|

जैसे पहले रजा और धर्म गुरु का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था पर आज अगर ये भी बुरा करेंगे तो इनको भी कानून का सामना करना पड़ेगा|यही तो बौद्ध धम्म का मकसद था, सबको न्याय मिले| समस्त भारत अहसान मंद है बाबा साहब आंबेडकर का जिन्होंने ऐसे उच्च बौद्ध मूल्यों को कानून और संविधान का रूप दिया| ये और बात है कि विरोधियों ने ऐसे युग पुरुष को जनता को ह्रदय सम्राट बनाने से रोकने के लिए जातिगत घृणा से अलग थलग कर दिया है| आज बाबा साहब के संविधान के मजे तो सब ले रहे हैं पर जातिगत घृणा के चलते अहसान नहीं मान रहे| खेर देर सवेर ही सही मान जायेंगे|

आज सब समझनते लगे हैं कि कानून व्यस्था से ऊपर कुछ नहीं संविधान से ऊपर कुछ नहीं यहाँ तक कि ईश्वर भी नहीं| भारत देश में “ओह माय गोड” (बोलुवूड) डा विन्ची कोड(हॉलीवुड) , किंगडम ऑफ़ हेवन(हॉलीवुड) जैसी फ़िल्म का बनना और कामयाब होना इस बात का सबूत है कि जनता में धम्म को समजने वाली सेंस विकसित हो रही है|ओह माय गोड जैसी हिंदी फ़िल्म ने बखूबी साबित किया ही कि अगर ईश्वर अन्याय करेगा तो उसे भी कानून का सामना करना होगा, हालाँकि कुछ दबाबों के चलते इस फ़िल्म को अंत में ईश्वरवाद पर ही ख़तम किया पर ये एक अच्छी शुरुआत है|

मैं काफी दिन यूरोप में रहा वहाँ बहुत ही ज्यादा भव्ये और बड़े गिरजाघर हैं पर उनमे मुझे बहुत कम  भीड़ नजर आयी|भारत में आजकल जब पूजास्थलों और पुराने ज़माने के राजाओं और बाबाओं को ईश्वर घोषित करके उसकी तारीफ में गाने गाने को, लोग ढोंग समझने लगे हैं तो ऐसे में बौद्ध सिद्धांत सत्यसंग अर्थात सत्य का संग जिसमे कोई सत्य शोधक जनता को सत्य  बताता है, ये सब काफी प्रचलित है| इसी तर्ज पर धम्म विरोधी भी अपनी ढोंग लीला को लेकर सत्संग कर रहे है| खेर ये जो सत्संग का चलन है ये भी लोगों को तर्क करने और प्रमाणिकता के बिना कुछ भी न स्वीकारने के तरफ ले जा रहे हैं| भले भी आज बुद्ध के नाम से सत्संग न होते हो, वजह वही घृणा संचार पर बातें वही हैं बहुजन गुरुओं वाली वही जिओ और जीने दो वाली| वही बहुजन गुरु जैसे बुद्ध ,कबीर,नानक, रविदास, तुकाराम,पेरियार  अदि अनेकों संतों कि वादियों को याद किया जा रहा है| आज लोगों  मरे हुए पुराने राजाओं और बाबाओं के तारीफ वाले गावों में समय बर्बाद नहीं करना चाहते बल्कि दर्शन या काम कि बात जानना और अपनाना चाहते हैं|आज सत्संग के नाम पर बहुजन मूल्यों का प्रचार हो रहा है वो दिन दूर नहीं जब जनता इस विचारधारा कि जड़ में पहुच जायेगी जो कि बौद्ध धम्म है| और तब धम्म से घृणा का षड्यंत्र और उसके षड्यंत्रकारी ख़त्म हो जायेंगे| सत्यमेव जयते

आज लोगों को विज्ञानं पसंद है, गणतंत्र पसंद है, न्याय व्यस्था पसंद है| उन्हें ये पसंद है कि न्याय के आगे कोई न हो चाहिए वो रजा या पुरोहित ही क्यों न हो|ये सब बौद्ध मूल्ये हैं लोग भले ही इस सब के लिए भगवन बुद्धा और उनके धम्म को जिम्मेदार न बताएं पर वे अब इन मूल्यों को बहुत ज्यादा पसंद कर रहे हैं|ये बौद्ध माया भारत कि मानसिकता कि तैयारी है|

व्यक्ति केंद्रित न होकर संविधान शाषित व्यस्था, कानून और न्याय का सरोवोपरी होना, विज्ञानं और तकनीक का बढ़ना,विश्व के अग्रणी बुद्धिजीवियों का धम्म को तरफ बढ़ना,भारत के झंडे में बौद्ध का धार्मिक चिन्ह धर्मचक्र होना, भारत देश के एम्ब्लेम एक बौद्ध सम्राट अशोक का चार शेरो वाला एम्ब्लेम होना|सेना में अशोक चक्र बहुत बड़ा सैनिक सम्मान होना|सत्संग में बहुजन विचारधारा का प्रचार| जेन अनजाने बौद्ध मानसिकता कि प्रचार और प्रसार|भारत के बहुजनों का  तेजी से बोधमय बनते जाना क्या अब भी आप नहीं समझ सकते कि विरोधियों कि लाख कोशिशों के बावजूद भारत ही नहीं समस्त विश्व बोधमय होता जा रहा है|

बौद्ध धम्म कि ये विशेषता है कि इसके सिद्धांत बाकि धर्मों कि तरह समय के साथ पुराने नहीं होते|ये हज़ारों साल पहले भी काम के थे और हज़ारों लाखों साल तक बी काम के रहेंगे, मानव ही नहीं समस्त जीवों का भला करते रहेंगे|

शायद अब आप भी कुछ कुछ समझ रहे होंगे की बौद्ध धम्म असल में धर्म और ईश्वर से बिलकुल अलग है शायद अब आप समझ रहे होंगे की सम्राट अशोक महान बाबा साहब आंबेडकर और सभी बौद्ध ये क्यों मानते है की बौद्ध धम्म फैलाना ही मानवता की सच्ची सेवा है बाकि सब तो बस अपना वर्चव और श्रेस्टता को बचने का षड्यंत्र  मात्र है|

….समयबुद्धा

बौद्ध उपासकों को भी हिंदू धर्म के सरनेम को त्यागना पडेगा बौद्ध संस्कृति से जुड़े नामों की पहचान करना होगा…निर्वाण बोधी, नागपुर

image writerबौद्ध उपासकों को भी हिंदू धर्म के सरनेम को त्यागना पडेगा बौद्ध संस्कृति से जुड़े नामों की पहचान करना होगा..

हिन्दू धर्म त्यागने और बुद्धिष्ट बन जाने पर भी हमारे नाम और सरनेम हमारी पुरानी जातियों से ही संबंधित होने के कारण मेश्राम, रामटेके, खोब्रागडे, बोरकर, गजभिये आदि को महार, अहिरवार, बरैया आदी को चमार समझाजाता है. तथा लाहोरी, मलिक, दासत,बाली वाल्मिकी आदि को भंगी समझा जाता है. इसी प्रकार अन्य जातिसूचक नाम और उपनामों के कारण हमें हमारी पुरानी जाती और तदनुसार हमें हमारे पुराने धर्म से संबंधितही जाना जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यक्ति की पहचान उसकेसंस्कारों उसके कार्यों से बनती है. हमें पुराने हिन्दू धर्म में सिखाया गया था की नामकरण संस्कार करते समय मनुस्मृति में वर्णित आदेशों का पालन किया जाना चाहिए. मनुस्मृति में वर्णित आदेशों का पालन किया जाना चाहिए. मनुस्मृति में लिखा है – मंगल्यं ब्राम्हणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलन्वितम वैशस्य धनसंयुक्त शूद्रस्य तु जुगूप्गितम्। अर्थात ब्राम्हण नाम मंगल सूचक शब्द से युक्, क्षत्रिय का बलसूचक शब्द से युक्त, वैश्य का धनवाचक शब्द से युक्त और शुद्रातिशुद्रों का नाम निन्दित शब्द से युक्त नामकरण करना चाहिए और सरनेम के लिए लिखा है – शर्मवद ब्राम्हणस्य स्यादाज्ञो रक्षासमन्वितम् वैशस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुक्त। अर्थात ब्राम्हण का उपनाम शर्मा शब्द से युक्त, क्षत्रिय का रक्षा शब्द से युक्त, वैश्य का पुष्टि शब्द से युक्त, और शुद्र का प्रेष्य (दास) शब्द से युक्त उपाधि करना चाहिए. (मनुस्मृति अध्याय २ श्लोक ३१,३२) विष्णु पुराण में भी शुद्रों के नाम घृणित (यथा-दीनदास) ही रखने की आज्ञा दी गई है. इस प्रकार हम आज भी हिन्दू शुद्रों के नाम व उपनामों को ढो रहे है. आज हमने अपने नाम तो नये-नये रखने शुरू कर दिये है परंतु सरनेम नहीं बदले है. इस संदर्भ में २१ वी शती में उत्तरी भारत के हिंदू धर्म से बौद्ध बने उपासकों से हमें अवश्य ही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए. उल्लेखनीय है की वहा के लोगों ने अपने सरनेम बोधी, बौद्ध, गौतम, अहिंसक, जीवक, मौर्य, बर्धन, कनिष्क, शाक्य, जैसे रखना शुरू करदिया है. इसी तरह से ब्राम्हण जाती से बौद्ध बने उपासकों ने भी जैसे की, डॉ. सुरेन्द्र शर्मा (पंजाब), डॉ. रुपाताई कुळकर्णी (महाराष्ट्र) ने बौद्ध धम्म ग्रहण करने के पश्चात अपने उपनाम बदलकर क्रमशः डॉ. सुरेद्र अज्ञात व डॉ. रुपाताई बौद्ध रखा है. उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश में भी ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे..

जयभीम.. नमो बुद्धाय.. –

निर्वाण बोधी, नागपुर

बौद्ध धम्म और अहिंसा पर नजरिया- जहाँ हिंसा आवश्यक है वहाँ तथागत बुद्ध ने अनुमति दी थी….Team SBMT

तथागत गौतम बुद्धा कभी किसी बात के अच्छे या बुरे होने पर बहुत जोर नहीं देते वो इस बात पर जोर देते हैं कि हमें अपनी बुद्धि को इतना विकसित कर लेना है कि हम व्यहार का सिद्धांत और सिद्धांत का व्यहार के लिए कब कैसे और कितना इस्तेमाल करना है सीख जाएँ|

आज पतंजलि के नाम पर लोग ये दुष्प्रचार कर रहे हैं कि भारत इसलिए विदेशी आक्रमणों से हरा क्योंकि बौद्ध होती जा रही जनता ने हिंसा और युद्ध का मार्ग छोड़ दिया था| जबकि सत्ये ये है कि इतिहास में जब भी भारत विदेशी आक्रमण से हरा है तब तब इस देश कि सत्ता पर मनुवादी कायम थे और जब जब इस देश कि सत्ता पर बहुजन थे तब तब किसी कि हिम्मत नहीं हुई भारत पर आक्रमण करने कि| सम्राट अशोक महान अपने सीमाओं कि प्रजा को सम्भोदित करते हुए कई शीला लेख लिखवाते हैं कि हमारी सीमा से भयभीत न हों अगय न्याय चाहिए तो किसी भी समय रजा के समक्ष न्याय मांगो| उन्होंने साफ लिखा कि मुझसे भयबजीत होने कि जरूरत नहीं आओ आपको न्याय मिलेगा| इसका अर्थ ये है कि हमारी सत्ता से सब डरते थे आक्रमण करना तो दूर कि बात|

elephant dhamm chakraआम तौर पर जैन धर्म की ही भांति बौध धम्म को भी अहिंसा का घोरतम समर्थक मन जाता है, पर ये पूरी तरह सच नहीं हैं| इस विषय पर भी बौध धर्म ने माध्यम मार्ग अपनाते हुए न ही पूरी तरह समर्थन किया न पूरी तरह नाकारा| “अहिंसा परमो धर्मं ” असल में एक जैन सिद्धांत है बौध नहीं|इस विषय पर पहला परिस्थिति जन्य सक्स्ये ये है की भिक्ख के रूप में यदि मांस भी दिया जाए तो भगवान् बुद्ध को मांस ग्रहण करने में कोई आपत्ति  न होगी,यदि भिक्षु किसी प्रकार से भी जीव हत्या से सम्बंधित नहीं है तो वह भिक्का में प्राप्त मांस ग्रहण कर सकता है |भगवान् बुद्ध ने देवदत्त के प्रस्ताव को ठुकरा दिया जो चाहता था की भिक्का में दिए जाने पर भी भिक्षु मांसाहार ग्रहण न करे| भगवान् बुद्ध असल में हिंसा करने की इच्छा के वोधी थे, जैसे धर्म या यग  के नाम पर की जाने वाली हत्या का उन्होंने घोर  विरोध किया|

नेपाल में आज भी धर्म के नाम पर विश्व की सबसे बड़ी पशु बलि का प्रचलन है,भगवान् बुद्ध के विरोध के बावजूद इतना अहिंसा बाकि बची है तो उनसे पहले कितनी ज्यादा होतो होगी| आज का नेपाल उस  इलाके का हिस्सा है जो भगवान् बुद्ध का कार्य क्षेत्र रहा था, यही की बलि प्रथा का उन्होंने सकत विरोध किया| टेलेग्राफ का एक आर्टिकल देखें :

http://www.telegraph.co.uk/news/worldnews/asia/nepal/6645024/Worlds-biggest-animal-sacrifice-held-in-Nepal.html
अहिंसा से भगवान् बुद्ध का अभिप्राय ये नहीं है की किसी को कभी मरो ही नहीं अपितु ये है की सभी प्राणीयों  से मैत्री रखो| इस बात को बेहतर तरह से समझने के लिए  हमें भगवन बुद्ध द्वारा बताये “जीव हत्या की इच्छा” और “जीव हत्या की आवश्यकता” के सिद्धांतों में भेद  करके समझना पड़ेगा|उन्होंने “जहाँ जीव हत्या की जरूरत है” वहां जीव हत्या को मन नहीं किया अपितु जहाँ “जीव हत्या की इच्छा के अतिरिक्त” कुछ नहीं, चाहे वो किसी धर्म या देवी शक्ति के ही नाम पर क्यों न हो सर्वथा वर्जित है नींदनिये  है | उन्होंने इस बात का निर्णय व्यक्ति पर छोड़ा है ताकि वह परिस्थिति के हिसाब से निर्णय ले सके |

इसी बात को दुसरे शब्दों में कहा जाए तो भगवान् बुद्ध ने शील या आदर्श और नियम में भेद किया है| जैसा की हम सभी जानते हैं की एक शील या आदर्श आपको कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड़ता है और जबकि नियम स्वतंत्र नहीं छोड़ता, यदि आप नियम तोड़ते हैं तो नियम आपको तोड़ता है |

अहिंसा पर तथागत बुद्ध के विचार: –

तथागत बुद्ध हिंसा के खिलाफ थे , लेकिन न्याय के पक्ष में थे |जब क़भी न्याय के लिए, हिंसा आवश्यक है वहाँ तथागत बुद्ध ने अनुमति दी थी.

तथागत बुद्ध और सिंह सेनापति (वैशाली कमांडर) की बातचीत नीचे दी गई

सिंह सेनापति ने तथागत बुद्ध से पूछा

“भगवंत, अहिंसा के विचारों का प्रचार और प्रसार करते है,इसका मतलब भगवंत यह चाहते हैं कि अपराधियों को दंडित नहीं किया जाए ?
हमारे बच्चों की रक्षा, पत्नी के सम्मान , प्रतिष्ठा की रक्षा और संपत्ति की रक्षा के लिए हम युद्ध पर नहीं जाए ?
अहिंसा के नाम पर हम अपराधी से हानि और नुक़सान भुगते ? अगर युद्ध सत्य और न्याय के लिए है तो भी भगवंत सभी प्रकार के युद्ध को मना करते है ?

तथागत बुद्ध ने सिंह सेनापति को उत्तर दिया ”

तुम ने मेरी सलाह का गलत अर्थ लगाया है ,अपराधी को दंडित करना होगा लेकिन निर्दोष को मुक्त करना होगा.न्यायाधीश एक आपराधिक सज़ा देना हिंसा करना नहीं हैं,सज़ा कारण के लिए अपराधी के अपराध जिम्मेदार है. न्यायाधीश हिंसा के लिए के जिम्मेदार नहीं है ,केवल न्यायाधीश कानून लागू करता है.

जो मनुष्य न्याय , नैतिकता , सुरक्षा और आजादी के लिए संघर्ष  करता है वह हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं है ,शांति के सभी तरीके जब असफल होते है तब
जो युद्ध शुरू करते हैं, वह हिंसा के लिए जिम्मेदार है ,किसी भी स्थिति में दुष्ट विचारों के लोगों के सामने आत्मसमर्पण करने का नहीं.किसी भी स्थिति में दुष्ट विचारों के लोगों के सामने घुटने टेकना नहीं.

SOURCE: https://www.facebook.com/rajkamalbauddh/posts/10200185419866736?notif_t=close_friend_activity

आपके विरोधी तो इतने कुटिल हैं ही वो हिंसा और अन्याय को ही धर्म बताकर जनता का विश्वास अपने पक्ष में कर लेते हैं,बहुजनों को ये बात समझने की बहुत ज्यादा जरूरत है, हिंसा हिंसा है अन्याय अन्याय है कहीं भी किसी भी सच्चे धर्म   में इस जायज़ नहीं ठहराया जा सकता |

बौद्ध धर्म और बर्मा या मयन्मार राष्ट्रवाद के विषय में निम्न आर्टिकल जरूर पढ़ें

http://blog.sureshchiplunkar.com/2013/07/buddhist-terror-and-osama-of-myanmar.html

 समयबुद्धा का इस विषय में कहना है की

“बौद्ध संस्कृति में हम ‘हाथी’ को कई प्रकार के राजनेतिक एव धार्मिक चिन्ह के रूप में प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि हमारी हिंसा जंगल में हाथी की हिंसा के सामान है|जिस तरह हाथी मासाहारी जानवरों की तरह पहल करके हिंसा नहीं करता पर जब उसे छेड़ा जाए तो वो इतना हिंसात्मक हो जाता है की सब तहस नहस कर डालता है| उसी तरह भारत का  बहुजन या बौद्ध भी है पहल करके बिना वजह हिंसा नहीं करता|हाथी की हिंसा में ध्यान देने वाली बात ये है की उसको हिंसा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि उसकी ताकत का सबको अंदाजा होता है,ये बात हिरन पर लागू नहीं हो सकती|इसीलिए किसी ने सही कहा है की अगर शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तयार रहो|”

अहिंसा पर इन सभी बातों का सार ये है की केवल आत्मा रक्षा में की गई हिंसा ही जायज़ है बाकि सब नाजायज़ और कुकर्म|

इस लेख पर डॉ प्रभात टंडन जी के कमेंट्स इस प्रकार हैं:

धम्मपद धम्मपद की गाथा “दण्ड्वग्गो’ मे भगवान बुद्ध कहते है :
१२९.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्‍चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न किसी की हत्या करे , न हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।
१३०.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।
१३१.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो न लभते सुखं॥
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।
१३२.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो लभते सुखं॥
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित नही करता है ( कष्ट नही पहुँचाता है ) वह मर कर सुख पाता है ।
स्पष्ट है बुद्ध का मार्ग अहिसंक होते हुये भी मध्यमार्गीय रहा लेकिन वह व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिये पशु हिंसा के पक्ष मे न थे ।