खलील जिब्रान की कहानी शैतान -प्रस्तुति: डॉ प्रभात टंडन


कपोल कल्पित शैतान और कपोल कल्पित ईशवर मे बहुत गहरी समानता है । इस संदर्भ मे मुझे खलील जिब्रान की कहानी शैतान याद आ गयी जिसे मैने कई साल पहले अपने ब्लाग मे डाला था ।
’शैतान ’ कहानी का सार बहुत ही सार्गर्भित और ईशवर और शैतान की परिकल्पना पर रोशनी डालने वाला है । यह कहानी उत्तरी लेबनान के एक पुरोहित ’पिता इस्मान ’ की है जो गाँव-२ मे घूमते हुये जनसाधारण को धार्मिक उपदेश देने का काम करते थे । एक दिन जब वह चर्च की तरफ़ जा रहे थे तो उन्हें जंगल मे खाई में एक आदमी पडा हुआ दिखा जिसके घावों से खून रिस रहा था । उसकी चीत्कार की आवाज को सुनकर जब पास जा कर पिता इस्मान ने गौर से देखा तो उसकी शक्ल जानी -पहचानी सी मालूम हुयी । इस्मान ने उस आदमी से कहा , ’ लगता है कि मैने कहीं तुमको देखा है ? ’

और उस मरणासन आदमी ने कहा ,

“ जरुर देखा होगा । मै शैतान हूँ और पादरियों से मेरा पुराना नाता है ।”

तब इस्मान को ख्याल आया कि वह तो शैतान है और चर्च मे उसकी तस्वीर लटकी हुई है । उसने अपने हाथ अलग कर लिये और कहा कि वह मर ही जाये ।

वह शैतान जोर से हँसा और उसने कहा ,

” क्या तुम्हें यह पता नहीं है कि अगर मेरा अन्त हो गया तो तुम भी भूखे मर जाओगे ?. … अगर मेरा नाम ही दुनिया से उठ गया तो तुम्हारी जीवका का क्या होगा ?”

“एक पुजारी होकर क्या तुम नही सोचते कि केवल शैतान के अस्तित्व ने ही उसके शत्रु ’ मंदिर ’का निर्माण किया है ? वह पुरातन विरोध ही एक ऐसा रहस्मय हाथ है , जो कि निष्कपट लोगों की जेब से सोना – चांदी निकाल कर उपदेशकों और मंहतों की तिजोरियों में संचित करता है । “

” तुम गर्व मे चूर हो लेकिन नासमझ हो । मै तुम्हें ’ विशवास ’ का इतिहास सुनाऊगाँ और तुम उसमे सत्य को पाओगे जो हम दोनो के अस्तित्व को संयुक्त करता है और मेरे अस्तित्व को तुम्हारे अन्तकरण से बाँध देता है ।”

” समय के आरम्भ के पहले प्रहर मे आदमी सूर्य के चेहरे के सामने खडा हो गया और चिल्लाया , ’ आकाश के पीछे एक महान , स्नेहमय और उदार ईशवर वास करता है ।”

” जब आदमी ने उस बडे वृत की की ओर पीठ फ़ेर ली तो उसे अपनी परछाईं पृथ्वी पर दिखाई दी । वह चिल्ला उठा , ’ पृथ्वी की गहराईयों में एक शैतान रहता है जो दृष्टता को प्यार करता है । ’

’ और वह आदमी अपने -आपसे कानाफ़ूसी करते हुये अपनी गुफ़ा की ओर चल दिया , ’ मै दो बलशाली शक्तियों के बीच मे हूँ । एक वह , जिसकी मुझे शरण लेनी चाहिये और दूसरी वह , जिसके विरुद्द मुझे युद्द करना होगा । ’

” और सदियां जुलूस बना कर निकल गयीं , लेकिन मनुष्य दो शक्तियों के बीच मे डटा रहा – एक वह जिसकी वह अर्चना करता था , क्योंकि इसमे उसकी उन्नति थी और दूसरी वह , जिसकी वह निन्दा करता था , क्योंकि वह उसे भयभीत करती थी । “………….

थोडी देर बाद शैतान चुप हो गया और फ़िर बोला ,

” पृथ्वी पर भविष्यवाणी का जन्म भी मेरे कारण हुआ । ला-विस प्रथम मनुष्य था जिसने मेरी पैशाचिकता को एक व्यवासाय बनाया । ला-विस की मृत्यु के बाद यह वृति एक पूर्ण धन्धा बन गया और उन लोगों ने अपनाया जिनके मस्तिष्क मे ज्ञान का भण्डार है तथा जिनकी आत्मायें श्रेष्ठ , ह्र्दय स्वच्छ एवं कल्पनाशक्ति अनन्त है । “

“बेबीलोन ( बाबुल ) मे लोग एक पुजारी की पूजा सात बार झुक कर करते हैं जो मेरे साथ अपने भजनों द्वारा युद्द ठाने हुये हैं ।”

” नाइनेवेह ( नेनवा ) मे वे एक मनुष्य को , जिसका कहना है कि उसने मेरे आन्तरिक रहस्यों को जान लिया है , ईशवर और मेरे बीच एक सुनहरी कडी मानते हैं । “

” तिब्बत में वे एक मनुष्य को , जो मेरे साथ एक बार अपनी श्क्ति आजमा चुका है , सूर्य और चन्द्र्मा के पुत्र के नाम से पुकारते हैं । “

” बाइबल्स में ईफ़ेसस औइर एंटियोक ने अपने बच्चों का जीवन मेरे विरोधी पर बलिदान कर दिया । “

” और यरुशलम तथा रोम मे लोगों ने अपने जीवन को उनके हाथों सौंप दिया , जो मुझसे घृणा करते हैं और अपनी सम्पूर्ण शक्ति द्वारा मुझसे युद्द मे लगे हुये हैं । “

” यदि मै न होता तो मन्दिर न बनाये जाते , मीनारों और विशाल धार्मिक भवनों का निर्माण न हुआ होता । “

” मै वह साहस हूँ , जो मनुष्य मे दृढ निष्ठा पैदा करता है “

” मै वह स्त्रोत हूँ , जो भावनाओं की अपूर्वता को उकसाता है । “

” मै शैतान हूँ , अजर-अमर ! मै शैतान हूँ , जिसके साथ लोग युद्द इसलिये करते हैं कि जीवित रह सकें । यदि वह मुझसे युद्द करना बंद कर दें तो आलस्य उनके मस्तिष्क , ह्र्दय और आत्मा के स्पन्दन को बन्द कर देगा …।”

” मै एक मूक और क्रुद्द तूफ़ान हूँ , जो पुरुष के मस्तिष्क और नारी के ह्र्दय को झकझोर डालता है । मुझसे भयभीत होकर वे मुझे दण्ड दिलाने मन्दिरों एवं धर्म-मठों को भाग जाते हैं अथवा मेरी प्रसन्नता के लिये, बुरे स्थान पर जाकर मेरी इच्छा के सम्मुख आत्म -समर्पण कर देते हैं ।”

” मै शैतान हूँ अजर-अमर ! “

” भय की नींव पर खडे धर्म – मठॊ का मै ही निर्माता हूँ । …..यदि मै न रहूँ तो विशव मे भय और आनन्द का अन्त हो जायेगा और इनके लोप हो जाने से मनुष्य के ह्र्दय मे आशाएं एंव आकाक्षाएं भी न रहेगीं । “

” मै अमर शैतान हूँ ! “

” झूठ , अपयश , विशवासघात , एवं विडम्बना के लिये मै प्रोत्साहन हूँ और यदि इन तत्वों का बहिष्कार कर दिया जाए तो मानव- समाज एक निर्जन क्षेत्र-मात्र रह जायेगा , जिसमें धर्म के कांटॊं के अतिरिक्त कुछ भी न पनप पायेगा । “

” मै अमर शैतान हूँ ! “

” मैं पाप का ह्र्दय हूँ । क्या तुम यह इच्छा कर सकोगे कि मेरे ह्र्दय के स्पन्दन को थामकर तुम मनुष्य गति को रोक दो ?”

” क्या तुम मूल को नष्ट करके उसके परिणाम को स्वीकार कर पाओगे ? मै ही तो मूल हूँ ।”

” क्या तुम अब भी मुझे इस निर्जन वन मे इसी तरह मरता छोडकर चले जाओगे?”

” क्या तुम आज उसी बन्धन को तोड फ़ेंकना चाहते हो , जो मेरे और तुम्हारे बीच दृढ है ? जबाब दो , ऐ पुजारी ! “

पिता इसमान व्याकुल हो उठे और कांपते हुये बोले ,

” मुझे विशवास हो गया है कि यदि तुम्हारी मृत्यु हो गयी तो प्रलोभन का भी अन्त हो जायेगा और इसके अन्त से मृत्यु उस आदर्श शक्ति को नष्ट कर देगी , जो मनुष्य को उन्नत और चौकस बनाती है ! “

“तुम्हें जीवित रहना होगा । यदि तुम मर गये तो लोगों के मन से भय का अन्त हो जायेगा और वे पूजा – अर्चना करना छोड देगें , क्योंकि पाप का अस्तित्व न रहेगा ! “

और अन्त मे पिता इस्मान ने अपने कुरते की बाहें चढाते हुये शैतान को अपने कंधें पर लादा और अपने घर को चल दिये ।

देखें यहाँ : http://drprabhattandon.wordpress.com/2007/07/26/khalil-jibran-a-rebel/

3 thoughts on “खलील जिब्रान की कहानी शैतान -प्रस्तुति: डॉ प्रभात टंडन

    • Thanks sushil, I am glad there there are some guys like you who can understand TRUTH…join samay buddha MISHAN….one more thing I want to tell you your title is SHARMA…do you know how it came into existence….when lord buddha use to give DESHNA (dharmopdesh) then he start like

      HE BRAHMANO AUR SHRMANO…..

      SHRMANO KA MATLAB THOSE WHO CAME TO LISTEN BUDDHA AND BRAHMIN GENERALLY COMES TO ARGUE ON RELIGION RATHER THAN BELIVING AND LISTNING…

      those SHRMANS are todays SHARMA….buddhists

      similirly dikshit kare those who have takeb buddhism diksha

      DIKSHA is buddhism word…

      welcome back to home…….

      bhagwaan buddha ne kaha hai

      “ghrina me hum kisi ki acchai nahin dekh sakte aur moh me burai”

      namo Buddhay…

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