बौद्ध धम्म और अहिंसा पर नजरिया- जहाँ हिंसा आवश्यक है वहाँ तथागत बुद्ध ने अनुमति दी थी….Team SBMT


तथागत गौतम बुद्धा कभी किसी बात के अच्छे या बुरे होने पर बहुत जोर नहीं देते वो इस बात पर जोर देते हैं कि हमें अपनी बुद्धि को इतना विकसित कर लेना है कि हम व्यहार का सिद्धांत और सिद्धांत का व्यहार के लिए कब कैसे और कितना इस्तेमाल करना है सीख जाएँ|

आज पतंजलि के नाम पर लोग ये दुष्प्रचार कर रहे हैं कि भारत इसलिए विदेशी आक्रमणों से हरा क्योंकि बौद्ध होती जा रही जनता ने हिंसा और युद्ध का मार्ग छोड़ दिया था| जबकि सत्ये ये है कि इतिहास में जब भी भारत विदेशी आक्रमण से हरा है तब तब इस देश कि सत्ता पर मनुवादी कायम थे और जब जब इस देश कि सत्ता पर बहुजन थे तब तब किसी कि हिम्मत नहीं हुई भारत पर आक्रमण करने कि| सम्राट अशोक महान अपने सीमाओं कि प्रजा को सम्भोदित करते हुए कई शीला लेख लिखवाते हैं कि हमारी सीमा से भयभीत न हों अगय न्याय चाहिए तो किसी भी समय रजा के समक्ष न्याय मांगो| उन्होंने साफ लिखा कि मुझसे भयबजीत होने कि जरूरत नहीं आओ आपको न्याय मिलेगा| इसका अर्थ ये है कि हमारी सत्ता से सब डरते थे आक्रमण करना तो दूर कि बात|

elephant dhamm chakraआम तौर पर जैन धर्म की ही भांति बौध धम्म को भी अहिंसा का घोरतम समर्थक मन जाता है, पर ये पूरी तरह सच नहीं हैं| इस विषय पर भी बौध धर्म ने माध्यम मार्ग अपनाते हुए न ही पूरी तरह समर्थन किया न पूरी तरह नाकारा| “अहिंसा परमो धर्मं ” असल में एक जैन सिद्धांत है बौध नहीं|इस विषय पर पहला परिस्थिति जन्य सक्स्ये ये है की भिक्ख के रूप में यदि मांस भी दिया जाए तो भगवान् बुद्ध को मांस ग्रहण करने में कोई आपत्ति  न होगी,यदि भिक्षु किसी प्रकार से भी जीव हत्या से सम्बंधित नहीं है तो वह भिक्का में प्राप्त मांस ग्रहण कर सकता है |भगवान् बुद्ध ने देवदत्त के प्रस्ताव को ठुकरा दिया जो चाहता था की भिक्का में दिए जाने पर भी भिक्षु मांसाहार ग्रहण न करे| भगवान् बुद्ध असल में हिंसा करने की इच्छा के वोधी थे, जैसे धर्म या यग  के नाम पर की जाने वाली हत्या का उन्होंने घोर  विरोध किया|

नेपाल में आज भी धर्म के नाम पर विश्व की सबसे बड़ी पशु बलि का प्रचलन है,भगवान् बुद्ध के विरोध के बावजूद इतना अहिंसा बाकि बची है तो उनसे पहले कितनी ज्यादा होतो होगी| आज का नेपाल उस  इलाके का हिस्सा है जो भगवान् बुद्ध का कार्य क्षेत्र रहा था, यही की बलि प्रथा का उन्होंने सकत विरोध किया| टेलेग्राफ का एक आर्टिकल देखें :

http://www.telegraph.co.uk/news/worldnews/asia/nepal/6645024/Worlds-biggest-animal-sacrifice-held-in-Nepal.html
अहिंसा से भगवान् बुद्ध का अभिप्राय ये नहीं है की किसी को कभी मरो ही नहीं अपितु ये है की सभी प्राणीयों  से मैत्री रखो| इस बात को बेहतर तरह से समझने के लिए  हमें भगवन बुद्ध द्वारा बताये “जीव हत्या की इच्छा” और “जीव हत्या की आवश्यकता” के सिद्धांतों में भेद  करके समझना पड़ेगा|उन्होंने “जहाँ जीव हत्या की जरूरत है” वहां जीव हत्या को मन नहीं किया अपितु जहाँ “जीव हत्या की इच्छा के अतिरिक्त” कुछ नहीं, चाहे वो किसी धर्म या देवी शक्ति के ही नाम पर क्यों न हो सर्वथा वर्जित है नींदनिये  है | उन्होंने इस बात का निर्णय व्यक्ति पर छोड़ा है ताकि वह परिस्थिति के हिसाब से निर्णय ले सके |

इसी बात को दुसरे शब्दों में कहा जाए तो भगवान् बुद्ध ने शील या आदर्श और नियम में भेद किया है| जैसा की हम सभी जानते हैं की एक शील या आदर्श आपको कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड़ता है और जबकि नियम स्वतंत्र नहीं छोड़ता, यदि आप नियम तोड़ते हैं तो नियम आपको तोड़ता है |

अहिंसा पर तथागत बुद्ध के विचार: –

तथागत बुद्ध हिंसा के खिलाफ थे , लेकिन न्याय के पक्ष में थे |जब क़भी न्याय के लिए, हिंसा आवश्यक है वहाँ तथागत बुद्ध ने अनुमति दी थी.

तथागत बुद्ध और सिंह सेनापति (वैशाली कमांडर) की बातचीत नीचे दी गई

सिंह सेनापति ने तथागत बुद्ध से पूछा

“भगवंत, अहिंसा के विचारों का प्रचार और प्रसार करते है,इसका मतलब भगवंत यह चाहते हैं कि अपराधियों को दंडित नहीं किया जाए ?
हमारे बच्चों की रक्षा, पत्नी के सम्मान , प्रतिष्ठा की रक्षा और संपत्ति की रक्षा के लिए हम युद्ध पर नहीं जाए ?
अहिंसा के नाम पर हम अपराधी से हानि और नुक़सान भुगते ? अगर युद्ध सत्य और न्याय के लिए है तो भी भगवंत सभी प्रकार के युद्ध को मना करते है ?

तथागत बुद्ध ने सिंह सेनापति को उत्तर दिया ”

तुम ने मेरी सलाह का गलत अर्थ लगाया है ,अपराधी को दंडित करना होगा लेकिन निर्दोष को मुक्त करना होगा.न्यायाधीश एक आपराधिक सज़ा देना हिंसा करना नहीं हैं,सज़ा कारण के लिए अपराधी के अपराध जिम्मेदार है. न्यायाधीश हिंसा के लिए के जिम्मेदार नहीं है ,केवल न्यायाधीश कानून लागू करता है.

जो मनुष्य न्याय , नैतिकता , सुरक्षा और आजादी के लिए संघर्ष  करता है वह हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं है ,शांति के सभी तरीके जब असफल होते है तब
जो युद्ध शुरू करते हैं, वह हिंसा के लिए जिम्मेदार है ,किसी भी स्थिति में दुष्ट विचारों के लोगों के सामने आत्मसमर्पण करने का नहीं.किसी भी स्थिति में दुष्ट विचारों के लोगों के सामने घुटने टेकना नहीं.

SOURCE: https://www.facebook.com/rajkamalbauddh/posts/10200185419866736?notif_t=close_friend_activity

आपके विरोधी तो इतने कुटिल हैं ही वो हिंसा और अन्याय को ही धर्म बताकर जनता का विश्वास अपने पक्ष में कर लेते हैं,बहुजनों को ये बात समझने की बहुत ज्यादा जरूरत है, हिंसा हिंसा है अन्याय अन्याय है कहीं भी किसी भी सच्चे धर्म   में इस जायज़ नहीं ठहराया जा सकता |

बौद्ध धर्म और बर्मा या मयन्मार राष्ट्रवाद के विषय में निम्न आर्टिकल जरूर पढ़ें

http://blog.sureshchiplunkar.com/2013/07/buddhist-terror-and-osama-of-myanmar.html

 समयबुद्धा का इस विषय में कहना है की

“बौद्ध संस्कृति में हम ‘हाथी’ को कई प्रकार के राजनेतिक एव धार्मिक चिन्ह के रूप में प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि हमारी हिंसा जंगल में हाथी की हिंसा के सामान है|जिस तरह हाथी मासाहारी जानवरों की तरह पहल करके हिंसा नहीं करता पर जब उसे छेड़ा जाए तो वो इतना हिंसात्मक हो जाता है की सब तहस नहस कर डालता है| उसी तरह भारत का  बहुजन या बौद्ध भी है पहल करके बिना वजह हिंसा नहीं करता|हाथी की हिंसा में ध्यान देने वाली बात ये है की उसको हिंसा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि उसकी ताकत का सबको अंदाजा होता है,ये बात हिरन पर लागू नहीं हो सकती|इसीलिए किसी ने सही कहा है की अगर शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तयार रहो|”

अहिंसा पर इन सभी बातों का सार ये है की केवल आत्मा रक्षा में की गई हिंसा ही जायज़ है बाकि सब नाजायज़ और कुकर्म|

इस लेख पर डॉ प्रभात टंडन जी के कमेंट्स इस प्रकार हैं:

धम्मपद धम्मपद की गाथा “दण्ड्वग्गो’ मे भगवान बुद्ध कहते है :
१२९.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्‍चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न किसी की हत्या करे , न हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।
१३०.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।
१३१.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो न लभते सुखं॥
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।
१३२.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो लभते सुखं॥
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित नही करता है ( कष्ट नही पहुँचाता है ) वह मर कर सुख पाता है ।
स्पष्ट है बुद्ध का मार्ग अहिसंक होते हुये भी मध्यमार्गीय रहा लेकिन वह व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिये पशु हिंसा के पक्ष मे न थे ।

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