17-Dec-2013 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: “लोग वैसी दुनिया चाहते हैं जैसी बुद्ध बनाना चाहते थे,भारत ही नहीं समस्त विश्व बुद्ध कि तरफ चल पड़ा है,”…समयबुद्धा


dhamm vs dharmeinstien

महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने  कहा था कि :

“बुद्ध धम्म में वे लक्षण हैं जो भविष्य के सार्वभौमिक धर्म में अपेक्षित है : यह वैयक्तिक ईशवर से परे है , हठधर्मिता और ईशवरवादी धर्म धाराणाओं से मुक्त है ; यह प्राकृतिक और आध्यात्मिक दोनों तत्वों को समावेशित करता है , यह सभी चीजों के अनुभव की धार्मिक भावना की अभिलाषा पर आधारित है , प्राकृतिक और आधात्मिक दोनों , एक अर्थपूर्ण एकत्व । यदि ऐसा कोई धर्म है जो आधुनिक वैज्ञानिक आवशयकताओं के साथ सुसंगत हो सकता है , तो वह बुद्ध धम्म ही होगा, ।”…अल्बर्ट आईनस्टीन

भारत का इतिहास बौद्धों और विरोधियों के संगर्ष कि कहानी के सिवा और कुछ नहीं, बस समय के साथ धर्म  नाम और रूप  बदलते रहते हैं पर विचारधारा वाही रहती है|ये संगर्ष है मानवता का और ईश्वरवादिता का या यूं कहें जियो और जीने दो कि नीति का और उंच नीच के षड्यंत्र का|इसमें विदेशी आक्रमणकारी एक पात्र का काम करते हैं बस, इस बात को समझने के लिए इतिहास का ज्ञान होना जरूरी है|खेर इसी संगर्ष में बौद्ध राजाओं कि हार के कारन भारत में बौद्ध धम्म सात सौ सैलून तक सुप्तावस्था में रहा| फिर अंग्रेजों ने खुदाई की धर्मोत्थान को नया  पञ्च रंगिये झंडा बनाया और बौद्ध धम्म को पुनरस्तापित करने कि कोशिश की| बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने बहुजन जनता को वापस अपने बौद्ध धम्म में लौटाया और इस तरह भारत में बौद्ध धम्म के पुनरुत्थान की शुरुआत हुई|

ये जिंदगी का बुनियादी नियम है की जिस तरह दिन के बाद  रात आती है फिर रात के बाद दिन आता है उसी प्रकार धर्म के बाद अधर्म आता है अधर्म के बाद धर्म आता है या कहें ईश्वरवाद के चरम पर मानवता आती है मानवता के चरम पर ईश्वरवाद आता है ये चक्र यूं ही चलता रहता है|मानवता बहाल होने से पुरोहितवादी लोग जो अपनी श्रेस्टता खोने से तिलमिलाए होते हैं,षड्यंत्र में लग जाते हैं|ये लोग निरंतर मानवता विरोधी दया शून्य षड्यंत्र करते रहते हैं यहाँ तक की अपने श्रेस्टता को वापस पाने हेतु नरसंघार और महायुद्ध तक करवाने से नहीं हिचकते इतिहास में ऐसा कई बार हो चुका है|जब युद्ध होता है तब मानवता और विज्ञानं सदियों पीछे चले जाते है| ऐसे में ईश्वर वाद का फिर उदय होता है पुरोहितवाद का फिर उदय होते हैं और फिर ईश्वर के नाम पर आम जनता का शोषण होना शुरू हो जाता है| आस्तिकता के चरम पर नास्तिकता आती है और नास्तिकता के चरम पर आस्तिकता| अब ईश्वरवाद का चरम हो चुका है अब मानवतावाद को आना ही होगा इसे कोई नहीं रोक सकता|

धम्म विरोधी लोग हमेशा धम्म को हराने की नीतियां खोज ही लेते हैं जैसे जब बुद्ध की बातें लोगों की समझ में आने लगी तो इन्होने कहना शुरू कर दिया की ये सब वो बाते हैं जो कानों को अच्छी लगती हैं इसकिये उन्होंने ऐसे सभी मानवतावादी महापुरुषों को चरुवाक कहा अर्थात वो लोग जिनके वाक्य कानों को भायें| फिर भी जब लोगों ने नहीं माना तो इन लोगों ने षड्यंत्र और युद्ध से जनता के राजाओं को हराया|और फिर हारे हुई जनता और उसके राजाओं को राक्षश अधर्मी नीच आदि अदि लिखवाकर इतिहास में उनको घृणा का पात्र बना डाला| दिन रात मीडिया में ऐसे मानवता समर्थक लोगों की बुराई कर कर  के जनता को जिनका भला असल में जिन लोगों से था वो उसे से घृणा करने लगी|

भगवान् बुद्धा ने कितना सच कहा था की – “हम जससे घृणा करते हैं उसकी अच्छाई देख ही नहीं पाते”

यही कारन है की धम्म विरोधियों की धम्म और बुद्धा और उसके लोगों के प्रति जो घृणा फैलाई इसीलिए लोग बुद्ध की तरफ नहीं गए और अपना शोषण सदियों तक करवाते रहे|पर अब लोग जाग रहे हैं

धन और मीडिया कि शक्ति के बिना भी जनता द्वारा सबसे ज्यादा चाहे जाने वाले भारतीय हैं  तथागत गौतम बुद्ध और बोधिसत्व डॉ आंबेडकर| ये दोनों किसी धन बल पर चलने वाली मीडिया फैक्ट्री से बनकर निकले जबरदस्ती के रेडीमेड लीडर नहीं हैं ये भारत कि जनता के ह्रदय सम्राट हैं, जनता के मन में बसते हैं|आज भारत कि हालत ये है कि बहुजन विरोधी लोग दिन रात मीडिया,राजसत्ता और धन बल से पता नहीं किसे किसे जनता का लीडर बना रहे हैं या बनाये रखना चाहते हैं जबकि जनता की उनमें रूचि नहीं | पर तथागत गौतम बुद्ध और डॉ आंबेडकर ऐसे भारतीय लीडर हैं जिनसे बिना धन,मीडिया और राजसत्ता बल के भी रोज हज़ारों लोग जुड़ जाते हैं, इनकी बढ़ती लोकप्रियता इस बात का सबूत है| अगर धम्म विरोधी अपने तथाकथित महापुरुषों के महिमा मंडन पर धन खर्च करना बंद कर दे तो वो जनता के मन से जल्द ही गायब हो जायेंगे|

भारत देश कि जमीन पर इसके सच्चे सपूतों का नाम और काम कभी नहीं मिट सकता ये जमीन भी अपने सपूतों को और अपने आक्रमण कारियों  को जानती जानती है| ये बुद्ध कि धरती है ये भारतीये बहुजनों की धरती है|ये अप्रत्याशित जनता समर्थन भारत में बौद्ध धम्म के पुनुरुत्थान को बहुत बल दे रही है|आप खुद देखिये बुद्ध की धरती पर कोई भी नयी कॉलोनी बनती है तो उसका नाम या तो कोई अंग्रेजी रखा जाता है या फिर विहार हैसे निर्माण विहार राहुल विहार आदि| अब जगह के नाम फलानागढ़ या फलानाबाद नहीं रखा जाता| विहार और पुर ये बौद्ध नाम हैं विहार का मतलब है जहाँ बुद्ध घूमे और पुर का मतलब है आराम महल|ये सब अपने आप हो रहा है ये सब भारत को बोधमय बना राह है|

लोग अंध श्रद्धा और तर्क, कर्मकांड और विज्ञानं में फर्क समझने लगे हैं अब लोग समझने लगे हैं की सिर्फ प्रार्थना करना वाले होठों से मदत करने वाले हाथ बहुत ज्यादा बेहतर होते हैं| लोग धीरे धीरे व्यक्ति पूजा से ज्यादा उनके सिद्धांतों पर जोर देने लगे हैं| विज्ञानं और तकनिकी के बढ़ने से धार्मिक आडम्बर और अंधविश्वासों को गहरा धक्का  लगा है| बहुत से पुराने ज़माने के धार्मिक विश्वासों की ग़लतफ़हमी साफ़ हो चली है| ये सब बौद्ध धम्म के पक्ष में है|

लोग समझने लगे हैं की बाकि विरोधी धर्म में केवल मरे हुए पुराने राजाओं और बाबाओं की महिमा गाने के आलावा और कुछ नहीं इससे उनका कोई भला नहीं होता|अगर किसी चीज़ से भला होता है तो उन पुराने लोगों की आदर्शों से बातों की अपने जीवन में इस्तेमाल करने से|लोग समझने लगे हैं की बिना प्रमाण के कुछ भी स्वीकारना मतलब अपना नुक्सान करना ही होगा|

आज सारी दुनिया में गणराज्य या रिपब्लिक देश बनाने का चलन है जिसमें किसी एक राजा की मनमानी नहीं चलती बल्कि जनता के चुनावों द्वारा फैसला होता है|जैसे कौन राजा होगा और कौन सी नीतियां चलेंगी| ये गणराजय जिसे पश्चिम बाले पिछली सदी से ही जाने हैं ये बोधमय भारत में हज़ारों साल से प्रचलित थी|तथागत गौतम बुद्ध के पिता के राज्ये को शाक्य गणराजय कहते थे|विश्व के हर मामले में अग्रणी लोग जिन्हें हम अंग्रेज के नाम से जानते हैं वे तेज़ी से बौद्ध धम्म कि तरफ जा रहे हैं| आपको ये जानकार थोडा आश्चर्य होगा कि पश्चिम में करुणामयी  इसा मसीह के बौद्ध भिक्कू होने कि चर्चा चल रही है| ऐसी चर्चाओं को आप यू टूयब  पर खूब देख सकते हो|खेर सत्य जो भी हो कहने का तात्पर्य ये है कि बुद्धिजीवी वर्ग बौद्ध धम्म को अपना रहा है|इतिहास गवाह है कि बदलाव केवल बुद्धिजीवी वर्ग ही लाता है और ये बदलाव दिख रहा है संयुक्त रास्त्र जैसी संस्थाएं गणराजय देश बनने पर जोर दे रही हैं|

आपको ये जान कर ख़ुशी होगी कि सात एसियन देश मिल कर बिहार में बहुत बढ़ी और भव्य नालंदा यूनिवर्सिटी बनाने का करार किया है| बहुजन शाशक मायावती के शाशन से बहुत से बौद्ध शिक्षण संसथान पहले ही कार्यरत हैं| बहुत तेज़ी से रिसर्च हो रही है | हम सब बोधमय भारत कि तरफ चल रहे हैं|

अब जनता बेवाक होती जा रही है वो ज्यादा धर्म के चक्कर में नहीं पड़ती| जनता बस खुशाल जीना चाहती है|बस कमान खाना और शती चाहती है| कर्मकांड अब कम होते जा रहे हैं लोग इन्हें छोड़ते जा रहे हैं| ये सब भी भारत को बौद्धमय बना रहा है| क्योंकि बौद्ध धम्म के प्रति धरना फैलाई गई है इसलिए लोग बौद्ध का नाम नहीं लेते पर असक में उनकी मानसिकता बौद्धमय  हो चली है|

उदाहरण के लिए किसी भी पूजास्थान में भगदड़ या प्राकृतिक आपदा से लोग मरते हैं तब जनता ये सवाल करने लगी है कि तथाकथित ईश्वर के दरवाजे पर भी सुरक्षित नहीं तो ऐसा ईश्वर शक के दायरे में आने लगा है| लोग अब सत्य जानने को उत्सुक हैं, ज्यादा दिन तक इनकी आँखों पर अंधश्रद्धा का पर्दा नहीं डाले रख सकते ये पुरोहित लोग| धम्म के लिए भारत कि जामीन अब तैयार है|अब वो समय आ गया है कि जब लोग धार्मिक बाबाओं गुरुओं और इसके ठेकेदारों को शक कि नज़र से देखने लगे हैं|लोग अपने कार्य स्थलों में अपने सर्कल में धर्म कि चर्चा करने से बचने लगे हैं क्योंकि ये अप्ससी मन मिटाव पैदा करता है जो कि सभी के लिए घातक होता है|

जैसे पहले रजा और धर्म गुरु का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था पर आज अगर ये भी बुरा करेंगे तो इनको भी कानून का सामना करना पड़ेगा|यही तो बौद्ध धम्म का मकसद था, सबको न्याय मिले| समस्त भारत अहसान मंद है बाबा साहब आंबेडकर का जिन्होंने ऐसे उच्च बौद्ध मूल्यों को कानून और संविधान का रूप दिया| ये और बात है कि विरोधियों ने ऐसे युग पुरुष को जनता को ह्रदय सम्राट बनाने से रोकने के लिए जातिगत घृणा से अलग थलग कर दिया है| आज बाबा साहब के संविधान के मजे तो सब ले रहे हैं पर जातिगत घृणा के चलते अहसान नहीं मान रहे| खेर देर सवेर ही सही मान जायेंगे|

आज सब समझनते लगे हैं कि कानून व्यस्था से ऊपर कुछ नहीं संविधान से ऊपर कुछ नहीं यहाँ तक कि ईश्वर भी नहीं| भारत देश में “ओह माय गोड” (बोलुवूड) डा विन्ची कोड(हॉलीवुड) , किंगडम ऑफ़ हेवन(हॉलीवुड) जैसी फ़िल्म का बनना और कामयाब होना इस बात का सबूत है कि जनता में धम्म को समजने वाली सेंस विकसित हो रही है|ओह माय गोड जैसी हिंदी फ़िल्म ने बखूबी साबित किया ही कि अगर ईश्वर अन्याय करेगा तो उसे भी कानून का सामना करना होगा, हालाँकि कुछ दबाबों के चलते इस फ़िल्म को अंत में ईश्वरवाद पर ही ख़तम किया पर ये एक अच्छी शुरुआत है|

मैं काफी दिन यूरोप में रहा वहाँ बहुत ही ज्यादा भव्ये और बड़े गिरजाघर हैं पर उनमे मुझे बहुत कम  भीड़ नजर आयी|भारत में आजकल जब पूजास्थलों और पुराने ज़माने के राजाओं और बाबाओं को ईश्वर घोषित करके उसकी तारीफ में गाने गाने को, लोग ढोंग समझने लगे हैं तो ऐसे में बौद्ध सिद्धांत सत्यसंग अर्थात सत्य का संग जिसमे कोई सत्य शोधक जनता को सत्य  बताता है, ये सब काफी प्रचलित है| इसी तर्ज पर धम्म विरोधी भी अपनी ढोंग लीला को लेकर सत्संग कर रहे है| खेर ये जो सत्संग का चलन है ये भी लोगों को तर्क करने और प्रमाणिकता के बिना कुछ भी न स्वीकारने के तरफ ले जा रहे हैं| भले भी आज बुद्ध के नाम से सत्संग न होते हो, वजह वही घृणा संचार पर बातें वही हैं बहुजन गुरुओं वाली वही जिओ और जीने दो वाली| वही बहुजन गुरु जैसे बुद्ध ,कबीर,नानक, रविदास, तुकाराम,पेरियार  अदि अनेकों संतों कि वादियों को याद किया जा रहा है| आज लोगों  मरे हुए पुराने राजाओं और बाबाओं के तारीफ वाले गावों में समय बर्बाद नहीं करना चाहते बल्कि दर्शन या काम कि बात जानना और अपनाना चाहते हैं|आज सत्संग के नाम पर बहुजन मूल्यों का प्रचार हो रहा है वो दिन दूर नहीं जब जनता इस विचारधारा कि जड़ में पहुच जायेगी जो कि बौद्ध धम्म है| और तब धम्म से घृणा का षड्यंत्र और उसके षड्यंत्रकारी ख़त्म हो जायेंगे| सत्यमेव जयते

आज लोगों को विज्ञानं पसंद है, गणतंत्र पसंद है, न्याय व्यस्था पसंद है| उन्हें ये पसंद है कि न्याय के आगे कोई न हो चाहिए वो रजा या पुरोहित ही क्यों न हो|ये सब बौद्ध मूल्ये हैं लोग भले ही इस सब के लिए भगवन बुद्धा और उनके धम्म को जिम्मेदार न बताएं पर वे अब इन मूल्यों को बहुत ज्यादा पसंद कर रहे हैं|ये बौद्ध माया भारत कि मानसिकता कि तैयारी है|

व्यक्ति केंद्रित न होकर संविधान शाषित व्यस्था, कानून और न्याय का सरोवोपरी होना, विज्ञानं और तकनीक का बढ़ना,विश्व के अग्रणी बुद्धिजीवियों का धम्म को तरफ बढ़ना,भारत के झंडे में बौद्ध का धार्मिक चिन्ह धर्मचक्र होना, भारत देश के एम्ब्लेम एक बौद्ध सम्राट अशोक का चार शेरो वाला एम्ब्लेम होना|सेना में अशोक चक्र बहुत बड़ा सैनिक सम्मान होना|सत्संग में बहुजन विचारधारा का प्रचार| जेन अनजाने बौद्ध मानसिकता कि प्रचार और प्रसार|भारत के बहुजनों का  तेजी से बोधमय बनते जाना क्या अब भी आप नहीं समझ सकते कि विरोधियों कि लाख कोशिशों के बावजूद भारत ही नहीं समस्त विश्व बोधमय होता जा रहा है|

बौद्ध धम्म कि ये विशेषता है कि इसके सिद्धांत बाकि धर्मों कि तरह समय के साथ पुराने नहीं होते|ये हज़ारों साल पहले भी काम के थे और हज़ारों लाखों साल तक बी काम के रहेंगे, मानव ही नहीं समस्त जीवों का भला करते रहेंगे|

शायद अब आप भी कुछ कुछ समझ रहे होंगे की बौद्ध धम्म असल में धर्म और ईश्वर से बिलकुल अलग है शायद अब आप समझ रहे होंगे की सम्राट अशोक महान बाबा साहब आंबेडकर और सभी बौद्ध ये क्यों मानते है की बौद्ध धम्म फैलाना ही मानवता की सच्ची सेवा है बाकि सब तो बस अपना वर्चव और श्रेस्टता को बचने का षड्यंत्र  मात्र है|

….समयबुद्धा

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