बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है, बौद्ध होने का मतलब ऐसा इंसान होना है जो जागृत है अर्थात सत्य कि सत्य और असत्य को असत्य समझने में सक्षम है और बुद्ध मार्ग द्वारा अपने दुखों से मुक्ति पाने के प्रयास में लगा हुआ है// ओशो प्रवचन ” जो ‘जागा’, वही ‘बुद्ध’ ”……ओशो


DHAMMA or DHARMA

” जो ‘जागा’, वही ‘बुद्ध’ ” ~ ओशो : –
” ‘बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है’| ‘गौतम बुद्ध एक नाम है’| ‘ऐसे और अनेंकों नाम हैं|’ धम्मपद के अंतिम सूत्रों का दिन आ गया!
लंबी थी यात्रा, पर बड़ी प्रीतिकर थी। मैं तो चाहता था-सदा चले। बुद्ध के साथ उठना, बुद्ध के साथ बैठना; बुद्ध की हवा में डोलना, बुद्ध की किरणों को पकड़ना; फिर से जीना उस शाश्वत पुराण को; बुद्ध और बुद्ध के शिष्यों के बीच जो अपूर्व घटनाएं घटीं, उन्हें फिर से समझना-बूझना-गुन ना; उन्हें फिर हृदय में बिठालना-यात्रा अदभुत थी।
पर यात्रा कितनी ही अदभुत हो, जिसकी शुरूआत है, उसका अंत है। हमकितनी ही चाहें, तो भी यहां शाश्वता नहीं हो सकता। यहां बुद्ध भी अवतरित होते हैं और विलीन हो जाते हैं। औरों की तो बात ही क्या! यहां सत्य भी आता है, तो ठहर नहीं पाता। क्षणभर को कौंध होती है, खो जाता है। यहां रोशनी नहीं उतरती, ऐसा नहीं। उतरती है। उतर भी नहीं पाती कि जाने का क्षण आ जाता है।
बुद्ध ने ठीक ही कहा है-यहां सभी कुछ क्षणभंगुर है। बेशर्त, सभी कुछ क्षणभंगुर है। और जो इस क्षणभंगुरता को जान लेता है, उसका यहां आना बंद हो जाता है। हम तभी तक यहां टटोलते हैं, जब तकहमें यह भ्रांति होती है कि शायदक्षणभंगुर में शाश्वत मिल जाए! शायद सुख में आनंद मिल जाए। शायदप्रेम में प्रार्थना मिल जाए। शायद देह में आत्मा मिल जाए। शायद पदार्थ में परमात्मा मिल जाए। शायद समय में हम उसे खोज लें, जो समय के पार है।
पर जो नहीं होना, वह नहीं होना। जो नहीं होता, वह नहीं हो सकता है।
यहां सत्य भी आता है, तो बस झलक दे पाता है। इस जगत का स्वभाव ही क्षणभंगुरता है। यहां शाश्वत भी पैर जमाकर खड़ा नहीं हो सकता! यह धारा बहती ही रहती है। यहां शुरुआत है; मध्य है; और अंत है। और देर नहीं लगती। और जितनी जीवंत बात हो, उतने जल्दी समाप्त हो जाती है। पत्थर तो देर तक पड़ा रहता है। फूल सुबह खिले, सांझ मुरझा जाते हैं।
यही कारण है कि बुद्धों के होने का हमें भरोसा नहीं आता। क्षणभर को रोशनी उतरती है, फिर खो जाती है। देर तक अंधेरा-और कभी-कभी रोशनी प्रगट होती है। सदियां बीतजाती हैं, तब रोशनी प्रगट होती है। पुरानी याददाश्तें भूल जाती हैं, तब रोशनी प्रगट होती है। फिरहम भरोसा नहीं कर पाते।
यहां तो हमें उस पर ही भरोसा ठीक से नहीं बैठता, जो

रोज-रोज होता है। यहां चीजें इतनी स्वप्नवत हैं! भरोसा हो तो कैसे हो। और जो कभी-कभी होता है सदियों में, जो विरल है, उस पर तो कैसे भरोसा हो! हमारे तो अनुभव में पहले कभी नहीं हुआ था, और हमारे अनुभव में शायद फिर कभी नहीं होगा।
इसलिए बुद्धों पर हमें गहरे में संदेह बना रहता है। ऐसे व्यक्ति हुए! ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं? और जब तक ऐसी आस्था प्रगाढ़ न हो कि ऐसे व्यक्ति हुए हैं, अब भी हो सकते हैं, आगे भी होते रहेंगे-तब तक तुम्हारे भीतर बुद्धत्व का जन्म नहीं हो सकेगा। क्योंकि अगर यह भीतर संदेह हो कि बुद्ध होते ही नहीं, तो तुम कैसे बुद्धत्व कीयात्रा करोगे? जो होता ही नहीं, उस तरफ कोई भी नहीं जाता।
जो होता है-सुनिश्चित होता है-ऐसी जब प्रगाढ़ता से तुम्हारे प्राणों में बात बैठ जाएगी, तभी तुम कदम उठा सकोगे अज्ञात कीosho36 ओर।
इसलिए बुद्ध की चर्चा की। इसलिए और बुद्धों की भी तुमसे चर्चा कीहै। सिर्फ यह भरोसा दिलाने के लिए; तुम्हारे भीतर यह आस्था उमगआए कि नहीं, तुम किसी व्यर्थ खोज में नहीं लग गये हो; परमात्मा है। तुम अंधेरे में नहीं चल रहे हो, यह रास्ता खूब चला हुआ है। औरभी लोग तुमसे पहले इस पर चले हैं। और ऐसा पहले ही होता था-ऐसा नहीं। फिर हो सकता है। क्योंकि तुम्हारे भीतर वह सब मौजूद है, जोबुद्ध के भीतर मौजूद था। जरा बुद्ध पर भरोसा आने की जरूरत है।

और जब मैं कहता हूं: बुद्ध पर भरोसा आने की जरूरत, तो मेरा अर्थगौतम बुद्ध से नहीं है। और भी बुद्ध हुए हैं। क्राइस्ट और कृष्ण, और मुहम्मद और महावीर, और लाओत्सू और जरथुस्त्र। जो जागा, वही बुद्ध। बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है। गौतम बुद्ध एकनाम है। ऐसे और अनेंकों नाम हैं।
गौतम बुद्ध के साथ इन अनेक महीनों तक हमने सत्संग किया। धम्मपद के तो अंतिम सूत्र का दिनआ गया, लेकिन इस सत्संग को भूल मतजाना। इसे सम्हालकर रखना। यह परमसंपदा है। इसी संपदा में तुम्हारा सौभाग्य छिपा है। इसी संपदा में तुम्हारा भविष्य है।
फिर-फिर इन गाथाओं को सोचना। फिर-फिर इन गाथाओं को गुनगुनाना। फिर-फिर इन अपूर्व दृश्यों को स्मरण में लाना। ताकिबार-बार के आघात से तुम्हारे भीतर सुनिश्चित रेखाएं हो जाएं। पत्थर पर भी रस्सी आती-जाती रहतीहै, तो निशान पड़ जाते हैं।

इसलिए इस देश ने अनूठी बात खोजी थी, जो दुनिया में कहीं भी नहीं है। वह थी-पाठ। पढ़ना तो एक बात है। पाठ बिलकुल ही दूसरी बात है।पढ़ने का तो अर्थ होता है: एक किताब पढ़ ली, खतम हो गयी। बात समाप्त हो गयी। पाठ का अर्थ होताहै: जो पढ़ा, उसे फिर पढ़ा, फिर-फिर पढ़ा। क्योंकि कुछ ऐसी बातें हैं इस जगत में, जो एक ही बार पढ़ने से किसकी समझ में आ सकती हैं! कुछ ऐसी बातें हैं इस जगत में, जिनमेंगहराइयों पर गहराइयां हैं। जिनको तुम जितना खोदोगे, उतने ही अमृत की संभावना बढ़ती जाएगी। उन्हीं को हम शास्त्र कहते हैं। किताब और शास्त्र में यही फर्क है। किताब वह, जिसमें एक ही पर्त होती है। एक बार पढ़ ली और खतम हो गयी। एक उपन्यास पढ़ा और व्यर्थ हो गया। एक फिल्म देखी और बात खतम हो गयी। दुबारा कौन उस फिल्मको देखना चाहेगा! देखने को कुछ बचा ही नहीं। सतह थी, चुक गयी।

शास्त्र हम कहते हैं ऐसी किताब को, जिसे जितनी बार देखा, उतनी बार नए अर्थ पैदा हुए। जितनी बारझांका, उतनी बार कुछ नया हाथ लगा।जितनी बार भीतर गए, कुछ लेकर लौटे। बार-बार गए और बार-बार ज्यादा मिला। क्यों? क्योंकि तुम्हारा अनुभव बढ़ता गया। तुम्हारे मनन की क्षमता बढ़ती गयी। तुम्हारे ध्यान की क्षमता बढ़ती गयी।

बुद्धों के वचन ऐसे वचन हैं कि तुम जन्मों-जन्मों तक खोदते रहोगे, तो भी तुम आखिरी स्थान पर नहीं पहुँच पाओगे। आएगा ही नहीं।गहराई के बाद और गहराई। गहराई बढ़ती चली जाती है।

 

http://dhruv1986.wordpress.com/2012/07/01/%E0%A4%9C%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B/

4 thoughts on “बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है, बौद्ध होने का मतलब ऐसा इंसान होना है जो जागृत है अर्थात सत्य कि सत्य और असत्य को असत्य समझने में सक्षम है और बुद्ध मार्ग द्वारा अपने दुखों से मुक्ति पाने के प्रयास में लगा हुआ है// ओशो प्रवचन ” जो ‘जागा’, वही ‘बुद्ध’ ”……ओशो

  1. yaha pravachan bahuta accha laga mai swam “es Dhammo sanantano” ki audio cd soon raha hon , osho ke pravaachano se sabhi dharmo khaskar Buddhism ka bahot sukshma gyan nmilta hai, ye pravachan karte hai jo anya kitabe nahi kar sakti. Thanks

    • ओशो को लोग बहुत विद्वान और आध्यात्मिक मानते हैं पर मैं इसका खंडन करता हूँ। अध्यात्म और ज्ञानवान की श्रेणी में मैं भगवान बुद्ध को श्रेष्ठ मानता हूँ। पर यह तुलना क्यों, इसका कारण यह है कि लोगों को सही दिशा पता चले। ओशो को कितनी जानकारी थी यह कोई श्रेष्ठता नहीं क्योंकि ओशो की अधिकांश्तर जानकारियां पुस्तकों द्वारा प्राप्त की गई थी। परन्तु भगवान बुद्ध अपने धम्म का जो ज्ञान बताते हैं वह उस समय कोई पुस्तकों में नहीं था और उनके अनुभव पर था। अध्यात्मिक पुरुषों की तुलना उनके जीवन से भी करनी चाहिए। भगवान बुद्ध एक योगी का जीवन व्यतीत करते हैं और अपने पांच सीलों (शीलों) में से एक यह भी रखते हैं कि व्यभिचार नहीं करना है। वहीं ओशो व्यभिचार को बढ़ावा देते हैं। भगवान बुद्ध भिक्खु के लिए निर्वाण का जो अलौकिक मार्ग बताते हैं उसमें उसे पदार्थहीनता की तरफ अग्रसर होना होता है जिसके लिए वह ब्रह्मचर्या का मार्ग बताते हैं, चूंकि वह समझाते हैं कि शरीर जिन पांच स्कन्धों से बना है उन पर नियंत्रित करके ही अपदार्थहीनता की तरफ जाया जा सकता है। यह बात तार्किक भी है क्योंकि सम्भोग पदार्थ उत्पन्न करने की एक प्रक्रिया है। वहीं ओशो अत्याधिक सम्भोग की तरफ अग्रसर करते हैं और कहते है कि इससे कामच्छन्द समाप्त होगा। परन्तु कामच्छन्द ओशो के कितने शिष्यों का समाप्त हो पाया यह एक बड़ा प्रश्न है। भगवान बुद्ध एक विलासिता का जीवन त्यागते हैं और कहते हैं कि अत्याधिक भोग से ही मनुष्य पदार्थ में लुप्त रहता है वहीं ओशो अत्याधिक भोगविलास्ता को यह कहते हुए अपनाते हैं कि इससे कामभोगों की तृप्ति होने के बाद अध्यात्मिकता की तरफ अग्रसर होते हैं। परन्तु ओशो खुद और उनके कितने शिष्य भोगविलास से तृप्त हो कर भगवान बुद्ध जैसे वन-वन और गाँव-गाँव में जा कर न्यूनतम साधनों पर जीवन निर्वाह करते हुए मानव को सही दिशा दिखाते हों या बौद्ध योगियों की तरह हिम्मालय पर साधना करते हों यह शायद ही देखने को मिला होगा। यदि आप मूल बौद्ध साहित्य (तिपिटक) पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक करके ले सकते हैं http://www.cfmedia.in/hindi-books/bauddh-sahitya/tipitak – निखिल सबलानिया

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