निर्विवाद रूप से ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है और आज भी है|डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प:इतिहास की जरुरत…एच0 एल0 दुसाध

डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प:इतिहास की जरुरत   … एच एल दुसाध

अगर लोगों से यह पूछा जाय कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या क्या है,बहुत कम लोगो का जवाब होगा-‘आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी’!किन्तु सचाई तो यही है कि हजारों साल से निर्विवाद रूप से ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है और आज भी है.इसी के कारण भूख,कुपोषण,गरीबी,वेश्या वृत्ति, विच्छिन्नतावाद,उग्रवाद जैसी दूसरी अन्य कई समस्यायों की सृष्टि होती रही है.यही वह सबसे बड़ी समस्या है,जिससे निजात दिलाने के लिए ई.पू.काल में भारत में गौतमबुद्ध,चीन में मो-ती,ईरान में मज्दक,तिब्बत में मुने-चुने पां;रेनेंसा उत्तरकाल में पश्चिम में होब्स-लॉक ,रूसो-वाल्टेयर,टॉमस स्पेंस,विलियम गाडविन ,सेंट साइमन ,फुरिये,प्रूधो,रॉबर्ट ओवन,लिंकन,मार्क्स,लेनिन तथा एशिया में माओत्से तुंग,हो चि मिन्ह,फुले,शाहूजी,पेरियार,आंबेडकर,लोहिया,जगदेव प्रसाद, कांशीराम इत्यादि जैसे ढेरों महामानवों का उदय तथा भूरि-भूरि साहित्य का सृजन हुआ एवं लाखों-करोड़ों लोगों ने अपना प्राण-बलिदान किया.इसके खात्मे को लेकर आज भी दुनिया के विभिन्न अंचलों में छोटा-बड़ा आन्दोलन/संघर्ष जारी है.

बहरहाल आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे को लेकर मानव जाति के इतिहास में जो विपुल चिंतन हुआ है उसका ठीक से अनुधावन करने पर यही दिखता है कि पूरी दुनिया में ही इसकी सृष्टि शक्ति के स्रोतों के विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे के कारण होती रही है.ध्यान देने की बात है कि सदियों से ही मानव समाज जाति,नस्ल,लिंग,भाषा,धर्म इत्यादि के आधार पर कुई समूहों में बंटा रहा है,सिर्फ अमीर-गरीब के दो भागों में नहीं जैसा कि मार्क्सवादी दावा करते हैं.जहां तक शक्ति का सवाल है ,सदियों से समाज में इसके तीन प्रमुख स्रोत रहे हैं-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक.शक्ति ये स्रोत जिस सामाजिक समूह के हाथों में जितना ही संकेंद्रित रहे,वह उतना ही शक्तिशाली,विपरीत इसके जो जितना ही इससे दूर रहा वह उतना ही दुर्बल व अशक्त रहा.सदियों से समतामूलक समाज निर्माण के लिए जारी संघर्ष और कुछ नहीं,शक्ति के स्रोतों में वंचितों को उनका प्राप्य दिलाना मात्र रहा है.

यह सही है कि हजारों साल से सारी दुनिया में शासक-वर्ग ही कानून बनाकर शक्ति का बंटवारा कराकर करता रहा है.पर,यदि हम यह जानने का प्रयास करें कि सारी दुनिया के शासकों ने अपनी स्वार्थपरता के तहत कौन सा ‘कॉमन उपाय’अख्तियार कर शक्ति का असमान वंटवारा कराया तो हमें विश्वमय एक विचित्र एकरूपता का दर्शन होगा.हम पाएंगे कि सभी ही शक्ति के स्रोतों में सामाजिक (social)और लैंगिक (gender)विविधता(diversity)का असमान प्रतिबिम्बन कराकर मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या की सृष्टि करते रहे.किन्तु आर्थिक और सामाजिक विषमता के पृष्ठ में सामाजिक और लैंगिक विविधता की क्रियाशीलता की सत्योपलब्धि आधुनिक मानवताबोध के उदय के साथ बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही जाकर पश्चिम के शासक कर पाए.इसकी सत्योपलाब्धि कर अमेरिका ,ब्रिटेन,फ़्रांस,आस्ट्रेलिया,न्यूज़ीलैंड इत्यादि जैसे लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों ने अपने-अपने देशों में शक्ति के सभी स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने की नीति पर काम करना शुरू किया.इसके परिणामस्वरूप उन देशों में महिलाओं,नस्लीय भेदभाव के शिकार अश्वेतों,अल्पसंख्यकों इत्यादि को सत्ता की सभी संस्थाओं,उद्योग-व्यापार,फिल्म-टीवी,शिक्षा के केन्द्रों इत्यादि में सहित शक्ति के तमाम स्रोतों में वाजिब भागीदारी मिलने लगी.ऐसा होने पर उन देशों में आर्थिक और सामाजिक विषमता से उपजी तमाम समस्यायों के खात्मे तथा लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई.

किन्तु विविधता सिद्धांत को सम्मान देनेवाले पश्चिम के देशों से लोकतंत्र का प्राइमरी पाठ पढने सहित कला-संस्कृति-फैशन-टेक्नॉलाजी-अर्थनीति इत्यादि सब कुछ उधार लेने वाले हमारे शासकों ने उनकी विविधता नीति से पूरी तरह परहेज किया.किन्तु उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि विदेशों की तरह विविधता नीति के अवलंबन की प्रत्याशा उनसे भी थी,ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है.इसका साक्ष्य ‘आजादी के बाद का भारत’ जैसा ग्रन्थ है जिसकी भूमिका में कहा गया है-‘1947 में देश अपने आर्थिक पिछड़ेपन ,भयंकर गरीबी ,करीब-करीब निरक्षरता,व्यापक तौर पर फैली महामारी,भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए अपनी लम्बी यात्रा की शुरुआत की थी.15 अगस्त पहला पड़ाव था,यह उपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था:शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था,स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था.भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना,राष्ट्रीय राजसत्ता को सामाजिक रूपांतरण के उपकरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था.यह महसूस किया जा रहा था कि भारतीय एकता को आंख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए.इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय,भाषाई,जातीय एवं धार्मिक विविधताएँ मौजूद हैं.भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न तबकों को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था.’

 

आज़ादी के बाद के भारत का उपरोक्त अंश को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे शासकों को इस बात का थोडा बहुत इल्म था कि राजसत्ता का इस्तेमाल विविधता के प्रतिबिम्बन के लिए करना है.यही कारण है उन्होंने किया मगर ,प्रतीकात्मक.जैसे हाल के वर्षों में हमने लोकतंत्र के मदिर में अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री,महिला राष्ट्रपति ,मुसलमान उप-राष्ट्रपति,दलित लोकसभा स्पीकर और आदिवासी डिप्टी स्पीकर के रूप में सामाजिक और लैंगिक विविधता का शानदार नमूना देखा.किन्तु यह नमूना सत्ता की सभी संस्थाओं, सप्लाई ,डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-टीवी, शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश,अध्यापन और पौरोहित्य इत्यादि शक्ति के प्रमुख स्रोतों में प्रस्तुत नहीं किया गया.चूँकि शक्ति के स्रोतों में भारत में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन प्रायः नहीं के बराबर हुआ इसलिए भारत जैसी आर्थिक और सामाजिक गैर-बरबी दुनिया में कहीं और नहीं है.विश्व में किसी भी देश परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन 15 प्रतिशत लोगों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है.ऐसी स्थिति एकमात्र दक्षिण अफ्रीका में थी,जहां 9-10 प्रतिशत गोरों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा.किन्तु दो दशकों से वहां मूलनिवासी कालों की सत्ता कायम रहने के कारण वहां भी यह गैर-बराबरी अतीत की बात होकर रह गयी है.भारत के शासकों द्वारा डाइवर्सिटी सिद्धांत से परहेज करने के कारण ही हम महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश और नेपाल जैसे पिछड़े राष्ट्रों से पीछे तथा सच्चर रिपोर्ट में मुसलमानों की बदहाली की तस्वीर देखकर सकते में हैं.इस कारण ही दलित-पिछड़े उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया और पौरोहित्य में दूरवीक्षण यंत्र से देखने की चीज बनकर रह गए हैं.इस कारण ही देश भूख,कुपोषण,गरीबी,उग्रवाद इत्यादि के मामले में विश्व चैम्पियन बन गया है.इससे राष्ट्र को उबारने के लिए विभिन्न संगठन अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं.पर, शायद वे आर्थिक सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के बुनियादी कारणों से नावाकिफ हैं इसलिए टुकड़ों-टुकड़ों में वंचितों को शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे हैं.अगर इस देश के समताकामी संगठन आर्थिक और सामाजिक विषमता जनित समस्यायों से पार पाना चाहते हैं तो उन्हें शासक दलों पर अमेरिका ,इंग्लैण्ड ,दक्षिण अफ्रीका इत्यादि की भांति शक्ति के समस्त स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक लागू करवाने में सर्वशक्ति लगानी होगी.

शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक –विविधता का प्रतिबिम्बन महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश और नेपाल जैसे पिछड़े राष्ट्रों से भी पिछड़े भारत को विश्व की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर देगा.तब सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली की तस्वीर खुशहाली में में बदल जाएगी .पौरोहित्य में डाइवर्सिटी ब्राह्मणशाही का खात्मा कर देगी.इससे इस क्षेत्र में ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी सौ की जगह महज तीन-चार पर सिमट जाएगी और शेष क्षत्रिय,वैश्य और शुद्रातिशुद्रों में बाँट जाएगी.तब किसी दस वर्ष के ब्राह्मण को कोई भू-देवता मानकर दंडवत नहीं करेगा.शक्ति के स्रोतों में डाइवर्सिटी दलित-आदिवासी और पिछड़ों को उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया इत्यादि तमाम क्षेत्रों में ही संख्यानुपात में भागीदारी दिलाकर उनके जीवन में क्या चमत्कार कर सकती है,इसकी कल्पना कोई भी कर सकता है.डाइवर्सिटी लागू होने पर परोक्ष लाभ यह भी होगा कि इससे दलित और महिला उत्पीडन में भारी कमी;लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण;विविधता में शत्रुता की जगह सच्ची एकता;विभिन्न जातियों में आरक्षण की होड़ व भ्रष्टाचार के खात्मे के साथ आर्थिक और सामाजिक विषमताजनित उन अन्य कई समस्यायों के खात्मे का मार्ग प्रशस्त होगा जिनसे हमारा राष्ट्र जूझ रहा है.अगर इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बहुजनों के लिए डाइवर्सिटी ही सर्वोत्तम विचार है तो वंचित वगों के सामाजिक संगठन नए वर्ष में ‘डाइवर्सिटी क्रांति’ का संकल्प लें.‘आम आदमी पार्टी’ की अप्रत्याशित उदय के बाद डाइवर्सिटी क्रांति की जरुरत समय की मांग बन गई है.

काबिले गौर है कि 25 नवम्बर,1949 भारतीय संविधान के जनक डॉ.आंबेडकर ने राष्ट्र को सतर्क करते हुए कहा था,’…हमें निकटतम समय के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा कर लेना होगा अन्यथा विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के मंदिर को विस्फोटित कर सकती है.’ किन्तु आजाद भारत के सवर्ण शासकों ने उनकी चेतावनी को कभी गंभीरता से लिया नहीं,और राहत और भीखनुमा घोषणाओं के सहारे लाचार बहुजनों को प्रलुब्ध कर सत्ता पर काबिज होते रहे.फलतःआज विश्व में सर्वाधिक गैर-बराबरी भारत में है.इस भीषण विषमता से बेपरवाह भाजपा और कांग्रेस जैसे दल एक बार फिर राहत और भीखनुमा घोषणाओं के सहारे अगली बार केंद्र की सत्ता हथियाने की जुगत भिड़ा रहे थे कि 8 दिसंबर,2013 को अचानक ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय हुआ.मीडिया और भूमंडलीकरण के दौर के नव-सृजित अवसरों का लाभ उठाकर ताकतवर बने सवर्ण युवाओं के समर्थन से पुष्ट ‘आप’सामाजिक न्यायवादी दलों को पृष्ठ में धकेलकर भाजपा और कांग्रेस के कतार में जा खड़ी हुई है.कांग्रेस-भाजपा बहुजनों का वोट पाने की लालच में कभी-कभार सामाजिक न्याय की बात कर भी लेती थीं.किन्तु ‘आम’ नेतृत्व की नज़र में आरक्षण लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है.लोकतंत्र को आरक्षण के खतरे बचाने के लिए वजूद में आई यह पार्टी लोकलुभावन सतही नारों और कामों के जरिये बड़ी तेज़ी से बहुजनो को भी आकर्षित करती जा रही है.भारतीय लोकतंत्र के दु:स्वप्न के रूप में उभर रही ‘आप’ को यदि रोकना है तो कुछ ऐसा उपक्रम चलाना होगा जिससे बहुजनों में मंडल के बाद अधिकार चेतना का एक नया उभार शुरू हो.चूँकि यह उभार पैदा करने में डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विचार नहीं है इसलिए डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प लेना हमारा ऐतिहासिक कर्तव्य बन जाता है.हां,अगर डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विकल्प हो तब तो इसे कूड़ेदान के हवाले कर देना चाहिए.

एच एल दुसाध

HL DUSHAD

 

दिनांक: 3 जनवरी,2014
डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प:इतिहास की जरुरत

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सावधान जातिवाद समर्थकों ने डॉ आंबेडकर द्वारा रचित भारत के संविधान का विरोध तेज़ कर दिया है| हर बार निशाने पर संविधान ही क्यों? अनीता भारती

ambedkar-samvidhan sadhye26 जनवरी की पूर्व संध्या पर प्रख्यात लेखिका और निष्ठावान अम्बेडकरी कार्यकर्ता अनीता भारती का यह आलेख अपने प्रदर्शन के बहाने संविधान का विरोध करने वालों के असली मंसूबों को उजागर कर हमारे संविधान के महत्व का बयान कर रहा है.

भारत का संविधान अपने आरंभिक स्वरुप से लेकर पूर्ण होकर बनने, बनने से लेकर लागू होने, और लागू होने से लेकर आज तक लोकतंत्र विरोधियों और कट्टरपंथी ताकतों के निशाने पर रहा है.संविधान को निशाने पर लेने के कई कारण है. पहला तो यह कि हमारा संविधान भारत के सभी लोगों को एक समान अधिकार और स्वतंत्रता प्रदान करता है फिर चाहे वे किसी भी जाति-धर्म-भाषा-रंग-रूप-लिंग से संबंध क्यों न रखते हो.
संविधान विरोध का दूसरा कारण है कि वह समाज के सभी वंचित तबकों के हितों के पालन और उनकी रक्षा की बात करता है.तीसरा बड़ा कारण यह है कि वह भारत के सार्वजनिक संसाधनों को निजी हाथों में जाने के विरुद्ध जनता के पक्ष में राष्ट्रीयकरण की बात करता है.चौथा कारण संविधान में भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)-आदिवासियों के आरक्षण का प्रावधान होना है.इन सब कारणों के चलते संविधान का बॉयकाट करने, बार-बार उसको संशोधन करने या या उसको पूर्ण रूप से बदल नवीन संविधान लागू करने की बातें करने वालों में आरक्षण विरोधी, अम्बेडकर विरोधी, भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)-वंचित-स्त्री विरोधी, मनुस्मृति समर्थक जातिवादी चेहरे शामिल है.जाहिर है कि इन तमाम कारणों के साथ संविधान को हटाने, संशोधन करने और देश के लिए नए संविधान की वकालत किये जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत के संविधान का डॉ.अम्बेडकर द्वारा लिखा गया है.संविधान विरोध की ये तमाम बातें कोई नई नहीं हैं, बल्कि ये बातें तब से होती रही हैं जबसे हमारा संविधान बना. लेकिन इसके साथ खुशी कि बात यह है कि देश का भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)-वंचित तबका आरम्भ से ही इन विरोधों और कुतर्कों का कठोरता से सफल जबाब देता रहा है.दरअसल संविधान विरोध का मुख्य कारण उसमें भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)-आदिवासियों के लिए सामाजिक आधार पर स्पष्ट रुप से आरक्षण का प्रावधान होना है.पिछले एक साल से भ्रष्ट्राचार के मुद्दे को लेकर बार-बार संविधान को टारगेट किया गया. परंतु इस बार हैरान करने वाली बात है कि अपने आपको ताल ठोंककर प्रगातिशील और वामपंथी होने का दावा ठोकने वाले ग्रुप ‘दामिनी बलात्कार केस’ की आड़ लेकर ये सब कर रहे हैं.
संविधान दिवस का बॉयकाट करने का फैसला क्या इन तथाकथितों के मन में भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)यों के प्रति सदियों से छिपी नफरत और द्वेष का नतीजा नही है?कितनी अजीब बात है कि एक तरफ यह लोग ‘दामिनी बलात्कार’ केस में अपराधियों के विरुद्ध कड़े से कड़ा न्याय भी संविधान के माध्यम से चाहते है और दूसरी तरफ उसका बॉयकाट भी करते है.यह किसी से छिपा नही है कि आजादी के बाद भारत के लिए निर्मित हो रहे संविधान में डा.अम्बेडकर जब ‘हिन्दू कोड बिल’ के माध्यम से भारतीय स्त्री को पुरुषों के समान अधिक से अधिक अधिकार और समानता देने के लिए अड़े हुए थे, उस समय भी कट्टरपंथी तबका हिन्दू कोड बिल और उनके खिलाफ संगठित रुप से लामबंद हो डॉ अम्बेडकर के विरोध में ज़हर उगल रहे थे. उस समय स्त्रियों को अधिकार ना मिलते देख और कट्टरपथिंयों के चौतरफा दबाब और तानाशाही पूर्ण विरोध देख वे बेहद निराश हो गए.पर इसके बावज़ूद भी वह स्त्रियों की स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों और सिद्धांतो पर अडिग रहते हुए इन धार्मिक कट्टरपंथी, जातिवादी और मनुवादियों का अकेले ही पूरी ताकत से मुकाबला करते रहे. इस बिल मे जायदाद, उत्तराधिकार, गोद लेना, भरण –पोषण, विवाह के माध्यम से लैंगिक समानता की मांग की गयी थी. पर ये समता की बातें कट्टरपंथियों को जरा भी रास नही आई.उस समय सरदार पटेल और राजेन्द्र प्रसाद खुलकर हिंदू कोड बिल के विरोध में सामने आ गए थे. इन नेताओं का मानना था कि ‘हिन्दू कोड बिल’ पास होने से हिन्दू समाज का मूल ढांचा ही ढह जाएगा. और तो और इस ढांचे को बचाने के लिए ‘ऑल इंडिया वीमेंन्स कांफ्रेंस’ तक ने हिन्दू कोड बिल का खुलकर विरोध किया था.अंततः इन प्रतिक्रियावादियों के कट्टर विरोध के चलते 1951 मे डॉ. अम्बेडकर ने संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के खिलाफ दुःख और रोष प्रकट करते हुए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.क्या आज हम कल्पना भी कर सकते है कि कोई स्त्रियों की हियायत में उतर कर अपना पद-प्रतिष्ठा सब दांव पर लगा दे?

भारतीय समाज में आज तक जो भी स्त्रियों के पक्ष में लड़ाई लड़ी गई थी या लड़ी जा रही है क्या वह डॉ अम्बेडकर के इतने बडे योगदान और त्याग के बिना संभव थी ?दुख और गुस्सा इस बात है कि हिन्दू कोड़ बिल से लेकर आज तक भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)यों और स्त्रियों के हक, सम्मान और अस्मिता पर लगातार हमले होते रहे है. जिसकी मूल जड़ धर्म में छिपी हुई है.इसी धर्म को नकारने और स्त्री की आजादी का बिगुल बजाने 25 दिसम्बर को अम्बेडकर द्वारा ‘मनुस्मृति दहन’ किया गया. डा. अम्बेडकर देश की तरक्की का मानदंड स्त्रियों की तरक्की से देखते थे। ऐसे में इन प्रगतिशीलों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या दामिनी के हक में खड़े होने के लिए उन्हें संविधान दिवस या देश की पहली शिक्षिका सावित्री बाई के अलावा और कोई दिन क्यों नही दिखता?भारत में बहुत से ऐसे त्यौहार व तथाकथित प्रतिष्ठित नायक हुए हैं जो स्त्री विरोधी रहे है. फिर क्यों नही इन त्यौहारों और इन नेताओं के जन्मदिन- मरणदिन को बायकॉट या विरोध करने के लिये इस्तेमाल किया गया?गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)यों में अपने अधिकारों के प्रति बढ़ी जागरूकता और उसके लिए संघर्ष करने की जिद्द से चरमपंथियों जिनमें तथाकथित प्रगतिशील-बुद्धिजीवी भी हैं की रातों की नींद उड़ी हुई है. वे पूरे मनोयोग से साम-दाम-दण्ड-भेद से इस जुनूनी जिद्द को दबाना चाहते हैं. इसका सबसे सरल और मारक तरीका है भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है) प्रतीकों, उनके नायकों उनके दिनों पर प्रहार या फिर कब्जा जमाकर करके उनके मनोबल को तोड़ने की कोशिश करना.यह अनायास ही नहीं कि रोज कहीं ना कहीं से अम्बेडकर की मूर्तियां तोड़ने की खबरें आती रहती है.

भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है) स्त्रियों के जगह-जगह अपमान और बलात्कार की घटनाएं इसकी साक्षी है, और इन अत्याचारों पर घोर चुप्पी लगा जाना इस बात की और भी अधिक पुष्टि करता है.6 दिसम्बर को जब पूरा देश अपने ‘नायक’ का परिनिर्वाण मनाता है, उस दिन सोची-समझी साजिश के तहत बाबरी मस्जिद गिराना भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)-मुस्लिम एकता और अस्मिता पर एक साथ प्रहार था.आरक्षण, भ्रष्टाचार अथवा बलात्कार या फिर किसी घोटाले की बात करने वाले लोग और उनका नेतृत्व सबसे पहले संविधान की धज्जियां उडाने से नहीं चूकता.आज अगर संविधान गलत हाथों में है और उसका दुरुपयोग हो रहा है तो इसमें संविधान बदलने,हटाने या बॉयकाट करने से हल नही निकलने वाला.अगर संविधान दिवस पर सोनी सोरी के यौनांगों में पत्थर डालने वाले अंकित गर्ग को भारतीय सरकार पुरस्कृत करती है तो यह सत्ता का चरित्र है, संविधान का चरित्र नहीं है. संविधान तो हमें सोनी सोरी के हक में कानूनी लड़ाई लड़ने का हक देता है.गौरतलब है कि बाबा साहेब ने संविधान सौपते हुए कहा था- ‘संविधान चाहे जितना भी अच्छा क्यों ना हो, यदि उसे लागू करने वालों की नियत अच्छी ना हो तो अच्छा संविधान भी बुरा बन जाता है’.इसलिए हमारी लड़ाई संविधान का आपहरण करने वालों के खिलाफ होनी चाहिए ना कि उस संविधान के जो भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)यों -वंचितों-शोषितो-स्त्रियों को समता-समानता-स्वतंत्रता देकर उनको उनके हकों दिलाने की हिमायत में खड़ा है.

अनीता भारती हिंदी की एक विख्यात शख्सियत हैं जिनकी कविताएं, कहानियाँ और आलेख मुख्यधारा की anita-bharti1पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. आपके संयुक्त संपादन में अभी हाल ही में एक कहानी संग्रह ‘यथास्थिति से टकराते हुए भारत के मूलनिवासी बहुजन (जिन्हें ब्राह्मणवादी मीडिया “दलित” नाम से सम्बोधित करता है)-स्त्री जीवन की कहानियाँ’ प्रकाशित हुई है.

http://www.neelkranti.com/2013/01/25/har-baar-nishane-par-samvidhan-hi-kyon/

 

 

नोट : जैसा की समयबुद्धा मिशन को पालिसी है की हम ब्राह्मणवादियों के दिए कलंक वाले नाम “दलित” लो ढोने  को गलत मानते हैं इसलिए अनीता भारती जी के मूल लेख से दलित शब्द को बहुजन और मूलनिवासी जैसे शब्दों से रेप्लस कर दिया गया है

 

सावधान मनुवादी, ब्राह्मणवादी, जातिवाद समर्थकों, पूंजीवादियों ने डॉ आंबेडकर द्वारा रचित भारत के संविधान का विरोध तेज़ कर दिया गया है| उदाहरण के लिए इस देश का नाम भारत है पर इसको हिन्दुस्तान बोल बोलकर दिन रात संविधान के खिलाफ काम हो रहा है

SAMAYBUDDHA MISHAN Calander 2014 and Frequently asked questions on BUDDHISM in English

sbmt calander 2014

F.A.Q. Buddhism

 

• What is Buddhism?

Buddhism is a religion to about 300 million people around the world. The word comes from ‘budhi’, ‘to awaken’. It has its origins about 2,500 years ago when Siddhartha Gotama, known as the Buddha, was himself awakened (enlightened) at the age of 35.

• Is Buddhism a Religion?

To many, Buddhism goes beyond religion and is more of a philosophy or ‘way of life’. It is a philosophy because philosophy ‘means love of wisdom’ and the Buddhist path can be summed up as:

(1) to lead a moral life,
(2) to be mindful and aware of thoughts and actions, and
(3) to develop wisdom and understanding.

• How Can Buddhism Help Me?

Buddhism explains a purpose to life, it explains apparent injustice and inequality around the world, and it provides a code of practice or way of life that leads to true happiness.

• Why is Buddhism Becoming Popular?

Buddhism is becoming popular in western countries for a number of reasons, The first good reason is Buddhism has answers to many of the problems in modern materialistic societies. It also includes (for those who are interested) a deep understanding of the human mind (and natural therapies) which prominent psychologists around the world are now discovering to be both very advanced and effective.

• Who Was the Buddha?

Siddhartha Gotama was born into a royal family in Lumbini, now located in Nepal, in 563 BC. At 29, he realised that wealth and luxury did not guarantee happiness, so he explored the different teachings religions and philosophies of the day, to find the key to human happiness. After six years of study and meditation he finally found ‘the middle path’ and was enlightened. After enlightenment, the Buddha spent the rest of his life teaching the principles of Buddhism — called the Dhamma, or Truth — until his death at the age of 80.

• Was the Buddha a God?

He was not, nor did he claim to be. He was a man who taught a path to enlightenment from his own experience.

• Do Buddhists Worship Idols?

Buddhists sometimes pay respect to images of the Buddha, not in worship, nor to ask for favours. A statue of the Buddha with hands rested gently in its lap and a compassionate smile reminds us to strive to develop peace and love within ourselves. Bowing to the statue is an expression of gratitude for the teaching.

• Why are so Many Buddhist Countries Poor?

One of the Buddhist teachings is that wealth does not guarantee happiness and also wealth is impermanent. The people of every country suffer whether rich or poor, but those who understand Buddhist teachings can find true happiness.

• Are There Different Types of Buddhism?

There are many different types of Buddhism, because the emphasis changes from country to country due to customs and culture. What does not vary is the essence of the teaching — the Dhamma or truth.

• Are Other Religions Wrong?

Buddhism is also a belief system which is tolerant of all other beliefs or religions. Buddhism agrees with the moral teachings of other religions but Buddhism goes further by providing a long term purpose within our existence, through wisdom and true understanding. Real Buddhism is very tolerant and not concerned with labels like ‘Christian’, ‘Moslem’, ‘Hindu’ or ‘Buddhist’; that is why there have never been any wars fought in the name of Buddhism. That is why Buddhists do not preach and try to convert, only explain if an explanation is sought.

• Is Buddhism Scientific?

Science is knowledge which can be made into a system, which depends upon seeing and testing facts and stating general natural laws. The core of Buddhism fit into this definition, because the Four Noble truths (see below) can be tested and proven by anyone in fact the Buddha himself asked his followers to test the teaching rather than accept his word as true. Buddhism depends more on understanding than faith.

• What did the Buddha Teach?

The Buddha taught many things, but the basic concepts in Buddhism can be summed up by the Four Noble Truths and the Noble Eightfold Path.

• What is the First Noble Truth?

The first truth is that life is suffering i.e., life includes pain, getting old, disease, and ultimately death. We also endure psychological suffering like loneliness frustration, fear, embarrassment, disappointment and anger. This is an irrefutable fact that cannot be denied. It is realistic rather than pessimistic because pessimism is expecting things to be bad. lnstead, Buddhism explains how suffering can be avoided and how we can be truly happy.

• What is the Second Noble Truth?

The second truth is that suffering is caused by craving and aversion. We will suffer if we expect other people to conform to our expectation, if we want others to like us, if we do not get something we want,etc. In other words, getting what you want does not guarantee happiness. Rather than constantly struggling to get what you want, try to modify your wanting. Wanting deprives us of contentment and happiness. A lifetime of wanting and craving and especially the craving to continue to exist, creates a powerful energy which causes the individual to be born. So craving leads to physical suffering because it causes us to be reborn.

• What is the Third Noble Truth?

The third truth is that suffering can be overcome and happiness can be attained; that true happiness and contentment are possible. lf we give up useless craving and learn to live each day at a time (not dwelling in the past or the imagined future) then we can become happy and free. We then have more time and energy to help others. This is Nirvana.

• What is the Fourth Noble Truth?

The fourth truth is that the Noble 8-fold Path is the path which leads to the end of suffering.

• What is the Noble 8-Fold Path?

In summary, the Noble 8-fold Path is being moral (through what we say, do and our livelihood), focussing the mind on being fully aware of our thoughts and actions, and developing wisdom by understanding the Four Noble Truths and by developing compassion for others.

• What are the 5 Precepts?

The moral code within Buddhism is the precepts, of which the main five are: not to take the life of anything living, not to take anything not freely given, to abstain from sexual misconduct and sensual overindulgence, to refrain from untrue speech, and to avoid intoxication, that is, losing mindfulness.

• What is Karma?

Karma is the law that every cause has an effect, i.e., our actions have results. This simple law explains a number of things: inequality in the world, why some are born handicapped and some gifted, why some live only a short life. Karma underlines the importance of all individuals being responsible for their past and present actions. How can we test the karmic effect of our actions? The answer is summed up by looking at (1) the intention behind the action, (2) effects of the action on oneself, and (3) the effects on others.

• What is Wisdom?

Buddhism teaches that wisdom should be developed with compassion. At one extreme, you could be a goodhearted fool and at the other extreme, you could attain knowledge without any emotion. Buddhism uses the middle path to develop both. The highest wisdom is seeing that in reality, all phenomena are incomplete, impermanent and do no constitute a fixed entity. True wisdom is not simply believing what we are told but instead experiencing and understanding truth and reality. Wisdom requires an open, objective, unbigoted mind. The Buddhist path requires courage, patience, flexibility and intelligence.

• What is Compassion?

Compassion includes qualities of sharing, readiness to give comfort, sympathy, concern, caring. In Buddhism, we can really understand others, when we can really understand ourselves, through wisdom.

• How do I Become a Buddhist?

Buddhist teachings can be understood and tested by anyone. Buddhism teaches that the solutions to our problems are within ourselves not outside. The Buddha asked all his followers not to take his word as true, but rather to test the teachings for themselves. ln this way, each person decides for themselves and takes responsibility for their own actions and understanding. This makes Buddhism less of a fixed package of beliefs which is to be accepted in its entirety, and more of a teaching which each person learns and uses in their own way.

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The Basics of Buddhism

Between 563 BCE and 483 BCE there lived in the southern regions of modern day Nepal, a man named Siddhartha Gautama who had been born a prince of the Sakya clan but who, at the age of thirty-five, after meditating an…d attaining a state called “Enlightenment,” began teaching a completely new doctrine in India. That doctrine has since come to be known as Buddhism. At the end of his life, the “Buddha,” as his followers have ever since referred to him, said that he had spent the previous forty-five years teaching only two things: suffering, and its cessation. Indeed, his emphasis upon the suffering inherent in samsara (literally, the realm of “continual going”) has caused many over the centuries to view the tradition as pessimistic. In reality, the Buddha preached a doctrine which demands an in depth analysis of suffering and its causes as a means of bringing about suffering’s end and, therefore, of ushering in a new and lasting peace, tranquility and insightfulness.

The most succinct formulation of the Buddha’s doctrine was provided in the very first sermon that he delivered. That “First Sermon” set forth the Four Noble Truths of Buddhism, namely:

1. There is suffering (duhkha).buddhist population
2. There is a cause of suffering (duhkha-samudaya).
3. There is the cessation of suffering (duhkha-nirodha); and
4. There is a path leading to the cessation of suffering (duhkha-nirodha-marga).

According to the first Noble Truth, suffering is defined as follows: “Birth is suffering; aging is suffering; sickness is suffering; death is suffering; sorrow and lamentation, pain grief and despair are suffering; association with the unpleasant is suffering; dissociation from the pleasant is suffering; not to get what one wants is suffering.” However, there is the further injunction to understand what is meant by the term duhkha in all its connotations. With regard to this, Buddhist texts further delineate “three types/levels of duhkha,” namely: suffering ‘plain and simple,’ that encompasses every kind of physical and mental pain, distress or uneasiness; the ‘suffering produced by change,’ especially that suffering brought on by the sudden shift of a happy state changing into an unhappy one; and the suffering which is ‘inherent in samsara,’ that is that type which occurs because of the very nature of all existents within samsara, namely their being ultimately impermanent, painful, and empty of independent existence.

The Second Noble Truth declares that the most palpable cause of our suffering is desire and thirst of various sorts, all of which are doomed to be unsatisfactory since they falsely ascribe permanence to what is, in reality, impermanent. However, the root cause of both desire and hatred is the ignorance which posits a false idea about the self’s permanence. Thinking, mistakenly, that the self, soul, or ego exists permanently causes us to desire certain things while it generates aversion towards others. Only by extinguishing this false and illusory idea about the nature of our selves, as well as about the nature of things, can a lasting liberation from suffering be achieved. A state of such liberation is called, in the Third Noble Truth, Nirvana. The notion of Nirvana has been grossly misunderstood over the centuries as being a state akin to complete extinction or annihilation. According to Buddhism, however, Nirvana is not viewed as an extinction of the self; rather, it is only the extinction of the false idea about the self. A more contemporary expression for this might be, “Nothing is lost except what’s false.” Buddhism never denies the existence of a “relative, impermanent and dependent self.” It denies only the erroneous view that the self exists as an inherently and independently existent entity.

The Fourth Noble Truth tells us that there is a Path that leads to the cessation of suffering. Once we have determined that samsara is unsatisfactory, we should enter upon the path and, traversing it, through undertaking various methods of meditation and practice, attain the enlightenment of the Buddha. The multifacetness of Buddhist traditions throughout Asia and over its 2600 year history derives from the great variety of meditative techniques and methods offered under the rubric of the “Path.”

As early as the days of the great Indian King Asoka (269-232 BCE), Buddhist traditions began to migrate out of India and to spread into the regions of South and Southeast Asia. Hinayana, or less derogatorily, Theravadin Buddhism spread south to Sri Lanka, and north and east to Burma, Thailand, Laos and Cambodia. By the fourth to the eighth centuries CE, Mahayana Buddhism had reached as far as Tibet, China, Korea and Japan.

According to recent world census data, there are about 305 million Buddhists worldwide, most of them living in Asia. However, one finds nearly 1 million (some recent sources make this number 4-5 million) Western-born Buddhists also, who live and practice in Europe and the United States.

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बुद्ध के पाँच उपदेश हैं…Dr Prabhat Tandon

बहुत से लोग बुद्ध धम्म को दुखवादी (pessimistic ) समझते हैं लेकिन अगर हम भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान किये गये पंचशील सिद्दांत को गौर से देखें तो यह जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं । यह पंचशील सिद्दांत क्या गलत है या क्या सही है की परिभाषा तय नही करते बल्कि यह हमे सिखाते हैं कि अगर हम होश रखें और जीवन को गौर से देखें तो हमारे कुछ कर्म हमको या दूसरों को दु:ख पहुंचाते हैं और कुछ हमे प्रसन्नता का अनुभव भी कराते हैं ।

बुद्ध के पाँच उपदेश हैं :

प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना ।
चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने से विरत रहना ।
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना ।
असत्य बोलने से विरत रहना ।
मादक पदार्थॊं से विरत रहना ।

बुद्ध के यह पाँच उपदेशों को हम व्यवाहार के “प्रशिक्षण के नियम” के रुप मे समझे न कि किसी आज्ञा के रुप मे । यह ऐसा अभ्यास है जिसका विकास करके ध्यान, ज्ञान, और दया को पा सकते हैं ।
हम इन पाँच उपदेशों को कैसे समझते है यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । जैसे कुछ लोग चीटीं को मार नही सकते लेकिन माँस खाते हैं या फ़िर कुछ सिर्फ़ शाकाहारी ही होते हैं । कुछ मदिरा को हाथ भी नही लगाते और कुछ दिन मे सिर्फ़ एक आध पैग लगाते हैं क्योकि इससे उनको लगता है कि इससे उनको सूकून मिलता है या कुछ हमेशा नशे मे धुत रहते हैं । यह पाँच उपदेश यह नही सिखाते कि क्या सही है बल्कि अगर हम ईमानदारी से तय करे कि हमारे लिये क्या मददगार है और क्या हानिकारक ।
इसी तरह अगर हमे दूसरों की आलोचना करने की गहरी आदत है तो हम चौथे उपदेश को अभ्यास के लिये चुन सकते हैं । और अगर हमे टी.वी. या इन्टर्नेट का नशा सा है तो हम पाँचवे नियम को भी चुन सकते हैं । बुद्ध ने जब यह पाँच उपदेश दिये थे तन उनका तात्पर्य मादक तत्वों से ही रहा होगा लेकिन वक्त के साथ मनोरंजन की गतिविधिया भी असंख्य हो गयी ।हँ , अगर हमसे कोइ सिद्दांत टूट भी जते है तब इस बात का अवशय ख्याल रखें कि हम अपराध बोध और पछतावे मे अन्तर अवशय रखें ।

इन उपदेशॊ का प्रयोजन हमे प्रसन्न रखना है और दुख से दूर रखना है । अगर हमारी वजह से किसी को चोट पहुची हो तो हमे दुख भी होता है और स्वाभाविक रूप से पश्चाताप भी । हम इस बात का ध्यान रखे और इससे सबक लें । पछ्तावे के यह क्षण बिना किसी अवशिष्ट भावनाओं को छोड़कर चले जाते हैं । लेकिन कभी –२ पछतावा और प्रायशिचित आत्म घृणा और दुख का कारण बनाता है । तब हम इस बात का ध्यान रखें और आत्म घृणा और अपराध बोध की बेकार की आदत से बचें क्योंकि यह भी आदत स्व दुख पहुँचाने की आदत सी है ।

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं का दर्शन है। सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है। पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं—‘अप्प दीपो भव!’ अपना दीपक आप बनो। ..श्री. ओम प्रकाश कश्यप

success-in-sight-cycleबुद्ध स्वयं राजकुमार थे। उनके समकालीन महावीर स्वामी भी राजकुमार ही थे। दोनों ने ही राजनीतिक सुख-सुविधाओं को ठुकराकर अध्यात्म-चिंतन का मार्ग चुना था। राजघराना छोड़कर उन्होंने चीवर धारण किया था। इसलिए बाकी वर्गों में विशेषकर उन लोगों में जो ब्राह्मणों और उनके कर्मकांडों से दूर रहना चाहते थे, जैन और बौद्धधर्म की खासी पैठ बनती चली गई। मगर सामाजिक स्थितियां बौद्ध धर्म के पक्ष में थीं। इसलिए कि एक तो वह व्यावहारिक था। दूसरे जैन दर्शन में अहिंसा आदि पर इतना जोर दिया गया था कि जनसाधारण का उसके अनुरूप अपने जीवन को ढाल पाना बहुत कठिन था। यज्ञों एवं कर्मकांडों के प्रति जनसामान्य की आस्था घटने से उनकी संख्या में गिरावट आई थी। उनमें खर्च होने वाला धर्म विकास कार्यों में लगने लगा था। पहले प्रतिवर्ष हजारों पशु यज्ञों में बलि कर दिए जाते थे। तथागत बुद्ध द्वारा अहिंसा पर जोर दिए जाने से पशुबलि की कुप्रथा कमजोर पड़ी थी। उनसे बचा पशुधन कृषि एवं व्यापार में खपने लगा। शुद्धतावादी मानसिकता के चलते ब्राह्मण समुद्र पार की यात्रा को निषिद्ध और धर्म-विरुद्ध मानते थे। बौद्ध धर्म में ऐसा कोई बंधन न था। इसलिए अंतरराज्यीय व्यापार में तेजी आई थी। चूंकि अधिकांश राजाओं द्वारा अपनाए जाने से बौद्ध धर्म राजधर्म बन चुका था, इसलिए युद्धों में कमी आई थी, जो राजीनितिक स्थिरता बढ़ने का प्रमाण थी। व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित हो चली थीं। जिससे व्यापार में जोरदार उछाल आया था।

ये सभी स्थितियां जनसामान्य के लिए भले ही आह्लादकारी हों, मगर ब्राह्मण-धर्म के समर्थकों के लिए अत्यंत अप्रिय और हितों के प्रतिकूल थीं। इसलिए उसका छटपटाना स्वाभाविक ही था। अतएव तथागत बुद्ध को लेकर वे ओछे व्यवहार पर उतर आए थे। बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रियों में गिनी जाती थी। ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहकर लांछित किया, जिसको बुद्ध इन बातों से अप्रभावित बने रहे। दर्शन को जनसाधारण की भावनाओं का प्रतिनिधि बनाते हुए उन्होंने दुःख की सत्ता को स्वीकार किया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुःख निवृत्ति संभव है। उसका एक निर्धारित मार्ग है। दुःख स्थायी और ताकतवर नहीं है। बल्कि उसको भी परास्त किया जा सकता है।

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं का दर्शन है। सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है। पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं—‘अप्प दीपो भव!’ अपना दीपक आप बनो। तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता नहीं हैं। किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो। समस्याओं से निदान का रास्ता मुश्किलों से हल का रास्ता तुम्हारे पास है। सोचो, सोचो और खोज निकालो! इसके लिए मेरे विचार भी यदि तुम्हारे विवेक के आड़े आते हैं, तो उन्हें छोड़ दो। सिर्फ अपने विवेक की सुनो। करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे। उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दुनिया को दिया। उसके द्वारा मर्यादित जीवन जीने की सीख दुनिया को दी। कहा कि सिर्फ उतना संजोकर रखो जिसकी तुम्हें जरूरत है। तृष्णा का नकार…हिंसा छोड़, जीवमात्र से प्यार करो। प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हें है। इसलिए अहिंसक बनो। झूठ भी हिंसा है। इसलिए कि वह सत्य का दमन करती है। झूठ मत बोलो। सिर्फ अपने श्रम पर भरोसा रखो। उसी वस्तु को अपना समझो जिसको तुमने न्यायपूर्ण ढंग से अर्जित किया है। पांचवा शील था, मद्यपान का निषेध। बुद्ध समझते थे वैदिक धर्म के पतन के कारण को, उन कारणों को जिनके कारण वह दलदल में धंसता चला गया। दूसरों को संयम, नियम का उपदेश देनेवाले वैदिक ऋषि खुद पर संयम नहीं रख पा रहे थे। अपने आत्मनियंत्रण को खोते हुए उन्होंने खुद ही नियमों को तोड़ा। मांस खाने का मन हुआ तो यज्ञों के जरिये बलि का विधान किया। कहा कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ और अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए पशुओं की बलि देते चले गए। नशे की इच्छा हुई तो सोम को देवताओं का प्रसाद कह डाला और गले में गटागट मदिरा उंडेलने लगे। ऐसे में धर्म भला कहां टिकता। कैसे टिकता!

श्री. ओम प्रकाश कश्यप…

16-jan-2014 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-” ध्यान रहे हर बात का समय होता है जब आप शक्तिशाली हो तब आपको अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा काम आएगी पर जब विपत्ति का समय हो तब केवल क्षमता बढ़ाना और अपने विरोधियों के खिलाफ संगर्ष करने से कल्याण होगा|”

tisharan sheel

क्या दो साल का बच्चा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य,शांति- षड्यंत्र आदि चीज़ों को समझता है? नहीं न, नहीं समझता है |अब एक प्रयोग करते हैं दो साल के बीस तीस बच्चों को एक कमरे में बिठा दो सभी को एक जैसे खिलौने जैसे गुड्डा दे दो| अब सब एक सामान हैं सबके पास एक जैसे गुड्डा है, होने ये चाहिए कि सब अपने अपने गुड्डे से संतुस्ट रहने चाहिए और शांति बनी रहनी चाहिए| पर ऐसा नहीं होता थोड़ी देर में आप देखोगे कि उनमे से कुछ बच्चे ऐसे हैं जो अपना गुड्डा दबेंगी अपनी बगल में और दूसरों का छीनने में लग जायेंगे| इसी छीना झपटी में कुछ खली हाथ रोते मिलेंगे और कुछ के पास कई गुड्डे होंगे, ऐसे में आपको न्यायकर्ता का रोल अदा करते हुए दबंग बच्चे से गुड्डा छीन कर रोते हुए बच्चे को देकर उसे चुप करना होगा| आप ऐसा कैसे कर पाएंगे? आप ऐसा तभी कर पाएंगे जब आप उन बच्चों से बड़े , शक्तिशाली और समझदार होगे| अगर आप भी उन्हीं में से एक बच्चे होगे तो आपको न्याय व्यस्था कायम करने में काफी दिक्कत होगी, बिना शक्ति और अन्य बच्चों के समर्थन के आप कर ही नहीं पाओगे|

यही बड़ों का भी संसार है बस वहाँ गुड्डे कि जगह धन,धरती और शक्ति के लिए छीना झपटी है| इसी संसार में सबके लिए इंतज़ाम है पर कुछ लालची खुदगर्ज़ दबंग लोग न खुद चैन से बैठते हैं और न ही बाकि कि जनता कि चैन से बैठने देते हैं| अब ऐसे में शांति बनाये रखने के लिए न्याय व्यस्था चाहिए जो दबंगों पर अंकुश रखे और मजलूमों को उनका हक़ और न्याय दिलाये| आज संसार में बौद्ध धम्म शांति फ़ैलाने वाला धम्म के रूप में विख्यात है|

अब सवाल उठता है कि शांति कैसे स्थापित होती है? शांति न्याय द्वारा स्थापित होती है,दो लोग या दो समूह लड़ाई कर रहे हैं ऐसे में शांति स्थापित करने के केवल दो ही विकल्प होते हैं:

– एक तो दोनों में से एक जुल्म सह ले और दुसरे को अपने पर हावी होने दो तो शांति हो जायेगी जो कि भारतीये बहुजन कर रहे हैं और विरोधी मीडिया बौद्ध धम्म के नाम पर उनकी मानसिकता इसी प्रकार कि बना रहा है|
– दूसरा दोनों में आपस में युद्ध होने दो और जो जीते वो हारने वाले पर हावी हो जाए जो धम्मविरोधी या बहुजन विरोधी कर रहे हैं|

इन दोनों के अलावा तीसरा विकल्प है कि दोनों एक दुसरे को प्रेम करें और इस दुनियां में उपलब्ध संसाधनों को मिल बाँट कर सुखी रहें,यही तो है बुद्ध कि शिक्षा का सार| बौद्धों का भारत में सदियों की दुर्दशा का इतिहास बताता है कि बुद्ध की शिक्षाओं  सिर्फ कहने सुनने में अच्छी बात है किताबी बात है पर जमीनी सच्चाई इससे उलट है यहाँ विजेता तय करता है की न्याय की परिभाषा क्या होगी|

पहले विकल्प में जो जुल्म सहने को तैयार है उसे हर हाल में खाली हाथ जीना मरना है तो ऐसी शांति में ये निश्चित है कि एक व्यक्ति या एक बहुत बढ़ी जनसँख्या जुल्म कि शिकार रहेगी| क्या ये शांति वाकई में शांति है?क्या भारत के बहुजनों को यही शांति चाहिए? क्या बौद्ध धम्म यही शांति सिखाता है?

दूसरी विकल्प में अगर जीतने वाला हारने वाले पर जुल्म न कर के उसे बराबरी का और न्याय का हक़ दे| पर ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता जीतने वाला हारने वाले को अपना गुलाम समझता है| विजेता अगर बहुत ज्यादा अच्छा हुआ तो भी अपने से एक दर्जा कम ही रखता है|

कुछ ऐसी ही बौद्ध धम्म के शशक कि मानसिकता होती होगी और इसी कारन जब बौद्ध सत्ता अपनी चरम पर थी तब विरोधियों को भी हक़ दिए गए पर उन हकों के माध्यम से विरोधियों ने अपने को मजबूत और बौद्ध सत्ता को कमजोर किया परिणाम स्वरुप बौद्धों कि हार हुई और अबौद्ध जीत गए |अब बारी अबोधों कि थी कि वो हारे हुए बौद्धों को न्याय और हक़ दें पर उन्होंने ऐसा नहीं किया उल्टा उन्होंने मनुस्मृति जैसे कड़े अमानवीय कानून बनाये कि सदियों से आज तक भी भारत के बहुजन अपमानित मौत मारे जा रहे हैं|यहाँ तक कि आज वो भूल गए हैं कि वो बौद्ध हैं और उनकी पूजा कर रहे हैं जो उनके पूर्वजों के हत्यारे हैं|भारत के मनुवादियों कि दयाशून्यता इतिहास चीख चीख कर बता रहा है और ऐसे में क्या शांति मिल सकती है बहुजनों को?

तो दोनों विकल्पों में हमने देखा कि ऐसी शांति बेमानी है दोनों ही विकल्पों में जनता का एक वर्ग अन्याय का शिकार रहेगा ही रहेगा| इसीलिए बाबा साहब आंबेडकर ने भारत को एक ऐसा संविधान दिया जिसने शक्ति तीसरे विकल्प अर्थात शक्ति के विकेंद्रीकरन को जमीन पर स्तापित किया| भारत में अनेकों असमानताएं हैं जैसे भाषा, कद काठी, विचारधारा,जमीनी असमानताएं, ऐसे में भारत के संविधान ने अगर पिछले पैसठ वर्षों से भारत को एक झंडे ने नीचे बनाये रखा है तो क्या ये बहुत ज्यादा बड़ी बात नहीं है |क्या बाबा साहब आंबेडकर वाकई सम्मान के काबिल नहीं हैं पर विरोधियों द्वारा फैलाई जातिगत घृणा के कारण लोग समझते हुए भी अम्बेकडर का नाम नहीं लेना चाहते| अगर कहीं कोई नाम ले भी रहा है तो वो इसलिए क्योंकि आंबेडकर नाम अब एक झंडा बन गए गई जीसके नीचे बहुत बड़ी जनसँख्या खड़ी है और वो उसको वोट दे सकती है|

तीसरा विकल्प सत्ता का विकंदीकरण बौद्धों द्वारा खोजा गया गणराज्य सिद्धांत का आधुनिकरण ही है| साड़ी दुनिया जब असभ्य थी तब भी भारत में बौद्धों द्वारा गणराज्य सिद्धांत द्वारा सुशाशन दिया जाता था| गणराज्य वो व्यस्था होती है जिसमें सत्ता और सरकार जनता कि जनता द्वारा जनता के लिए चुनी जाती है|आज भारत में कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति अपनी हटधर्मी नहीं चला सकता है उसे संविधान के हिसाब से चलना होगा अगर कोई ज्यादा अन्यायी हो जाता है तो गणतंत्र के अन्य स्थम्भ जैसे कोर्ट कचेरी, मीडिया,जनता का मताधिकार अदि उसपर अंकुश रखेंगे| हाँ ये बात और है कि सेना विद्रोह कर के सत्ता अपने हाथों में ले ले तो कोई नहीं बचा पायेगा| पर इसमें भी सत्ता का विकेंद्रीकरण है सेना में अनेकों विचारधारा के लोग हैं जो कभी एक विचारधारा में एक सुर नहीं होगी| अगर एक बटालियन विद्रोह करती है तो दूसरी बटालियन उसके मुकाबले में खड़ी है| अब तो जाती पर आधारित बटालियनों में भी जाइए जाट रेजिमेंट महार रेजिमेंट सिख रेजिमेंट में भी सिर्फ एक ही जातिगत मानसिकता के लोगों को नहीं रखा जाता बल्कि मिक्स हैं | ऐसे में विद्रोह करने के लिए एकता नहीं हो पाती हालाँकि धम्म विरोधियों का अपने धर्म के नाम पर सेना के ब्रेनवाश पर काम जरी है जिसके महाभयंकर परिणाम आप समझ सकते हो|सबसे शक्तिशाली है सरकार उससे भी शक्तिशाली है संविधान पर इस सबसे शक्तिशाली है सेना और सेना से भी ज्यादा क्या शक्तिशाली है – धर्म | धर्म क्या है ?धर्म जनता के मन वचन और कर्मों को नियंत्रित करना वाला सबसे शक्तिशाली औज़ार होता है|शायद अब आप समझ गए होंगे कि क्यों सेना में धर्म पढ़ाने वालों को भर्ती किया जाता है|

धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं|यही कारण है कि धर्म एक इतना बड़ा मुद्दा है जिसपर सत्ताधारी कोई समझौता नहीं करता|यही कारण है कि सारे संसार में धर्म के नाम पर सबसे बड़े और भीषण नरसंघार और युद्ध होते हैं| इस सब नरसंहारों से ईश्वर का कोई लेना देना नहीं , धर्म का कोई लेना देना नहीं| ये सब सत्ता जी जंग है ये सब धन धरती और शक्ति को पाने कि जंग है| धर्म और ईश्वर लालची भेड़ियों की भेड़ की वो खाल है जिसे वो जनता के सामने आने से पहले पहन लेते हैं|अब आप समझ सकते हो की क्यों राजनीती धर्म को सरक्षण देती है और क्यों पुरोहित वर्ग और रजा दोनों मिलकर शाशन चलाते हैं|

अब आप समझ रहे होगे कि शक्ति से ही शांति स्थापित होती है, अब आप समझ सकते हो की संयुक्त रास्ट्र कैसे दुनिया में शती स्थापित करता है | क्या केवल शब्दों से, धर्म से, भिक्खुओं से शांति स्तापित होती हैं? नहीं? संयुक्त रास्ट्र सेना या शक्ति द्वारा शांति स्थापित करवाता है|आज अगर बौद्ध धम्म सारे संसार में शांति फ़ैलाने वाला धम्म है तो इसका मतलब ये नहीं की खुद पीटकर मरकर शांति फैलाओ इसका मतलब ये है की खुद को इतना बुलंद करो की सब आपसे डर कर शांति बनाये रखें| आप इतने ऊपर पहुच जाओ की आप को युद्ध की जरूरत ही न पड़े और तब बौद्ध धम्म की शांति का सन्देश आपने काम है| बौद्ध धम्म का शांति का सन्देश शक्तिशाली राजाओं के लिए हैं उनको न्यायप्रिय बनाने के लिए हैं| गरीब और कमजोर के लिए बौद्ध धम्म की शांति की शिक्षा किस काम की वो तो वैसे ही दब्बू है शांति के अलववा उसके पास और कुछ नहीं उसको शांति की क्या जरूरत|आप बताईये कि की कोई कमजोर किसी दबंग को कह सकता है कि शांति बनाये रखो?

भारत के बहुजनों का धर्म सदियों से बौद्ध धम्म रहा है पर इतिहास में सत्ता के संगर्ष के दौरान बौद्ध धम्म नीति हार गई और बहुजन अपनी सुरक्षा के लिए ईसाइयत और इस्लाम की तरफ चले गए, जो नहीं गए वही आज के दलित हैं| आज हमने बौद्ध धम्म के उसी हार वाले स्वरुप को अपना लिए तो फिर से हार निश्चित है| आज बौद्ध धम्म के नाम पर अगर आपको मानसिक रूप से जुल्म सहने को तैयार किया जा रहा है तो समझ लो बौद्ध धम्म का गलत मतलब समझ रहे हो आप| आज केवल बुद्धा से भला नहीं होगा आजा समयबुद्धा से भला होगा अर्थात बुद्ध कि बात तो माननी ही है पर समय कि मांग को पहचानना है जो समय के साथ नहीं बदलता समय उसको बदल देता है| आप धम्म से वही चुनों, जिस तरह युद्ध हर वक्त के लिए सामान उपयोगी नहीं उसी तरह शांति भी हर वक्त के लिए समः उपयोगी नहीं है| अगर सुरक्षा चाहते हो तो धम्म में बहुजन सुरक्षा नीति को बदलना और विकसित करना ही होगा|सब जानते हैं की धम्म सबसे बेहतर है पर यहाँ सुरक्षा न होने के कारण बहुजन चाहकर भी अपना नहीं पा रहे|धर्म वाही फलता फूलता है जिसे राजनेतिक सरक्षण प्राप्त होता है और राजनीती वही फलती फूलती है जिसे धर्म अर्थात जनता का समर्थन मिलता है| हे बहुजनों ध्यान रहना बौद्ध धम्म केवल डॉ आंबेडकर द्वारा केवल गौतम बुद्ध की तस्वीर टांगने को नहीं चुना गया है बल्कि इसके द्वारा अपनी क्षमताएं बढ़ाने को और फिर संगर्ष करने को चुना गया है|

फेसबुक पर बलात्कार कर के मार दी गई दलित लड़कियों की फ़ोटो डालकर लोग मीडिया और सरकार की शिकायत करते रहते हैं | बौद्ध धम्म के नाम पर जो लोग अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा देते फिरते हैं मैं उनसे पूछता हूँ कि अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा द्वारा क्या ये दलित लड़कीया और इनकी कौम अपनी इस दुर्दशा से कैसे बच सकते हैं | अगर नहीं तो फिर अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा का इसको और इसकी कौम को क्या फायदा| ध्यान रहे हर बात का समय होता है जब आप शक्तिशाली हो तब आपको अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा काम आएगी पर जब विपत्ति का समय हो तब केवल क्षमता बढ़ाना और अपने दुश्मनों के खिलाफ संगर्ष करने से कल्याण होगा| ये संगर्ष कुछ भी हो सकता है राजनीति ,धार्मिक, नीति, विज्ञानं या युद्ध भी| ध्यान रहे अगर शांति से जीना चाहते हो तो अपनी क्षमता बढ़ाओ और हर प्रकार के संघर्ष के लिए तैयार रहो| ध्यान रहे अगर आप अपनी कौम के लिए क़ुरबानी नहीं दोगे तो ऐसे ही क़ुरबानी ले ली जायेगी अब ये आपके हाथों में है की आप खुद क़ुरबानी देते हो या दुश्मन को अपनी क़ुरबानी लेने देते हो|मैं हमेशा बौद्ध धम्म को बढ़ाने को प्रयासरत रहता हूँ पर मैंने समय के हिसाब से बुद्धा की शिक्षाओं को मानने की देशना की है| समय की नब्ज पहचानो हर नियम हर बात हर समय एक सी लागू नहीं होती, आज का समय अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा से भी ज्यादा अपनी और अपनी कौम की क्षमता बढ़ाने का है|

हम अक्सर वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत सुनते हैं -प्राकृतिक चुनाव(natural selection) और सर्वोचित या शक्तिसंपन्न ही अपने अस्तित्व को बचा पता है (Fittest survives)|अगर आपके पास ताकत या हिंसा करने की क्षमता नहीं हैं तो आपको हर कदम पर झुकना पड़ेगा| इससे कोई खास फर्क नहीं नहीं पड़ता कि आप कितने धनि, ज्ञानी, शरीफ, सच्चे और न्याय प्रिये हो|शोषित राजनीती क्षमता के बिना केवल जुल्मों की शिकायत करते रह जाते हैं हल नहीं मिलता|ये जिन्दगी का अटल नियम है की अगर शांति चाहिए तो जंग के लिए तयार रहो | दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं एक शाशक और एक शोषित,अगर शाशक बनना है तो नीति,शिक्षा,संगठन और संगर्ष से क्षमता बढ़ाने में लगे रहो कभी न कभी आपका मौका आएगा।अगर निति और राजनेतिक शक्ति की क्षमता का महत्व नहीं समझ सकते तो शोषित बने रहने को मजबूर होना पड़ेगा, चाहे कुछ भी कर लो।आपके विरोधी राजनीतिज्ञ मंच पर खड़े होकर सार्वजानिक रूप से आपको तलवार और गदा जैसे हथियार दिखाते हैं, क्या आप इसका मतलब नहीं समझते?वो शक्ति शक्तिशाली हैं इसलिए वो ऑफेन्सिव खेलते हैं और हम डिफेंसिव पर ध्यान रहे बेवजह हिंसा करना गलत है पर हिंसा करने की क्षमता होना गलत नहीं जैसे जंगल का शेर और जंगल का हाथी|

“बौद्ध संस्कृति में हम ‘हाथी’ को कई प्रकार के राजनेतिक एव धार्मिक चिन्ह के रूप में प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि हमारी हिंसा जंगल में हाथी की हिंसा के सामान है|जिस तरह हाथी मासाहारी जानवरों की तरह पहल करके हिंसा नहीं करता पर जब उसे छेड़ा जाए तो वो इतना हिंसात्मक हो जाता है की सब तहस नहस कर डालता है| उसी तरह भारत का बहुजन या बौद्ध भी है पहल करके बिना वजह हिंसा नहीं करता|हाथी की हिंसा में ध्यान देने वाली बात ये है की उसको हिंसा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि उसकी ताकत का सबको अंदाजा होता है,ये बात हिरन पर लागू नहीं हो सकती|इसीलिए किसी ने सही कहा है की अगर शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तयार रहो|”

भगवान् बुद्ध ने कहा है कि तर्क एवं तथ्य पर जो बात सत्य लगे उसे ही अपनाओ, ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा कहने वाले एवं आडम्बर और ढोंग पर आधारित व्यवस्था को मत मानो, और मनुष्य को किसी बात को केवल इसलिए नहीं मानना चाहिए कि बहुत से लोग उसे मानते है या परम्परा से चली आई है या धर्म-ग्रंथों में लिखी हुई है या न्यायशास्त्र के अनुसार है या तर्कशास्त्र के अनुसार है या वह ऊपरी तौर पर मान्य प्रतीत है, बल्कि किसी बात को इसलिए मानना चाहिए, जो कि अनुभव, बुद्धि और दलील की कसौटी पर सत्य सिद्ध होती हो और सभी का हित करने वाली हो l

बौद्ध धम्म के नाम पर अगर मीडिया आपको जुल्म सहना सिखा रहा है तो आपको धम्म से कोई फायदा न होगा|अकेला सत्य और शांति सन्देश किसी काम का नहीं क्योंकि सत्य वो नहीं जो सत्य है, सत्य वो होता है जो विजेता कह देता है या लिखवा देता है| इसके अलावा बाकि सब बस जनता कि यादें और चर्चाएं मात्र हैं जो समय के साथ धूमिल पड़ती जातीं हैं|बौद्ध शांति सन्देश भारत में हज़ारों साल से किताबों में बंद है पर क्या उससे भारत में बहुजनों को शांति मिली ? शांति केवल शोषित होने में नहीं है विजेता बनने में है ,कुछ चाहिए तो विजेता कि तरह छीन लो वर्ना विजेता बनने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाते रहो|क्षमता ही सबकुछ है”

आप जानना चाहते हो कि एक झटके में ही क्षमता कैसे बढ़ेगी? बहुत आसान है सभी लोग कानून कि पढाई पढ़ो एल0 एल0 बी0 कर लो  एक झटके में ही आप कमजोर से ताकतवर बन जाओगे|

समानता, जनता की जरूरतें पूरी करना,न्याय आदि किसी ईश्वर और धर्म से भी ऊपर हैं ऐसी बौद्ध विचारधारा को भारत के संविधान में  डॉ आंबेडकर ने कानून का रूप देने कि कोशिश की है तभी तो बौद्ध सत्ता को छोड़कर समस्त इतिहास में आज जैसा सुख और शांति का समय कभी नहीं रहा| आज का राजनितिक उठा पटक और भ्रस्टाचार उन जुल्मों के आगे कुछ नहीं जो इस देश का बहुजन गेर बौद्ध सत्ता में भोगता आया है,पर बहुजन बहुत मूर्ख होता है जैसे ही उसे थोडा आराम मिलता है वो संगर्ष छोड़ देता है और फिर गुलाम बन जाता है ध्यान रहे गलती से धम्म विरोधियों को न चुन लेना जो संविधान पलटने की फ़िराक में हैं, ये केवल बौद्ध बहुजनों के लिए ही नहीं सभी के लिए बुरा हो जायेगा| आंबेडकर संविधान से ही भारत एक रह पायेगा वर्ना ……

…समयबुद्धा

hum khud jimmedar

धर्म असल में क्या है, बौद्ध धम्म और अन्य धर्मों में क्या फर्क है …Udham Charmkar

darshnik skeka

DHAMMA or DHARMAधर्म का प्रयोजन क्या है – भिन्न-भिन्न धर्मो ने इसके भिन्न-भिन्न उत्तर दिए है | इस प्रश्न का एक सामान्य सा दिया जाने वाला उत्तर है मानव को ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर लगाना और उसे अपनी आत्मा के मोक्ष का महत्तव समझाना | बहोत से धर्मो के अनुसार तिन प्रकार के राज्य है स्वर्ग का राज्य (ईश्वर का सीधा शासन), पृथ्वी का राज्य और नरक का राज्य (शैतान का शासन) | कुछ धर्म कहते है की स्वर्ग का राज्य धर्म-राज्य है क्योकि वहा ईश्वर का सीधा शासन है | वो बताते है जो ईश्वर और उसके पैगम्बर पे ईमान लाता है वह ही स्वर्ग पहुच पता है और जीवन में जितने भी भोग विलास के साधन है वो सभी स्वर्ग में प्राप्त करता है | सभी धर्मो का यही उपदेश है कि मानव के जीवन का उद्देश्य इस स्वर्ग के राज्य को प्राप्त करना और कैसे प्राप्त करना यही होना चाहिए |

तो मेरे मित्रो क्या यही धर्म है ? क्या यही धर्म-राज्य है ? भोग विलास के साधनों की प्राप्ति |

इस घुप्प अंधकार में सिर्फ तथागत ही सूर्य के सामान दिखाई देते है | तथागत का कहना था धर्म का राज्य पृथ्वी पर ही है और वह धर्म-पथ पर चल कर प्राप्त किया जा सकता है | धर्म का उद्देश्य है मानव के दुःख का अंत करना न की किसी काल्पनिक ईश्वर, स्वर्ग अथवा जन्नत की प्राप्ति | आदमी-आदमी के साथ जो अनुचित व्यव्हार करता है उसी से मानव का सारा दुःख जन्म लेता है | बुद्ध ने लोगो से कहा की यदि तुम अपने दुःख का अंत करना चाहते हो तो हर किसी को दुसरे के साथ न्याय सांगत, धर्म-संगत और समान व्यव्हार करना चाहिए तभी पृथ्वी धर्म का राज्य बनेगी |

मेरी समझ से बुद्ध का धर्म ही सच्चा धर्म है और सिर्फ तथागत का धर्म ही धर्म-राज्य की स्थापना कर सकता है |

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“बौद्ध धम्म में वो बात है कि मीडिया, धन और राजनेतिक सरक्षण से सदियों का रटाया ईश्वर और पुरोहित श्रेस्टता कि पट्टी को लोगों के जहन से सिर्फ एक साल में धोकर साफ़ कर सकता है बशर्ते सिर्फ एक साल के लिए बौद्ध धम्म को मीडिया धन और राजनेतिक सरक्षण दे कर देख लो, धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं|भारत के बहुजनों का धर्म सदियों से बौद्ध धम्म रहा है पर इतिहास में सत्ता के संगर्ष के दौरान बौद्ध धम्म नीति हार गई और बहुजन अपनी सुरक्षा के लिए ईसाइयत और इस्लाम की तरफ चले गए, जो नहीं गए वही आज के दलित हैं| आज हम वापस अपने धम्म में लौट रहे हैं पर हमें बहुजन सुरक्षा नीति को बदलना और विकसित करना ही होगा अन्यथा फिर से हार निश्चित है| जो जाना वो समझ गया धम्म सबसे बेहतर है पर यहाँ सुरक्षा और फायदा कहाँ तो चाहकर भी अपना नहीं पा रहे|”….समयबुद्धा