जिसे अपने दुखों से मुक्ति चाहिए उसे आज़ादी के लिए लड़ना होगा, जो लड़ना चाहता है उसे पढ़ना होगा, आज बहुजनों कि दशा में जो सुधार है उसका मूल कारन बाबा साहब आंबेडकर कि पढ़ाई और संगर्ष है, पर अफ़सोस आज के पढ़े लिखे बहुजन अपने समाज के लिए कुछ नहीं करना चाहते


jise ladna hai use padhna hoga“कोई समुदाय स्वयं को केवल तभी गतिमान रख सकता है जब वह राजसत्ता पर अपना नियंत्रणकारी प्रभाव रख सकने लायक हो। राजसत्ता पर  नियंत्रणकारी प्रभाव रख कर मामुली से मामुली जनसंख्या वाला अल्पमत समुदाय भी किस तरह समाज मेँ अपनी सर्वोच्च हैसियत बरकरार रख सकता है, भारत मेँ ब्राह्मणोँ की वर्चस्वपूर्ण स्थिति इस की जीती – जागती मिसाल है। राजसत्ता पर.नियंत्रणकारी प्रभाव निहायत जरुरी है क्योँकि इसके बिना राज्य की नीति को एक दिशा देना संभव नही है, और प्रगती का सारा दारोमदार तो राज्य की नीति पर ही होता है।” — ङाँ. बाबासाहब आंबेङकर ….

“अपनी आजादी के लिए सदियों से संघर्षरत भारत के बहुजन  क़ौम को धर्म, दर्शन, इतिहास, संस्कृति, परंपरा के लिए अपने से बाहर किसी और का मुँह जोहने और उसका मोहताज होने की कोई जरूरत नहीं. अपनी स्वतंत्रता के लिए सदियों से निरंतर संघर्ष करने वाली क़ौम के पास चिंतन की कोताही हो ही नहीं सकती… हम आर्थिक दृष्टि से भले ही गरीब हैं किंतु अपनी सांस्कृतिक परंपरा में दुनिया में सबसे समृद्ध. दुनियाँ में किसके पास बुद्ध, कबीर, रैदास जैसे संतों की महान परंपरा और सामाजिक न्याय के महान संघर्ष में अंबेडकर जैसे अहिंसक लोकतांत्रिक योद्धा हैं.हमारे लोग उस बंजर भूमि कि तरह हैं जिस्म्ने कितना भी खाद बीज पानी डालो पर परिणाम कुछ नहीं, अगर लोग ही अपने लिए कुछ न करना चाहे तो ये महँ इतिहास और परंपरा भी क्या कर सकती है, समय भी उसी का साथ देता है जो अपना साथ खुद देता है| ..??”ladna padhnaबाबा साहेब को अगर किसी चीज से लगाव था, तो वह थीं पुस्तकें. न्यूयार्क में अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने बहुत सी किताबें खरीदीं. पुस्तकें पढ़ना और लिखना उनके लिए मात्र शौक ही नहीं बल्कि एक जुनून बन गया था. वह जानते थे कि बिना अध्ययन और ज्ञान के शक्ति नहीं आ सकती. अगर हम किसी व्यवस्था के विरुद्ध लड़ना चाहते हैं, तो पहले हमें इसके प्रति खुद को समर्थ बनाना होगा.

ब्राह्मण धर्म से लड़ने के लिए हमें इसकी सामजिक व्यवस्था और इसके परिणाम तथा राजनीतिक समस्या व इसका हल जैसे विषयों पर पूर्ण ज्ञान होना चाहिए. बहुजन समाज को सम्बोधित कर वह कहा करते थे, कि उन्हें नहीं मालूम कि आपको अध्ययन के लिए कितना समय मिलता है पर प्रभावी ढंग से खुद को प्रस्तुत करने के लिए आपको समय निकालना ही होगा. अपनी बात बताते हुए उन्होंने कहा कि जब एक बार वह इंग्लैण्ड से वापस आ रहे थे तो वीनस से मुम्बई पहुंचने की अवधि में उन्होंने कुल 8000 पृष्ठ पढ़ डाले थे. ऐसा उन्होंने 6 दिनों की यात्रा अवधि के दौरान किया था.

किसी पुस्तक की आवश्यकता होने पर उसे खरीदने हेतु वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं को भी छोड़ देते थे. जब वे न्यूयॉर्क में थे तो उन्होंने लगभग 2000 पुस्तकें खरीदीं. वहीं गोलमेज सम्मलेन के दौरान उन्होंने पुस्तकों से भरे 32 बड़े संदूकों को भारत भिजवाया. बाबा साहेब ने एक बार कहा था कि ऐसा कोई भी विषय अछूता नहीं है, जिसका उन्होंने अध्ययन न किया हो. बम्बई के अपने मकान में उन्होंने खुद का पुस्तकालय बनवाया जिसमें लगभग 50000 पुस्तकें थीं. इनसाईड एशिया के लेखक जॉन गुंथर ने भी यह माना है कि संसार भर के निजी पुस्तकालयों में डॉ अम्बेडकर का पुस्तकालय सबसे बड़ा था. इतना ही नहीं उनके पास पुस्तकों का विपुल संग्रह था, जो एक-एक करके उन्होंने बड़ी मेहनत से इकठ्ठा किया था. मदन मोहन मालवीय बीएचयू के लिए उस पुस्तकालय को 2 लाख की कीमत पर खरीदना चाहते थे पर बाबा साहेब ने इसके लिए साफ़ इंकार कर दिया. उनके लिए पुस्तकें अपनी पत्नी और बच्चों से भी अधिक प्रिय थीं. कुछ पुस्तकों को पढ़कर वह रो भी पड़े थे.

वह पुस्तकें लाइफ ऑफ टॉलस्टॉय, लेस मिजरेबल(ह्यूगो) और फाट फ्रॉम द मैडिग क्राउड थीं. अमेरिका में अध्ययन हेतु वह 18 घंटे दिया करते थे जो वाकई अद्भुत है. पढ़ते समय उनको खाने-पीने का कोई होश न रहता था. जैसा कि फुले ने कहा कि एक अविद्या के कारण ही बहुजन समाज का अनर्थ हुआ, वैसी ही सोच बाबा साहेब भी रखते थे. वह इस बात को लेकर बेहद ही चिंतित रहते थे कि हमारे लोग अध्ययन नहीं करते पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. आज बहुजन समाज के वे लोग जो संसाधन युक्त हैं, उन्हें बाबा साहेब के सन्देश को समझना चाहिए. शिक्षा ही वह आयाम है जहां से असमानता की सभी बेड़ियां तोड़ी जा सकती हैं. आज बाबा साहेब ने जो कुछ भी हासिल किया है, वह उनकी शिक्षा की वजह से है. शिक्षा के प्रति असाधारण जुनून ने उन्हें विश्व के सर्वाधिक शिक्षित व्यक्तियों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया है..

‎2000 वर्ष तक कोई भी भगवान हमारी मदद करने को नहीं आया | किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा कि ये भी इन्सान है इनको भी जीने का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये नहीं सो…चा कि इनको भी मैंने बनाया है फिर मै इनको मंदिर में प्रवेश करने से क्यों रोकूँ ? किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा कि इनकी भी आवश्यकताए है, इनको भी सुविधापूर्वक, सरल जीवन जीने का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा जिस पानी को पशु पी सकते है वो पानी इन इंसानों के पीने से कैसे अपवित्र हो सकता है ? किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा इनकी भी जरूरते है इसलिए इनको भी भविष्य के लिए धन और संपत्ति संचय करने का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा जो लोग गाय का मूत्र पीकर अशुद्ध नहीं होते है वो किसी इन्सान की छाया पड़ने से कैसे अपवित्र हो सकते है ? किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा कि इनको भी ऊपर उठने का अधिकार है और इनको भी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है ? किसी भी भगवान ने ये नहीं सोचा कि जब ये धरती पशु पक्षियों और इन तथाकथित उच्च वर्ण के लोगो के मलमूत्र से अपवित्र नहीं होता है तो फिर इन लोगो के थूक और पदचाप से कैसे अपवित्र हो सकती है ? फिर उस भगवान को मै क्यों मानु जिस भगवान ने इंसानों में ही फर्क किया और इंसानों को ६७४३ से अधिक श्रेणियों यानि कि जातियों में बाँट दिया | जिस भगवान ने ये नहीं सोचा सभी को समानता का अधिकार है और सबको आजादी से जीने का अधिकार है, उस भगवान को मै क्यों मानू ? मै उस इन्सान को मानता हूँ जिसने इन सभी बातो को जाना और हमको हर तरह की से मुक्ति दिलाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया | उन्होंने सारा जीवन हमको पशु से इन्सान बनाने के लिए बलिदान कर दिया और हमको इन्सान बना कर ही दम लिया |
मेरे भगवान तो वही बाबा साहब है जिनकी वजह से मै आज आजाद हूँ | जिनकी वजह से मैंने शिक्षा प्राप्त की, वही मेरे भगवान है | जिनकी वजह से मै आज सिर उठाकर चल सकता हूँ वही बाबा साहब मेरे भगवान है और मै उन बाबा साहब को नमन करता हूँ|

https://www.facebook.com/gautam.aman.5

“बहुजनों (SC/ST/OBC/Converted Minorities)  के सम्पन्न वर्ग का आंबेडकर मिशन के लिए अज्ञानता,अरुचि और नीरसता ही वो कारण हैं जिसकी वजह से न केवल बहुजनों का बल्कि समस्त भारत का भविष्य दुखमय नज़र आता है|इसका एक कारन ये भी है की विरोधी मीडिया आंबेडकर विचारधारा को बाकी बहुजनों से दूर रखकर केवल एस०सी० तक ही सीमित रखना चाहती है| एस०सी० वर्ग में भी जो लोग शिक्षित और सम्पन्न है उन्हें संगर्ष की जरूरत नहीं लगती और जो दुखी है उसके पास संगर्ष करने को पहले तो समय नहीं और अगर समय हो भी जाये तो धन के आभाव में उनकी आवाज़ कहीं नहीं पहुचती|चंद लोग संगर्ष कर रहे हैं और बाकि लोग कब तक केवल मूक दर्शक बने रहेंगे|  ध्यान रहे भविष्य उसका होता है जो वर्तमान में संगर्ष करता है|”…समयबुद्धा (Bahujan/Buddhist preacher and Philosopher)

banner4

hamari niti aur sangarsh

 

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s