16-jan-2014 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-” ध्यान रहे हर बात का समय होता है जब आप शक्तिशाली हो तब आपको अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा काम आएगी पर जब विपत्ति का समय हो तब केवल क्षमता बढ़ाना और अपने विरोधियों के खिलाफ संगर्ष करने से कल्याण होगा|”


tisharan sheel

क्या दो साल का बच्चा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य,शांति- षड्यंत्र आदि चीज़ों को समझता है? नहीं न, नहीं समझता है |अब एक प्रयोग करते हैं दो साल के बीस तीस बच्चों को एक कमरे में बिठा दो सभी को एक जैसे खिलौने जैसे गुड्डा दे दो| अब सब एक सामान हैं सबके पास एक जैसे गुड्डा है, होने ये चाहिए कि सब अपने अपने गुड्डे से संतुस्ट रहने चाहिए और शांति बनी रहनी चाहिए| पर ऐसा नहीं होता थोड़ी देर में आप देखोगे कि उनमे से कुछ बच्चे ऐसे हैं जो अपना गुड्डा दबेंगी अपनी बगल में और दूसरों का छीनने में लग जायेंगे| इसी छीना झपटी में कुछ खली हाथ रोते मिलेंगे और कुछ के पास कई गुड्डे होंगे, ऐसे में आपको न्यायकर्ता का रोल अदा करते हुए दबंग बच्चे से गुड्डा छीन कर रोते हुए बच्चे को देकर उसे चुप करना होगा| आप ऐसा कैसे कर पाएंगे? आप ऐसा तभी कर पाएंगे जब आप उन बच्चों से बड़े , शक्तिशाली और समझदार होगे| अगर आप भी उन्हीं में से एक बच्चे होगे तो आपको न्याय व्यस्था कायम करने में काफी दिक्कत होगी, बिना शक्ति और अन्य बच्चों के समर्थन के आप कर ही नहीं पाओगे|

यही बड़ों का भी संसार है बस वहाँ गुड्डे कि जगह धन,धरती और शक्ति के लिए छीना झपटी है| इसी संसार में सबके लिए इंतज़ाम है पर कुछ लालची खुदगर्ज़ दबंग लोग न खुद चैन से बैठते हैं और न ही बाकि कि जनता कि चैन से बैठने देते हैं| अब ऐसे में शांति बनाये रखने के लिए न्याय व्यस्था चाहिए जो दबंगों पर अंकुश रखे और मजलूमों को उनका हक़ और न्याय दिलाये| आज संसार में बौद्ध धम्म शांति फ़ैलाने वाला धम्म के रूप में विख्यात है|

अब सवाल उठता है कि शांति कैसे स्थापित होती है? शांति न्याय द्वारा स्थापित होती है,दो लोग या दो समूह लड़ाई कर रहे हैं ऐसे में शांति स्थापित करने के केवल दो ही विकल्प होते हैं:

– एक तो दोनों में से एक जुल्म सह ले और दुसरे को अपने पर हावी होने दो तो शांति हो जायेगी जो कि भारतीये बहुजन कर रहे हैं और विरोधी मीडिया बौद्ध धम्म के नाम पर उनकी मानसिकता इसी प्रकार कि बना रहा है|
– दूसरा दोनों में आपस में युद्ध होने दो और जो जीते वो हारने वाले पर हावी हो जाए जो धम्मविरोधी या बहुजन विरोधी कर रहे हैं|

इन दोनों के अलावा तीसरा विकल्प है कि दोनों एक दुसरे को प्रेम करें और इस दुनियां में उपलब्ध संसाधनों को मिल बाँट कर सुखी रहें,यही तो है बुद्ध कि शिक्षा का सार| बौद्धों का भारत में सदियों की दुर्दशा का इतिहास बताता है कि बुद्ध की शिक्षाओं  सिर्फ कहने सुनने में अच्छी बात है किताबी बात है पर जमीनी सच्चाई इससे उलट है यहाँ विजेता तय करता है की न्याय की परिभाषा क्या होगी|

पहले विकल्प में जो जुल्म सहने को तैयार है उसे हर हाल में खाली हाथ जीना मरना है तो ऐसी शांति में ये निश्चित है कि एक व्यक्ति या एक बहुत बढ़ी जनसँख्या जुल्म कि शिकार रहेगी| क्या ये शांति वाकई में शांति है?क्या भारत के बहुजनों को यही शांति चाहिए? क्या बौद्ध धम्म यही शांति सिखाता है?

दूसरी विकल्प में अगर जीतने वाला हारने वाले पर जुल्म न कर के उसे बराबरी का और न्याय का हक़ दे| पर ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता जीतने वाला हारने वाले को अपना गुलाम समझता है| विजेता अगर बहुत ज्यादा अच्छा हुआ तो भी अपने से एक दर्जा कम ही रखता है|

कुछ ऐसी ही बौद्ध धम्म के शशक कि मानसिकता होती होगी और इसी कारन जब बौद्ध सत्ता अपनी चरम पर थी तब विरोधियों को भी हक़ दिए गए पर उन हकों के माध्यम से विरोधियों ने अपने को मजबूत और बौद्ध सत्ता को कमजोर किया परिणाम स्वरुप बौद्धों कि हार हुई और अबौद्ध जीत गए |अब बारी अबोधों कि थी कि वो हारे हुए बौद्धों को न्याय और हक़ दें पर उन्होंने ऐसा नहीं किया उल्टा उन्होंने मनुस्मृति जैसे कड़े अमानवीय कानून बनाये कि सदियों से आज तक भी भारत के बहुजन अपमानित मौत मारे जा रहे हैं|यहाँ तक कि आज वो भूल गए हैं कि वो बौद्ध हैं और उनकी पूजा कर रहे हैं जो उनके पूर्वजों के हत्यारे हैं|भारत के मनुवादियों कि दयाशून्यता इतिहास चीख चीख कर बता रहा है और ऐसे में क्या शांति मिल सकती है बहुजनों को?

तो दोनों विकल्पों में हमने देखा कि ऐसी शांति बेमानी है दोनों ही विकल्पों में जनता का एक वर्ग अन्याय का शिकार रहेगा ही रहेगा| इसीलिए बाबा साहब आंबेडकर ने भारत को एक ऐसा संविधान दिया जिसने शक्ति तीसरे विकल्प अर्थात शक्ति के विकेंद्रीकरन को जमीन पर स्तापित किया| भारत में अनेकों असमानताएं हैं जैसे भाषा, कद काठी, विचारधारा,जमीनी असमानताएं, ऐसे में भारत के संविधान ने अगर पिछले पैसठ वर्षों से भारत को एक झंडे ने नीचे बनाये रखा है तो क्या ये बहुत ज्यादा बड़ी बात नहीं है |क्या बाबा साहब आंबेडकर वाकई सम्मान के काबिल नहीं हैं पर विरोधियों द्वारा फैलाई जातिगत घृणा के कारण लोग समझते हुए भी अम्बेकडर का नाम नहीं लेना चाहते| अगर कहीं कोई नाम ले भी रहा है तो वो इसलिए क्योंकि आंबेडकर नाम अब एक झंडा बन गए गई जीसके नीचे बहुत बड़ी जनसँख्या खड़ी है और वो उसको वोट दे सकती है|

तीसरा विकल्प सत्ता का विकंदीकरण बौद्धों द्वारा खोजा गया गणराज्य सिद्धांत का आधुनिकरण ही है| साड़ी दुनिया जब असभ्य थी तब भी भारत में बौद्धों द्वारा गणराज्य सिद्धांत द्वारा सुशाशन दिया जाता था| गणराज्य वो व्यस्था होती है जिसमें सत्ता और सरकार जनता कि जनता द्वारा जनता के लिए चुनी जाती है|आज भारत में कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति अपनी हटधर्मी नहीं चला सकता है उसे संविधान के हिसाब से चलना होगा अगर कोई ज्यादा अन्यायी हो जाता है तो गणतंत्र के अन्य स्थम्भ जैसे कोर्ट कचेरी, मीडिया,जनता का मताधिकार अदि उसपर अंकुश रखेंगे| हाँ ये बात और है कि सेना विद्रोह कर के सत्ता अपने हाथों में ले ले तो कोई नहीं बचा पायेगा| पर इसमें भी सत्ता का विकेंद्रीकरण है सेना में अनेकों विचारधारा के लोग हैं जो कभी एक विचारधारा में एक सुर नहीं होगी| अगर एक बटालियन विद्रोह करती है तो दूसरी बटालियन उसके मुकाबले में खड़ी है| अब तो जाती पर आधारित बटालियनों में भी जाइए जाट रेजिमेंट महार रेजिमेंट सिख रेजिमेंट में भी सिर्फ एक ही जातिगत मानसिकता के लोगों को नहीं रखा जाता बल्कि मिक्स हैं | ऐसे में विद्रोह करने के लिए एकता नहीं हो पाती हालाँकि धम्म विरोधियों का अपने धर्म के नाम पर सेना के ब्रेनवाश पर काम जरी है जिसके महाभयंकर परिणाम आप समझ सकते हो|सबसे शक्तिशाली है सरकार उससे भी शक्तिशाली है संविधान पर इस सबसे शक्तिशाली है सेना और सेना से भी ज्यादा क्या शक्तिशाली है – धर्म | धर्म क्या है ?धर्म जनता के मन वचन और कर्मों को नियंत्रित करना वाला सबसे शक्तिशाली औज़ार होता है|शायद अब आप समझ गए होंगे कि क्यों सेना में धर्म पढ़ाने वालों को भर्ती किया जाता है|

धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं|यही कारण है कि धर्म एक इतना बड़ा मुद्दा है जिसपर सत्ताधारी कोई समझौता नहीं करता|यही कारण है कि सारे संसार में धर्म के नाम पर सबसे बड़े और भीषण नरसंघार और युद्ध होते हैं| इस सब नरसंहारों से ईश्वर का कोई लेना देना नहीं , धर्म का कोई लेना देना नहीं| ये सब सत्ता जी जंग है ये सब धन धरती और शक्ति को पाने कि जंग है| धर्म और ईश्वर लालची भेड़ियों की भेड़ की वो खाल है जिसे वो जनता के सामने आने से पहले पहन लेते हैं|अब आप समझ सकते हो की क्यों राजनीती धर्म को सरक्षण देती है और क्यों पुरोहित वर्ग और रजा दोनों मिलकर शाशन चलाते हैं|

अब आप समझ रहे होगे कि शक्ति से ही शांति स्थापित होती है, अब आप समझ सकते हो की संयुक्त रास्ट्र कैसे दुनिया में शती स्थापित करता है | क्या केवल शब्दों से, धर्म से, भिक्खुओं से शांति स्तापित होती हैं? नहीं? संयुक्त रास्ट्र सेना या शक्ति द्वारा शांति स्थापित करवाता है|आज अगर बौद्ध धम्म सारे संसार में शांति फ़ैलाने वाला धम्म है तो इसका मतलब ये नहीं की खुद पीटकर मरकर शांति फैलाओ इसका मतलब ये है की खुद को इतना बुलंद करो की सब आपसे डर कर शांति बनाये रखें| आप इतने ऊपर पहुच जाओ की आप को युद्ध की जरूरत ही न पड़े और तब बौद्ध धम्म की शांति का सन्देश आपने काम है| बौद्ध धम्म का शांति का सन्देश शक्तिशाली राजाओं के लिए हैं उनको न्यायप्रिय बनाने के लिए हैं| गरीब और कमजोर के लिए बौद्ध धम्म की शांति की शिक्षा किस काम की वो तो वैसे ही दब्बू है शांति के अलववा उसके पास और कुछ नहीं उसको शांति की क्या जरूरत|आप बताईये कि की कोई कमजोर किसी दबंग को कह सकता है कि शांति बनाये रखो?

भारत के बहुजनों का धर्म सदियों से बौद्ध धम्म रहा है पर इतिहास में सत्ता के संगर्ष के दौरान बौद्ध धम्म नीति हार गई और बहुजन अपनी सुरक्षा के लिए ईसाइयत और इस्लाम की तरफ चले गए, जो नहीं गए वही आज के दलित हैं| आज हमने बौद्ध धम्म के उसी हार वाले स्वरुप को अपना लिए तो फिर से हार निश्चित है| आज बौद्ध धम्म के नाम पर अगर आपको मानसिक रूप से जुल्म सहने को तैयार किया जा रहा है तो समझ लो बौद्ध धम्म का गलत मतलब समझ रहे हो आप| आज केवल बुद्धा से भला नहीं होगा आजा समयबुद्धा से भला होगा अर्थात बुद्ध कि बात तो माननी ही है पर समय कि मांग को पहचानना है जो समय के साथ नहीं बदलता समय उसको बदल देता है| आप धम्म से वही चुनों, जिस तरह युद्ध हर वक्त के लिए सामान उपयोगी नहीं उसी तरह शांति भी हर वक्त के लिए समः उपयोगी नहीं है| अगर सुरक्षा चाहते हो तो धम्म में बहुजन सुरक्षा नीति को बदलना और विकसित करना ही होगा|सब जानते हैं की धम्म सबसे बेहतर है पर यहाँ सुरक्षा न होने के कारण बहुजन चाहकर भी अपना नहीं पा रहे|धर्म वाही फलता फूलता है जिसे राजनेतिक सरक्षण प्राप्त होता है और राजनीती वही फलती फूलती है जिसे धर्म अर्थात जनता का समर्थन मिलता है| हे बहुजनों ध्यान रहना बौद्ध धम्म केवल डॉ आंबेडकर द्वारा केवल गौतम बुद्ध की तस्वीर टांगने को नहीं चुना गया है बल्कि इसके द्वारा अपनी क्षमताएं बढ़ाने को और फिर संगर्ष करने को चुना गया है|

फेसबुक पर बलात्कार कर के मार दी गई दलित लड़कियों की फ़ोटो डालकर लोग मीडिया और सरकार की शिकायत करते रहते हैं | बौद्ध धम्म के नाम पर जो लोग अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा देते फिरते हैं मैं उनसे पूछता हूँ कि अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा द्वारा क्या ये दलित लड़कीया और इनकी कौम अपनी इस दुर्दशा से कैसे बच सकते हैं | अगर नहीं तो फिर अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा का इसको और इसकी कौम को क्या फायदा| ध्यान रहे हर बात का समय होता है जब आप शक्तिशाली हो तब आपको अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा काम आएगी पर जब विपत्ति का समय हो तब केवल क्षमता बढ़ाना और अपने दुश्मनों के खिलाफ संगर्ष करने से कल्याण होगा| ये संगर्ष कुछ भी हो सकता है राजनीति ,धार्मिक, नीति, विज्ञानं या युद्ध भी| ध्यान रहे अगर शांति से जीना चाहते हो तो अपनी क्षमता बढ़ाओ और हर प्रकार के संघर्ष के लिए तैयार रहो| ध्यान रहे अगर आप अपनी कौम के लिए क़ुरबानी नहीं दोगे तो ऐसे ही क़ुरबानी ले ली जायेगी अब ये आपके हाथों में है की आप खुद क़ुरबानी देते हो या दुश्मन को अपनी क़ुरबानी लेने देते हो|मैं हमेशा बौद्ध धम्म को बढ़ाने को प्रयासरत रहता हूँ पर मैंने समय के हिसाब से बुद्धा की शिक्षाओं को मानने की देशना की है| समय की नब्ज पहचानो हर नियम हर बात हर समय एक सी लागू नहीं होती, आज का समय अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा से भी ज्यादा अपनी और अपनी कौम की क्षमता बढ़ाने का है|

हम अक्सर वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत सुनते हैं -प्राकृतिक चुनाव(natural selection) और सर्वोचित या शक्तिसंपन्न ही अपने अस्तित्व को बचा पता है (Fittest survives)|अगर आपके पास ताकत या हिंसा करने की क्षमता नहीं हैं तो आपको हर कदम पर झुकना पड़ेगा| इससे कोई खास फर्क नहीं नहीं पड़ता कि आप कितने धनि, ज्ञानी, शरीफ, सच्चे और न्याय प्रिये हो|शोषित राजनीती क्षमता के बिना केवल जुल्मों की शिकायत करते रह जाते हैं हल नहीं मिलता|ये जिन्दगी का अटल नियम है की अगर शांति चाहिए तो जंग के लिए तयार रहो | दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं एक शाशक और एक शोषित,अगर शाशक बनना है तो नीति,शिक्षा,संगठन और संगर्ष से क्षमता बढ़ाने में लगे रहो कभी न कभी आपका मौका आएगा।अगर निति और राजनेतिक शक्ति की क्षमता का महत्व नहीं समझ सकते तो शोषित बने रहने को मजबूर होना पड़ेगा, चाहे कुछ भी कर लो।आपके विरोधी राजनीतिज्ञ मंच पर खड़े होकर सार्वजानिक रूप से आपको तलवार और गदा जैसे हथियार दिखाते हैं, क्या आप इसका मतलब नहीं समझते?वो शक्ति शक्तिशाली हैं इसलिए वो ऑफेन्सिव खेलते हैं और हम डिफेंसिव पर ध्यान रहे बेवजह हिंसा करना गलत है पर हिंसा करने की क्षमता होना गलत नहीं जैसे जंगल का शेर और जंगल का हाथी|

“बौद्ध संस्कृति में हम ‘हाथी’ को कई प्रकार के राजनेतिक एव धार्मिक चिन्ह के रूप में प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि हमारी हिंसा जंगल में हाथी की हिंसा के सामान है|जिस तरह हाथी मासाहारी जानवरों की तरह पहल करके हिंसा नहीं करता पर जब उसे छेड़ा जाए तो वो इतना हिंसात्मक हो जाता है की सब तहस नहस कर डालता है| उसी तरह भारत का बहुजन या बौद्ध भी है पहल करके बिना वजह हिंसा नहीं करता|हाथी की हिंसा में ध्यान देने वाली बात ये है की उसको हिंसा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि उसकी ताकत का सबको अंदाजा होता है,ये बात हिरन पर लागू नहीं हो सकती|इसीलिए किसी ने सही कहा है की अगर शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तयार रहो|”

भगवान् बुद्ध ने कहा है कि तर्क एवं तथ्य पर जो बात सत्य लगे उसे ही अपनाओ, ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा कहने वाले एवं आडम्बर और ढोंग पर आधारित व्यवस्था को मत मानो, और मनुष्य को किसी बात को केवल इसलिए नहीं मानना चाहिए कि बहुत से लोग उसे मानते है या परम्परा से चली आई है या धर्म-ग्रंथों में लिखी हुई है या न्यायशास्त्र के अनुसार है या तर्कशास्त्र के अनुसार है या वह ऊपरी तौर पर मान्य प्रतीत है, बल्कि किसी बात को इसलिए मानना चाहिए, जो कि अनुभव, बुद्धि और दलील की कसौटी पर सत्य सिद्ध होती हो और सभी का हित करने वाली हो l

बौद्ध धम्म के नाम पर अगर मीडिया आपको जुल्म सहना सिखा रहा है तो आपको धम्म से कोई फायदा न होगा|अकेला सत्य और शांति सन्देश किसी काम का नहीं क्योंकि सत्य वो नहीं जो सत्य है, सत्य वो होता है जो विजेता कह देता है या लिखवा देता है| इसके अलावा बाकि सब बस जनता कि यादें और चर्चाएं मात्र हैं जो समय के साथ धूमिल पड़ती जातीं हैं|बौद्ध शांति सन्देश भारत में हज़ारों साल से किताबों में बंद है पर क्या उससे भारत में बहुजनों को शांति मिली ? शांति केवल शोषित होने में नहीं है विजेता बनने में है ,कुछ चाहिए तो विजेता कि तरह छीन लो वर्ना विजेता बनने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाते रहो|क्षमता ही सबकुछ है”

आप जानना चाहते हो कि एक झटके में ही क्षमता कैसे बढ़ेगी? बहुत आसान है सभी लोग कानून कि पढाई पढ़ो एल0 एल0 बी0 कर लो  एक झटके में ही आप कमजोर से ताकतवर बन जाओगे|

समानता, जनता की जरूरतें पूरी करना,न्याय आदि किसी ईश्वर और धर्म से भी ऊपर हैं ऐसी बौद्ध विचारधारा को भारत के संविधान में  डॉ आंबेडकर ने कानून का रूप देने कि कोशिश की है तभी तो बौद्ध सत्ता को छोड़कर समस्त इतिहास में आज जैसा सुख और शांति का समय कभी नहीं रहा| आज का राजनितिक उठा पटक और भ्रस्टाचार उन जुल्मों के आगे कुछ नहीं जो इस देश का बहुजन गेर बौद्ध सत्ता में भोगता आया है,पर बहुजन बहुत मूर्ख होता है जैसे ही उसे थोडा आराम मिलता है वो संगर्ष छोड़ देता है और फिर गुलाम बन जाता है ध्यान रहे गलती से धम्म विरोधियों को न चुन लेना जो संविधान पलटने की फ़िराक में हैं, ये केवल बौद्ध बहुजनों के लिए ही नहीं सभी के लिए बुरा हो जायेगा| आंबेडकर संविधान से ही भारत एक रह पायेगा वर्ना ……

…समयबुद्धा

hum khud jimmedar

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