बौद्ध धम्म में ‘अनित्यता’ अर्थात सब कुछ परिवर्तनशील होना एक प्रमुख सिद्धांत है, बुद्ध ने ही प्रथम बात खोजा कि सब कुछ अनित्य है और प्रत्येक वस्तु कुछ और होने की प्रक्रिया मे है… डॉ प्रभात टनडन

BUDDHA waxअनित्यता बौद्ध धर्म की एक महत्वपूर्ण ईकाई है . बुद्ध ने खोजा कि सब कुछ अनित्य है और प्रत्येक वस्तु कुछ और होने की प्रक्रिया मे है. नशवरता का यह बोध हमे अपनी अपने जीवन मे भी दिखता है . हम सब वय: परिवर्तन के दौर मे है . जो हम आज से बीस साल पहले थे वह आज नही है , यहाँ तक कि हमारे विचार हर पल बदलते रहते हैं . प्रकृति मे भी यह बदलाव आसानी से देखा जा सकता है , कली का फ़ूल बनना , फ़ूल का मुरझाना , और यहाँ तक तारे और आकाश गंगा भी परिवर्तन के दौर मे हैं .  बौद्ध गुरु – – Thich Naht Hanh के अनुसार हमें अपने आप को सागर की तंरगों के समान सोचना चहिये . लहरों की मुख्य विशेषता इसकी अस्थायी प्रवृति है , इसी तरह हम भी एक दिन नशवरता मे मिल जाते हैं जैसे कभी हुये ही न हों .

एक सूफ़ी कहानी कहती हूँ- फरीदुद्दीन अत्तार की लिखी हुई . आज सुबह जब मैने इसे पढा तो लगा कि यह अनित्यता का बोध हमे जीवन मे करा सकती है.

अत्तार ने लिखा की एक दरवेश दिन रात बंदगी करता | जो कुछ उसने अपने गुरुओं से सीखा उसका अभ्यास करता रहा | फिर उसके जी में आया कि ‘अब मैं हज करूँ’ | जब हज के लिए वह निकला तो दूर मुश्किल यात्रा थी|महीनों लगने थे|चलते-चलते एक गाँव पहुँचा| थका हुआ था, भूख भी लगी हुई थी| अनजान रास्ता था| उसने एक राहगीर से कहा कि ‘मुझ दरवेश को ठहरने के लिए कहाँ जगह मिल सकती है?’ उसने जवाब दिया- ‘यहाँ शाक़िर नाम का इनसान रहता है, तू उसके घर चला जा|वह इस इलाके का सबसे अमीर आदमी है और बहुत दयावान और दिलदार आदमी है |वैसे तो इस इलाके का सबसे बड़ा सेठ हमदाद है लेकिन हमदाद की जगह तू शाक़िर के घर जा|

दरवेश शाक़िर के घर गया| शाक़िर का अर्थ होता है – जो शुक्राना करता रहता है| जब उसके पास पहुँचा तो जैसा उसके बारे में सुना था, बिल्कुल वैसा ही निकला| शाक़िर ने उसे अपने घर में पनाह दी | भोजन दिया, बिस्तर दिया| शाक़िर की बीवी, बच्चों ने उसकी बहुत ख़ातिर की |दो दिन वह ठहरा, तीसरे दिन जब वह चलने लगा तो उन्होंने उसको रास्ते के लिए खाना , पानी, खजूरें आदि सब दिया| चलते समय दरवेश ने कहा कि ‘शाक़िर! तू कितना अच्छा है| तू कितना अमीर है, तूने मुझे इतना कुछ दिया कि तुझे इस बारे में ज़रा भी सोचना नहीं पड़ा. जबकि तू मुझे जानता भी नहीं है|

शाक़िर ने अपने मकान की ओर नज़र दौड़ाई और कहा कि ‘गुज़र जाएगा|’ दरवेश पूरे रास्ते सोचता रहा क्योंकि उसके मुर्शदों ने कहा था कि जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लिया करो और जब किसी से बात सुनो तो उसकी गहराई में जाया करो| वह अपने दिल की धड़कनों को सुनते हुए, ज़िक्र करते हुए, मन के किनारे बैठा और मन के विचारों को देखता रहा, देखता रहा और सोचता रहा कि शाक़िर ने अपने धन, अपनी अमीरी, अपनी दौलत की ओर इशारा करते हुए ये क्यों कहा कि ‘गुज़र जाएगा’| कहीं कोई आने वाली घटना के बारे में कह रहा था या फिर ऐसे ही बोल गया | मक्‍के पहुँचा, हज किया, वहीं ठहर गया| फिर एक साल बाद लौटना हुआ| उसके चित्त में यह विचार था कि एक बार मैं शाक़िर को मिलूं| पर जब वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि शाक़िर का मकान है ही नहीं| लोगों ने बताया कि अब वह हमदाद के घर में नौकर है|उन्होंने बताया कि बाढ़ आई थी, उसमे उसका मकान बह गया, भेड़ – बकरियाँ बह गई, बहुत ग़रीब हो गया है |इसलिए उसको नौकरी करनी पड़ी, उसे वहीं जाकर मिल लो |

दरवेश बहुत हैरान हुआ कि इतना नेक आदमी इतने दुख में! फिर वह हमदाद के घर गया और जब शाक़िर को मिला तो उसके बदन पर फटे हुए कपड़े, उसकी बीवी और बेटियाँ भी उसके साथ में थीं| दरवेश ने कहा कि ‘ बड़ा दुख हुआ तेरे जैसे नेक आदमी के साथ इतनी त्रासदी?’ शाक़िर ने गम्भीर स्वर में कहा-‘ यह भी गुज़र जाएगा|’ |

हमदाद भी नेक आदमी था, उसने भी दरवेश को पनाह दी | कुछ समय वह यहीं रहा|फिर जब दरवेश जाने लगा तो शाक़िर ने उतना तो नहीं पर फिर भी उसको कुछ रूखा-सूखा खाने को साथ में दिया | दो-चार साल गुज़र गए पर दरवेश हमेशा शाक़िर को याद करता| फिर एक दिन मक्का जाने का मन हो गया| फिर उसी रास्ते से गुज़रा, फिर हमदाद के घर गया| जब वहाँ पहुँचा तो मालूम हुआ कि हमदाद की तो मौत हो गई है और उसने अपना सब कुछ शाक़िर को दे दिया क्योंकि उसकी अपनी कोई औलाद नहीं थी|

शाक़िर फिर से अमीर हो गया|उसके बदन पर फिर रेशमी वस्त्र, उसकी बीवी फिर सुंदर कपड़ों में है|उसकी बेटियों की शादियाँ अमीरों के घर हो चुकी हैं| दरवेश अंदर गया और कहता कि ‘अरे वाह शाक़िर! इतना अच्छा…….. खुदा ने खूब रहमत की तेरे ऊपर|’ शाक़िर ने फिर गंभीर स्वर में कहा- ‘यह भी गुज़र जाएगा|’

कुछ दिन दरवेश उसके घर ठहरा फिर मक्‍के गया|इस बार वह मक्‍के करीब दो साल रहा| जब वापिस लौटा तो मन में चाह उठी कि अपने उस दोस्त को मिलूं| जब पहुँचा तो मालूम हुआ कि शाक़िर तो मर चुका है| फकीर ने लोगों से पूछा- ‘उसकी कब्र कहाँ है? मैं उसकी कब्र पर जाकर नमाज़ पढ़ूंगा| दुआ करूँगा अपने उस दोस्त के लिए|’ लोगों ने शाक़िर की कब्र का पता दिया| जब कब्र के पास दरवेश पहुँचा तो उस कब्र पर एक तख़्ती लगी हुई थी, जिस पर लिखा था- ‘यह भी गुज़र जाएगा|’ पढ़कर दरवेश बहुत रोया, कहता-‘ यह भी गुज़र जाएगा’, अब इसका गहरा अर्थ और क्या हो सकता है? दरवेश ने बहुत दुआएँ की|

फिर अपने डेरे को निकला तो उसके बाद कई साल गुज़र गए| फिर कई सालो बाद एक काफिला मक्‍के की ओर जा रहा था तो उसे लगा की जिंदगी की एक हज और कर सकता हूँ| चल तो नहीं सकता पर ऊँट की सवारी मिल गई तो उस पर बैठकर चल दिया| रास्ते में शाक़िर का गाँव आना था, उससे रहा न गया और सोचा कि एक बार तो शाक़िर की कब्र पर फूल चढ़ाऊं और दुआ करूँ| और जब वह वहाँ पहुँचा तो जिस जगह शाक़िर की कब्र थी, अब वहाँ कब्र ही नहीं है|लोगों से पूछा कि कब्र कहाँ गई तो कहते कि तूफान आया था, कहीं ज़मीन धँस गई, टूट-फूट हुई, सब तहस-नहस हो गया| और वह कब्र कहाँ गई, पता नहीं|दरवेश आया भी लम्बे समय बाद था|सब बदल चुका था, जहाँ उसकी कब्र थी, अब वहाँ आबादी हो गई थी और ढूँढने पर भी न मिली|

आज दरवेश को शाक़िर का यह वचन पूरी तरह समझ आ गया कि ‘यह भी गुज़र जाएगा’ उसकी तो कब्र भी गुज़र गई, पता ही नहीं कि कहाँ है .

हम बुद्ध शिक्षाओं को धम्म कहते हैं पर दुनिया धर्म समझती समझती है, आइये धर्म और धम्म में फर्क समझें …अभिजीत गणेश भिवा

DHAMMA or DHARMA

धर्म और धम्म में क्या अंतर है ? ये महत्व पूर्ण सवाल बहोत बार पूछा जाता है | कुछ लोगो का कहना है की धर्म और धम्म में सिर्फ भाषा का फर्क है धर्म हिंदी का शब्द है उसी को पली में धम्म कहते हैं,पर मुझे ये कथन अपूर्ण लगता है | धर्म शब्द कि व्याख्या के बारे में कोई भी तर्क या विचार व्यक्त करना बहुत ही मुश्किल है क्योकि इसपर अलग अलग विद्वान ने अलग अलग मत हैं | धम्म का अर्थ तथागत के शब्दों से लगाया जा सकता है | अत: मैं इस विषय पर प्रकाश डालने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा हू |

इस विषय कि संवेदन शीलता समझने के लिए एक महत्वपूर्ण घटना का यहाँ उल्लेख करना बहुत जरुरी लगता है | बुद्ध धम्म के आज तक के महत्वपूर्ण विद्वानों में से अग्रणी हैं,जिन्हें की बोधिसत्व का पद/उपाधि प्रदान की गई है:- डॉ. भीम राव आंबेडकर जी |उनका इस विषय से सबसे गहरा ताल्लुक है |भारतीय बौद्ध धर्मिय लोगो के महत्वपूर्ण ग्रन्थ “बुद्ध और उनका धम्म” का निर्माण करते वक्त डॉ. आंबेडकर जी ने पहले इस महत्वपूर्ण किताब का नाम ‘बुद्ध और उनका तत्वज्ञान’ ( Buddh And his Gospel ) रखा था| पर बीच मे उन्होंने इस किताब का नाम बदलकर बुद्ध और उनका धम्म ( Buddha And his Dhamma) कर दिया | यह अपने आप में बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण घटना है | उन्होंने ऐसा क्यों किया ? उन्होंने धम्म जैसे पाली के शब्द का इस्तेमाल क्यों किया ? धर्म ( Religion ) शब्द क्यों इस्तेमाल नहीं किया ? इस बात को स्पष्ट करने हेतु वे अपने ग्रन्थ में धर्म और धम्म में अंतर स्पस्ट करते हैं |

आज पूरी दुनिया में सबसे बड़े चार धर्म समुदाय नजर आते है ईसाइयत,मुस्लिम,हिंदू/ब्राह्मण धर्मी और बौद्ध | ईसाइयत ,मुस्लिम हिंदू ये तीन अगर धर्म हैं तो फिर अकेले बुद्ध कि शिक्षाओं को धर्म कहने में क्या समस्या है ?

उपरी तीनों धर्मो में कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत के बारे में बहुत ही चमत्कारीक समानताएं है,जो की उन धर्म की जड़े मानी जाती है | पर बुद्ध धम्म उन बातों को पूरी तरह से विरोध करता है या फिर कही असहमति दर्शाता है |

सबसे पहला फर्क ये है कि धर्म का उद्देश्ये दुनिया की उत्पत्ति स्पष्ट करना है और धम्म का उद्देश जीवों का दुःख मिटाकर दुनिया की पुनर्रचना करना है |बुद्ध का कथन है , ” कोई भी यह साबित नहीं कर सकता की पृथ्वी का निर्माण ईश्वर ने करवाया है “|

दूसरा फर्क है कि अन्य धर्म ईश्वर कि संकल्पना को मान्यता ही नहीं देते बल्कि उसे अपने धर्म का सर्वोच्च स्थान भी प्रदान करते है, पर धम्म में ईश्वरीय परिकल्पना को सभी जीवों के लिए गैरजरूरी बताया गया है |बुद्ध का ये वचन और ऐसे कई उपदेश ईश्वर की संकल्पना को स्पष्ट रूप से नकार देते है | अन्य तीनों धर्मों के संस्थापक/व्याख्याता ईश्वर से अपना रिश्ता स्पष्ट करते हुए नजर आते है | पर बुद्ध उस ईश्वर संकल्पना को ख़ारिज कर देते है | बुद्ध ने ईश्वर पर विश्वास करना अधम्म बताया है| ईश्वर की संकल्पना की जगह बुद्ध धम्म में नीतिमत्ता विद्यमान है | जैसे की तीनों धर्मो में ईश्वर की संकल्पना विद्यमान है वैसे ही शैतान ,भूत ,पिशाच,देवता अदि की संकल्पनाए भी विद्यमान है | बुद्ध ने इस तरह की किसी संकल्पना को अपने उपदेश में स्थान नहीं दिया |

तीसरा फर्क तीनों धर्म में आत्मा की संकल्पना नजर आती है, बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास को सम्यक दृष्टी के मार्ग की अड़चन बताया और आत्मा पर विश्वास करना अधम्म बताया |

चौथा फर्क है कि तीनों धर्मो के संस्थापक स्वयं को मोक्षदाता/पैगम्बर/ईश्वर का बेटा आदि घोषित करते है,मतलब ईश्वर के अस्तित्व को buddha is not godमान्यता देते हैं और ईश्वर के साथ अपना विशेष नाता स्थापित करते हैं,चमत्कार करते हैं जिसे न मानने पर जनता मोक्ष (मृत्यु उपरांत स्वर्ग में जाना ) प्राप्त नहीं कर सकते| बुद्ध ने अपने धम्म में अपने लिए विशेष स्थान अपने आप निर्धारित नहीं किया, बुद्ध ने अपने को एक जागृत मानव अर्थात बुद्ध कहा है, बुद्ध चमत्कार को विरोध करते है| बुद्ध ने कभी भी कही भी ऐसा कथन नहीं किया की मैं मोक्षदाता हूँ उन्होंने कहाँ कि मैं मार्गदाता हूँ |

बुद्ध ने “स्वर्ग और नर्क की कल्पना को मृत्यु उपरांत ना मानते हुए अपने कर्म से उस अवस्था को जीवित रहते हुए आप प्राप्त करते हो” ऐसे कहा है | संसार में सबसे पहले कर्म और फल का सिद्धांत देते हुए बुद्ध ने हर व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार फल मिलने का आश्वासन दिया| मोक्ष की कल्पना को छोड़ निर्वाण नामक अवस्था कि देशना कि, जो की हर व्यक्ति अपने ही जीवन में जीवित रहते हुए प्राप्त कर सकता है |इसीलिए धम्म में यही मन जाता है कि मृत्यु के पहले या मृत्यु के उपरांत आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा |

अन्ये तीनो धर्मो की कुछ विशिष्ट धार्मिक किताब है और उन्हें ईश्वर की देंन समझा और समझाया जाता है या फिर ईश्वर के किसी रिस्तेदार व्यक्ति ने लिखी हुई समझा जाता है | बुद्ध ने किसी भी धार्मिक ग्रन्थ पर विश्वास रखना इस बात को तिलांजलि देते हुए बुद्ध दीघ निकाय १/१३ मे अपने शिष्य कलामों उपदेश देते हुए कहते है:

” हे कलामों , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह तूम्हारे सुनने में आई है , किसी बात को केवल ईसलिए मत मानो कि वह परंपरा से चली आई है -आप दादा के जमाने से चली आई है , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी हुई है , किसी बातको केवल इसलिए मत मानो की वह न्याय शास्त्र के अनुसार है किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की उपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होतीहै , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह हमारे विश्वास या हमारी दृष्टी के अनुकूल लागती है,किसि बात को इसलिए मत मनो की उपरीतौर पर सच्ची प्रतीत होती है किसीबात को इसलिए मत मानो की वह किसी आदरणीय आचार्य द्वारा कही गई है .

कालामों ;- फिर हमें क्या करना चाहिए …….???? बुद्ध ;- कलामो , कसौटी यही है की स्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्या ये बात को स्वीकार करना हितकर है? क्या यह बात करना निंदनीय है ? क्या यह बात बुद्धिमानों द्वारा निषिद्ध है , क्या इस बात से कष्ट अथवा दुःख ; होता है कलमों, इतना ही नही तूम्हे यह भी देखना चाहिए कि क्या यह मत तृष्णा, घृणा ,मूढता ,और द्वेष की भावना की वृद्धि में सहायक तो नहीहै , कालामों, यह भी देखना चाहिए कि कोई मत -विशेष किसी को उनकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नही बनाता, उसे हिंसा में प्रवृत्त तोनही करता , उसे चोरी करने को प्रेरित तो नही करता , अंत में तुम्हे यह देखना चाहिए कि यह दुःख; के लिए या अहित के लिए तो नही है ,इन सब बातो को अपनी बुद्धि से जांचो, परखो और तूम्हे स्वीकार करने लायक लगे , तो ही इसे अपनाओ…….

इस छूट कि वजह से ही हर देश का बुद्ध धम्म अलग सा लगता है क्योंकि वहाँ बुद्धा शिक्षाओं के साथ साथ अपने देश कि संस्कृति और मान्यताओं को भी मिला दिया गया है

तीनों धर्मो में उनकी किताबो में जो बाते लिखी है उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता और इन धर्मो के संस्थापक ने जो कह दिया वह अंतिम सत्य कहा गया | बुद्ध ने ऐसा कोई दावा न करते हुए मानव को अपने बुद्धि से विचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की | और यही नहीं तो धम्म को कालानुरूप बदलने की स्वतंत्रता प्रदान की | ऐसी स्वतंत्रता दुनिया में कोई भी धर्म अपने अनुयायी को नहीं दे सका | इतना विश्वास किसी भी धर्म ने अपने अनुयायी पर कभी भी कही भी नहीं दिखाया है |

प्रत्येक धर्म के संस्थापक ने अपना विशेष ऐसा स्थान निर्माण कर लिया | बुद्ध ने कभी भी अपने स्वयं के लिए ऐसा विशेष स्थान का कोई हेतु नहीं रखा | बुद्ध ने अपने व्यक्तिगत जीवन को कभी भी महत्व नहीं दिया | किसी भी धर्म संस्थापक के करीब तक आप नहीं पहुच सकते | पर बुद्ध यह एक पद है और वहा तक कोई भी व्यक्ति अपने प्रयत्न से पहुच सकता है | बुद्ध ने स्वयं को चुनौती देने को अपने अनुयायी को हमेशा से ही प्रेरित किया | ऐसा करने वाला वो दुनिया का एकमात्र धर्म संस्थापक है | जिस समय बुद्ध का महापरिनिर्वाण हो रहा था तो अंतिम शब्दों में वे कहते है ” हे भिक्षुओ अगर किसी भी प्रकार की शंका आपके मन में धम्म के प्रति हो तो कृपया कहो , कही ऐसा न हो की मेरे महापरिनिर्वाण के बाद आपके मन में विचार आये की हमारा शास्ता जब यहाँ मौजूद था उस वक्त हमने उससे हमारी शंका कथन नहीं की ” | अपने जीवन की आखरी घडी में भी बुद्ध अपने अनुयायी को शंका पूछने के लिए उकसाते है | ऐसा करने वाला वो दुनिया का एकमात्र धर्म संस्थापक है | अन्ये धर्मो ने अपने धर्म के गुरु निर्माण करते हुए , उनके आदेशानुसार चलने पर लोगो को विवश कर दिया पर बुद्ध ने अपने संघ का निर्माण धम्म के आदेशो पर चलने वाला लोकसमुदाय है और वह जैसा बोलता है वैसा चलता है|

अन्य धर्मों में तो बलि प्रथा को बड़ा ही पवित्र माना पर बुद्ध ने किसी भी प्राणी की हत्या करने पर अपने धम्म में आने वाले को पहले ही पंचशील में वैसा शील रखकर प्रतिबन्ध लगाना चाहा | बुद्ध ने चार्वाक का तर्क स्वीकार किया | चार्वाक कहते है ” बलि दिए जाने वाले को यदि स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो आप लोगो ने अपने स्वयं के पिता की बलि देनी चाहिए ” | बुद्ध कहते है , ” बलि के प्राणी के जगह मेरे प्राणों की आहुति देने पर आपको ज्यादा पुण्य प्राप्त हो सकता है ” ऐसा राजा से कहने वाला बुद्ध एकमात्र धर्म संस्थापक है |

अन्य धर्मों में स्त्रियों को बड़ा ही निचला दर्जा प्रदान किया गया है ( उदाहरण देना मुझे जरुरी नहीं लगता ) | ” स्त्री वर्ग को धम्म का भिक्षु पद देकर स्त्री को समानता का दर्जा देने वाला बुद्ध सबसे पहला धर्म संस्थापक है | बुद्ध अपने उपदेश में कहते है ” स्त्री पुरुष से महान होती है क्योकि वो चक्रवर्ती सम्राट को जन्म दे सकती है | वो एक बुद्ध को जन्म दे सकती है “| ऐसे उपदेश देकर बुद्ध ने उस वक्त की सामाजिक व्यवस्था को पूरा हिला दिया | ” स्त्री अपने प्रयासों से निर्वाण पद , अर्हत पद , बुद्ध पद पर भी पहुच सकती है ” यह बुद्ध के धम्म की मान्यता है |

“मानव के कर्म से मानव ऊँचा या निचा सिद्ध होता है जन्म से नहीं ” ऐसा बुद्ध ने स्पष्ट रूप से कहा | उस वक्त के भारत में धार्मिक जातीयता को पूरी तरह से रोंदते हुए उसने अपने संघ में अछूत माने जाने वाले समाज को भी आदर प्राप्त करने का अवसर दिया, हर पद पर पहुचने का अवसर दिया |

बौद्ध धम्म ने संसार को “लोकतंत्र” व्यस्था दी जिमें केवल बहुजन अर्थात बहुसंख्यक जनता का भला होता है अन्य व्यस्ताहों कि तरह नहीं जिनमें कुछ शाशकों का भला होता है बाकि जनता दुखी रहती है|धम्म संघ के कई नियम आज कई देशो में लोकतंत्र में इस्तेमाल किये जाते है |

धर्म कौन सा मानना है ? या कौनसे ईश्वर की पूजा करनी है ? ये तो पूरी तरह व्यक्तिगत बात है पर धम्म व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक है | अकेले आदमी को धम्म की कोई आवश्यकता नहीं पर जब आदमी के बिच के संबंधो की बात आती है तब धम्म बिना समाज होना संभव नहीं है क्योकि नीतिमत्ता मतलब धम्म मतलब संविधान मतलब कानून और न्याय कि नज़र में सब सामान हैं चाहते वो किसी भी धर्म या ईश्वर को मने या न माने | इंसान के बिच के सम्बन्ध से ही धम्म की शुरुवात होती है | धम्म ( नीतिमत्ता ) के बिना समाज जंगली हो जाएगा इसलिए आपको नीतिमत्ता समाज में प्रस्थापित करने के लिए धम्म अपनाना ही पड़ता है | धर्म में दो आदमी के बिच के संबंधो को महत्व ना देते हुए स्वयं के मोक्ष को ज्यादा महत्व है |

अनीश्वरवादी या निरीश्वरवादी रहने वाले व्यक्ति को धर्म गद्दार समझता है | उदा .नास्तिक जिसका कोई अस्तित्व नहीं ), काफ़िर (जो मानवता को गद्दार हो चूका हो ) …….ऐसे शब्द निरीश्वरवादी लोगो के लिए धर्म इस्तेमाल करता है | ऐसे शब्दों से ही वे धर्म निरीश्वरवादी व्यक्ति के प्रति नफ़रत करते है ऐसा सिद्ध होता है | धम्म निरीश्वरवाद को ही मान्यता देता है और इतना ही नहीं तो विरोध का हमेशा ही स्वागत करता है |

धर्म ईश्वर , नर्क इन जैसी बातों का खौफ दिखाकर हर बात को इंसान के ऊपर जबरन थोपता है | बुद्ध अपने उपदेशो को अपने बुद्धि की कसौटी पर ताड़ना , परखना इस बात पर जोर देते है | धर्म के हिसाब से हर काम पहले से ईश्वर ने पूर्व नियोजित किये होते है |

धर्म में ऐसा भी मन जाता है कि सब ईश्वर ने पहले से तय करके रखा है,आदमी मात्र कटपुतली है,मानव के जन्म का धर्म कोई प्रयोजन स्पष्टीकरण नहीं करता | धम्म इस बात को पूरी तरह से नकारते हुए बता है कि निसर्ग व्यवस्था इंसान के कर्म व्यवस्था पर निर्भर है और मानव का जन्म उस व्यवस्था को सँभालने के लिए हुआ है |धम्म मानव के जन्म का ध्येय धम्म स्पष्ट करता है और धर्म पूजा,अर्चना,ईश्वर की स्तुति,कर्मकांड में विश्वास करना इन जैसी बातों को महत्व देता है पर धम्म आचरण को महत्व देता है | धर्म में आचरण करना आप अपने मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हो या ईश्वर के खौफ से करते हो | और धम्म में सभी को सुखी रखना और स्वयं सुखी होकर अपने निर्वाण तक पहुचने के लिए आचरण को महत्व दिया जाता है |

धर्म अज्ञानता या श्रद्धा से मान लेने पर टिका करता है जबकि धम्म हर बात को जांचने , परखने के लिए कहता है | धम्म किसी भी बात पर महज विश्वास करने की शिक्षा को नकारता है | धम्म स्वयं को भी जांचने ,परखने की कसौटी पर खरा उतरता है | धम्म गरीबी को दुखी मानता है | धम्म शील को महत्व देता है | धम्म करुणा (मानव ने मानव प्रति प्रेम करना ) की शिक्षा देता है | धम्म करुणा के भी आगे जाकर मैत्री ( सभी प्राणिमात्र से प्रेम करना ) सीख देता है |इस वजह से आपकी किसी भी प्राणी की हिंसा करने की इच्छा न हो | धम्म पंचशील देता है,जो की सारे मानव प्राणी को सुखी होने के लिए जरुरी है | धर्म ऐसी बाते समाज को नहीं सिखाता नहीं उस पर चलने का महत्व प्रतिपादन करता है |

धम्म कि बाते कभी पुरानी और गेर जरूरी नहीं होती ,जैसे जैसे विज्ञानं तरक्की करता है धम्म कि शिक्षाएं स्पस्ट होती जाती हैं जबकि धर्म कि कई शिक्षाएं गलत साबित होती जाती हैं|

ऐसे महत्वपूर्ण फर्क होने के कारन दुनिया के विद्वान बुद्ध के धम्म को धर्म मानने के लिए तैयार नहीं होते | इन जैसी बातों पर गौर किया जाए तो फिर बुद्ध का अपना पाली शब्द ‘ धम्म ‘ अधिक योग्य लगने लग जाता है | वास्तविक धर्म का पाली शब्द धम्म ही है पर दुनिया के किसी भी धर्म की तुलना बुद्ध के धम्म से करने पर बहुत ही फर्क दिखाई देने लगते है | इसलिए सवाल खड़ा हो जाता है की उसे धर्म कहना उचित होगा या नहीं ? ” एक विशिष्ट महामानव के उपदेश पर चलने वाला मानव समूह उसे उस धर्म का व्यक्ति कहा जाता है ” ऐसी कुछ सयुक्तिक व्याख्या अगर धर्म की लगाईं जाए तो ही बुद्ध के धम्म को धर्म कहने में ठीक लगेगा | वैसे आज की दुनिया में अगर धम्म को धर्म कहा जाए क्योकि वो एक भाषा का फर्क है तो ठीक है पर इतने बड़े फर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ऐसे मेरा मानना है | धन्यवाद

( अभिजीत गणेश भिवा )
http://abhijitganeshb0.blogspot.in/2011/10/blog-post.html

institution of god and religion

बहुजन मार्गदर्शक गुरु रविदास जी की जयंती पर हार्दिक बधाईयाँ एंव मंगलकामनाएं सहित प्रस्तुत है ये लेख

sant ravidas

हमारे भारत देश की पावन भूमि पर अनेक साधु-सन्तों, ऋषि-मुनियों, योगियों-महर्षियों और महामानवों  ने जन्म लिया है और अपने अलौकिक ज्ञान से समाज को अज्ञान, अधर्म एवं अंधविश्वास के अनंत अंधकार से निकालकर एक नई स्वर्णिम आभा प्रदान की है। चौदहवीं सदी के दौरान देश में जाति-पाति, धर्म, वर्ण, छूत-अछूत, पाखण्ड, अंधविश्वास का साम्राज्य स्थापित हो गया था। हिन्दी साहित्यिक जगत में इस समय को मध्यकाल कहा जाता है। मध्यकाल को भक्तिकाल कहा गया। भक्तिकाल में कई बहुत बड़े सन्त एवं भक्त पैदा हुए, जिन्होंने समाज में फैली कुरीतियों एवं बुराइयों के खिलाफ न केवल बिगुल बजाया, बल्कि समाज को टूटने से भी बचाया। इन सन्तों में से एक थे, सन्त कुलभूषण रविदास, जिन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता है।
सन्त रविदास का जन्म सन् 1398 में माघ पूर्णिमा के दिन काशी के निकट माण्डूर नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम संतोखदास (रग्घु) और माता का नाम कर्मा (घुरविनिया) था। सन्त कबीर उनके गुरु भाई थे, जिनके गुरु का नाम रामानंद था। सन्त रविदास बचपन से ही दयालु एवं परोपकारी प्रवृति के थे। उनका पैतृक व्यवसाय चमड़े के जूते बनाना था। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने पैतृक व्यवसाय अथवा जाति को तुच्छ अथवा दूसरों से छोटा नहीं समझा।
सन्त रविदास अपने काम के प्रति हमेशा समर्पित रहते थे। वे बाहरी आडम्बरों में विश्वास नहीं करते थे। एक बार उनके पड़ौसी गंगा स्नान के लिए जा रहे थे तो उन्होंने सन्त रविदास को भी गंगा-स्नान के लिए चलने के लिए कहा। इस पर सन्त रविदास ने कहा कि मैं आपके साथ गंगा-स्नान के लिए जरूर चलता लेकिन मैंने आज शाम तक किसी को जूते बनाकर देने का वचन दिया है। अगर मैं तुम्हारे साथ गंगा-स्नान के लिए चलूंगा तो मेरा वचन तो झूठा होगा ही, साथ ही मेरा मन जूते बनाकर देने वाले वचन में लगा रहेगा। जब मेरा मन ही वहां नहीं होगा तो गंगा-स्नान करने का क्या मतलब। इसके बाद सन्त रविदास ने कहा कि यदि हमारा मन सच्चा है तो इस कठौती में भी गंगा होगी अर्थात् ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। कहते हैं कि पड़ोसी ने जब इस बात का मजाक उड़ाया तो सन्त रविदास ने अपने प्रभु का स्मरण किया और चमड़ा भिगोने वाले पानी के बर्तन को छुआ और पड़ोसी को उसमें झांकने को कहा। जब पड़ोसी ने उस कठौती में झांका तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं, क्योंकि उसे कठौती में साक्षात् गंगा प्रवाहित होती दिखाई दे रही थी। उसने सन्त रविदास के चरण पकड़ लिए और उसका शिष्य बन गया। धीरे-धीरे सन्त रविदास की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई और उनके भक्ति के भजन व ज्ञान की महिमा सुनने लोग जुटने लगे और उन्हें अपना आदर्श एवं गुरु मानने लगे।
सन्त रविदास समाज में फैली जाति-पाति, छुआछूत, धर्म-सम्प्रदाय, वर्ण विशेष जैसी भयंकर बुराइयों से बेहद दुखी थे। समाज से इन बुराइयों को जड़ से समाप्त करने के लिए सन्त रविदास ने अनेक मधुर व भक्तिमयी रसीली कालजयी रचनाओं का निर्माण किया और समाज के उद्धार के लिए समर्पित कर दिया। सन्त रविदास ने अपनी वाणी एवं सदुपदेशों के जरिए समाज में एक नई चेतना का संचार किया। उन्होंने लोगों को पाखण्ड एवं अंधविश्वास छोड़कर सच्चाई के पथ पर आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया।
सन्त रविदास के अलौकिक ज्ञान ने लोगों को खूब प्रभावित किया, जिससे समाज में एक नई जागृति पैदा होने लगी। सन्त रविदास कहते थे कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सभी नाम परमेश्वर के ही हैं और वेद, कुरान, पुरान आदि सभी एक ही परमेश्वर का गुणगान करते हैं।
कृष्ण, करीम, राम, हरि, राघव, सब लग एकन देखा।
वेद कतेब, कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
सन्त रविदास का अटूट विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परोपकार तथा सद्व्यवहार का पालन करना अति आवश्यक है। अभिमान त्यागकर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करके ही मनुष्य ईश्वर की सच्ची भक्ति कर सकता है। सन्त रविदास ने अपनी एक अनूठी रचना में इसी तरह के ज्ञान का बखान करते हुए लिखा है :
कह रैदास तेरी भगति दूरी है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।
एक ऐतिहासिक उल्लेख के अनुसार, चित्तौड़ की कुलवधू राजरानी मीरा रविदास के दर्शन की अभिलाषा लेकर काशी आई थीं। सबसे पहले उन्होंने रविदास को अपनी भक्तमंडली के साथ चौक में देखा। मीरा ने रविदास से श्रद्धापूर्ण आग्रह किया कि वे कुछ समय चित्तौड़ में भी बिताएं। संत रविदास मीरा के आग्रह को ठुकरा नहीं पाए। वे चित्तौड़ में कुछ समय तक रहे और अपनी ज्ञानपूर्ण वाणी से वहां के निवासियों को भी अनुग्रहीत किया। सन्त रविदास की भक्तिमयी व रसीली रचनाओं से बेहद प्रभावित हुईं और वो उनकीं शिष्या बन गईं। इसका उल्लेख इस पद में इस तरह से है :
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।
संत रविदास मानते थे कि हर प्राणी में ईश्वर का वास है।
इसलिए वे कहते थे :
सब में हरि है, हरि में सब है, हरि आप ने जिन जाना।
अपनी आप शाखि नहीं दूजो जानन हार सयाना।।

इसी पद में सन्त रविदास ने कहा है :
मन चिर होई तो कोउ न सूझै जानै जीवनहारा।
कह रैदास विमल विवेक सुख सहज स्वरूप संभारा।

सन्त रविदास ने मथुरा, प्रयाग, वृन्दावन व हरिद्वार आदि धार्मिक एवं पवित्र स्थानों की यात्राएं कीं। उन्होंने लोगों से सच्ची भक्ति करने का सन्देश दिया।
सन्त रविदास ने मनुष्य की मूर्खता पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि वह नश्वर और तुच्छ हीरे को पाने की आशा करता है लेकिन जो हरि हरि का सच्चा सौदा है, उसे प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता है।
हरि सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत आषै रविदास।।

कुलभूषण रविदास ने सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय एकता के लिए भी समाज में जागृति पैदा की। उन्होंने कहा:
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिन्दु तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
सन्त रविदास ने इसी सन्दर्भ में ही कहा है :
मुसलमान सो दोस्ती हिन्दुअन सो कर प्रीत।
रैदास जोति सभी राम की सभी हैं अपने मीत।।
सन्त रविदास ने लोगों को समझाया कि तीर्थों की यात्रा किए बिना भी हम अपने हृदय में सच्चे ईश्वर को उतार सकते हैं।
का मथुरा का द्वारिका का काशी हरिद्वार।
रैदास खोजा दिल आपना तह मिलिया दिलदार।।
सन्त रविदास ने जाति-पाति का घोर विरोध किया। उन्होंने कहा :
रैदास एक बूंद सो सब ही भयो वित्थार।
मूरखि है जो करति है, वरन अवरन विचार।।
सन्त रविदास अपने उपदेशों में कहा कि मनुष्य को साधुओं का सम्मान करना चाहिए, उनका कभी भी निन्दा अथवा अपमान नहीं करना चाहिए। वरना उसे नरक भोगना पड़ेगा। वे कहते हैं :
साध का निंदकु कैसे तरै।
सर पर जानहु नरक ही परै।।
सन्त रविदास ने जाति-पाति और वर्ण व्यवस्था को व्यर्थ करार दिया और कहा कि व्यक्ति जन्म के कारण ऊंच या नीच नहीं होता। सन्त ने कहा कि व्यक्ति के कर्म ही उसे ऊंच या नीच होता है।
रैदास जन्म के कारणों, होत न कोई नीच।
नर को नीच करि डारि है, ओहे कर्म की कीच।।
इस प्रकार कुलभूषण रविदास ने समाज को हर बुराई, कुरीति, पाखण्ड एवं अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया और असंख्य मधुर भक्तिमयी कालजयी रचनाएं रचीं। उनकीं भक्ति, तप, साधना व सच्चे ज्ञान ने समाज को एक नई दिशा दी और उनके आदर्शों एवं शिक्षाओं का मानने वालों का बहुत बड़ा वर्ग खड़ा हो गया, जोकि ‘रविदासी’ कहलाते हैं। ।

सन्त रविदास द्वारा रचित ‘रविदास के पद’, ‘नारद भक्ति सूत्र’, ‘रविदास की बानी’ आदि संग्रह भक्तिकाल की अनमोल कृतियों में गिनी जाती हैं।  स्वामी रामानंद के ग्रन्थ के आधार पर संत रविदास का जीवनकाल संवत् 1471 से 1597 है। उन्होंने यह 126 वर्ष का दीर्घकालीन जीवन अपनी अटूट योग और साधना के बल पर जीया।

संत रविदास जी की जो बात मुझे सबसे अच्छी लगी वह यही है की उन्होंने अपनी आजीविका कमाते कमाते ही अपना दर्शन विकसित किया और संत का जीवन व्यतीत किया, उन्होंने भिक्षा का सहारा नहीं लिया|

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डॉ आंबेडकर का निम्न कोटेशन देखिये :

“मेरे अध्ययन के मुताबिक भारत देश के संतों ने कभी भी जात और छुआ-छुत को मिटाने के लिए आन्दोलन नहीं चलाया। वो मनुष्यों के बीच के संघर्ष के लिए चिंतित नहीं थे। बल्कि वो (ज्यादा) चिंतित थे मनुष्य और ईश्वर के बीच के सम्बन्ध के लिए। “~डॉ बी .आर. आंबेडकर~ सन्दर्भ:-Annihilation of castes – P-127. Author:- Dr. B.R.Ambedkar

आज हम देख रहे हैं की हमारे बहुत से लोग बहुजन  गुरुओं  ………..तक ही अपने को सीमित रखना चाहते हैं| मैं अपने ऐसे लोगों से अनुरोध करूंगा की बहुजन गुरुओं के दर्शन से थोडा आगे बढिए और  बौद्ध दर्शन को भी समझिये| मानना न मानना बाद की बात है पर खुद को सीमित मत करिए|

जरा सोचिये अगर डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धम्म में वापस लौटने को चुना है तो जरूर कोई भला ही होगा|बाबा साहब ने धम्म इसलिए चुन था ताकि उनकी अनुपस्थिथि में उनका काम धम्म करता रहेगा उनके जाने के बाद बहुजनों की तरक्की का सिलसिला नहीं रुकेगा|

हमारे लोगों की भी क्या गलती उसे तो जो मीडिया ने बता दिया वही मान लिए वो तो  मान कर बैठे हैं की अनीश्वर वाद और अहिंसा ही धम्म की शिक्षा है|

आप खुद सोचो की क्या सिर्फ अहिंसा से दुःख दूर किया जा सकता है अरे हमारे लोग तो पहले ही पिछड़े हैं कमजोर हैं और कमजोर तो पहले ही शील ,करुणा, मैत्री और अहिंसा के मार्ग पर चल रहा है वो चाहकर भी इनके विरुद्ध नहीं जा सकता|भगवान् बुद्ध एक क्रन्तिकारी हैं वो विश्व के पहले क्रन्तिकारी हैं जिन्होंने दुख का मूल कारन गलत सरकारी नीतियाँ, धार्मिक आडम्बर और आर्थिक विषमता (unequal distribution of national income) के खिलाफ न केवल आवाज़ उठाई बल्कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से दर्शन ज्ञान और मार्ग खोज जिसके प्रचार प्रसार के लिए बौद्ध भिक्खुओं की फ़ौज खड़ी की| धम्म पूंजीपतियों और शोषकों के के खिलाफ क्रांति है|

सदा ध्यान रहे मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक विषमता (unequal distribution of national income) के खिलाफ जुझने वालों में पहला नाम गौतम बुद्ध का है|यह भारी दुःख का विषय है कि गौतम बुद्ध की छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप चित्रित की गयी है जिसने अहिंसा के धर्मोपदेश के साथ पंचशील का दर्शन दिया है,जबकि सचाई यह है कि वे दुनिया के पहले ऐसे क्रांतिकारी पुरुष थे जिन्होंने आर्थिक विषमता को इंसानियत की सबसे बड़ी समस्या चिन्हित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण का युगांतरकारी अध्याय रचा|

बौद्ध धम्म का मकसद बहुत ज्यादा विस्तृत है जिसमें से एक है बहुजन हिताए बहुजन सुखाय है बहुजन का दुःख दूर करना है|पता नहीं हमारे लोग क्यों नहीं समझ रहे की विरोधी धम्म के कमजोर पक्ष को उजागर कर रहे हैं और शक्तिशाली पक्ष को दबा रहे हैं|महामानव बुद्ध और बहुजन गुरुओ दोनों ने जातिवाद और वर्णव्यस्था की बुराई की है और मानव कल्याण को प्राथमिकता दी| हम सभी जानते हैं की बहुजनों का ही नहीं समस्त भारतवर्ष का समस्त मानवता है भला जाती भेद नस्ल भेद और वर्णव्यस्था का दमन करने में हैं| सभी बहुजन गुरुओं ने भी अपने सरे जीवन इसी जातिवाद और वर्णव्यस्था और मनुवाद की खिलाफत की, अपने लेखन या दर्शन में मानव कल्याण के बातें की| बौद्ध धम्म मार्ग में भी जातिवाद और वर्णव्यस्था और मनुवाद की न केवल खिलाफत की बल्कि उसके मुकाबले सम्पूर्ण व्यस्था और कामयाब क्रांति खड़ी की| धम्म ने जीवन की हर पहलों पर व्यस्था दी| हमारे समस्या ये है की धम्म को ठीक से मीडिया में समझाने नहीं दिया जा रहा|

भारत की 80% बहुजन असल में बौध जनता है जिसे विरोधियों ने षडियंत्र के तहत अलग अलग महापुरुष देकर अलग अलग खूंटे से बांध दिया है|इसे हमारे लोग समझ नहीं पा रहे हैं, जब हम बुद्धा की बात करते हैं तो वे वाल्मीकि, रविदास, कबीर अदि की बात करते हैं, निसन्देह ये भी बुद्धा के समतुल्य हैं, पर जब तक हम एक सर्वमान्य सिद्धांत को नहीं पकड़ेंगे एक झंडे के नीचे नहीं आ पाएंगे|आपसे प्रार्थना है की मानो या न मानो पर धम्म को जानो तो सही|

हमारी मुक्ति केवल मानव और इश्वर के सम्बन्ध की चर्चा से नहीं होगी|क्या आप कभी ये नहीं सोचते की बौद्ध साम्राज्य के पतन से लेकर आंबेडकर क्रांति के बीच के लगभग दो हजार सालों में कोई भी इश्वर बहुजनों को बचने क्यों नहीं आया, क्यों उस इश्वर ने इतनी सदियों तक अपने मानवों की सुध नहीं ली| इश्वर का सिद्धांत निसंदेह व्यावहारिक रूप से जरूरी है आम जनता कभी ईश्वरवाद को नहीं छोड़ पायेगी पर बौध धम्म में ईश्वरवाद का प्रश्न तो अव्याकृत प्रश्न है| आप मनो या न मानो ये आपकी इच्छा है बौध धम्म मार्ग में इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं| इसके आलावा बौध धम्म में बाकि की बहुत से बातें ऐसी हैं जो बहुजन गुरुओं से कहीं ज्यादा आगे का दर्शन ज्ञान और मार्ग उपलब्ध करते हैं| बहुजन गुरुओं को छोड़ना नहीं है बल्कि हमें बस इतना समझना है की उनका ज्ञान जिस भी बिंदु पर संशयात्मक स्तिथि पैदा करता है वहां बुद्धा धम्म ज्ञान हर संशय का संतुस्ठ उत्तर उपलब्ध करता है|बहुजन गुरुओं और बौध धम्म दोनों एक दुसरे के पूरक हैं दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करवाते हैं |

अपने आप को कहीं भी सीमित न करो, अगर वाकई अपना उद्धार करना है तो सारा दर्शन खंगाल डालो यहाँ तक की सभी अन्य धर्म के सभी ग्रन्थ भी और तभी आप फैसला कर पाओगे की क्या सही है क्या गलत|

बुद्ध ने अपनी शिक्षा मानने से पहले परखने की अनुमति दी है ऐसा संसार के किसी भी धर्म के प्रवर्तक ने नहीं किया …Ishwar Chand Baudh

बुद्ध ने अनुयाईयो अपनी शिक्षा मानने से पहले परखने की अनुमति दी है ऐसा संसार के किसी भी धर्म के प्रवर्तक ने नहीं किया

बुद्ध अनुयायी भागवान बुद्ध को प्रसन्न करने के लिए, उनसे कुछ मांगने के लिए, स्वर्ग के लालच और नरक के भय से डरकर पूजा नहीं करते हैं| उनकी पूजा बुद्ध के प्रति आभार प्रकट करने के लिए होती है|वास्तव में ये पूजा नहीं है ये एल शिक्षक का उसके शिष्यों का सम्मान है|भगवन बुद्धा वास्तव में महा मानव थे ब्राह्मणी मिलावट के कारन बुद्धा को पारलोकिक शक्ति स्तापित किया जाने लगा और धम्म का असली रूप ही परवर्तित हो गया और यही रूप कई देशों में गया|400-LPA090611_4

स्कुलो में शिक्षक हमें पढाते हैं, जिसके लिए उनको वेतन मिलता है, हम उनको नमस्कार करके तथा चरण-स्पर्श करके अपना आभार और आदर प्रकट करते हैं, आभार प्रकट न करना अशिष्टता माना जाता है, तो फिर गौतम बुद्ध तो ऐसे आनोखे शिक्षक थे, जो बुद्धत्व प्राप्ति के बाद पैंतालिस वर्षो तक धम्म्चारिका करते रहे और लोगो को धम्म सिखाते रहे| वह चाहते तो बुद्धत्व प्राप्ति के बाद किसी आश्रम में या हिमालय पर जाकर शेष जीवन निर्वाण का आनंद लेते हुए बिता सकते थे. लेकिन उन्होंने अनंत करुना और मैत्री के साथ लोगो को धम्म बांटा| अगर वो ऐसा नहीं करते तो आज यह अदभुत धम्म कैसे मिलता ?इसलिए धम्म मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक व्यक्ति भागवान बुद्ध के प्रति कृतज्ञता से भर उठाता है और उसी कृतज्ञता और आभार को प्रकट करने के लिए पूजा करता है| बुद्ध का ज्ञान इतना प्रभावी है की, आज भी बैज्ञानिक युग में उतना ही प्रभाव है, जितना की भागवान बुद्ध ने २६०० वर्ष पहले उपदेशित किया था| तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशो में सबसे बड़ी बात कही है की “किसी बात को इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी है, या किसी साधू संत ने कही है, किसी बात को इसलिए भी मत मानो की आपको प्रिय लगने वाले किसी व्यक्ति ने कही है. किसी भी बात को मानने से पहले उसे तर्क की कसौटी पर कस कर देखो की वह स्वं के हित के साथ मानवमात्र के हित में है या नहीं|” अर्थात किसी व्यक्ति या वर्ग के हित के लिए किसी दुसरे व्यक्ति या वर्ग का अहित करना घोर सामाजिक अन्याय है |

बुद्ध की अपने अनुयाईयो को स्वत्रन्त्रता अपनी शिक्षा मानने से पहले परखने की अनुमति दी है वहीँ दूसरी तरफ संसार के किसी भी धर्म के प्रवर्तक ने अपने मत को जाच परख करने की किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता नही दी है,उनकी शिक्षा पर आस्था या ईमान लाना ही उस धर्म की पहली शर्त रख दी जाती है| संसार के सारे धर्मो में बुद्ध ने ही अपने मत को जांच परख करने के बाद ही अपनाने या स्वीकार करने की स्वतंत्रता दी है| ये उनके “बुद्ध धम्म” के अपने अनुयायियों की लिए दिमाक को खुला रखने का महान सन्देश है|

 

बुद्ध दीघ निकाय १/१३ मे अपने शिष्य कलामों उपदेश देते हुए कहते है:
” हे कलामों , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह तूम्हारे सुनने में आई है , किसी बात को केवल ईसलिए मत मानो कि वह परंपरा से चली आई है -आप दादा के जमाने से चली आई है , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी हुई है , किसी बातको केवल इसलिए मत मानो की वह न्याय शास्त्र के अनुसार है किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की उपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होतीहै , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह हमारे विश्वास या हमारी दृष्टी के अनुकूल लागती है,किसि बात को इसलिए मत मनो की उपरीतौर पर सच्ची प्रतीत होती है किसीबात को इसलिए मत मानो की वह किसी आदरणीय आचार्य द्वारा कही गई है .

कालामों ;- फिर हमें क्या करना चाहिए …….???? बुद्ध ;- कलामो , कसौटी यही है कीस्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्या ये बात को स्वीकार करना हितकर है? क्या यह बात करना निंदनीय है ? क्या यह बात बुद्धिमानों द्वारा निषिद्ध है , क्या इस बात से कष्ट अथवा दुःख ; होता है कलमों, इतना ही नही तूम्हे यह भी देखना चाहिए कि क्या यह मत तृष्णा, घृणा ,मूढता ,और द्वेष की भावना की वृद्धि में सहायक तो नहीहै , कालामों, यह भी देखना चाहिए कि कोई मत -विशेष किसी को उनकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नही बनाता, उसे हिंसा में प्रवृत्त तोनही करता , उसे चोरी करने को प्रेरित तो नही करता , अंत में तुम्हे यह देखना चाहिए कि यह दुःख; के लिए या अहित के लिए तो नही है ,इन सब बातो को अपनी बुद्धि से जांचो, परखो और तूम्हे स्वीकार करने लायक लगे , तो ही इसे अपनाओ…….

By,

Ishwar Chand Baudh

14-FEB-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: मनुवाद,भारत के पिछड़े बहुजन,उनका आरक्षण का हक़, और जमनी सच्चाई…समयबुद्धा

arakshan justice equality

मनुवाद,भारत के पिछड़े बहुजन,उनका आरक्षण का हक़, और जमनी सच्चाई

बौद्ध धम्म पर तो मैं अक्सर ही बात करता हूँ पर कभी कभी जीवन में ऐसे मौके आ जाते हैं जब बौद्ध धम्म के आलावा बाकि ज्वलंत बहुजन मुद्दों पर चर्चा करना जरूरी ही नहीं अनिवार्य हो जाता है|ऐसा ही एक ज्वलंत मुद्दा है मनुवाद,भारत के पिछड़े बहुजन,उनका आरक्षण का हक़, और जमनी सच्चाई |आज इस पूर्णिमा पर मैं इसी मुद्दे पर चर्चा करूंगा|

“सदेव ध्यान रखना आरक्षण का काम केवल भारत के बहुजनों की गरीबी हटाना नहीं है,बल्कि इसका काम है शासन प्रशासन में वंचित जातियों की भागीदारी सुनिश्चित करना है जिससे उनको न्याय मिल सके”.

कमाल कि बात देखिये कि आरक्षण का विरोध करने  वाले जाती और वर्णव्यस्था का विरोध नहीं करते, वो ये क्यों नहीं समझते कि आरक्षण कि जड़ में मनुवाद/जातिवाद/वर्णव्यस्था का अन्याय है, जब तक ये रहेंगे तब तक आरक्षण चलेगा| वैसे भी आरक्षण क्या है आरक्षण उस एक गिलास पानी कि तरह है जो लुटे पिटे अधमरे मनुष्य को दिया जाए| क्या एक गिलास पानी से उस अधमरे मानव  का भला हो पायेगा, नहीं ,उसको सम्पूर्ण इलाज चाहिए और ये दयाशून्य लोग इलाज तो दूर कि बात है एक गिलास पानी नहीं देना चाहते|  इन महास्वार्थी लोगों को वहाँ मिर्ची लगती है जब इनकी निकम्मी संतान कुछ नहीं करती और मेहनती बहुजन कमाने खाने लगता है|

एक उदहारण देखिये  जब एक बहुजन एक सेकंड हेंड छोटी कार खरीद लेता है तब ये कहते हैं कि इनको अब आरक्षण कि जरूरत नहीं ये बहुत ज्यादा कामयाब हो गए हैं| अरे महास्वार्थीयों अगर किसी बहुजन ने सेकंड हेंड  छोटी कार खरीद भी ली तो तुम्हारे सवर्णों को देखो वो एस0यु0वि0,लक्जरी सेडान और हेलिकॉप्टर खरीद रहे हैं|सत्ता कि चाबी तो आज भी बहुजन विरोधियों के हाथों में है| अरे जलने वाले मूर्खों तुम क्यों नहीं समझते कि आज कि सेकेण्ड हैण्ड कार पुराने ज़माने के पैदल बहुजन और आज के एस यु वि, लक्जरी सेडान और हेलिकॉप्टर  पुराने ज़माने कि घोडा गाड़ी के बराबर है| फर्क वहीँ का वहीँ है बल्कि इतना बढ़ गया है कि पटना मुश्किल है|अगर बहुजन दस कदम आगे बढ़ें है तो सवर्ण हज़ार कदम आगे बढ़ें हैं|आज बहुजन किसी माल में एक दूकान नहीं ले सकता और सवर्णों के तो पूरे पूरे कई माल होते हैं| आरक्षण से कुछ खास लाभ नहीं हो रहा है ये बात केवल विरोधियों को ही नहीं हमारे लोगों को भी समझने कि जरूरत है|आरक्षण का लाभ तब है जब सभी संसाधनों में हिस्सेदारी सुनिश्चित हो, क्या मीडिया क्या इंडस्ट्री क्या राजनीति, केवक सरकारी नौकरियों से कुछ नहीं हो रहा|

समस्त मीडिया में आजकल आरक्षण की खिलाफत की एक जबरदस्त लहर चल रही है, कोई ऐसे संभव जगह नहीं बची जहाँ इसका विरोध और इसको गिराने का संगर्ष न हो रहा हो| आखिर ये झोपड़ा इन थपेड़ों को कब तक सहेगा ? जब बात आरक्षण की होती है तो सब भारतीय संविधान द्वारा अनुसूचित-जाती, जनजाति एवं अतिपिछड़ा वर्ग को मिले उस आरक्षण या विशेष अधिकारों की ही बात करतें हैं जिन्हें लागू हुए मुश्किल से 60 वर्ष ही हुए हैं ,कोई उस आरक्षण की बात नही करता जो पिछले 3000 वर्षों से भारतीय समाज में लागू था, जिसके कारण ही इस आरक्षण को लागू करने की आवश्यकता पड़ी|उस अन्यायी आरक्षण के चलते चंद मनुवादी हजारों सालों से मलाई लूट रहे हैं और बहुजन दाने दाने को मोहताज़, भूखे, नंगे, बेइज्जत जीने मरने को को मजबूर हुए |

आज हम जिस संविधान का पालन कर रहें है वो डॉ आंबेडकर द्वारा बनाया गया ”भारतीय गणराज्य का संविधान” है| ये 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ उससे पहले जो संविधान इस देश में लागू था जिसका पालन सभी राजा-महाराजा बड़ी ईमानदारी से करते थे उस संविधान का नाम था ”मनुस्मृति”| मनुस्मृति नमक संविधान में कैसे कैसे कानून थे जानने के लिए कुछ उदहारण देखिये:
– संसार में जो कुछ भी है सब ब्राह्मणों के लिए ही है क्यूंकी वो जन्म से ही श्रेष्ठ है(मनुस्मृति 1/100)
– राजा का ये कर्त्तव्य है की वह ब्राह्मणों की जीविकी निश्चित करे|जिस तरह पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है उसी प्रकार राजा को भी ब्रह्मण की आजीविका के साधन का ध्यान रखना चाहिए (मनुस्मृति 7/135)
– किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्ये होता है , सौ वर्ष का वृद्ध क्षत्रीय भी १० वर्ष के बालक ब्रह्मण को पिता के बराबर ही समझे (मनुस्मृति 2/138)
– धार्मिक मनुष्या इन नीच जाती वालों के साथ बातचीत ना करें उन्हें ना देखें (मनुस्मृति 10/52)
– यदि कोई नीची जाती का व्यक्ति ऊंची जाती का कर्म करके धन कमाने लगे तो राजा को यह अधिकार है की उसका सब धन छीन कर उसे देश से निकल दे (मनुस्मृति 10/95)
– बिल्ली नेवला चिड़िया मेंडक उल्लू और कौवे की हत्या में जितना पाप लगता है उतना ही पाप शूद्र यानि SC/ST/OBC की हत्या में है (मनुस्मृति 11/131 )
– शूद्र यानि SC/ST/OBC द्वारा अर्जित किया हुआ धन ब्रह्मण उससे जबरदस्ती छीन सकता है क्यूंकि उसे धन जमा करने का कोई अधिकार ही नहीं है (मनुस्मृति 8/416 )
– स्वामी के द्वारा छोड़ा गया शूद्र भी दासत्व से मुक्त नही क्यूंकी यह उसका कर्म है जिससे उसे कोई नही छुड़ा सकता (मनुस्मृति 8/413)
– चाहे वो खरीदा गया हो या नहीं लेकिन शूद्रों से सेवा ही करनी चाहिए क्योंकि शूद्रों की उत्पत्ति ब्रहमा ने ब्राह्मणों की सेवा के उद्देश्य से ही की है (मनुस्मृति 8/412)
– इन शूद्रों को शमशान,पहाड़ और उपवनों में ही अपनी जीविका के कर्म करते हुए निवास करना चाहिए (मनुस्मृति 10/49)
– इन नीच जाती वालों के लिए कफ़न ही इनका वस्त्र है, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें,इनके आभूषण लोहे के हों और वे सदा भ्रमन की करते रहे तथा एक स्थान पर बहुत दिनों तक न रहें (मनुस्मृति 10/52)

आधुनिक संविधान के निर्माता अंबेडकर ने सबसे पहले 25 दिसंबर 1927 को हज़ारों लोगों के सामने इस ”मनुस्मृति” नामक संविधान को जला दिया ,क्यूंकी ऐसे अन्यायी संविधान की कोई आवश्यकता नही थी| भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए दिया गया क्यूंकी इस देश की 85 प्रतिशत शूद्र जनसंख्या को कोई भी मौलिक अधिकार तक प्राप्त नही था,सार्वजनिक जगहों पर ये नही जा सकते थे मंदिर में इनका प्रवेश निषिध था सरकारी नौकरियाँ इनके लिए नहीं थी , ये कोई व्यापार नही कर सकते थे , पढ़ नहीं सकते थे , किसी पर मुक़दमा नही कर सकते थे , धन जमा करना इनके लिए अपराध था , ये लोग टूटी फूटी झोपड़ियों में, बदबूदार जगहों पर, किसी तरह अपनी जिंदगिओं को घसीटते हुए काट रहे थे|और यह सब ”मनुस्मृति” जैसे अन्य कई हिंदू धर्मशास्त्रों के कारण ही हो रहा था कुछ उदाहरण देखिए-

– अगर कोई शूद्र वेद मंत्र सुन ले तो उसके कान में धातु पिघला कर डाल देना चाहिए- गौतम धर्म सूत्र 2/3/4….
– सब वर्णों की सेवा करना ही शूड्रों का स्वाभाविक कर्तव्य है (गीता,18/44)
– जो अच्छे कर्म करतें हैं वे ब्राह्मण ,क्षत्रिय वश्य, इन तीन अच्छी जातियों को प्राप्त होते हैं जो बुरे कर्म करते हैं वो कुत्ते, सूअर, या शूद्र जाती को प्राप्त होते हैं (छान्दोन्ग्य उपनिषद् ,5/10/7)

– पूजिए विप्र ग्यान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ग्यान प्रवीना,(रामचरित मानस)
– ब्राह्मण दुश्चरित्र भी पूज्यहनीए है और शूद्र जितेन्द्रीए होने पर भी तरास्कार योग्य है (पराशर स्मृति 8/33)
– धोबी , नई बधाई कुम्हार, नट, चंडाल, दास चामर, भाट, भील, इन पर नज़र पद जाए तो सूर्य की ओर देखना चाहिए इनसे बातचीत हो जाए तो स्नान करना चाहिए (व्यास स्मृति 1/11-13)
– निर्माण,चित्रकारी,कारीगरी,कृषी तथा पशुपालन यह सब नीच कर्म है(अनुशासन पर्व अ० २३श्लोक १४और२४—) (अनुशासन पर्व अ०90श्लोक६/८/9) (अनुशासन पर्व अ०135श्लोक 11)

ये उन असंख्य नियम क़ानूनों के उदाहरण मात्र थे, जो आज़ाद भारत से पहले देश में लागू थे| ये अँग्रेज़ों के बनाए क़ानून नहीं थे ये हिंदू धर्म द्वारा बनाए क़ानून थे जिसका सभी हिंदू राजा पालन करते थे| इन्ही नियमों के फलस्वरूप भारत में यहाँ की विशाल जनसमूह के लिए उन्नति के सभी दरवाजे बंद कर दिए गये या इनके कारण बंद हो गये, सभी अधिकार, या विशेष-अधिकार, संसाधन, एवं सुविधायें कुछ लोगों के हाथ में ही सिमट कर रह गईं, भारत के जनता में आपसी फूट इतनी बहुतायत में हो गई की विदेशी आक्रमण जैसे महा संगठन कारक के आगे भी लोग संगठित होने को तयार नहीं हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारत गुलाम हुआ| हाय! विशुद्ध भारतीय मौर्य साम्राज्य की हार के साथ ही भारत का भाग्य फूट गया|

उनमे क्षमता थी तो उन्होंने अपना संविधान चलाया और क्रूर से क्रूर कानून बनाये| हममे क्षमता थी हमारे बाबा साहेब में क्षमता थी इसलिए उन्होंने आरक्षण का हमारा हक़ छीन लिए| अब ये बताओ की उन हजारों जुल्म करने वाले कानून को हजारों साल हमने सहा तो ये लोग इस जरा से हक मांगने को नहीं सह पा रहे हैं| एक और बात डॉ आंबेडकर ने तो आरक्षण माँगा ही नहीं था उन्होंने तो सेपरेट इलेकट्रेट और सेपरेट सेटलमेंट माँगा था, आरक्षण तो हमपर थोपा गया है|

पूना समझौता के बाद अस्पृश्यता और जाती निर्मूलन के लिए प्रस्ताव आये और कानून बने इसी का परिणाम “आरक्षण” है| सवर्णों को हमारा आरक्षण बिलकुल बर्दास्त नहीं हो पा रहा है, वे इसपर हमले पर हमले कर रहे हैं खासकर मीडिया की मदत से लोगों को इसके खिलाफ भड़का रहे हैं |४ अगस्त २०११ के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आरक्षण के खिलाफ जनहित याचिका की खबर पढ़ी, जिसमें ये मांग की गई थी की फलां फलां जातीं बहुत अधिक शक्षम हो गईं हैं,अब इन्हें और आरक्षण की जरूरत नहीं है | इस देश में हमारे असहाए और गरीबों के पास इसके आलावा कुछ भी तो नहीं | ध्यान रहे हमारे पास आरक्षण के अलावा कुछ भी शक्ति नहीं है और ये भी कोई खास ज्यादा बड़ी शक्ति नहीं है, इसके बल पर अदिकतम सफलता जो हमने पाई है वो ये है की कही कोई नौकरी कर पाते है और चैन की रोटी नौकरी करें वाली पीड़ी को मिल जाती है पर इनको देखो :varn vyastah

०. सरकार में बहुमत
१. पुलिस में बहुमत
२. सेना की कमान इनके हाथ में
३. बड़े बड़े घर कोठिया फार्म हाउस इनके
४. स्विस बैंक में बड़ी दौलतें इनकी
५. मंदिरों में आपार धन सम्पदा इनकी
६. ज्ञान ध्यान के साधन और मौके इनके
७. शिक्षा को जानके इतना महंगा कर दिया है ताकि हम न ले पाए,सरकारी स्कूल की पढाई आज कारगर नहीं रह गई है
८. बड़े बड़े सेठ पूँजी-पती धन कुबेर इनके पक्ष में , हमारा तो कोई धन बल भी नहीं
९. निजीकरण या प्राइवेट-करन करके सभी नौकरियां धीरे धीरे ख़तम कर दी हैं ,प्राइवेट नौकरी में आरक्षण नहीं चलता |

अब ऐसी स्तिथि आ रही है की आरक्षण केवल कागजों में ही रह जायेगा, धरातल पर इसका कोई फायदा नहीं होगा|आरक्षण से भरने वाले सरकारी पद खाली रखे जाते हैं वहाँ पर बहुजनों को नौकरी दी ही नहीं जाती ऐसे पदों को ये लिख कर खली छोड़ दिया जाता है कि ” उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहे” |

संविधान को सही से लागू नहीं कर रहे हैं बहुजन विरोधी और ऊपर से शोर मचा रहे हैं की आरक्षण इनके हकों के लिए खतरा है, चित्त भी इनकी पट्ट भी इनकी| जब ऐसे संसथान जैसे नौकरी करने कि कम्पनियाँ ,स्कूल, कॉलेज आदि प्राइवेट हो जायेगे जहाँ आरक्षण नहीं चलता तो आरक्षण तो वसे ही ख़तम हो जायेगा|हमपर है क्या? कुछ भी तो नहीं एक आरक्षण के सिवा वह भी छीन जायेगा तो हमारे पिछड़े लोग के लिए बढ़ने के सब मौके ख़तम हो जायेंगे ,खली हाथ दूसरों की गुलामी को मजबूर हो जायेगे, और यही तो इनका मकसद है|

हाँ ये और बात है की कुछ बहुजन लोग सक्षम हो गए हैं जिन्हें मीडिया में क्रीमी लेयर कहा जाता है वो अच्छे स्कूल और कालेज में पड़ कर खुद को कामयाब बनाये रखें | पर ऐसे लोग बहुत कम है और अगर हैं भी तो वे इतने दिलदार नहीं हूए हैं की अपने बाकि के समाज के लिए चैरिटी करें | जबकि ये लोग कई तरह के ट्रस्ट,हॉस्टल,मंदिर,स्कोलरशिप, एन०जी0ओ0 और चैरिटी जैसे अनेकों संगठन बना कर अपनी कौम को वैसे ही आरक्षण से कहीं ज्यादा लाभ पंहुचा पा रहे है|

बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने अपने परिनिर्वाण से पहले का हमारे लिए निम्न अंतिम कथन कहा था:

‘‘मेरे लोगों से कह देना, नानक चन्द! मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेषकर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धेखा दे दिया। मैं बड़ी कठिनाइयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है। कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हे इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा। जाओ जाकर उनसे कह दो जाओ जाकर उनसे कह दो.. जाओ जाकर उनसे कह दो’’

उन्होंने तीन बार कहा। यह कह कर वह सिसकने लगे, देखते ही देखते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

पुराने समय में गुरुकुल शिक्षा व्यस्था के माध्यम से ज्ञान केवल सत्ताधारी और उसके सहयोगियों के बीच ही सदियों तक घूमता रहा|परिणाम आम जनता कभी समझ ही नहीं पायी की दिन रात मेहनत और ईमानदारी से जीने के बावजूद उनके हिस्से सिर्फ महा-दुःख ही क्यों आये|आखिरकार डॉ आंबेडकर ने संविधान में सबके लिए सार्वजानिक शिक्षा की व्यस्था और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर दिया|परिणाम ये हुआ की आम जनता समझने लगी की उनके जीवन का दुःख किसी इश्वर का दिया नहीं अपितु गलत सरकारी निति की वजह से है जिसका समाधान भी इश्वर नहीं राजनीति ही करेगी और उन्होंने राजनीती हिस्सा लेना शुरू कर दिया|ये बात इस देश के धम्म-विरोधियों को को अच्छी नहीं लगी और सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था (सरकारी स्कूल) आज संविधान लागू होने के लगभग साठ साल के अन्दर ही महत्व हीन कर दी गई और गुरुकुल शिक्षा व्यस्था को अंग्रेजी स्कूल के नए रूप में लागू कर दिया गया|सरकारी स्कूल में अक्सर देखा गया है की न तो वहां पढ़ाने वाले हैं न पढने वाले|पहले ज़माने के अनपढ़ के समतुल्य आज सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था से निकले व्यक्ति से की जा सकती है और गुरुकुल के से पास सत्ताधारी की तुलना आज के प्राइवेट स्कूल से पास हो रहे लोगों से की जा सकती है|

मैं मानता हूँ कि केवल दो परसेंट लीडर स्वाभाव के छात्र ही स्वेछा से पढाई करते है बाकि ९८% बहुजन छात्र लचर शिक्षा व्यस्था से केवल मजदूर बनकर निकलते हैं |जो भी हो अभी तक एक अच्छाई है कि स्कूल शिक्षा के अंत में सरकारी और प्राइवेट स्कूल दोनों को सामान बोर्ड पेपर देने होते हैं | साथियों आज जब विद्या और ज्ञान के दरवाजे खुले हुए हैं तो क्यों नहीं ज्ञान ले लेते?क्या सत्ता परिवर्तन का इंतज़ार है जब संविधान बदल दिया जायेगा और फिर दमन निति चालू हो जाएगी |

आपके विरोधी दिन रात आपको नाकामयाब करने में लगे हैं क्या आप अपने को बचाने को भी खड़े नहीं होगे, मुकाबला तो दूर कि बात है|अब फैसला आपके हाथों में है कि आप संगर्ष करते हो या निकम्मेपन में टाइम पास कर के गुलामी स्वीकार करते हो|

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…समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

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बाबा साहब आंबेडकर ने कहा था कि “जुल्म करने वालों से जुल्म सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता है|” इस तथ्य को समझने के लिए पढ़िए बहुजन लेखक मुंशी प्रेमचंद कि कहानी “कफ़न”…Team SBMT

hum khud jimmedarएक बार ब्रिटेन में बहुत भयानक अकाल पड़ा । लोग त्राहि-त्राहि कर उठे । लाखों लोग भोजन और काम की तलाश में इधर से उधर भटकने लगे । एक जमींदार था । जो भी भोजन की तलाश में उसके पास आता वह उससे लकड़ियों का एक ढेर इधर से उधर रखवाता और बदले में भोजन देता था । यह प्रक्रिया महीनों तक चलती रही । वह लकड़ियों का ढेर सैकड़ों बार इधर से उधर और उधर से इधर हो चुका था । एक दिन तंग आ चुकी जमींदार की लड़की ने उससे पूछ ही लिया । आप परेशान लोगों को सीधा-सीधा भोजन क्यों नहीं दे देते ! क्यों बेवजह इस लकड़ियों के ढेर को इधर से उधर रखवाते हैं ? जमींदार पिता ने उत्तर दिया- अगर मैंने उन्हें बिना काम करवाये भोजन दिया तो बिना मेहनत किए खाने के कारण उनमें हीनभावना आएगी और उनका जमीर मर जायेगा और जिस देश के लोगों का जमीर मर जाता है वह देश कभी महान नहीं बन सकता ।

आज भारत के बहुजनों को ऐसे ही कई लालच देकर जैसे बेरोजगारी भत्ता, मध्यान भोजन, अदि अदि देकर और साथ में शिक्षा न देकर लचर मजदूर बनाया जा रहा है जो गुलामी करने को मजबूर होगा|

बुद्ध की सारी जीवनप्रक्रिया को एक शब्द में हम रख सकते हैं, वह है, अप्रमाद, अवेयरनेस, जागकर जीना।”अप्रमाद(जागरूक) अमृत का पथ है और प्रमाद(आलस्य) मृत्यु का।”

दलितों कि दुर्दशा में जितना हाथ ब्राह्मणवाद का है उतना ही हाथ उनकी खुद के निकम्मेपन का भी है| निकामा आदमी मरे हुए आदमी के सामान होता है, शायद इसीलिए ब्राह्मणवाद ने ऐसे आदमी को मारने में कोई पाप नहीं समझा|बाबा साहब आंबेडकर ने भी कहा था कि जुल्म करने वालों से जुल्म सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता है| इस तथ्ये को समझने के लिए पढ़िए बहुजन लेखक मुंशी प्रेमचद कि कहानी  “कफ़न”

अगर कहानी नहीं पढ़ना चाहते तो यु  ट्यूब  पर जाने माने अभिनेता पंकज  कपूर  द्वारा अभिनय किया गया ते नाटक ही देख लो  लिंक इस प्रकार है 

कफ़न- प्रेमचंद

झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।

घीसू ने कहा-मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।

माधव चिढक़र बोला-मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?

‘तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!’

‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।’

चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना काम-चोर था कि आध घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढक़र लकडिय़ाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल जरूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिये जाते थे। संसार की चिन्ताओं से मुक्त कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाये थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आयी थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी, यह दोनों और भी आरामतलब हो गये थे। बल्कि कुछ अकडऩे भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निब्र्याज भाव से दुगुनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इन्तजार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोयें।

घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा-जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!

माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला-मुझे वहाँ जाते डर लगता है।

‘डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।’

‘तो तुम्हीं जाकर देखो न?’

‘मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं; और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!’

‘मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!’

‘सब कुछ आ जाएगा। भगवान् दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।’

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गयीं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताजी थी, बोला-वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लडक़ी वालों ने सबको भर पेट पूडिय़ाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूडिय़ाँ खायीं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो, खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौडिय़ाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिये जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!

माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मजा लेते हुए कहा-अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।

‘अब कोई क्या खिलाएगा? वह जमाना दूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। सादी-ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, खर्च में किफायत सूझती है!’

‘तुमने एक बीस पूरियाँ खायी होंगी?’

‘बीस से ज़्यादा खायी थीं!’

‘मैं पचास खा जाता!’

‘पचास से कम मैंने न खायी होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।’

आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों।

और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

2

सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों जोर-जोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?

बाप-बेटे रोते हुए गाँव के जमींदार के पास गये। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा-क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।

घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा-सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुजर गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गये। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।

जमींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब गरज पड़ी तो आकर खुशामद कर रहा है। हरामखोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दण्ड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपये निकालकर फेंक दिए। मगर सान्त्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।

जब जमींदार साहब ने दो रुपये दिये, तो गाँव के बनिये-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू जमींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिये, किसी ने चारे आने। एक घण्टे में घीसू के पास पाँच रुपये की अच्छी रकम जमा हो गयी। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।

गाँव की नर्मदिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।

3

बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गयी है, क्यों माधव!

माधव बोला-हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।

‘तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें।’

‘हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?’

‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।’

‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’

‘और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।’

दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बजाज की दूकान पर गये, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गयी। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गये। वहाँ जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा-साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।

उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आयी और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे।

कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गये।

घीसू बोला-कफ़न लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।

माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रुपये क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!

‘बड़े आदमियों के पास धन है, फ़ूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?’

‘लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?’

घीसू हँसा-अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।

माधव भी हँसा-इस अनपेक्षित सौभाग्य पर। बोला-बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो खूब खिला-पिलाकर!

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूडिय़ाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबखाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया खर्च हो गया। सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे।

दोनों इस वक्त इस शान में बैठे पूडिय़ाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।

घीसू दार्शनिक भाव से बोला-हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?

माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की-जरूर-से-जरूर होगा। भगवान्, तुम अन्तर्यामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।

एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला-क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?

घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था।

‘जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?’

‘कहेंगे तुम्हारा सिर!’

‘पूछेगी तो जरूर!’

‘तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!’

माधव को विश्वास न आया। बोला-कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिये। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।

‘कौन देगा, बताते क्यों नहीं?’

‘वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएँगे।’

‘ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाये देता था।

वहाँ के वातावरण में सरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।

और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मजे ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूडिय़ों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।

घीसू ने कहा-ले जा, खूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!

माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा-वह बैकुण्ठ में जाएगी दादा, बैकुण्ठ की रानी बनेगी।

घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला-हाँ, बेटा बैकुण्ठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुण्ठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं?

श्रद्धालुता का यह रंग तुरन्त ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।

माधव बोला-मगर दादा, बेचारी ने ज़िन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा। कितना दु:ख झेलकर मरी!

वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।

घीसू ने समझाया-क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि

munshi premchand

वह माया-जाल से मुक्त हो गयी, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिये।

और दोनों खड़े होकर गाने लगे-

‘ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी।

पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताये, अभिनय भी किये। और आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।

मित्र के बारे में गौतम बुद्ध के विचार-मित्र और अमित्र- VRUND PUROHIT

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मित्र के बारे में गौतम बुद्ध के विचार-मित्र और अमित्र – गौतम बुद्ध

 

भगवान बुद्ध मित्र और अमित्र की पहचान बताते हुए कहते हैं कि पराया धन हरने वाले, बातूनी, खुशामदी और धन के नाश में सहायता करने वाले मित्रों को अमित्र जानना चाहिए।

मित्र उसी को जानना चाहिए जो उपकारी हो, सुख-दुख में हमसे समान व्यवहार करता हो, हितवादी हो और अनुकम्पा करने वाला हो।
* जो मद्यपानादि के समय या आंखों के सामने प्रिय बन जाता है, वह सच्चा मित्र नहीं। जो काम निकल जाने के बाद भी मित्र बना रहता है, वही मित्र है।
* इन चारों को मित्र के रूप में अमित्र समझना चाहिए:-bad_friend

1. दूसरों का धन हरण करने वाला।
2. कोरी बातें बनानेवाला।
3. सदा मीठी-मीठी चाटुकारी करने वाला।
4. हानिकारक कामों में सहायता देने वाला।
* जो बुरे काम में अनुमति देता है, सामने प्रशंसा करता है, पीठ-पीछे निंदा करता है, वह मित्र नहीं, अमित्र है।
* जो मद्यपान जैसे प्रमाद के कामों में साथ और-आवारागर्दी में प्रोत्साहन देता है और कुमार्ग पर ले जाता है, वह मित्र नहीं, अमित्र है। ऐसे शत्रु-रूपी मित्र को खतरनाक रास्ते की भांति छोड़ देना चाहिए।

* वास्तविक सुहृदय इन चार प्रकार के मित्रों को समझना चाहिए-
1. सच्चा उपकारी,
2. सुख-दुख में समान साथ देने वाला,
3. अर्थप्राप्ति का उपाय बताने वाला,
4. सदा अनुकंपा करने वाला।

* जो प्रमत्त अर्थात भूल करने वाले की और उसकी सम्पत्ति की रक्षा करता है, भयभीत को शरण देता है और सदा अपने मित्र का लाभ दृष्टि में रखता है, उसे उपकारी सुहृदयी समझना चाहिए।
* जो अपना गुप्त भेद मित्र को बतला देता है, मित्र की गुप्त बात को गुप्त रखता है, विपत्ति में मित्र का साथ देता है और उसके लिए अपने प्राण भी होम करने को तैयार रहता है, उसे ही सच्चा सुहृदय समझना चाहिए।
* जो पाप का निवारण करता है, पुण्य का प्रवेश कराता है और सुगति का मार्ग बताता है, वही ‘अर्थ-आख्यायी’, अर्थात अर्थ प्राप्ति का उपाय बतलाने वाला सच्चा सुहृदय है।
* जो मित्र की बढ़ती देखकर प्रसन्न होता है, मित्र की निंदा करने वाले को रोकता है और प्रशंसा करने पर प्रशंसा करता है, वही अनुकंपक मित्र है। ऐसे मित्रों की सत्कारपूर्वक माता-पिता और पुत्र की भाँति सेवा करनी चाहिए।
* जगत में विचरण करते-करते अपने अनुरूप यदि कोई सत्पुरुष न मिले तो दृढ़ता के साथ अकेले ही विचारें, मूढ़ के साथ मित्रता नहीं निभ सकती।
* अकेले विचरना अच्छा है, किन्तु मूर्ख मित्र का सहवास अच्छा नहीं।

* यदि कोई होशियार, सुमार्ग पर चलने वाला और धैर्यवान साथी मिल जाए तो सारी विघ्न-बाधाओं को झेलते हुए भी उसके साथ रहना चाहिए।
* जो छिद्रान्वेषण किया करता है और मित्रता टूट जाने के भय से सावधानी बरतता है, वह मित्र नहीं है। पिता के कंधे पर बैठकर जिस प्रकार पुत्र विश्वस्त रीति से सोता है, उसी प्रकार जिसके साथ विश्वासपूर्वक बर्ताव किया जा सके और दूसरे जिसे फोड़ न सकें, वही सच्चा मित्र है।

(समाप्त)

प्रस्तुति

VRUND PUROHIT

vrundpurohit99@rediffmail.com