14-FEB-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: मनुवाद,भारत के पिछड़े बहुजन,उनका आरक्षण का हक़, और जमनी सच्चाई…समयबुद्धा


arakshan justice equality

मनुवाद,भारत के पिछड़े बहुजन,उनका आरक्षण का हक़, और जमनी सच्चाई

बौद्ध धम्म पर तो मैं अक्सर ही बात करता हूँ पर कभी कभी जीवन में ऐसे मौके आ जाते हैं जब बौद्ध धम्म के आलावा बाकि ज्वलंत बहुजन मुद्दों पर चर्चा करना जरूरी ही नहीं अनिवार्य हो जाता है|ऐसा ही एक ज्वलंत मुद्दा है मनुवाद,भारत के पिछड़े बहुजन,उनका आरक्षण का हक़, और जमनी सच्चाई |आज इस पूर्णिमा पर मैं इसी मुद्दे पर चर्चा करूंगा|

“सदेव ध्यान रखना आरक्षण का काम केवल भारत के बहुजनों की गरीबी हटाना नहीं है,बल्कि इसका काम है शासन प्रशासन में वंचित जातियों की भागीदारी सुनिश्चित करना है जिससे उनको न्याय मिल सके”.

कमाल कि बात देखिये कि आरक्षण का विरोध करने  वाले जाती और वर्णव्यस्था का विरोध नहीं करते, वो ये क्यों नहीं समझते कि आरक्षण कि जड़ में मनुवाद/जातिवाद/वर्णव्यस्था का अन्याय है, जब तक ये रहेंगे तब तक आरक्षण चलेगा| वैसे भी आरक्षण क्या है आरक्षण उस एक गिलास पानी कि तरह है जो लुटे पिटे अधमरे मनुष्य को दिया जाए| क्या एक गिलास पानी से उस अधमरे मानव  का भला हो पायेगा, नहीं ,उसको सम्पूर्ण इलाज चाहिए और ये दयाशून्य लोग इलाज तो दूर कि बात है एक गिलास पानी नहीं देना चाहते|  इन महास्वार्थी लोगों को वहाँ मिर्ची लगती है जब इनकी निकम्मी संतान कुछ नहीं करती और मेहनती बहुजन कमाने खाने लगता है|

एक उदहारण देखिये  जब एक बहुजन एक सेकंड हेंड छोटी कार खरीद लेता है तब ये कहते हैं कि इनको अब आरक्षण कि जरूरत नहीं ये बहुत ज्यादा कामयाब हो गए हैं| अरे महास्वार्थीयों अगर किसी बहुजन ने सेकंड हेंड  छोटी कार खरीद भी ली तो तुम्हारे सवर्णों को देखो वो एस0यु0वि0,लक्जरी सेडान और हेलिकॉप्टर खरीद रहे हैं|सत्ता कि चाबी तो आज भी बहुजन विरोधियों के हाथों में है| अरे जलने वाले मूर्खों तुम क्यों नहीं समझते कि आज कि सेकेण्ड हैण्ड कार पुराने ज़माने के पैदल बहुजन और आज के एस यु वि, लक्जरी सेडान और हेलिकॉप्टर  पुराने ज़माने कि घोडा गाड़ी के बराबर है| फर्क वहीँ का वहीँ है बल्कि इतना बढ़ गया है कि पटना मुश्किल है|अगर बहुजन दस कदम आगे बढ़ें है तो सवर्ण हज़ार कदम आगे बढ़ें हैं|आज बहुजन किसी माल में एक दूकान नहीं ले सकता और सवर्णों के तो पूरे पूरे कई माल होते हैं| आरक्षण से कुछ खास लाभ नहीं हो रहा है ये बात केवल विरोधियों को ही नहीं हमारे लोगों को भी समझने कि जरूरत है|आरक्षण का लाभ तब है जब सभी संसाधनों में हिस्सेदारी सुनिश्चित हो, क्या मीडिया क्या इंडस्ट्री क्या राजनीति, केवक सरकारी नौकरियों से कुछ नहीं हो रहा|

समस्त मीडिया में आजकल आरक्षण की खिलाफत की एक जबरदस्त लहर चल रही है, कोई ऐसे संभव जगह नहीं बची जहाँ इसका विरोध और इसको गिराने का संगर्ष न हो रहा हो| आखिर ये झोपड़ा इन थपेड़ों को कब तक सहेगा ? जब बात आरक्षण की होती है तो सब भारतीय संविधान द्वारा अनुसूचित-जाती, जनजाति एवं अतिपिछड़ा वर्ग को मिले उस आरक्षण या विशेष अधिकारों की ही बात करतें हैं जिन्हें लागू हुए मुश्किल से 60 वर्ष ही हुए हैं ,कोई उस आरक्षण की बात नही करता जो पिछले 3000 वर्षों से भारतीय समाज में लागू था, जिसके कारण ही इस आरक्षण को लागू करने की आवश्यकता पड़ी|उस अन्यायी आरक्षण के चलते चंद मनुवादी हजारों सालों से मलाई लूट रहे हैं और बहुजन दाने दाने को मोहताज़, भूखे, नंगे, बेइज्जत जीने मरने को को मजबूर हुए |

आज हम जिस संविधान का पालन कर रहें है वो डॉ आंबेडकर द्वारा बनाया गया ”भारतीय गणराज्य का संविधान” है| ये 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ उससे पहले जो संविधान इस देश में लागू था जिसका पालन सभी राजा-महाराजा बड़ी ईमानदारी से करते थे उस संविधान का नाम था ”मनुस्मृति”| मनुस्मृति नमक संविधान में कैसे कैसे कानून थे जानने के लिए कुछ उदहारण देखिये:
– संसार में जो कुछ भी है सब ब्राह्मणों के लिए ही है क्यूंकी वो जन्म से ही श्रेष्ठ है(मनुस्मृति 1/100)
– राजा का ये कर्त्तव्य है की वह ब्राह्मणों की जीविकी निश्चित करे|जिस तरह पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है उसी प्रकार राजा को भी ब्रह्मण की आजीविका के साधन का ध्यान रखना चाहिए (मनुस्मृति 7/135)
– किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्ये होता है , सौ वर्ष का वृद्ध क्षत्रीय भी १० वर्ष के बालक ब्रह्मण को पिता के बराबर ही समझे (मनुस्मृति 2/138)
– धार्मिक मनुष्या इन नीच जाती वालों के साथ बातचीत ना करें उन्हें ना देखें (मनुस्मृति 10/52)
– यदि कोई नीची जाती का व्यक्ति ऊंची जाती का कर्म करके धन कमाने लगे तो राजा को यह अधिकार है की उसका सब धन छीन कर उसे देश से निकल दे (मनुस्मृति 10/95)
– बिल्ली नेवला चिड़िया मेंडक उल्लू और कौवे की हत्या में जितना पाप लगता है उतना ही पाप शूद्र यानि SC/ST/OBC की हत्या में है (मनुस्मृति 11/131 )
– शूद्र यानि SC/ST/OBC द्वारा अर्जित किया हुआ धन ब्रह्मण उससे जबरदस्ती छीन सकता है क्यूंकि उसे धन जमा करने का कोई अधिकार ही नहीं है (मनुस्मृति 8/416 )
– स्वामी के द्वारा छोड़ा गया शूद्र भी दासत्व से मुक्त नही क्यूंकी यह उसका कर्म है जिससे उसे कोई नही छुड़ा सकता (मनुस्मृति 8/413)
– चाहे वो खरीदा गया हो या नहीं लेकिन शूद्रों से सेवा ही करनी चाहिए क्योंकि शूद्रों की उत्पत्ति ब्रहमा ने ब्राह्मणों की सेवा के उद्देश्य से ही की है (मनुस्मृति 8/412)
– इन शूद्रों को शमशान,पहाड़ और उपवनों में ही अपनी जीविका के कर्म करते हुए निवास करना चाहिए (मनुस्मृति 10/49)
– इन नीच जाती वालों के लिए कफ़न ही इनका वस्त्र है, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें,इनके आभूषण लोहे के हों और वे सदा भ्रमन की करते रहे तथा एक स्थान पर बहुत दिनों तक न रहें (मनुस्मृति 10/52)

आधुनिक संविधान के निर्माता अंबेडकर ने सबसे पहले 25 दिसंबर 1927 को हज़ारों लोगों के सामने इस ”मनुस्मृति” नामक संविधान को जला दिया ,क्यूंकी ऐसे अन्यायी संविधान की कोई आवश्यकता नही थी| भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए दिया गया क्यूंकी इस देश की 85 प्रतिशत शूद्र जनसंख्या को कोई भी मौलिक अधिकार तक प्राप्त नही था,सार्वजनिक जगहों पर ये नही जा सकते थे मंदिर में इनका प्रवेश निषिध था सरकारी नौकरियाँ इनके लिए नहीं थी , ये कोई व्यापार नही कर सकते थे , पढ़ नहीं सकते थे , किसी पर मुक़दमा नही कर सकते थे , धन जमा करना इनके लिए अपराध था , ये लोग टूटी फूटी झोपड़ियों में, बदबूदार जगहों पर, किसी तरह अपनी जिंदगिओं को घसीटते हुए काट रहे थे|और यह सब ”मनुस्मृति” जैसे अन्य कई हिंदू धर्मशास्त्रों के कारण ही हो रहा था कुछ उदाहरण देखिए-

– अगर कोई शूद्र वेद मंत्र सुन ले तो उसके कान में धातु पिघला कर डाल देना चाहिए- गौतम धर्म सूत्र 2/3/4….
– सब वर्णों की सेवा करना ही शूड्रों का स्वाभाविक कर्तव्य है (गीता,18/44)
– जो अच्छे कर्म करतें हैं वे ब्राह्मण ,क्षत्रिय वश्य, इन तीन अच्छी जातियों को प्राप्त होते हैं जो बुरे कर्म करते हैं वो कुत्ते, सूअर, या शूद्र जाती को प्राप्त होते हैं (छान्दोन्ग्य उपनिषद् ,5/10/7)

– पूजिए विप्र ग्यान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ग्यान प्रवीना,(रामचरित मानस)
– ब्राह्मण दुश्चरित्र भी पूज्यहनीए है और शूद्र जितेन्द्रीए होने पर भी तरास्कार योग्य है (पराशर स्मृति 8/33)
– धोबी , नई बधाई कुम्हार, नट, चंडाल, दास चामर, भाट, भील, इन पर नज़र पद जाए तो सूर्य की ओर देखना चाहिए इनसे बातचीत हो जाए तो स्नान करना चाहिए (व्यास स्मृति 1/11-13)
– निर्माण,चित्रकारी,कारीगरी,कृषी तथा पशुपालन यह सब नीच कर्म है(अनुशासन पर्व अ० २३श्लोक १४और२४—) (अनुशासन पर्व अ०90श्लोक६/८/9) (अनुशासन पर्व अ०135श्लोक 11)

ये उन असंख्य नियम क़ानूनों के उदाहरण मात्र थे, जो आज़ाद भारत से पहले देश में लागू थे| ये अँग्रेज़ों के बनाए क़ानून नहीं थे ये हिंदू धर्म द्वारा बनाए क़ानून थे जिसका सभी हिंदू राजा पालन करते थे| इन्ही नियमों के फलस्वरूप भारत में यहाँ की विशाल जनसमूह के लिए उन्नति के सभी दरवाजे बंद कर दिए गये या इनके कारण बंद हो गये, सभी अधिकार, या विशेष-अधिकार, संसाधन, एवं सुविधायें कुछ लोगों के हाथ में ही सिमट कर रह गईं, भारत के जनता में आपसी फूट इतनी बहुतायत में हो गई की विदेशी आक्रमण जैसे महा संगठन कारक के आगे भी लोग संगठित होने को तयार नहीं हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारत गुलाम हुआ| हाय! विशुद्ध भारतीय मौर्य साम्राज्य की हार के साथ ही भारत का भाग्य फूट गया|

उनमे क्षमता थी तो उन्होंने अपना संविधान चलाया और क्रूर से क्रूर कानून बनाये| हममे क्षमता थी हमारे बाबा साहेब में क्षमता थी इसलिए उन्होंने आरक्षण का हमारा हक़ छीन लिए| अब ये बताओ की उन हजारों जुल्म करने वाले कानून को हजारों साल हमने सहा तो ये लोग इस जरा से हक मांगने को नहीं सह पा रहे हैं| एक और बात डॉ आंबेडकर ने तो आरक्षण माँगा ही नहीं था उन्होंने तो सेपरेट इलेकट्रेट और सेपरेट सेटलमेंट माँगा था, आरक्षण तो हमपर थोपा गया है|

पूना समझौता के बाद अस्पृश्यता और जाती निर्मूलन के लिए प्रस्ताव आये और कानून बने इसी का परिणाम “आरक्षण” है| सवर्णों को हमारा आरक्षण बिलकुल बर्दास्त नहीं हो पा रहा है, वे इसपर हमले पर हमले कर रहे हैं खासकर मीडिया की मदत से लोगों को इसके खिलाफ भड़का रहे हैं |४ अगस्त २०११ के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आरक्षण के खिलाफ जनहित याचिका की खबर पढ़ी, जिसमें ये मांग की गई थी की फलां फलां जातीं बहुत अधिक शक्षम हो गईं हैं,अब इन्हें और आरक्षण की जरूरत नहीं है | इस देश में हमारे असहाए और गरीबों के पास इसके आलावा कुछ भी तो नहीं | ध्यान रहे हमारे पास आरक्षण के अलावा कुछ भी शक्ति नहीं है और ये भी कोई खास ज्यादा बड़ी शक्ति नहीं है, इसके बल पर अदिकतम सफलता जो हमने पाई है वो ये है की कही कोई नौकरी कर पाते है और चैन की रोटी नौकरी करें वाली पीड़ी को मिल जाती है पर इनको देखो :varn vyastah

०. सरकार में बहुमत
१. पुलिस में बहुमत
२. सेना की कमान इनके हाथ में
३. बड़े बड़े घर कोठिया फार्म हाउस इनके
४. स्विस बैंक में बड़ी दौलतें इनकी
५. मंदिरों में आपार धन सम्पदा इनकी
६. ज्ञान ध्यान के साधन और मौके इनके
७. शिक्षा को जानके इतना महंगा कर दिया है ताकि हम न ले पाए,सरकारी स्कूल की पढाई आज कारगर नहीं रह गई है
८. बड़े बड़े सेठ पूँजी-पती धन कुबेर इनके पक्ष में , हमारा तो कोई धन बल भी नहीं
९. निजीकरण या प्राइवेट-करन करके सभी नौकरियां धीरे धीरे ख़तम कर दी हैं ,प्राइवेट नौकरी में आरक्षण नहीं चलता |

अब ऐसी स्तिथि आ रही है की आरक्षण केवल कागजों में ही रह जायेगा, धरातल पर इसका कोई फायदा नहीं होगा|आरक्षण से भरने वाले सरकारी पद खाली रखे जाते हैं वहाँ पर बहुजनों को नौकरी दी ही नहीं जाती ऐसे पदों को ये लिख कर खली छोड़ दिया जाता है कि ” उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहे” |

संविधान को सही से लागू नहीं कर रहे हैं बहुजन विरोधी और ऊपर से शोर मचा रहे हैं की आरक्षण इनके हकों के लिए खतरा है, चित्त भी इनकी पट्ट भी इनकी| जब ऐसे संसथान जैसे नौकरी करने कि कम्पनियाँ ,स्कूल, कॉलेज आदि प्राइवेट हो जायेगे जहाँ आरक्षण नहीं चलता तो आरक्षण तो वसे ही ख़तम हो जायेगा|हमपर है क्या? कुछ भी तो नहीं एक आरक्षण के सिवा वह भी छीन जायेगा तो हमारे पिछड़े लोग के लिए बढ़ने के सब मौके ख़तम हो जायेंगे ,खली हाथ दूसरों की गुलामी को मजबूर हो जायेगे, और यही तो इनका मकसद है|

हाँ ये और बात है की कुछ बहुजन लोग सक्षम हो गए हैं जिन्हें मीडिया में क्रीमी लेयर कहा जाता है वो अच्छे स्कूल और कालेज में पड़ कर खुद को कामयाब बनाये रखें | पर ऐसे लोग बहुत कम है और अगर हैं भी तो वे इतने दिलदार नहीं हूए हैं की अपने बाकि के समाज के लिए चैरिटी करें | जबकि ये लोग कई तरह के ट्रस्ट,हॉस्टल,मंदिर,स्कोलरशिप, एन०जी0ओ0 और चैरिटी जैसे अनेकों संगठन बना कर अपनी कौम को वैसे ही आरक्षण से कहीं ज्यादा लाभ पंहुचा पा रहे है|

बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने अपने परिनिर्वाण से पहले का हमारे लिए निम्न अंतिम कथन कहा था:

‘‘मेरे लोगों से कह देना, नानक चन्द! मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेषकर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धेखा दे दिया। मैं बड़ी कठिनाइयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है। कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हे इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा। जाओ जाकर उनसे कह दो जाओ जाकर उनसे कह दो.. जाओ जाकर उनसे कह दो’’

उन्होंने तीन बार कहा। यह कह कर वह सिसकने लगे, देखते ही देखते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

पुराने समय में गुरुकुल शिक्षा व्यस्था के माध्यम से ज्ञान केवल सत्ताधारी और उसके सहयोगियों के बीच ही सदियों तक घूमता रहा|परिणाम आम जनता कभी समझ ही नहीं पायी की दिन रात मेहनत और ईमानदारी से जीने के बावजूद उनके हिस्से सिर्फ महा-दुःख ही क्यों आये|आखिरकार डॉ आंबेडकर ने संविधान में सबके लिए सार्वजानिक शिक्षा की व्यस्था और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर दिया|परिणाम ये हुआ की आम जनता समझने लगी की उनके जीवन का दुःख किसी इश्वर का दिया नहीं अपितु गलत सरकारी निति की वजह से है जिसका समाधान भी इश्वर नहीं राजनीति ही करेगी और उन्होंने राजनीती हिस्सा लेना शुरू कर दिया|ये बात इस देश के धम्म-विरोधियों को को अच्छी नहीं लगी और सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था (सरकारी स्कूल) आज संविधान लागू होने के लगभग साठ साल के अन्दर ही महत्व हीन कर दी गई और गुरुकुल शिक्षा व्यस्था को अंग्रेजी स्कूल के नए रूप में लागू कर दिया गया|सरकारी स्कूल में अक्सर देखा गया है की न तो वहां पढ़ाने वाले हैं न पढने वाले|पहले ज़माने के अनपढ़ के समतुल्य आज सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था से निकले व्यक्ति से की जा सकती है और गुरुकुल के से पास सत्ताधारी की तुलना आज के प्राइवेट स्कूल से पास हो रहे लोगों से की जा सकती है|

मैं मानता हूँ कि केवल दो परसेंट लीडर स्वाभाव के छात्र ही स्वेछा से पढाई करते है बाकि ९८% बहुजन छात्र लचर शिक्षा व्यस्था से केवल मजदूर बनकर निकलते हैं |जो भी हो अभी तक एक अच्छाई है कि स्कूल शिक्षा के अंत में सरकारी और प्राइवेट स्कूल दोनों को सामान बोर्ड पेपर देने होते हैं | साथियों आज जब विद्या और ज्ञान के दरवाजे खुले हुए हैं तो क्यों नहीं ज्ञान ले लेते?क्या सत्ता परिवर्तन का इंतज़ार है जब संविधान बदल दिया जायेगा और फिर दमन निति चालू हो जाएगी |

आपके विरोधी दिन रात आपको नाकामयाब करने में लगे हैं क्या आप अपने को बचाने को भी खड़े नहीं होगे, मुकाबला तो दूर कि बात है|अब फैसला आपके हाथों में है कि आप संगर्ष करते हो या निकम्मेपन में टाइम पास कर के गुलामी स्वीकार करते हो|

Diksha_Bhumi_50th_large-776528

…समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

for further reading please click on following WIKIPEDIA LINK

http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s