भारत के सम्राट अशोक महान के जन्म दिवस पर चंद्रमणि बौद्ध विहार, कल्याण पूरी दिल्ली में 6, अप्रेल २०१४ को आप सदर आमंत्रित हैं …अमर विशारत (लार्ड बुद्धा ट्रस्ट)

ashoka lord buddha trust
निमंत्रण पत्र
मान्यवर
लार्ड बुद्धा ट्रस्ट एक सामाजिक संस्था है , लार्ड बुद्धा ट्रस्ट ने स्थानीय व् राष्ट्रिय स्तर पर बहुत सारे सामजिक कार्यक्र्म कर चुकी है , लार्ड बुद्धा ट्रस्ट संस्था चंद्रमणि बौद्ध विहार 12 /181,182, कल्याण पूरी दिल्ली में गरीब बच्चों को मुफ्त टूशन शिक्षा व् धम्म की शिक्षा भी दे रही है , इस सेण्टर में सभी विषयो की शिक्षा दी जाती है, 7 अप्रेल 2014 को महान राजा सम्राट अशोका का जन्म दिवस है, उनके जनम दिवस पर हम एक सांस्कृतिक कार्यक्र्म कर रहे है, भारत के महान राजा सम्राट अशोका के बारे में सभी लोग अच्छी तरह से जानते है कि सम्राट अशोका ने भारत को बहुत कुछ दिया है , हमारे राष्ट्रीय झण्डे में जो चक्र है ये सम्राट अशोक की देन है और भारत की मुद्रा पर जो चिन्ह अंकित है व् सरकार जिस चिन्ह का प्रयोग करती है वो चिन्ह भी सम्राट अशोक की देन है, भारत को सोने की चिड़िया उनके शासन काल से ही कहा जाता था

लार्ड बुद्धा ट्रस्ट भारत के महान सम्राट अशोका के जन्म दिवस पर चंद्रमणि बौद्ध विहार , 12 /181 -182 कल्याण पूरी दिल्ली में के सामने पार्क में दिनांक 6, अप्रेल 2014, समय 9:30 प्रातः से 1 बजे दोपहर तक धम्म शिक्षा केंद्र के बच्चो के द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्र्म कर रही है, इस अवसर पर आप से निवेदन है कि आप इस कार्यक्र्म में अथिति के रूप सादर आमंत्रित है , इस कार्यकर्म में संस्था की और से कुछ सामाजिक लोगो को अवार्ड से सम्मानित भी किया जाएगा, कार्यक्र्म में पहुँच कर बच्चो का मनोबल बढ़ाये व् लार्ड बुद्धा ट्रस्ट का सहयोग करे ,
धन्यवाद् भवदीय

ashoka the great
Dear All
Inauguration of Dhamma Shiksha Kendra & Cultural Program
On
Samrat Ashoka Jyanti
Your Are invited for great king of India Samrat Ashoka Jyanti Program dated on 6th April 2014 Time 9:30 Am to 1:30 Pm at Chandramani Buddh Vihar Park, 12 /181 Kalyan Puri .Delhi . On this occasion, Lord Buddha Trust is organizing a cultural and inauguration of Dhamma Shiksha Kendra (Dhamma Education Center free nonformal education center for all ) Your presence is necessary.
(Lord Buddha Trust (LBT)is charitable Buddhist organization founded with the objectives of imparting Buddhist philosophy, besides the cause of human rights, self respect, brotherhood, Love, peace, Equality, progress and dedicated for the welfare and happiness of people irrespective of religious, cast ,race, color or sex. Since its very inception the society as been actively engaged in rendering various spiritual and humanitarian service. Lord Buddha Trust (LBT) is based in India although working in another country of Asia. Lord Budd Trust is creating an environment of Dhamma era in India.)

Program Schedule
9:30 Am : Buddh Vandan
10:00 Am : Briefing History life of Samrat Ashoka
10:20 Am : Song, poem and Dance by our school (Dhamma Shiksha Kendra)
Children
12.30Am: Certificate Distribution & message by Akash Patil, Chief Guest
1:30 Pm: Tea and refreshment

Thanks
With Maitri
Amar Visharat , Chairman, Lord Buddha Trust 0921012282
Kamal Tayde Vice Chairman, Lord Buddha Trust, 0965491278
Arvind Pahariya Program Secretary Lord Buddha Trust, 09718959488
Anita Ujjainwal Bodh 09268378100
Sushil Jogrkar , 9250010030
Pl. support us for our mission of LBT
Pl. Visit website: www.lordbuddhatrust.org

Note: Lord Buddha Trust is registered under Income Tax Act 80G Exemption departments Government of India, all contribution is exempted from Income Tax.
Pl. Deposit your contributions in our bank account for good cause
Our Bank: – INDIAN BANK, ACCOUNT: 985020038

BRANCH: SOUTH EXTENSION PART 1 , DELHI 110049

IFS CODE: IDIB000S032
Or send your contribution account payee cheque at our office address: 16/383 Second Floor Trilok Puri New Delhi 110091

विश्व इतिहास के केवल तीन लोग के नाम के साथ ‘महान’ लिखा जाता है उसमें से एक हैं हमारे बहुजन सम्राट अशोक महान….- डॉ. हरिकृष्ण देवसरे

ashoka the great
विश्व इतिहास के केवल तीन लोग के नाम के साथ ‘महान’  लिखा जाता है उसमें से एक हैं हमारे बहुजन सम्राट अशोक महान 
 
– डॉ. हरिकृष्ण देवसरे
ashoka200px-Ashoka_Chakra_svg

विश्व इतिहास में कई महानायक हुए हैं जिनकी कीर्ति विश्व में फैली। एक इतिहासकार के अनुसार ‘किसी व्यक्ति के यश और प्रसिद्धि को मापने का मापदंड असंख्‍य लोगों का हृदय है – जो उसकी पवित्र स्मृति को सजीव रखता है और जो अगणित मनुष्यों की वह जिह्वा है जो उसकी कीर्ति का गान करती है।उन्हें विश्व इतिहास में ‘महान’ की उपाधि से विभूषित किया है। आज भी इतिहास ग्रंथों में उनका नाम इसी उपाधि के साथ प्रत्यय के साथ मिलता है। ‘महान’ कही जाने वाली ये तीन‍ विभूतियाँ हैं अशोक महान, सिकंदर महान और अकबर महान। यहाँ प्रस्तुत है अशोक महान के प्रेरक चरित्र एवं आदर्शों की संक्षिप्त झाँकी।

सम्राट अशोक मौर्यवंश का तीसरा राजा था। उसके पिता का नाम बिंदुसार और माता का जनपद कल्याणी था। अशोक का जन्म लगभग 297 ई. पूर्व माना गया है। अशोक का साम्राज्य प्राय: संपूर्ण भारत और पश्चिमोत्तर में हिंदुकुश एवं ईरान की सीमा तक था।

कलिंग के भीषण युद्ध ने अशोक के हृदय पर बड़ा आघात पहुँचाया और उसने अपनी हिंसा आधारित दिग्विजय की नीति छोड़कर, धर्म विजय की नीति को अपनाया। लगभग इसी समय अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। अब सम्राट अशोक शासक और संत-दोनों का मिश्रित चरित्र था। उसने अपने साम्राज्य के सभी साधकों को लोकमंगल के कार्यों में लगा दिया था। अशोक की राजनीति धर्म और नीति से पूर्णत: प्रभावित थी। अशोक का आदर्श था – ‘लोकहित से बढ़कर दूसरा और कोई कर्म नहीं है जो कुछ मैं पुरुषार्थ करता हूँ, वह लोगों पर उपकार नहीं, अपितु इसलिए कि मैं उनमें उऋण हो जाऊँ और उनको इहलौकिक सुख और परमार्थ प्राप्त कराऊँ।’

अशोक जनता में अत्यधिक लोकप्रिय था। वह जनता को अपनी संतान के समान स्नेह करता था। जनता का सुख-दुख जानने के लिए वह वेश बदलकर भ्रमण किया करता था जिसे वह जनता के संपर्क में आकर उसके सुख को समझने का अवसर पाता था। अशोक अपनी प्रजा की भौतिक एवं नैतिक दोनों प्रकार की उन्नति चाहता था। इस कारण वह अपने शासन में नैतिकता को अधिक बल देता था।

अशोक को धर्म प्रचार के लिए, इतिहास में अधिक जाना जाता है। वह अपने धर्म प्रचार में नैतिक सिद्धांतों पर ही जोर देता था – इससे सभी धर्मों के बीच संतुलन बनाने में सरलता होती थी। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए, नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए धर्म लेखों का सहारा लिया था जो पर्वत शिखाओं, पत्‍थर के खंभों और गुफाओं में अंकित किए गए गए। अशोक ने तीन वर्ष की अवधि में चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण कराया। इनमें सारनाथ (वाराणसी के निकट) में उसके द्वारा निर्मित स्तूप के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

अशोक ने देश के विभिन्न भागों में, प्रमुख राजपथों और मार्गों पर धर्म स्तंभ स्थापित किए। इनमें सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। यह धर्मचक्र की घटना का स्मारक था। सारनाथ की सिंह मुद्रा को भारत सरकार का राज्य चिह्न स्वीकार किया गया है। अशोक संसार के उन सम्राटों में था जिसने धर्म-विजय के द्वारा संपूर्ण देश एवं पड़ोसी देशों में अहिंसा, शांति, मानव कल्याण एवं मानव प्रेम का संदेश जन-जन तक पहुँचाया।

इसी के साथ अशोक की धर्म विजय में लोकोपकारी कार्यों का समावेश भी हुआ। सड़कों का निर्माण, उसके किनारे वृक्षों का आरोपण, विश्राम शालाओं और प्याऊ निर्माण, सुरक्षा आदि का समुचित प्रबंध था। जनता सुखी एवं धर्मपरायण थी।

अशोक ने पूरे विश्व में बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ शांति, अहिंसा एवं प्रेम का जो व्यापक प्रचार किया, उससे उसे सर्वत्र प्रशंसा मिली। अशोक के समय में पूरे विश्व में युद्ध, रक्तपात, हिंसा और अराजकता का साम्राज्य था। अशोक ने ऐसे उथलपुथल वाले सागर में अमृत बिंदु का काम किया और विश्व में शांति स्थापित की, नैतिक मूल्यों की स्थापना की और सबको विश्वबंधुत्व एवं प्रेम का संदेश दिया। इस तरह अशोक पूरे विश्व में यशस्वी बना – उसे ‘अशोक महान’ कहा गया।

(लेखक ‘पराग’ के पूर्व संपादक और प्रसिद्ध बाल साहित्यकार हैं)

गौतम बुद्ध की वाणी अनूठी है।बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म है। बुद्धि पर उनका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है। प्रारंभ बुद्धि से है।…ओशो

ओशो
darshnik skekaगौतम बुद्ध की वाणी
 अनूठी है। और विशेषकर उन्हें, जो सोच-विचार, चिंतन-मनन, विमर्श के आदी हैं। हृदय से भरे हुए लोग सुगमता से परमात्मा की तरफ चले जाते हैं। लेकिन हृदय से भरे हुए लोग कहां हैं? और हृदय से भरने का कोई उपाय भी तो नहीं है। हो तो हो, न हो तो न हो। ऐसी आकस्मिक, नैसर्गिक बात पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। बुद्ध ने उनको चेताया जिनको चेताना सर्वाधिक कठिन है-विचार से भरे लोग, बुद्धिवादी, चिंतन-मननशील।

प्रेम और भाव से भरे लोग तो परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते हैं; उन्हें झुकाना नहीं पड़ता। उनसे कोई न भी कहे, तो भी वे पहुंच जाते हैं; उन्हें पहुंचाना नहीं पड़ता। लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं, और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गयी है। उंगलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं।

मुनष्य का विकास मस्तिष्क की तरफ हुआ है। मनुष्य मस्तिष्क से भरा है। इसलिए जहां जीसस हार जाएं, जहां कृष्ण की पकड़ न बैठे, वहां भी बुद्ध नहीं हारते हैं; वहां भी बुद्ध प्राणों के अंतरतम में पहुंच जाते हैं।

बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म कहा गया है। बुद्धि पर उनका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है। प्रारंभ बुद्धि से है। क्योंकि मनुष्य वहां खड़ा है। लेकिन अंत, अंत उसका बुद्धि में नहीं है। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहां सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है; जहां केवल साक्षी, मात्र साक्षी शेष रह जाता है। लेकिन बुद्ध का प्रभाव उन लोगों में तत्क्षण अनुभव होता है जो सोच-विचार में कुशल हैं।

बुद्ध के साथ मनुष्य-जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा जो आज भी सार्थक मालूम पड़ेगा, और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा। बुद्ध ने विश्लेषण दिया, एनालिसिस दी। और जैसा सूक्ष्म विश्लेषण उन्होंने किया, कभी किसी ने न किया था, और फिर दुबारा कोई न कर पाया। उन्होंने जीवन की समस्या के उत्तर शास्त्र से नहीं दिए, विश्लेषण की प्रक्रिया से दिए।

बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। अगर तुम समझने को राजी हो, तो तुम बुद्ध की नौका में सवार हो जाओगे। अगर श्रद्धा भी आएगी, तो समझ की छाया होगी। लेकिन समझ के पहले श्रद्धा की मांग बुद्ध की नहीं है। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं, भरोसा कर लो। बुद्ध कहते हैं, सोचो, विचारो, विश्लेषण करो; खोजो, पाओ अपने अनुभव से, तो भरोसा कर लेना।

दुनिया के सारे धर्मों ने भरोसे को पहले रखा है, सिर्फ बुद्ध को छोड़कर। दुनिया के सारे धर्मों में श्रद्धा प्राथमिक है, फिर ही कदम उठेगा। बुद्ध ने कहा, अनुभव प्राथमिक है, श्रद्धा आनुशांगिक है। अनुभव होगा, तो श्रद्धा होगी। अनुभव होगा, तो आस्था होगी।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, आस्था की कोई जरूरत नहीं है; अनुभव के साथ अपने से आ जाएगी, तुम्हें लानी नहीं है। और तुम्हारी आयी हुई आस्था का मूल्य भी क्या हो सकता है? तुम्हारी लायी हुई आस्था का मूल्य भी क्या हो सकता है? तुम्हारी लायी आस्था के पीछे भी छिपे होंगे तुम्हारे संदेह।

तुम आरोपित भी कर लोगे विश्वास को, तो भी विश्वास के पीछे अविश्वास खड़ा होगा। तुम कितनी ही दृढ़ता से भरोसा करना चाहो, लेकिन तुम्हारी दृढ़ता कंपती रहेगी और तुम जानते रहोगे कि जो तुम्हारे अनुभव में नहीं उतरा है, उसे तुम चाहो भी तो कैसे मान सकते हो? मान भी लो, तो भी कैसे मान सकते हो? तुम्हारा ईश्वर कोरा शब्दजाल होगा, जब तक अनुभव की किरण न उतरी हो। तुम्हारे मोक्ष की धारणा मात्र शाब्दिक होगी, जब तक मुक्ति का थोड़ा स्वाद तुम्हें न लगा हो।

बुद्ध ने कहा: मुझ पर भरोसा मत करना। मैं जो कहता हूं, उस पर इसलिए भरोसा मत करना कि मैं कहता हूं। सोचना, विचारना, जीना। तुम्हारे अनुभव की कसौटी पर सही हो जाए, तो ही सही है। मेरे कहने से क्या सही होगा!

बुद्ध के अंतिम वचन हैं: अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनना। और तुम्हारी रोशनी में तुम्हें जो दिखाई पड़ेगा, फिर तुम करोगे भी क्या-आस्था न करोगे तो करोगे क्या? आस्था सहज होगी। उसकी बात ही उठानी व्यर्थ है।

बुद्ध का धर्म विश्लेषण का धर्म है। लेकिन विश्लेषण से शुरू होता है, समाप्त नहीं होता वहां। समाप्त तो परम संश्लेषण पर होता है। बुद्ध का धर्म संदेह का धर्म है। लेकिन संदेह से यात्रा शुरू होती है, समाप्त नहीं होती। समाप्त तो परम श्रद्धा पर होती है।

इसलिए बुद्ध को समझने में बड़ी भूल हुई। क्योंकि बुद्ध संदेह की भाषा बोलते हैं। तो लोगों ने समझा, यह संदेहवादी है। हिंदू तक न समझ पाए, जो जमीन पर सबसे ज्यादा पुरानी कौम है। बुद्ध निश्चित ही बड़े अनूठे रहे होंगे, तभी तो हिंदू तक समझने से चूक गए। हिंदुओं तक को यह आदमी खतरनाक लगा, घबड़ाने वाला लगा। हिंदुओं को भी लगा कि यह तो सारे आधार गिरा देगा धर्म के। और यही आदमी है, जिसने धर्म के आधार पहली दफा ढंग से रखे।

श्रद्धा पर भी कोई आधार रखा जा सकता है! अनुभव पर ही आधार रखा जा सकता है। अनुभव की छाया की तरह श्रद्धा उत्पन्न होती है। श्रद्धा अनुभव की सुगंध है। और अनुभव के बिना श्रद्धा अंधी है। और जिस श्रद्धा के पास आंख न हों, उससे तुम सत्य तक पहुंच पाओगे?

बुद्ध ने बड़ा दुस्साहस किया। बुद्ध जैसे व्यक्ति पर भरोसा करना एकदम सुगम होता है। उसके उठने-बैठने में प्रमाणिकता होती है। उसके शब्द-शब्द में वजन होता है। उसके होने का पूरा ढंग स्वयंसिद्ध होता है। उस पर श्रद्धा आसान हो जाती है। लेकिन बुद्ध ने कहा, तुम मुझे अपनी बैसाखी मत बनाना। तुम अगर लंगड़े हो, और मेरी बैसाखी के सहारे चल लिए-कितनी दूर चलोगे? मंजिल तक न पहुंच पाओगे। आज मैं साथ हूं, कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने ही पैरों पर चलना है। मेरी रोशनी से मत चलना, क्योंकि थोड़ी देर को संग-साथ हो गया है अंधेरे जंगल में। तुम मेरी रोशनी में थोड़ी देर रोशन हो लोगे; फिर हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मेरी रोशनी मेरे साथ होगी, तुम्हारा अंधेरा तुम्हारे साथ होगा। अपनी रोशनी पैदा करो। अप्प दीपो भव!

यह बुद्ध का धम्मपद, कैसे वह रोशनी पैदा हो सकती है अनुभव की, उसका विश्लेषण है। श्रद्धा की कोई मांग नहीं है। श्रद्धा की कोई आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए बुद्ध को लोगों ने नास्तिक कहा। क्योंकि बुद्ध ने यह भी नहीं कहा कि तुम परमात्मा पर श्रद्धा करो।

तुम कैसे करोगे श्रद्धा? तुम्हें पता होता तो तुम श्रद्धा करते ही। तुम्हें पता नहीं है। इस अज्ञान में तुम कैसे श्रद्धा करोगे? और अज्ञान में तुम जो श्रद्धा बांध भी लोगे, वह तुम्हारी अज्ञान की ईंटों से बना हुआ भवन होगा; उसे तुम परमात्मा का मंदिर कैसे कहोगे? वह तुमने भय से बना लिया होगा। मौत डराती होगी, इसलिए सहारा पकड़ लिया होगा। यहां जिंदगी हाथ से जाती मालूम होती होगी, इसलिए स्वर्ग की कल्पनाएं कर ली होंगी। लेकिन इन कल्पनाओं से, भय पर खड़ी हुई इन धारणाओं से, कहीं कोई मुक्त हुआ है! इससे ही तो आदमी पंगु है। इससे ही तो आदमी पक्षघात में दबा है। इसलिए बुद्ध ने ईश्वर की बात नहीं की।

एच.जी.वेल्स ने बुद्ध के संबंध में कहा है कि पृथ्वी पर इस जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और इस जैसा ईश्वर-विरोधी व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है-सो गाड लाइक एंड सो गाडलेस! अगर तुम ईश्वरीय प्रतिभाओं को खोजने निकलो तो तुम बुद्ध से ज्यादा ईश्वरीय प्रतिभा कहां पाओगे? सो गाडलेस! और फिर भी इतना ईश्वर-शून्य! ईश्वर की बात ही नहीं की। इस शब्द को ही गंदा माना। इस शब्द का उच्चार नहीं किया। इससे यह मत समझ लेना कि ईश्वर-विरोधी थे बुद्ध। उच्चार नहीं किया, क्योंकि उस परम शब्द का उच्चार किया नहीं जा सकता।

उपनिषद कहते हैं, ईश्वर के संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता; लेकिन इतना तो कह ही देते हैं। बुद्ध ने इतना भी न कहा। वे परम उपनिषद हैं। उनके पार उपनिषद नहीं जाता। जहां उपनिषद समाप्त होते हैं, वहां बुद्ध शुरू होते हैं। आखिर इतना तो कह ही दिया, रोक न सके अपने को, कि ईश्वर निर्गुण है। तो निर्गुण उसका गुण बना दिया। कहा कि ईश्वर निराकार है, तो निराकार उसका आकार हो गया। लेकिन बिना कहे न रह सके। उपनिषद के ऋषि भी बोल गए! मौन में ही सम्हालना था उस संपदा को; बोलकर गंवा दी। बंधी मुट्ठी लाख की थी, खुली दो कौड़ी की हो गई। वह बात ऐसी थी कि कहानी नहीं थी। क्योंकि तुम जो कुछ भी कहोगे, वह गलत होगा। यह कहना भी कि परमात्मा निराकार है, गलत है, क्योंकि निराकार भी एक धारणा है। वह भी आकार से ही जुड़ी है। आकार के विपरीत होगी, तो भी आकार से संबंधित है।

निराकार का क्या अर्थ होता है? जब भी अर्थ खोजने जाओगे, आकार का उपयोग करना पड़ेगा। निर्गुण का क्या अर्थ होता है? जब भी कोई परिभाषा पूछेगा, गुण को परिभाषा में लाना पड़ेगा। ऐसी निर्गुणता भी बड़ी नपुंसक है, जिसकी परिभाषा में गुण लाना पड़ता है! और ऐसे निराकार में क्या निराकार होगा, जिसको समझाने के लिए आकार लाना पड़ता है!

बुद्ध से ज्यादा कोई भी नहीं बोला; और बुद्ध से ज्यादा चुप भी कोई नहीं है। कितना बुद्ध बोले हैं! अन्वेषक खोज करते हैं तो वे कहते हैं, एक आदमी इतना बोला, यह संभव कैसे है! उन्हें डर लगता है कि इसमें बहुत कुछ प्रक्षिप्त है, दूसरों ने डाल दिया है। कुछ भी प्रक्षिप्त नहीं है। जितना बुद्ध बोले, पूरा संगृहीत ही नहीं हुआ है। खूब बोले। और फिर भी उनसे ज्यादा चुप कोई भी नहीं है। क्योकि जहां-जहां नहीं बोलना था, वहां नहीं बोले। ईश्वर के संबंध में एक शब्द न कहा। इस खतरे को भी मोल लिया कि लोग नास्तिक समझेंगे। और आज तक लोग नास्तिक समझे जा रहे हैं। और इससे बड़ा कोई आस्तिक कभी हुआ नहीं।

बुद्ध महा आस्तिक हैं। अगर परमात्मा के संबंध में कुछ कहना संभव नहीं है, तो फिर बुद्ध ने ही कुछ कहा-चुप रह कर; इशारा किया।

पश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक विट्गिंस्टीन ने अपनी बड़ी अनूठी किताब टेक्टेटस में लिखा है कि जिस संबंध में कुछ कहा न जा सके, उस संबंध में बिलकुल चुप रह जाना उचित है। दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। जो नहीं कहा जा सकता, कहना ही मत, कहना ही नहीं चाहिए।

अगर विट्गिंस्टीन बुद्ध को देखता तो समझता। अगर विट्गिंस्टीन के वचन को बुद्ध ने समझा होता तो वे मुस्कुराते और उन्होंने स्वीकृति दी होती। विट्गिंस्टीन को भी पश्चिम में लोग नास्तिक समझे। नास्तिक नहीं है। पर जो कही नहीं जा सकती बात, अच्छा है न ही कही जाए। कहने से बिगड़ जाती है। कहने से गलत हो जाती है।

लाओत्से तक, कहता तो है प्रथम वचन में अपने ताओ-तेह-किंग में कि सत्य कहा नहीं जा सकता, और जो भी कहा जाए वह असत्य हो जाता है; लेकिन फिर भी सत्य के संबंध में बहुत सी बातें कही हैं। बुद्ध ने नहीं कही। तुम कहोगे, फिर बुद्ध कहते क्या रहे? बुद्ध ने स्वास्थ्य के संबंध में एक भी शब्द नहीं कहा, केवल बीमारी का विश्लेषण किया और निदान किया; औषधि की व्यवस्था की। बुद्ध ने कहा, मैं एक वैद्य हूं; मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं। मैं तुम्हारी बीमारी का विश्लेषण करूंगा, निदान करूंगा, औषधि सुझा दूंगा; और जब तुम ठीक हो जाओगे, तभी तुम जानोगे कि स्वास्थ्य क्या है। मैं उस संबंध में कुछ भी न कहूंगा।

स्वास्थ्य जाना जाता है, कहा नहीं जा सकता। बीमारी मिटायी जा सकती है, बीमारी समझायी जा सकती है, बीमारी बनायी जा सकती है, बीमारी का इलाज हो सकता है-सही हो सकता है, गलत हो सकता है-बीमारी के साथ बहुत कुछ हो सकता है। स्वास्थ्य? जब बीमारी नहीं होती तब शेष रह जाता है, वही। उस तरफ केवल इशारे हो सकते हैं, मौन। इंगित हो सकते हैं-वे भी प्रत्यक्ष नहीं, बड़े परोक्ष।

बुद्ध के धर्म को शून्यवादी कहा गया है। शून्यवादी उनका धर्म है। लेकिन इससे यह मत समझ लेना कि शून्य पर उनकी बात पूरी हो जाती है। नहीं, बस शुरू होती है।

बुद्ध एक ऐसे उत्तुंग शिखर हैं, जिसका आखिरी शिखर हमें दिखायी नहीं पड़ता। बस थोड़ी दूर तक हमारी आंखें जाती हैं, हमारी आंखों की सीमा है। थोड़ी दूर तक हमारी गर्दन उठती है, हमारी गर्दन के झुकने की सामर्थ्य है। और बुद्ध खोते चले जाते हैं-दूर…हिमाच्छादित शिखर है। बालों के पार! उनका प्रारंभ तो दिखायी पड़ता है, उनका अंत दिखायी नहीं पड़ता। यही उनकी महिमा है। और प्रारंभ को जिन्होंने अंत समझ लिया, वे भूल में पड़ गए। प्रारंभ से शुरू करना; लेकिन जैसे-जैसे तुम शिखर पर उठने लगोगे, और आगे, और आगे दिखायी पड़ने लगा, और आगे दिखायी पड़ने लगेगा।

बहुत लोग बोले हैं। बहुत लोगों ने मनुष्य के रोग का विश्लेषण किया है; लेकिन ऐसा सचोट नहीं। बड़े सुंदर ढंग से लोगों ने बातें कही हैं, बड़े गहरे प्रतीक उपाय में लाए हैं। पर बुद्ध, बुद्ध के कहने का ढंग ही और है। अंदाजे-बयां और! जिसने एक बार सुना, पकड़ा गया। जिसने एक बार आंख से आंख मिला ली, फिर भटक न पाया। जिसको बुद्ध की थोड़ी सी भी झलक मिल गयी, उसका जीवन रूपांतरित हुआ।

आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, जिस दिन बुद्ध का जन्म हुआ, घर में उत्सव मनाया जाता था। सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था, पूरी राजधानी सजी थी। रातभर लोगों ने दीए जलाए, नाचे। उत्सव का क्षण था! बूढ़े सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था। बड़े दिन की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। मालिक बूढ़ा होता जाता था और नए मालिक की कोई खबर न थी। इसलिए बुद्ध को सिद्धार्थ नाम दिया। सिद्धार्थ का अर्थ होता है, अभिलाषा का पूरा हो जाना।

पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड-बाजे बजते थे, शहनाई बजती थी, फूल बरसाए जाते थे महल में, चारों तरफ प्रसाद बंटता था, हिमालय से भागा हुआ एक वृद्ध तपस्वी द्वार पर खड़ा हुआ आकर। उसका नाम था असिता। सम्राट भी उसे सम्मान करता था। और कभी असिता राजधानी नहीं आया था। जब कभी जाना था तो शुद्धोदन को, सम्राट को, स्वयं उसके दर्शन करने जाना होता था। ऐसे बचपन के साथी थे। फिर शुद्धोधन सम्राट हो गया, बाजार की दुनिया में उलझ गया। असिता महातपस्वी हो गया। उसकी ख्याति दूर-दिगंत तक फैल गयी। असिता को द्वार पर आए देखकर शुद्धोदन ने कहा, आप, और यहां! क्या हुआ? कैसे आना हुआ? कोई मुसीबत है? कोई अड़चन है? कहें! असिता ने कहा, नहीं, कोई मुसीबत नहीं, कोई अड़चन नहीं। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ, उसके दर्शन को आया हूं।

शुद्धोधन तो समझ न पाया। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा तपस्वी और बेटे के दर्शन को आया। भागा गया अंतःगृह में। नवजात शिशु को लेकर बाहर आ गया। असिता झुका, और उसने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने अपने पैर उसकी जटाओं में उलझा दिए। फिर तब से आदमी की जटाओं में बुद्ध के पैर उलझे हैं। फिर आदमी छुटकारा नहीं पा सका। और असिता हंसने लगा, और रोने भी लगा। और शुद्धोधन ने पूछा कि इस शुभ घड़ी में आप रोते क्यों हैं?

असिता ने कहा, यह तुम्हारे घर जो बेटा पैदा हुआ है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है; असाधारण है। कई सदियां बीत जाती हैं। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं है; यह अनंत-अनंत लोगों के लिए सिद्धार्थ है। अनेकों की अभिलाषाएं इससे पूरी होंगी। हंसता हूं, कि इसके दर्शन मिल गए। हंसता हूं, प्रसन्न हूं, कि इसने मुझ बूढ़े की जटाओं में अपने पैर उलझा दिए। यह सौभाग्य का क्षण है! रोता इसलिए हूं कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दिग-दिगंत में इसकी सुवास उठेगी, और इसकी सुवास की छाया में करोड़ों लोग राहत लेंगे, तब मैं न रहूंगा। यह मेरा शरीर छूटने के करीब आ गया।

और एक बड़ी अनूठी बात असिता ने कही है, वह यह कि अब तक आवागमन से छूटने की आकांक्षा थी, वह पूरी भी हो गयी; आज पछतावा होता है। एक जन्म अगर और मिलता तो इस बुद्धपुरुष के चरणों में बैठने की, इसकी वाणी सुनने की, इसकी सुगंध को पीने की, इसके नशे में डूबने की सुविधा हो जाती। आज पछताता हूं, लेकिन मैं मुक्त हो चुका हूं। यह मेरा आखिरी अवतरण है; अब इसके बाद देह न धर सकूंगा। अब तक सदा ही चेष्टा की थी कि कब छुटकारा हो इस शरीर से, कब आवागमन से…आज पछताता हूं कि अगर थोड़ी देर और रुक गया होता…।

इसे तुम थोड़ा समझो।

बुद्ध के फूल के खिलने के समय, असिता चाहता है, कि अगर मोक्ष भी दांव पर लगता हो तो कोई हर्जा नहीं। तब से पच्चीस सौ साल बीत गए। बहुत प्रज्ञा-पुरुष हुए। लेकिन बुद्ध अतुलनीय हैं। और उनकी अतुलनीयता इसमें है कि उन्होंने इस सदी के लिए धर्म दिया, और आने वाले भविष्य के लिए धर्म दिया। कृष्ण की बात कितनी ही समझाकर कही जाए, इस सदी के लिए मौजूं नहीं बैठती। फासला बड़ा हो गया है। बड़ा अंतराल पड़ गया है। कृष्ण ने जिनसे कहा था उनके मनों में, और जिनके मन आज उसे सुनेंगे, बड़ा अंतर है। बुद्ध की कुछ बात ऐसी है, कि ऐसा लगता है अभी-अभी उन्होंने कही। बुद्ध की बात को समसामयिक बनाने की जरूरत नहीं है; वह समसामयिक है, वह कंटेम्प्रेरी है। कृष्ण पर बोलो, तो कृष्ण को खींचकर लाना पड़ता है बीसवीं सदी में; बुद्ध को नहीं लाना पड़ता। बुद्ध जैसे खड़े हैं, बीसवीं सदी में ही खड़े हैं। और ऐसा अनेक सदियों तक रहेगा। क्योंकि मनुष्य ने जो होने का ढंग अंगीकार कर लिया है, बुद्धि का, वह अब ठहरने को है; वह अब जाने को नहीं है। और उसके साथ ही बुद्ध का मार्ग ठहरने को है।

धम्मपद उनका विश्लेषण है। उन्होंने जो जीवन की समस्याओं की गहरी छानबीन की है, उसका विश्लेषण है। एक-एक शब्द को गौर से समझने की कोशिश करना। क्योंकि ये कोई सिद्धांत नहीं हैं जिन पर तुम श्रद्धा कर लो। ये तो निष्पत्तियां हैं, प्रयोग की। अगर तुम भी इनके साथ विचार करोगे तो ही इन्हें पकड़ पाओगे। यह आंख बंद करके स्वीकार कर लेने का सवाल नहीं है; यह तो बड़े सोच-विचार, मनन का सवाल है।

http://navbharattimes.indiatimes.com/—/articleshow/17557162.cms

बौद्ध वो नहीं जो बस बुद्ध कि मूर्ती और तस्वीर टांगने तक सीमित है बौद्ध वो है जो जाग गया है …ओशो

dhamma and dharma” जो ‘जागा’, वही ‘बुद्ध’ ” ~ ओशो : –
” ‘बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है’| ‘गौतम बुद्ध एक नाम है’| ‘ऐसे और अनेंकों नाम हैं|’ धम्मपद के अंतिम सूत्रों का दिन आ गया!
लंबी थी यात्रा, पर बड़ी प्रीतिकर थी। मैं तो चाहता था-सदा चले। बुद्ध के साथ उठना, बुद्ध के साथ बैठना; बुद्ध की हवा में डोलना, बुद्ध की किरणों को पकड़ना; फिर से जीना उस शाश्वत पुराण को; बुद्ध और बुद्ध के शिष्यों के बीच जो अपूर्व घटनाएं घटीं, उन्हें फिर से समझना-बूझना-गुन ना; उन्हें फिर हृदय में बिठालना-यात्रा अदभुत थी।

पर यात्रा कितनी ही अदभुत हो, जिसकी शुरूआत है, उसका अंत है। हमकितनी ही चाहें, तो भी यहां शाश्वता नहीं हो सकता। यहां बुद्ध भी अवतरित होते हैं और विलीन हो जाते हैं। औरों की तो बात ही क्या! यहां सत्य भी आता है, तो ठहर नहीं पाता। क्षणभर को कौंध होती है, खो जाता है। यहां रोशनी नहीं उतरती, ऐसा नहीं। उतरती है। उतर भी नहीं पाती कि जाने का क्षण आ जाता है।
बुद्ध ने ठीक ही कहा है-यहां सभी कुछ क्षणभंगुर है। बेशर्त, सभी कुछ क्षणभंगुर है। और जो इस क्षणभंगुरता को जान लेता है, उसका यहां आना बंद हो जाता है। हम तभी तक यहां टटोलते हैं, जब तकहमें यह भ्रांति होती है कि शायदक्षणभंगुर में शाश्वत मिल जाए! शायद सुख में आनंद मिल जाए। शायदप्रेम में प्रार्थना मिल जाए। शायद देह में आत्मा मिल जाए। शायद पदार्थ में परमात्मा मिल जाए। शायद समय में हम उसे खोज लें, जो समय के पार है।

पर जो नहीं होना, वह नहीं होना। जो नहीं होता, वह नहीं हो सकता है।
यहां सत्य भी आता है, तो बस झलक दे पाता है। इस जगत का स्वभाव ही क्षणभंगुरता है। यहां शाश्वत भी पैर जमाकर खड़ा नहीं हो सकता! यह धारा बहती ही रहती है। यहां शुरुआत है; मध्य है; और अंत है। और देर नहीं लगती। और जितनी जीवंत बात हो, उतने जल्दी समाप्त हो जाती है। पत्थर तो देर तक पड़ा रहता है। फूल सुबह खिले, सांझ मुरझा जाते हैं।
यही कारण है कि बुद्धों के होने का हमें भरोसा नहीं आता। क्षणभर को रोशनी उतरती है, फिर खो जाती है। देर तक अंधेरा-और कभी-कभी रोशनी प्रगट होती है। सदियां बीतजाती हैं, तब रोशनी प्रगट होती है। पुरानी याददाश्तें भूल जाती हैं, तब रोशनी प्रगट होती है। फिरहम भरोसा नहीं कर पाते।

यहां तो हमें उस पर ही भरोसा ठीक से नहीं बैठता, जो रोज-रोज होता है। यहां चीजें इतनी स्वप्नवत हैं! भरोसा हो तो कैसे हो। और जो कभी-कभी होता है सदियों में, जो विरल है, उस पर तो कैसे भरोसा हो! हमारे तो अनुभव में पहले कभी नहीं हुआ था, और हमारे अनुभव में शायद फिर कभी नहीं होगा।

इसलिए बुद्धों पर हमें गहरे में संदेह बना रहता है। ऐसे व्यक्ति हुए! ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं? और जब तक ऐसी आस्था प्रगाढ़ न हो कि ऐसे व्यक्ति हुए हैं, अब भी होसकते हैं, आगे भी होते रहेंगे-तब तक तुम्हारे भीतर बुद्धत्व का जन्म नहीं हो सकेगा। क्योंकि अगरयह भीतर संदेह हो कि बुद्ध होते ही नहीं, तो तुम कैसे बुद्धत्व कीयात्रा करोगे? जो होता ही नहीं, उस तरफ कोई भी नहीं जाता।
जो होता है-सुनिश्चित होता है-ऐसी जब प्रगाढ़ता से तुम्हारे प्राणों में बात बैठ जाएगी, तभी तुम कदम उठा सकोगे अज्ञात की ओर।
इसलिए बुद्ध की चर्चा की। इसलिए और बुद्धों की भी तुमसे चर्चा कीहै। सिर्फ यह भरोसा दिलाने के लिए; तुम्हारे भीतर यह आस्था उमगआए कि नहीं, तुम किसी व्यर्थ खोज में नहीं लग गये हो; परमात्मा है। तुम अंधेरे में नहीं चल रहे हो, यह रास्ता खूब चला हुआ है। औरभी लोग तुमसे पहले इस पर चले हैं। और ऐसा पहले ही होता था-ऐसा नहीं। फिर हो सकता है। क्योंकि तुम्हारे भीतर वह सब मौजूद है, जोबुद्ध के भीतर मौजूद था। जरा बुद्ध पर भरोसा आने की जरूरत है।

और जब मैं कहता हूं: बुद्ध पर भरोसा आने की जरूरत, तो मेरा अर्थगौतम बुद्ध से नहीं है। और भी बुद्ध हुए हैं। क्राइस्ट और कृष्ण, और मुहम्मद और महावीर, और लाओत्सू और जरथुस्त्र। जो जागा, वही बुद्ध। बुद्ध जागरण की अवस्था का नाम है। गौतम बुद्ध एकनाम है। ऐसे और अनेंकों नाम हैं।

गौतम बुद्ध के साथ इन अनेक महीनों तक हमने सत्संग किया। धम्मपद के तो अंतिम सूत्र का दिनआ गया, लेकिन इस सत्संग को भूल मतजाना। इसे सम्हालकर रखना। यह परमसंपदा है। इसी संपदा में तुम्हारा सौभाग्य छिपा है। इसी संपदा में तुम्हारा भविष्य है।
फिर-फिर इन गाथाओं को सोचना। फिर-फिर इन गाथाओं को गुनगुनाना। फिर-फिर इन अपूर्व दृश्यों को स्मरण में लाना। ताकिबार-बार के आघात से तुम्हारे भीतर सुनिश्चित रेखाएं हो जाएं। पत्थर पर भी रस्सी आती-जाती रहतीहै, तो निशान पड़ जाते हैं।

इसलिए इस देश ने अनूठी बात खोजी थी, जो दुनिया में कहीं भी नहीं है। वह थी-पाठ। पढ़ना तो एक बात है। पाठ बिलकुल ही दूसरी बात है।पढ़ने का तो अर्थ होता है: एक किताब पढ़ ली, खतम हो गयी। बात समाप्त हो गयी। पाठ का अर्थ होताहै: जो पढ़ा, उसे फिर पढ़ा, फिर-फिर पढ़ा। क्योंकि कुछ ऐसी बातें हैं इस जगत में, जो एक ही बार पढ़ने से किसकी समझ में आ सकती हैं! कुछ ऐसी बातें हैं इस जगत में, जिनमेंगहराइयों पर गहराइयां हैं। जिनको तुम जितना खोदोगे, उतने ही अमृत की संभावना बढ़ती जाएगी। उन्हीं को हम शास्त्र कहते हैं। किताब और शास्त्र में यही फर्क है। किताब वह, जिसमें एक ही पर्त होती है। एक बार पढ़ ली और खतम हो गयी। एक उपन्यास पढ़ा और व्यर्थ हो गया। एक फिल्म देखी और बात खतम हो गयी। दुबारा कौन उस फिल्मको देखना चाहेगा! देखने को कुछ बचा ही नहीं। सतह थी, चुक गयी।
शास्त्र हम कहते हैं ऐसी किताब को, जिसे जितनी बार देखा, उतनी बार नए अर्थ पैदा हुए। जितनी बारझांका, उतनी बार कुछ नया हाथ लगा।

जितनी बार भीतर गए, कुछ लेकर लौटे। बार-बार गए और बार-बार ज्यादा मिला। क्यों? क्योंकि तुम्हारा अनुभव बढ़ता गया। तुम्हारे मनन की
osho36क्षमता बढ़ती गयी। तुम्हारे ध्यान की क्षमता बढ़ती गयी।
बुद्धों के वचन ऐसे वचन हैं कि तुम जन्मों-जन्मों तक खोदते रहोगे, तो भी तुम आखिरी स्थान पर नहीं पहुँच पाओगे। आएगा ही नहीं।गहराई के बाद और गहराई। गहराई बढ़ती चली जाती है।

http://dhruv1986.wordpress.com/2012/07/01/%E0%A4%9C%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B/

यहाँ प्रस्तुत बाबा साहब डॉ आंबेडकर के ये चुनिंदा कथन,उन्हीं कि लिखी पुस्तक भगवन बुद्धा और उनका धम्म जिसे धम्म भूमि प्रकाशन पलवल हरयाणा ने प्रकाशित किया है,से लिया गया है

398 399 400 401 402

16-MAR-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: बौद्ध धम्म पर दस बुनियादी सवाल जवाब.…समयबुद्धा

किसी भी धर्म की कुल जनसँख्या का अमूमन 10% बुद्धिजीवी वर्ग धर्म का अध्यन करता है और समझता है पर 90% आम आदमी रोज़ी रोटी कमाने और अपने धर्म के गिने चुने बुनियादी सवालों के जानने और मानने  तक ही सीमित रहता है|जैसे- हमारा पूजनीय इश्वर कोन है,हमरी धार्मिक किताब,चिन्ह,पूजास्थल क्या है,हमारे त्यौहार कौन से है और उनको कैसे मानते हैं | आजकल भारत देश के मूलनिवासयों का रुझान बौध धर्म की तरफ बहुत बढ़ रहा है क्योंकि केवल यहीं धर्म से जुडी सभी जरूरतों की पूर्ण संतुस्टी मिल पाती है| कई जगह ऐसी पारिस्थि देखी गई है की जो लोग खुद को  बौध  कहते हैं उन्हें भी इन गिनेचुने  आम सवालों का जवाब भी नहीं मालूम होता | बौध साहित्य बहुत व्यापक है जिसे हर व्यक्ति नहीं पढ़ पता | ऐसे में  सर्व जीव हितकारी बौध धर्म को हर खास-ओ-आम तक उन्ही की रूचि अनुसार पहुचाने की मानव सेवा करने के लिए समयबुद्ध मिशन ट्रस्ट प्रयासरत है, इसी कड़ी में प्रस्तुत है बौद्ध धर्म के बुनियादी सवाल जवाब:

 

प्रश्न 1    हमारा धार्मिक चिन्ह क्याहैं?  

200px-Ashoka_Chakra_svg

“धम्मचक्र या समयचक्र” है जिसके सभी अंगों का कुछ अर्थ है जो इस प्रकार है 

१. गोल घेरा दर्शाता है बौध धर्म की शिक्षा ही सम्पूर्ण है और समय ही ऐसा है जिसका कोई आदि  अंत नहीं है

२. आठ तीले  अष्टांगिक मार्ग दर्शातें हैं  जो समस्त विश्व ने बुद्धिस्म के चिन्ह के रूम में स्वीकृत है

३. बारह तीले प्रतीत्यसमुत्पाद का आरंभ के १२ सिद्धांतों को दर्शाते हैं

४. चौबीस  तीले प्रतीत्यसमुत्पाद का आरंभ के १२ और समाप्ति के १२ सिद्धांतों को दर्शाते हैं

५. चक्र का केंद्र अनुशाशन और ध्यान केन्द्रित करने को दर्शाता है

हमारा झंडा 

buddhist flag

 =============================================================================

प्रश्न 2 …बौद्ध धर्म ग्रंथ (धार्मिकपुस्तकें) कौनसीहैं?

* त्रिपिटक

भगवान बुद्ध ने अपने हाथ से कुछ नहीं लिखा था। उनके उपदेशों को उनके शिष्यों नेपहले कंठस्थ किया, फिर लिख लिया। वे उन्हें पेटियों में रखते थे। इसी से नाम पड़ा, ‘पिटक’। पिटक तीन हैं:-

1) विनय पिटक :इसमें विस्तार से वेनियम दिए गए हैं, जो भिक्षु-संघ के लिए बनाए गए थे। इनमें बताया गया है कि भिक्षुओंऔर भिक्षुणियों को प्रतिदिन के जीवन में किन-किन नियमों का पालन करनाचाहिए।

2) सुत्त पिटक :सबसे महत्वपूर्ण पिटक सुत्त पिटक है। इसमें बौद्ध धर्मके सभी मुख्य सिद्धांत स्पष्ट करके समझाए गए हैं। सुत्त पिटक पाँच निकायों में बँटाहै:- (1) दीघ निकाय,(2) मज्झिम निकाय, (3) संयुत्तनिकाय, (4) अंगुत्तर निकाय और ( खुद्दक निकाय)
खुद्दक निकाय सबसे छोटा है। इसके 15 अंगहैं। इसी का एक अंग है ‘धम्मपद’। एक अंग है ‘सुत्त निपात’।

3) अभिधम्म पिटक :अभिधम्म पिटक में धर्म और उसके क्रियाकलापों कीव्याख्या पंडिताऊ ढंग से की गई है। वेदों में जिस तरह ब्राह्मण-ग्रंथ हैं, उसी तरहपिटकों में अभिधम्म पिटक हैं।

* धम्मपद : हिन्दू-धर्म में गीता का जो स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान धम्मपद का है। गीता धम्मपद सुत्त पिटक के खुद्दक निकाय का एक अंश है।धम्मपद में 26 वग्ग और 423 श्लोक हैं।बौद्ध धर्म को समझने के लिए अकेला धम्मपद ही काफी है। मनुष्य को अंधकार से प्रकाशमें ले जाने के लिए यह प्रकाशमान दीपक है। यह सुत्त पिटक के सबसे छोटे निकाय खुद्दकनिकाय के 15 अंगों में से एक है।

*गुजरे वक़्त में धर्म ग्रन्थ ने संविधान का काम किया है, इस नजरिये से देखा जाये तो  आज के युग में भारतीय संविधान धर्म ग्रन्थ के समतुल्य है, क्योंकि ये भी हमें व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में बेहतरीन मार्ग दिखता है |

बौद्ध धम्म साहित्य में एक तरफ तो लिखा है फलां बात ऐसे है वहीँ कहीं दूसरी तरफ लिखा है फलां बात ऐसे नहीं ऐसे है|आज बौध धम्म की तरफ अग्रसर लोगों की सबसे बड़ी परेशानी ये है की वो किसको सही माने किसको गलत,किसको अपनाएं किसको छोड़ें|बौद्ध धम्म के पतन के लिए न केवल दमन से बल्कि विरोधियों ने भिक्षु बन कर बौद्ध साहित्य में बहुत ज्यादा मिलावट कर दी थी| वही मिलावट का साहित्य आज मार्किट में उपलब्ध है जिसका सार यही बनता है जी जीवन नीरस है कुछ मत करो|असल में बौद्ध धम्म मनुवादी षडियन्त्र और अन्याय के खिलाफ क्रांति है|आप किसी धम्म साहित्य की मत सुनो, बाबा साहब आंबेडकर की निम्न तीन पुस्तकों को शुरुआती ज्ञान से लेकर अंतिम रेफरेंस तक मनो :

१. भगवन बुद्धा और उनका धम्म

२. भगवन बुद्धा और कार्ल मार्क्स

३. प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति

इन तीनो पुस्तकों से आगे जाना असल में अपने को धम्म विरोधी मिलावट में फ़साना होगा|इन तीन पुस्तकों की रचना डॉ आंबेडकर ने इसी भटकाव को रोकने के लिए किया है और ये बात उन्होंने खुद कही है|हमें आखिर कहीं किसी बिन्दु पर तो एक मत होना ही होगा वरना विरोधी अपनी चाल चल जायेंगे और हम सही गलत की बहस ही करते रह जायेंगे,अब फैसला आपके हाथ में है

=============================================================================

प्रश्न 3  हमारा मुख्य त्यौहार क्या है?

            बुद्ध जयन्ती (बुद्ध पूर्णिमा, वेसाक या हनमतसूरी) बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों का एक प्रमुख त्यौहार है। बुद्ध जयन्ती वैशाख पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। इस दिन 563 ई.पू. में भगवान बुद्ध  संकिसा  लुम्बिनी मे जन्म हुआ था , इसी पूर्णिमा के दिन ही 483 ई.पू. में 80 वर्ष की आयु में, देवरिया जिले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया था। भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। ऐसा पूरी दुनिया में  किसी अन्य के साथ आज तक नही हुआ है।बौध धर्म में पूर्णिमा का बहुत महत्व होता है हर महीने की पूर्णिमा का विशेषअर्थ होता है |

14 april… डॉ आंबेडकर जयंती
25 disembar मनुस्मृति धन दिवस :   अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पढ़िए  https://samaybuddha.wordpress.com/2013/12/25/manusmriti-burning-day-s-r-darapuri-buddhist-dalit-bahujan/
14 october… धम्मक्रांति दिवस aktubar

धम्म क्रांति दिवस 14-OCT :  बौद्ध धम्म ही बहुजनों का असल धर्म था है और रहेगा, डॉ अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन नहीं करवाया बल्कि अपने धम्म में लौटाया है |अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पढ़िए

https://samaybuddha.wordpress.com/2013/10/14/dalit-dharm-ki-avdharna-v-baudh-dhamm-kanval-bharti-part-3/

=============================================================================

 

प्रश्न 4  मुख्य बौद्ध  प्राचीन तीर्थ  क्या है?

(1) लुम्बिनी : जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ,यह स्थान नेपाल की तराई में पूर्वोत्तररेलवे की गोरखपुर-नौतनवाँ लाइन के नौतनवाँ स्टेशन से 20 मील और गोरखपुर-गोंडा लाइनके नौगढ़ स्टेशन से 10 मील दूर है।
(2) बोधगया : जहाँ बुद्ध ने ‘बोध’ प्राप्तकिया।भरत के बिहार में स्थित गया स्टेशन से यह स्थान 7 मील दूर है।
(3) सारनाथ :भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश जहाँ से बुद्ध ने दिव्यज्ञान देना प्रारंभकिया।बनारस छावनी स्टेशन से पाँच मील, बनारस-सिटी स्टेशन से तीन मील और सड़क मार्गसे सारनाथ चार मील पड़ता है।
(4) कुशीनगर :जहाँ बुद्ध का महापरिनिर्वाणहुआ।पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले से 51 किमी की दूरी पर स्थित है।

 =============================================================================

प्रश्न 5बौध धम्म में परम शक्ति इश्वर कौन है?

भगवान् बुद्ध ने स्वयं के इश्वर होने,किसी इश्वर का अवतार होने या किसी इश्वर का दूत होने से साफ़ इनकार किया है,उन्होंने स्वयं को मार्गदाता कहा है| किसी और के इश्वर होने के प्रश्न पर वे मौन हो कर गुजरते हुए समय की तरफ इशारा किया है ,जिसे समय गुजरने के साथ कुछ बौध सम्प्रदाए में इंकार या अनीश्वरवाद  समझा गया, जबकि कुछ सम्प्रदायें में भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में स्वीकार कर लिए|

बौध धम्म पूर्णतः वैज्ञानिकता पर आधारित धर्म है जहाँ प्रमाणिकता के बिना कुछ भी स्वीकार्य नहीं, जबकि अन्य सभी धर्मों के सिद्धांत केवल आस्था और परंपरा के बल पर चल  रहे हैं| अब भी दुनियां में ऐसा बहुत कुछ है जो वैज्ञानिकता और इंसान के समझ के परे है जिसे अन्य धर्म अपने धर्म से जोड़कर जनता को अपने साथ मिलाये रखते हैं| बुद्ध धम्म में ऐसा नहीं है, भगवान् बुद्ध ने इस विषय में कहा है की “सर्वोच्च सत्य अवर्णननिये है” | पर ये भी एक सच्चाई है की जब किसी व्यक्ति के जीवन में भीषण दुःख या परालौकिक घटनाएँ होतीं हैं तब केवल इश्वर रुपी काल्पनिक सहारा ही उसे ढाढस  बंधता है| बौध धम्म की सभी बातें सभी को अच्छी लगती हैं पर अनीश्वरवाद की बात से पीछे हट जाता है , 10% बुद्धिजीवी वर्ग तो अनीश्वरवाद को समझ सकता है पर मानते वे भी नहीं हैं |इसपर 90% आम आदमी को तो अटूट विशवास है की कोई न कोई  सर्वशक्तिमान तो है जो दुनियां चलता है|आम आदमी चमत्कार को नमस्कार करता है,उसे कोई ऐसा चाहिए ही चाहिए जिसके आगे वो अपने सुख दुःख रख सके| वो सच्चाई जानना ही नहीं चाहता ऐसे में उन तक भगवान् बुद्ध का सन्देश कैसे पहुंचेगा? यही कारण रहा की ये महा-कल्याणकारी धर्म हर आदमी तक आज भी नहीं पहुँच पा रहा है |

असल में व्यापक प्रचार न होने के कारण बौध धम्म को समझने के लिए थोडा अध्यन करना पड़ता है इसलिए ये केवल बुद्धि-जीवी वर्ग तक ही सीमित होकर रह गया है|उन्हें बाकि बातें समझने के लिए जीवित गुरु के प्रवचनों की आवश्यकता होती है, मौलवी,पादरी,पुरोहित,सत्संग अदि इसी जरुरत का एक उदाहरण है | इसी बात का फायदा उठाकर अन्य धर्म बहुसंख्यक आम जनता को काल्पनिक आस्था,चमत्कार और कर्मकांडों में फसाकर सत्य से दूर कर देते हैं |शायद  इसी इश्वरिये कल्पना की जरूरत के चलते सभी धर्म किसी इश्वरिये नाम पर केन्द्रित होते हैं,यहाँ तक की कुछ अभिनज्ञ अनुयाई  भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में पूजते हैं |

=============================================================================

प्रश्न 6  भगवन बुद्ध कौन हैं क्या वो इश्वरिये शक्ति नहीं, क्या वो मेरे मन्नत पूरी नहीं करेंगे?

गौतम बुद्ध वास्तव में कौन हैं, उनकी शिक्षा क्या है, उनका मकसद और उपलब्धि क्या है अदि समझने के लिए उनके बारे में ओशो द्वारा बताई प्रस्तुत सात प्रमुख बातें जरूर पढ़ें या विडियो सुने |अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पढ़िए

https://samaybuddha.wordpress.com/2013/10/31/bhagwan-buddha-meri-dristi-me-osho-lord-buddha-buddhism/#comments

विडियो 

 

=============================================================================

प्रश्न 7   हमारा पूजा स्थल या मंदिर क्या है?

हमारा धार्मिक स्थल है “बौद्ध विहार” जहाँ पर गौतम बुद्ध और बाबा साहब आंबेडकर कि मूर्तियां लगी होती हैं| ध्यान रहे हम इनकी वंदना करते हैं पूजा नहीं करते इसलिए पूजा स्थल शब्द ही गलत होगा|

=============================================================================

प्रश्न 8  बहुजनों को अन्य धर्मों में कन्वर्ट की जगह अपने बौद्ध धम्म में ही क्यों लौटना उचित है?

मुझे सुन कर बहुत दुःख होता है जब कोई बहुजन दुसरे बहुजन के बारे में ये कहता है की वो बौध धर्म में कन्वर्ट हो गया| उस बेचारे की भी क्या गलती जो अपना इतिहास ही नहीं जानता उससे और क्या उम्मीद की जाए|इतिहास में भी बहुत बड़ी गड़बड़ और मिलावट है क्योंकि इतिहास जीतने वाला लिखवाता है और बौद्ध धम्म के विरोधीयों ने कैसा इतिहास लिखा होगा ये समझा जा सकता है|ये बात अपने दिमाग में अच्छी तरह बैठा लो की बौद्ध धम्म ही भारत की बहुसंख्यक जनता का धर्म था जिसे कई प्रकार के षडियंत्रों  द्वारा मात दी गई थी|अधिक जानकारी के समयबुद्धा की वेब साईट पर फ्री में उपलब्ध पुस्तक DECLINE AND FALL OF BUDDHISM(A tragedy in Ancient India) by Dr. K. Jamanadas डाउनलोड करें और पढ़ें | आगे से कन्वर्ट वाली बात न कहें बल्कि ये कहें की बहुत सह लिए अब हम सब वापस अपने धर्म बौद्ध धम्म में लौट रहे हैं|.

अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पढ़िए

https://samaybuddha.wordpress.com/2012/10/29/why-bahujan-should-return-back-in-buddhism/

=============================================================================

प्रश्न 9  पर मैंने सुना है कि बौद्ध धम्म हमें मानसिक रूप से कमजोर बनता हैं, ऐसे में पहले से ही दबाए- सताए बहुजनों कि बौद्ध धम्म कैसे मदत करेगा?

ध्यान रहे हर बात का समय होता है जब आप शक्तिशाली हो तब आपको अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा काम आएगी पर जब विपत्ति का समय हो तब केवल क्षमता बढ़ाना और अपने विरोधियों के खिलाफ संगर्ष करने से कल्याण होगा|

अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पढ़िए

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/01/16/samaybuddha-poornima-buddhism-dhamm-deshna-16jan2014/

 

=============================================================================

प्रश्न 10  बुद्ध धर्म के सिद्धांत क्या हैं?

बुद्ध धम्म कौतुहुल और जिज्ञासा से कम नही है , जितना  इसे जानने का प्रयत्न्न करोगे उसमे उतना ही समाते चले जाओगे। जहाँ एक ओर सारे मत , धर्म और मतावलम्बी अपने-२ उपासकों या अनाम ईशवर को महाँमडित करने का प्रयत्न्न करते हैं वही यह मत मन के कोने को छूते , झकझोरते और पूर्वग्रहों से मुक्त करता प्रतीत होता है ।हमारी नजर मे बुद्ध एक बेहतरीन मार्गदर्शक थे, चिकित्सक थे , शास्ता थे ,गुरु थे,महामानव थे और अप्रमाद योगी थे । सारी मनुष्य जाति मे बुद्ध ने जितनी संभावनाओं को जन्म दिया , किसी दूसरे मनुष्य ने नही दिया । साधारण से दिखने वाले बुद्ध के वचन क्रांति के उदघोष हैं और यही कारण है बुद्ध के वचनों के साथ क्रांति की ऐसी आँधी आती है जो हमारी जड मान्यताओं को तोड जाती है और हमारे लिये छॊड जाती है हमारी शुद्द निजता , हमारा एकांत मन । मन से विदा हो जाती है सब भीड –भाड , समाज की भेड्चाल और प्रथम बार व्यक्ति जानता है व्यक्ति होना ।

नीरव ह्र्दय
नि:स्तब्ध मन
शून्य नयन
निरभ्र गगन
सहज ध्यान

आज सत्संग की लहर चली है पर इस शब्द का मतलब है सत्य का संग, असल मैं बौध मार्ग को जानना ही सत्ये का संग होना है| क्योंकि बौध धर्म का लक्ष्य सत्ये की खोज था तो बौध साहित्य में ही सत्संग शब्द प्रथम बार इस्तेमाल हूया| तो अगर आपमें वाकई सत्य जानने की इच्छा है तो बुद्धा के मार्ग को जानो

नमो बुद्धाय

भगवान् बुद्धा ने कहा है

“तुम किसी बात को केवल इसलिये मत स्वीकार करो कि यह अनुश्रुत है, केवल इसलिये मत स्वीकारो कि यह हमारे धर्मग्रंथ के अनूकूल है या यह तर्क सम्मत है , केअवल इसलिये मत स्वीकरो कि यह यह अनुमान सम्मत है , केवल इसलिये मत स्वीकारो कि इसके कारणॊं की सावधानी पूर्वक परीक्षा कर ली गई है , केवल इसलिये मत स्वीकरो कि इस पर हमने विचार कर अनुमोदन कर लिया है , केवल इसलिये मत स्वीकारो कि कहने वाले का व्यक्तित्व आकर्षक है, केवल इसलिये मत स्वीकारो कि कहने वाला श्रमण हमारा पूज्य है । जब तुम स्वानुभव से यह जानो कि यह बातें अकुशल हैं और इन बातों के चलने से अहित होता है , दुख होता है तब तुम उन बातों को छॊड दो !”

Lord Buddha ( Angutra Nikaya , vol 1, 188-193 )

Do not believe in anything (simply)
because you have heard it.
Do not believe in traditions because they
have been handed down for many generations.
Do not believe in anything because it is
spoken and rumoured by many.
Do not believe in anything (simply)because
it is found in your religious books.
Do not believe in anything merelely on the authority
of your teachers & elders.
But after observations & analysis,
when you find anything that agrees with reason
and is conducive to the good & benefit of one & all
then accept it & live upto it .
Buddha
( Angutra Nikaya , vol 1, 188-193 )

बुद्ध सिद्धांत बहुत व्यापक है जिसे यहाँ देना संभव नहीं, फिर भी कुछ बातें यहाँ प्रस्तुत हैं:

* त्रिशरण-शील:

बुद्धम शरणम् गच्छामि- मैं बुद्ध व बुद्धि की शरण में जाता हूँ.

धम्मम शरणम् गच्छामि-मैं धम्म(धर्म) की शरण में जाता हूँ

संघम शरणम् गच्छामि-मैं संघ की शरण में जाता हूँ.

*पञ्चशील:

-पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – मैं जीव हत्या से विरत (दूर) रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.

-अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – जो वस्तुएं मुझे दी नहीं गयी हैं उन्हें लेने (या चोरी करने) से मैं विरत रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.

-कामेसु मिच्छाचारा  वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – काम (रति क्रिया) में मिथ्याचार करने से मैं विरत रहूँगा ऐसा व्रत लेता हूँ.

-मुसावादा वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – झूठ बोलने से मैं विरत रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.

-सुरामेरयमज्जपमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – मादक द्रव्यों के सेवन से मैं विरत रहूँगा, ऐसा वचन लेता हूँ

ये पांच वचन बौद्ध धर्म के अतिविशिष्ट वचन हैं और इन्हें हर गृहस्थ इन्सान के लिए बनाया गया था

*चार आर्य सत्यबुद्ध का पहले धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार आर्य सत्यों के बारे में था ।

दुःख : इस दुनिया में  दुःख व्याप्त है – जैसे जन्म, बीमारी, बूढे होने, मौत, बिछड़ने , नापसंद,चाहत सब में दुःख है ।
दुःखप्रारंभ : तृष्णाया अत्यधिक चाहतदुःख का मुख्य कारण है

दुःखनिरोध : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
दुःखनिरोधकामार्ग : तृष्णा से मुक्ति अष्टांग मार्ग के अनुसार जिन्दगी जीने से पाई जा सकती है ।

*अष्टांग मार्गबौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य- दुःख निरोध पाने का रास्ता – अष्टांग मार्ग है। जन्म से मरण तक हम जो भी करते है उसका अंतिम मकसद केवल ख़ुशी होता है,तो  निर्वाण(स्थायी ख़ुशी)  सुनिश्चित करने के लिए हमें जीवन में इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए:

१. सम्यकदृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
२. सम्यकसंकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
३. सम्यकवाक : हानिकारक बातें और झूठ न बोलना
४. सम्यककर्म : हानिकारक कर्में न करना
५. सम्यकजीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना
६. सम्यकप्रयास : अपने आप सुधारने की कोशिश करना
७. सम्यकस्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
८. सम्यकसमाधि : निर्वाण पाना और अहंकार का गायब होना

 *प्रतीत्यसमुत्पाद

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है।प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक(कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र होता है| कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है,हर घटना मूलतः शुन्य होती है।

 *अहिंसा – ध्यान रहे अन्याय सहना अहिंसा नहीं है, हमारी अहिंसा जंगल में हाथी के सामान है| इसका सही मतलब है  की हमें पहल करके हिंसा नहीं करनी चाहिए पर  खुद को बलशाली बना कर आत्मरक्षा के लिए भी हर तरह से तयार रहना चाहिए, क्योंकि अगर आप शांति चाहते हो युद्ध के लिए तयार रहना जरूरी है |

*सामाजिक समानता बुद्ध धम्म में सभी मानव सामान हैं कोई छोटा-बड़ा/ऊँचा-नीचा नहीं माना जायेगा, सबको एक सामान खुशहाली के अवसर मिलनेचाहिए |

*करुणा- सभी जीवों पर दया करो और यथा संभव मदत करते रहो

*शील – अपनी जिन्दगी को शीलवान अर्थात अपने  उसूलों के पक्के रहकर गुज़रो
*प्रज्ञा – अपने ज्ञान और विवेक को सारी जिन्दगी बढ़ाते और इस्तेमाल करते रहो

महामानव तथागत गौतम बुद्ध पर और बौद्ध धम्म कि धार्मिक किताब “धम्मपद ” पर ओशो का व्याख्यान , मूल शीर्षक = “एस धम्मो सनंतनो भाग—१”…Team SBMT

बौद्ध धम्म कि धार्मिक किताब “धम्म पद ” पर ओशो का व्याख्यान जिनमे से एक यहाँ दिया है , के ऑडियो रिकॉर्डिंग आप मुफ्त में निम्न लिंक से भी डाउनलोड कर सकते हो:

http://oshoworld.com/discourses/audio_hindi.asp?album_id=30
dhammapada oshoगौतम बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है, उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम- भगवत्ता उपलब्ध की है, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं।

गौतम बुद्ध की वाणी अनूठी है। और विशेषकर उन्हें जो सोच-विचार, चिंतन-मनन, विमर्श के आदी हैं।

हृदय से भरे हुए लोग सुगमता से परमात्मा की तरफ चले जाते हैं। लेकिन हृदय से भरे हुए लोग कहां हैं न और हृदय से भरने का कोई उपाय भी तो नहीं है। हो तो हो, न हो तो न हो। ऐसी आकस्मिक, नैसर्गिक बात पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। बुद्ध ने उनको चेताया जिनको चेताना सर्वाधिक कठिन है-विचार से भरे लोग, बुद्धिवादी, चिंतन-मननशील।

प्रेम और भाव से भरे लोग तो परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते हैं; उन्हें झुकाना नहीं पड़ता। उनसे कोई न भी कहे, तो भी वे पहुंच जाते हैं; उन्हें पहुंचाना नहीं पड़ता। लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गयी है। उंगलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं।

मनुष्य का विकास मस्तिष्क की तरफ हुआ है। मनुष्य मस्तिष्क से भरा है। इसलिए जहां जीसस हार जाएं, जहां कृष्ण की पकड़ न बैठे, वहां भी बुद्ध नहीं हारते हैं; वहां भी बुद्ध प्राणों के अंतरतम में पहुंच जाते हैं।

बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म कहा गया है। बुद्धि पर उसका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है। प्रारंभ बुद्धि से है। क्योंकि मनुष्य वहा खड़ा है। लेकिन अंत, अंत उसका बुद्धि में नहीं है। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहां सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है; जहां केवल साक्षी, मात्र साक्षी शेष रह जाता है। लेकिन बुद्ध का प्रभाव उन लोगों में तत्‍क्षण अनुभव होता है जो सोच-विचार में कुशल हैं।

बुद्ध के साथ मनुष्य-जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा जो आज भी सार्थक’ मालूम पड़ेगा, और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा। बुद्ध ने विश्लेषण दिया, एनालिसिस दी। और जैसा सूक्ष्म विश्लेषण उन्होंने किया, कभी किसी ने न किया था, और फिर दुबारा कोई न कर पाया। उन्होंने जीवन की समस्या के उत्तर शास्त्र से नहीं दिए, विश्लेषण की प्रक्रिया से दिए।

बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। अगर तुम समझने को राजी हो, तो तुम बुद्ध की नौका में सवार हो जाओगे। अगर श्रद्धा भी आएगी, तो समझ की छाया होगी। लेकिन समझ के पहले श्रद्धा की मांग बुद्ध की नहीं है। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं, भरोसा कर लो। बुद्ध कहते हैं, सोचो, विचारों, विश्लेषण करो, खोजो, पाओ अपने अनुभव से, तो भरोसा कर लेना।

दुनिया के सारे धर्मों ने भरोसे को पहले रखा है, सिर्फ बुद्ध को छोड़कर। दुनिया के सारे धर्मों में श्रद्धा प्राथमिक है, फिर ही कदम उठेगा। बुद्ध ने कहा, अनुभव प्राथमिक है, श्रद्धा आनुसांगिक है। अनुभव होगा, तो श्रद्धा होगी। अनुभव होगा, तो आस्था होगी।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, आस्था की कोई जरूरत नहीं है; अनुभव के साथ अपने से आ जाएगी, तुम्हें लानी नहीं है। और तुम्हारी लायी हुई आस्था का मूल्य भी क्या हो सकता है? तुम्हारी लायी आस्था के पीछे भी छिपे होंगे तुम्हारे संदेह।

तुम आरोपित भी कर लोगे विश्वास को, तो भी विश्वास के पीछे अविश्वास खड़ा होगा। तुम कितनी ही दृढता से भरोसा करना चाहो, लेकिन तुम्हारी दृढ़ता कंपती रहेगी और तुम जानते रहोगे कि जो तुम्हारे अनुभव में नहीं उतरा है, उसे तुम चाहो भी तो भी कैसे मान सकते हो? मान भी लो, तो भी कैसे मान सकते हो? तुम्हारा ईश्वर कोरा शब्दजाल होगा, जब तक अनुभव की किरण न उतरी हो। तुम्हारे मोक्ष की धारणा मात्र शाब्दिक होगी, जब तक मुक्ति का थोड़ा स्वाद तुम्हें न लगा हो।

बुद्ध ने कहा : मुझ पर भरोसा मत करना। मैं जो कहता हूं उस पर इसलिए भरोसा मत करना कि मैं कहता हूं। सोचना, विचारना, जीना। तुम्हारे अनुभव की कसौटी पर सही हो जाए, तो ही सही है। मेरे कहने से क्या सही होगा!

बुद्ध के अंतिम वचन हैं : अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनना। और तुम्हारी रोशनी में तुम्हें जो दिखायी पड़ेगा, फिर तुम करोगे भी क्या-आस्था न करोगे तो करोगे क्या? आस्था सहज होगी। उसकी बात ही उठानी व्यर्थ है।

बुद्ध का धर्म विश्लेषण का धर्म है। लेकिन विश्लेषण से शुरू होता है, समाप्त नहीं होता वहा। समाप्त तो परम संश्लेषण पर होता है 1 बुद्ध का धर्म संदेह का धर्म हैं। लेकिन संदेह से यात्रा शुरू होती है, समाप्त नहीं होती। समाप्त तो परम श्रद्धा पर होती है।

इसलिए बुद्ध को समझने में बड़ी भूल हुई। क्योंकि बुद्ध संदेह की भाषा बोलते

हैं। तो लोगों ने समझा, यह संदेहवादी है। हिंदू तक न समझ पाए, जो जमीन पर सबसे ज्यादा पुरानी कौम है। बुद्ध निश्चित ही बड़े अनूठे रहे होंगे, तभी तो हिंदू तक समझने से चूक गए। हिंदुओं तक को यह आदमी खतरनाक लगा, घबड़ाने वाला लगा।

हिंदुओं को भी लगा कि यह तो सारे आधार गिरा देगा धर्म के। और यही आदमी है, जिसने धर्म के आधार पहली दफा ढंग से रखे।

श्रद्धा पर भी कोई आधार रखा जा सकता है! अनुभव पर ही आधार रखा जा सकता है। अनुभव की छाया की तरह श्रद्धा उत्पन्न होती है। श्रद्धा अनुभव की सुगंध है। और अनुभव के बिना श्रद्धा अंधी है। और जिस श्रद्धा के पास आख न हों, उससे तुम सत्य तक पहुंच पाओगे?

बुद्ध ने बड़ा दुस्साहस किया। बुद्ध जैसे व्यक्ति पर भरोसा करना एकदम सुगम होता है। उसके उठने-बैठने में प्रामाणिकता होती है। उसके शब्द-शब्द में वजन होता है। उसके होने का पूरा ढंग स्वयंसिद्ध होता है। उस पर श्रद्धा आसान हो जाती है। लेकिन बुद्ध ने कहा, तुम मुझे अपनी बैसाखी मत बनाना। तुम अगर लंगड़े हो, और मेरी बैसाखी के सहारे चल लिए-कितनी दूर चलोगे? मंजिल तक न पहुंच पाओगे। आज मैं साथ हूं कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने ही पैरों पर चलना है। मेरी रोशनी से मत चलना, क्योंकि थोड़ी देर को संग-साथ हो गया है अंधेरे जंगल में। तुम मेरी रोशनी में थोड़ी देर रोशन हो लोगे, फिर हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मेरी रोशनी मेरे साथ होगी, तुम्हारा अंधेरा तुम्हारे साथ होगा। अपनी रोशनी पैदा करो। अप्प दीपो भव!

यह बुद्ध का धम्मपद, कैसे वह रोशनी पैदा हो सकती है अनुभव की, उसका विश्लेषण है। श्रद्धा की कोई मांग नहीं है। श्रद्धा की कोई आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए बुद्ध को लोगों ने नास्तिक कहा। क्योंकि बुद्ध ने यह भी नहीं कहा कि तुम परमात्मा पर श्रद्धा करो।

तुम कैसे करोगे श्रद्धा? तुम्हें पता होता तो तुम श्रद्धा करते ही। तुम्हें पता नहीं है। इस अज्ञान में तुम कैसे श्रद्धा करोगे? और अज्ञान में तुम जो श्रद्धा बांध भी लोगे, वह तुम्हारी अज्ञान की ईंटों से बना हुआ भवन होगा; उसे तुम परमात्मा का मंदिर कैसे कहोगे? वह तुमने भय में बना लिया होगा। मौत डराती होगी, इसलिए सहारा पकड़ लिया होगा। यहां जिंदगी हाथ से जाती मालूम होती होगी, इसलिए स्वर्ग की कल्पनाएं कर ली होंगी। लेकिन इन कल्पनाओं से, भय पर खड़ी हुई इन धारणाओं से, कहीं कोई मुका हुआ है! इससे ही तो आदमी पंगु है। इससे ही तो आदमी पक्षाघात में दबा है। इसलिए बुद्ध ने ईश्वर की बात नहीं की।

एच जी वेल्स ने बुद्ध के संबंध में कहा है कि पृथ्वी पर इस जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और इस जैसा ईश्वर-विरोधी व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है-सो गॉड लाइक एंड सो गॉडलेस! अगर तुम ईश्वरीय प्रतिभाओं को खोजने निकलो तो तुम बुद्ध से ज्यादा ईश्वरीय प्रतिभा कहां पाओगे? सो गॉडलेस! और फिर भी इतना ईश्वर-शुन्य! ईश्वर की बात ही नहीं की। इस शब्द को ही गंदा माना। इस शब्द का उच्चार नहीं किया। इससे यह मत समझ लेना कि ईश्वर-विरोधी थे बुद्ध। उच्चार नहीं किया, क्योंकि उस परम शब्द का उच्चार किया नहीं जा सकता।

उपनिषद कहते हैं, ईश्वर के संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन इतना तो कह ही देते हैं। बुद्ध ने इतना भी न कहा। वे परम उपनिषद हैं। उनके पार उपनिषद नहीं जाता। जहां उपनिषद समाप्त होते हैं, वहां बुद्ध शुरू होते हैं। आखिर इतना तो कह ही दिया, रोक न सके अपने को, कि ईश्वर निर्गुण है। तो निर्गुण उसका गुण बना दिया। कहा कि ईश्वर निराकार है, तो निराकार उसका आकार हो गया। लेकिन बिना कहे न रह सके। उपनिषद के ऋषि भी बोल गए! मौन में ही सम्हालना था उस संपदा को, बोलकर गंवा दी। बंधी मुट्ठी लाख की थी, खुली दो कौड़ी की हो गयी। वह बात ऐसी थी कि कहनी नहीं थी। क्योंकि तुम जो कुछ भी कहोगे, वह गलत होगा। यह कहना भी कि परमात्मा निराकार है, गलत है, क्योंकि निराकार भी एक धारणा है। वह भी आकार से ही जुड़ी है। आकार के विपरीत होगी, तो भी आकार से संबंधित है।

निराकार का क्या अर्थ होता है? जब भी अर्थ खोजने जाओगे, आकार का उपयोग करना पड़ेगा। निर्गुण का क्या अर्थ :होता है? जब भी कोई परिभाषा पूछेगा, गुण को परिभाषा में लाना पड़ेगा। ऐसी निर्गुणता भी बड़ी नपुंसक है, जिसकी परिभाषा में गुण लाना पड़ता है! और ऐसे निराकार में क्या निराकार होगा, जिसको समझाने के लिए आकार लाना पड़ता है!

बुद्ध ‘से ज्यादा कोई भी नहीं बोला; और बुद्ध से ज्यादा चुप भी कोई नहीं है। कितना बुद्ध ‘बोले हैं! अन्वेषक खोज करते हैं तो वे कहते हैँ, एक आदमी इतना बोला, यह संभव कैसे है! उन्हें डर लगता है कि इसमें बहुत कुछ प्रक्षिप्त है, दूसरों ने डाल दिया है। कुछ भी प्रक्षिप्त नहीं है। जितना बुद्ध बोले, पूरा संगृहीत ही नहीं हुआ है। खूब बोले। और फिर भी उनसे ज्यादा चुप -कोई भी नहीं है। क्योंकि जहाँ-जहां नहीं बोलना था, वहां नहीं बोले। ईश्वर के संबंध में एक शब्द न कहा। इस खतरे को भी मोल लिया कि लोग नास्तिक समझेंगे। और आज तक लोग नास्तिक समझे जा रहे हैं। और इससे बड़ा कोई आस्तिक कभी हुआ नहीं।

बुद्ध महा आस्तिक हैं। अगर परमात्मा के संबंध में कुछ कहना संभव नहीं है, तो फिर बुद्ध ने ही कुछ कहा-चुप रह कर; इशारा किया।

पश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक विटगेंस्टीन ने अपनी बड़ी अनूठी किताब ट्रैक्टेटस में लिखा है कि जिस संबंध में कुछ कहा न जा सके, उस संबंध में बिलकुल चुप रह जाना उचित है। दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। जो नहीं कहा जा सकता, कहना ही मत, कहना ही नहीं चाहिए।

अगर विट्गिस्टीन बुद्ध को देखता तो समझता। अगर विट्गिस्टीन के वचन को बुद्ध ने समझा होता तो वे मुस्कुराते और उन्होंने स्वीकृति दी होती। विट्गिस्टीन को भी पश्चिम में लोग नास्तिक समझे। नास्तिक नहीं है। पर जो कही नहीं जा सकती बात, अच्छा है न ही कही जाए। कहने से बिगड़ जाती है। कहने से गलत हो जाती है।

लाओत्से तक, कहता तो है प्रथम वचन में अपने ताओ -तेह-किंग में कि सत्य कहा नहीं जा सकता, और जो भी कहा जाए वह असत्य हो जाता है; लेकिन फिर भी सत्य के संबंध में बहुत सी बातें कही हैं। बुद्ध ने नहीं कहीं। तुम कहोगे, फिर बुद्ध कहते क्या रहे? बुद्ध ने स्वास्थ्य के संबंध में एक शब्द भी नहीं कहा, केवल बीमारी का विश्लेषण किया और निदान किया, औषधि की व्यवस्था की। बुद्ध ने कहा, मैं एक वैद्य हूं; मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं। मैं तुम्हारी बीमारी का विश्लेषण करूंगा, निदान करूंगा, औषधि सुझा दूंगा; और जब तुम ठीक हो जाओगे, तभी तुम जानोगे कि स्वास्थ्य क्या है। मैं उस संबंध में कुछ भी न कहूंगा।

स्वास्थ्य जाना जाता है, कहा नहीं जा सकता। बीमारी मिटायी जा सकती है, बीमारी समझायी जा सकती है, बीमारी बनायी जा सकती है, बीमारी का इलाज हो सकता है-सही हो सकता है, गलत हो सकता है-बीमारी के साथ बहुत कुछ हो सकता है। स्वास्थ्य? जब बीमारी नहीं होती तब जो शेष रह जाता है, वही। उस तरफ केवल इशारे हो सकते हैं, मौन। इंगित हो सकते हैं-वे भी प्रत्यक्ष नहीं, बड़े परोक्ष।

बुद्ध के धर्म को शून्यवादी कहा गया है। शून्यवादी उनका धर्म है। लेकिन इससे यह मत समझ लेना कि शून्य पर उनकी बात पूरी हो जाती है। नहीं, बस शुरू होती है।

बुद्ध एक ऐसे उतुंग शिखर हैं, जिसका आखिरी शिखर हमें दिखायी नहीं पड़ता। बस थोड़ी दूर तक हमारी आंखें जाती हैं, हमारी आंखों की सीमा है। थोड़ी दूर तक हमारी गर्दन उठती है, हमारी गर्दन के झुकने की सामर्थ्य है। और बुद्ध खोते चले जाते हैं-दूर.. हिमाच्छादित शिखर हैं। बादलों के पार! उनका प्रारंभ तो दिखायी पड़ता है, उनका अंत दिखायी नहीं पड़ता। यही उनकी महिमा है। और प्रारंभ को जिन्होंने अंत समझ लिया, वे भूल में पड़ गए। प्रारंभ से शुरू करना; लेकिन जैसे-जैसे तुम शिखर पर उठने लगोगे, और आगे, और आगे दिखायी पड़ने लगा, और आगे दिखायी पड़ने लगेगा।

बहुत लोग बोले हैं। बहुत लोगों ने मनुष्य के रोग का विश्लेषण किया है; लेकिन ऐसा सचोट नहीं। बड़े सुंदर ढंग से लोगों ने बातें कही हैं, बड़े गहरे प्रतीक उपाय में लाए हैं। पर बुद्ध, बुद्ध के कहने का ढंग ही और है। अंदाजे-बया और! जिसने एक बार सुना, पकड़ा गया। जिसने एक बार आख से आख मिला ली, फिर भटक न पाया। जिसको बुद्ध की थोड़ी सी भी झलक मिल गयी, उसका जीवनरूपांतरित हुआ।

आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, जिस दिन बुद्ध का जन्म हुआ, घर में उत्सव मनाया जाता था। सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था, पूरी राजधानी सजी थी। रातभर लोगों ने दीए जलाए, नाचे। उत्सव का क्षण था! बूढ़े सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था। बड़े दिन की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। मालिक बूढ़ा होता जाता था और नए मालिक की कोई खबर न थी। इसलिए बुद्ध को सिद्धार्थ नाम दिया। सिद्धार्थ का अर्थ होता है, अभिलाषा का पूरा हो जाना।

पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड-बाजे बजते थे, शहनाई बजती थी, फूल बरसाए थे महल में, चारों तरफ प्रसाद बंटता था, हिमालय से भागा हुआ एक वृद्ध तपस्वी द्वार पर खड़ा हुआ आकर। उसका नाम था असिता। सम्राट भी उसे सम्मान करता था। और कभी असिता राजधानी नहीं आया था। जब कभी जाना था तो शुद्धोदन को, सम्राट को, स्वयं उसके दर्शन करने जाना होता था। ऐसे बचपन के साथी थे। फिर शुद्धोदन सम्राट हो गया, बाजार की दुनिया में उलझ गया। असिता महातपस्वी हो गया। उसकी ख्याति दूर-दिगंत तक फैल गयी। असिता को द्वार पर आए देखकर शुद्धोदन ने कहा, आप, और यहां! क्या हुआ? कैसे आना हुआ? कोई मुसीबत है? कोई अड़चन है? कहे। असिता ने कहा, नहीं, कोई मुसीबत नहीं, कोई अड़चन नहीं। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ, उसके दर्शन को आया हूं।

शुद्धोदन तो समझ न पाया। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा तपस्वी और बेटे के दर्शन को आया। भागा गया अंतगृह में। नवजात शिशु को लेकर बाहर आ गया। असिता झुका, और उसने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने अपने पैर उसकी जटाओं में उलझा दिए। फिर तब से आदमी की जटाओं में बुद्ध के पैर उलझे हैं। फिर आदमी छुटकारा नहीं पा सका। और असिता हंसने लगा, और रोने भी लगा। और शुद्धोदन ने पूछा कि इस शुभ घड़ी में आप रोते क्यों हैं?

असिता ने कहा, यह तुम्हारे घर जो बेटा पैदा हुआ है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है; असाधारण है। कई सदियां बीत जाती हैं। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं है; यह अनंत-अनंत लोगों के लिए सिद्धार्थ है। अनेकों की अभिलाषाएं इससे पूरी होंगी। हंसता हूं, कि इसके दर्शन मिल गए। हंसता हूं प्रसन्न हूं? कि इसने मुझ के की जटाओं में अपने पैर उलझा दिए। यह सौभाग्य का क्षण है! रोता इसलिए हूं कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दिग-दिगंत में इसकी सुवास उठेगी, और इसकी सुवास की छाया में करोड़ों लोग राहत लेंगे, तब मैं न रहूंगा। यह मेरा शरीर छूटने के करीब आ गया।

और एक बड़ी अनूठी बात असिता ने कही है, वह यह कि अब तक आवागमन से छूटने की आकांक्षा थी, वह पूरी भी हो गयी; आज पछतावा होता है। एक जन्म

अगर और मिलता तो इस बुद्धपुरुष के चरणों में बैठने की, इसकी वाणी सुनने की, इसकी सुगंध को पीने की, इसके नशे में डूबने की सुविधा हो जाती। आज पछताता हूं लेकिन मैं मुक्त हो चुका हूं। यह मेरा आखिरी अवतरण है; अब इसके बाद देह न धर सकूंगा। अब तक सदा ही चेष्टा की थी कि कब छुटकारा हो इस शरीर से, कब आवागमन से आज पछताता हूं कि अगर थोड़ी देर और रुक गया होता.। इसे तुम थोड़ा समझो।

बुद्ध के फूल के खिलने के समय, असिता चाहता है, कि अगर मोक्ष भी दांव पर लगता हो तो कोई हर्जा नहीं। तब से पच्चीस सौ साल बीत गए। बहुत प्रज्ञा-पुरुष हुए। लेकिन बुद्ध अतुलनीय हैं। और उनकी अतुलनीयता इसमें है कि उन्होंने इस सदी के लिए धर्म दिया, और आने वाले भविष्य के लिए धर्म दिया। कृष्ण की बात कितनी ही समझाकर कही जाए, इस सदी के लिए मौजूं नहीं बैठती। फासला बड़ा हो गया है। बड़ा अंतराल पड़ गया है। कृष्ण ने जिनसे कहा था उनके मनों में, और जिनके मन आज उसे सुनेंगे, बड़ा अंतर है। बुद्ध की कुछ बात ऐसी है, कि ऐसा लगता है अभी-अभी उन्होंने कही। बुद्ध की बात को समसामयिक बनाने की जरूरत नहीं है; वह समसामयिक है, वह कंटेम्प्रेरी है। कृष्ण पर बोलो, तो कृष्ण को खींचकर लाना पड़ता है बीसवीं सदी में; बुद्ध को नहीं लाना पड़ता। बुद्ध जैसे खड़े ही हैं, बीसवीं सदी में ही खड़े हैं। और ऐसा अनेक सदियों तक रहेगा। क्योंकि मनुष्य ने जो होने का ढंग अंगीकार कर लिया है, बुद्धि का, वह अब ठहरने को है; वह अब जाने को नहीं है। और उसके साथ ही बुद्ध का मार्ग ठहरने को है।

धम्मपद उनका विश्लेषण है। उन्होंने जो जीवन की समस्याओं की गहरी छानबीन की है, उसका विश्लेषण है। एक-एक शब्द को गौर से समझने की कोशिश करना। क्योंकि ये कोई सिद्धात नहीं हैं जिन पर तुम श्रद्धा कर लो। ये तो निष्पत्तियां हैं, प्रयोग की। अगर तुम भी इनके साथ विचार करोगे तो ही इन्हें पकड़ पाओगे। यह आख बंद करके स्वीकार कर लेने का सवाल नहीं है; यह तो बड़े सोच-विचार, मनन का सवाल है।

साधारणत: आदमी की जिंदगी क्या है? कुछ सपने! कुछ टूटे-फूटे सपने! कुछ अभी भी साबित, भविष्य की आशा में अटके! आदमी की जिंदगी क्या है? अतीत के खंडहर, भविष्य की कल्पनाएं! आदमी का पूरा होना क्या है? चले जाते हैं, उठते हैं, बैठते हैं, काम करते हैं-कुछ पक्का पता नहीं, क्यों? कुछ साफ जाहिर नहीं, कहा जा रहे हैं? बहुत जल्दी में भी जा रहे हैं। बड़ी पहुंचने की तीव्र उत्कंठा है, लेकिन कुछ पक्का नहीं, कहां पहुंचना चाहते हैं? किस तरफ जाते हो?

कल मैं एक गीत पढ़ता था साहिर का :

न कोई जादा न कोई मंजिल न रोशनी का सुराग

भटक रही है खलाओं में जिंदगी मेरी

न कोई रास्ता, न कोई मंजिल,

रोशनी का सुराग भी नहीं;

कोई एक किरण भी नहीं।

और पूरी जिंदगी अंधेरी घाटियों में,

शून्य में भटक रही है।

भटक रही है खलाओं में जिंदगी मेरी

ऐसी ही मनुष्य की दशा है सदा से। बहुत सी झूठी मंजिलें भी तुम बना लेते हो। राहत के लिए कुछ तो चाहिए! सत्य बहुत कडुवा है। और अगर सत्य के साथ तुम खड़े हो जाओ, तो खड़े होना भी मुश्किल मालूम होगा।

सिगमंड फ्रायड ने कहा है कि आदमी बिना झूठ के जी नहीं सकता। झूठ सहारा है। तो हम झूठी मंजिलें बना लेते हैं। असली मंजिल का तो कोई पता नहीं। बिना मंजिल के जीना असंभव। कैसे जीओगे बिना मंजिल के? अगर यह पक्का ही हो जाए कि पता ही नहीं कहो जा रहे हैं, तो पैर कैसे उठेंगे? यात्रा कैसे होगी? तो हम कल्‍पित मंजिल बना लेते हैं, एक झूठी मंजिल बना लेते हैं। उससे राहत मिल जाती है, लगता है कहीं जा रहे हैं। कोई रास्ता नहीं है क्योंकि झूठी मंजिलों के कहीं कोई रास्ते होते हैं! जब मंजिल ही झूठी है, तो रास्ता कैसे हो सकता है? तो फिर हम रास्ता भी बना लेते हैं। रास्ता बना लेते हैं, मंजिल बना लेते हैं-सब कल्पित, सब मन के जाल, सब सपने! और ऐसे अपने को भर लेते हैं। और लगता है शून्य भर गया, जिंदगी बड़ी भरी-पूरी है।

कोई कुछ दिन हुए चल बसा। एक मित्र ने आकर कहा कि आपको पता चला, फलां-फलां व्यक्ति चल बसे? बड़ी भरी-पूरी जिंदगी थी! मैंने पूछा, रुको। चल बसे, ठीक; उसमें तो कुछ किया नहीं जा सकता। लेकिन भरी-पूरी जिंदगी थी, यह तुमसे किसने कहा? शायद उन्होंने सोचकर कहा भी नहीं था। थोड़े झिझके; कहा, मैं तो ऐसे ही कह रहा था। कहने की बात थी। पर मैंने कहा, कहा तब तुम भी सोचते होओगे कि बड़ी भरी-पूरी जिंदगी थी। मैं उनको जानता हू। और अगर तुम मुझसे पूछो तो कुछ भी नहीं हुआ, क्योंकि वे मरे हुए ही थे। अब मरा हुआ मर जाए इसमें कौन सी बड़ी घटना हो गयी। जिंदा वे कभी थे नहीं। क्योंकि जिंदगी तो सत्य के साथ ही उपलब्ध होती है, और कोई जिंदगी नहीं है। लेकिन जो झूठ के साथ जी रहा है, वह भी सोचता है, जिंदगी भरी-पूरी है।

कितने झूठ तुमने बना रखे हैं! लड़का बड़ा होगा, शादी होगी, बच्चे होंगे, धन कमाएगा, यश पाएगा, और तुम मर रहे हो! और तुम्हारे बाप भी ऐसे ही मरे, किं तुम बड़े होओगे, कि शादी होगी, कि धन कमाओगे। और तुम्हारा लड़का थी ऐसे ही मरेगा। जिंदगी बड़ी भरी-पूरी जा रही है!

बाप बेटे के लिए मर जाता है। बेटा अपने बेटे के लिए मर जाता है। ऐसा एक-दूसरे पर मरते चले जाते हैं। कोई जीता नहीं। मरना इतना आसान, जीना इतना कठिन!

लोग सोचते हैं, मौत बड़ी दुस्तर है। गलत सोचते हैं। मौत में क्या दुस्तरता है? क्षण में मर जाते हो। जिंदगी दुस्तर है। सत्तर साल जीना होता है। और बिना झूठ के तुम जीना नहीं जानते हो, तो तुम हजार तरह के झूठ खड़े कर लेते हो-यश, पद, प्रतिष्ठा, सफलता, धन। जब इनसे चुक जाते हो तो धर्म, मोक्ष, स्वर्ग, परमात्मा, आत्मा, ध्यान, समाधि। पर तुम कुछ न कुछ ताकि अपने को भरे रखो। और ध्यान रखना, बुद्ध का सारा जोर झूठ से खाली हो जाने पर है। सत्य से भरना थोड़े ही पड़ता है। झूठ से खाली हुए तो जो शेष रह जाता है, वही सत्य है। गयी बीमारी, जो बचा वही स्वास्थ्य है।

लेकिन कितने ही लोगों ने जगाने की कोशिश की है, तुम जागते नहीं। आदमी का झूठ को पैदा करने का अभ्यास इतना गहरा है कि वह बुद्ध के आसपास भी-बुद्ध भी मौजूद हों जगाने को तो उनके आसपास भी-अपनी नींद की सुविधा जुटा लेता है। बुद्ध जगाते हैं; तुम उनके जगाने की चेष्टा को भी नशा बना लेते हो। तुम हर चीज में से शराब निकाल लेते हो। ऐसी कोई चीज नहीं है जिसमें से तुम शराब न निकाल लो। इसलिए तो बुद्ध आते हैं, चले जाते हैं; बुद्धपुरुष पैदा होते हैं, विदा हो जाते हैं; तुम अपनी जगह अडिग खड़े रहते हो, तुम अपने झूठ से हटते नहीं। शायद, बुद्धपुरुषों ने जो कहा उसको भी तुम अपने झूठ में सम्मिलित कर लेते हो।

क्या है तुम्हारे झूठ का राज? अहंकार। अहंकार सरासर झूठ है। ऐसी कोई चीज कहीं है नहीं। तुम हो नहीं, सिर्फ एक भ्रांति हो; है तो पूर्ण। सारा अस्तित्व इकट्ठा है। यह भ्रांति है कि तुम अलग हो।

कल ही एक मित्र से मैंने कहा कि अब जागो। तो उन्होंने कहा कि कोशिश बहुत करता हूं मन निंदा से भी भर जाता है अपने प्रति, अपराधी भी मालूम होता हूं; बेईमान भी मालूम पड़ता हूं-क्योंकि जो करना चाहिए मालूम है, समझ में आता है, और नहीं कर रहा हूं। तो मैंने उनसे कहा, तुम एक ही कृपा करो, यह करने का खयाल छोड़ दो। क्योंकि उसने पैदा किया, वही श्वास ले रहा है, तुम करना भी उसी पर छोड़ दो। उन्होंने कहा कि जन्म उसने दिया, इतना तक तो मैं मान सकता हूं; लेकिन बाकी और काम वही कर रहा है, यह नहीं मान सकता। यह तो मैं मान ही नहीं सकता कि बेईमानी भी वही कर रहा है।

अब यह थोड़ा सोचने जैसा है। हमें भी लगेगा कि बेचारा, धार्मिक बात तो कह रहा है यह व्यक्ति, कि बेईमानी कैसे परमात्मा पर छोड़ दूं? लेकिन नहीं, सवाल यह नहीं है। अहंकार…! यह कोई परमात्मा को बचाने की चेष्टा नहीं है कि परमात्मा पर बेईमानी कैसे सौंप दूं; यह भी अहंकार को बचाने की चेष्टा है। ध्यान रखना कि जब बेईमानी तुम करोगे, तो ईमानदारी भी तुम ही करोगे। लेकिन जब जन्म भी तुम्हारा अपना नहीं है और मौत भी तुम्हारी अपनी नहीं है, तो दोनों के बीच में तुम्हारा अपना कुछ कैसे हो सकता है? जब दोनों छोर पराए हैं, जब जन्म के पहले कोई और के हाथ में तुम हो, मौत के बाद किसी और के हाथ में, तो यह बीच की थोड़ी सी जो घड़ियां हैं, इनमें तुम अपने को सोच लेते हो अपने हाथ में, वहीं भ्रांति हो जाती है। वही अहंकार तुम्हें जगने नहीं देता। वही अहंकार सोने की नयी तरकीबें, व्यवस्थाएं खोज लेता है।

इसलिए बुद्धपुरुष आते हैं। उनके तीर ठीक तरकस से तुम्हारे हृदय की तरफ निकलते हैं। पर तुम बचा जाते हो।

हजारों खिज़ पैदा कर चुकी है नस्ल आदम की

आदमी ने कितने बुद्धपुरुष पैदा किए!

हजारों खिज़-पैगंबर, तीर्थंकर!

हजारों खिज़ पैदा पर चुकी है

नस्ल आदम की ये सब तस्लीम

लेकिन आदमी अब तक भटकता है

यह सब तस्लीम, यह सब स्वीकार कि हजारों बुद्धपुरुष हुए हैं। पर इससे क्या फर्क पड़ता है? आदमी अब तक भटकता है। आदमी भटकना चाहता है। कहता तो आदमी यही है कि भटकना नहीं चाहता। कहते तो तुम मेरे पास यही हो, शात होना चाहते हैं, सत्य होना चाहते हैं, सरल होना चाहते हैं। लेकिन सच में तुम होना चाहते हो? या कि सरलता के नाम पर तुम नयी जटिलता खोज रहे हो? या सत्य के नाम पर तुमने नए झूठों की तलाश शुरू की है? या शाति के नाम पर अब तुमने एक नया रोग पाला? अब तुम शाति के नाम पर अशात होने को उत्सुक हुए हो? साधारण आदमी अशात होता है सिर्फ, शाति की तो कम से कम चिंता नहीं होती। अब तुम शाति के लिए भी चिंतित हुए। पुरानी अशांति तो बरकरार, अब तुम और धन करोगे उसमें, गुणनफल करोगे। अब तुम कहोगे कि शाति भी चाहिए। अब एक नयी अशांति जुड़ी, कि शाति नहीं है। झूठ तो तुम थे; अब तुम कहते हो, सत्य खोजेंगे। अब तुम सत्य के नाम पर कुछ नए झूठ ईजाद करोगे-स्वर्ग के, मोक्ष के, नर्क के, परमात्मा के, आकाश के।

मंदिरों में जाओ, स्वर्गों के नक्शे टंगे हैं-पहला स्वर्ग, दूसरा स्वर्ग; पहला खंड, दूसरा खंड, तीसरा खंड, सच खंड तक; नक्शे टंगे हुए हैं। आदमी की मूढ़ता की कोई सीमा है, कोई अंत है! अपने घर का नक्शा भी तुमसे बनेगा नहीं। अपना भी नक्शा तुम बना न सकोगे कि तुम क्या हो, कहो हो, कौन हो; तुमने स्वर्ग के नक्शे बना लिए!

एक दुकान पर एक शिकारी कुछ सामान खरीद रहा था। अफ्रीका जा रहा था शिकार करने। कहीं जंगल में भटक न जाए, इसलिए उसने एक यंत्र खरीदा : दिशासूचक यंत्र, कॅम्पास। और तो सब ठीक था, उसने खोलकर देखा, लेकिन कॅम्पास में पीछे एक आईना भी लगा था। यह उसकी समझ में न आया। क्योंकि यह कोई कॅम्पास है या किसी स्त्री का साज-श्रृंगार का सामान? इसमें आईना किसलिए लगा है? यह दिशासूचक यंत्र है, इसमें आईने की क्या जरूरत? उसने दुकानदार से पूछा कि और सब तो ठीक है, लेकिन यह मेरी समझ में नहीं आया कि इसमें आईना क्यों लगा है? दुकानदार ने कहा, यह इसलिए कि जब तुम भटक जाओ, तो कॅम्पास तो बताएगा स्थान, आईने में तुम देख लेना ताकि पता चल जाए-कौन भटक गया है? कहा भटक गए हो यह तो कॅम्पास से पता चल जाएगा; लेकिन कौन भटक गया है!

अपना पता नहीं है, स्वर्ग के नक्शा बना दिए हैं! विवाद चल रहे हैं लोगों के-कितने नर्क होते हैं? हिंदू कहते हैं, तीन। जैन कहते हैं, सात। बुद्ध ने बड़ी मजाक की है, उन्होंने कहा, सात सौ। यह मजाक की है, क्योंकि बुद्ध को जरा भी उत्सुकता नहीं है इस तरह की मूढ़ताओं में। लेकिन मजाक भी -नहीं समझ पाते लोग। बुद्ध के मानने वाले हैं जो कहते हैं कि नहीं, सात सौ ही होते हैं, इसीलिए कहे। मैं तुमसे कहता हूं सात हजार।

आदमी सत्य से भी झूठ खोज लेता है। इसलिए आदमी भटकता है।

बुद्ध बड़े शुद्ध खोजी हैं। उनकी खोज बड़ी निर्दोष। घर छोड़ा तो जितने गुरु उपलब्ध थे, सबके पास गए। गुरु उनसे थक गए; क्योंकि असली शिष्य आ जाए तभी पता चलता है कि गुरु-गुरु है या नहीं। झूठे शिष्य हों साथ, तो पता ही नहीं चलता।

लोग मुझसे पूछते हैं आकर, कि असली गुरु का कैसे पता चले? मैं उनको कहता हूं तुम फिक्र न करो। अगर तुम असली शिष्य हो, पता चल जाएगा। नकली गुरु तुमसे बचेगा, भागेगा, कि यह चला आ रहा है असली शिष्य, यह झंझट खड़ी करेगा। तुम गुरु की फिक्र ही छोड़ दो। असली शिष्य अगर तुम हो, तो नकली गुरु तुम्हारे पास टिकेगा ही नहीं। तुम टिके रहना, वही भाग जाएगा।

जिब्रान की कहानी है कि एक आदमी गांव-गाव कहता फिरता था कि मुझे स्वर्ग का पता है, जिनको आना हो मेरे साथ आ जाओ। कोई आता नहीं था, क्योंकि लोगों को हजार दूसरे काम हैं, कोई स्वर्ग जाने की इतनी जल्दी वैसे भी किसी को नहीं है। लोग स्वर्गीय तो मजबूरी में होते हैं। जब हाथ-पैर ही नहीं चलते और लोग मरघट पर पहुंचा आते हैं, तब स्वर्गीय होते हैं। कोई स्वर्गीय होने को राजी नहीं था। लोग कहते, आपकी बात सुनते हैं, जंचती है; जब जरूरत होगी तब उपयोग करेंगे, मगर अभी कृपा करें, अभी…अभी हमें जाना नहीं।

एक गांव में ऐसा हुआ.. उस आदमी का खूब धंधा चलता था। क्योंकि जिनको स्वर्ग नहीं जाना, उनको बचने के लिए भी गुरु को कुछ गुरु-दक्षिणा देनी पड़ती थी। वह आ जाए गांव में और समझाए, तो उसकी कुछ सेवा भी करनी पड़ती, पैर भी पड़ने पड़ते। वे कहते, तुम बिलकुल ठीक हो, मगर अभी हम साधारणजन, अभी संसार में उलझे हैं; जब कभी सुलझेंगे, जरूर आपकी बात का खयाल करेंगे। रख लेते हैं सम्हालकर हृदय में। तो गुरु का धंधा भी चलता था। न कभी कोई झंझट आयी थी, न कुछ!

एक गांव में उपद्रव हो गया। एक असली शिष्य मिल गया। उसने कहा, अच्छा, तुम्हें पता है! पक्का पता है? बिलकुल पक्का पता है। क्योंकि अभी तक कोई झंझट आयी नहीं थी। उसने कहा, अच्छा, मैं चलता हूं। कितने दिन लगेंगे पहुंचने में? तब जरा गुरु घबड़ाया कि यह जरा उपद्रवी मालूम पड़ता है। पैर छुओ, बात ठीक है। साथ चलने की बात! मगर अब सबके सामने मना भी नहीं कर सका। उसने कहा, देखेंगे, भटकाके साल दो साल, भाग जाएगा अपने आप। छह साल बीत’ गए। वह उनके पीछे ही पड़ा है। वह कहता है कि कब आएगा? अभी तक आया नहीं। एक दिन उस गुरु ने कहा, तेरे हाथ जोड़ता हूं भैया! तू जब तक न मिला था हमको भी पता था, अब तेरे कारण हमारा भी! असली शिष्य मिल जाए, तो फिर गुरु अपने आप।

दुनिया में नकली गुरु हैं, क्योंकि नकली शिष्यों की बड़ी संख्या है। नकली गुरु तो बाइप्राडक्ट हैं। वे सीधे पैदा नहीं होते। नकली शिष्य उन्हें पैदा कर लेता है।

बुद्ध सभी गुरुओं के पास गए। गुरु घबड़ा गए। क्योंकि यह व्यक्ति निश्चित प्रामाणिक था। जो उन्होंने कहा, वह इसने इतनी पूर्णता से किया कि उनको भी दया आने लगी, कि यह तो हमने भी नहीं किया है! कोई करता ही नहीं था, तब तक बात ठीक थी 1 इस पर दया आने लगी। इससे यह भी न कह सकते थे कि तुमने पूरा नहीं किया, इसलिए उपलब्ध नहीं हो रहा है। इसने पूरा-पूरा किया। उसमें तो रत्ती भर कमी नहीं रखी। गुरुओं ने हाथ जोड़कर कहा कि बस, हम यहां तक तुम्हें बता सकते थे, इसके आगे हमें खुद भी पता नहीं है।

सारे गुरुओं को बुद्ध ने चुका डाला। एक गुरु साबित न हुआ। तब सिवाय इसके कोई रास्ता न रहा कि खुद खोजें। और इसीलिए बुद्ध की बातों में बड़ी ताजगी है, क्योंकि उन्होंने खुद खोजा। किसी गुरु से नहीं पाया था। किसी से सुनकर नहीं दोहराया था। फिर खुद खोज पर निकले-नितांत अकेले, बिना किसी सहारे के। शास्त्र धोखा दे गए गुरु धोखा दे गए, सब पीछे हट गए, अकेला रह गया खोजी। ऐसा ही होता है। जब तुम्हारी खोज असली होगी, तुम पाओगे शास्त्र काम नहीं देते। शास्त्र तभी तक काम देते हैं जब तक तुम उनका भजन-पाठ करते हो। बस तभी तक। अगर तुमने यात्रा शुरू की, तुम तत्क्षण पाओगे शास्त्र में हजार गलतियां हैं। होनी ही चाहिए। क्योंकि हजारों साल तक हजारों लोग उसे दोहराते रहे हैं, बनाते रहे हैं। उसमें बहुत कुछ छूट गया है, बहुत कुछ जुड़ गया है। लेकिन यह तो पता तुम्हें तभी चलेगा जब तुम यात्रा करोगे।

एक तुम नकशा लिए घर में बैठे हो, उसकी तुम पूजा करते हो-तो कैसे पता चलेगा? यात्रा पर निकलो तब तुम्हें पता चलेगा-अरे, इस नक्शो में नदी बतायी है, यहां कोई नदी नहीं है! इस नक्शो में पहाड़ बताया है, यहां कोई पहाड़ नहीं है!

एस धम्मो सनंतनो इस नक्शो में कहा है बाएं मुड़ना, बाएं मुड़ो तो गड्डा है। यात्रा होती नहीं। दाएं मुड़ो तो ही हो सकती है।

जब तुम यात्रा पर निकलोगे तभी परीक्षा होती है तुम्हारे नक्‍शो की। उसके बिना कोई परीक्षा नहीं। जो भी यात्रा पर गए, उन्होंने शास्त्र को सदा कम पाया। जो भी यात्रा पर गए, उन्होंने गुरुओं को कम पाया। जो भी यात्रा पर गए, उन्हें एक बात अनिवायरूपेण पता चली कि प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं ही खोजना पड़ता है। दूसरे से सहारा मिल जाए, बहुत। पर कोई दूसरा तुम्हें मार्ग नहीं दे सकता। क्योंकि दूसरा जिस मार्ग पर चला था, तुम उस पर कभी भी न चलोगे। वह उसके लिए था। वह उसका था। वह उसके स्वभाव में अनुकूल बैठता था।

और प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है।

बुद्ध ने यह घोषणा की कि प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है। इसलिए एक ही राजपथ पर सभी नहीं जा सकते, सबकी अपनी पगडंडी होगी। इसीलिए सदगुरु तुम्हें रास्ता नहीं देता, केवल रास्ते को समझने की परख देता है। सदगुरु तुम्हें विस्तार के नक्शो नहीं देता, केवल रोशनी देता है, ताकि तुम खुद विस्तार देख सको, नक्शो तय कर सको। क्योंकि नक्शो रोज बदल रहे हैं।

जिंदगी कोई घिर बात नहीं है, जड़ नहीं है। जिंदगी प्रवाह है। जो कल था वह आज नहीं है, जो आज है वह कल नहीं होगा।

सदगुरु तुम्हें प्रकाश देता है, रोशनी देता है, दीया देता है हाथ में कि यह दीया ले लो, अब तुम खुद खोजो और निकल जाओ। और ध्यान रखना, खुद खोजने से जो मिलता है, वही मिलता है। जो दूसरा दे-दे, वह मिला हुआ है ही नहीं। दूसरे का दिया छीना जा सकता है। खुद का खोजा भर नहीं छीना जा सकता। और जो छिन जाए वह कोई अध्यात्म है? जो छीना न जा सके, वही।

पहली गाथा :

‘मन सभी प्रवृत्तियों का पुरोगामी है; मन उनका प्रधान है, वे मनोमय हैं। यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है या कर्म करता है, तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी का चक्का खींचने वाले बैलों के पैर का।’

छोटा सूत्र, पर बड़ा दूरगामी। ध्यान रखना, बुद्ध किसी शास्त्र को नहीं दोहरा रहे हैं। बुद्ध से शास्त्र पैदा हो रहा है।

‘मन सभी प्रवृत्तियों का पुरोगामी है।’

कोई भी वृत्ति उठती है राह पर तुम खड़े हो, एक सुंदर कार निकली। क्या हुआ तुम्हारे मन में? एक छाप पड़ी। एक काली कार निकली, एक प्रतिबिंब गंजा। कार के निकलने से वासना पैदा नहीं होती-अगर तुम देखते रहो और तुम्हारा देखना ऐसा ही तटस्थ हो जैसे कैमरे की आख होती है। कैमरे के सामने से भी कार निकल जाए, वह फोटो भी उतार देगा, तो भी कार खरीदने नहीं जाएगा। और न सोचेगा कि कार खरीदनी है। अगर तुम वहां खड़े हो और कैमरे जैसी तुम्हारी आख है–तुमने सिर्फ देखा, काली कार गुजर गयी। चित्र बना, गया। एक छाया आयी, गयी-कुछ भी कठिनाई नहीं है।

लेकिन जब यह काली छाया कार की तुम्हारे भीतर से निकल रही है, तब तुम्हारे मन में एक कामना जगी-ऐसी कार मेरे पास हो! मन में एक विकार उठा। एक लहर उठी-जैसे पानी में किसी ने कंकड़ फेंका और लहर उठी। कार तो जा चुकी, अब लहर तुम्हारे साथ है। अब यह लहर तुम्हें चलाएगी।

तुम धन कमाने में लगोगे, या तुम चोरी करने में लगोगे, या किसी की जेब काटोगे। अब तुम कुछ करोगे। अब वृत्ति ने तुम्हें पकड़ा। अब वृत्ति तुम्हारी कभी क्रोध करवाएगी, अगर कोई बाधा डालेगा। अगर कोई मार्ग में आएगा तो तुम हिंसा करने को उतारू हो जाओगे, मरने-मारने को उतारू हो जाओगे। अगर कोई सहारा देगा तो तुम मित्र हो जाओगे, कोई बाधा देगा तो शत्रु हो जाओगे। अब तुम्हारी रातें इसी सपने से भर जाएंगी। बस यह कार तुम्हारे आसपास घूमने लगेगी। जब तक यह न हो जाए, तुम्हें चैन न मिलेगा।

और मजा यह है कि वर्षों की मेहनत के बाद जिस दिन यह तुम्हारी हो जाएगी, तुम अचानक पाओगे, कार तो अपनी हो गयी, लेकिन अब? इन वर्षों की बेचैनी का अभ्यास हो गया। अब बेचैनी नहीं छोड़ती। कार तो अपनी हो गयी, लेकिन बेचैनी नहीं जाती, क्योंकि बेचैनी का अभ्यास हो गया।

अब तुम इस बेचैनी के लिए नया कोई यात्रा-पथ खोजोगे। बड़ा मकान बनाना है! हीरे-जवाहरात खरीदने हैं! अब तुम कुछ और करोगे, क्योंकि अब बेचैनी तुम्हारी आदत हो गयी। और अब इस बेचैनी का तुम क्या करोगे? सालों तक बेचैनी को सम्हाला, कार तो मिल गयी; लेकिन अब कार का मिलना न मिलना बराबर है। अब यह बेचैनी पकड़ गयी।

इसीलिए तो धनी बहुत लोग हो जाते हैं और धनी नही हो पाते। क्योंकि जब वे धनी होते हैं, तब तक बेचैनी का अभ्यास हो गया उनका। जब तक धनी हुए तब तक चैन से न रह सके, सोचा कि जब धनी हो जाएंगे तब चैन से रह लेंगे। लेकिन चैन कोई इतनी आसान बात है। अगर बेचैनी का अभ्यास घना हो गया, तो धनी तो तुम हो जाओगे, बेचैनी कहां जाएगी? तब और धनी होने की दौड़ लगती है। और मन कहता है और धनी हो जाएं, फिर..?। लेकिन सारा जाल मन का है।

बुद्ध ने अपनी एक-एक वृत्ति को जांचा और पाया कि वृत्ति मन के सरोवर में उठी लहर है। वृत्ति का मतलब ही लहर होता है। वह मन का कैप जाना है। अगर मन निष्कंप रह पाए तो कोई वृत्ति पैदा नहीं होती। अगर मन कंप गया, तो वृत्ति पैदा हो जाती है। फिर कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस चीज से कंपता है।

आज से ढाई हजार साल पहले बुद्ध के समय में कार तो नहीं थी, तो कई

नासमझ सोचते हैं कि तब बड़ी शाति थी; क्योंकि कार नहीं थी, तो कार की तो चिंता पैदा नहीं हो सकती थी। हवाई जहाज नहीं था, तो हवाई जहाज खरीदना है इसकी चिंता तो पैदा नहीं हो सकती थी। लेकिन तुम गलती में हो। चिंताएं इतनी ही थीं। क्योंकि किसी के पास शानदार बैलगाड़ी थी, बग्घी थी, वह चिंता पैदा करवाती थी। किसी के पास शानदार घोड़ा था, वह चिंता पैदा करवाता था।

चिंता के लिए विषय से कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम लहर सरोवर में उठाने के लिए एक कंकड़ फेंको या कोहिनूर हीरा फेंको, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोहिनूर हीरा भी वृत्ति उठाता है, साधारण कंकड़ भी उतनी ही वृत्ति उठाता है, उतनी ही लहर उठाता है। पानी फिकर नहीं करता कि तुमने कोहिनूर फेंका कि कंकड़ फेंका। कुछ फेंका, बस इतना काफी है। मन ने कुछ भी फेंका और उपद्रव शुरू हुआ।

‘मन सभी प्रवृत्तियों का पुरोगामी है, मन उनका प्रधान है; वे मनोमय हैं। यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है या कर्म करता है, तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी का चक्का खींचने वाले बैलों के पैर का।’

बुद्ध ने एक सूत्र पाया : जीवन में दुख. है। हम भी जीवन में दुखी हैं। और जब हमें दुख पकड़ता है तो हम पूछते हैं, किसने दुख पैदा किया? कौन मेरा दुख पैदा कर रहा है-पत्नी, पति, बेटा, बाप, मित्र, समाज? कौन मेरा दुख पैदा कर रहा है-आर्थिक-व्यवस्था, सामाजिक-ढांचा? कौन मेरा दुख पैदा कर रहा है?

मार्क्स से पूछो तो वह कहता है, दुख पैदा हो रहा है क्योंकि समाज का आर्थिक ढांचा गलत है। गरीबी है, अमीरी है, इसलिए दुख पैदा हो रहा है।

फ्रायड से पूछो तो वह कहता है, दुख इसलिए पैदा हो रहा है कि मनुष्य को अगर उसकी वृत्तियों के प्रति पूरा खुला छोड़ दिया जाए, तो वह जंगली जानवर जैसा हो जाता है। दुख पैदा होगा उससे। सभ्यता नष्ट हो जाएगी। अगर उसे समझाया- बुझाया जाए, तैयार किया जाए, परिष्कृत किया जाए, तो दमन हो जाता है। दमन होने से दुख पैदा होता है।

इसलिए फ्रायड ने कहा, दुख कभी भी न मिटेगा। अगर आदमी को बिलकुल खुला छोड़ दो, तो मार-काट हो जाएगी; क्योंकि आदमी के भीतर हजार तरह की जानवरी वृत्तियां हैं। अगर दबाओं, ढंग का बनाओ, सज्जन बनाओ, तो दमन हो जाता है। दमन होता है, तो दुख होता रहता है, वृत्तियां पूरी नहीं हो पातीं। पूरी करो तो मुसीबत, न पूरी करो तो मुसीबत।

तो फ्रायड ने तो अंत में कहा कि आदमी जैसा है, कभी सुखी हो ही नहीं सकता। सुख असंभव है।

फ्रायड और मार्क्स, इनका विश्लेषण ही अगर अकेला विश्लेषण होता तो पक्का है कि आदमी कभी सुखी नहीं हो सकता। क्योंकि रूस में गरीब-अमीर मिट गए लेकिन दुख नहीं मिटा। गरीब-अमीर मिट गए, तो दूसरे वर्ग खड़े हो गए। कोई पद पर है, कोई पद पर नहीं है। कोई कम्युनिस्ट पार्टी में है, कोई कम्युनिस्ट पार्टी में नहीं है। जो पद पर है, वह इतना शक्तिशाली हो गया है जितना धनी पुराने दिनों में कभी भी न था। और जो पद पर नहीं है, वह इतना निर्बल हो गया है जितना भूखा, भिखमंगा, गरीब कभी नहीं था। धनी के हाथ में इतनी ताकत कभी नहीं थी जितनी रूस में पदाधिकारी के हाथ में है। संघर्ष वहीं का वहीं खड़ा है। भेद वहीं का वहीं खड़ा है। वर्ग नए बन गए, पुराने मिटे तो। कुछ ऐसा लगता है, आदमी बीमारी बदलता जाता है। क्रांतियों के नाम से केवल बीमारी बदलती है, कुछ भी बदलता नहीं। ऊपर के ढंग बदलते हैं, भीतर का रोग जारी रहता है।

सब क्रांतियां व्यर्थ हो गयी हैं; सिर्फ बुद्ध की एक क्रांति अभी भी सार्थकता रखती है। बुद्ध कहते हैं, तुम्हारे मन में ही कारण है। बाहर खोजने गए, पहला कदम ही गलत पड़ गया। अब तुम ठीक कभी न हो पाओगे। तुम्हारे मन में ही दुख का कारण है। जब भी तुम किसी को दुख देना चाहते हो, तुम दुख पाओगे। जब १गई तुम दुख देने की आकांक्षा से भरे किसी विचार के पीछे जाते हो, तम दुख के बीज बो रहे हो। दूसरे को दुख मिलेगा या नहीं मिलेगा, तुम्हें दुख जरूर मिलेगा। तुम अगर आज दुख पा रहे हो, तो बुद्ध कहते हैं, कल बोए बीजों का फल है। और अगर कल तुम चाहते हो दुख न पाओ, तो आज कृपा करना, आज बीज मत बोना।

‘यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है, सोचता है, व्यवहार करता है, या वैसे कर्म करता है, तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी जाती है तो बैलों के पीछे चाक चले आते हैं।’

तुम्हारे मन में अगर किसी को भी दुख देने का जरा सा भी भाव है, तो तुम अपने लिए बीज बो रहे हो। क्योंकि तुम्हारे मन में जो दुख देने का बीज है, वह तुम्हारे ही मन की भूमि में गिरेगा, किसी दूसरे के मन की भूमि मैं नहीं गिर सकता। बीज तो तुम्हारे भीतर है, वृक्ष भी तुम्हारे भीतर ही होगा। फल भी तुम्हीं भोगोगे।

अगर बहुत गौर से देखा जाए, तो जब तुम दूसरे को दुख देना चाहते हो, तब तुमने अपने को दुख देना शुरू कर ही दिया। तुम दुखी होने शुरू हो ही गए। तुम क्रोधित हो, किसी पर क्रोध करके उसे नष्ट करना चाहते हो; उसे तुम करोगे या नहीं, यह दूसरी बात है, लेकिन तुमने अपने को नष्ट करना शुरू करे दिया।

बुद्ध कहते थे, क्रोध से बड़ी कोई मूढ़ता नहीं है। दूसरे के कसूर के लिए तुम अपने को दंड देते हो। एक आदमी ने तुम्हें गाली दी, कसूर उसका होगा, अब क्रोधित तुम हो रहे हों-दंड तुम अपने को दे रहे हो, कसूर उसका था। इससे ज्यादा मूढ़ता और क्या हो सकती है? उसने गाली दी, उसकी समस्या है; तुम क्यों बीच में आते हो? तुम गाली मत लो। लेने पर निर्भर है। लेना आवश्यक नहीं है। आप मुझे गाली दे सकते हैं, लेकिन लेने पर थोड़े ही मजबूर कर सकते हैं। देना आपके बस में है, लेना मेरे बस में है। उस मालकियत को मुझसे कोई कभी नहीं छीन सकता। मैं कह सकता हूं कि नहीं लेता, फिर तुम क्या करोगे? तुम्हारी गाली तुम्हीं पर लौट जाएगी। तुमने गाली देने के लिए जो तैयारी में दुख भोगा, वह भोगा, अब गाली लौटेगी तब तुम जो दुख भोगोगे, वह भोगोगे।

जब हम किसी चीज को अपने मन के भीतर ले लेते हैं, तभी वह सक्रिय हो जाती है। और दूसरे से लेने की कोई जरूरत नहीं है; तुम अपने भीतर ही इतने दुख के बीज पैदा करते रहते हो। अकारण!

मैं कलकत्ते में एक मित्र के घर मेहमान होता था। उनके पास सबसे बढ़िया कोठी है कलकत्ते में। थी कहना चाहिए, अब नहीं है। अब एक दूसरी कोठी खड़ी हो गयी, पड़ोस में ही खड़ी हो गयी। जब मैं उनके घर मेहमान होता था, तो वे हमेशा अपने मकान में मुझे ले जाते। कई बार दिखा चुके थे, मगर फिर-फिर दिखाते। उनका रस खतम नहीं होता था। स्विमिंग-पूल, बगीचा-सब दिखाते। उनकी आदत थी, यह मानकर मैं जब भी वे दिखाते फिर इस तरह उत्सुकता लेता जैसे कभी नहीं देखा है। मगर आखिरी बार जब उनके घर गया, तो उन्होंने मकान न दिखाया। मैं थोड़ा हैरान हुआ, क्या यह आदमी बदल गया! मैंने पूछा कि क्या मामला है, मकान नहीं दिखलाइएगा? कहने लगे, क्या खाक दिखलाए!

क्या हुआ?

देखते नहीं कि बगल में एक बड़ा मकान खड़ा हो गया? जब तक इससे बड़ी कोठी न कर लूं तब तक अब चैन नहीं! अब क्या दिखाना है!

इनका मकान वैसे का वैसा ही है, क्योंकि बगल के मकान ने इनके मकान में कुछ फर्क नहीं किया है। इनका मकान ठीक उतना ही सुंदर है जैसा था। लेकिन बगल में एक मकान खड़ा हो गया! बड़ी लकीर किसी ने खींच दी, इनकी लकीर छोटी हो गयी, बिना छुए। किसी ने छुआ नहीं, हाथ नहीं लगाया, मगर बगल में एक लकीर खड़ी हो गयी।

उनकी पत्नी ने मुझसे कहा कि कुछ समझाइए इनको; न सोते हैं, न चैन! इनकी छाती पर बोझ हो गया है वह बगल का मकान। बगल के मकान वाले को शायद पता भी न हो कि कोई जला- भुजा जा रहा है, कि कोई मरा जा रहा है। मगर इस आदमी ने अपने भीतर एक बीज बो लिया। यह उस मकान से नहीं आया है, क्योंकि इसकी पत्नी को कोई तकलीफ नहीं है। इसकी पत्नी भी वहीं है, उसे कोई तकलीफ नहीं है। मकान से नहीं आया है; इसके अपने भीतर के मन का रोग है। एक ईर्ष्या जगी है। अहंकार को चोट लगी है।

मैंने उनसे कहा कि मैं सदा जानता था, कभी न कभी यह झंझट होगी। आप अपने मन में अपने मकान का इतना रस लेते हैं कि कोई भी मकान अगर खड़ा हो गया, तो आप जी न सकोगे। क्योंकि सदा आपको देखकर मुझे ऐसा लगा है, यह

मकान आपके लिए नहीं है, आप मकान के लिए हो। आप मालिक नहीं हो, यह मकान मालिक है। आप वस्तु को अपना सब सम्हाल दिए हैं, दे दिए हैं वस्तुओं को। आप गुलाम हो गए हैं। मुझे डर था कि कभी न कभी यह होगा, कोई मकान बड़ा बगल में खड़ा हो जाएगा, तो तुम न झेल पाओगे।

वे रुग्ण रहने लगे जब से वह मकान बन गया। मन में सारा खेल है।

यही जिंदगी मुसीबत यही जिंदगी मसर्रत

यही जिंदगी हकीकत यही जिंदगी फसाना

कैसी मन की व्याख्या है, कैसे तुम देखते हो, कैसे तुम सोचते हो, कैसी तुम व्याख्या करते हो जीवन की-सब उस पर निर्भर है।

‘मन सभी प्रवृत्तियों का पुरोगामी है, मन उनका प्रधान है। यदि कोई प्रसन्न मन से बोलता है या कर्म करता है, तो सुख उसका अनुसरण करता है-वैसे ही जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली छाया।

अगर तुम दुखी हो तो अपने को कारण जानना, अगर सुखी हो तो अपने को कारण जानना। अपने से बाहर कारण को मत ले जाना। वही धोखा है। इसको ही मैं धार्मिक क्रांति कहता हूं। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के सारे कारणों को अपने भीतर देख लिया, वह व्यक्ति धार्मिक हो गया। क्योंकि अब उसके हाथ में है बात। अब दुखी होना हो, तो तुम जानते हो कौन से बीज बोने। सुखी होना हो, तो जानते हो कौन से बीज बोने। अब कोई मजबूरी न रही। फिर अगर दुख में ही मजा लेना हो, तो मजे से बीज बोओ; कोई बाधा नहीं डाल सकता। लेकिन एक बात फिर तुम न कर सकोगे कि दुख के तो बीज बोओ और रोना भी रोओ कि मैं दुखी क्यों हूं! अपने ही हाथ से जहर पीओ, और फिर रोओ कि मैं मर क्यों रहा हूं! मरना हो, मजे से जहर पीओ। जीना हो, मत पीओ। तुम्हारे हाथ हैं, तुम्हारी प्याली है, तुम्हारा जहर है-और तुम्हीं को जीना या मरना है।

‘उसने मुझे डांटा, मुझे मारा, मुझे जीत लिया, मेरा लूट लिया-जो ऐसी गांठें मन में बनाए रखते हैं, उनका वैर शात नहीं होता।’

उसने! दूसरे पर जिनका सारा जोर है-उसने मुझे डाटा, उसने मुझे मारा, उसने मुझे जीत लिया, मेरा लूट लिया-जो दूसरे पर नजर रखते हैं…।

बुद्ध का एक शिष्य हुआ पूर्ण काश्यप। वह निश्चित ही पूर्ण हो गया था, इसलिए उसे बुद्ध पूर्ण कहते हैं। फिर एक दिन बुद्ध ने उससे कहा कि पूर्ण, अब तू पूर्ण सच में ही हो गया। अब मेरे साथ-साथ डोलने की कोई जरूरत न रही। अब तू जा। अब तू गांव-गाव, नगर-नगर घूम और डोल। मेरी खबर ले जा। मेरे पास तूने जो पाया है, उसे लुटा।

पूर्ण ने कहा : भगवान, किस दिशा में जाऊं? आप इशारा कर दें।

बुद्ध ने कहा : तू खुद ही चुन ले। अब तू खुद ही समर्थ है। अब मेरे इशारे की

भी कोई जरूरत न रही।

तो पूर्ण ने कहा कि जाऊंगा–’सूखा’ नाम का एक इलाका था बिहार में-वहां जाऊंगा। बुद्ध ने कहा, तू खतरा मोल ले रहा है। वह जगह भली नहीं। लोग सज्जन नहीं। लोग बड़े दुष्ट हैं और लोग सताने में रस लेते हैं। लोग तुझे परेशान करेंगे। इन पीत-वस्त्रों में उन्होंने भिक्षु कभी देखा नहीं। वे बड़े जंगली हैं। तू वहा मत जा।

पर पूर्ण ने कहा, इसीलिए तो उनको मेरी जरूरत है। किसी को तो जाना ही होगा। कब तक वे जंगली रहें? कब तक उनको पशुओं की तरह रहने दिया जाए? मुझे जाना होगा। आशा दें।

बुद्ध ने कहा, जा; मगर मेरे दो-तीन सवालों के जवाब दे दे। पहला – अगर वे तुझे गालियां दें, अपमान करें, तो तुझे क्या होगा ‘ तो पूर्ण ने कहा, यह भी आप मुझसे पूछते हैं, क्या होगा? आप भलीभांति जानते हैं कि मैं प्रसन्न होऊंगा। क्योंकि मेरे मन में यह भाव उठेगा, कितने भले लोग हैं, सिर्फ गालियां देते हैं, मारते नहीं। मार भी सकते थे।

बुद्ध ने कहा, ठीक। मगर अगर मारे न, मारने ही लगें, तो तेरे मन में क्या होगा? पूर्ण ने कहा, आप पूछते हैं? आप भलीभांति जानते हैं कि पूर्ण प्रसन्न होगा, कि धन्यभाग कि मारते हैं, मार ही नहीं डालते। मार भी डाल सकते थे।

बुद्ध ने कहा, आखिरी सवाल, पूर्ण। अगर मार ही डालें, तो मरते वक्त तेरे मन में क्या होगा? पूर्ण ने कहा, आप, और पूछते हैं? आपको भलीभांति मालूम है कि जब मैं मर रहा होऊंगा तो मेरे मन में होगा, धन्यभाग, उस जीवन से छुटकारा दिला दिया जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी।

बुद्ध ने कहा, अब तू जा। अब तुझे जहां जाना है, तू जा। अब तुझे कोई गाली नहीं दे सकता। अब तुझे कोई मार नहीं सकता। अब तुझे कोई मार डाल नहीं सकता। ऐसा नहीं कि वे तुझे गाली न देंगे; गाली तो वे देंगे, लेकिन तुझे अब कोई गाली नहीं दे सकता। ऐसा नहीं कि वे तुझे मारेंगे नहीं; मारेंगे, लेकिन तुझे अब कोई मार नहीं सकता। और कौन जाने, कोई तुझे मार भी डाले; लेकिन अब तू अमृत है। अब तेरी मृत्यु संभव नहीं।

सारा खेल मन का है, कैसे हम देखते हैं!

‘उसने मुझे डांटा, उसने मुझे मारा, मुझे जीत लिया, मेरा लूट लिया-जो ऐसी गांठें मन में नहीं बनाए रखते हैं, उनका वैर शात हो जाता है।’

और वैर नर्क है। कहीं और कोई नर्क नहीं; शत्रुता में जीना नर्क है। तुम जितनी शत्रुता अपने चारों तरफ बनाते हो, उतना तुम्हारा नर्क बड़ा हो जाता है। तुम जितनी मित्रता अपने चारों तरफ बनाते हो, उतना स्वर्ग खड़ा हो जाता है। स्वर्ग मित्रों के बीच जीने का नाम है। नर्क शत्रुओं के बीच जीने का नाम है। और सब तुम पर निर्भर है। नर्क कोई भौगोलिक जगह नहीं है, और न स्वर्ग कोई भौगोलिक जगह है। नक्शो

में मत पड़ना। मनोदशाएं हैं। स्टेट्स आफ माइंड।

जब तुम सारे जगत को मित्र की तरह देखते हो-ऐसा नहीं कि सारा जगत मित्र हो जाएगा, इस भूल में मत पड़ना–लेकिन तुम जब सारे जगत को मित्र की भांति देखते हो, तुम्हारे लिए जगत मित्र हो गया, तुम्हारे शत्रु समाप्त हो गए। और अगर कोई तुम्हारी शत्रुता करेगा, तो वह शत्रुता उसके मन में होगी, वह उसकी पीड़ा पाएगा। लेकिन तुम्हें कोई पीड़ा नहीं दे सकता।

‘इस संसार में वैर से वैर कभी शात नहीं होता। अवैर से ही वैर शात होता है। यही सनातन धर्म है, यही नियम है।

नहि वेरेन वेरामि सम्मन्तीध कुदाचनं

अवेरेन व सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो।।

यही सनातन धर्म है। शत्रुता से शत्रुता समाप्त नही होती। क्रोध से क्रोध समाप्त नहीं होता। वैर से वैर नहीं मिटता। और जितना वैर बढ़ता जाता है, उतना तुम अपने चारों तरफ अपने हाथों नर्क निर्मित करते चले जाते हो।

यह जगत तुम्हारी कृति है। तुम चारों तरफ अपना परिवेश बनाते हो। यह बात तुम्हें दिखायी पड़ जाए, यह इशारा तुम्हें समझ आ जाए, तो तुम्हें फिर कोई दुख नहीं दे सकता। तुम्हारा स्वभाव तब सुख हो जाएगा।

फैलाओ मैत्री!

महावीर ने कहा है : मित्ति मे सव्‍व भूए सू वैरं मज्‍झ न केवई। मेरी मित्रता सबसे है, सारे विश्व से है। –सव्‍व भूए सू। और वैर मेरा किसी से भी नहीं।

महावीर के कानों में भी कीलें ठोकने वाले मिल गए, पत्थर मारने वाले मिल गए। महावीर को गाव-गांव से खदेड़ कर बाहर निकालने वाले मिल गए। लेकिन महावीर यही कहते रहे, वैर मज्‍झ न केवई–मेरी किसी से कोई शत्रुता नहीं। उनकी होगी, उनका हिसाब वे जानें।

अभी कुछ दिन पहले मैं एक कहानी कह रहा था कि दो मनोवैज्ञानिक, एक ही मकान में उनका दफ्तर था, रोज सुबह आते, लिफ्ट में सवार होते, अक्सर साथ-साथ सवार होते। वह जो लिफ्ट को चलाने वाला सेवक था, वह बड़ा हैरान था। जब भी वे दोनों साथ-साथ जाते तो पहले एक मनोवैज्ञानिक उतरता, दसवीं-बारहवीं मंजिल पर कहीं। जब भी वह उतरता, दरवाजे से लौटकर दूसरे मनोवैज्ञानिक के ऊपर थूकता, चला जाता अपनी तरफ; और दूसरा चुपचाप अपना रूमाल निकालकर अपना मुंह पोंछ लेता, टाई पोंछ लेता, या कोट पर पड़ गया होता यूक, पोंछ लेता, रख लेता और अपना बस तैयारी करने लगता, क्योंकि पंद्रहवीं या बीसवीं मंजिल पर उसको उतरना था। आखिर उस लिफ्टमैन को और सम्हालना मुश्किल हो गया।

एक दिन उसने कहा कि यह बात बहुत हुई जा रही है, यह मामला क्या है? यह आदमी क्यों आपके ऊपर थूकता है?

तो उस मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह उसकी समस्या है, उसी से पूछो। मेरा इसमें कोई हाथ ही नहीं है। यह समस्या उसकी है, उसी से पूछो। बेचारा! जरूर कोई न कोई पागलपन उसे सवार है। मेरा तो कुछ भी नहीं बिगड़ता। पोंछ लेता हूं। उसकी सोचो! असली तकलीफ वही पा रहा है। थूकने के पहले तकलीफ पाता होगा, थूकते वक्त तकलीफ पाता है, पीछे तकलीफ पाता होगा। क्योंकि समस्या उसकी है, वही कुछ कर रहा है। हम तो केवल दर्शक हैं।

अगर जीवन को ऐसे देखने की कला आ जाए तो फिर तुम्हें कोई दुख नहीं दे सकता। दूसरा देना भी चाहे तो यह उसकी समस्या है। और तुम इस भ्रांति में कभी मत पड़ना कि वैर से तुम दूसरों के वैर को मिटा दोगे। कभी कोई नहीं मिटा पाया। प्रेम से ही मिटता है वैर। करुणा से ही मिटता है क्रोध।

‘इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होते, अवैर से ही होते हैं। यही सनातन नियम है।

यह बुद्ध के धर्म की आधारशिला है।

और थोड़ा सोचो भी कि कौन तुम्हें सुख दे पाता है, कौन तुम्हें दुख दे पाता है! सब तुम्हारे मन का ही हिसाब है। अभी घडी भर पहले जो बात सुख देती थी, घड़ी भर बाद दुख देने लगती है। अभी जो बात दुख दे रही है, घड़ी भर बाद सुख दे सकती है। तुम्हारी व्याख्या! तुम कैसे उस बात को पकड़ते हो! क्या उस बात को रंग देते हो! क्या रूप देते हो! और अगर तुम्हें यह दिखायी पड़ जाए कि कोई दूसरा सुख नहीं दे सकता, तो दुख कैसे देगा? किसने तुम्हें कभी कोई सुख दिया, याद है कुछ? किसने तुम्हें कभी कोई आनंद दिया, याद है कुछ? और जब किसी ने कोई सुख नहीं दिया, तो दुख कोई क्या देगा!

मैं एक गीत कल पढ़ता था। बात मूल्यवान लगी-

डरूं मैं किसलिए गुस्से से, प्यार में क्या था

मैं अब खिजां को जो रोऊं, बहार में क्या था

डरूं मैं किसलिए गुस्से से, प्यार में क्या था

जब दूसरे के प्यार से कुछ न मिला, तब उसके गुस्से से क्या परेशान होना है! जब प्यार ही कुछ न दे सका, तो गुस्सा क्या छीन लेगा?

मैं अब खिजां को जो रोऊं, बहार में क्या था

और अब पतझड़ आ गयी, सब वीरान हुआ जाता है-इसको रोऊं? लेकिन बहार में क्या था? जब बहार थी तब भी जब कुछ पास न था; जब बहार में भी कोई सुख

न मिला, तो अब पतझड़ में दुख का क्या प्रयोजन है?

लेकिन आदमी बड़ा अजीब है! जिनसे तुम्हें सुख नहीं मिला, उनसे भी तुम दुख

ले लेते हो। जिनके जीते-जी तुम्हें कभी कोई शाति नहीं मिली, उनके मरने पर तुम रोते हो।

मैं एक युगल को जानता हूं। जब तक पति जिंदा रहा, पति और पत्नी निरंतर कलह करते रहे। कभी-कभी मेरे पास आते थे। लेकिन सुलझाव कोई आसान न था। सब उलझाव सुलझ जाएं, पति-पत्नी के बड़े मुश्किल से सुलझते हैं, क्योंकि सुलझाना ही नहीं चाहते। शायद वही उनकी जिंदगी है, वही व्यस्तता है, वही कुल भराव है। वह भी चला जाए, तो फिर बड़ा खाली हो जाता है। कई बार तलाक देने की बात भी उठी, लेकिन उस पर भी राजी न हो पाते थे। फिर पति शराब पीने लगा। और शराब पीते-पीते मरा। जवान ही था, अभी कोई छत्तीस साल उम्र थी, ज्यादा नहीं थी। जब मर गया तो पत्नी मेरे पास आयी, छाती पीट-पीटकर रोने लगी।

मैंने उससे कहा, अब तू रोना बंद कर। क्योंकि जिस आदमी के कारण तू कभी हंसी नहीं, उसके लिए रोना क्या? और मैं जानता हूं कि हजार बार तेरे मन में यह सवाल उठता रहा होगा कि यह आदमी मर ही जाए तो अच्छा! बोल, झूठ कहता हूं या सच? वह थोड़ी चौंकी। उसने कहा, आपको कैसे पता चला?

पता चलने की क्या बात है? कितनी बार तूने नहीं सोचा है कि यह आदमी मर ही जाए तो झंझट मिटे। अब मर गया। आकांक्षा पूरी हो गयी। अब क्यों रोती है? जिससे तुझे सुख नहीं मिला, उससे दुखी होने का क्या प्रयोजन है?

लेकिन यही बड़े मजे की बात है। सुख लेने में तो तुम बड़े कंजूस हो, दुख लेने में तुम बड़े कुशल हो। सुख तो तुम बामुश्किल स्वीकार करते हो। दुख, तुम द्वार सजाकर खड़े हो सदा। स्वागतम! हाथ फैलाए खड़े हो सदा। तुम दुखी होना चाहते हो! दुखवादी हो! अन्यथा कोई कारण नहीं तुम्हारे दुखी होने का।

जीवन को जो जानते हैं, वे पहचान लेते हैं कि न तो दूसरे से सुख मिलता है, न दुख मिलता है। न तो किसी के जीवन से तुम्हें जीवन मिलता है, न किसी की मौत से तुम्हें मौत मिलती है।

डरूं मैं किसलिए गुस्से से, प्यार में क्या था

मैं अब खिजां को जो रोऊं, बहार में क्या था

और जब तुम्हें दोनों बातें साफ दिखायी पड़ जाती हैं, तब जैसे एक उदघाटन हो जाता है भीतर, एक बिजली कौंध जाती है कि यह मैं ही हूं अपनी ही शकल देखता हूं दूसरे तो केवल दर्पण हैं। अपने ही प्रतिबिंब, अपनी ही प्रतिध्वनि, अपनी ही परछाईं पकड़ता हूं दूसरे तो केवल दर्पण हैं; घाटियां हैं, जिनमें अपनी ही आवाज गुंजकर लौट आती है।

इसे बुद्ध एस धम्मो सनंतनो कहते हैं, यही धर्म का सनातन सूत्र है। न परमात्मा, न मोक्ष, न वेद, न आत्मा-कोई भी धर्म के मूल आधार नहीं हैं। बुद्ध कहते हैं, एस धम्मो सनंतनो-यह छोटा सा सूत्र कि तुम्हारे दुख के कारण तुम हो, तुम्हारे सुख के कारण तुम हो और दूसरे को दुख देने से तुम कभी सुख न पा सकोगे, दूसरे को सतानें से कभी तुम उत्सव न मना सकोगे।

वैर से वैर शांत नहीं होता, अवैर से शात हो जाता है। अवैर बरस जाए, वैर की अग्नि शांत हो जाती है। फिर हो या न हो शात, यह कोई सवाल नहीं है; तुम्हारे लिए समाप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति को यह सूत्र समझ में आ गया, उसके लिए नर्क नहीं है, वह यहीं इसी क्षण स्वर्ग में प्रविष्ट हो जाता है। उसका स्वर्ग कल नहीं है, उसका स्वर्ग अभी है।

‘हम इस संसार में नहीं रहेंगे, सामान्यजन यह नहीं जानते। और जो इसे जानते हैं, उनके सारे कलह शात हो जाते हैं।

बड़ी थोड़ी देर का बसेरा है, रैन बसेरा! सुबह हुई और चल पड़ेंगे यात्री। यह कारवां यहीं ठहरा न रहेगा। ये तंबू हैं, जिनको तुमने घर समझा है। ये अभी-अभी लगाए हैं, अभी-अभी उखाड़ने का वक्त आ जाएगा। और कितने कारवां तुमसे पहले निकल चुके हैं! उनके पदचिह्न भी नहीं रह गए। खों गए हैं बिलकुल। दूर उनके पैरों की, घुड़सवारों की उड़ती धूल भी दिखायी नहीं पड़ती। सिकंदर की फौजों की उड़ती धूल भी अब दिखायी नहीं पड़ती।

यहां क्षण भर हम हैं। हम जैसे बहुत लोग पहले थे। वैज्ञानिक कहते हैं कि एक-एक आदमी के नीचे कम से कम दस-दस आदमियों की लाशें गड़ी हैं। तुम जहां बैठे हो वहां दस आदमी मर चुके हैं। हर आदमी मरघट पर बैठा है, लाशों के ढेर पर बैठा है। कितनी देर तुम जिंदा रहोगे? थोड़ी देर, जल्दी तुम भी ग्यारहवीं लाश बन जाओगे और बारहवां आदमी तुम्हारे ऊपर बैठा होगा। कारवां की उड़ती धूल भी दिखायी नहीं पड़ती, कारवां खुद ही धूल हो गए।

इस संसार में सदा नहीं रहेंगे, ऐसा जिसको समझ में आ गया, उसी को इस संसार में रहने का ढंग आ गया। जिसको समझ में आ गया कि ओस की बूंद है, अब गिरी, तब गिरी; भोर की तरैया है, अब डूबी, तब डूबी। क्षणभर का खेल है। फिर क्या चिंता है? फिर किसको दुख देना है, किसको पीड़ा देनी है, किससे शत्रुता लेनी है? शत्रुता हम ले पाते हैं इसी आधार पर कि जैसे सदा रहना है।

तुम थोड़ा सोचो, अगर इसी वक्त खबर आ जाए कि आज सांझ तुम्हारी मौत हो जाएगी-पक्की खबर आ जाए-क्या तुम अपने दुश्मनों से क्षमा नहीं मांग आओगे? क्या तुम उनसे जिनको मिटाने को तत्पर थे, क्षमायाचना नहीं कर लोगे? क्या वैर समाप्त नहीं हो जाएगा? जाते आदमी का क्या, कौन सा वैर! किसकी शत्रुता! कैसी शत्रुता! जब विदा होने का क्षण आ जाएगा, तुम सभी से क्षमा मांग लोगे। लेकिन पक्का नहीं कि वह क्षण कब आएगा। अभी आ सकता है। लेकिन एक बात पक्की है कि कभी न कभी आएगा। ज्यादा देर नहीं है। जो कली खिल गयी, अब फूल के कुम्हलाने में ज्यादा समय नहीं है। सुबह हो गयी, सूरज चढ़ आया-सांझ को कितनी देर है? प्रतिपल सांझ हुई जाती है। सुबह के साथ ही सांझ हो गयी।

जिसको ऐसा दिखायी पड़ जाता है, वह फिर इस जगत में वैर के बीज नहीं बोता। फिर वह कल्याणमित्र हो जाता है। फिर वह मैत्री बोता है। वह अपने चारों तरफ स्वर्ग की फसल काटता है।

‘हम इस संसार में नहीं रहेंगे, सामान्यजन यह नहीं जानते हैं।

ऐसे जीते हैं जैसे सदा यहां रहना है। उसी से सारी भूल हो जाती है।

और जो इसे जानते हैं, उनके सारे कलह शात हो जाते हैं।’

क्षणभंगुर है जीवन। आंख झपकी, क्षणभर का सपना है जीवन। इस पर बहुत भरोसा मत कर लेना। इस पर तुमने जितना ज्यादा भरोसा किया, उतने ही भटक जाओगे। इसमें सो मत जाना। इसमें खो मत जाना। जागे रहना।

नींद स्वाभाविक लगती है, क्योंकि नींद सनातन की आदत हो गयी है। जागना कठिन मालूम पड़ता है, क्योंकि कभी जागे नहीं। लेकिन एक बार तुम जाग जाओगे, तो यह जीवन तो क्षणभंगुर हो जाएगा, महाजीवन के द्वार खुलेंगे। एक बार तुम जागकर देख लोगे तो तुम हंसोगे-क्या सपने देखते थे, जब कि सत्य के खजाने उपलब्ध थे!

लेकिन बुद्ध उन खजानों के संबंध में कुछ भी नहीं कहते। वे कहते हैं, डर है। खजाने की बात भी तुम सुन लेते हो सपने में, तो तुम उसका भी सपना बना लेते हो, और नींद तुम अपनी गहरी कर लेते हो। इसलिए बुद्ध कहते हैं, वे उस संबंध में कुछ भी न कहेंगे। इतना ही कहेंगे कि तुम जहां हो, गलत हो।

इसलिए बुद्ध निषेधात्मक हैं, निगेटिव हैं। उनका धर्म नकार का है। वे ब्रह्म की बात नहीं करते, क्योंकि वह तो उसकी बात हो जाएगी जो खुली आख से दिखायी पड़ता है। वे मोक्ष की बात नहीं करते, क्योंकि तुमसे क्या मोक्ष की बात करनी! तुम इतनी गहरी नींद में पड़े हो; तुमने संसार की ऐसी शराब पी ली है कि तुमसे क्या मोक्ष की बात करनी! शराब के नशे में तुम मोक्ष को सुनोगे भी, तो भी कुछ और समझोगे। अनर्थ हो जाएगा। वे कहते हैं, इतना ही समझो कि तुम नाली में पड़े हो, बेहोश पड़े हो, जागो!

बुद्ध मेटाफिजिक्स, दर्शनशास्त्र की बात नहीं करते। बुद्ध चिकित्सक हैं। वे सिर्फ तुम्हारी बीमारी की बात करते हैं। और निदान उनका दुरुस्त है, शत-प्रतिशत सही है। इस निदान पर सोचना।

बुद्ध का धर्म भरोसे का नहीं है; गहन सोच-विचार, चिंतन-मनन, और उसी चिंतन-मनन और सोच-विचार से उठे हुए ध्यान का धर्म है। परमात्मा, आत्मा, मोक्ष-ये शब्द बुद्ध के लिए पराए हैं। बुद्ध तो तुम्हारे मन का खंड-खंड करेंगे। क्योंकि तुम्हारा मन ही एकमात्र सवाल है। अगर तुम उस मन से जाग गए, तो वह शेष सब तुम पा लोगे जो उपनिषदों ने कहा है, वेदों ने कहा है, कुरान ने कहा है, बाइबिल ने कहा है।

लेकिन बुद्ध उसको कहते नहीं, इस बात को स्मरण रखना। जो पाना है, वह पाकर ही जाना जाएगा। उसकी चर्चा व्यर्थ है। और उसकी चर्चा खतरनाक है।

झेन फकीर हैं जापान में-बुद्ध को प्रेम करते हैं, सुबह-सांझ पूजा करते हैं-लेकिन वे कहते हैं, अगर बुद्ध का भी बहुत ज्यादा विचार मन में आने लगे और बुद्ध के प्रति भी बहुत ज्यादा लगाव बनने लगे, तो सावधान! कहीं नींद में नया सपना तो नहीं आ रहा है! झेन फकीर कहते हैं, अगर बुद्ध रास्ते पर मिल जाएं, उठाकर तलवार काट देना।

बोकोजू अपने गुरु के पास था। उसके गुरु ने कहा कि देख, अब वह खतरा करीब आ रहा है जब बुद्ध तुझे रास्ते पर मिलेंगे। डरना मत। लगाव भी मत करना। राग मत लगाना। उठाकर तलवार काट देना; दो टुकड़े, खंड-खंड कर देना बुद्ध के। चाहे तोड़कर नमस्कार कर लेना, लेकिन पहले तोड़ देना।

बोकोजू ने कहा, लेकिन तलवार? कहां से तलवार लाऊंगा वहां? गुरु ने कहा, घबड़ा मत, जहां से बुद्ध को लाया-कल्पना का सब जाल है-वहीं से तलवार भी ले आना। उठाकर तलवार काट ही देना। कहीं ऐसा न हो कि बुद्ध का सपना आने लगे।

बुद्ध ने सपने को कोई सहारा नहीं दिया। बुद्ध से बड़ा मूर्तिभंजक जगत में नहीं हुआ है। और बड़े विडंबना की बात है, बुद्ध से ज्यादा मूर्तियां किसी की नहीं हैं। और उनसे बड़ा मूर्तिभंजक कोई नहीं है!

उर्दू में शब्द है बुद्ध के लिए, बुत। बुत जो है, जिसका मतलब अब मूर्ति होता है, बुद्ध का ही बिगड़ा हुआ रूप है। इतनी मूर्तियां बनीं बुद्ध की कि बुद्ध शब्द बुत होकर मूर्ति का ही पर्यायवाची हो गया। और इतना बड़ा मूर्तिभंजक कोई भी नहीं!

बुद्ध की तलवार तुम्हें काटेगी, तुम्हें खंड-खंड करेगी। तुम्हारी श्रद्धाओं, विश्वासों को, तुम्हारी मान्यताओं को तोड़ेगी, ताकि तुम ही बचो तुम्हारी शुद्धता में, तुम्हारी परिपूर्ण निर्दोषता में, तुम्हारे कवांरेपन में। वही बच जाए जो काटा नहीं जा सकता; नैनं छिदंति शस्त्राणि-जिसे छेदा नहीं जा सकता, जिसे जलाया नहीं जा सकता।

बुद्ध छेदेंगे और जलाएंगे, ताकि जो छेदा जा सकता है वह छिद जाए, जो जलाया जा सकता है वह जल जाए और फिर तुम बच जाओ तुम्हारी परिशुद्ध अवस्था में। वही वेदों का ब्रह्म है; महावीर का कैवल्य है; कपिल और कणाद का मोक्ष है; बुद्ध का वही निर्वाण है।

निर्वाण शब्द नकारात्मक है। निर्वाण का अर्थ होता है, दीए को फूंककर बुझा देना। एक दीया जल रहा है, अंधेरी रात है; तुमने फूंक मारी और दीया बुझ गया;

फिर तुम यह नहीं पूछते कि यह ज्योति कहां गयी? बुद्ध कहते हैं, ऐसा ही निर्वाण है। मैं चाहूंगा कि तुम फूंक मारो और अपने को बुझा दो। और फिर मत पूछो कि कहां गए। खो गयी अनंत में, हो गयी एक ‘एक’ के साथ! मगर पूछो मत कहां गयी! निराकार के साथ एक हो गयी। मगर पूछो मत! कहने में बात बिगड़ जाएगी। चुप्पी और चुप्पी में समझ लो।

ऐसे, बड़े गहन बुद्ध के विश्लेषण और निषेध में हम उतरेंगे। अगर तुम हिम्मत पूर्वक बुद्ध के विश्लेषण में उतर जाओ, तो बुद्ध तुम्हें परम स्वास्थ्य की दशा में ला सकते हैं।

आज इतना ही।

http://oshosatsang.org/2013/08/10/%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-1/