WOMEN’s Day 8-MAR-14 special बौद्ध धम्म में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर का दर्ज दिया गया है-आईये इस अर्टिक से समझें बौद्ध काल में स्त्रियों की दशा और दिशा …Team SBMT


Story-1 womem in buddha ageवर्तमान भारत में स्त्रीयों से भेदभाव यह वास्तविक देश के विकास से महिलाओं को विलुप्त करने जैसा है, भारत कि सामाजीक-आर्थिक विषमता तथा स्त्रीयों से भेदभाव में भारी बदलाव ला सकने की क्षमता प्रबुध्द भारत कि नारी भुमीका वर्तमान नारीयों के लिये एक आदर्श प्रतिस्थापना के रूप में है. नारी का शक्तिसम्पन्नं होना केवल उसी के जीवन पर सकारात्माक प्रभाव नही डालता, इससे देश, बच्‍चे एंव पुरूषों का जीवन भी लाभान्विंत होता है. इस बात के बहुत स्पष्ट प्रमाण बौध्दकाल खंडो में मिलते है. सम्राट अशोक के समय उनके साम्राज्‍य में महिलाओं को शक्तिसम्पन्न करने के लिए स्वंतत्र विभाग था और इस विभाग कि महिला अध्यक्ष हुऑ करती थी. सम्राट अशोक ने अपनी बेटी को भिक्षुनी बनाकर महिलाओं को शक्तिसम्पन्न किया और महिलाओं कि शक्तिसम्पन्न करने कि भुमीका निभाई. वर्तमान भारत कि तुलना में बौध्दकाल खंडो में महिलायें वास्तविक शक्तिसम्पन्न थी. इसके प्रमाण बौध्द कालखंडो में बने स्‍तुप जहा पर विभिन्न प्रकार कि कला कृतीयों में महिला पुरूषों के बराबर और समान अधिकारी के रूप में इस चित्र में दिखाई दे रही है.

सिध्दांर्थ गौतम से शाक्‍य कुमारी यशोधरा का विवाह हो जाने के बाद भी यशोधरा किसी को देखकर घुघट से मुंह नही ढाकती थी, यशोंधरा का मानना था कि घुंघट से मुंह छुपानें से जादा समाज में शिल संपन्न गुणों के नैतिक आचरण कि जरूरत होती है. घुंघट करने कि नही. यह सुनकर राजा शुध्‍दोंधन प्रसन्न होकर शाक्य यशोधरा को दुशाला और लाल मणियों से जटि सुवर्णमाला भेंट की थी. इससे यह स्पष्ट दृष्टी‍गोचर होता है कि उस समय स्त्रीयों में सच्चरित्रता एंव श्रमण संस्कृ‍ती के उच्च आदर्श विचारों का समावेश था अर्थात बौध्दो कालखंडो में स्त्रीया पर्दा नही करती थी.

विश्व्जगत में महाप्रजापती गौतमी यह प्रथम नारी है जिसने महिलाओं को शक्तिसम्पन्न करने कि भुमीका निभाने के लिये 500 महिलाओं के साथ भगवान बुध्द के संघ में प्रवेश किया था. 500 महिलाओं का प्रवेश इससे आप कपिलवस्‍तु के महिलाओं के जनसंख्‍या का अंदाजा लगा सकते है. बुध्द ने महिलाओं को बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के लिए संघ में प्रर्वजीत किया जिससे समुचे महिला और पुरूषों में किसी प्रकार का भेद नही रहा. राजगृह में बुध्द् के काल में ही महिलाओं के लिए गुणशिला विद्यालय था, जहा मिलटरी शिक्षा के सथा 62 प्रकार के विषय महिलाओं को पडायें जाते थे और नंन्दा नाम कि थेरी भिक्खुनी एक शिक्षक के रूप में गुणशीला नाम के बौध्द विश्वंविद्यालय में महिलाओं को पडाती थी. दुनिया के महिलाओं के लिए यह प्रथम आदर्श का स्‍त्रोत है.

बौध्दं साहित्य से यह स्पष्ट दिखाई देता है कि बौध्दकाल खंडों में स्त्रिया घुंघट में नही रहती थी बल्कि बौध्द कालखंडों में स्त्रियां शिक्षित और विद्ववान हुऑ करती थी. उस समय पुत्रों की तरह पुत्रियों के पालन पोंषन और शिक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता था. प्राकृत-पालि बौध्द साहित्यों में ज्ञात होता है कि बौध्द कालखंडो में सैकडों स्त्रियों ने उच्चं शिक्षा प्राप्त कर समाज को उच्चय आदर्श स्थापीत करणे के लिए अपना जिवन समर्पीत किया था. थेरीगाथा में ऐसे अनेको उच्च थेरीयों भिक्‍खुनीयों के नाम आते है जिनमें 32 कवित्रिया थी, जो आजीवन ब्रम्‍हचारीणी रहीं थी और 18 स्त्रियों ने वैवाहिक जीवन के पश्चात भिक्खुिनी बनी थी. यह आदर्श वैदकिब्राम्‍हणहिन्‍तुत्‍व में कहि पर भी नही मिलेंगा यह ठोस दावा है………………..

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