आपने हरिशंकर परसाई जी की रचना भेड़ और भेड़िये अवश्य पढ़ी होगी,प्रस्तुत कहानी उसी जंगल में चालीस साल बाद घटे घटनाक्रम पर आधारित है

Wolf_Lamb_Community(आपने हरिशंकर परसाई जी की रचना भेड़ और भेड़िये  अवश्य पढ़ी होगी । अगर नहीं पढ़ी तो जरुर पढ़ें । प्रस्तुत कहानी उसी जंगल में चालीस साल बाद घटे घटनाक्रम पर आधारित है और परसाई जी की रचना के पात्रों ने प्रस्तुत कहानी में अपना योगदान देने से मना नहीं किया जिसके लिए हम उनके आभारी हैं । )
चालीस साल बाद जब भेड़ों को दिखने लगा कि भेड़ियों का जीवन दिन प्रतिदिन सुविधाओं से भरपूर होता जा रहा है और उनको बिना कुछ किये रोज आहार के लिए पौष्टिक भेड़ें मिल रही हैं, तो उन्हें लगा कि जिस उद्देश्य से जंगल में पशुतंत्र की स्थापना हुई थी, वो रास्ते से भटक गया है। भेड़ियों को जंगल की सबसे अच्छी गुफाओं में रहने को मिल रहा है, जबकि भेड़ें अभी भी जंगल में सर्दी, गर्मी, बरसात से लड़ती रहती हैं । भेड़िये सामान्य दिनों में अपनी गुफाओं से बाहर निकलते ही नहीं थे, भेड़ों को ही अपनी समस्याओं को लेकर उनकी आलीशान गुफाओं में जाना पड़ता था । उन गुफाओं कि साज-सजावट देखकर और वहाँ सेवा के लिए लगी हुई अनेक भेड़ों को देखकर उनकी आँखें आश्चर्यचकित रह जाती थी । जबकि चुनाव आते ही ये भेड़िये भी पेड़ों के इर्द-गिर्द दस भेड़ों को सम्बोधित करते हुए दिख जाते थे ।
चालीस साल तक ऐसा होता रहा और किसी भेड़ ने आवाज नहीं उठाई और अगर उठाई भी तो उसे ठिकाने लगा दिया गया । भेड़ों में असंतोष बढ़ता गया । बहुत दिनों के बाद जंगल के दूर दराज़ के इलाकों में खबर गई कि बूढ़े पीपल के पास एक भेड़, जो किसी दूर के जंगल से उच्च-शिक्षा ग्रहण करके आया है, भेड़ों को भेड़ियों के खिलाफ जागरूक कर रहा है । बूढ़ा पीपल एक तरह से जंगल की राजधानी हुआ करता था । जंगल के सारे बुद्धिजीवी पशु यहीं पर इकठ्ठा होकर सम-सामायिक विषयों पर चर्चा किया करते थे । उस पढ़े लिखे भेड़, जिसका नाम बुधई था, ने पूरे जंगल में घूम घूमकर भेड़ियों के खिलाफ भेड़ों को बताना शुरू किया और देखते ही देखते ही जंगल में एक लहर सी व्याप्त हो गई । इस अभियान में भेड़ों का नेतृत्व करने के लिए बुधई कि अगुवाई में एक समिति का गठन किया गया जिसमें जंगल के विभिन्न क्षेत्रों के भेड़ों को प्रतिनिधित्व मिला ।
नियत समय पर समिति ने बूढ़े पीपल के पास एक विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया, जिसमें भेड़ों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । भेड़ों से मिले समर्थन को देखकर अभिभूत होते हुए बुधई ने भेड़ों ने सम्बोधित करना शुरू किया, “मित्रों ! आज हमारे लिए बहुत बड़ा दिन है । आज हर एक भेड़ अपने अधिकारों के लिए जाग चुकी है। हम इन भेड़ियों को भेड़ों कि असली ताकत दिखाकर रहेंगे । आज तक भेड़ियों ने जो भी सुविधाएं ली हैं उसके लिए जांचपाल नाम की एक संस्था बनाई जाये जो कि यह फैसला करेगी कि ये सुविधाएं वैध हैं या अवैध। बस यही हमारी मांग हैं । और हम यह मांग मनवाकर रहेंगे । ”  भेड़ों ने एक स्वर में क्रन्तिकारी नारे लगाकर अपनी हामी भरी ।
लेकिन इतना प्रयास करने के बाद भी भेड़ियों ने सिर्फ आश्वासन दिया और कोई ठोस प्रगति नहीं हुई । इससे समिति के सदस्यों में रोष व्याप्त हो गया और उन्होंने दोबारा विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने की घोषणा की । इस बार भी पहले की तरह भेड़ों का व्यापक समर्थन मिला लेकिन इस बार भी भेड़िये टस से मस नहीं हुए । जब समिति को लगा कि बार बार के विरोध प्रदर्शनों से कुछ नहीं होगा तो उन्होंने अगला चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी । बुधई ने भेड़ों से कहा, “एक आम भेड़ कि आवाज कोई नहीं सुनता । इस जंगल की  सारी  समस्याओं कि जड़ दो मुख्य भेड़िया दल, जंगलदेश और जंगल भेड़ पार्टी (‘जे बी पी’ ) हैं । हमें इनको उखाड़ फेंकना है । भेड़ियों को लगता है कि जांचपाल के आने के बाद उनके कारनामों की पोल खुल जायेगी इसीलिए वो यह मांग मानने को तैयार नहीं हैं लेकिन मित्रों जब जंगल की हर एक आम भेड़ जाग जायेगी तो हमें कोई रोक नहीं सकता । इस जंगल की समस्याएं तभी दूर होंगी जब एक ईमानदार भेड़ चुन कर जायेगी । आप हमें अपना बहुमूल्य मत दीजिये और हमको जांचपाल और भेड़राज देंगे । ” बुधई ने जंगल के लिए जो नयी व्यवस्था सोची थी उसका नाम भेड़राज था और उसको विस्तार से बताने के लिए ‘भेड़राज’ नामक एक पुस्तक भी लिखी थी । जब नया दल बनाया गया तो उसका नाम रखा गया : ‘आम भेड़ दल’, जिसको संछेप में ‘अभेद’ नाम से जाना गया । जब किसी ने इंगित किया कि संछेप में उसे ‘अभेद’ नहीं बल्कि ‘आभेद’ नाम से जाना जायेगा तो उसे ‘जे बी पी’ का एजेंट बताकर चुप करा दिया गया ।
जैसे जैसे चुनाव नजदीक आता गया, अपने प्रचार के लिए समिति ने नए नए तरीके खोजने शुरू किये । सबसे पहले यह फैसला किया गया कि हर एक भेड़ अपने गले में एक पट्टा बांधेगी जिसपे लिखा होगा : “मैं हूँ आम भेड़ । ” चूँकि बन्दर एक डाल से दूसरी डाल तक बहुत जल्दी पहुच जाते हैं इसलिए उनको जंगल के हर एक कोने में ‘अभेद’ का सन्देश पहुंचाने का काम दिया गया । और स्वयं बुधई अपने समर्थकों और स्वयंसेवकों के साथ हर भेड़ के इलाके में पहुंचे और उनसे ‘अभेद’ के लिए मतदान करने का आग्रह किया। चुनाव हुआ और चुनाव में ‘अभेद’ थोड़े से अंतर से दूसरा सबसे बड़ा दल बनके उभरी । सबसे बड़े दल के सरकार बनाने से मना करने के बाद ‘अभेद’ से सरकार बनाने की अपेक्षा की जाने लगी । ‘अभेद’ की समिति ने सोचा कि चूँकि उन्होंने भेड़ों से पूँछकर ही सब काम करने का वादा किया था अतः उनकी राय ली जानी चाहिए । उन्होंने फैसला किया कि कल सुबह बूढ़े पीपल के आगे इस प्रस्ताव पर भेड़मत संग्रह किया जायेगा । जो भेड़ इससे सहमत हैं वो गुलाब का फूल लेकर आएंगी और जो इससे असहमत हैं वो चमेली का फूल लेकर आएंगी ।  उनका मानना था भेड़ें भेड़ियों से बहुत त्रस्त हैं इसलिए कभी उनके साथ जाने का समर्थन नहीं करेंगी । लेकिन परिणाम इससे ठीक विपरीत निकला । गुलाब के फूलों की संख्या चमेली के फूलों से कहीं ज्यादा निकली ।
इसके बाद बुधई ने मुख्य शाषक की शपथ ली । बुधई ने आते ही अपने लिए एक बड़ी गुफा की मांग की । जैसे ही भेड़ों को ये पता चला, हाहाकार मच गया । भेड़ों ने चुनाव के पहले और चुनाव के बाद के बुधई में काफी अंतर पाया । इतना होने के बाद बुधई ने कहा ,”मुझे पुरे जंगल का सञ्चालन करने के लिए एक गुफा तो चाहिए ही लेकिन आम भेड़ अगर इससे सहमत नहीं हैं तो मैं गुफा नहीं लूंगा, यहीं आपके बीच में रहूँगा । ” बुधई के पद सँभालते ही लोग अपनी मांगो का पुलिंदा लेकर उसके पास पहुँचने लगे । बुधई ने घोषणा की भेड़ों को सप्ताह के पहले तीन दिन चारा मुफ्त में दिया जायेगा । भेड़ों को सरकारी तालाब से पीने के लिए कर चुकाना पड़ता है, अब से उन्हें दिन में सात लीटर पानी मुफ्त दिया जायेगा।  चूँकि भेड़ों के बालों को काटने से उन्हें ठण्ड लगने कि सम्भावना अधिक रहती है अतः आज के बाद से उनके बालों को काटने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जायेगा । बंदरों ने पेड़ों पर अधिक ऊपर तक जाकर उछलकूद करने की मांग की तो उनकी मांग भी मान ली गयी। इस पर पेड़ों पर अधिक ऊंचाई पर रहने वाले पक्षियों ने जब व्यवधान की शिकायत की तो बंदरों को उनके बच्चों की कसम दिलाई गयी कि वो अधिक ऊंचाई तक जाकर उत्पात नहीं करेंगे ।
ऐसे ही रोज रोज नयी शिकायतों और मांगो का अम्बार बुधई और उसकी सरकार के आगे आने लग गया । इसमें कुछ मांगे मान ली गई और कुछ पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया गया । इस बीच कुछ अप्रिय घटनाएं घटी जिससे भेड़ों में ‘आम भेड़ दल’ के बारे में गलत सन्देश गया । समिति ने फैसला किया इस जंगल में शाषन करते हुए बाकी जंगलों में हो रहे चुनावों में हिस्सा ले पाना सम्भव नहीं है । अतः सरकार छोड़ने का कोई तरीका खोजा जाए। यहाँ पर फिर जांचपाल ‘आम भेड़ दल’ के काम आया। सरकार में इतने दिन रहने के बाद भी भेड़ों को ‘जांचपाल अधिनियम’ के बारे में विस्तारपूर्वक नहीं बताया गया ।  समिति ने फैसला किया जांचपाल के नाम से फिर से भेड़ों से मत माँगा जायेगा और इसी के नाम पर सरकार की बलि दे दी जाये । और ‘अभेद’ ने ठीक वैसा ही किया भी । भेड़ों ने जो एक बदलाव की उम्मीद देखी थी, वह उम्मीद धूमिल हो गयी । भेड़िये अपनी गुफाओं में जमे रहे ।
(लेखकीय टिप्पणी : भेड़ और भेड़ियों के संघर्ष की कहानी आगे भी जारी रहेगी । इस कहानी का वर्तमान राजनीतिक स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है ।  )

कहानी – “भेड़ें और भेड़िये”…….’हरिशंकर परसाई जी’ की लेखनी से व्यंग्य रचना, आज की राजनैतिक उथल पुथल पर विशेष

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एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए | और,एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो | पशु-समाज में इस `क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गयी कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया |

जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं,उसमें भेंडें बहुत थीं–निहायत नेक , ईमानदार, दयालु , निर्दोष पशु जो घास तक को फूँक-फूँक कर खाता है |
भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा | हम अपने प्रतिनिधियों से क़ानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारीकिसी को न सताए, न मारे | सब जिएँ और जीने दें | शान्ति,स्नेह,बन्धुत्त्व और सहयोग पर समाज आधारित हो |
इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया | भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका बहुमत होगा और अगर उन्होंने क़ानून बना दिया कि कोई पशु किसी को न मारे, तो हम खायेंगे क्या? क्या हमें घास चरना सीखना पडेगा?
ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ों का उल्लास बढ़ता जाता |
ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ियों का दिल बैठता जाता |
एक दिन बूढ़े सियार ने भेड़िये से कहा,“मालिक, आजकल आप बड़े उदास रहते हैं |”

हर भेड़िये के आसपास दो – चार सियार रहते ही हैं | जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे माँस को कुतरकर खाते हैं,और हड्डियाँ चूसते रहते हैं | ये भेड़िये के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके “हुआं-हुआं ” चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं |
तो बूढ़े सियार ने बड़ी गंभीरता से पूछा, “महाराज, आपके मुखचंद्र पर चिंता के मेघ क्यों छाये हैं?” वह सियार कुछ कविता भी करना जानता होगा या शायद दूसरे की उक्ति को अपना बनाकर कहता हो |
ख़ैर, भेड़िये ने कहा,“ तुझे क्या मालूम नहीं है कि वन-प्रदेश में नई सरकार बनने वाली है? हमारा राज्य तो अब गया |

सियार ने दांत निपोरकर कहा,“ हम क्या जानें महाराज ! हमारे तो आप ही `माई-बाप’ हैं | हम तो कोई और सरकार नहीं जानते| आपका दिया खाते हैं, आपके गुण गाते हैं ”
भेड़िये ने कहा, “ मगर अब समय ऐसा आ रहा है कि सूखी हड्डियां भी चबाने को नहीं मिलेंगी |”
सियार सब जानता था, मगर जानकार भी न जानने का नाटक करना न आता, तो सियार शेर न हो गया होता !

आखिर भेड़िये ने वन-प्रदेश की पंचायत के चुनाव की बात बूढ़े सियार को समझाई और बड़े गिरे मन से कहा, “ चुनाव अब पास आता जा रहा है | अब यहाँ से भागने के सिवा कोई चारा नहीं | पर जाएँ भी कहाँ ?”
सियार ने कहा, “ मालिक, सर्कस में भरती हो जाइए |”
भेड़िये ने कहा, “अरे, वहाँ भी शेर और रीछ को तो ले लेते हैं,पर हम इतने बदनाम हैं कि हमें वहाँ भी कोई नहीं पूछता”
“तो,” सियार ने खूब सोचकर कहा, “ अजायबघर में चले जाइए |”
भेड़िये ने कहा, “ अरे, वहाँ भी जगह नहीं है, सुना है |वहाँ तो आदमी रखे जाने लगे हैं |”

बूढा सियार अब ध्यानमग्न हो गया | उसने एक आँख बंद की, नीचे के होंठ को ऊपर के दाँत से दबाया और एकटक आकाश की और देखने लगा जैसे विश्वात्मा से कनेक्शन जोड़ रहा हो | फिर बोला,“बस सब समझ में आ गया | मालिक, अगर पंचायत में आप भेड़िया जाति का बहुमत हो जाए तो?”
भेड़िया चिढ़कर बोला, “ कहाँ की आसमानी बातें करता है? अरे हमारी जाति कुल दस फीसदी है और भेड़ें तथा अन्य पशु नब्बे फीसदी |भला वे हमें काहे को चुनेंगे | अरे, कहीं ज़िंदगी अपने को मौत के हाथ सौंप सकती है? मगर हाँ, ऐसा हो सकता तो क्या बात थी !”

बूढा सियार बोला,“ आप खिन्न मत होइए सरकार ! एक दिन का समय दीजिये | कल तक कोई योजना बन ही जायेगी | मगर एक बात है | आपको मेरे कहे अनुसार कार्य करना पड़ेगा |”
मुसीबत में फंसे भेड़िये ने आखिर सियार को अपना गुरु माना और आज्ञापालन की शपथ ली |
दूसरे दिन बूढा सियार अपने तीन सियारों को लेकर आया | उनमें से एक को पीले रंग में रंग दिया था, दूसरे को नीले में और तीसरे को हरे में |
भेड़िये ने देखा और पूछा, “ अरे ये कौन हैं?
बूढा सियार बोला, “ ये भी सियार हैं सरकार, मगर रंगे सियार हैं |आपकी सेवा करेंगे | आपके चुनाव का प्रचार करेंगे |”
भेड़िये ने शंका की,“ मगर इनकी बात मानेगा कौन? ये तो वैसे ही छल-कपट के लिए बदनाम हैं |”
सियार ने भेड़िये का हाथ चूमकर कहा, “ बड़े भोले हैं आप सरकार ! अरे मालिक, रूप-रंग बदल देने से तो सुना है आदमी तक बदल जाते हैं | फिर ये तो सियार हैं |”

और तब बूढ़े सियार ने भेड़िये का भी रूप बदला | मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए | बोला, “ अब आप पूरे संत हो गए | अब भेड़ों की सभा में चलेंगे | मगर तीन बातों का ख्याल रखना– अपनी हिंसक आँखों को ऊपर मत उठाना, हमेशा ज़मीन की ओर देखना और कुछ बोलना मत, नहीं तो सब पोल खुल जायेगी और वहां बहुत-सी भेड़ें आयेंगी, सुन्दर-सुन्दर, मुलायम-मुलायम, तो कहीं किसी को तोड़ मत खाना |”
भेड़िये ने पूछा, “ लेकिन रंगे सियार क्या करेंगे?ये किस काम आयेंगे?”
बूढा सियार बोला,“ ये बड़े काम के हैं | आपका सारा प्रचार तो यही करेंगे | इन्हीं के बल पर आप चुनाव लड़ेंगे | यह पीला वाला सियार बड़ा विद्वान है ,विचारक है ,कवि भी है,और लेखक भी | यह नीला सियार नीला और पत्रकार है | और यह हरा धर्मगुरु | बस, अब चलिए |”

“ ज़रा ठहरो,” भेड़िये ने बूढ़े सियार को रोका, “ कवि, लेखक, नेता, विचारक– ये तो सुना है बड़े अच्छे लोग होते हैं | और ये तीनों……..”
बात काटकर सियार बोला, “ ये तीनों सच्चे नहीं हैं, रंगे हुए हैं महाराज ! अब चलिए देर मत करिए |”
और वे चल दिए | आगे बूढा सियार था, उसके पीछे रंगे सियारों के बीच भेड़िया चल रहा था– मस्तक पर तिलक, गले में कंठी, मुख में घास के तिनके | धीरे-धीरे चल रहा था, अत्यंत गंभीरतापूर्वक, सर झुकाए विनय की मूर्ति !


उधर एक स्थान पर सहस्रों भेंड़ें इकट्ठी हो गईं थीं, उस संत के दर्शन के लिए, जिसकी चर्चा बूढ़े सियार ने फैला रखी थी |
चारों सियार भेड़िये की जय बोले हुए भेड़ों के झुण्ड के पास आए| बूढ़े सियार ने एक बार जोर से संत भेड़िये की जय बोली ! भेड़ों में पहले से ही यहाँ-वहाँ बैठे सियारों ने भी जयध्वनि की |
भेड़ों ने देखा तो वे बोलीं, “ अरे भागो, यह तो भेड़िया है |”

तुरंत बूढ़े सियार ने उन्हें रोककर कहा, “ भाइयों और बहनों ! अब भय मत करो| भेड़िया राजा संत हो गए हैं | उन्होंने हिंसा बिलकुल छोड़ दी है | उनका `हृदय परिवर्तन हो गया है | वे आज सात दिनों से घास खा रहे हैं | रात-दिन भगवान के भजन और परोपकार में लगे रहते हैं | उन्होंने अपना जीवन जीव-मात्र की सेवा में अर्पित कर दिया है | अब वे किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी का रोम तक नहीं छूते |भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है | इस जाति ने जो कष्ट सहे हैं,उनकी याद करके कभी-कभी भेड़िया संत की आँखों में आँसू आ जाते हैं | उनकी अपनी भेड़िया जाति ने जो अत्याचार आप पर किये हैं उनके कारण भेड़िया संत का माथा लज्जा से जो झुका है, सो झुका ही हुआ है | परन्तु अब वे शेष जीवन आपकी सेवा में लगाकर तमाम पापों का प्रायश्चित्त करेंगे | आज सवेरे की ही बात है कि एक मासूम भेड़ के बच्चे के पाँव में काँटा लग गया, तो भेड़िया संत ने उसे दाँतों से निकाला, दाँतों से ! पर जब वह बेचारा कष्ट से चल बसा, तो भेदिया संत ने सम्मानपूर्वक उसकी अंत्येष्टि-क्रिया की | उनके घर के पास जो हड्डियों का ढेर लगा है, उसके दान की घोषणा उन्होंने आज सवेरे ही की | अब तो वह सर्वस्व त्याग चुके हैं | अब आप उनसे भय मत करें | उन्हें अपना भाई समझें | बोलो सब मिलकर, संत भेड़िया जी की जय !” 
भेड़िया जी अभी तक उसी तरह गर्दन डाले विनय की मूर्ती बने बैठे थे |बीच में कभी-कभी सामने की ओर इकट्ठी भेड़ों को देख लेते और टपकती हुई लार को गुटक जाते |
बूढा सियार फिर बोला, “ भाइयों और बहनों, में भेड़िया संत से अपने मुखारविंद से आपको प्रेम और दया का सन्देश देने की प्रार्थना करता पर प्रेमवश उनका हृदय भर आया है, वह गदगद हो गए हैं और भावातिरेक से उनका कंठ अवरुद्ध हो गया है | वे बोल नहीं सकते | अब आप इन तीनों रंगीन प्राणियों को देखिये | आप इन्हें न पहचान पाए होंगे | पहचानें भी कैसे? ये इस लोक के जीव तो हैं नहीं | ये तो स्वर्ग के देवता हैं जो हमें सदुपदेश देने के लिए पृथ्वी पर उतारे हैं | ये पीले विचारक हैं,कवि हैं, लेखक हैं | नीले नेता हैं और स्वर्ग के पत्रकार हैं और हरे वाले धर्मगुरु हैं | अब कविराज आपको स्वर्ग-संगीत सुनायेंगे | हाँ कवि जी …….”
पीले सियार को `हुआं-हुआं ‘ के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था | `हुआं-हुआं चिल्ला दिया |शेष सियार भी `हुआं-हुआं’ बोल पड़े | बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला,“ भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं | पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं | वे कह रहे हैं की जैसे स्वर्ग में परमात्मा वैसे ही पृथ्वी पर भेड़िया | हे भेड़िया जी, महान ! आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वशक्तिमान हैं | प्रातः आपके मस्तक पर तिलक करती है, साँझ को उषा आपका मुख चूमती है , पवन आप पर पंखा करता है और रात्रि को आपकी ही ज्योति लक्ष-लक्ष खंड होकर आकाश में तारे बनकर चमकती है | हे विराट ! आपके चरणों में इस क्षुद्र का प्रणाम है |”
फिर नीले रंग के सियार ने कहा, “ निर्बलों की रक्षा बलवान ही कर सकते हैं | भेड़ें कोमल हैं, निर्बल हैं, अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं | भेड़िये बलवान हैं, इसलिए उनके हाथों में अपने हितों को छोड़ निश्चिन्त हो जाओ, वे भी तुम्हारे भाई हैं | आप एक ही जाति के हो | तुम भेड़ वह भेड़िया | कितना कम अंतर है ! और बेचारा भेड़िया व्यर्थ ही बदनाम कर दिया गया है कि वह भेड़ों को खाता है | अरे खाते और हैं, हड्डियां उनके द्वार पर फेंक जाते हैं | ये व्यर्थ बदनाम होते हैं | तुम लोग तो पंचायत में बोल भी नहीं पाओगे | भेड़िये बलवान होते हैं | यदि तुम पर कोई अन्याय होगा, तो डटकर लड़ेंगे | इसलिए अपने हित की रक्षा के लिए भेडियों को चुनकर पंचायत में भेजो| बोलो संत भेड़िया की जय !”

फिर हरे रंग के धर्मगुरु ने उपदेश दिया, “ जो यहाँ त्याग करेगा, वह उस लोक में पाएगा | जो यहाँ दुःख भोगेगा, वह वहां सुख पाएगा | जो यहाँ राजा बनाएगा, वह वहाँ राजा बनेगा | जो यहाँ वोट देगा, वह वहाँ वोट पाएगा | इसलिए सब मिलकर भेड़िये को वोट दो | वे दानी हैं, परोपकारी हैं, संत हैं | में उनको प्रणाम करताहूं |”
यह एक भेड़िये की कथा नहीं है, सब भेड़ियों की कथा है | सब जगह इस प्रकार प्रचार हो गया और भेड़ों को विश्वास हो गया कि भेड़िये से बड़ा उनका कोई हित-चिन्तक और हित-रक्षक नहीं है |
और, जब पंचायत का चुनाव हुआ तो भेड़ों ने अपने हित- रक्षा के लिए भेड़िये को चुना |
और, पंचायत में भेड़ों के हितों की रक्षा के लिए भेड़िये प्रतिनिधि बनकर गए | और पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों की भलाई के लिए पहला क़ानून यह बनाया —-
हर भेड़िये को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए , दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए |

हरिशंकर परसाई

 

http://pwaup.blogspot.in/2012/08/blog-post.html

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1ST DAY =10
2ND DAY =100
3RD DAY =1,000
4TH DAY =10,000
5TH DAY =100,000
6TH DAY =1,000,000
7TH DAY =10,000,000
8TH DAY =100,000,000
9TH DAY =1,000,000,000
10TH DAY =1,210,193,422

4. बौद्ध साहित्य बहुत विस्तृत है, केवल बौद्ध भंते और बौद्ध लीडर उतना नहीं कर सकते जितना की हम सब मिल कर कर सकते हैं| अगर आपके पास भी बौद्ध धम्म की जानकारी है और आप बौद्ध धम्म पर लिखते हो तो आपसे अनुरोध है की आप बौद्ध धर्म पर अपने आर्टिकल हिंदी में jileraj@gmail.com पर भेजे जिसे हम आपके नाम और फोटो सहित या जैसा आप चाहें यहाँ पब्लिश करेंगे| आईये किताबों में दबे बौध धम्म के कल्याणकारी ज्ञान को मिल जुल कर जन साधारण के लिए उपलब्ध कराएँ |

5. अगर आप और आपके साथी बौद्ध लोगों की अच्छी भीड़ जुटा सकते हैं और धन जुटा सकते हैं तो बौद्ध धम्म पर सत्संग केडर कैंप  गोष्टी समूहित चर्चा आदि करवाएं|

6 हमेशा याद रखें की धन से धर्म चलता है धर्म से संगठन चलता है और संगठन से सुरक्षा होती है, धन के बिना तो बच्चे भी अपने पिता की नहीं सुनते| धन के बिना कोई संस्था और मिशन नहीं चल सकता| समयबुद्धा मिशन को धन उपलब्ध करवाएं|ज्यादातर मामलों में हमारे लोगों को दान देने में विश्वास नहीं होता की उनका दान सही जगह लगेगा या नहीं|इसका भी समाधान है विश्वास नहीं तो दान न दो आप बाबा साहब डॉ आंबेडकर की लिखी किताबों को ,बौद्ध धम्म और समयबुद्धा बौद्ध प्रवचन साहित्य को खरीद कर आम जनता में बाटें दूर दराज गाँव में बाटें|जरा ध्यान दें की अगर आप केवल पांच सौ रूपए महीने बौद्ध धम्म के लिए जमा करते हो तो साल के छह हज़ार जमा कर सकते हो|अगर आप हर साल छह हज़ार की किताबें और सी०डी० जनता में बाटें तो भी आप समयबुद्धा मिशन का ही काम करेंगे|ध्यान रहे धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है|हर साल आप बौद्ध धम्म की शिक्षा से भरे कैलंडर भी छपवा कर बाँट सकते हो|उस कैलंडर में क्या लिखना है इस जानकारी के लिए jileraj@ gmail.com पर मेल करें|

7. हर पूर्णिमा पर व्रत रखें और शाम को अपने निकटतम बौद्ध विहार में जाकर अपने समाज के साथ संगठित बुद्ध वंदना और धम्म चर्चा करें|कभी ये न कहे की हमें धर्म परिवर्तन करना है बल्कि हमेशा ये कहें की हम अपने खुद के बौद्ध धम्म में वापस लौट रहे हैं

8. हरिजन,दलित, शोषित, शूद्र, अछूत, राक्षश जैसे विरोधियों के दिए अपमानजनक नामों को मौखिक और लिखित किसी भी रूप में इस्तेमाल न करें|इसकी जगह ऐसे संबोधन का प्रयोग करें जिसमें आपके समाज की कमजोरी नहीं आपके समाज का बल नज़र आये जैसे मूलनिवासी, अनार्य, बौद्ध खासकर बहुजन जिसका मतलब है बहुसंख्यक जनता जिसकी संख्या ज्यादा हो|

शोषक के अत्याचारों की केवल बुराई और शिकायत आदि में ही अपनी उर्जा व्यर्थ न करते रहो| आगे बढ़ो और कुछ ठोस करो बिना संगर्ष के कुछ नहीं मिलेगा, आपको आपकी जगह कोई नहीं देगा आपको खुद बनानी है छीननी है| सम्मान माँगा नहीं जाता करवाया जाता है| बाबा साहब के मूल मंत्र -शिक्षित बनो, संगठित रहो और संगर्ष करो पर आप क्या काम कर रहे हो यही बात तय करेगी की आपको और आपके समाज को दुनिया में क्या जगह मिलेगी|

Team

SAMAUBUDDHA MIDHAN Delhi.

बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर जयंती 14 अप्रैल व् पूर्णिमा धम्म संघायन (15-April-2014 ) पर विशेष धम्म देशना: – आम्बेडिकर दर्शन व मिशन और भारत के बहुजन…समयबुद्धा

“हमारे लोग  हजारों साल तक मंदिर प्रवेश की सख्त मनाही के बावजूद पिट पिट कर बेइज़ज़त हो होकर , मर मर कर और अत्याचार सहकर भी  तेतीस करोड़ देवी देवताओं की  पूजा करते रहे पर कोई उद्धार न हो सका|जो काम तेतीस करोड़ देवी देवता मिल कर भी हजारों सालों में नहीं कर सके वो काम बोधिसत्व डॉ भीम राव अम्बेडकर ने कुछ ही सालों में कर दिखाया|हे बहुजनों क्या अब भी तुम अपने मसीहा को देखने सुनने समझने को अपने कान आँखें नहीं खोलोगे,क्या अब भी संगर्ष नहीं करोगे,क्या अब भी तुम मन्दिरबाजी में ही लगे रहोगे, अगर हाँ तो फिर से पिटने और बेइज्जत मौत मरने को तैयार रहो, तुम नहीं तो तुम्हारे आने वाली पीढ़ियां..”… समयबुद्धा

shik sang200px-Dr_Bhimrao-Ambedkarआम्बेडिकर दर्शन  व मिशन और भारत के बहुजन

आम्बेडिकर मिशन बहुत ही व्यापक मिशन है, इस मिशन का जो अर्थ मैं समझा हूँ वो है:- ” भारत के बहुजनों का सम्पूर्ण और चौमुखी विकास का लक्ष्य ” , बाबा साहेब के इस चौमुखी विकास के मिशन कुछ इस प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है:

-शरीक व मानसिक उन्नति
-शैक्षणिक उन्नति
-राजनीतिक उन्नति
-सामाजिक उन्नति
-आत्मस्वाभिमान की जिन्दगी
-आत्मनिर्भरता
-अपना धर्म एव धार्मिक उन्नति
-आर्थिक समृधि
-बहुजन संगठन बल
-व्यक्तिगत,सामाजिक एव नेतिक उन्नति

ऐसे ही अनेकों मिशन हैं जिसपर हमारे लोग अपने अपने स्थर पर जो हो सकता है कर रहे हैं| इन्ही जैसा एक मिशन है  “व्यक्तिगत विवेक क्षमता वृद्धि” जिसपर जो इस पुस्तक का लक्ष्य है, क्योंकि मैंने ये महसूस किया है की जन साधारण में विवेक एव क्षमता की कमी होने के कारन जितने भी उन्नति के प्रयास किया जाते हैं वे उतने कामयाब नहीं हो पाते  जितनी उनसे उपेक्षा होती है|इस मिशन के तहत मैंने इस पुस्तक की रचना की है और इस पुस्तक के सन्देश को जन जन तक पहुचने में आपसे सहयोग  की उपेक्षा रखता हूँ |

आम्बेडिकर दर्शन  एक संपूर्ण विषय है ,उनकी सोच इतनी ज्यादा  उन्नत  थी की उनके विचार उनका साहित्य अपने आप बहुत विस्तृत और ठोस है ,उनकी एक एक सोच पी एच डी का विषय है |यदि आप जानकारी चाहते हैं तो बाबा साहेब द्वारा लिखित पुस्तकें पड़ें हर मिशन पर बहुत सा साहित्य उपलध हैं | मुझे लगता है की कम शब्दों में  बाबा साहेब महान के मिशन बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखने जैसा ही है| हर मिशन पर ज्यादा चर्चा से हम इस पुस्तक की विषयवस्तु से  थोडा भटक जायेंगे, फिर भी थोड़ी चर्चा जरूरी है|

ये जिन्दगी का नियम है की जो जीतता है वही कानून बनता है और वही इतिहास लिखता है, और कोई भी इतिहास में खुद को गलत कैसे लिखायेगा,हारने वाला चाहे कितना ही सही क्यों न हो उसी को गलत लिखाया जाता है , इसी हार के परिणाम स्वरुप बहुजनों से सब कुछ छीन लिया यहाँ तक की विद्या और अध्यन का अधिकार भी

“विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना धन गया 
धन बिना शूद्र पीढ़ियों तक गुलाम हुए… इतना घोर अनर्थ मात्र अविद्या के कारण ही हुआ “….

साथियों आज जब विद्या और ज्ञान के दरवाजे खुले हुए हैं तो क्यों नहीं ज्ञान ले लेते?क्या सत्ता परिवर्तन का इंतज़ार है जब संविधान बदल दिया जायेगा और फिर दमन निति चालू हो जाएगी |

मैंने सन 2000 में रिलीज जब्बर पटेल की फिल्म डॉ बाबासाहेब  आंबेडकर देखि जो सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार व महारास्ट्र सरकार की लागत और मार्गदर्शन में बाबा साहेब  के जीवन संगर्ष पर बनी है| इस फिल्म का प्रबंधन नेशनल  फिल्म  डेवेलोपमेंट  कॉर्पोरेसन ऑफ़ इंडिया (NFDC) ने किया है, इसे जरूर देखें |इसी फिल्म की शुरुआत में एक भूमिका डाएलोग  है जिसे हम कह सकते हैं की स्वव भारत सरकार  कह रही है|  जिसका तात्पर्य ये है की इन भारतवासियों  को  समाज से काट कर रखा गया उन्हें तरक्की करने के सभी मौके छीन लिए गए| उन्हें न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से गुलाम बना दिया गया| ये गुलामी दुनिया भर के इतिहास की गुलामी से भी बत्तर थी क्योंकि इसमें हारे हुए इन भारतवासियों  के विचारों को गुलाम बना दिया था| ये रोमन साम्राज्य की गुलामी से बत्तर थी जो अमेरिकी नीग्रो और जर्मन यहूदियों के साथ किया गया ये उससे कहीं ज्यादा बत्तर था|

आखिर ये कब तक चलता रहता, बाबा साहेब आंबेडकर ने  समाज सुधारकों और धर्म गुरुओं की तरह केवल बातें बनाने तक ही सीमित नहीं रहे उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता को कानून का रूप दिया| अब कोई चाहे या न चाहे उसे समानता का बर्ताव करना ही पड़ेगा| इस बाबा साहेब के युग में कोई जन्म से नहीं अपनी क्षमता के हिसाब से जीवन यापन करता है| ये कानून कुछ महास्वार्थी देशद्रोही  मनुवादियों को छोड़कर सभी सम्प्रदायों के लिए अच्छा है |आज जैसी खुशहाली इस देश में कभी नहीं रही थी, केवल सम्राट अशोक के राज्ये में कुछ हद तक समानता थी| उस सुशाशन की याद और आदर्श में आज भी  देश में अशोक चक्र और अशोक स्तम्भ को भारत सरकार अपने  शाशन का प्रतीक मानती  हैं |

डॉ आंबेडकर और उनके विचारों को केवल दलितों तक सीमित रखना एक साजिश है, वे समस्त भारत के नेता हैं विशेष कर 80% भारतवासी जनसँख्या जिन्हें आज हम एस०सी०, एस०टी०, ओ०बी०सी० और कनवरटेड  माईनोरिटी के नाम से जानते हैं|डॉ आंबेडकर द्वारा चयनित बौद्ध सिद्धांत  “कानून की नज़र में सब सामान हैं और कानून धर्म से ऊपर है” पर आधारित संविधान का लाभ आज सभी उठा रहे हैं|आज जिसकी जो जाती है उसको उस पेशे में बाध्य नहीं किया जा रहा बल्कि जिसकी जितनी क्षमता उसको उतना मिल रहा है|जरा सोच कर देखिये की अगर किसी कट्टरपंथी मनुवादी ने संविधान बनाया होता तो क्या हाल होता|ये बड़ा भ्रम ओबीसी समुदाय के बुद्धिजिवियो और पढ़े-लिखे शिक्षितों में फैला हुआ  है कि बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर महार जाती में जन्मे थे इसलिये उन्होंने केवल दलित/एससी समुदाय के उत्थान लिए ही कार्य किया किया है| इस भ्रम फेलने के पीछे मनुवादी मिडिया का बड़ा रोल है सच्चाई और अम्बेदिकरवादी विचारधारा अगर जनसाधारण तक पहुच गई तो क्या परनाम होगा वे जानते हैं|

वास्तव मे  बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर आधुनिक भारत के शिल्पकारों में मेहनत और क़ुरबानी में सबसे आगे थे| भारत जैसे देश जो हजारों जातिया,समुदाय,भाषा, मान्यता,धर्म,समाज, भौगोलिक विषमता आदि से भरा हुआ है उसको पिछले 65 सालों से अगर तिरंगे के नीचे इकठ्ठा कर के कोई रख पाया है तो इन सभी समस्याओं का समाधान जो कि बाबा साहेब ने भारतीय संविधान में सुझा गए| सभी वर्ग अगर अपनी अपनी मान्यताओं के हिसाब से संविधान बना लेते तो  आज भारत का क्या हाल होता  ये आप समझ सकते हैं |

जिसके हाथ में सार्वजनिक पुस्तकालय को सँभालने और देश के स्कूलों कालेजों का पठयेक्रम को तय करने  का कारोबार रहा है,  ऐसे उच्च वर्ण जातियों के संचालको का भी बड़ा रोल है, क्योकि यही से  बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के जीवनचरित्र, उनके विचारों और मेहनत को जग  जाहिर नहीं होने दिया जाता, पर धीरे धीरे ही सही सच एक दिन फ़ैल ही जायेगा |इसीलिए बाबा साहेब  डॉ. आम्बेडकर द्वारा किये गए संगर्ष का जो लोग लाभ उठा रहे हैं वे अपने मसीहा को दलित के रूप में देखने और नकारने  को मजबूर हैं| आज भी ओबीसी के बुद्धिजिवियो और शिक्षितों को ये पता नहीं है कि बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय के लिए क्या किया है ? बात चली है तो थोडा सा तो लिखना पड़ेगा ,बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय, जो देश में 52% से भी अधिक है उसके उत्थान के लिए:

(१) १९२८ में बोम्बे सरकार ने स्टार्ट कमिटी नियुक्त कि थी जिसमे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर ने Other backward caste यानि कि OBC शब्द का उपयोग किया था.स्टार्ट कमिटी में बाबा साहेब ने कहा था कि, जो जातिया अपर कास्ट और बेकवर्ड के बिच में आती है ऐसी जातियां अन्य पिछड़ी जाति यानी कि ओबीसी है|

(२) देश की संविधान सभा में सिर्फ ६ ही ओबीसी सदस्य थे. जिसकी आवाज दबा कर रख दी थी लेकिन डॉ. बाबा साहेब के कारण ही कलम ३४० का प्रावधान करना पडा और जिनके फलस्वरूप “काका कालेलकर आयोग” (१९५३-५५) तथा “मंडल आयोग” (१९७८-८०) की रचना केन्द्र सरकार को करनी पड़ी थी. दोनों आयोग ओबीसी के लिए थे लेकिन अफसोसजनक है की ओबीसी समुदाय के 99% शिक्षितों को इसके बारे में पता नहीं है|

(३) १९५१ में अपने कानून मंत्री पद से इस्तीफा देते हुवे पत्र में बाबा साहेब ने इस्तीफा का दूसरा कारण ओबीसी जातियों के लिए आयोग की नियुक्ति नहीं करना और ओबीसी की उपेक्षा करना बताया था. क्या ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों को लागु करने के लिए १९४७ से २०११ तक राज्य या केन्द्र सरकार के कोई मंत्री ने इस्तीफा दिया है ?
डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर के इस्तीफा के कारण ही दबाव में आकर सरकार को ओबीसी के लिए “काका कालेलकर आयोग” की रचना करनी पड़ी थी. १९५२ की लोकसभा में ५२% से ज्यादा ओबीसी-समुदाय के सांसदों सिर्फ ४.३९% ही थे. बाबासाहेब ही थे जिन्होंने ओबीसी, एससी-एसटी(अति शुद्र) और महिलाओं के उत्थान के किया आजीवन संघर्ष किया था,

sc st obc rolling on brahmin jootan

उनको दलितो के उद्धारक के रूप में सिमित कर देना क्या एक षड्यंत्र नहीं है ?

“गैर अम्बेडकरवादी बहुजन जातियां विशेषकर ओबीसी के दिमाग में ब्राह्मणों ने इतना ब्राह्मणवाद भर डाला है की ,ओबीसी अपने साथी SC ST के साथ बैठकर खाना खाने को भी पसंद नहीं करता ,जबकि ब्राह्मणों की जूठी पत्तल पर इस तरह लेटने  में भी उसे गर्व महसूस होता है| यही है मानसिक गुलामी और इसका सीधा कारन है कीइन अनपढ़ों की  मानसिक गुलामी जीमने इनको लगता है की  ब्राह्मणवाद या मन्दिरबाजी इनको फायदा पहुचता है और आंबेडकरवाद उनको दलितों के साथ खड़ा कर देगा  जिससे इनका कोई फायदा नहीं होगा|

Picture on RIGHT>>>>>>Karnataka Rajya Hindulida Vargagala Jagrutha Vedike president K.S. Shivaramu has sought an end to made snana (rolling on the plantain leaves on which Brahmins have partaken meal) or its modified form of ede snana (rolling on plantain leaves on which food offered to deity is kept) at Kukke Subramanya Temple.

हमारे समाज को कोई भी क्रांति उठती तो जोश से है पर धन न होने के कारन चल नहीं पाती|जब बुद्ध आंबेडकर विचारधारा जनता को धन कम कर नहीं दे सकती तो जनता भी अपना धन इसे नहीं दे सकती ये एक कड़वी सच्चाई है| जब तक धन कमाने के रास्ते बुद्धवाद या अम्बेडकरवाद में नहीं अपना लिए जाते इसकी पूछ नहीं होगी| ये विचारधारा केवल कुछ गिने चुने लोग के बीच की चर्चा का विषय बनकर रह जायेगा| ये जनता है इसे फायदा चाहिए हमारी विचारधारा नहीं देगी तो जनता वहां चली जाएगी जहाँ से फायदा मिलेगा| हमारे समाज में अगर कोई आंबेडकर या बुद्धा के नाम पर धन कमाने लगे तो लोग उसकी इस कदर खिलाफत करते हैं की बस वो व्यक्ति इस विचारधारा का कट्टर दुश्मन हो जाता है| मैं मानता हूँ अपवाद हर जगह हो सकते हैं कुछ लोग गलत फायदा उठा सकते हैं पर क्या इस बात के लिए हमारी विचारधारा को धन विहीन नीरस ज्ञान बना कर छोड़ दें|उदहारण के लिए मुझे एक बात बताओ की एक दलित अगर किसी हिन्दू देवी का जागरण में गण बजाना कर के अपने परवार का पेट पाल रहा है और वो हमारी बात समाज जाये की बुद्धवाद और आंबेडकरवाद  सही है पर तब उसका सवाल होगा की अपनी रोजी रोटी के लिए वो क्या करे? क्या हमारी विचारधारा में धाम कमाने का कोई जरिया है| ऐसे में कुछ साथी जोश में आकर कह सकते हैं की हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं , तो ठीक हैं पर ऐसे लोगों की संख्या नब्बे प्रतिशत है| इनको छोड़ दो तो बचते हैं वही सेल्फ मोटिवटेड दस प्रतिशत से भी काम लोग जो सिर्फ मुह बजने या कलम जिसने तक ही सीमित हों| साथियों ध्यान रहे यही है इस देश में बौद्ध विचारधारा के पतन का मुखुए कारन, बौद्ध विचारधारा का डिजाइन में “अहिंसा,सत्य और कायदा” प्रमुख है जबकि ब्राह्मणवाद के डिजाइन में “विजय,अवसरवाद और फायदा”प्रमुख हैं| ये दुनिया है आप इसे फायदा नहीं डोज तो ये वहीँ चली जाएगी जहाँ इसे फायदा होगा| अब फैसला आपके हाथ में हैं की आप इस विचारधारा को फायदेमंद बनाने में लगते हो या  इसे केवल किताबी बाते बनाकर एक कोने में पड़ा रहने देते हो|.

 

बाबा साहेब का निम्न कथन उनका हमारे लिए अंतिम था:

‘‘मेरे लोगों से कह देना, नानक चन्द! मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेषकर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धेखा दे दिया। मैं बड़ी कठिनाइयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है। कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हे इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा। जाओ जाकर उनसे कह दो जाओ जाकर उनसे कह दो.. जाओ जाकर उनसे कह दो,’’

उन्होंने तीन बार कहा। यह कह कर वह सिसकने लगे, देखते ही देखते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

ambedkar sandesh

बाबासाहब के कारवाँ का अन्तिम पड़ाव क्या है? बाबासाहब के कारवां का गंतव्य स्थान है – देश में धम्म का शासन, देश को बुद्धमय करना, अर्थात हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो भ्रष्टाचारमुक्त हो, अपराधमुक्त हो, आतंकवादमुक्त हो, गरीबीमुक्त हो. हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ सभी लोग स्वस्थ हों, शक्तिशाली हों, प्रबुद्ध हों, खुश हों, सुखी हों, सम्पन्न हों, न्यायप्रिय हों, जहाँ जातिवाद न हो, असमानता न हो, अन्धविश्वास न हो, कुरीतियों न हो, आडम्बर न हो, अज्ञानता न हो, भेदभाव न हो, जहां लोगों में एकता, बन्धुत्व, समानता, ईमानदारी और आपसी प्रेम हो…लाला बौद्ध

bahujanबाबासाहब का कारवाँ

ग्रुप में अधिकांश मित्रों की सक्रियता और बहुत अच्छे-अच्छे ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक संदेशों का आदान-प्रदान इस बात का द्योतक हैं कि हम लोग बहुत शीघ्र बाबासाहब के काँरवा को गंतव्य स्थान तक पहुंचाने में सफल होंगे.

बाबासाहब के कारवाँ का अन्तिम पड़ाव क्या है? बाबासाहब के कारवां का गंतव्य स्थान है – देश में धम्म का शासन, देश को बुद्धमय करना, अर्थात हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो भ्रष्टाचारमुक्त हो, अपराधमुक्त हो, आतंकवादमुक्त हो, गरीबीमुक्त हो. हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ सभी लोग स्वस्थ हों, शक्तिशाली हों, प्रबुद्ध हों, खुश हों, सुखी हों, सम्पन्न हों, न्यायप्रिय हों, जहाँ जातिवाद न हो, असमानता न हो, अन्धविश्वास न हो, कुरीतियों न हो, आडम्बर न हो, अज्ञानता न हो, भेदभाव न हो, जहां लोगों में एकता, बन्धुत्व, समानता, ईमानदारी और आपसी प्रेम हो.

हमारे देश की समस्त समस्यों का मूल कारण ब्राह्मणवाद है. ब्राह्मणवाद को देश में सत्ता के बल पर लाया गया था, अतः सत्ता के बल से ही इसे नेस्तनाबूत (कब्र के अन्दर दफन करना) किया जा सकता है. सत्ता प्राप्त करने के लिये के दो रास्ते हैं. पहला- खूनी क्रान्ति, दूसरा- वोट (लोकसभा एवं विधान सभा के चुनाव में सम्यक प्रत्याशी को वोट करके विजयी बनाना).

सत्ता हम खूनी क्रान्ति से प्राप्त करें या सम्यक प्रत्याशी को वोट देकर?
तथागत बुद्ध और बाबासाहब के वंशज होने के नाते सत्ता प्राप्ति के लिये हम हिंसक क्रान्ति का रास्ता नहीं अपना सकते. हालांकि हमारा दुश्मन ब्राह्मणवादी सवर्ण और उसके तथाकथित भगवानों (ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, राम, परशुराम, गणेश, दुर्गा आदि-आदि) ने नाना प्रकार के हथियारों से हमारे पूर्वजों (असुर, राक्षस, दानव) की हत्या की, आज भी उन्हीं हथियारों से लैस हमारा खात्मा करने के लिये खड़े हैं. लेकिन फिर भी सत्ता प्राप्ति के लिये हमारा पहला प्रयास बुद्ध का अहिंसक रास्ता ही होगा.

कथित आजादी की प्राप्ति के बाद से अब तक सत्ता अल्पसंख्यक ब्राह्मणवादियों और पूंजीपतियों की रही है, और आज भी है. हम अपना लक्ष्य तभी प्राप्त कर सकते हैं, जब केन्द्र में हमारी पूर्ण बहुमत-प्राप्त सत्ता होगी.
सत्ता को हम अभेद्य एकता और मजबूत संगठन के बिना प्राप्त नहीं कर सकते.

कथित सवर्ण ब्राह्मण, बनियां, ठाकुर भारत में अल्पसंख्यक है. देश में इनकी आबादी मात्र 15% है. देश में शेष 85% अवर्ण कौन हैं? देश के 85% अवर्ण ‘बहुजन’ हैं, जिसमें देश के SC, ST, OBC, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान लोग समाहित हैं. लोकतांत्रिक देश में अल्पसंख्क लोगों की सरकार है. बहुसंख्यक बहुजन हासिये पर हैं. बहुसंख्यकों पर अल्पसंख्सकों का शासन स्थापित है. ये विश्व का आठवाँ अजूबा है. ये दुनियां का नायाब अजूबा है.

देश में लोकतंत्र है लेकिन जाल ब्राह्मणतंत्र का फैला हुआ है. देश के कायदे-कानून हैं, लेकिन यहां के शंकराचार्य और पुरोहित खुलेआम कहते हैं, “मेरा नाम फलांफलां शर्मा शास्त्री है, मैं अमुक विद्यापीठ का अध्यक्ष हूं, शास्त्रों को मानने वाला और कट्टर ब्राह्मण होने के नाते मैं छुआछूत मानता हूँ. मैं भारत के संविधान को नहीं मानता हूँ, मनुस्स्मृति और शास्त्रों में वर्णित नियम ही मेरा संविधान हैं”. “दलितों का मन्दिर में प्रवेश वर्जित है”…आदि आदि अभिकथन लोकतंत्र नहीं ब्राह्मणतंत्र के परिचायक हैं. देश के हजारों कथित संत आश्रम अय्यासी, कदाचार और आतंकी गतिविधियों के अड्डे बनते जा रहे हैं.

देश की 90% संपत्ति ब्राह्मण बनियों के पास है. देश की लोकतांत्रिक सरकार पूंजीपतियों, उद्योगपतियों के ‘पैसे के बल’ से बनती है. देश में मुसलमानों, ईसाइयों के विरुद्ध साम्प्रदायिक दंगे मंदिरों में जमा अकूत ‘संपत्ति के बल’ से कराये जाते हैं. सुनियोजित योजना बनाकर ये ब्राह्मणवादी, पूंजीवादी सरकारें SC, ST, OBC के लोगों को आरक्षण के बावजूद सरकारी पदों पर जाने से रोक रहीं हैं. आज हजारों की संख्या में प्राइवेट मेडिकल कालेज, प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज, प्राइवेट मैनेजमेंट कालेज, प्राइवेट फार्मेसी कालेज, प्राइमरी से लेकर परस्नातक की शिक्षा के लिये तमाम प्राइवेट स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालयों के द्वारा दलितों को शिक्षा और रोजगार से वंचित किया जा रहा है.

बहुजन समाज के लोग शिक्षा से वंचित रहकर उत्तरोत्तर गरीब होते जा रहे हैं. वे अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिये अपने पैतृक गाँव छोड़-छोड़कर बड़े-बड़े शहरों में मजदूरी के लिये जाने को विवश हैं. वहां सुबह से देर रात तक शारीरिक श्रम करने के कारण न तो उनके पास पर्याप्त कुछ सोचने-समझने के लिये समय है और न ही समुचित ज्ञान की रोशनी.

अक्सर हमने कुछ लोगों को ये कहते सुना है कि अमुक अमुक बिरादरी के लोग ब्राह्मणवादी राजनैतिक पार्टियों के पिछलग्गू हैं या पढ़े-िलखे लोग मंदिर जाते हैं, हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. बात सही है. हमें उनके इस कृत्य के पीछे के कारण को समझना होगा. कारण है सम्यक ज्ञान का अभाव. हमें उन तक ज्ञान की रोशनी पहुंचानी है. रोशनी पहुँचते ही वे बिहार के मुख्यमंत्री माँझी की तरह मुखर होकर बोलने लगेंगे.

हमारे कुछ लोग कथित सवर्णों के पिछलग्गू असुरक्षा की भावना के कारण होते हैं. हमें उनको बताना होगा कि वे अकेले नहीं हैं, हम हमेशा उनके साथ हैं. येसा करने से वे जब स्वयं को सुरक्षित महसूस करेंगे तो हमारे साथ आ जायेंगे.

अतः हमें अपने हर व्यक्ति तक पहुंचकर उन्हें समझाना है और उनमें अभेद्य एकता पैदा करनी है साथ ही अपना संगठन विस्तृत और मजबूत करना है.

जय भीम लाला बौद्ध

डा. भीमराव अम्बेडकर : एक युग पुरुष….RANCHI EXPRESS

डा. भीमराव अम्बेडकर : एक युग पुरुष

बहुजन ह्रदय  सम्राट बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की जयंती  (14-APRIL-14)  कि हार्दिक शुभकामनायें

AMBEDKAR best photo

कितनी भी पाबन्दियां क्यों न हों, चाहे जितना अन्धकार क्यों न हो, रास्ता कठिनाइयों से भवा पड़ा हो, किन्तु जो यह मानकर चलता है कि उड़ा पाल मांझी बढ़ाव नाव आगे, तो वह एकदिन गन्तव्य स्थान पर पहुंच ही जाता है।

डा. भीम राव अम्बेडकर का जन्म ऐसी परिस्थिति में हुआ था जब देश में सामन्तवादी ताकतों का बोलबाला था तथा सवणों के अन्दर इस तरह की मानसिकता थी कि वे जानवर को स्पर्श करना धर्म समझते थे, किन्तु दलितों को स्पर्श करना उनके लिए अधर्म था। डा. अम्बेडकर बचपन से ही उन सवालों को लेकर चिन्तित रहते थे कि-

‘कांटे तो काटे से ही निकाले जाते हैं,
क्यों जातिवादी जातियता से घबराते हैं,
तुम बाह्मण हम शुद्र कैसे?
तुम क्षत्रिय हम वैश्य कैसे?
तुम पावन हम पतित कैसे?

उपर्युक्त सवालों के प्रति उनके दिल में चुभन थी और उन्होंने अवर्णनीय कष्ट, प्रबलतम विरोध, घनघोर अभाव एवं अमानवीय पीड़ा का सामना करते हुए उपर्युक्त प्रश्नों का हल ढूंढनिकाला। उन्होंने कहा कि जब तक वर्ण नहीं टूटता तब तक वर्ग नहीं बदलेगा और बिना वर्ग तोड़े समता आयेगी नहीं, समता लाने के लिए वर्ग और वर्ण दोनों ही तोड़ना पड़ेगा, क्योंकि समता के बिना प्रजातंत्र चल ही नहीं सकता है। यदि प्रजातंत्र को बचाना है तो वर्ण और वर्ग दोनों को ही तोड़ना पड़ेगा।

बाबा साहेब ने सर्वप्रथम 2 जनवरी, 1920 को ‘मुकनायक’ पत्रिका निकाली तथा उसमें समाज के समस्त वर्गों को समझाने की कोशिश की कि सभी इंसान बराबर है और एक इंसान यदि दूसरे इंसान से घृणा करता है, छूत मानता है तो यह सबसे बड़ा अधर्म है तथा वैसे लोग अपराधी माने जायेंगे। उन्होंने राष्ट्र के समक्ष ऐसा सार रखा जो बुध्द की प्रज्ञा, मोहम्मद साहेब की सचेत समता और ईशा मसीह की मैत्री को बराबर का दर्जा दिया। पुनः वे सन् 1924 के 20 जुलाई के दिन ‘बहिष्कृत हितकरणी’ की सभी में अपना आन्दोलन शुरू किया तथा 2 मार्च, 1929 को नासिक में स्थित कालाराम मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलाकर यह साबित कर दिया कि दलितों में भी भगवान के प्रति आस्था है, तो किसी की भी आस्था को तोड़ना नहीं चाहिए।
कबीर पंथी परिवार

बाबा साहेब का पूरा परिवार कबीरपंथी था इस कारण से उन्हें भक्ति भावना प्रदान हुआ। मान्यवर  ज्योतिबा फूले ने ब्राह्मणवाद से विरोध करने का सहयोग दिया और महामानव तथागत बुध्द के आदर्शों ने उन्हें मानसिक और दार्शनिक पीपासा बुझाने वाला अमृत प्रदान किया।
उन्होंने महसूस किया कि बाबा जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे तब तक अधिकारों के प्रति संगठित नहीं हो सकते और संगठित हुए बिना वे अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अतः उन्होंने समस्त दलितों को शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो का संदेश देकर समाज को जगाने के लिए खड़े हो गये, क्योंकि वे जानते थे कि दलितों के जीवन के चारों क्षेत्रों यानी सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में जब तक इनकी स्थिति मजबूत नहीं होगी तब तक दलितों का उत्थान संभव नहीं है। इसे मजबूत करने के लिए हिन्दुस्तान में एक आन्दोलन छेड़ दिया।
पेट में भूख ऐसी आग है कि जब तक पेट में जलती है, तब तक तो अन्न से शमन हो सकती है, लेकिन जब इसकी लपटें दिमाग तक पहुंचती हैं तो फिर भूख अन्न से नहीं बुझती वह आग तो क्रांति से ही बुझती है।

‘हद से बढ़ जाती है जब आमदी की मजबूरी
अमन पसन्द बगावत की बात करते हैं
अगर अब चुप रहे तो वक्तें मुश्किल कौन बोलेगा
तुम्हारे सिर चलेगी, तेगे कातिल कौन बोलेगा।’

डा. भीमराव अम्बेडकर सिर्फ समाज सुधारक ही नहीं, सिर्फ देशभक्त ही नहीं, बल्कि दुनिया ने विद्वान के रूप में भी जाना। सर्वप्रथम कोलम्बिया विश्वविद्यालय, अमेरिका ने 5 जून, 1 952 को विधान विशेषज्ञ डा. अम्बेडकर को एल.एल.बी. डिग्री से विभूषित किया तथा अनेकों डिग्रियां अम्बेडकर ने विदेशों में प्राप्त कीं तथा दुनिया के छठे विद्वान के रूप में वे जाने गये जो भारत के लिए गौरव की बात था।

बाबा साहेब की योग्यता से ब्रिटिश सरकार भी अवगत हो चुकी थी तथा भारत के वाइसराय ने 2 जुलाई, 1942 को उन्हें अपनी कार्यकारिणी समिति का सदस्य नियुक्त किया और उनकी योग्यता और कर्मठता को देखकर उहें श्रम मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया। सन् 1946 ई. में वे संविधान सभा के सदस्य चुने गये। 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा में संविधान प्रारूप समिति की नियुक्ति की गयी।

14 नवम्बर, 1948 को संविधान सभा के संविधान में संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि ‘तमाम भारतीयों से मेरी अपील है कि जिस जात-पात से सामाजिक जीवन में अलगाव आया है,र् ईष्या, द्वेष तथा घृणा का जन्म हुआ है, उसे त्याग कर एक आदर्श राष्ट्र बने। यदि इस संविधान से आम लोगों की भलाई और प्रगति नहीं हुई तो दोष संविधान का नहीं होगा, बल्कि यह कहा जायेगा कि संविधान को चलाने वाले लोग ही गलत हैं।’
सत्ता में गरीबों का हिस्सा

डा. अम्बेडकर ने सिर्फ दलितों के उत्थान के लिए ही काम नहीं किया बल्कि देश के नारी & OBC उत्थान में भी सहयोग दिया। बालश्रम पर रोक लगायी तथा हिन्दू, मुस्लिम, सीख और ईसाई को समान रूप दिया। वे एक सच्चे देशभक्त थे तथा राष्ट्र में लोकतंत्र का स्थापना चाहते थे, इस बात का सबूत देखने को मिल जब अंग्रेज सरकार ने अपनी सत्ता सिमटती देख 1930 में गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया। डा. अम्बेडकर भी पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में शामिल होकर उन्होंने अंग्रेजी सरकार के विरुध्द आवाज उठाते हुए कहा कि ‘भारत की सभी पिछड़ी जातियों की मांग है कि ब्रिटिश सरकार की जगह द्वारा चुना हुई जनता की सरकार बने। हमने इतने जुल्म और अत्याचार सहे हैं कि हमारे जख्म अभी हरे हैं। अंग्रेज सरकार ते 150 वर्षों के शानकाल में देश का कल्याण नहीं हुआ तो ऐसी सरकार की भारत में कोई आवश्यकता नहीं है। इस बात को सुनकर गांधी ने भी गर्व महसूस करते हुए प्रसन्नता व्यक्त किया था। डा. अम्बेडकर का मानना था कि भारतवर्ष में 85 प्रतिशत गुलाम नागरिकों की दो ही प्रमुख समस्याएं हैं, निरादर और दरिद्रता। सही पहचान थी बाबा साहेब में कि जब तक सत्ता के अन्दर गरीबों का साझेदारी नहीं होगी तब तक उनकी तकदीर में बदलाव नहीं आयेगा। इसलिए उन्होंने संविधान में इस बात का प्रावधान किया कि सत्ता की साझेदारी में गरीबों का हिस्सा होना चाहिए।
राष्ट्र में लोकतंत्र की स्थापना हुई तथा संविधान के अनुसार देश को चलाने का संकल्प लिया गया, लेकिन आजादी के 65 वर्ष बीतने चले और नियोजित विकास कार्यक्रम शुरू हुए 61 वर्ष हो गये, अर्थव्यवस्था समतावादी उद्देश्यों को प्राप्त करने में सभी सरकारें असफल रही हैं और आज भी दलितों, आदिवासियों तथा अन्य पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यक वर्ग के मजदूरों का सामाजिक उत्पीड़न और निरन्तर आर्थिक शोषण होता रहा है। यह विश्वास किया जाता है कि पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत अपनाये गये भूमि सुधार और आर्थिक विकास के तरीके से रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी होगी जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के उन गरीब लोगों, जिनकी कठिनाइयां शिक्षित नहीं होने के कारण बढ़ी है, उनको लाभ होगा और उन्हें कठिनाइयों से राहत मिलेगी। उनके मध्य और शेष आबादी के मध्य असमानता पैदा हुई है, वह घटी नहीं है बल्कि उसे और बढ़ावा दिया गया।
नयी आर्थिक नीति दबे, पिछड़े और दलित वर्गों के लिए संकट में डालने वाली साबित हुई। जिन पेशों से मजदूरों को प्रोत्साहन मिलता था उन पेशों में बुनाई, जूता बनाना, तेल निकालना, दूध की डेयरी, मछली पालन, ताड़ी निकालना आदि आते हैं, उनको निगमित क्षेत्रों द्वारा समाप्त कर दिये गये हैं जिससे ग्रामीण दस्तकार बेरोजगार हो गये हैं। किसानों को दी जा रही आर्थिक सहायता में भारी कमी की जा रही है, जिससे छोटे और सीमान्त किसानों को खेती करने के बहुत कम लाभ हो रहा है। ग्रामीण जनता गरीब होने में दलित और पिछड़े वर्गों के लोग इससे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
डा. अम्बेडकर की अध्यक्षता में तैयार किया गया भारतीय संविधान का प्रारूप तथा संसद के प्रथम सत्र में सफलतापूर्वक पारित कराया गया। वर्तमान भारतीय संविधान देश के नागिरकों के लिए एक प्रकार से मनोवांछित विकास के अधिकारों को पथप्रसस्त करने वाला मैगना कार्य बनकर सामने आया किन्तु राज्य की नीति निर्धारण हेतु निदेशक सिध्दांतों वाला अध्याय देश के अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए एक विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि कोई भी सरकार आये या जाये उनको ये सिध्दांत, इन सिध्दांतों को ध्यान में रखकर नीति निर्धारण के लिए बाध्य करते हैं। जैसा कि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य है उससे तो यही पता चलता है कि किसी भी सरकार द्वारा इन सिध्दांतों को निष्ठापूर्वक ध्यान में नहीं रखा जाता है। राजनीतिक इच्छा की कमी है। जब तक राजनीतिक वर्ग थोड़ी सी कटिबध्दता का प्रदर्शन करता है तब तक स्वच्छ और सख्त कानून शासक वर्ग का समर्थन नहीं कर पाता और शराबे करके लोगों को गुमराह करने का भ्रम फैलाते हैं, अफवाह फैलाते हैं, ताकि संविधान के अनुच्छेद 335 के प्रावधानों के अनुसार सरकारी कामकाज सामान्य जनता के हित को अंजाम ना दिये जा सके और अनुच्छेद 15 (4) एवं 16 (4) के अनुसार हमारे अधिकारों के प्रावधान कागजी शेर बनकर रह जाते हैं।
इस मुद्दे पर सभी दलित वर्ग के लोगों को अपने बीच के मतभेद भुलाकर एकजुट होकर पुनः खड़े होने की आवश्यकता है, ताकि अपनी चेतना एवं स्वाभिमान को उपलब्ध कर सकें।
राज बदला, मिजाज नहीं
आजादी के 65 वर्ष बाद भी देश की स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं आया। राज बदला, लेकिन मिजाज नहीं बदला, शासन बदला, लेकिन प्रशासन वही रहा। आंकडें के अनुसार बिना भोजन के स्कूल जाने वालों की संख्या 24 प्रतिशत है, जबकि यह प्रतिशत पाकिस्तान में 12, बांग्लादेश में 11 और पेरू में 14 है, एक मात्र नाइजीरिया ही ऐसा देश है, जहां इसका प्रतिशत 24 है। पांच में एक परिवार (17 प्रतिशत) का कहना है कि खाने के लिए धन जुटाने के उद्देश्य में उनके बच्चे स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर हैं। भारत के 24 प्रतिशत परिवारों का कहना है कि उनके बच्चे सारे दिन बिना खाए रहते हैं। लगभग 66 प्रतिशत परिवार हैं जिनका कहना है कि आकाश छूती महंगाई उनकी भुखमरी का कारण है। वर्तमान भारत में 10 करोड़ से भी अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
आज देश भ्रष्टाचार, असंतोष, पदलिप्सा, महंगाई, असंगठन जैसी बुराइयों से कराह रहा है। वरिष्ठता दिखाने के लिये निर्दोषों की हत्यायें हो रही हैं। निर्दोष लोग के ऊपर जुल्म ढाये जा रहे हैं तथा मानवाधिकार का खुलमखुला उल्लंघन हो रहा है। एक पक्ष हत्या का विरोध कर रहा है तो दूसरा पक्ष समर्थन कर समाज में अशांति फैला रहा है। अमीर अमीर बनते जा रहा है और गरीबों की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है।
हालांकि 65 वर्षों में संविधान के अनुसार सभी वर्गों की सत्ता में साझेदारी हुई है और यह अभिलाषा और आकांक्षा कुछ चन्द लोगों की नहीं, कोई सरकार की नहीं, बल्कि जो मेहनत और उत्पीड़न के अन्दर बंधे हुए हैं, उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति हुई है। सरकार के सीमाओं के बाहर जो समाज की व्यवस्था है और उस व्यवस्था की जो चुनौकियां थी, उनको डा. भीमराव अम्बेडकर ने स्वीकारा और संजोया भी। यदि सचमुच देश एवं राज्य के शासकगण संविधान की मूल भावनाओं को सही-सही समझें और अपनायें तो इस देश की यह दुर्दशा नहीं होती जो आज दिखाई देती है।
अगर वास्तव में हम बाबा साहेब आदर्शों को मानने के लिए वचनबध्द हैं, तो दिल और दिमाग से वर्ण और वर्गवाद के फासले को खत्म करना होगा। यही वह रहा है जो देश को संस्कार देगा, अंगुलियां जुटकर मुट्ठी बन जायेंगी, हम एक हो जायेंगे और हमारी एक ही कोशिश होगी एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण में अपने आप को समर्पित होना।

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