बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर जयंती 14 अप्रैल व् पूर्णिमा धम्म संघायन (15-April-2014 ) पर विशेष धम्म देशना: – आम्बेडिकर दर्शन व मिशन और भारत के बहुजन…समयबुद्धा


“हमारे लोग  हजारों साल तक मंदिर प्रवेश की सख्त मनाही के बावजूद पिट पिट कर बेइज़ज़त हो होकर , मर मर कर और अत्याचार सहकर भी  तेतीस करोड़ देवी देवताओं की  पूजा करते रहे पर कोई उद्धार न हो सका|जो काम तेतीस करोड़ देवी देवता मिल कर भी हजारों सालों में नहीं कर सके वो काम बोधिसत्व डॉ भीम राव अम्बेडकर ने कुछ ही सालों में कर दिखाया|हे बहुजनों क्या अब भी तुम अपने मसीहा को देखने सुनने समझने को अपने कान आँखें नहीं खोलोगे,क्या अब भी संगर्ष नहीं करोगे,क्या अब भी तुम मन्दिरबाजी में ही लगे रहोगे, अगर हाँ तो फिर से पिटने और बेइज्जत मौत मरने को तैयार रहो, तुम नहीं तो तुम्हारे आने वाली पीढ़ियां..”… समयबुद्धा

shik sang200px-Dr_Bhimrao-Ambedkarआम्बेडिकर दर्शन  व मिशन और भारत के बहुजन

आम्बेडिकर मिशन बहुत ही व्यापक मिशन है, इस मिशन का जो अर्थ मैं समझा हूँ वो है:- ” भारत के बहुजनों का सम्पूर्ण और चौमुखी विकास का लक्ष्य ” , बाबा साहेब के इस चौमुखी विकास के मिशन कुछ इस प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है:

-शरीक व मानसिक उन्नति
-शैक्षणिक उन्नति
-राजनीतिक उन्नति
-सामाजिक उन्नति
-आत्मस्वाभिमान की जिन्दगी
-आत्मनिर्भरता
-अपना धर्म एव धार्मिक उन्नति
-आर्थिक समृधि
-बहुजन संगठन बल
-व्यक्तिगत,सामाजिक एव नेतिक उन्नति

ऐसे ही अनेकों मिशन हैं जिसपर हमारे लोग अपने अपने स्थर पर जो हो सकता है कर रहे हैं| इन्ही जैसा एक मिशन है  “व्यक्तिगत विवेक क्षमता वृद्धि” जिसपर जो इस पुस्तक का लक्ष्य है, क्योंकि मैंने ये महसूस किया है की जन साधारण में विवेक एव क्षमता की कमी होने के कारन जितने भी उन्नति के प्रयास किया जाते हैं वे उतने कामयाब नहीं हो पाते  जितनी उनसे उपेक्षा होती है|इस मिशन के तहत मैंने इस पुस्तक की रचना की है और इस पुस्तक के सन्देश को जन जन तक पहुचने में आपसे सहयोग  की उपेक्षा रखता हूँ |

आम्बेडिकर दर्शन  एक संपूर्ण विषय है ,उनकी सोच इतनी ज्यादा  उन्नत  थी की उनके विचार उनका साहित्य अपने आप बहुत विस्तृत और ठोस है ,उनकी एक एक सोच पी एच डी का विषय है |यदि आप जानकारी चाहते हैं तो बाबा साहेब द्वारा लिखित पुस्तकें पड़ें हर मिशन पर बहुत सा साहित्य उपलध हैं | मुझे लगता है की कम शब्दों में  बाबा साहेब महान के मिशन बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखने जैसा ही है| हर मिशन पर ज्यादा चर्चा से हम इस पुस्तक की विषयवस्तु से  थोडा भटक जायेंगे, फिर भी थोड़ी चर्चा जरूरी है|

ये जिन्दगी का नियम है की जो जीतता है वही कानून बनता है और वही इतिहास लिखता है, और कोई भी इतिहास में खुद को गलत कैसे लिखायेगा,हारने वाला चाहे कितना ही सही क्यों न हो उसी को गलत लिखाया जाता है , इसी हार के परिणाम स्वरुप बहुजनों से सब कुछ छीन लिया यहाँ तक की विद्या और अध्यन का अधिकार भी

“विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना धन गया 
धन बिना शूद्र पीढ़ियों तक गुलाम हुए… इतना घोर अनर्थ मात्र अविद्या के कारण ही हुआ “….

साथियों आज जब विद्या और ज्ञान के दरवाजे खुले हुए हैं तो क्यों नहीं ज्ञान ले लेते?क्या सत्ता परिवर्तन का इंतज़ार है जब संविधान बदल दिया जायेगा और फिर दमन निति चालू हो जाएगी |

मैंने सन 2000 में रिलीज जब्बर पटेल की फिल्म डॉ बाबासाहेब  आंबेडकर देखि जो सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार व महारास्ट्र सरकार की लागत और मार्गदर्शन में बाबा साहेब  के जीवन संगर्ष पर बनी है| इस फिल्म का प्रबंधन नेशनल  फिल्म  डेवेलोपमेंट  कॉर्पोरेसन ऑफ़ इंडिया (NFDC) ने किया है, इसे जरूर देखें |इसी फिल्म की शुरुआत में एक भूमिका डाएलोग  है जिसे हम कह सकते हैं की स्वव भारत सरकार  कह रही है|  जिसका तात्पर्य ये है की इन भारतवासियों  को  समाज से काट कर रखा गया उन्हें तरक्की करने के सभी मौके छीन लिए गए| उन्हें न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से गुलाम बना दिया गया| ये गुलामी दुनिया भर के इतिहास की गुलामी से भी बत्तर थी क्योंकि इसमें हारे हुए इन भारतवासियों  के विचारों को गुलाम बना दिया था| ये रोमन साम्राज्य की गुलामी से बत्तर थी जो अमेरिकी नीग्रो और जर्मन यहूदियों के साथ किया गया ये उससे कहीं ज्यादा बत्तर था|

आखिर ये कब तक चलता रहता, बाबा साहेब आंबेडकर ने  समाज सुधारकों और धर्म गुरुओं की तरह केवल बातें बनाने तक ही सीमित नहीं रहे उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता को कानून का रूप दिया| अब कोई चाहे या न चाहे उसे समानता का बर्ताव करना ही पड़ेगा| इस बाबा साहेब के युग में कोई जन्म से नहीं अपनी क्षमता के हिसाब से जीवन यापन करता है| ये कानून कुछ महास्वार्थी देशद्रोही  मनुवादियों को छोड़कर सभी सम्प्रदायों के लिए अच्छा है |आज जैसी खुशहाली इस देश में कभी नहीं रही थी, केवल सम्राट अशोक के राज्ये में कुछ हद तक समानता थी| उस सुशाशन की याद और आदर्श में आज भी  देश में अशोक चक्र और अशोक स्तम्भ को भारत सरकार अपने  शाशन का प्रतीक मानती  हैं |

डॉ आंबेडकर और उनके विचारों को केवल दलितों तक सीमित रखना एक साजिश है, वे समस्त भारत के नेता हैं विशेष कर 80% भारतवासी जनसँख्या जिन्हें आज हम एस०सी०, एस०टी०, ओ०बी०सी० और कनवरटेड  माईनोरिटी के नाम से जानते हैं|डॉ आंबेडकर द्वारा चयनित बौद्ध सिद्धांत  “कानून की नज़र में सब सामान हैं और कानून धर्म से ऊपर है” पर आधारित संविधान का लाभ आज सभी उठा रहे हैं|आज जिसकी जो जाती है उसको उस पेशे में बाध्य नहीं किया जा रहा बल्कि जिसकी जितनी क्षमता उसको उतना मिल रहा है|जरा सोच कर देखिये की अगर किसी कट्टरपंथी मनुवादी ने संविधान बनाया होता तो क्या हाल होता|ये बड़ा भ्रम ओबीसी समुदाय के बुद्धिजिवियो और पढ़े-लिखे शिक्षितों में फैला हुआ  है कि बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर महार जाती में जन्मे थे इसलिये उन्होंने केवल दलित/एससी समुदाय के उत्थान लिए ही कार्य किया किया है| इस भ्रम फेलने के पीछे मनुवादी मिडिया का बड़ा रोल है सच्चाई और अम्बेदिकरवादी विचारधारा अगर जनसाधारण तक पहुच गई तो क्या परनाम होगा वे जानते हैं|

वास्तव मे  बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर आधुनिक भारत के शिल्पकारों में मेहनत और क़ुरबानी में सबसे आगे थे| भारत जैसे देश जो हजारों जातिया,समुदाय,भाषा, मान्यता,धर्म,समाज, भौगोलिक विषमता आदि से भरा हुआ है उसको पिछले 65 सालों से अगर तिरंगे के नीचे इकठ्ठा कर के कोई रख पाया है तो इन सभी समस्याओं का समाधान जो कि बाबा साहेब ने भारतीय संविधान में सुझा गए| सभी वर्ग अगर अपनी अपनी मान्यताओं के हिसाब से संविधान बना लेते तो  आज भारत का क्या हाल होता  ये आप समझ सकते हैं |

जिसके हाथ में सार्वजनिक पुस्तकालय को सँभालने और देश के स्कूलों कालेजों का पठयेक्रम को तय करने  का कारोबार रहा है,  ऐसे उच्च वर्ण जातियों के संचालको का भी बड़ा रोल है, क्योकि यही से  बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के जीवनचरित्र, उनके विचारों और मेहनत को जग  जाहिर नहीं होने दिया जाता, पर धीरे धीरे ही सही सच एक दिन फ़ैल ही जायेगा |इसीलिए बाबा साहेब  डॉ. आम्बेडकर द्वारा किये गए संगर्ष का जो लोग लाभ उठा रहे हैं वे अपने मसीहा को दलित के रूप में देखने और नकारने  को मजबूर हैं| आज भी ओबीसी के बुद्धिजिवियो और शिक्षितों को ये पता नहीं है कि बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय के लिए क्या किया है ? बात चली है तो थोडा सा तो लिखना पड़ेगा ,बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय, जो देश में 52% से भी अधिक है उसके उत्थान के लिए:

(१) १९२८ में बोम्बे सरकार ने स्टार्ट कमिटी नियुक्त कि थी जिसमे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर ने Other backward caste यानि कि OBC शब्द का उपयोग किया था.स्टार्ट कमिटी में बाबा साहेब ने कहा था कि, जो जातिया अपर कास्ट और बेकवर्ड के बिच में आती है ऐसी जातियां अन्य पिछड़ी जाति यानी कि ओबीसी है|

(२) देश की संविधान सभा में सिर्फ ६ ही ओबीसी सदस्य थे. जिसकी आवाज दबा कर रख दी थी लेकिन डॉ. बाबा साहेब के कारण ही कलम ३४० का प्रावधान करना पडा और जिनके फलस्वरूप “काका कालेलकर आयोग” (१९५३-५५) तथा “मंडल आयोग” (१९७८-८०) की रचना केन्द्र सरकार को करनी पड़ी थी. दोनों आयोग ओबीसी के लिए थे लेकिन अफसोसजनक है की ओबीसी समुदाय के 99% शिक्षितों को इसके बारे में पता नहीं है|

(३) १९५१ में अपने कानून मंत्री पद से इस्तीफा देते हुवे पत्र में बाबा साहेब ने इस्तीफा का दूसरा कारण ओबीसी जातियों के लिए आयोग की नियुक्ति नहीं करना और ओबीसी की उपेक्षा करना बताया था. क्या ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों को लागु करने के लिए १९४७ से २०११ तक राज्य या केन्द्र सरकार के कोई मंत्री ने इस्तीफा दिया है ?
डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर के इस्तीफा के कारण ही दबाव में आकर सरकार को ओबीसी के लिए “काका कालेलकर आयोग” की रचना करनी पड़ी थी. १९५२ की लोकसभा में ५२% से ज्यादा ओबीसी-समुदाय के सांसदों सिर्फ ४.३९% ही थे. बाबासाहेब ही थे जिन्होंने ओबीसी, एससी-एसटी(अति शुद्र) और महिलाओं के उत्थान के किया आजीवन संघर्ष किया था,

sc st obc rolling on brahmin jootan

उनको दलितो के उद्धारक के रूप में सिमित कर देना क्या एक षड्यंत्र नहीं है ?

“गैर अम्बेडकरवादी बहुजन जातियां विशेषकर ओबीसी के दिमाग में ब्राह्मणों ने इतना ब्राह्मणवाद भर डाला है की ,ओबीसी अपने साथी SC ST के साथ बैठकर खाना खाने को भी पसंद नहीं करता ,जबकि ब्राह्मणों की जूठी पत्तल पर इस तरह लेटने  में भी उसे गर्व महसूस होता है| यही है मानसिक गुलामी और इसका सीधा कारन है कीइन अनपढ़ों की  मानसिक गुलामी जीमने इनको लगता है की  ब्राह्मणवाद या मन्दिरबाजी इनको फायदा पहुचता है और आंबेडकरवाद उनको दलितों के साथ खड़ा कर देगा  जिससे इनका कोई फायदा नहीं होगा|

Picture on RIGHT>>>>>>Karnataka Rajya Hindulida Vargagala Jagrutha Vedike president K.S. Shivaramu has sought an end to made snana (rolling on the plantain leaves on which Brahmins have partaken meal) or its modified form of ede snana (rolling on plantain leaves on which food offered to deity is kept) at Kukke Subramanya Temple.

हमारे समाज को कोई भी क्रांति उठती तो जोश से है पर धन न होने के कारन चल नहीं पाती|जब बुद्ध आंबेडकर विचारधारा जनता को धन कम कर नहीं दे सकती तो जनता भी अपना धन इसे नहीं दे सकती ये एक कड़वी सच्चाई है| जब तक धन कमाने के रास्ते बुद्धवाद या अम्बेडकरवाद में नहीं अपना लिए जाते इसकी पूछ नहीं होगी| ये विचारधारा केवल कुछ गिने चुने लोग के बीच की चर्चा का विषय बनकर रह जायेगा| ये जनता है इसे फायदा चाहिए हमारी विचारधारा नहीं देगी तो जनता वहां चली जाएगी जहाँ से फायदा मिलेगा| हमारे समाज में अगर कोई आंबेडकर या बुद्धा के नाम पर धन कमाने लगे तो लोग उसकी इस कदर खिलाफत करते हैं की बस वो व्यक्ति इस विचारधारा का कट्टर दुश्मन हो जाता है| मैं मानता हूँ अपवाद हर जगह हो सकते हैं कुछ लोग गलत फायदा उठा सकते हैं पर क्या इस बात के लिए हमारी विचारधारा को धन विहीन नीरस ज्ञान बना कर छोड़ दें|उदहारण के लिए मुझे एक बात बताओ की एक दलित अगर किसी हिन्दू देवी का जागरण में गण बजाना कर के अपने परवार का पेट पाल रहा है और वो हमारी बात समाज जाये की बुद्धवाद और आंबेडकरवाद  सही है पर तब उसका सवाल होगा की अपनी रोजी रोटी के लिए वो क्या करे? क्या हमारी विचारधारा में धाम कमाने का कोई जरिया है| ऐसे में कुछ साथी जोश में आकर कह सकते हैं की हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं , तो ठीक हैं पर ऐसे लोगों की संख्या नब्बे प्रतिशत है| इनको छोड़ दो तो बचते हैं वही सेल्फ मोटिवटेड दस प्रतिशत से भी काम लोग जो सिर्फ मुह बजने या कलम जिसने तक ही सीमित हों| साथियों ध्यान रहे यही है इस देश में बौद्ध विचारधारा के पतन का मुखुए कारन, बौद्ध विचारधारा का डिजाइन में “अहिंसा,सत्य और कायदा” प्रमुख है जबकि ब्राह्मणवाद के डिजाइन में “विजय,अवसरवाद और फायदा”प्रमुख हैं| ये दुनिया है आप इसे फायदा नहीं डोज तो ये वहीँ चली जाएगी जहाँ इसे फायदा होगा| अब फैसला आपके हाथ में हैं की आप इस विचारधारा को फायदेमंद बनाने में लगते हो या  इसे केवल किताबी बाते बनाकर एक कोने में पड़ा रहने देते हो|.

 

बाबा साहेब का निम्न कथन उनका हमारे लिए अंतिम था:

‘‘मेरे लोगों से कह देना, नानक चन्द! मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेषकर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धेखा दे दिया। मैं बड़ी कठिनाइयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है। कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हे इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा। जाओ जाकर उनसे कह दो जाओ जाकर उनसे कह दो.. जाओ जाकर उनसे कह दो,’’

उन्होंने तीन बार कहा। यह कह कर वह सिसकने लगे, देखते ही देखते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

ambedkar sandesh

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