‘ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’ नीत्शे का कहा जैसे ही कुत्ते ने सुना, उसके कान खड़े हो गए…ओमप्रकाश कश्यप

god‘ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’ नीत्शे का कहा जैसे ही कुत्ते ने सुना, उसके कान खड़े हो गए.
वह घबरा गया.जो ईश्वर बिना हथियार कहीं आता-जाता नहीं, भूत, भविष्य,
वर्तमान की खबर रखता है, उसकी हत्या भला कौन कर सकता है. और अगर हत्या हुई है तो ईश्वर के भरोसेमंद आदमी ने ही
की होगी. हो सकता है, पुजारी को कुछ मालूम हो. वह दौड़कर मंदिर पहुंचा. भक्तगण घर जा चुके थे. पुजारी दिन-भर का चढ़ावा
समेटकर घर जाने की तैयारी में था. कुत्ते ने नीत्शे का लिखा उसको दिखाया और पूछा—
‘सुना तुमने, ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’
यह सुनते ही पुजारी के चेहरे का रंग उतर गया—‘मुझे नहीं मालूम, मैंने कुछ नहीं किया…’
‘कैसे नहीं मालूम, मंदिर में तुम्हीं तो रहते हो.’
‘मुझे सचमुच कुछ नहीं पता.’ पुजारी गिड़गिड़ाया.
‘फिर वही बात, रोज ईश्वर को भोग लगाते हो, उसे आरती सुनाते हो, सुबह-शाम दावा करते हो कि ईश्वर मंदिर में पधार चुका
है…सच-सच बताओ, तुमने ईश्वर को आखिरी बार इस मंदिर में कब देखा था?’
‘सच कहूं…मेरा ईश्वर तो इस मूर्ति से आगे कभी बढ़ा ही नहीं. इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता.’ पुजारी रोने लगा. अंतत:
कुत्ता उसे छोड़कर आगे बढ़ने को हुआ तो पुजारी ने पीछे से टोका—
‘सुनो, ईश्वर मर चुका है, यह बात किसी को बताना मत. लोगों का भरम जितने दिन बना रहे, उतना ही अच्छा. अब इस उम्र में
मैं कोई दूसरा काम भी तो नहीं सीख सकता. और हां, तुम्हारे हिस्से का चढ़ावा मैं तुम्हें सुबह-शाम सौंपता रहूंगा.’ कुत्ता पुजारी
की बात अनसुनी कर आगे बढ़ गया. वहां से वह एक चौपाल पर पहुंचा, जहां कीर्तन हो रहा था. गांव के बड़े-बड़े लोग वहां मौजूद
थे. उनके पास पहुंचकर वह बोला— ‘नीत्शे का कहना है कि ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की
है?’ ‘वही नीत्शे जो सुकरात को जोकर बताता है?’
‘हां वही…!’
‘वह तो दार्शनिक है, भला झूठ क्यों बोलेगा…हमें यह कीर्तन रुकवा देना चाहिए, क्यों सरपंच जी?’ एक पढ़े-लिखे आदमी ने कहा.
‘हां, सबको एक न एक दिन मरना तो है ही…’ बराबर में बैठा एक वुजुर्ग बोला. इसपर सरपंच भड़क उठा—‘चुप रहो,’ मगर
अगले ही पल उसके क्रोध पर पानी पड़ गया. फिर बराबर में बैठे अपने चेले चपाटों को समझाते हुए कहने लगा—
‘देखो, ईश्वर मरा है या जिंदा, इससे मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं तो इतना जानता हूं कि अगले महीने चुनाव हैं. इतने
सारे वोटरों को जोड़े रखने के लिए ही मैंने यह कीर्तन रखा है. मैं इसको अचानक नहीं रुकवा सकता.’
‘पर क्या यह उचित होगा?’

‘कैसे उचित नहीं होगा…ईश्वर को देखा किसने है! समझ लो, जब वह जीवित था, हमारे लिए तब भी एक लाश ही था…’ सरपंच ने
निस्पृह भाव से कहा और कीर्तन की धुन पर गर्दन हिलाने लगा. ‘एक लाश की पूजा…ऊंह!’ कुत्ता के मुंह से अनायास निकला.
अगले ही पल उसने टांग उठाई, हल्का हुआ और आगे बढ़ गया.

http://opkaashyap.wordpress.com/2009/06/18/%E0%A4%88%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

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महामानव गौतम बुद्ध द्वारा बताये गए चार आये सत्य….उदित भार्गव

2भगवन बुद्ध ने संसार को जीवन के चार आर्य सत्य दिए हैं। भगवान् की यह देशना सर्वकालिक है। वे ढाई हजार वर्ष पूर हुए पर उनके बताये हुए मार्ग उस समय भी सटीक थे, आज भी हैं और जब तक मनुष्य है तब तक रहेंगे। उन्होंने मनुष्य के स्वभाव और चेतना की बात की है- श्रद्धा पर नहीं पर विज्ञान पर आधारित कर। उन्होंने एक जीवन विज्ञान दिया, दर्शन शास्त्र की बात ही नहीं की मात्र रोग व मोचिकित्सा की बात की है। किसी और पर आश्रित होने को नहीं कहा परन्तु स्वयं के जागरण व होश को महत्व दिया। इशारे दिए और मार्ग स्वयं ढूँढने को कहा। उनका सारा जोर इस बात पर था की मनुष्य की पीड़ा कैसे दूर हो, उसमें कैसे रूपांतर आए और वह स्वयं ही आनंद रूपी स्वभाव की पहचान कर सके।

 

इसके लिए भगवान् बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की घोषणा की-

  1. दुःख है, मनुष्य दुखी है।
  2. मनुष्य के दुःख का, उसके दुखी होने का कारण है क्योंकि दुःख अकारण तो होता नहीं।
  3. दुःख का निरोध है दुःख के कारणों को हटाया जा सकता है। दुःख के मिटाने के साधन है, वे ही आनन्द को पाने के साधन है।
  4. दुःख निरोध की अवस्था है। एक ऐसी दशा है जब दुःख नहीं रह जाता, दुःख से मुक्त होने की पूरी संभावना है।

 

जीवन में दुःख है

भगवान् बुद्ध ने कहा जीवन में दुःख है, जीवन ही दुःख है इसलिए कि मनुष्य दुःख में पडा है और उसे दुःख दिखाई नहीं देता। बुद्ध कहते हैं, जन्म दुःख है, जवानी दुःख है, मित्रता दुःख है, प्रेम दुःख है, रोग दुःख है, सम्बन्ध दुःख है। असफलता तो दुःख है ही सफलता भी दुःख है। लगता है की बुद्ध महादुखवादी है। यों भी तो कहा जा सकता था कि जीवन आनन्द है, आनन्द के उपाय हैं, आनन्द पाया जा सकता है, आनन्द की एक दशा है। यह पूर्णता की स्थिति है, यह दुःख निरोध की स्थिति है। तो प्रश्न उठता है कि बुद्ध ने नकारात्मक पहलू क्यों चुना? कारण साफ़ है। दुःख तो सबने जाना है, आनंद किसने जाना है। जिससे साक्षात्कार ही नहीं हुआ, जिसको जानते ही नहीं, कोई परिचय नहीं उससे बात आरम्भ करें तो समझ में कैसे आए, आरम्भ तो अनुभव पर आधार बनाकर किया जा सकता है। जीवन दुःख है, यह तो जीवन का तथ्य है, इससे कौन इनकार करेगा। दुःख से हर कोई मुक्त होना चाहता है। बुद्ध जीवन की निंदा नहीं कर रहे हैं वे तो इतना ही कह रहे हैं कि जो जीवन का ढंग है, वह दुःख है। जीवन में लोग दुःख रोग से ग्रस्त हैं। वे रोग से परिचय करा रहे हैं फिर वे रोग के कारण समझाते हैं, रोग से छुटकारे के लिए औषधियां बताते हैं और रोग से मुक्त हुए लोगों की दशा से परिचित कराते हैं। वे यह सब करूणा के कारण कह रहे हैं कि जीवन दुखों का घर बना है । वे तो जीवन का यथार्थ बता रहे हैं ताकि वह चुभने लगे, फिर उसे दूर करने का उपाय करें जिससे महासुख मिले, आनन्द की प्राप्ति हो।

 

दुःख का कारण है

भगवान् बुद्ध आनन्द की बात नहीं करते। वे तो कहते हैं की दुःख पैदा करने के आयोजन छोड़ दो, आनन्द तो अपने आप हो जाएगा क्योंकि आनन्द तो मनुष्य का स्वभाव ही है। आनद तो है ही, उसे पाना थोड़े ही है। दुःख न रहे तो आनन्द तो स्वतः ही हो जाएगा। व्यक्ति सोचता है कि जब आनन्द मौजूद ही है तो उसे पाने की ही कोशिश करें। परन्तु आनन्द मिलता नहीं दुःख को मिटाए बिना। आनन्द की खोज में वह दुःख को भूल जाता है। दुःख के रास्ते पर चलता है और आनन्द की कामना करने लगता है। बीमारी के कारण बने रहें तो स्वास्थ्य की कामना का कोई परिणाम नहीं होता। अतः बुद्ध कहते हैं कि स्वास्थ्य पाना है तो बीमारियों के कारण ढूंढों और उन्हें हटाओ तभी स्वास्थ्य घटेगा। बुद्ध की देशना में सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने कोई सीधे कारण नहीं बताये, इशारे किये और महत्वपूर्ण बात कही- ‘अप्प दीपोभाव’ अपने दीये स्वयं बनो। उन्होंने कहा- आकाशे च पदं नत्थि, समणों नत्थि बाहरे- आकाश में पथ नहीं होता और जो बाहर की तरफ दौड़ता है वह ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकता। इसीलिये तो बुद्ध के मार्ग में ध्यान पर सबसे अधिक जोर है, होश पर सबसे अधिक जोर है। ध्यान में जितनी निर्विचार की स्थिति आएगी, उतना ही आनद स्पष्ट होने लगेगा। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होगा कि जो सुख, आनन्द संसार में खोजा तो नहीं मिला पर ध्यान के घंटे, आधे घंटे में प्रकाश की छोटी-छोटी किरणों ने जीवन दृष्टि में बदलाव आरम्भ कर दिया। दुःख के कारणों पर दृष्टि पडी तो इलाज आरम्भ हुआ।

 

दोष युक्त मन

भगवान् बुद्ध ने कहा है- यदि कोई दोष युक्त मन से बोलता है या कर्म करता है तो दुःख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाडी का चक्का खीचने वाले बैलों के पैर का। यदि मन में किसी को दुःख देने का भाव उठता है तो बीज गिर रहा है। बीज बड़ा होकर वृक्ष बनेगा और उस पर फल लगेगा तो भोगना भी उसे ही पडेगा। अक्सर जब दुःख आता है तो व्यक्ति सोचता है कि कोई दूसरा उसके लिए दुःख उत्पन्न कर रहा है- पत्नी, पति, पुत्र, पिता, मित्र, समाज आदि। पर बुद्ध कहते हैं कि दुःख के कारण व्यक्ति के मन में होते हैं, बाहर खोजने गए तो गलती हो गई। वे कहते हैं कि यदि कोई गाली दे तो तुम उसे स्वीकार ही मत करो। दोष उसका है, क्रोध करके तो हम अपने को दंड देते हैं। जब हम किसी चीज को भीतर ले लेते हैं तब ही वह सक्रीय होती है। दूसरे से न लें, भीतर न उतरने दें तो फिर दुःख का कोई कारण नहीं होगा। सारी बात मन की है, उसकी व्याख्या की है, सब इसी पर निर्भर होता है।

 

इसीलिये बुद्ध कहते हैं कि जितनी हानि द्वेषी की या बैरी बैरी की करता है, उससे अधिक बुराई गलत मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है। वे कहते हैं कि दुश्मन से डरने की जरूरत नहीं है, चित्त से डरना चाहिए क्योंकि गलत दिशा में जाता हुआ चित्त ही हानि पहुंचाता है। ठीक दिशा में जाने वाला चित्त तो मित्र होता है अतः चित्त से सावधान होने की जरूरत है। गलत मार्ग पर ले जाने वाला चित्त व्यक्ति को सब दिशाओं में भटकाता है, स्वयं को भीतर की खोज का साधन नहीं बनने देता, वह स्वयं को अकेला नहीं होने देता। चित्त यदि भीड़ से हट जाए, स्वयं में केन्द्रित हो जाए तो दुःख का कारण ही समाप्त हो जाता है।

 

सुख, दुःख व्याख्या पर निर्भर

सुख और दुःख देखने पर निर्भर ही, दृष्टि पर निर्भर है। ये सब अपनी व्याख्याएं हैं। एक बात किसी के लिए सुख हो सकती है, वही दूसरे के लिए दुःख की। उसी बात में कोई व्यक्ति निरपेक्ष रह सकता है, न दुःख अनुभव करे, न सुख। यह भी हो सकता है कि जो आज सुख लग रहा है, कल दुःख हो जाए। इसके विपरीत भी हो सकता है। यदि जीवन का ठीक ठीक निरीक्षण हो तो निश्चय ही ज्ञात हो जाता है कि जीवन में जो कुछ भी हम अनुभव करते हैं, दुःख या सुख, सब हमारी व्याख्याए हैं। व्याख्याए बदली नहीं कि जीवन दूसरा हो जाता है। व्याख्याए अपनी है, हर व्यक्ति उसे बदलने में स्वतंत्र है, किसी और का कोई बंधन नहीं है।

भगवान् बुद्ध ने धम्मपद में कहा है ससुखं वतजीवाम  वेरिनेसू स्वेरिनोवेरिनेसू मनुस्सेसू विहराम अवेरिनो।। अर्थात वैरियो के बीच अबैरी होकर, अहो हम सुख पूर्वक जीवन बिता रहे हैं। बैरी मनुष्यों के बीच अबीरी होकर हम विहार करते हैं। यह गाथा बुद्ध ने एक विशेष अवसर के कारण कही। इसके पीछे सूत्र के जन्म की कथा है। शाक्य और कोली राजाओं में रोहिणी नामक नदी के पानी को रोक कर दोनों जनपदवासी खेतों की सिंचाई करते थे। एक बार ज्येष्ठ मास में फसलों को सूखते देखकर दोनों जनपदवासी पहले अपने खेतों को सींचना चाहते थे अतः दोनों और के नौकरों में झगडा हो गया। इस झगड़े की खबार दोनों और के मालिकों को मिली तो दोनों सेना को साथ लेकर युद्ध करने को आ गए। भगवान् बुद्ध रोहिणी नदी के तट पर ही ध्यान करते थे। उन्हें जब यह खबर मिली तो वे युद्ध को तत्पर दोनों सेनाओं के मध्य आए।

 

भगवान्  को देखकर शाक्य और कोलियों ने हथियार फ़ंड कर वन्दना की। भगवान् बुद्ध ने दोनों राजाओं को कहा-यह किस बात का झगड़ा है। राजाओं ने कहा कारण हम नहीं जानते। भगवान ने पूछा, फिर कारण कौन जानता है ? सेनापतियों को शायद पता हो। सेनापतियों ने उपसेनापतियों की और इशारा किया, उपसेनापतियों ने सैनिकों के प्रति और बात फिर नौकरों तक पहुँची। नौकरों ने कहा-भगवान पानी के कारण। बुद्ध ने कहा पानी तो सदा से बहता है, पानी के कारण नहीं हो सकता। नौकरों ने कहा पहले कौन उपयोग करे। बुद्ध ने कहा, पहले के कारण पानी के कारण नहीं।

 

बुद्ध हँसे। शाक्य व कोलियों के प्रधानों से पूछा पानी का क्या मूल है और मनुष्यों का क्या मूल्य है। उन्होंने कहा, पानी का तो नाम मात्र मूल्य है और मनुष्य अमूल्य है। बुद्ध ने कहा, फिर सोचो, नाम मात्र के मूल्य के लिए अमूल्य को मिटाने चले हो, असार के लिए सार को गंवाते हो।

 

दृष्टि बदल गयी तो सब बदल गया। व्याख्या बदल गयी तो सब बदल गया।

 

सुख-दुःख स्वयं के

साधारणतया धारणा यह रहती है की दूसरे दुःख दें रहें हैं। इसका यह भी अर्थ है की दूसरे ही सुख देंगे। बुद्ध के जीवन की एक घटना है। बुद्ध को किसी ने गालियाँ दी। बुद्ध ने कहा तेरी बात पूरी हो गयी हो तो जाऊं। उस व्यक्ति ने कहा, बात नहीं है, हम तो गालियाँ दे रहे हैं। बुद्ध ने कहा, मेरे लिए बात ही है, तुम्हारे लिए गाली होगी। यदि तुम दस साल पहले आते तो यह मेरे लिए गाली थी। अब मैं दूसरों की भूलों के लिए अपने को दंड नहीं देता, दुःख नहीं पाता। गाली दे रहे हो तो तुम जानो, हम बीच में आते ही नहीं। वह व्यक्ति गया पर रात भर नहीं सो सका। वह सुबह माफी माँगने आया। बुद्ध ने कहा, जो हमने ली ही नहीं, उसके लिए क्षमा कैसे करें। तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। दुखी होना चाहें तो यह घटना काफी है पर यदि इस पर भी प्रसन्न रहना चाहें, दुखी न हों तो कोई दूसरा बाधा नहीं डाल सकता। सीधा सा अर्थ है कि कोई दूसरा न तो दुःख दे सकता है, न सुख। हम स्वयं अपने मालिक बनें तो कोई दूसरा दुःख दे ही नहीं सकता। दरअसल दूसरे के हाथ में चाबी दे दें, दूसरों के हाथ में खेलें, अपना बटन दूसरों को दबाने दे, तभी दूसरा दुःख दे सकता है।

एक बाहर का पहलवान गाँव में आया। दंगल हुआ गाँव के पहलवान से वह हार गया। लोग उसकी हार पर हंसने लगे, तालियाँ बजाने लगे तो हारा हुआ पहलवान भी जोर-जोर से हंसने लगा। लोगों की हंसी रूक गयी और आश्चर्यचकित हुए कि यह हारा हुआ पहलवान इतना क्यों हंस रहा है। उस पहलवान ने कहा कि हम भी देख रहे हैं, बड़े पहलवान बने फिरते थे, खूब हुई चारों खाने चित्त। वह पहलवान तो था ही, पर उससे ज्यादा उसकी फकीरी थी, मस्ती थी। वह दूसरों के कारण सुखी, दुखी नहीं हुआ, गुलाम नहीं बना।

सुख की आशा से दुःख

दुःख आता है सुख की आशा से। सुख की आशा भी अपने निकटतम से ही होती है। पति से होती है, पत्नी से होती है, पुत्र से होती है। यदि कोई औरत बिना देखे निकल जाए तो दुःख नहीं होता परन्तु यदि पत्नी बिना देखे निकल जाए तो दुःख होता है। यदि किसी का बेटा अपने को सम्मान न दे तो दुःख नहीं होता परन्तु अपना बेटा सम्मान न दे तो दुःख होता है तो बेटा दुःख देता है, पत्नी दुःख देती है, पति दुःख देता है। मित्र दुःख देते हैं अर्थात जो निकट हैं वे दुःख देते हैं क्योंकि जो निकट हैं उनसे उतना ही सुख मिलता है। मिलता तो नहीं है पर आभास होता है। जिससे सुख की आशा की जाती है उसी से दुःख मिलता है।

दुःख अपेक्षा से मिलता है। जितनी बड़ी सुख की उपेक्षा होती है, उतनी ही टूटती है। अपरिचित से उपेक्षा नहीं होती इसलिए दुःख भी नहीं होता, दुःख तो परिचितों से ही मिलता है। यदि उपेक्षा छोड़ दी जाए, सुख न माँगा जाए तो कोई दुःख नहीं होता। न बाहर से सुख आता है, न बाहर से दुःख आता है। दुःख सुख की उपेक्षा का ही परिणाम होता है। लाओत्से ने कहा, मैंने कभी सम्मान चाहा ही नहीं तो मेरा अपमान कैसे हो सकता है।

दुःख से छुटकारा पाने के लिए बुद्ध ने उपेक्षा एक कारगर उपाय बताया है। उपेक्षा का अर्थ है, न दुःख मिलता है, न सुख मिलता है। कोई उपेक्षा नहीं रखी का अर्थ उपेक्षा है। उपेक्षा में जीने वाले को न कोई चीज दुःख दे सकती है और न सुख। यह तो साक्षी भाव से जीता है वह दोनों की समदृष्टि से देखता है।

दुःख न देने तो स्वतः सुख

दुःख मनुष्य का मूल स्वाभाव नहीं है अतः वैसा घटने पर तकलीफ होती है, अच्छा नहीं लगता। यह किसी एक व्यक्ति के साथ नहीं सभी व्यक्तियों के साथ होता है। इसी कारण सभी धर्मों में कहा गया है कि ऐसा कोई व्यव्हार दूसरों के साथ मत करा करो जो स्वयं दूसरे से अपने साथ नहीं चाहो। सीधा सा अर्थ यह है कि ऐसा कोई कार्य मत करो जिससे दूसरे को दुःख पहुंचे। विश्व के सभी प्राणी सुख से रहना चाहते हैं पर साधारण मनुष्य अपने लिए अलग नियम बनाता है और दूसरों के लिए अलग। वह चाहता है कि चाहे सारे संसार को दुःख मिले तो भी मैं सुख चाहूंगा। दूसरे को दुःख देगा अपने सुख के लिए। प्रकृति का नियम है कि जो देंगे वही लौटेगा। अस्तित्व में कोई सीमा नहीं है सभी एक दूसरे से जुड़े हैं पर गहरी दृष्टि नहीं होने पर सभी अलग-अलग लगते हैं। जो किसी को दुःख देगा, दुःख उसी पर लौट आएगा। इसलिए तो सभी वेड कुरआन, बाइबिल, धम्मपद आदि में सभी ने एक ही स्वर्ण नियम दिया है- जो तुम अपने लिए चाहते हो उससे अन्यथा दूसरे के लिए मत करना।

पर मनुष्य का स्वभाव अलग ही है। वह अपने निकटतम व्यक्ति पुत्र, पुत्री या अन्य पर अत्याचार भी करता है तो इस नाम से कि वह उसके भले के लिए कर रहा है। आकान्शाओं से दूसरे का जीवन सुखद नहीं होता पर दुःख पहुंचाया जाता है, सुख का लेबल लगाकर। हिंसा इतनी गहन है कि दूसरे को सुख देने के नाम पर भी कोई सता सकता है, किसी को दुःख दे सकता है। इसी कारण भगवान् बुद्ध ने कहा- अतानं उपमं कत्वा न हत्रेय न घातये। अर्थात अपने सामान ही सबको जानकार न मारे न किसी को मारने की प्रेरणा दें। उन्होंने कहा कि यदि दूसरों को दुःख नहीं दिया तो अपने जीवन में फूल खिलने शुरू हो जाएंगे क्योंकि जीवन ऐसा है कि जो दुःख नहीं देता तो सुख अपने आप हो जाता है।

दुःख भोगने से सुख का अहसान

भगवान् बुद्ध ने कहा कि जो बाल्यावस्था में ब्रहमचारी का पालन नहीं करते और युवावस्था में धन नहीं कमाते वे वृद्धावस्था में चिंता को प्राप्त होते हैं। बड़ा अजीब लगता है कि बुद्ध कहे कि धन कमाए अर्थात मह्त्वकांशा हो, पद हो, धन एकत्रीटी करें अर्थात जो व्यक्ति है उसको भी इकट्ठा करें। एक यहूदी रबाई से एक गरीब आदमी ने आकर कहा कि मई बहुत दुखी हूँ, मुझे मरने का आशीर्वाद दें। उसने कहा कि जीना नरक हो गया है। एक छोटा सा कमरा है, वर्षा में पानी टपकता है। उसमें ही मैं, मेरी पत्नी, दो बच्चे, मेरी सास और ससुर रहते हैं। उसी में मेरे पिता व मेरी माँ। हिलने डुलने की भी जगह नहीं है, ऊपर से चिडचिडे व क्रोध भरे। नया मकान लेने की भी सामर्थ्य नहीं। नरक है, मरने की आगया दे दें। बूढ़े रबाई ने कहा, तुम्हे रोकूंगा नहीं, केवल सात दिन रूक जाओ। उसने कहा तुम्हारे पास कितने जानवर है. उसने कहा, एक कुत्ता, छह बकरिया, एक गाय और एक बछडा। रबाई ने कहा ऐसा करो कि इन सबको भी कमरे में ले आओ। उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि यों ही मरे जा रहे है, इन्हें लेकर तो खड़े रहने की भी जगह नहीं रहेगी। उस रबाई ने कहा, सात ही दिन का मामला है, फिर तुम मर जाना, इतना तो मान लो। सारी जिन्दगी तुमने मेरी बात मानी मरते वक्त तो न टालो। उस व्यक्ति ने कहा कि ऐसे तो सात दिन ज़िंदा ही नहीं रहूँगा। बूढ़े ने कहा कोई चिंता नहीं जब मरना ही है तो मरने की क्या फिकर।

घर जाकर उसने सारी बात बताई। सभी ने विरोध किया। वे भी रबाई के पास गए। रबाई ने कहा कि हाँ मैंने ही कहा है, करने दो। जब रबाई कहता है तो करना पड़ता है। ले लिया सबको अन्दर। सात दिन माह नरक के थे। सात दिन बाद वह व्यक्ति आया। रबाई ने कहा, अब मरने के पहले उन सबको घर के बाहर कर दे। उसने घर के बाहर कर दिया। रबाई ने दो-तीन दिन प्रतीक्षा की। वह आदमी लौटा नहीं तो रबाई उसके घर गया। कहा, क्या मामला है, मरना नहीं है? उसने कहा, कमरा वही है, अब इतनी जगह मालूम होती है, ऐसा आनद कभी जाना भी नहीं था, सब में प्रेम भाव भी बढ़ गया है। अब कौन मरता है, तुम्हारी कृपा है।
दुःख सघन हुआ, फिर अनुभव हुआ सुख की जैसी स्थिति में थे। यहाँ दुःख ने भी दिशा दी, सुख का अहसास कराया। जीवन में दुःख भी जरूरी है, सुख के आभास के लिए।

दुःख का निरोध है

भगवान् जेतवन में ठहरे थे। उनके साथ पांच सौ भिक्षु भी ठहरे थे। व आसंशाला में बैठे रात्री को बाते कर रहे थे। उनकी बात साधारण जनों जैसी थी। भगवान् मौन बैठे उन्हें सुन रहे थे। वे बातों में इतने तल्लीन थे कि भगवान् को भूल ही गए थे। कोई कह रहा था कि अमुख गाँव का मार्ग बड़ा सुन्दर है, अमुक गाँव का मार्ग बड़ा खराब है। अमुख मार्ग पर छायादार वृक्ष है, स्वच्छ सरोवर भी है और अमुक मार्ग बहुत रूखा है, उससे भगवान् बचाए। और कोई कह रहा था कि अमुक राजा भी अद्भुत व नगर सेठ भी अद्भुत बड़ा दानी। फलां नगर का राजा भी कंजूस और नगरसेठ भी कंजूस वहां तो कोई भूल कर पैर नहीं रखे। इस प्रकार की कई बातें हो रही थे। भगवान ने यह सब सुना। चौके भी, हँसे भी। भिक्षुओं को पास बुलाय। उन्हें कहा कि भिक्षु होकर भी बाह्य मार्गों की बात करते हो। समय थोड़ा है और करने को बहुत है। बाह्य मार्गों पर जन्म जन्म भटकते रहे हो, अब भी थके नहीं। अंतर्मार्गों की सोच। सौन्दर्य तो अंतर्मार्गों में है। शरण भी खोजनी हो तो वहा खोजो क्योंकि दुःख निरोध का वही मार्ग है। उन्होंने कहा कि भिक्षुओं मग्गानुट्ठगिको सेट्टो-यदि श्रेष्ठ मार्ग की बात करनी है तो आर्य अष्टान्गिक मार्ग की बात करो। यह तुम किन मार्गों की बात करते हो। तब उन्होंने गाथा कही उर कहा कि भीतर आने के बहुत मार्गों में आठ अंगों वाला मार्ग श्रेष्ठ है।

भगवान् बुद्ध ने दुःख निरोध के आठ सूत्र दिए। पहला, सम्यक दृष्टि अर्था जैसा है, वैसा ही देखना अपनी धारणाओं को बीच में लाकर नहीं देखना। आँख निर्दोष हो जैसे दर्पण खाली हो। यदि दर्पण पर धुल पडी हो कोई रंग लगा हो कोई पक्ष पडा हो तो जैसा सत्य है, वैसा दिखाई नहीं पड़ता। सम्यक दृष्टि का अर्थ है सभी दृष्टियों से मुखत निष्पक्ष।

दूसरा सूत्र सम्यक संकल्प। इसका अर्थ है कि जो करने योग्य है वह करना और उस पर पूरा जीवन लगा देना। करना किसी अहंकार के कारण न हो, वही सम्यक संकल्प। ऐसा संकल्प जो बोध से हो, जीवन की प्रौढ़ता से हो, क्षणिक उत्साह, लोग क्या कहेंगे इस भावना से न हों। जिसमें बाहरी उत्साह नहीं हो आतंरिक उत्साह हो।

तीसरा है सम्यक वाणी-जैसा है वैसा ही करना। अपनी मिलाकर, बदल कर नहीं. ऐसा नहीं कि भीतर कुछ है और बाहर कुछ। वाणी में ह्रदय की सही अवस्था प्रकट हो। जो बोलना है, वही बोले, असार न बोले जितनी आवश्यकता हो जिसके बिना का चले। अधिक बोलने से बड़ी दिक्कते होती है, जीवन व्यर्थ के जाल में फंस जाता है।

चौथा है सम्यक कर्मात अर्थात वही करना जो ह्रदय करने को कहे। ऐसा नहीं कि कोई खे वैसा कर दें। करें वही जो स्वयं को करने योग्य लगे। व्यर्थ काम नहीं, वही काम जिससे जीवन का सार मिले। व्यस्त रहना, कुछ न कुछ करते रहना जरूरी नहीं है। करना वही जो जरूरी हो, उसी को बुद्ध सम्यक कर्म कहते हैं।

पांचवा सम्यक आजीव। आजीव का अर्थ आजीविका से है। रोटी तो कमानी ही है पर आजीविका सम्यक हो, विध्वंसात्मक न होकर सृजनात्मक हो और जीवन को परमात्मा की तरफ ले जाने वाली हो। बुद्ध कहते है कि अपने जीने के लिए किसी का जीवन नष्ट करना अनुचित है। आजीविका ऐसी हो जिससे किसी का अहित न होता हो। यदि कोई दूसरे का अहित करता है तो वह अपने ही अहित के बीज बोता है।

छठा है सम्यक व्यायाम। यहाँ व्यायाम का अर्थ श्रम से समयक श्रम न तो आलस्य और न ही अति कर्मठता है जहाँ दौड रुके ही नहीं। दोनों का मध्य मार्ग है समयक व्यायाम, जहाँ जीवन की ऊर्जा संतुलित हो।

सांतवा सूत्र है सम्यक समाधि अर्थात मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। असली बात जाग्रत रह कर आनंद को उपलब्ध होना, उसीक ओ बुद्ध ने सम्यक समाधि कहा है। अंतिम दो चरण सर्वाधिक महत्व है। सम्यक स्मृति परिधि पर और सम्यक समाधि केंद्र पर। परिधि पर होश हो और फिर केंद्र में भी होश की ज्योति जले तो ही सम्यक समाधि।

दुःख निरोध की अवस्था

जब इस बात का अहसास हो गया कि जब जीवन है तो दुख अवश्यम्मभावी है, फ़िर कारण पर विचार किया और उन कारणों को दूर करने के लिये आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण कर सातवें-आठवें सूत्र तक पहुंचे तो निदान हो गया, उपाय हो गया कारण मिट गये, तब चौथा आर्य सत्य सुख की अवस्था आ गई। इसे निर्वाण की अवस्था महासुख की अवस्था कुछ भी कहा जा सकता है। इस अवस्था में आने पर मनुष्य की सभी तृष्णाएं समाप्त हो जाती हैं तो फ़िर उसका वापिस जन्म लेकर इस संसार में वापिस आने का कोई कारण नहीं रह जाता। जैसे ही दुख समाप्त हुए, संसार की यात्रा समाप्त हो गई। फ़िर यह व्यक्ति का आखिरी पडाव रह। एक बार दुख निरोध की अवस्था या महासुख को उपलब्ध करने पर शरीर छोडने के उपरान्त वह वापिस नहीं लौटता। ज्योति में ज्योति मिल जाती है। अन्य शब्दों में वही तो निर्वाण है, यही तो फ़िर मोक्ष है। जब ज्योति में ज्योति विलुप्त हो गई तो सूक्ष्म शरीर में समाहित इच्छाएं, तृष्णाएं, अहंकार, अस्मिता आदि जो पुनर्जन्म लेने का कारण बनती है, वे ही नहीं रहती तो वह आत्मा भैतिक शरीर के समाप्त होने के बाद आवागमन से मुक्त हो जाती है। भारतीय अध्यात्म में इस महासुख से बढकर जीवन की अन्य कोई उपलब्धि नहीं मानी गई है। इस चार आर्यसत्यों के माध्यम से भगवान बुद्ध ने व्यक्ति को चरम सीमा तक पहुंचने का मार्ग बताया है।

अप्प दीपो भव

भगवान बुद्ध ने अपनी देशना में मानने पर कत्तई जोर नहीं दिया, जोर दिया अनुभव कर स्वयं जानने पर। जीवन का सत्य बताया, रोग का इलाज दिया जिसे लेकर गूंगे के गुड की तरह अनगिनत लोग दुखों से मुक्त हुए, महासुख की अवस्था प्राप्त की। उनके बताए मार्ग को समझने, ह्रदयगम करें, उस पर चले तो बुद्ध की तरह कोई भी व्यक्ति उस स्थिति को पा सकता है। उन्हें महामानव, भगवान, अलौकिक शक्तियों से युक्त बताकर अपने को असमर्थ मानें तो हम अपने को धोखा देते हुए मनुश्य की गरिमा को ही कम करते हैं जिसे बुद्ध ने जीवन को सार्थक बनाने के लिये अप्प दीपो भव की देशना देकर शिखर पर पहुंचाया है। यह जन्म तो अनन्त जन्मों में आगे की एक कडी है। यात्रा यदि चालू रहे, कदम बढते रहें, दिशा यदि सही संकल्प और होश बढाने की है, हर मनुष्य को अपने भीतर छिपी दिव्यता को पहचानने और सही दिशा में चलने की है। भगवान बुद्ध ने तो मानव मात्र के कल्याण के लिये जीवन के सत्य उदघाटित किये हैं।

 

 

 

Source:   http://uditbhargavajaipur.blogspot.in/2011/09/blog-post_22.html

14-MAY-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना:धम्म पुनरुत्थान एव स्थातित्व प्राप्ति के लिए समयबुद्धा का प्रस्तावित नियम- पूर्णिमा मासिक संगायन अर्थात बौध विहार पर मासिक संगठित वंदना का नियम अनिवार्य करना होगा…समयबुद्धा

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14-MAY-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना:धम्म पुनरुत्थान एव स्थातित्व प्राप्ति के लिए समयबुद्धा का प्रस्तावित नियम- पूर्णिमा मासिक संगायन अर्थात बौध विहार पर मासिक संगठित वंदना का नियम अनिवार्य करना होगा|

 

इतहास गवाह है की बौद्ध क्रांति को प्रतिक्रांति करके दबा दिया गया था, अधिक जानकारी के लिए बाबा साहब आंबेडकर की पुस्तक “प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति” अवश्य पढ़ें| अब हमें उन सभी कारणों को समझना और बदलना होगा जिनकी वजह से बौद्ध क्रांति विफल हुई थी|अगर हमने अपने इतिहास से सीखकर बौध धम्म के लिए कुछ नए नियम नहीं बनाये तो इतिहास फिर हमें सबक सिखा देगा इसलिए नया नियम हर पूर्णिमा को बौध विहार पर संगठित वंदना का नियम अनिवार्य करना होगा | बौध धर्म में पूर्णिमा का बड़ा महत्व है हमें ये नियम बनाना होगा की कम से कम महीने में एक बार अर्थात पूर्णिमा के दिन अपने निकटतम बौध विहारों पर संगठित होना होगा| ये भारत के 6000 जातियों में बंटे सभी मूलनिवासियों को संगठित करने का बहेतरीन  माद्यम है|इसके दो फायेदे होंगे एक तो धार्मिक ज्ञान से जीवन बेहतर होगा दुसरे हमारा संगठन बल साबित होगा |विहारों से हमारे समाज को बढ़ाने वाली  नीति  को जनसाधारण  और जनसाधारण  की जरूरतों  को ऊपर  बैठे  अपने समाज के बुद्धिजीवियों  तक पहुचाया  जा सकेगा| राजनेतिक पार्टी के नाम और चिन्ह  तो बदलते रहेंगे पर किसे  चुनना है  इसका सामूहिक फैसला केवल बौध विहारों पर ही हो पायेगा| इस संगठन के पीछे राजनेतिक पार्टियाँ और हुकुमरान बौध विहारों के चक्कर काटेंगे |

 

पूर्णिमा मासिक संगायन अर्थात बौध विहार पर संगठित वंदना का नियम अनिवार्य करना होगा| इस नियम को समयबुद्धा मिशन से जुड़े लोग बहुत तत्परता से पालन करते हैं| अब आप समझ सकते हैं की आप समयबुद्धा की धम्म देशना केवल पूर्णिमा के ही दिन क्यों पाते हो|

 

बौद्ध पूर्णिमा पर संगठित होकर वंदना करने से बौद्ध धम्म ज्ञान तो निश्चित रूप से मिलेगा ही पर इसके साथ साथ अन्य जबरदस्त फायेदे भी होंगे जैसे:

 

१. असल में व्यापक प्रचार न होने के कारण बौध धम्म को समझने के लिए थोडा अध्यन करना पड़ता है इसलिए ये केवल बुद्धि-जीवी वर्ग तक ही सीमित होकर रह गया है| बहुजन या बौद्ध  विचारधारा या अम्बेडकरवादी विचारधारा का प्रचार कैसे हुआ, हम सभी जानते हैं की कहीं कभी मौके बे मौके, रैली,जयंती अदि में इकठ्ठा हुए कुछ बहुजन और साहित्य प्रकाशक द्वारा हुआ|ये मीटिंग बहुत कम हैं जरा सोच कर देखो की अगर ऐसी मीटिंग ज्यादा हों तो क्या ज्यादा तेज़ी से मिशन आगे नहीं बढेगा?हर पूर्णिमा पर संगठित होने से  विचारों का प्रचार प्रसार बहुत तेज़ी से होगा जिससे बहुजनों को जगाने में कम समय लगेगा , अपने मीडिया का काम करेगी ये मासिक मीटिंग|

 

२. बहुजनों को अपना जनसँख्या बल या जनाधार पता चलेगा जिससे उनमें अकेलेपन का डर ख़त्म होगा और संगर्ष करने को प्रोत्साहित होगा|जो छुपे बैठे हैं अपने घरों में वो भी इस जनसँख्या बल से खिचे चले आयेंगे|

 

३. बौद्ध पेशेवर व्यवसाई जैसे डॉक्टर,इंजिनियर, कारीगर,मिस्त्री,व्यवसायी,दुकानदार, अदि अनेकों लोगों को एक दुसरे की सेवाओं का लाभ मिलेगा व उनकी मार्केटिंग होगी परिणामस्वरूप आमदनी बढ़ेगी|इतना ही नहीं रोजगार चुनाव के लिए ऐसे अनुभवी पेशेवरों का मार्गदर्शन भी मिलेगा|कोलेज,स्कूल अदि में एडमिशन में भी मार्गदर्शन मिलेगा|बहुत ज्यादा फायेदे हैं,जरा सोचोगे तो समझ जाओगे| भीड़ को देखते हुए हर महीने मेला या बाजार सा भी लग जायेगा जिससे कुछ लोगों की आमदनी होगी|बौद्ध मूर्तियाँ और साहित्य आसानी से खरीदा बेक जा सकेगा|

 

४. दबे छुपे होने की वजह से या अन्य कई वजह से शादी सम्बन्द अदि के लिए जान पहचान बनेगी|सालाना शादी लायक बच्चों की किताब भी निकली जा सकती है परिचय सम्मलेन भी करवाया जा सकता है| इस दिशा में भी बहुत फायेदा होगा|

 

५. बह्जनों के स्थाई झंडे बौद्ध धम्म के भारत में पतन और उत्थान न होने की मूल कारन पर भी सह सहमती से काम होगा जिनमे प्रमुख हैं१. धन और शक्ति की सिधान्तिक उपेक्षा २. अनईश्वरवाद की नासमझी ३. धम्म विरोधी की जबरदस्त मौकापरस्ती४. इसके धम्म आचार्यों को भीख मांगना५. अच्छे प्रवचन करने वाले न होना६. जनाश्रित न होकर राज आश्रित होना |इनमे से सबसे मुख्य है धन संचय की उपेक्षा, यकीनन धन संचय भ्रस्टाचार और अशांति का कारन बनता है पर समय गवाह है की इसके बिना धम्म शिक्षा महत्वहीन हो गई है,पराजित होकर युगों तक गुलामी की,असुरक्षित होकर अन्य धर्मों में आश्रय खोजने लगे|आज भी बौद्ध विहारों पर नीरसता छाई हुई है, दुसरे तो  तो छोड़ो अपने लोग ही वहां नहीं फटकना चाहते|आज हमारे लोग जब भी संगर्ष को उठते हैं तो धन के आभाव में सब ठंडा हो जाता है और अपनी दुर्दशा कबूल करने को मजबूर हो जाते हैं|इसके विपरीत धम्म विरोधी धन के महत्व को समझते हैं और हमेशा धर्म के नाम पर धन संचय में लगे रहते हैं| ये धन हर प्रकार से उनका संवर्धन करता हैं|ये धन उनके हर पाप कर्म को शुभ कर्म बना देता है और हमारे लोग शिकायत करते हुए जीते हैं और मर जाते हैं|हमें ऐसी व्यस्था बनानी है जिसमें हर पूर्णिमा को लोग यथा शक्ति दान दे जो की बौद्ध विहार की मासिक वेतन का काम करेगा| क्योंकि धम्म से सभी लाभान्वित होते हैं तो ये सबकी जिम्मेदारी है न की केवल कुछ प्रेरित बौद्धों की|इस मासिक वेतन से विहारों का रखाव और उन्नति होगी,उसमें आश्रित धम्म आचार्यों को फिर भीख नहीं मंगनी पड़ेगी|

 

६. हमें बौद्ध धम्म आचार्यों को भिखारी नहीं धम्म अधिकारी बनान होगा| उनकी सभी भौतिक जरूरतों की जिम्मेदारी बौद्ध समाज को लेनी होगी|मेरी निजी राय  है की बौद्ध धाम के अगुवा जिनपर धम्म प्रचार की जिम्मेदारी है उनको ही कमजोर बनाये रखने और भीख मंगवाने में बौद्ध धम्म का उद्धार नहीं हो पायेगा| विहारों के मासिक वेतन या चंदे में से नियमित तनख्वा देनी होगी| इस ठीक किसी कम्पनी या विभाग की नौकरी की तरह बनाना होगा|भगवन बौद्ध ने जब भिक्षा मांगी थी तब परिस्थिथि दूसरी थी,केवल बुरी परिस्थिथि में भिक्षा मांगना जायज़ ठराया जा सकता है| भिक्षु व्यस्था और ग्रीक स्टाइल चीवर का सिद्धांत भगवन बुद्धा के  बहुत बाद स्थापित किया गया|बौद्ध भिक्षु को राजनेतिक सरक्षण जब मिलेगा तब मिलेगा पर तब तक जनता से संरक्षण मिलना ही चाहिए|ये समझा जा सकता है की जहाँ धन है वह भ्रस्टाचार हो सकता है इसी वजह से बौद्ध धम्म में ये व्यस्था नहीं है|भ्रस्टाचार बुरी चीज़ है पर गुलामी,घृणा,अपमानित मौत,बलात्कार,नरसंघार,दबंगई अदि उससे भी ज्यादा बुरी चीज़ है| अब फैसला आपके हाथो में है आप व्यस्था परिवर्तन चुनकर अपना भला करते हो बौध्मय भारत का भला करते हो या केवल बौद्ध बातों तक ही सीमित रहते हो|ये व्यस्था बौद्ध धम्म के पूर्ण उत्थान होने तक लागू रहनी चाहिए|

 

७. किसी भी कौम का साहित्य और इतिहास उसके लोगों के मन,वचन और कर्मों को दिशा देते हैइसलिए हार को नहीं विजय गाथा को प्रचारित करना चाहिए। हारको भी नज़रन्दाज नहीं करना बल्कि उसके सबक से अपना साहित्य बनाओ |

 

…समयबुद्धा

 

BAHUJAN HITAYE BAHUJAN SUKHAYE

 

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/05/14/14may2014-buddh-poornima-samaybuddha-dhamm-deshna/

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बहुजन शिकायत तो बहुत करते रहते हैं अपनी दुर्दशा की, मीडिया द्वारा दरकिनार करने की पर जब उनको वेकपित मीडिया का समाधान दिया जाता है तब वे उसे अनसुना कर देते हैं ।समयबुद्धा मिशन बहुत समय से बहुजनों को जगाने की कोशिश कर रहा है पर अफ़सोस वो ध्यान ही नहीं दे रहे। यही वो आदत है जिसकी वजह से बहुजन अपनी दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार रहे हैं और आज भी हैं।
समयबुद्धा मिशन बहुजन समाज को अम्बेडकर और बुद्ध मार्ग द्वारा खुशहाल बनाने के लिए समर्पित है| बुद्धा और आंबेडकर के विचारों का प्रचार प्रसार करने के लिए ही समयबुद्धा वेबसाईट समर्पित है| शिक्षित और सक्षम वर्ग ही बदलाव लाता है पर ऐसा देखा गया है की समय का आभाव या अन्य कारणों से यही वर्ग बौद्ध और अम्बेडकरवादी विचारधारा और साहित्य पर ध्यान नहीं दे पाता। शिक्षित और सक्षम वर्ग इन्टरनेट खूब इस्तेमाल करता है, इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए इस वेबसाईट को चलाया जा रहा है। ये वेबसाईट ऐसा प्लेटफार्म प्रदान करती है जहाँ अम्बेडकर और बुद्ध विचारधारा को हमारे लोग आपस में शेयर कर सकते हैं इस वेबसाईट पर अनेकों पुस्तकें और लेख फ्री में उपलब्ध हैं, आप स्वेव भी लेख लिख सकते हैं|.इस वेबसाइट पर उपलब्ध फ्री किताबों का अध्ययन करें |आप खुद यहाँ इस वेबसाइट पर उपलब्ध बौद्ध धम्म की जानकारी पढ़ें और अपना ज्ञान बढ़ाएं, बौद्ध धम्म ज्ञान को अपने जीवन में उतारें| भगवान् बुद्ध द्वारा बताये गए मार्ग और शिक्षा को हिंदी में जानने के लिए,बौद्ध विचारक एव दार्शनिक ‘समयबुद्धा’ के धम्म प्रवचनों के लिए , बौद्ध धम्म पर अपने विचार और लेख लिखने के लिए व् अनेकों बौद्ध धम्म और अम्बेडकरवाद की पुस्तकों को मुफ्त में पाने के लिए आप इस वेबसाइट को अपनी ईमेल से ज्वाइन करें, अपने सभी साथियों को ज्वाइन करवाएं| तरीका इस प्रकार है:

https://samaybuddha.wordpress.com/ पर जाकर बाएँ तरफ दिए Follow Blog via Email में अपनी ईमेल डाल कर फोल्लो पर क्लिक करें, इसके बाद आपको एक CONFIRMATION का बटन बनी हुए मेल आएगी निवेदन है की उसे क्लिक कर के कनफिरम करें इसके बाद आपको हर हफ्ते बौध धर्म की जानकारी भरी एक मेल आयेगी| ये ठीक ऐसे है जैसे कोई साप्ताहिक हिंदी बौद्ध पत्रिका हो और वो भी फ्री में, पसंद न आने पर अनसब्सक्राइब भी कर सकते हैं|

भले ही हमारा मीडिया में शेयर न हो हमें अपना मीडिया खुद बनना है। आप बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार में मदत करें, आप केवल अपने १० बहुजन साथियों की जिम्मेदारी ले|अगर हम में से हर कोई हमारे समाज के फायदे की बात अपने दस साथिओं जो की हमारे ही लोग हों को मौखिक बताये या SMS या ईमेल या अन्य साधनों से करें तो केवल 7 दिनों में हर बुद्धिस्ट भाई के पास हमारा सन्देश पहुँच सकता है | इसी तरह हमारा विरोध की बात भी 9 वे दिन तक तो देश के हर आखिरी आदमी तक पहुँच जाएगी | नीचे लिखे टेबल को देखो, दोस्तों जहाँ चाह वह राह, भले ही हमारा मीडिया में शेयर न, हो हम अपना मीडिया खुद हैं :

1ST DAY =10
2ND DAY =100
3RD DAY =1,000
4TH DAY =10,000
5TH DAY =100,000
6TH DAY =1,000,000
7TH DAY =10,000,000
8TH DAY =100,000,000
9TH DAY =1,000,000,000
10TH DAY =1,210,193,422

अगर आपको कोई लेख ऐसा लगता है जिसका आप प्रचार करना चाहते हैं तो उसे कॉपी कर के प्रिंट और फोटो कॉपी कर के अपने लोगों में बाँट भी सकते हैं, क्योंकि इन्टरनेट का इस्तेमाल हर कोई तो नहीं करता | कई लोग जो नौकरी करते हैं उनको प्रिंट और फोटो कॉपी की सुविधा मुफ्त में उपलब्ध होती है|बिना अपना धन खर्च किये भी आप इस तरह धम्म प्रचार कर सकते हो| ज्यादा नहीं बस दस शिक्षित युवा लोगो को चुन लो और उनतक सन्देश पहुचने की जिम्मेदारी ले लो|

बौद्ध साहित्य बहुत विस्तृत है, केवल बौद्ध भंते और बौद्ध लीडर उतना नहीं कर सकते जितना की हम सब मिल कर कर सकते हैं| अगर आपके पास भी बौद्ध धम्म की जानकारी है और आप बौद्ध धम्म पर लिखते हो तो आपसे अनुरोध है की आप बौद्ध धर्म पर अपने आर्टिकल हिंदी में jileraj@gmail.com पर भेजे जिसे हम आपके नाम और फोटो सहित या जैसा आप चाहें यहाँ पब्लिश करेंगे| आईये किताबों में दबे बौध धम्म के कल्याणकारी ज्ञान को मिल जुल कर जन साधारण के लिए उपलब्ध कराएँ |

भगवान् बुद्धा ने कहा है “सत्य जानने के मार्ग में इंसान बस दो ही गलती करता है ,एक वो शुरू ही नहीं करता दूसरा पूरा जाने बिना ही छोड़ जाता है “

 

 

बुद्ध पूर्णिमा पर कविता -पंचशील के अनुगामी…लेखिका श्रीमती सपना निगम, प्रेषक- अरुण कुमार निगम

बुद्ध पूर्णिमा पर गीत -पंचशील के अनुगामी

रचना – श्रीमती सपना निगम buddha deshna

यही धर्म है मोक्ष पथगामी
मध्यम मार्ग सरल
पाँच अनुशीलन हैं इसके
मानव पालन कर.

सत्कर्मों की पूँजी बना ले 
प्रेम-भाव अविरल
कर्मों को अपना धर्म समझ ले
करना किसी से न छल.

प्राणीमात्र पर दया करना तू 
जो  हैं दीन-निर्बल
बुद्ध ने जो सन्देश दिया है
उस पर करना अमल.


राग-रंग नहीं करना तुझको
 
संयम है तेरा बल
मानव जीवन तुझे मिला है
रखना इसे निर्मल.

त्रिपिटक ग्रंथों में समाये 
जीवन सार सकल 

प्रज्ञा शील करुणा अपना ले
मोक्ष की कामना कर.


स्वर्ग-नर्क सब किसने देखा ?
 
किसने देखा कल ?
परम-धाम जाना है तुझको
बुद्ध की राह पर चल.

बुद्धं शरणम गच्छामि
 
धम्मं शरणम गच्छामि
संघम  शरणम गच्छामि
पंचशील के अनुगामी.


बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनायें

प्रेषक- अरुण कुमार निगम

भारत के बहुजनों का ही नहीं संसार भर के बौद्धों का बड़ा पर्व बुद्ध पूर्णिमा (वैशाख-पूर्णिमा) का परिचय…मनोहर पुरी

buddh poornima14-मई-2014 को बुद्ध पूर्णिमा का त्यहार है इस पर प्रस्तुत है  मनोहर पुरी का ये लेख 

इसे नियति की एक महती योजना ही समझना चाहिए कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म ५६३ ई. पू. बैसाख पूर्णिमा को हुआ। यह दिवस उनके और उनके अनुयायियों के साथ तब से आज तक जुड़ा हुआ है। भगवान बुद्ध ने बैसाख पूर्णिमा ४८३ ई. पू. में ८० वर्ष की आयु में, देवरिया ज़िले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया। उनका परम प्रिय शिष्य आनन्द, पत्नी यशोधरा, सारथी चन्ना और यहाँ तक की अश्व कटंक भी अपनी जीवन यात्रा का प्रारम्भ करने के लिए इसी दिन जन्मे। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ ने कठिन तपस्या कर बोधिसत्व प्राप्त किया उसका रोपण भी बैसाख पूर्णिमा को ही हुआ था। इसी दिन समाज में पतिता समझी जाने वाली सुजाता ने तपस्या के जर्जर सिद्धार्थ को पूजा के लिए खीर अर्पित की थी।

बौद्ध साहित्य के अनुसार इस प्रकार बैसाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के प्रत्येक सहयात्री, घटनाक्रम और जीवन परिवर्तन का पावन दिवस रहा है। इसे नियति की एक महती योजना ही समझना चाहिए कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म ५६३ ई. पू. बैसाख पूर्णिमा को हुआ। यह दिवस उनके और उनके अनुयायिओं के साथ तब से आज तक जुड़ा हुआ है। भगवान बुद्ध ने बैसाख पूर्णिमा ४८३ ई. पू. में ८० वर्ष की आयु में, देवरिया जिले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया। उनका परम प्रिय शिष्य आनन्द, पत्नी यशोधरा, सारथी चन्ना और यहाँ तक की अश्व कटंक भी अपनी जीवन यात्रा का प्रारम्भ करने के लिए इसी दिन जन्मे। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ ने कठिन तपस्या कर बोधित्व प्राप्त किया उसका रोपण भी बैसाख पूर्णिमा को ही हुआ था। इसी दिन समाज में पतिता समझी जाने वाली सुजाता ने तपस्या के जर्जर सिद्धार्थ को पूजा के लिए खीर अर्पित की थी। बौद्ध साहित्य के अनुसार इस प्रकार बैसाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के प्रत्येक सहयात्री, घटनाक्रम और जीवन परिवर्तन का पावन दिवस रहा है। आज विश्व के कोने-कोने में बैसाख पूर्णिमा के शुभ अवसर को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है।

भगवान गौतम बुद्ध की जन्मस्थली होने के कारण भारत की धरती पर ही जन्मा है बौद्ध धर्म, प्रारम्भ से ही बौद्ध धर्म ने भारतीय जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। आज भी इस धर्म द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों की अपनी प्रासंगिकता है। यदि भगवान बुद्ध द्वारा दिखाए गए मार्ग पर हम चलने लगें तो विश्व को शान्ति के मार्ग पर आगे ले जाने के लिए हम एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। जब भगवान बुद्ध इस धरती पर अवतरित हुए तब चारों ओर हिंसा और स्वार्थ का बोलबाला था। हिंदू समाज को अनेकानेक कर्मकांडों ने अपने बंधनों में जकड़ा हुआ था। समाज के कुछ वर्ग अपने स्वार्थों की रक्षा के लिए अन्य वर्गों का शोषण करने में जुटे थे। बलि प्रथा का सर्वत्र प्रचलन था फलत: प्रतिदिन हज़ारों पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। पशु-पक्षियों के वध के कारण चारों ओर हिंसा का वातावरण बना हुआ था। लोगों की धर्म से आस्था उठने लगी थी। आज भी वैज्ञानिक प्रगति के कारण लोगों की धर्म में अनास्था बढ़ती जा रही है। भौतिकता की अधिकता के कारण उनके मन अविश्वासी और शंकालु बनते जा रहे हैं। आज हिंसा पहले की अपेक्षा कहीं अधिक भयावह आकार धारण किए पूरी मानवता को त्रस्त किए हुए है। अणु बमों के रूप में हिंसा की एक छोटी-सी चिंगारी सारी मानवता को तहस नहस करने में सक्षम समझी जा रही है। ऐसी स्थिति में अहिंसा ही एक ऐसा मूल मंत्र है जो मानव समाज की इस विनाश से रक्षा कर सकता है। यही वह बिन्दु है जहाँ गौतम बुद्ध आज की परिस्थितियों में भी उतने ही प्रासंगिक हो उठते हैं जितने आज से हज़ारों वर्ष पूर्व थे।

आज का मनुष्य जितना अधिक अधीर एवं असंयमी है उतना शायद पहले कभी नहीं रहा। वह रातों रात वह सब कुछ पा लेना चाहता है जो उसके पूर्वज सदियों में भी प्राप्त नहीं कर पाए थे। सब कुछ अपने पास ही समेट लेने की चाह ने जहाँ उसे स्वार्थी बनाया है वहीं उसे हिंसा का शिकार भी बना डाला है। फलस्वरूप वह मानसिक तनावों का शिकार हो कर लोभी, कामी, क्रोधी और हिंसक को उठा है। मानवीय मूल्यों का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है। ऐसी हालत में गौतम बुद्ध के सिद्धांतों का शीतल मरहम ही उसके घावों को ठंड़क पहुँचा सकता है।

ऐसे समय में जब भारतीय समाज अनेकानेक कुरीतियों और कर्मकांड़ों में फँसा अस्त व्यक्त हो रहा था, गौतम बुद्ध ने जन्म लेकर समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए अहिंसापरक सिद्धान्तों की स्थापना की। गौतम बुद्ध का उस समय के समाज और आने वाली पीढ़ियों पर इतना अधिक प्रभाव हुआ कि उन्हें सहज रूप से ही विष्णु का दसवाँ अवतार मान लिया गया। लोगों की यह धारणा समय के साथ-साथ दृढ़ से दृढ़तर होती गई कि जैसे राम और कृष्ण के रूप में भगवान विष्णु ने धरती पर अवतार लिया था वैसे ही पशु हिंसा को रोकने एवं मानव को शान्ति का मार्ग दिखाने के लिए गौतम बुद्ध इस पृथ्वी पर अवतरित हुए। सिद्धार्थ के रूप में भगवान गौतम बुद्ध का जन्म राजा शुद्धोधन के यहाँ लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ। नेपाल की तराई में स्थित यह स्थान उनकी राजधानी कपिलवस्तु के समीप ही है। राजा शुद्धाधन शाक्य क्षत्रिय वंश के एक अच्छे शासक थे। सिद्धार्थ की माता महामाया कौशल राजवंश की राजकुमारी थी। बचपन में ही सिद्धार्थ की माता का स्वर्गवास होने के कारण उनका लालन पालन विमाता महाप्रजापति गौतमी ने किया। राजवंशीय परम्पराओं के अनुरूप ही उनका लालन-पालन अति वैभवपूर्ण वातावरण में हुआ।

बचपन से ही सिद्धार्थ परपीड़ा से विचलित हो उठते थे। किसी को भी कष्ट में देख कर उसकी सहायता करने की उनके मन में एक सहज ललक थी। ज्योतिषियों ने राजा शुद्धोधन को सचेत कर दिया था कि यदि उनका पुत्र चक्रवर्ती सम्राट नहीं बन पाया तो सन्यासी हो जाएगा। सिद्धार्थ का मन इसी दुनिया के भोग विलास में रम कर रह जाए इसके लिए हर प्रकार के साधन उपलब्ध कराए गए और १८ वर्ष की अवस्था में एक रूपमती कन्या यशोधरा से उनका विवाह कर दिया गया। जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो सिद्धार्थ ने उसका नाम राहुल अर्थात बन्धन रख दिया परन्तु यह बन्धन भी उनके लिए पगबाधा नहीं बन सका। सिद्धार्थ अपने जीवन में मोहमाया को बन्धन मानते थे फलत: शीघ्र ही उन्होंने परिवार के सब बन्धन तोड़ डाले और २१ वर्ष की युवावस्था में ज्ञान की खोज में घर से निकल पड़े।

गृह त्याग के पश्चात सिद्धार्थ ने निरंजना नदी के तट पर पीपल के एक वृक्ष के नीचे घोर तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया, इसी ज्ञान की ज्योति कालान्तर में भारत ही नहीं विश्व के कोने कोने में फैली। आज भी मानवता इसके आलोक में आलोकित हो रही है। ज्ञान की इस दिव्य ज्योति के कारण राजकुमार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कहलाए। गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं के संबंध में अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया। सारनाथ नामक ग्राम के एक उपवन में बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय का महामंत्र गूँज उठा, दु:ख, अज्ञान और परस्पर वैमनस्य से त्रस्त लोग इस अवतरित महापुरुष के समक्ष नतमस्तक होने लगे। गौतम ने जन जन को अन्धविश्वासों, आतंक, हिंसा और स्वार्थ की संकुचित प्रवृतियों को उतार फेंकने का उपदेश दिया। उन्होंने सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए सत्य, अहिंसा और प्रेम का सन्देश दिया। जन-जन को प्राणीमात्र के लिए दया, ममता, परस्पर मेल जोल और अपरिग्रह का पाठ पढ़ाया।

इसी शताब्दि के मध्य में महात्मा गांधी ने गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप दिया। यही कारण है कि महात्मा गांधी को वर्तमान युग का बुद्ध कहा जाने लगा। महात्मा गांधी के इस प्रयास ने बुद्ध की वर्तमान समय में प्रासंगिकता को भी सर्व सिद्ध कर दिखाया।

गौतम बुद्ध ने लगभग ४० वर्ष तक घूम घूम कर अपने सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया। वह उन गिने चुने महात्माओं में से थे जिनके जीवन में ही उनके सिद्धांतों का प्रसार तेज़ी से हुआ और उन्होंने अपने द्वारा लगाए गए पौधे को वृक्ष बन कर पल्लवित होते हुए स्वयं देखा। गौतम बुद्ध ने बहुत ही सहज वाणी और सरल भाषा में अपने विचार लोगों के सामने रखे। अपने धर्म प्रचार में उन्होंने समाज के सभी वर्गों, अमीर गरीब, ऊँच नीच तथा स्त्री-पुरुष को समानता के आधार पर सम्मिलित किया। किसी के मार्ग दर्शन में भी उन्होंने किसी प्रकार का भेद भाव नहीं किया। उन्होंने संघ की स्थापना की जहाँ सभी लोग मिल जुल कर समाज के उत्थान के लिए कार्य करते थे और उसमें अपना अपना योगदान देते थे। बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की घोषणा करते हुए कहा कि उनके निवारण के लिए हर व्यक्ति प्रयास करने में सक्षम है। बुद्ध मानते थे कि संसार दु:खमय है, दु:खों का कोई न कोई कारण है, दु:ख का निरोध है और दु:ख निरोध का उपाय भी है। उन्होंने अविद्या को दु:ख का मूल कारण माना। मन, वचन और कर्म से साधना के मार्ग पर चलने के लिए उन्होंने सम्यक दृष्टि, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक संकल्प, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि को अनिवार्य बताया। महात्मा बुद्ध का मानना था कि साधना द्वारा सर्वोच्च सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। यही अवस्था बुद्ध कहलाती है और इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है।

यद्यपि बौद्ध धर्म का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ फिर भी अन्य भारतीय धर्मों की भान्ति बौद्ध धर्म में ईश्वर और आत्मा के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं किया गया। गौतम बुद्ध ने अपने आप को आत्मा और परमात्मा के निरर्थक विवादों में फँसाने की अपेक्षा समाज कल्याण की ओर अधिक ध्यान दिया। उनके उपदेश अधिकतर सामाजिक एवं संसारिक समस्याओं तक ही सीमित रहे। यही कारण है कि उनकी बात लोगों की समझ में सहज रूप से ही आने लगी। महात्मा बुद्ध ने मध्यममार्ग अपनाते हुए अहिंसा युक्त दस शीलों का प्रचार किया तो लोगों ने उनकी बातों से स्वयं को सहज ही जुड़ा हुआ पाया। बुद्ध का मानना था कि मनुष्य यदि अपनी तृष्णाओं पर विजय प्राप्त कर ले तो वह निर्वाण प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उन्होंने पुरोहितवाद पर करारा प्रहार किया और व्यक्ति के महत्त्व को प्रतिष्ठित किया।

मानवता को बुद्ध की सबसे बड़ी देन है भेदभाव को समाप्त करना। यह एक विडम्बना ही है कि बुद्ध की इस धरती पर आज तक छूआछूत, भेदभाव किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। उस समय तो समाज छूआछूत के कारण अलग अलग वर्गों में विभाजित था। बौद्ध धर्म ने सबको समान मान कर आपसी एकता की बात की तो बड़ी संख्या में लोग बौद्ध मत के अनुयायी बनने लगे। अभी कुछ ही दशक पूर्व डाक्टर भीमराव आम्बेडकर ने भारी संख्या में अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध मत को अंगीकार किया ताकि हिन्दुओं समाज में उन्हें बराबरी का स्थान प्राप्त हो सके। बौद्ध मत के समानता के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप देना आज भी बहुत आवश्यक है। हिन्दुओं धर्म में आई कुरीतियों का विरोध करने के कारण कुछ विद्वान बौद्ध मत को हिन्दुओं धर्म से पृथक नहीं मानते। उनके विचार में मूलत: बौद्ध मत हिन्दुओं धर्म के अनुरूप ही रहा और हिन्दुओं धर्म के भीतर ही रह कर महात्मा बुद्ध ने एक क्रान्तिकारी और सुधारवादी आन्दोलन चलाया।

बौद्ध धर्म हर प्रकार के भेद भाव से सर्वथा मुक्त रहा। किसी भी प्रकार के भेद को निर्वाण के मार्ग में बाधा नहीं माना गया। गौतम बुद्ध ने अत्यन्त कुशलता से बौद्ध भिक्षुओं को संगठित किया और लोकतांत्रिक रूप में उनमें एकता की भावना का विकास किया। इसका अहिंसा का सिद्धांत इतना लुभावना था कि सम्राट अशोक ने दो वर्ष बाद इससे प्रभावित होकर बौद्ध मत को स्वीकार किया और युद्धों पर रोक लगा दी। इस प्रकार बौद्ध धर्म को राजाश्रय प्राप्त हो गया। सिद्धार्थ का क्षत्रिय कुल इस धर्म का संरक्षक बना और बौद्ध मत देश की सीमाएँ लांघ कर विश्व के कोने-कोने तक अपनी ज्योति फैलाने लगा। आज भी इस धर्म की मानवतावादी, बुद्धिवादी और जनवादी परिकल्पनाओं को नकारा नहीं जा सकता और इनके माध्यम से भेद भावों से भरी व्यवस्था पर ज़ोरदार प्रहार किया जा सकता है। यही धर्म आज भी दु:खी एवं अशान्त मानवता को शान्ति प्रदान कर सकता है। ऊँच नीच के अभाव में लोगों के मन में धार्मिक एकता का विकास कर सकता है। विश्व शान्ति एवं परस्पर भाईचारे का वातावरण निर्मित करके कला, साहित्य और संस्कृति के विकास के मार्ग को प्रशस्त कर सकता है।

भगाणा कांड के पीड़ितों ने इंसाफ की मांग की…By बेधड़क न्यूज

 

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भगाणा कांड के पीड़ितों ने इंसाफ की मांग की,,…..By बेधड़क न्यूज
****************************************************************************नई दिल्ली, 11 मई। हरियाणा के भगाणा गांव में सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई चार नाबालिगों के हक में न्याय की मांग के समर्थन में आज पीड़ितों के साथ भारी संख्या में दिल्ली के सामाजिक कार्यकता, बुद्धिजीवी और विद्यार्थी भी जुटे। यहां दिल्ली में पंत मार्ग पर स्थित हरियाणा के मुख्यमंत्री आवास पर धरना देते हुए आंदोलनकारियों ने पीड़ितों के प्रति हरियाणा सरकार के रवैए की तीखी आलोचना की और कहा कि ऐसा लगता है कि हरियाणा सरकार सामंती उत्पीड़नकर्ताओं के पक्ष में खड़ी हो गई है और दलितों-पीड़ितों की आवाज को जानबूझ कर दफन किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर जुटे लोगों ने यहां दिल्ली में सरकार और प्रशासन से यह मांग की कि पीड़ितों पर जुल्म ढाने वाले दोषियों को सख्त सजा दी जाए और फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन कर पीड़ितों को जल्द से जल्द इंसाफ दिलाई जाए।
आंदोलनकारी हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुडा से मिलना चाहते थे, लेकिन भारी संख्या में पुलिस बल ने बैरिकेड लगाकर उन्हें रोक दिया। इसके बाद आंदोलनकारियों ने अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस के कई बैरिकेड तोड़ डाले और आक्रोश से भर कर वहीं हरियाणा सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारे लगाए। जब आंदोलनकारियों का गुस्सा नहीं थमा तो उनमें से दस लोगों के प्रतिनिधिमंडल को हरियाणा के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव सुरेंद्र दहिया से बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन उन्हें कार्रवाई का भरोसा नहीं दिया। इस पर आंदोलनकारियों का गुस्सा और क्षोभ और बढ़ गया तब फिर दुबारा सात लोगों के प्रतिनिधिमंडल को बुलाया गया, जिसने सुरेंद्र दहिया के सामने जोरदार तरीके से हरियाणा और खासकर भगाणा में दलितों पर होने वाले अत्याचारों का ब्योरा दिया और जल्द कानूनी कार्रवाई करने के साथ-साथ पीड़ितों को मुआवजा देने और उनके पुनर्वास की मांग की। इसके बाद राजनीतिक सचिव की ओर से अगले बहत्तर घंटों के भीतर मांगों पर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया गया।
विरोध प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने भगाणा में पीड़ित किशोरियों के सामूहिक बलात्कार में शामिल अपराधियों को संरक्षण देने वाले गांव के सरपंच और उसके साथियों को भी तत्काल गिरफ्तार करने की मांग की। भगाणा कांड सघर्ष समिति के प्रवक्ता जगदीश काजला ने कहा कि भगाणा की इन पीड़ित बच्चियों और परिवारों के साथ हुई यह घटना हरियाणा में दबंगों के आतंक की एक छोटी बानगी है। काजला ने कहा कि जिस गांव में दबंगों ने दलित परिवारों का सम्मान से जीना असंभव कर दिया है, वे वहां लौटना चाहते, इसलिए उन्हें वहां से अलग बसाने की व्यवस्था की जाए। बलात्कार पीड़ित एक बच्ची की मां सोना ने कहा कि हरियाणा में हमें इंसाफ नहीं मिला तो हम दिल्ली के जंतर मंतर पर आए कि यहां हमारी आवाज सुनी जाएगी, लेकिन अब एक महीने होने जा रहा है, आज तक केंद्र सरकार या दिल्ली या फिर हरियाणा के प्रशासन या किसी नेता ने हमारा दुख समझने और यहां तक बात करने तक की भी कोशिश नहीं की। सोना ने आगे कहा कि हम देश और प्रशासन से पूछना चाहते हैं कि क्या दलितों का कोई सम्मान नहीं होता, उनकी बेटियां क्या बेटी नहीं होती हैं?
भगाणा गांव की एक वृद्ध महिलाए गुड्डी ने कहा कि जिन बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, उनके सम्मान और गरिमा के खिलाफ अपराध हुआ, वे खुद दिल्ली के जंतर मंतर पर न्याय की आस में बैठी है, लेकिन केंद्र या राज्य सरकार या किसी भी प्रशासन को इनकी बात सुनने की जरूरत महसूस नहीं हुई। विरोध प्रदर्शन के आखिर में भगाणा कांड संघर्ष समिति ने कहा है कि अगर इस मामले में पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हुआ, तो हम देशव्यापी आंदोलन छेड़ने के लिए तैयार हैं।भगाणा कांड संघर्ष समिति
जगदीश काजला
09812034593
https://www.facebook.com/bedharaknews?fref=photo

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मित्रों,बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर ढेर सारी शुभकामनाएं.इस अवसर को यादगार बनाने के लिए आज के ही दिन जेएनयू के पेरियार होस्टल में रात्रि ९ बजे ‘भगाणा की निर्भयायें’पुस्तक रिलीज हो रही है.यदि मुमकिन हो तो इस अवसर पर उपस्थित रहकर भगाणा पीड़ितो के न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे लोगों का हौसला अफजाई करें.
कार्यक्रम
‘भगाणा की निर्भयाएं’ पुस्‍तक का लोकार्पण और ‘कैसे हो दलित उत्‍पीडन का प्रतिकार?’ पर परिचर्चा।
दिनांक : 14 मई। रात 9.15 बजे, पेरियार हॉस्‍टल, जेएनयूमुख्‍य अतिथि : ढाबारा कांड की नायिका आशा व भगाणा की नायिकाएं।
वक्‍ता :
1. वीर भारत तलवार (जेएनयू)
2. वेदपाल तंवर (सामाजिक कार्यकर्ता व अध्‍यक्ष, सर्व समाज संघर्ष समिति, हरियाणा)
3. एचएल दुसाध (पुस्‍तक के संपादक)
4. गंगा सहाय मीणा (जेएनयू)
5.शत्रुघ्‍न प्रसाद (इग्‍नू)
6. कल्‍पना शर्मा ( स्‍वतंत्र पत्रकार)आयोजक : बहुजन डायवर्सिटी मिशन और ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंट फोरम

हरियाणा में हिसार जिले के भगना गांव में दलित महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ हुड्डा के दिल्ली आवास पर प्रदर्शन, लाठीचार्ज

हुड्डा के दिल्ली आवास पर प्रदर्शन, लाठीचार्ज
हरियाणा में दलित महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ महिलाओं ने मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डïा के नयी दिल्ली स्थित आवास के बाहर रविवार को प्रदर्शन किया। -प्रेट्र
गुडग़ांव, 11 मई (हप्र)
हिसार जिले के भगना गांव में 4 अनुसूचित लड़कियों के साथ कथित तौर पर गैंगरेप से गुस्साये दलित ने सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दिल्ली स्थित आवास पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने जब इस मामले को लेकर सीएम से मिलने की जिद की तो पुलिसकर्मियों के साथ उनकी भिडं़त हो गई। इस दौरान पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर प्रदर्शनकारियों को वहां से खदेड़ दिया। उस समय सीएम अपने आवास में ही थे।
गुस्साई महिलाओं ने पुलिस के बैरीकेड्स गिरा दिए और इन्हें तोड़कर सीएम की कोठी में प्रवेश करने का प्रयास तो पुलिस ने बल प्रयोग करना शुरू कर दिया। दलित नेताओं का आरोप है कि लाठी चार्ज में 30 से अधिक महिलाओं व अन्य प्रदर्शनकारियों को चोटें आयीं।

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http://dainiktribuneonline.com/2014/05/%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%A1%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AA/