बुद्धा कहानी गाठें और हमारे जीवन में दुखों के छह मूल कारन और निवारण…समयबुद्धा

buddha28_medएक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.

बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.

सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”

शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”

“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”

“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.

“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”

शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता| एक बार ठीक से पता कर लेने के बाद इन गाठों को खोलने का संगर्ष शुरू कर देना चाहिए,जिस गाँठ को जितना संगर्ष चाहिए जब उसको खोलने में हम उतना संगर्ष लगा देंगे तब वह खुल जाएगी|”

“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.

“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम अपने जीवन के दुखों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन दुखों में कैसे पड़े?”

अगर कोई उनको उनके दुःख का सही करब बताये तो ये लोग उससे घृणा कर दूरी बना लेते हैं| इतना ही नहीं अपने दुखों को दूर करने हेतु ये लोग सही इलाज़ करने की बजाये लघुपथ खोजते हुए ये लोग ईश्वरवादी हो लेते हैं , पुरोहित और ज्योतिष के चंगुल में फास जाते हैं| ये परजीवी धूर्त लोग नाना प्रकार के प्रपंच रचकर इन दुखों लोगों को लूटते और शोषण करते हैं| ऐसे में इनका दुःख दूर होने की बजाये और बढ़ जाता है|
जहाँ अन्ये dharmon का मूल उद्देश्ये ईश्वरवाद के नाम पर भोली भली जनता पर शाशन करना होता है वही बौद्ध धम्म का मकसद है की कैसे मानवता के दुखो को दूर kiya jaaye | इसीलिए गौतम बुद्ध ने *चार आर्य सत्यबुद्ध का पहले धर्मोपदेश, अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, निम्न चार आर्य सत्यों के बारे में था ।

१. दुःख : इस दुनिया में दुःख व्याप्त है – जैसे जन्म, बीमारी, बूढे होने, मौत, बिछड़ने , नापसंद,चाहत सब में दुःख है ।
२. दुःखप्रारंभ : तृष्णाया अत्यधिक चाहतदुःख का मुख्य कारण है

३. दुःखनिरोध : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
४. दुःखनिरोधकामार्ग : तृष्णा से मुक्ति अष्टांग मार्ग के अनुसार जिन्दगी जीने से पाई जा सकती है ।

 

 

संसार के सभी दुखों का मूल रूप से निम्न पांच ही कारन होते हैं:

-गैरजरूरी हिंसा (unnecessary Violence)gajah_putih_
-चोरी  (steel)
-व्यभिचार (sex misconduct)
-असत्य  (False statements)
-मादक पदार्थॊं सेवन (Drugs,hard drinks etc.)

बौद्ध धम्म में बुद्ध में मानव दुखों के कारणों पर गहन शोध करके ये पांच कारन खोजे और संसार को दुःख मिटाने के लिए पंचशील सिद्दांत प्रतिपादित किया |बुद्ध के पंचशील सिद्धांत के अनुसार मनुष्ये को :

प्रागैरजरूरी हिंसा से विरत (दूर) रहना चाहिए ।
चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने से विरत(दूर) रहना चाहिए ।
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत(दूर) रहना चाहिए ।
असत्य बोलने से विरत(दूर) रहना चाहिए ।
मादक पदार्थॊं से विरत(दूर) रहना चाहिए ।

ये पांच कारन व्यक्तिगत होते हैं,जिनपर एक व्यक्ति का वस होता है,वो चाहे तो व्यक्तिगत संगर्ष से इनपर विजय प्राप्त कर सकता है |

मैं समयबुद्धा आपसे कहते हूँ की इनके आलावा दुखों का छठा कारन भी होता है-” गलत सरकारी नीतियां “, ये हमारे दुखों का बहुत बड़ा कारन होता है|

गलत सरकारी नीतियां ही वो वजह है जिनके कारन कुछ लोग बहुत ज्यादा अमीर और साधन संपन्न हैं जबकि जनता का बहुत बड़ा हिस्सा दुखी है, पोषण,शिक्षा और देश के संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी तो बहुत दूर की बात है, पेट भर भोजन भी उनको नहीं मिल पता| इस छटे कारन का निवारण व्यक्तिगत संगर्ष से नहीं पाया जा सकता इसके लिए समूहित संगर्ष करना होता है, इसलिए बुद्ध ने भी कहा है संघम शरणम् गच्छामि, डॉ आंबेडकर ने भी कहा है संगठित रहो|
अपने दुखों से निजात पाने के लिए आपको इसकी जड़ में वार करना होगा और जड़ है राजनीती, आपको राजनीति में बाद चढ़कर जिससे लेना होगा| जो लोग राजनीती में सक्रिय होते हैं वो इस छटे दुःख का इलाज कर पते हैं|

आज के समय राजनैतिक हिस्सेदारी तलवार से कम और मताधिकार से ज्यादा होती है| ऐसे में बहुजन समाज को चाहिए की वो विरोधियों भेड़ियों को पहचानने में धोखा न खाए|ये हर बार भेड़ की खेल पहन कर आये हैं मतलब नए नाम. नए चहेरे, नयी बातें पर इनकी नीति और नियत न ही सदियों से बदली है न ही बदलेगी| मीडिया के बहकावे में न आएं अम्बेडकरवादी पार्टी को ही चुने वार्ना आप अपने और अपने आने वाली पीढ़ियों की गर्दन पर कुल्हाड़ी मार लोगे | हे बहुजनों आपको भी अपनी इच्छा शक्ति और संगठन शक्ति दिखानी ही होगी वार्ना आप छटे दुःख से नहीं बच पाओगे| आपके विरोधी अगर सत्ता में आगये तो वो ऐसी नीतियां बनाएंगे की आपका सदियों का संगर्ष व्यर्थ कर आपको सदियों पीछे धकेल देंगे| बहुजन विरोधी किस प्रकार एक नीति बनाकर आपके सदियों के संगर्ष की कमर तोड़ देते हैं इसको समझने के लिए निम्न उदाहरण देखिये:

आप हर तरफ से गुलाम बनते जा रहे हो और आपको पता भी नहीं चल रहा, यही तो है ब्राह्मणवाद, आज सारी संवेधानिक संस्थाएं नाकाबिल कर दी गयीं हैं और उनके मुकाबले ब्राह्मणवादी संस्थाएं खड़ी कर दी गयीं हैं| उदाहरण के लिए सरकती टीवी रेडियो चैनल, अखबार की जगह  कई प्राइवेट चैनल, अखबार जो केवल ब्राह्मणवादी अजेंडे का प्रचार करते हैं| सरकारी स्कूल विफल, ये बहुजनों को सिर्फ मजदूर बना रहे हैं, प्राइवेट स्कूल में गुरुकुल की तरह केवल राजा सेठ और पुरोहित के बच्चे पड़ते हैं|बीमार हो जाओ तो इलाज को सरकारी अस्पताल विफल कर दिया गए हैं और प्राइवेट में जिसके पास पैसा है वही इलाज करा सकता है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी अब ब्राह्मणवादियों की,सरकारी एयरलाइन्स विफल अब नज़र रेल पर, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है, समझदार के लिए इशारा ही काफी है|चलो ये तो होना ही था पर ये क्या बात है की इन सबके मालिक केवल ब्राह्मणवादी ही हो सकते हैं, मूलनिबासी नहीं|होना ये चाहिए की जिसकी जितनी जनसँख्या उसकी उतनी भागीदारी| जानते हैं गुलामी क्या है, वही पहले जैसे दिन आ गए बस नाम और रूप बदल गया, जैसे पहले आप अपने जीवन की हर चीज़ के लिए ब्राह्मणवादी पर निर्भर थे, जैसे काम उनके खेतों में, बाजार उनकी दुकानों से, कर्ज इन्ही साहूकारों से, आदि आदि वैसे ही आज है | सोचिये जब बच्चा पैदा होता है तो किसी ब्राह्मणवादी के हस्पताल में, फिर स्कूल पढ़ने जाता है ब्राह्मणवादी के स्कूल में फिर कॉलेज जाता है ब्राह्मणवादी की यूनिवर्सिटी फिर नौकरी करता है ब्राह्मणवादी की कंपनी में, अभी तो ठीक है पर धीरे धीरे सिकंजा कसता जाएगा और आप ब्राह्मणवादियों के इशारे पर जीने मरने को पहले की तरह मजबूर हो जायेंगे|राष्ट्रीय संपत्ति या संसाधनों का ये अनुचित बटवारा ही तो मानवता के दुःख का मूल कारन है, यही तो बौद्धों ने दुःख का मूल कारन बताया है, और इसके खिलाफ जो क्रांति थी वही तो बौद्ध धम्मथा और है, इसके आलावा तो सब ब्राह्मणवादी मिलावट है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने पुस्तक ‘कार्ल मार्क्स और बुद्ध’ लिखी इसीलिए उन्होंने कहा है की बौद्ध धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है| जागो कब तक सोये रहोगे, ये मजे जो ले रहे हो ज्यादा दिनों के लिए नहीं हैं सावधान!!

गुज़रे ज़माने में बहुजनों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था | गुरुकुल शिक्षा व्यस्था के माध्यम से ज्ञान केवल सत्ताधारी और उसके सहयोगियों के बीच ही सदियों तक घूमता रहा|परिणाम आम जनता कभी समझ ही नहीं पायी की दिन रात मेहनत और ईमानदारी से जीने के बावजूद उनके हिस्से सिर्फ महा-दुःख ही क्यों आये| हमारे लोगों ने सदियों शिक्षा के लिए संगर्ष किया और आखिरकार अंग्रेजों के सरक्षण में बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने संविधान में सबके लिए सार्वजानिक शिक्षा की व्यस्था और शिक्षा का अधिकार मनुवादियों से छीनकर सुनिश्चित कर दिया|परिणाम ये हुआ की आम जनता समझने लगी की उनके जीवन का दुःख किसी इश्वर का दिया नहीं अपितु गलत सरकारी निति की वजह से है जिसका समाधान भी इश्वर नहीं राजनीति ही करेगी और उन्होंने राजनीती में हिस्सा लेना शुरू कर दिया|ये बात इस देश के धम्म-विरोधियों मनुवादियों को अच्छी नहीं लगी और सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था (सरकारी स्कूल) आज संविधान लागू होने के लगभग साठ साल के अन्दर ही महत्व हीन कर दी गई और गुरुकुल शिक्षा व्यस्था को अंग्रेजी स्कूल के नए रूप में लागू कर दिया गया|सरकारी स्कूल में अक्सर देखा गया है की न तो वहां पढ़ाने वाले हैं न पढने वाले|पहले ज़माने के अनपढ़ के समतुल्य आज सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था से निकले व्यक्ति से की जा सकती है और गुरुकुल के से पास सत्ताधारी की तुलना आज के प्राइवेट स्कूल से पास हो रहे लोगों से की जा सकती है|

हमारे बहुत से बहुजन सरकारी अध्यापक हैं वे भी इसी रंग में हैं पढ़ाते नहीं जबकि ऐसे स्कूलों में सबसे ज्यादा बहुजन के बच्चे ही पढ़ते हैं|मैं बहुजन अध्यापकों से अपील करता हूँ की बहुत ज्यादा नहीं पर जितना सिलेबस है उतना तो इमानदारी से पढ़ा ही दो,आपकी कमाई भी सार्थक होगी और बहुजनों का भला भी होगा|

आप हर तरफ से गुलाम बनते जा रहे हो और आपको पता भी नहीं चल रहा, यही तो है ब्राह्मणवाद, आज सारी संवेधानिक संस्थाएं नाकाबिल कर दी गयीं हैं और उनके मुकाबले ब्राह्मणवादी संस्थाएं खड़ी कर दी गयीं हैं| उदाहरण के लिए सरकती टीवी रेडियो चैनल, अखबार की जगह कई प्राइवेट चैनल, अखबार जो केवल ब्राह्मणवादी अजेंडे का प्रचार करते हैं| सरकारी स्कूल विफल, ये बहुजनों को सिर्फ मजदूर बना रहे हैं, प्राइवेट स्कूल में गुरुकुल की तरह केवल राजा सेठ और पुरोहित के बच्चे पड़ते हैं|बीमार हो जाओ तो इलाज को सरकारी अस्पताल विफल कर दिया गए हैं और प्राइवेट में जिसके पास पैसा है वही इलाज करा सकता है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी अब ब्राह्मणवादियों की,सरकारी एयरलाइन्स विफल अब नज़र रेल पर, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है, समझदार के लिए इशारा ही काफी है|चलो ये तो होना ही था पर ये क्या बात है की इन सबके मालिक केवल ब्राह्मणवादी ही हो सकते हैं, मूलनिबासी नहीं|होना ये चाहिए की जिसकी जितनी जनसँख्या उसकी उतनी भागीदारी| जानते हैं गुलामी क्या है, वही पहले जैसे दिन आ गए बस नाम और रूप बदल गया, जैसे पहले आप अपने जीवन की हर चीज़ के लिए ब्राह्मणवादी पर निर्भर थे, जैसे काम उनके खेतों में, बाजार उनकी दुकानों से, कर्ज इन्ही साहूकारों से, आदि आदि वैसे ही आज है | सोचिये जब बच्चा पैदा होता है तो किसी ब्राह्मणवादी के हस्पताल में, फिर स्कूल पढ़ने जाता है ब्राह्मणवादी के स्कूल में फिर कॉलेज जाता है ब्राह्मणवादी की यूनिवर्सिटी फिर नौकरी करता है ब्राह्मणवादी की कंपनी में, अभी तो ठीक है पर धीरे धीरे सिकंजा कसता जाएगा और आप ब्राह्मणवादियों के इशारे पर जीने मरने को पहले की तरह मजबूर हो जायेंगे|राष्ट्रीय संपत्ति या संसाधनों का ये अनुचित बटवारा ही तो मानवता के दुःख का मूल कारन है, यही तो बौद्धों ने दुःख का मूल कारन बताया है, और इसके खिलाफ जो क्रांति थी वही तो बौद्ध धम्मथा और है, इसके आलावा तो सब ब्राह्मणवादी मिलावट है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने पुस्तक ‘कार्ल मार्क्स और बुद्ध’ लिखी इसीलिए उन्होंने कहा है की बौद्ध धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है| जागो कब तक सोये रहोगे, ये मजे जो ले रहे हो ज्यादा दिनों के लिए नहीं हैं सावधान,आओ संगठित होकर सवेधानिक तंत्र को चलायें और अपने छटे  दुःख से मुक्ति पाएं…समयबुद्धा https://samaybuddha.wordpress.com/

आओ संगठित होकर सवेधानिक तंत्र को चलायें और अपने छटे  दुःख से मुक्ति पाएं

…समयबुद्धा

BAHUJAN HITAYE, BAHUJAN SUKHAY

Advertisements

12-JULY-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: एक कडवा सच-भारत के दलित अपनी दुर्दशा के जिम्मेदार हैं ….समयबुद्धा

2

मेरा पसंदीदा  भगवान् बुद्धा का कथन इस प्रकार है:

अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराने से यह पता चलता है कि व्यक्ति में सुधार की आवश्यकता है,स्वयं को दोषी ठहराने से यह पता चलता है कि सुधार आरंभ हो गया है,और किसी को भी दोषी नहीं ठहराने का अर्थ यह है कि सुधार पूर्ण हो चुका है|”

मैं आपको कडवा सच बताऊ तो इस सब दुर्दशा का सीधा जिमेदार बहुजन लोग खुद ही हैं| सारे संसार का इतिहास उठा कर देख लो कभी किसी कौम का कभी किसी कौम की सत्ता आती जाती रहती है, पर ऐसे क्या वजह है की एक बात इनके हाथों से सत्ता छूटी तो बस आज तक नहीं आ पा रही है| इसकी दो वजह हैं:

१.न केवल परास्त  किया बल्कि अपने कूटनीति और ज्ञान से ये सुनिश्चित किया की आगे ये लोग सर न उठा सके

२. बहुजन लोग अमन के दिनों में  संगठित होकर संगर्ष नहीं करते

आप खुद अपने आप को एक न्यायकर्ता की जगह रखकर एक बहुजन और एक सवर्ण की हरकतों आदतों और चाल चलन का अद्ययन करके  देखिये आपको पता चल जायेगा की सवर्ण चाहे सुख हो या दुःख हो संगर्ष और संगठन जरी रखता है पर बहुजन सुख में सब भूल जाता है| इस तथ्य  को कई उदाहरण देकर भी यहाँ समझाया जा सकता है पर वो इस अद्याय के विषय सम्मत न होगा समझदार के लिए इशारा काफी है| मैं अपने निजी जीवन के लिहाज़ से भी कहों तो मुझे दलितों से खासकर मेरे अपने रिश्तेदारों से कभी कोई लाभ नहीं हुआ उल्टा कई मामलों ने नुक्सान ही मिला है| अगर किसी दलित ने मेरा साथ दिया तो वो वही है जिसे ये सारी बातों का अहसास है और वो संगठन के महत्व को समझता है|

अगर मेरी  किताब  “समयबुद्धा त्रिक्षमता सूत्र”  एक दलित को दे दो, एक सवर्ण को दे दो तो सवर्ण न केवल इससे लाभ उठा लेगा बल्कि वो ज्ञान की दशा और दिशा का  अंदाज़ा लगाकर  इस साहित्य के दमन की सोचेगा | जबकि अपनी जिन्दगी जोखिम  में डाल  कर जिनके लिए जिनके लिए ये साहित्य लिखा गया है  वो  इसका कोई लाभ नहीं उठा पायेगा, ऐसा क्यों ?

इसकी मुख्य  वजह केवल एक ही है  “कुछ दलितों का निकम्मापन” | दुसरे शब्दों में कहूं तो व्यक्तिगत,सामाजिक और कूटनीतिक क्षमता का न होना जो की इस पुस्तक का सर्वोपरि लक्ष्य है|

किसी भी व्यक्ति या कौम की दुर्दशा होने की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब वो तथ्यों या ज्ञान की बातों को ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करना शुरू करता है|आप खुद ये बात नोट करना की जो नाकामयाब व्यक्ति होगा वो ज्ञान की बात को पूरा सुनने से पहले ही ख़ारिज कर देगा,जबकी कामयाब आदमी हर बात को पहले सुनता है, सोचता है फिर उसे अपनाता या ख़ारिज करता है|संसार में सब कुछ है, ये हमपर है हम क्या चुनते हैं, चुनाव के लिए ज्ञान होना जरूरी है, ज्ञान के लिए जानना जरूरी है और जानने के लिए धैर्य से सुनना और समझना जरूरी है, समझने के लिए ध्यान देना जरूरी है|सोचो की स्कूल में एक से अध्यापक और शिक्षा के बावजूद कुछ कामयाब और कुछ नाकामयाब क्यों हो जाते हैं,जवाब वही है जो ध्यान देना या न देना|देखो अपने आस पास जो भी  गुलाम मानसिकता का व्यक्ति होगा वो अपने खाली समय में भी बजाये दिमाग पर जोर देने,सोचने, सुसंगति ढूंढने, पढ़ने,ज्ञान चर्चा आदि में शामिल होने के, वो गाना बजाने, बेफ़िजूत की बातों और धार्मिक बाबाओं या स्थलों के चक्कर काटने में अपना समय बर्बाद करेगा|ऐसे लोगों को समझाने की कोशिश करने वाले को दुखी और निराश, और कई बार जान से भी हाथ धोना पड़ता है क्योंकि मूर्ख से बड़ा और कोई दुश्मन नहीं|सदा ध्यान रहे की हमारा ‘नज़रअंदाज और अनसुना करना और ढीलमढाल रव्वैया हमारी दुर्दशा का मूल कारण है|संसार में दो ही तह के लोग है एक वो जो जीवन को अपने हिसाब से चलाते हैं, ये शाशक बनते हैं जो गुलामों के भाग्य का फैसला करते हैं |दुसरे वो जो ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करके जीवन के हिसाब से चलते हैं ये ही गुलाम हैं,आप सोचिये आप किनमे से हैं?ये एक कड़वा सच है की बहुजन उद्धार के मिशन को जितना खतरा ब्राह्मणवादी से है उससे कहीं ज्यादा खतरा मूर्ख दलित से है, वो सुनना और समझना ही नहीं चाहता, संगर्ष तो बाद की बात है|

कभी सोचा इतनी घृणा क्यों? आखिर इतना भी क्या बुरे हैं यहाँ के ये बहुजन लोग ? इसका सीधा जवाब है निकम्मापन| पर एक बात तय है की समाज में सभी निकम्मे  नहीं अगर ऐसा होता तो इतनी दमन के बावजूद ये कौम आज वर्चस्व में न होती | असल में इस कौम में जो संगर्ष कर रहा है वो तो जी जान से लगा है और बहुत ज्ञानी और मेहनती है पर जो नहीं कर रहे है उनका निकम्मापन इतना ज्यादा है की वो सारे संगर्ष को न केवल बर्बाद करता है बल्कि हमारे मेहनती लोगों को भी निकम्मों के क़तर में ला खड़ा करता है| यही है वो कारन जिसकी वजह से निम्नलिखित दो कहावते मशहूर हैं:

– दलित ही दलित का सबसे बड़ा दुश्मन होता है (पर सक्षम सक्षम का सबसे बड़ा साथी होता है)

– जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाला ज्यादा गुनाहगार होता है

हमारे लोगों की अहसान फरामोशी हमारे पतन का मुख्य कारन है, अहसान फरामोश लोग हर कौम में होते हैं उन्हें छोड़ो|ऐसा केवल हमारे समाज ही नहीं होता हर समाज में होता है,हिंदुत्व और उसके सवर्ण भी इससे अछूते नहीं हैं, हिंदुत्व के महाज्ञानी स्वामी विवेकानंदा ने इस विषय में कहा है

“यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।“

आज हमारे समाज में तीन तरह के लोग है-

१. अशिक्षित एव असक्षम वर्ग

२. शिक्षित वर्ग पर बहुजन संगर्ष से अपरिचित

३. शिक्षित,ज्ञानी,सक्षम और संगर्ष शील वर्ग

-इनमे से जो पहला वर्ग है वो जनसँख्या दबाव या भीड़ के रूप में सबसे ज्यादा संगर्ष को आगे ले जा रहा है |

-दूसरा वर्ग किसी काम का नहीं उल्टा ये विभीषण हैं |

-तीसरा वर्ग संगर्ष की अगुवाई करता है पर इन नए नए हुए ज्ञानियों में अपने आप को श्रेष्ट समझने और अन्य को हीन समझने का रोग लग गया है परिणाम मकसद एक होने के बावजूद ये लोग एक मंच पर नहीं आ पाते|

हमारा संगर्षबल है अपना शिक्षित और साधन संपन्न वर्ग, पर दुःख की बात ये है की वो अपने सुखों में इतना चूर है कि उसे संगर्ष कि जरूरत ही महसूस नहीं होती|अगर उससे संगर्ष कि बात करो तो ऐसे बिदक जाता है जैसे अपराध कर दिया हो|एक कहावत है-‘जाके पैर न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई’| जब इनके साथ अन्याय होता है तब इनको समाज क़ी याद आती है पर तब तक देर हो चुकी होती है| जिस समाज के शशक्तिकरन में इन्होने कोई योगदान नहीं दिया वो इनका लिए तब क्या कर सकेगा? इसके विपरीत मनुवादी लोग सुख में भी संगर्ष नहीं छोड़ते इसीलिए वो शासक हैं और हमारे लोग सुख में बावरे होकर सब भूल जाते हैं इसलिए शोषित होते हैं|क्या हम अपने शोषण के इस मूल कारण को कभी समझ पायेंगे?

हम सभी जानते हैं की इस देश में हर व्यक्ति हर वर्ग केवल अपने और अपनी कौम के संवर्धन में लगा है जिसके लिए देश की परवाह न करके किसी भी तरह खुद को सबसे ज्यादा

सक्षम बना लेना चाहता है, जिसके लिए भ्रस्टाचार द्वारा धनबल इकठ्ठा किया जा रहा है| ऐसे में हम क्या करें? हमें डर सिर्फ यही है की आज भ्रस्टाचार के मूल कारण ‘जातिगत वर्ग संगर्ष’ को छिपाकर उससे फैली अव्यस्था का मीडिया में प्रचार की गति हमारे संगर्ष की गति से तेज न निकले| धन और मीडिया के बल पर सोचे समझे षडीयंत्र के तहत जो अराजकता फैलाई जा रही है उसे संविधान की विफलता साबित किया जा सकता है| और तब हमारी भोली भली जनता संविधान विरोध कर के अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेगी|इसी लिए बाबा साहब  पहले ही कह गए थे “संविधान कितना ही अच्छा क्यों न हो उसे मानने वाले बुरे होंगे तो उसका लाभी नहीं हो पायेगा” | जनता का नाम लेकर सत्तापलट या  संविधान पलट न हो जाये,ऐसे होने पर हमारे विरोध और अपने पक्ष का संविधान या कानून बना लेंगे इसलिए सावधान!

मैं समझ सकता हूँ की हमारा सक्षम वर्ग किसी नेता की रैली में भीड़ बढ़ने का काम तो नहीं करेगा, पर वो उससे भी कहीं ज्यादा जरूरी काम कर सकता है| कुछ खास नहीं तो जो कर सकते हो वो तो करो जैसे: अम्बेडकरवाद को वोट करो,उन्हें चंदा दो,मिशन की किताबें खरीद कर अपने लोगों में बांटो,विचार और सुझाव देना, लेखन कार्य करना,एन जी ओ, ट्रस्ट, स्कूल में किसी मेधावी बहुजन को स्कॉलरशिप देना अदि| जो जिस लायक है उसे वही काम करना चाहिए, जो भीड़ बढ़ा सकता है वो भीड़ जो धन दे सकता वो धन, जो विचार दे सकता है वो विचार, कुछ तो करो संगर्ष के लिए सब कुछ जरूरी है|भगवान् बुद्धा ने कहा है की संसार में तीन प्रकार के लोग हैं:

“एक जो केवल अपना भला करते हैं दूसरों का नहीं,दुसरे जो अपना भला नहीं करते केवल दूसरों का भला करते हैं,तीसरे वो जो अपना भी भला करते हैं दूसरों का भी ये ही श्रेष्ठ हैं|”

इनमें से हमें तीसरा बनना है|बिना जमीन वालों को आंबेडकर मिशन ने जमीन के पट्टे दिलाये, बिना नौकरियों वालों को नौकरी करने लायक बनाया और नौकरियां दिलाईं|अब ये लोग उस मिशन के लिए कुछ न करें तो क्या समस्त कौम पतन की तरफ नहीं चली जाएगी|बहुजनों को सम्पन्न होना विरोधयों को खटक रहा है और अन्दर ही अन्दर वो दमन निति बना और चला रहे हैं, अगर ये सफल हो गए तो क्या होगा कभी सोचा?|पता नहीं हमारे सक्षम लोग ये क्यों नहीं समझते की जब भी बहुजनों का दमन किया जाएगा इनको भी बक्शा नहीं जाएगा|

१८ मार्च १९५६ को को बाबासाहब आंबडेकर ने दुःखी होकर आगरा के बेजमीन वाले लोगों (बहुजन समाज) को इकट्ठा करके उन्होंने ऐलान किया कि:

  “अंग्रेजों ने मेरी बात मान ली थी, लेकिन दुनिया की हालत बदलने के कारण उनको देश छोड़ना पड़ा. अंग्रेज चले गये| जिन लोगों के हाथों में जमीन आयी वो कहते है अगर बेजमीन वाले लोगों को हमने खेत दे दिये तो हमारे खेतों में मझदूरी कौन करेगा,इसलिए मैं मजबूर हूं| बाबासाहब आंबेडकर ने उस वक्त १८ मार्च १९५६ को आगरा में दुःखी होकर लाखों बेजमीन वाले लोगों से कहा कि, ये काम, जिसकी अंग्रेजो ने हाँ भरी थी की, हमारे लिए वो सेपरेट इलेक्टोरेट बनायेंगे, सेपरेट सेटलमेन्ट बनायेंगे, अलग से हमारे रहने के लिए बस्तियां बनायेंगे, जिनमें हम करोड़ो लोग रहेंगे, और अपने बलबूते पर अपने एम.एल.एम. चुनकर भेजेंगे, और लोकल सेल्स गवरनमेंट खुद चलायेंगे.. इस बात को अंग्रेजों ने मान लिया था, लेकिन आज की सरकार नहीं मान रही है| मेरा ज्यादा समय पढ़ाई-लिखाई के मामले में रिजरवेशन के मामले में हमारे समाज में इंजिनिअर, डाक्टर, वकील पैदा हो, अधिकारी पैदा हो, कर्मचारी पैदा हो, इसमें मेरा बहुत ज्यादा समय लग गया है| लेकिन मैं आज देख रहा हूं कि ये पढ़े-लिखे कर्मचारी, ये तो एक क्लास (वर्ग) बनकर रह गये, एक अलग कास्ट बनकर रह गये है. जिन लोगों में ये पैदा हुए है, उन लोगों का इनको कोई ख्याल नहीं है. हमारा गरीब समाज नीचे की ओर जा रहा है, और ये अधिकारी लोग ऊपर को जा रहे है, इन दोनों का कोई मेल-मिलाप नहीं है| इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि, इस बढ़ती हुई उम्र में मैं लाठी लेकर आगे-आगे चलूंगा, और आप लोग मेरे पीछे-पीछे चलें| अपने लोगों की बस्तियां बनाना, ये हमारी जरुरत है, आज की सरकार यह नहीं करना चाहती है, ये काम हमारा है, हमारी जरुरत है, हमारी जरुरत हमें ही पूरी करनी होगी|”

मान्यवर कांशीरामजी ने ७ जुलाई २००२ को दिल्ली के रामलिला मैदान में नारा लगाना शूरू किया था:

“जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है..” हम लोगों ने बाबासाहेब आंबेडकर के प्रयासों से प्रेरित होकर, जो हमें वोट का अधिकार लेकर दिया, उस वोट के अधिकार को ध्यान में रखकर हम लोगों ने नारा बनाया है, “वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा”

आज हमारे लोग चौधरी बन कर उन्हीं विभिन्न धर्म स्थलों, सत्संग अदि को अपना समय और दान दे रहे हैं जहाँ हमारे दमन निति के सृजक बैठे हैं| हमारे लोग ये क्यों भूल जाते है की इनका नाम और रूप बदल जाता है पर नियत कभी नहीं बदलेगी| पता नहीं हमारे सक्षम लोग ये कब समझेंगे की आज जिस खुशहाली से वो जीवन बिता रहे हैं उसके लिए बहुत ज्यादा संगर्ष हुआ है जिसको आगे ले जाना इनका कर्तव्य है| बाबा साहेब ने हमें जो उपलब्धियां दिलायीं उनका आनंद तो लेते हो पर उनके संगर्ष से भी तो कुछ प्रेरणा भी तो लो, बाबा साहेब की निम्न  पंक्तियाँ देखिये:

“जब मेरे प्यारे बेटे गंगाधर का बीमारी के कारण निधन हुआ, तब उसके मृतदेह को ढकने के लिए नए कपडे लाने के लिए लोगो ने मेरे से पैसे मांगे, पर मेरे पास उतने भी पैसे नहीं थे तब मेरी पत्नी ने उसकी साडी का एक टुकड़ा फाड कर दिया ..और हम गंगाधर को स्मशान ले गए .मेने मेरी जिंदगी में गरीबी के जो दिन देखे है, वो भारत के किसी नेता ने नहीं देखे होंगे ..फिर भी मेने मेरी गरीबी के कारण कभी मेरा आत्म-सन्मान और मेरे आन्दोलन को कभी पीछे हटने नहीं दिया . ऐसी गरीबी में भी मेने अपने आप को किसी के हाथो बिकने नहीं दिया…डॉ. आंबेडकर|

जो भी हो मैं कोशिश जरी रखूंगा , मैं मिशन को प्रचार,समय,विचार,दिशा, और लेखन दे सकता हूँ तो दे रहा हूँ |मुझे यकीन है इस मिशन से समाज को फायदा अवश्य होगा|

 

…..समयबुद्धा