12-JULY-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: एक कडवा सच-भारत के दलित अपनी दुर्दशा के जिम्मेदार हैं ….समयबुद्धा


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मेरा पसंदीदा  भगवान् बुद्धा का कथन इस प्रकार है:

अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराने से यह पता चलता है कि व्यक्ति में सुधार की आवश्यकता है,स्वयं को दोषी ठहराने से यह पता चलता है कि सुधार आरंभ हो गया है,और किसी को भी दोषी नहीं ठहराने का अर्थ यह है कि सुधार पूर्ण हो चुका है|”

मैं आपको कडवा सच बताऊ तो इस सब दुर्दशा का सीधा जिमेदार बहुजन लोग खुद ही हैं| सारे संसार का इतिहास उठा कर देख लो कभी किसी कौम का कभी किसी कौम की सत्ता आती जाती रहती है, पर ऐसे क्या वजह है की एक बात इनके हाथों से सत्ता छूटी तो बस आज तक नहीं आ पा रही है| इसकी दो वजह हैं:

१.न केवल परास्त  किया बल्कि अपने कूटनीति और ज्ञान से ये सुनिश्चित किया की आगे ये लोग सर न उठा सके

२. बहुजन लोग अमन के दिनों में  संगठित होकर संगर्ष नहीं करते

आप खुद अपने आप को एक न्यायकर्ता की जगह रखकर एक बहुजन और एक सवर्ण की हरकतों आदतों और चाल चलन का अद्ययन करके  देखिये आपको पता चल जायेगा की सवर्ण चाहे सुख हो या दुःख हो संगर्ष और संगठन जरी रखता है पर बहुजन सुख में सब भूल जाता है| इस तथ्य  को कई उदाहरण देकर भी यहाँ समझाया जा सकता है पर वो इस अद्याय के विषय सम्मत न होगा समझदार के लिए इशारा काफी है| मैं अपने निजी जीवन के लिहाज़ से भी कहों तो मुझे दलितों से खासकर मेरे अपने रिश्तेदारों से कभी कोई लाभ नहीं हुआ उल्टा कई मामलों ने नुक्सान ही मिला है| अगर किसी दलित ने मेरा साथ दिया तो वो वही है जिसे ये सारी बातों का अहसास है और वो संगठन के महत्व को समझता है|

अगर मेरी  किताब  “समयबुद्धा त्रिक्षमता सूत्र”  एक दलित को दे दो, एक सवर्ण को दे दो तो सवर्ण न केवल इससे लाभ उठा लेगा बल्कि वो ज्ञान की दशा और दिशा का  अंदाज़ा लगाकर  इस साहित्य के दमन की सोचेगा | जबकि अपनी जिन्दगी जोखिम  में डाल  कर जिनके लिए जिनके लिए ये साहित्य लिखा गया है  वो  इसका कोई लाभ नहीं उठा पायेगा, ऐसा क्यों ?

इसकी मुख्य  वजह केवल एक ही है  “कुछ दलितों का निकम्मापन” | दुसरे शब्दों में कहूं तो व्यक्तिगत,सामाजिक और कूटनीतिक क्षमता का न होना जो की इस पुस्तक का सर्वोपरि लक्ष्य है|

किसी भी व्यक्ति या कौम की दुर्दशा होने की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब वो तथ्यों या ज्ञान की बातों को ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करना शुरू करता है|आप खुद ये बात नोट करना की जो नाकामयाब व्यक्ति होगा वो ज्ञान की बात को पूरा सुनने से पहले ही ख़ारिज कर देगा,जबकी कामयाब आदमी हर बात को पहले सुनता है, सोचता है फिर उसे अपनाता या ख़ारिज करता है|संसार में सब कुछ है, ये हमपर है हम क्या चुनते हैं, चुनाव के लिए ज्ञान होना जरूरी है, ज्ञान के लिए जानना जरूरी है और जानने के लिए धैर्य से सुनना और समझना जरूरी है, समझने के लिए ध्यान देना जरूरी है|सोचो की स्कूल में एक से अध्यापक और शिक्षा के बावजूद कुछ कामयाब और कुछ नाकामयाब क्यों हो जाते हैं,जवाब वही है जो ध्यान देना या न देना|देखो अपने आस पास जो भी  गुलाम मानसिकता का व्यक्ति होगा वो अपने खाली समय में भी बजाये दिमाग पर जोर देने,सोचने, सुसंगति ढूंढने, पढ़ने,ज्ञान चर्चा आदि में शामिल होने के, वो गाना बजाने, बेफ़िजूत की बातों और धार्मिक बाबाओं या स्थलों के चक्कर काटने में अपना समय बर्बाद करेगा|ऐसे लोगों को समझाने की कोशिश करने वाले को दुखी और निराश, और कई बार जान से भी हाथ धोना पड़ता है क्योंकि मूर्ख से बड़ा और कोई दुश्मन नहीं|सदा ध्यान रहे की हमारा ‘नज़रअंदाज और अनसुना करना और ढीलमढाल रव्वैया हमारी दुर्दशा का मूल कारण है|संसार में दो ही तह के लोग है एक वो जो जीवन को अपने हिसाब से चलाते हैं, ये शाशक बनते हैं जो गुलामों के भाग्य का फैसला करते हैं |दुसरे वो जो ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करके जीवन के हिसाब से चलते हैं ये ही गुलाम हैं,आप सोचिये आप किनमे से हैं?ये एक कड़वा सच है की बहुजन उद्धार के मिशन को जितना खतरा ब्राह्मणवादी से है उससे कहीं ज्यादा खतरा मूर्ख दलित से है, वो सुनना और समझना ही नहीं चाहता, संगर्ष तो बाद की बात है|

कभी सोचा इतनी घृणा क्यों? आखिर इतना भी क्या बुरे हैं यहाँ के ये बहुजन लोग ? इसका सीधा जवाब है निकम्मापन| पर एक बात तय है की समाज में सभी निकम्मे  नहीं अगर ऐसा होता तो इतनी दमन के बावजूद ये कौम आज वर्चस्व में न होती | असल में इस कौम में जो संगर्ष कर रहा है वो तो जी जान से लगा है और बहुत ज्ञानी और मेहनती है पर जो नहीं कर रहे है उनका निकम्मापन इतना ज्यादा है की वो सारे संगर्ष को न केवल बर्बाद करता है बल्कि हमारे मेहनती लोगों को भी निकम्मों के क़तर में ला खड़ा करता है| यही है वो कारन जिसकी वजह से निम्नलिखित दो कहावते मशहूर हैं:

– दलित ही दलित का सबसे बड़ा दुश्मन होता है (पर सक्षम सक्षम का सबसे बड़ा साथी होता है)

– जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाला ज्यादा गुनाहगार होता है

हमारे लोगों की अहसान फरामोशी हमारे पतन का मुख्य कारन है, अहसान फरामोश लोग हर कौम में होते हैं उन्हें छोड़ो|ऐसा केवल हमारे समाज ही नहीं होता हर समाज में होता है,हिंदुत्व और उसके सवर्ण भी इससे अछूते नहीं हैं, हिंदुत्व के महाज्ञानी स्वामी विवेकानंदा ने इस विषय में कहा है

“यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।“

आज हमारे समाज में तीन तरह के लोग है-

१. अशिक्षित एव असक्षम वर्ग

२. शिक्षित वर्ग पर बहुजन संगर्ष से अपरिचित

३. शिक्षित,ज्ञानी,सक्षम और संगर्ष शील वर्ग

-इनमे से जो पहला वर्ग है वो जनसँख्या दबाव या भीड़ के रूप में सबसे ज्यादा संगर्ष को आगे ले जा रहा है |

-दूसरा वर्ग किसी काम का नहीं उल्टा ये विभीषण हैं |

-तीसरा वर्ग संगर्ष की अगुवाई करता है पर इन नए नए हुए ज्ञानियों में अपने आप को श्रेष्ट समझने और अन्य को हीन समझने का रोग लग गया है परिणाम मकसद एक होने के बावजूद ये लोग एक मंच पर नहीं आ पाते|

हमारा संगर्षबल है अपना शिक्षित और साधन संपन्न वर्ग, पर दुःख की बात ये है की वो अपने सुखों में इतना चूर है कि उसे संगर्ष कि जरूरत ही महसूस नहीं होती|अगर उससे संगर्ष कि बात करो तो ऐसे बिदक जाता है जैसे अपराध कर दिया हो|एक कहावत है-‘जाके पैर न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई’| जब इनके साथ अन्याय होता है तब इनको समाज क़ी याद आती है पर तब तक देर हो चुकी होती है| जिस समाज के शशक्तिकरन में इन्होने कोई योगदान नहीं दिया वो इनका लिए तब क्या कर सकेगा? इसके विपरीत मनुवादी लोग सुख में भी संगर्ष नहीं छोड़ते इसीलिए वो शासक हैं और हमारे लोग सुख में बावरे होकर सब भूल जाते हैं इसलिए शोषित होते हैं|क्या हम अपने शोषण के इस मूल कारण को कभी समझ पायेंगे?

हम सभी जानते हैं की इस देश में हर व्यक्ति हर वर्ग केवल अपने और अपनी कौम के संवर्धन में लगा है जिसके लिए देश की परवाह न करके किसी भी तरह खुद को सबसे ज्यादा

सक्षम बना लेना चाहता है, जिसके लिए भ्रस्टाचार द्वारा धनबल इकठ्ठा किया जा रहा है| ऐसे में हम क्या करें? हमें डर सिर्फ यही है की आज भ्रस्टाचार के मूल कारण ‘जातिगत वर्ग संगर्ष’ को छिपाकर उससे फैली अव्यस्था का मीडिया में प्रचार की गति हमारे संगर्ष की गति से तेज न निकले| धन और मीडिया के बल पर सोचे समझे षडीयंत्र के तहत जो अराजकता फैलाई जा रही है उसे संविधान की विफलता साबित किया जा सकता है| और तब हमारी भोली भली जनता संविधान विरोध कर के अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेगी|इसी लिए बाबा साहब  पहले ही कह गए थे “संविधान कितना ही अच्छा क्यों न हो उसे मानने वाले बुरे होंगे तो उसका लाभी नहीं हो पायेगा” | जनता का नाम लेकर सत्तापलट या  संविधान पलट न हो जाये,ऐसे होने पर हमारे विरोध और अपने पक्ष का संविधान या कानून बना लेंगे इसलिए सावधान!

मैं समझ सकता हूँ की हमारा सक्षम वर्ग किसी नेता की रैली में भीड़ बढ़ने का काम तो नहीं करेगा, पर वो उससे भी कहीं ज्यादा जरूरी काम कर सकता है| कुछ खास नहीं तो जो कर सकते हो वो तो करो जैसे: अम्बेडकरवाद को वोट करो,उन्हें चंदा दो,मिशन की किताबें खरीद कर अपने लोगों में बांटो,विचार और सुझाव देना, लेखन कार्य करना,एन जी ओ, ट्रस्ट, स्कूल में किसी मेधावी बहुजन को स्कॉलरशिप देना अदि| जो जिस लायक है उसे वही काम करना चाहिए, जो भीड़ बढ़ा सकता है वो भीड़ जो धन दे सकता वो धन, जो विचार दे सकता है वो विचार, कुछ तो करो संगर्ष के लिए सब कुछ जरूरी है|भगवान् बुद्धा ने कहा है की संसार में तीन प्रकार के लोग हैं:

“एक जो केवल अपना भला करते हैं दूसरों का नहीं,दुसरे जो अपना भला नहीं करते केवल दूसरों का भला करते हैं,तीसरे वो जो अपना भी भला करते हैं दूसरों का भी ये ही श्रेष्ठ हैं|”

इनमें से हमें तीसरा बनना है|बिना जमीन वालों को आंबेडकर मिशन ने जमीन के पट्टे दिलाये, बिना नौकरियों वालों को नौकरी करने लायक बनाया और नौकरियां दिलाईं|अब ये लोग उस मिशन के लिए कुछ न करें तो क्या समस्त कौम पतन की तरफ नहीं चली जाएगी|बहुजनों को सम्पन्न होना विरोधयों को खटक रहा है और अन्दर ही अन्दर वो दमन निति बना और चला रहे हैं, अगर ये सफल हो गए तो क्या होगा कभी सोचा?|पता नहीं हमारे सक्षम लोग ये क्यों नहीं समझते की जब भी बहुजनों का दमन किया जाएगा इनको भी बक्शा नहीं जाएगा|

१८ मार्च १९५६ को को बाबासाहब आंबडेकर ने दुःखी होकर आगरा के बेजमीन वाले लोगों (बहुजन समाज) को इकट्ठा करके उन्होंने ऐलान किया कि:

  “अंग्रेजों ने मेरी बात मान ली थी, लेकिन दुनिया की हालत बदलने के कारण उनको देश छोड़ना पड़ा. अंग्रेज चले गये| जिन लोगों के हाथों में जमीन आयी वो कहते है अगर बेजमीन वाले लोगों को हमने खेत दे दिये तो हमारे खेतों में मझदूरी कौन करेगा,इसलिए मैं मजबूर हूं| बाबासाहब आंबेडकर ने उस वक्त १८ मार्च १९५६ को आगरा में दुःखी होकर लाखों बेजमीन वाले लोगों से कहा कि, ये काम, जिसकी अंग्रेजो ने हाँ भरी थी की, हमारे लिए वो सेपरेट इलेक्टोरेट बनायेंगे, सेपरेट सेटलमेन्ट बनायेंगे, अलग से हमारे रहने के लिए बस्तियां बनायेंगे, जिनमें हम करोड़ो लोग रहेंगे, और अपने बलबूते पर अपने एम.एल.एम. चुनकर भेजेंगे, और लोकल सेल्स गवरनमेंट खुद चलायेंगे.. इस बात को अंग्रेजों ने मान लिया था, लेकिन आज की सरकार नहीं मान रही है| मेरा ज्यादा समय पढ़ाई-लिखाई के मामले में रिजरवेशन के मामले में हमारे समाज में इंजिनिअर, डाक्टर, वकील पैदा हो, अधिकारी पैदा हो, कर्मचारी पैदा हो, इसमें मेरा बहुत ज्यादा समय लग गया है| लेकिन मैं आज देख रहा हूं कि ये पढ़े-लिखे कर्मचारी, ये तो एक क्लास (वर्ग) बनकर रह गये, एक अलग कास्ट बनकर रह गये है. जिन लोगों में ये पैदा हुए है, उन लोगों का इनको कोई ख्याल नहीं है. हमारा गरीब समाज नीचे की ओर जा रहा है, और ये अधिकारी लोग ऊपर को जा रहे है, इन दोनों का कोई मेल-मिलाप नहीं है| इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि, इस बढ़ती हुई उम्र में मैं लाठी लेकर आगे-आगे चलूंगा, और आप लोग मेरे पीछे-पीछे चलें| अपने लोगों की बस्तियां बनाना, ये हमारी जरुरत है, आज की सरकार यह नहीं करना चाहती है, ये काम हमारा है, हमारी जरुरत है, हमारी जरुरत हमें ही पूरी करनी होगी|”

मान्यवर कांशीरामजी ने ७ जुलाई २००२ को दिल्ली के रामलिला मैदान में नारा लगाना शूरू किया था:

“जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है..” हम लोगों ने बाबासाहेब आंबेडकर के प्रयासों से प्रेरित होकर, जो हमें वोट का अधिकार लेकर दिया, उस वोट के अधिकार को ध्यान में रखकर हम लोगों ने नारा बनाया है, “वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा”

आज हमारे लोग चौधरी बन कर उन्हीं विभिन्न धर्म स्थलों, सत्संग अदि को अपना समय और दान दे रहे हैं जहाँ हमारे दमन निति के सृजक बैठे हैं| हमारे लोग ये क्यों भूल जाते है की इनका नाम और रूप बदल जाता है पर नियत कभी नहीं बदलेगी| पता नहीं हमारे सक्षम लोग ये कब समझेंगे की आज जिस खुशहाली से वो जीवन बिता रहे हैं उसके लिए बहुत ज्यादा संगर्ष हुआ है जिसको आगे ले जाना इनका कर्तव्य है| बाबा साहेब ने हमें जो उपलब्धियां दिलायीं उनका आनंद तो लेते हो पर उनके संगर्ष से भी तो कुछ प्रेरणा भी तो लो, बाबा साहेब की निम्न  पंक्तियाँ देखिये:

“जब मेरे प्यारे बेटे गंगाधर का बीमारी के कारण निधन हुआ, तब उसके मृतदेह को ढकने के लिए नए कपडे लाने के लिए लोगो ने मेरे से पैसे मांगे, पर मेरे पास उतने भी पैसे नहीं थे तब मेरी पत्नी ने उसकी साडी का एक टुकड़ा फाड कर दिया ..और हम गंगाधर को स्मशान ले गए .मेने मेरी जिंदगी में गरीबी के जो दिन देखे है, वो भारत के किसी नेता ने नहीं देखे होंगे ..फिर भी मेने मेरी गरीबी के कारण कभी मेरा आत्म-सन्मान और मेरे आन्दोलन को कभी पीछे हटने नहीं दिया . ऐसी गरीबी में भी मेने अपने आप को किसी के हाथो बिकने नहीं दिया…डॉ. आंबेडकर|

जो भी हो मैं कोशिश जरी रखूंगा , मैं मिशन को प्रचार,समय,विचार,दिशा, और लेखन दे सकता हूँ तो दे रहा हूँ |मुझे यकीन है इस मिशन से समाज को फायदा अवश्य होगा|

 

…..समयबुद्धा

3 thoughts on “12-JULY-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: एक कडवा सच-भारत के दलित अपनी दुर्दशा के जिम्मेदार हैं ….समयबुद्धा

  1. Apne aapko heen bhawna se upar uthane ki khatir hamare log swarn. Logo ki good book me aane ki chah me Aur jyada mansik gulam bante h
    Itihas nahi padhna
    Baba saheb ke sangarsh ko na janna yahi hamare logo. Ki durdsha ka karan h

  2. Hamare hi log Jane anjane manuvad ka prchar kr rhe h isme bi padhe likhe log jyada h yahi dalito ki brbadi ka karan h jis din ye log sahi raste pr chalege manuvad ka patan hona nischit h jay bhim

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