बुद्धा कहानी गाठें और हमारे जीवन में दुखों के छह मूल कारन और निवारण…समयबुद्धा


buddha28_medएक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.

बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.

सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”

शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”

“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”

“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.

“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”

शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता| एक बार ठीक से पता कर लेने के बाद इन गाठों को खोलने का संगर्ष शुरू कर देना चाहिए,जिस गाँठ को जितना संगर्ष चाहिए जब उसको खोलने में हम उतना संगर्ष लगा देंगे तब वह खुल जाएगी|”

“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.

“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम अपने जीवन के दुखों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन दुखों में कैसे पड़े?”

अगर कोई उनको उनके दुःख का सही करब बताये तो ये लोग उससे घृणा कर दूरी बना लेते हैं| इतना ही नहीं अपने दुखों को दूर करने हेतु ये लोग सही इलाज़ करने की बजाये लघुपथ खोजते हुए ये लोग ईश्वरवादी हो लेते हैं , पुरोहित और ज्योतिष के चंगुल में फास जाते हैं| ये परजीवी धूर्त लोग नाना प्रकार के प्रपंच रचकर इन दुखों लोगों को लूटते और शोषण करते हैं| ऐसे में इनका दुःख दूर होने की बजाये और बढ़ जाता है|
जहाँ अन्ये dharmon का मूल उद्देश्ये ईश्वरवाद के नाम पर भोली भली जनता पर शाशन करना होता है वही बौद्ध धम्म का मकसद है की कैसे मानवता के दुखो को दूर kiya jaaye | इसीलिए गौतम बुद्ध ने *चार आर्य सत्यबुद्ध का पहले धर्मोपदेश, अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, निम्न चार आर्य सत्यों के बारे में था ।

१. दुःख : इस दुनिया में दुःख व्याप्त है – जैसे जन्म, बीमारी, बूढे होने, मौत, बिछड़ने , नापसंद,चाहत सब में दुःख है ।
२. दुःखप्रारंभ : तृष्णाया अत्यधिक चाहतदुःख का मुख्य कारण है

३. दुःखनिरोध : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
४. दुःखनिरोधकामार्ग : तृष्णा से मुक्ति अष्टांग मार्ग के अनुसार जिन्दगी जीने से पाई जा सकती है ।

 

 

संसार के सभी दुखों का मूल रूप से निम्न पांच ही कारन होते हैं:

-गैरजरूरी हिंसा (unnecessary Violence)gajah_putih_
-चोरी  (steel)
-व्यभिचार (sex misconduct)
-असत्य  (False statements)
-मादक पदार्थॊं सेवन (Drugs,hard drinks etc.)

बौद्ध धम्म में बुद्ध में मानव दुखों के कारणों पर गहन शोध करके ये पांच कारन खोजे और संसार को दुःख मिटाने के लिए पंचशील सिद्दांत प्रतिपादित किया |बुद्ध के पंचशील सिद्धांत के अनुसार मनुष्ये को :

प्रागैरजरूरी हिंसा से विरत (दूर) रहना चाहिए ।
चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने से विरत(दूर) रहना चाहिए ।
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत(दूर) रहना चाहिए ।
असत्य बोलने से विरत(दूर) रहना चाहिए ।
मादक पदार्थॊं से विरत(दूर) रहना चाहिए ।

ये पांच कारन व्यक्तिगत होते हैं,जिनपर एक व्यक्ति का वस होता है,वो चाहे तो व्यक्तिगत संगर्ष से इनपर विजय प्राप्त कर सकता है |

मैं समयबुद्धा आपसे कहते हूँ की इनके आलावा दुखों का छठा कारन भी होता है-” गलत सरकारी नीतियां “, ये हमारे दुखों का बहुत बड़ा कारन होता है|

गलत सरकारी नीतियां ही वो वजह है जिनके कारन कुछ लोग बहुत ज्यादा अमीर और साधन संपन्न हैं जबकि जनता का बहुत बड़ा हिस्सा दुखी है, पोषण,शिक्षा और देश के संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी तो बहुत दूर की बात है, पेट भर भोजन भी उनको नहीं मिल पता| इस छटे कारन का निवारण व्यक्तिगत संगर्ष से नहीं पाया जा सकता इसके लिए समूहित संगर्ष करना होता है, इसलिए बुद्ध ने भी कहा है संघम शरणम् गच्छामि, डॉ आंबेडकर ने भी कहा है संगठित रहो|
अपने दुखों से निजात पाने के लिए आपको इसकी जड़ में वार करना होगा और जड़ है राजनीती, आपको राजनीति में बाद चढ़कर जिससे लेना होगा| जो लोग राजनीती में सक्रिय होते हैं वो इस छटे दुःख का इलाज कर पते हैं|

आज के समय राजनैतिक हिस्सेदारी तलवार से कम और मताधिकार से ज्यादा होती है| ऐसे में बहुजन समाज को चाहिए की वो विरोधियों भेड़ियों को पहचानने में धोखा न खाए|ये हर बार भेड़ की खेल पहन कर आये हैं मतलब नए नाम. नए चहेरे, नयी बातें पर इनकी नीति और नियत न ही सदियों से बदली है न ही बदलेगी| मीडिया के बहकावे में न आएं अम्बेडकरवादी पार्टी को ही चुने वार्ना आप अपने और अपने आने वाली पीढ़ियों की गर्दन पर कुल्हाड़ी मार लोगे | हे बहुजनों आपको भी अपनी इच्छा शक्ति और संगठन शक्ति दिखानी ही होगी वार्ना आप छटे दुःख से नहीं बच पाओगे| आपके विरोधी अगर सत्ता में आगये तो वो ऐसी नीतियां बनाएंगे की आपका सदियों का संगर्ष व्यर्थ कर आपको सदियों पीछे धकेल देंगे| बहुजन विरोधी किस प्रकार एक नीति बनाकर आपके सदियों के संगर्ष की कमर तोड़ देते हैं इसको समझने के लिए निम्न उदाहरण देखिये:

आप हर तरफ से गुलाम बनते जा रहे हो और आपको पता भी नहीं चल रहा, यही तो है ब्राह्मणवाद, आज सारी संवेधानिक संस्थाएं नाकाबिल कर दी गयीं हैं और उनके मुकाबले ब्राह्मणवादी संस्थाएं खड़ी कर दी गयीं हैं| उदाहरण के लिए सरकती टीवी रेडियो चैनल, अखबार की जगह  कई प्राइवेट चैनल, अखबार जो केवल ब्राह्मणवादी अजेंडे का प्रचार करते हैं| सरकारी स्कूल विफल, ये बहुजनों को सिर्फ मजदूर बना रहे हैं, प्राइवेट स्कूल में गुरुकुल की तरह केवल राजा सेठ और पुरोहित के बच्चे पड़ते हैं|बीमार हो जाओ तो इलाज को सरकारी अस्पताल विफल कर दिया गए हैं और प्राइवेट में जिसके पास पैसा है वही इलाज करा सकता है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी अब ब्राह्मणवादियों की,सरकारी एयरलाइन्स विफल अब नज़र रेल पर, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है, समझदार के लिए इशारा ही काफी है|चलो ये तो होना ही था पर ये क्या बात है की इन सबके मालिक केवल ब्राह्मणवादी ही हो सकते हैं, मूलनिबासी नहीं|होना ये चाहिए की जिसकी जितनी जनसँख्या उसकी उतनी भागीदारी| जानते हैं गुलामी क्या है, वही पहले जैसे दिन आ गए बस नाम और रूप बदल गया, जैसे पहले आप अपने जीवन की हर चीज़ के लिए ब्राह्मणवादी पर निर्भर थे, जैसे काम उनके खेतों में, बाजार उनकी दुकानों से, कर्ज इन्ही साहूकारों से, आदि आदि वैसे ही आज है | सोचिये जब बच्चा पैदा होता है तो किसी ब्राह्मणवादी के हस्पताल में, फिर स्कूल पढ़ने जाता है ब्राह्मणवादी के स्कूल में फिर कॉलेज जाता है ब्राह्मणवादी की यूनिवर्सिटी फिर नौकरी करता है ब्राह्मणवादी की कंपनी में, अभी तो ठीक है पर धीरे धीरे सिकंजा कसता जाएगा और आप ब्राह्मणवादियों के इशारे पर जीने मरने को पहले की तरह मजबूर हो जायेंगे|राष्ट्रीय संपत्ति या संसाधनों का ये अनुचित बटवारा ही तो मानवता के दुःख का मूल कारन है, यही तो बौद्धों ने दुःख का मूल कारन बताया है, और इसके खिलाफ जो क्रांति थी वही तो बौद्ध धम्मथा और है, इसके आलावा तो सब ब्राह्मणवादी मिलावट है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने पुस्तक ‘कार्ल मार्क्स और बुद्ध’ लिखी इसीलिए उन्होंने कहा है की बौद्ध धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है| जागो कब तक सोये रहोगे, ये मजे जो ले रहे हो ज्यादा दिनों के लिए नहीं हैं सावधान!!

गुज़रे ज़माने में बहुजनों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था | गुरुकुल शिक्षा व्यस्था के माध्यम से ज्ञान केवल सत्ताधारी और उसके सहयोगियों के बीच ही सदियों तक घूमता रहा|परिणाम आम जनता कभी समझ ही नहीं पायी की दिन रात मेहनत और ईमानदारी से जीने के बावजूद उनके हिस्से सिर्फ महा-दुःख ही क्यों आये| हमारे लोगों ने सदियों शिक्षा के लिए संगर्ष किया और आखिरकार अंग्रेजों के सरक्षण में बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने संविधान में सबके लिए सार्वजानिक शिक्षा की व्यस्था और शिक्षा का अधिकार मनुवादियों से छीनकर सुनिश्चित कर दिया|परिणाम ये हुआ की आम जनता समझने लगी की उनके जीवन का दुःख किसी इश्वर का दिया नहीं अपितु गलत सरकारी निति की वजह से है जिसका समाधान भी इश्वर नहीं राजनीति ही करेगी और उन्होंने राजनीती में हिस्सा लेना शुरू कर दिया|ये बात इस देश के धम्म-विरोधियों मनुवादियों को अच्छी नहीं लगी और सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था (सरकारी स्कूल) आज संविधान लागू होने के लगभग साठ साल के अन्दर ही महत्व हीन कर दी गई और गुरुकुल शिक्षा व्यस्था को अंग्रेजी स्कूल के नए रूप में लागू कर दिया गया|सरकारी स्कूल में अक्सर देखा गया है की न तो वहां पढ़ाने वाले हैं न पढने वाले|पहले ज़माने के अनपढ़ के समतुल्य आज सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था से निकले व्यक्ति से की जा सकती है और गुरुकुल के से पास सत्ताधारी की तुलना आज के प्राइवेट स्कूल से पास हो रहे लोगों से की जा सकती है|

हमारे बहुत से बहुजन सरकारी अध्यापक हैं वे भी इसी रंग में हैं पढ़ाते नहीं जबकि ऐसे स्कूलों में सबसे ज्यादा बहुजन के बच्चे ही पढ़ते हैं|मैं बहुजन अध्यापकों से अपील करता हूँ की बहुत ज्यादा नहीं पर जितना सिलेबस है उतना तो इमानदारी से पढ़ा ही दो,आपकी कमाई भी सार्थक होगी और बहुजनों का भला भी होगा|

आप हर तरफ से गुलाम बनते जा रहे हो और आपको पता भी नहीं चल रहा, यही तो है ब्राह्मणवाद, आज सारी संवेधानिक संस्थाएं नाकाबिल कर दी गयीं हैं और उनके मुकाबले ब्राह्मणवादी संस्थाएं खड़ी कर दी गयीं हैं| उदाहरण के लिए सरकती टीवी रेडियो चैनल, अखबार की जगह कई प्राइवेट चैनल, अखबार जो केवल ब्राह्मणवादी अजेंडे का प्रचार करते हैं| सरकारी स्कूल विफल, ये बहुजनों को सिर्फ मजदूर बना रहे हैं, प्राइवेट स्कूल में गुरुकुल की तरह केवल राजा सेठ और पुरोहित के बच्चे पड़ते हैं|बीमार हो जाओ तो इलाज को सरकारी अस्पताल विफल कर दिया गए हैं और प्राइवेट में जिसके पास पैसा है वही इलाज करा सकता है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी अब ब्राह्मणवादियों की,सरकारी एयरलाइन्स विफल अब नज़र रेल पर, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है, समझदार के लिए इशारा ही काफी है|चलो ये तो होना ही था पर ये क्या बात है की इन सबके मालिक केवल ब्राह्मणवादी ही हो सकते हैं, मूलनिबासी नहीं|होना ये चाहिए की जिसकी जितनी जनसँख्या उसकी उतनी भागीदारी| जानते हैं गुलामी क्या है, वही पहले जैसे दिन आ गए बस नाम और रूप बदल गया, जैसे पहले आप अपने जीवन की हर चीज़ के लिए ब्राह्मणवादी पर निर्भर थे, जैसे काम उनके खेतों में, बाजार उनकी दुकानों से, कर्ज इन्ही साहूकारों से, आदि आदि वैसे ही आज है | सोचिये जब बच्चा पैदा होता है तो किसी ब्राह्मणवादी के हस्पताल में, फिर स्कूल पढ़ने जाता है ब्राह्मणवादी के स्कूल में फिर कॉलेज जाता है ब्राह्मणवादी की यूनिवर्सिटी फिर नौकरी करता है ब्राह्मणवादी की कंपनी में, अभी तो ठीक है पर धीरे धीरे सिकंजा कसता जाएगा और आप ब्राह्मणवादियों के इशारे पर जीने मरने को पहले की तरह मजबूर हो जायेंगे|राष्ट्रीय संपत्ति या संसाधनों का ये अनुचित बटवारा ही तो मानवता के दुःख का मूल कारन है, यही तो बौद्धों ने दुःख का मूल कारन बताया है, और इसके खिलाफ जो क्रांति थी वही तो बौद्ध धम्मथा और है, इसके आलावा तो सब ब्राह्मणवादी मिलावट है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने पुस्तक ‘कार्ल मार्क्स और बुद्ध’ लिखी इसीलिए उन्होंने कहा है की बौद्ध धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है| जागो कब तक सोये रहोगे, ये मजे जो ले रहे हो ज्यादा दिनों के लिए नहीं हैं सावधान,आओ संगठित होकर सवेधानिक तंत्र को चलायें और अपने छटे  दुःख से मुक्ति पाएं…समयबुद्धा https://samaybuddha.wordpress.com/

आओ संगठित होकर सवेधानिक तंत्र को चलायें और अपने छटे  दुःख से मुक्ति पाएं

…समयबुद्धा

BAHUJAN HITAYE, BAHUJAN SUKHAY

2 thoughts on “बुद्धा कहानी गाठें और हमारे जीवन में दुखों के छह मूल कारन और निवारण…समयबुद्धा

    • comment ke liye dhanaywaad, aapne SAMJHA hame isi baat ki khushi hai.in vicharon jo janta tak pahuchane me apke sahyou ki jaroorat hai, kam se kam 10 logon ko is website me join karvane ki niji jimmedari le, aau sangarsh karna hai , hame apna media khud hi banna hai

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