बुद्ध ने जिस पुनर्जन्म की बात की है वो एकदम वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित है…बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

hUMAN LIFE CYCLE REINCARNATION
बुद्ध ने जिस पुनर्जन्म की बात की है वो एकदम वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित है

विज्ञान कहता है ब्रह्माण्ड परिवर्तनीय है पल प्रतिपल इसकी उर्जा बदलती है पुरानी उर्जा क्षीण होती है उसकी जगह नई उर्जा स्थानातरित हो जाती है ! एक पदार्थ के लिए जो उर्जा क्षीण हो जाती है वही दुसरे को नवीन भी करती है उदहारण – पेड़ पौधों के लिए oxigen क्षीण उर्जा है और हमारे लिए वही जीवन दाई !

अब मनुष्य या अन्य जीव जिस oxigen को क्षीण बनाते है उसी उर्जा का disordarरूप है कार्बन डाई आक्साइड

मतलब पेड़ पौधों ने foto sinthesis द्वारा जो सौर उर्जा प्राप्त की उसे oxizaneमें रूपांतरित कर दिया

इस तरह उर्जा का पुनर्जन्म होता है disordar enerjy के रूप में ! ये क्षीण उर्जा दुसरे पदार्थ के लिए नविन उर्जा के रूप में होती है और वहां से क्षीण अवस्था में रूपांतरित होती है

सूर्य की प्रचंड उर्जा गर्मी पैदा करती है गर्मी से जल वास्पित होता है उससे बादल बनते है उससे वर्षा होती है पहाड़ों पर हुई वर्षा ग्लेशियर बनातेहै है उससे नदिया बनती है नदियों से पर्यावरण पर्यावरण से मौसम चक्र इससे जीवन चक्र चलता है

भूमिगत ऊष्मा क्षीण होकर magma बनता है मैग्मा से लावा , लावा विस्फोटित होकर अपनी क्षीण अवशता में चट्टान बनते हैं चट्टान रेत बनती है , रेत मिटटी के रूप में क्षीण होती है मिटटी क्षीण होकर पोषक बनती है और वनस्पतियो को उर्जा देती है वनस्पतियों की क्षीण अवस्था जिव जंतुओं को पोषक तत्व प्रदान करती है

यही है असली पुनर्जन्म जो किसी आत्मा के बिना होता है

महात्मा बुद्ध कहतें हैं “मेरी बात भी केवल इसलिए ना मानो की उसे तथागत गौतम ने कहा उसपर अध्यन करो ध्यान लगाओं उसको तर्क की कसौटी पर कसो जब तुम्हें अपने अनुभवों से उस बात की सत्यता का अनुभव हो तब उसे मानो अन्यथा मत मानो”

बुद्धिज्म पूर्णतः विज्ञान ही है उसको आप मानिये या नहीं मानिये कोई किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं है !

आप विज्ञान को मानते है सभी बातों को तर्क की कसौटी पर कसते हैं आप के दिल में मानवता के लिए करुणा है , आप जीव मात्र से भी प्रेम करते है ,आप बदलाव चाहते है , दुखों के कारणों को ढूंड रहे है , ब्रह्माण्ड के रहस्यों में रूचि है , आप के अन्दर सत्य को जान्ने की तीव्र जिज्ञासा है यही तो बौद्धमत है बुद्धि का मत मतलब वैज्ञानिक विचारधारा

आप स्वीकार करो न करो परन्तु आप एक सच्चे बौद्ध हो

यही बुद्दिज्म है इसके आलावा सब बकवास और मिलावट है

मानव का शरीर पांच तत्वों से बना है वो है carben , nytrojan , oxyzen , fasfores, hydrozen इसी को बुद्ध ने कहा पंचतत्व ! ध्यान रखना की पंचतत्व की अवधारणा केवल बुद्ध ने की ! बाद में ब्राह्मणों ने इस अवधारणा का अपहरण कर उसे अपनी पोथियों में अपने अनुसार विस्लेषित किया !

पुनर्जन्म या रूपांतरण जिव के मरने के बाद इन पांच तत्वों का होता है ! किसी आत्मा का नहीं !

ब्राह्मण पोथी गीता के अनुसार आत्मा अजर अमर है यानि न वो पैदा होती है न मरती है

सौ साल पहले दुनिया की पूरी आबादी 3 अरब थी आज 7 अरब है सौ सालों में ये 4 अरब आत्माएं कहा से आगई ?

…शकील प्रेम

लोग अन्य धर्मों की ही तरह बौद्ध धम्म में भी पारलौकिक प्रश्नों के उत्तर खोजने आते हैं|गौतम बुद्ध को कुछ सिद्ध नहीं करना है। न तो परमात्मा को सिद्ध करना है, न परलोक सिद्ध करना है।बुद्ध तो मनोवैज्ञानिक हैं उन्हें तो निदान करना है।मनुष्य का रोग क्या है? मनुष्य दुखी क्यों है? इस दुःख का समाधान क्या है?यही बुद्ध का मौलिक प्रश्न है।…OSHO

Buddha27गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं है। मेटाफिजिक्‍स और परलोक के प्रश्नों में उनकी जरा भी—जरा भी रूचि नहीं है। उनकी रूचि है, मनुष्य मनोविज्ञान में। उनकी रुचि है मनुष्य के रोग में और मनुष्य के उपचार में। बुद्ध ने जगत को एक उपचार का शास्त्र दिया है। वे मनुष्य जाति के पहले मनोवैज्ञानिक हैं।

इसलिए बुद्ध को समझने में ध्यान रखना, सिद्धात या सिद्धातों के आसपास तर्कों का जाल उन्होंने जरा भी खड़ा नहीं किया है। उन्हें कुछ सिद्ध नहीं करना है। न तो परमात्मा को सिद्ध करना है, न परलोक को सिद्ध करना है। उन्हें तो आविष्कृत करना है, निदान करना है। मनुष्य का रोग कहा है? मनुष्य का रोग क्या है? मनुष्य दुखी क्यों है? यही बुद्ध का मौलिक प्रश्न है।

परमात्मा है या नहीं; संसार किसने बनाया, नहीं बनाया; आत्मा मरने के बाद बचती है या नहीं; निर्गुण है परमात्मा या सगुण-इस तरह की बातों को उन्होंने व्यर्थ कहा है। और इस तरह की बातों को उन्होंने आदमी की चालाकी कहा है। ये जीवन के असली सवाल से बचने के उपाय हैं। ये कोई सवाल नहीं हैं। इनके हल होने से कुछ हल नहीं होता।

नास्तिक मानता है ईश्वर नहीं है, तो भी वैसे ही जीता है। आस्तिक मानता है ईश्वर है, तो भी उसके जीवन में कोई भेद नहीं। अगर नास्तिक और आस्तिक के जीवन को देखो तो तुम एक सा पाओगे। तो फिर उनके विचारों का क्या परिणाम है?

परलोक है या नहीं, इससे तुम नहीं बदलते। और बुद्ध कहते हैं, जब तक तुम न बदल जाओ, तब तक समय व्यर्थ ही गंवाया। बुद्ध की उत्सुकता तुम्हारी आंतरिक क्रांति में है। बुद्ध बार-बार कहते थे, कि मनुष्य की दशा उस आदमी जैसी है जो एक अनजानी राह से गुजरता था और एक तीर आकर उसकी छाती में लग गया। वह गिर पड़ा है। लोग आ गए हैं। लोग उसका तीर निकालना चाहते हैं। लेकिन वह कहता है, ठहरो! पहले मुझे यह पता चल जाए कि तीर किसने मारा। ठहरो, पहले मुझे यह पता चल जाए कि तीर उसने क्यों मारा। ठहरो, मुझे यह पता चल जाए कि तीर आकस्मिक रूप से लगा है या सकारण। ठहरो, मुझे यह पता चल जाए कि तीर विषबुझा है, या बिन-विषबुझा।

बुद्ध ने कहा, वह आदमी दार्शनिक रहा होगा। वह बड़े ऊंचे सवाल उठा रहा है। लेकिन जो लोग इकट्ठे थे उन्होंने कहा, यह सवाल तुम पीछे पूछ लेना। पहले तीर निकाल लेने दो, अन्यथा पूछने वाला मरने के करीब है। उत्तर भी मिल जाएंगे तो हम किसे देंगे? और अभी इन प्रश्नों की कोई आत्यंतिकता नहीं है। अभी तीर खींच लेने दो। तीर छाती में लगा है, खतरा है। तुम ज्यादा देर न बच सकोगे।

बुद्ध कहते, ऐसी ही दशा में मैं तुम्हें पाता हूं। और तुम पूछते हो कि संसार किसने बनाया? पहले इसका पता चल जाए, तब करेंगे ध्यान। क्यों बनाया? पहले इसका पता चल जाए, तब बदलेंगे जीवन को। क्या कारण है परमात्मा का संसार बनाने में? क्यों यह लीला उसने रची? जब तक इसका पता न चल जाए, तब तक हम मंदिर में प्रवेश न करेंगे।

बुद्ध कहते हैं, जीवन का तीर छाती में चुभा है। पल-पल मर रहे हो। किसी भी डूब जाओगे। ये उत्तर, ये प्रश्न, सब व्यर्थ हैं। अभी तो एक ही बात पूछो कि कैसे यह तीर निकल आए।

इसलिए बुद्ध की बातें शायद उतनी गहरी न मालूम पड़े जितनी कपिल और कणाद की; कांट और हीगल की, प्लेटो और अरस्‍तू की। लेकिन ज्यादा यथार्थ हैं। ज्यादा वास्तविक हैं। और गहराई का करोगे क्या, अगर गहराई झूठी हो और शब्दों की हो? असली सवाल यथार्थ को समझना है।

बुद्ध पहले मनुष्य हैं जिन्होंने परमात्मा के बिना ध्यान करने की विधि दी। जिन्होंने परमात्मा की मान्यता को ध्यान के लिए आवश्यक न माना। और न केवल परमात्मा की बल्कि आत्मा की धारणा को भी ध्यान के लिए आवश्यक न माना। उन्होंने कहा, ध्यान तो स्वास्थ्य है। तुम स्वस्थ हो सकते हो। फिर शेष तुम खोज लेना। मैं तुम्हें रोग से मुका करने आया हूं।

इसलिए बुद्ध को तुम एक मनस-चिकित्सक की भाति देखना। वे धर्मगुरु नहीं हैं। धर्मगुरु मान लेने से बड़ी भ्रांति हो गयी। तो लोग उन्हें दूसरे धर्मगुरुओं के साथ देते हैं। वे धर्मगुरु जरा भी नहीं हैं। कहीं परमात्मा की धारणा के बिना कोई धर्म हो सकता है? कहीं आत्मा की धारणा के बिना कोई धर्म हो सकता है? तत्व की तो कोई बुद्ध ने बात ही नहीं की। तथ्य की बात की। उन जैसा यथार्थवादी खोजना मूश्किल है। और उन्होंने मनुष्य की असली तकलीफ को पकड़ा और कहा यह तकलीफ सुलझ सकती है।

उन्होंने चार आर्य-सत्यों की घोषणा की : कि मनुष्य दुखी है। इसमें किसको संदेह होगा? इसका कौन विरोध करेगा? मनुष्य दुखी है। मनुष्य के दुख का कारण है। ठीक बुद्ध वैसा ही बोलते हैं जैसे वैज्ञानिक बोलता है। दुख का कारण है। क्योंकि अकारण कैसे दुख होगा? पैर में पीड़ा हो, तो काटा लगा होगा। सिर दुखता हो, तो कारण होगा। पीड़ा है तो अकारण कैसे होगी? पीड़ा का कारण है।

तो बुद्ध ने कहा है पहला आर्य-सत्य कि मनुष्य दुख में है। दूसरा आर्य-सत्य कि दुख का कारण है। और तीसरा’ आर्य-सत्य कि दुख के कारण को मिटाया जा सकता है। और चौथा आर्य-सत्य कि एक ऐसी भी दशा है जब दुख नहीं रह जाता।

बुद्ध ने यह भी नहीं कहा कि वहा आनंद होगा। क्योंकि वह कहते है, व्यर्थ की बातों को क्यों करना? इतना ही कहा, वहा दुख नहीं होगा। आनंद को तुम समझोगे कैसे? आनंद तुमने जाना नहीं। वह शब्द थोथा है, अर्थहीन है। तुम उसमें जो अर्थ भी डालोगे, वह वही होगा जो तुमने जाना है। तुम अपने सुख को ही आनंद समझोगे। उसको थोड़ा बड़ा कर लोगे-करोड़ गुना कर लोगे-लेकिन वह मात्रा का भेद होगा, गुण का न होगा। और आनंद गुणात्मक रूप से भिन्न है। वह तुम्हारा सुख बिलकुल नहीं है। वह तुम्हारा दुख भी नहीं है, सुख भी नहीं है।

तो बुद्ध ने कहा, उसकी बात कैसे करें? उसकी बात ही करनी उचित नहीं। इतना ही कहा कि दुख-निरोध हो जाएगा। तुमने जिसे दुख की तरह जाना है, वह वहा नहीं होगा। बीमारी नहीं होगी। स्वास्थ्य क्या होगा, वह तुम स्वयं स्वाद ले लेना और जान लेना। और जिन्होंने भी स्वाद लिया, उन्होंने कहा नहीं। गूंगे का गुड़ है।

ये जो बुद्ध के वचन हैं, उनके मनोविज्ञान की आधारशिलाएं हैं-

‘विषय-रस में शुभ देखते हुए विहार करने वाले, इंद्रियों में असंयत, भोजन में मात्रा न जानने वाले, आलसी और अनुद्यमी पुरुष को मार वैसे ही गिरा देता है जैसे आधी दुर्बल वृक्ष को।

विषय-रस में शुभ देखते हुए जो जीता है, वह निरंतर दुख में गिरता है। इस बात को विस्तार से समझ लेना जरूरी है। क्योंकि समस्त योग और समस्त अध्यात्म इसी बात की समझ पर खड़ा होता है। विषय में रस मालूम होता है। रस विषय में है या मनुष्य की अपनी धारणा में?

कभी कुत्ते को देखा, सूखी हड्डी को चूसता है और रस पाता है। सोचता है, सूखी हड्डी से लहू निकल रहा है। लहू निकलता नहीं। सूखी हड्डी में कहा लहू? लेकिन सूखी हड्डी मुंह में चबाता है तो उसके मुंह से ही लहू बहने लगता है। सूखी हड्डी गड़ती है, चोट करती है मुंह में, लहू निकल आता है। उस लहू को वह पीता है, और सोचता है, हड्डी से रस मिल रहा है।

लेकिन कुत्ते को समझाओ, समझेगा न। उसने कभी भीतर प्रवेश करके देखा नहीं कि सूखी हड्डी से कैसा रस निकलेगा! सूखी हड्डी रसहीन है। और अगर रस निकल रहा है तो कहीं मुझसे ही निकलता होगा।

मैंने सुना है कि एक सर्दी की सुबह एक कुत्ता एक वृक्ष के नीचे धूप ले रहा है और विश्राम कर रहा है। उसी वृक्ष के ऊपर जगह बनाए बैठी है एक बिल्ली, वह भी सुबह की झपकी ले रही है। उसको नींद में बड़े प्रसन्न होते देखकर कुत्ते ने पूछा कि मामला क्या है? तू बड़ी आनंदित मालूम होती है। उस बिल्ली ने कहा कि मैंने एक सपना देखा, बड़ा अनूठा सपना, कि वर्षा हो रही है, पानी नहीं गिर रहा, चूहे गिर रहे हैं। कुत्ते ने कहा, नासमझ बिल्ली! नासमझ कहीं की, मूढ़! न शास्त्र का ज्ञान, न पुराण पढ़े, न इतिहास का पता! शास्त्रों में कभी भी ऐसा उल्लेख नहीं है। हा, कई दफा वर्षा हुई है, सूखी हड्डियां जरूर बरसी हैं, चूहे कभी नहीं।

लेकिन वह कुत्तों का शास्त्र है। बिल्ली के शास्त्रों में चूहों के बरसने का ही उल्लेख है। कुत्ते को सूखी हड्डी में रस है। इसलिए उसके पुराण सूखी हड्डियों के पास होंगे। बिल्ली को चूहे में रस है। तो निश्चित ही चूहे में कुछ ऐसा नहीं है जिसके कारण बिल्ला को रस है। बिल्ली में ही कुछ ऐसा है, जो चूहे में रस है। कुत्ते में ही कुछ ऐसा है, जो हड्डी में रस है।

हमारी वृत्ति में कहीं रस का कारण है, विषय-वस्तु में नहीं। यह पहला विश्लेषण है।

मैं पढ़ रहा था, दूसरे महायुद्ध में एक घटना घटी। बर्मा के जंगलों में सिपाहियों का एक जत्था, सैनिकों का एक जत्था जूझ रहा है युद्ध में। महीनों हो गए। उन युवकों ने स्त्री की शकल नहीं देखी। और एक दिन दोपहर को एक तोता उड़ा जोर से कहता हुआ कि बड़ी सुंदर युवती है, अत्यंत सुंदर युवती है। सैनिकों ने अपनी बंदूकें रख दीं। बहुत दिन हुए स्त्री नहीं देखी। और तोता कह रहा है तो वे सब तोते का पीछा करते हुए भागे कि कहा जा रहा है। और वे जब पहुंचे, परेशान, झाड़ियों को पार करके, तो वहा कोई स्त्री न थी। एक मादा तोता, जिसकी वह तोता खबर कर रहा था। उन्होंने अपना सिर पीट लिया कि कहा इस नासमझ की बातों में पड़े!

लेकिन तोते का रस मादा तोते में है। तुम्हें कोई रस नहीं मालूम होता मादा तोते मे। मादा तोते में कोई रस है भी नहीं। वह तो नर तोते की धारणा में है। पुरुष को स्त्री में रस मालूम होता है। स्त्री को पुरुष में रस मालूम होता है। वह रस बाहर नहीं है, वह तुम्हारी भावदशा में है। वह तुममें है। बुखार के बाद स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन में स्वाद नहीं मालूम होता। तुम्हारी जीभ ही बदल गयी है। तुम्हारी जीभ में स्वाद लेने की जो क्षमता है, वही नहीं रही है। भोजन में थोड़े ही स्वाद होता है। स्वाद तुम्हारी जीभ की क्षमता है। जब तुम स्वस्थ होते हो, स्वाद होता है। जब अस्वस्थ होते हो, स्वाद खो जाता है।

जीवन का जो रस है, वह वस्तु में और विषय में नहीं है, वह स्वयं तुममें है। और जब तक तुम उसे विषय में देखोगे, तब तक तुम गलत मार्ग पर भटकते रहोगे, क्योंकि तुम विषय का पीछा करोगे। जब तुम देखोगे कि वह रस मुझमें ही है, वह मैंने ही डाला है वस्तु में, वह मैंने ही प्रक्षेपित किया है, वह रस मैंने ही आरोपित किया है, उसी दिन तुम्हारे जीवन में क्रांति शुरू हो जाएगी। तब रस को खोजना हो तो अपने भीतर गहरे जाओ। अब बाहर जाने की कोई जरूरत न रही।

दुनिया में दो ही तरह की यात्राएं हैं। एक -बाहर की यात्रा है। अधिक लोग उसी यात्रा पर जाते हैं, क्योंकि उनको दिखता है कि रस बाहर है। हड्डियों में रस मालूम होता है। फिर कुछ लोग जाग जाते है। और उन्हें दिखायी पड़ता है, बाहर तो रस नहीं है, रस मैं ही डालता हूं। मैं ही डालता हूं और मैं ही अपने को भरमा लेता हूं। रस मुझमें है। तो फिर वे अंतर्यात्रा पर जाते हैं।

उस अंतर्यात्रा को ही बुद्ध ने योग कहा है।

‘विषय-रस में शुभ देखते हुए विहार करने वाले, इंद्रियों में असंयत।’

और जब तुम विषय-रस में देखोगे रस, विषय में देखोगे रस, तब तुम्हारी इंद्रिया अपने आप असंयत हो जाएंगी। क्योंकि मन चाहता है, भोग लो जितना ज्यादा भोग सको। कुछ चूक न जाए। समय भागा जाता है। जीवन चुका जाता है। मौत करीब आती चली जाती है। कुछ छूट न जाए। कुछ ऐसा न रह जाए कि मन में पछतावा रहे कि भोग न पाए। तो भोग लो, ज्यादा से ज्यादा भोग लो। उस ज्यादा की दौड़ से असंयम पैदा होता है।

आंख थक जाती है, तो भी तुम रूप को देखे चले जाते हो। जीभ थक जाती है, तो भी तुम भोजन किए चले जाते हो। पेट और लेने को तैयार नहीं है, फिर भी तुम भरे चले जाते हो। तब रस तो दूर रहा, विरस पैदा होता है। ज्यादा खाने से कोई आनंदित नहीं होता, पीड़ित होता है। ज्यादा देखने से आंखें सौंदर्य से नहीं भरती, सिर्फ थक जाता हैं, धूमिल हो जाती हैं। ज्यादा दौड़ने से, धन-वस्तुएं इकट्ठी करने से भीतर एक तरह की रिक्तता बढ़ती जाती है, कुछ भराव नहीं आता। लेकिन मरते दम तक, आखिरी क्षण तक आदमी भोग लेना चाहता है। मैंने सुना है-

गो हाथ को जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है

रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

मर रहे हो, हाथ नहीं हिल सकता-

गो हाथ को जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है

अभी देख तो सकता हूं। इसलिए शराब की प्याली तुम मेरे सामने से मत हटाओ।

हाथ बढ़ाकर पी भी नहीं सकता।

रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

पर देख तो सकता हूं।

मरते दम तक, जब तक आखिरी श्वास चलती है, तब तक भोग का रस बना रहता है। वह छूटता ही नहीं। जवानी चली जाती है, बुढ़ापा घेर लेता है, लेकिन मन जवान ही बना रहता है। मन उन्हीं तरंगों से भरा रहता है, जो जवानी में तो संगत भी हो सकती थीं-तूफान था। अब तो तूफान भी जा चुका, तूफान के चिह्न रह गए हैं रेत के तट पर बने, याददाश्त रह गयी है। लेकिन याददाश्त भी भरमाती है, सपने बनाती है। मन में तो व्यक्ति जवान ही बना रहता है। मौत आ जाती है, लेकिन भीतर आदमी जीवन के रस में ही डूबा रहता है। तब दुख न हो तो क्या हो?

दुख का अर्थ है, जहां नहीं था वहा खोजा। दुख का और क्या अर्थ है? रेत से तेल निकालने की चेष्टा की। आकाश-कुसुम तोड़ने चाहे, जो थे ही नहीं। खरगोश के सींग खोजे, जो थे ही नहीं। दुख का इतना ही अर्थ है, जो नहीं हो सकता था उसकी कामना की। फिर हाथ खाली रह जाते हैं, मन बुझा-बुझा। सब तरफ विफलता का ढेर लग जाता है। और वही ढेर तुम्हारी कब्र बन जाता है।

जब तक विषय में रस है और ऐसा दिखायी पड़ता है कि वहा सुख है जब तक आख भीतर नहीं मुड़ी और यह नहीं दिखायी पड़ा कि सुख मैंने डाला है, वह मेरी दृष्टि है, मैं जहां डालूं वहा सुख होगा; और जब मुझे यह समझ में आ जाए कि सुख मुझमें ही है-तो फिर डालने का सवाल क्या-मैं अपने में डूब जाऊं तो महासुख होगा, आनंद होगा। जब तक वैसी घड़ी नहीं घटती, तब तक इंद्रिया असंयत होंगी। जब दृष्टि ही भ्रांत है तो संयम नहीं हो सकता।

संयम तो संतुलित दृष्टि का परिणाम है। संयम तो सम्यक दृष्टि का परिणाम है। सम्यक का अर्थ है, जहां है वहा दिखायी पड़े, जहां नहीं है वहा दिखायी न पड़े। तो फिर खोज सार्थक हो जाती है ‘ तो उपलब्धि होती है, तो सिद्धि होती है, तो जीवन में सुख के फूल लगते हैं, तो आनंद का अहो१गव पैदा होता है।

‘विषय-रस में सुख देखते हुए विहार करने वाले, इंद्रियों में असंयत, भोजन में मात्रा न जानने वाले, आलसी और अनुद्यमी पुरुष को मार वैसे ही गिरा देता है जैसे आधी दुर्बल वृक्ष को।

मार बुद्ध का शब्द है, कामवासना के देवता के लिए। यह शब्द बड़ा अच्छा है। यह राम का बिलकुल उलटा है। अगर राम को उलटा करके लिखें तो म, फिर बड़े अ की मात्रा, और फिर र। ठीक उलटा हो जाए तो मार हो जाता है। मार बुद्ध का शब्द है, कामवासना के देवता के लिए। और दो ही चित्तदशाए हैं। या तो मार से प्रभावित, या राम से आंदोलित। या तो तुम भीतर की तरफ चलो, तब तुम राम की तरफ चले; या तुम बाहर की तरफ चलो, तब तुम मार की तरफ चले।

‘मार उस व्यक्ति को वैसे ही गिरा देता है जैसे आधी दुर्बल वृक्ष को।’

कामवासना का देवता शक्तिशाली नहीं है, तुम दुर्बल हो। इस बात को ठीक से स्मरण रखो। कामवासना का देवता शक्तिशाली नहीं है। और अगर तुम गिर गए हो, तो उसकी शक्ति के कारण नहीं गिरे हो। तुम गिरे हो अपनी दुर्बलता के कारण। जैसे कि कोई सूखा जड़ से टूटा वृक्ष, दुर्बल हुआ, दीन-जर्जर हुआ, वृद्ध हुआ, आधी में गिर जाता है। आधी न भी आती तो भी गिरता। आधी तो बहाना है। आधी तो मन समझाने की बात है। क्योंकि ऐसे ही गिर गए बिना किसी के गिराए, तो चित्त को और भी पीड़ा होगी। न भी आधी आती तो वृक्ष गिरता ही। अपनी ही दुर्बलता गिराती है। दूसरे की सबलता का सवाल नहीं है। क्योंकि वस्तुत: वहा कोई वासना का देवता खड़ा नहीं है, जो तुम्हें गिरा रहा है। तुम ही गिरते हो। अपनी दुर्बलता से गिरते हो।

और आदमी दुर्बल कैसे हो जाता है? जो जहां नहीं है वहा खोजने से धीरे-धीरे अपने पर आस्था खो जाती है। व्यर्थ में सार्थक को खोजने से और न पाने से आत्मविश्वास डिग जाता है। पैर लड़खड़ा जाते हैं। और जीवनभर असफलता हाथ लगती हो तो स्वाभाविक है कि भरोसा नष्ट हो जाए। और आदमी डरने लगे, कंपने लगे। पैर उठाए उसके पहले ही जानने लगेगा कि मंजिल तो मिलनी नहीं है, यात्रा व्यर्थ है, क्योंकि हजारों बार यात्रा की है और कभी कुछ हाथ लेकर लौटा नहीं। हाथ खाली के खाली रहे।

आलसी और अनुद्यमी।

आलस्य असंयत जीवन का परिणाम है। जितना ही इंद्रियां असंयत होंगी और जितना ही वस्तुओं में, विषयों में रस होगा, उतना ही स्वभावत: आलस्य पैदा होगा। आलस्य इस बात की खबर है कि तुम्हारी जीवन-ऊर्जा एक संगीत में बंधी हुई नहीं है। आलस्य इस बात की खबर है कि तुम्हारी जीवन-ऊर्जा अपने भीतर ही संघर्षरत है। तुम एक गहरे युद्ध में हो। तुम अपने से ही लड़ रहे हो। अपना ही घात कर रहे हो।

उद्यम बुद्ध उसी को कहते हैं जब तुम्हारी जीवन-ऊर्जा एक संगीत में प्रवाहित होती है। तुम्हारे सब स्वर एक लय में बद्ध हो जाते हैं। तुम एक पुंजीभूत शक्ति हो जाते हो। तब तुम्हारे भीतर बड़ी ताजगी है, बड़े जीवन का उद्दाम वेग है। तब तुम्हारे भीतर जीवन की चुनौती लेने की सामर्थ्य है। तब तुम जीवंत हो। अन्यथा मरने के पहले ही लोग मर जाते हैं। मौत तो बहुत बाद में मारती है, तुम्हारी नासमझी बहुत पहले ही मार डालती है।

‘विषय-रस में अशुभ देखते हुए विहार करने वाले, इंद्रियों में संयत, भोजन में मात्रा जानने वाले, श्रद्धावान और उद्यमी पुरुष को मार वैसे ही नहीं डिगाता जैसे आधी शैल पर्वत को।

आधी आती है, जाती है। कोई हिमालय उससे डिगता नहीं। पर तुम्हारे भीतर हिमालय की शात, संयत दशा होनी चाहिए। हिमालय एक प्रतीक है। बहुमूल्य शैल-शिखर। अर्थ केवल इतना है कि तुम जब भीतर अडिग हो, जब तुम्हें कुछ भी डिगाता नहीं, जब तुम ऐसे स्थिर हो जैसे शैल-शिखर-आधी आती है, चली जाती है; तुम वैसे ही खड़े रहते हो जैसे पहले थे-तब तो ऐसा होगा कि आधी तुम्हें और स्वच्छ कर जाएगी। गिराना तो दूर, तुम्हारी धूल-झंखाड़ झाडू जाएगी। तुम्हें और नया कर जाएगी, ताजा कर जाएगी।

इसे ऐसा समझो कि तुम राह से गुजरते हो। एक सुंदर युवती पास से गुजर गयी। इस सुंदर युवती में जीवन की एक धारा, एक तरंग तुम्हारे पास से गुजरी। अगर तुम्हारी ऐसी भ्रांत चित्त की दशा है कि रस विषय में है, तो तुम कंप जाओगे। तो यह स्त्री का गुजर जाना या पुरुष का गुजर जाना, तुम्हें ऐसे कंपा जाएगा जैसे कि कोई सूखे, मरते हुए वृक्ष को आधी कंपा जाए। गिरने-गिरने को हो जाए, या गिर ही जाए। तब तुम पाओगे कि यह घटना दुर्भाग्यपूर्ण हो गयी। लेकिन अगर तुम संयत हो, अगर तुम शात हो, अगर तुम मौन हो और अडिग हो, अगर ध्यान की तुम्हारे जीवन में थोड़ी सी भी किरण उतरी है, अगर तुमने थोड़ा सा भी जाना है कि चैतन्य का शात हो जाना क्या है, तुमने अगर अपने भीतर बैठने और खड़े होने की कला थोड़ी सी भी सीखी है, और उस घड़ी में-जब एक सुंदर युवती पास से निकली या एक सुंदर युवक पास से निकला-अगर तुम अपने भीतर ध्यान में खड़े रहे, तो तुम पाओगे कि उस स्त्री का सौंदर्य, वह जीवन की धारा तुम्हें निखार गयी, तुम्हें ताजा कर गयी, तुम्हें प्रफुल्लित कर गयी। जैसे आधी निकल गयी हो और वृक्ष पर जमी हुई धूल वर्षो की झड़ गयी हो। वृक्ष और ताजा हो गया।

जीवन को देखने के ढंग पर सब कुछ निर्भर है। अगर तुम्हारे देखने का ढंग गलत है, तो जीवन तुम्हारे साथ जो भी करेगा वह गलत होगा। तुम्हारा देखने का ढंग सही है, तो जीवन तो यही है, कोई और दूसरा जीवन नहीं है, लेकिन तब तुम्हारे साथ जो भी होगा वही ठीक होगा।

बुद्ध भी इसी पृथ्वी से गुजरते हैं, तुम भी इसी पृथ्वी सै गुजरते हो। यही चांद-तारे हैं। यही आकाश है। यही फूल हैं। लेकिन एक के जीवन में रोज पवित्रता बढ़ती चली जाती है। एक रोज-रोज निर्दोष होता चला जाता है। निखरता चला जाता है। और दूसरा रोज-रोज दबता चला जाता है, बोझिल होता जाता है, धूल से भरता जाता है, अपवित्र होता जाता है, गंदा होता जाता है। मृत्यु जब बुद्ध को लेने आएगी तो वहा तो पाएगी मंदिर की पवित्रता, वहा तो पाएगी मदिर की धूप, मंदिर के फूल। वहा तो पाएगी एक कुंवारापन, जिसको कुछ भी विकृत न कर पाया।

जैसा कबीर ने कहा है, ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया। तो बुद्ध तो चादर को वैसा का वैसा रख देंगे।

मुझे तो लगता है कि कबीर ने जो कहा, वह थोड़ा अंडरस्टेटमेंट है। वह अतिशयोक्ति तो है ही नहीं, सत्य को भी बहुत धीमे स्वर में कहा है। क्योंकि मेरी दृष्टि ऐसी है कि जब बुद्ध चादर को लौटाएंगे तो वह और भी पवित्र होगी। उससे भी ज्यादा पवित्र होगी जैसी उन्होंने पायी थी। होनी ही चाहिए। क्योंकि जैसे अपवित्रता बढ़ती है और विकासमान है, वैसे ही पवित्रता भी बढ़ती है और विकासमान है। जो पवित्रता बुद्ध को बीज की तरह मिली थी, बुद्ध उसे एक बड़े वृक्ष की तरह लौटाएंगे।

जीसस एक कहानी कहते थे, कि एक बाप चिंतित था’। तीन उसके बेटे थे और बड़ा उसकें पास धन, बड़ी समृद्धि थी। कुछ तय न कर पाता था, किस बेटे को मालिक बनाए। तो उसने एक तरकीब की। उसने तीनों बेटों को बुलाया और तीनों बेटों को समान मात्रा में फूलों के बीज दिए और कहा कि मैं तीर्थयात्रा को जा रहा हूं, इनको तुम सम्हालकर रखना। जब मैं वापस आऊं, तो मुझे वापस लौटा देना। और ध्यान रहे, इस पर बहुत कुछ निर्भर है। इसलिए लापरवाही मत करना। ये बीज ही नहीं हैं, तुम्हारा भविष्य!

बाप तीन वर्ष बाद वापस लौटा। बड़े बेटे ने सोचा कि इन बीज को कहां सम्हालकर रखेंगे? सड़ जाएंगे। और कुछ कम-बढ़ हो गया, झंझट होगी; और बाप कह गया है, तुम्हारा भविष्य! तो उसने सोचा, यही उचित होगा कि इनको बाजार में बेच दिया जाए। पैसे को सम्हालकर रखना आसान होगा। फिर जब बाप लौटेगा, फिर बाजार से खरीदकर बीज उसको लौटा देंगे। यह बात ठीक गणित की थी। दूसरे बेटे ने सोचा कि कैसे सम्हाला जाए? बीज कहीं खो न जाएं, कुछ कमी न हो जाए, सड़ न जाएं, कुछ गड़बड़ न हो जाए। और फिर जो बीज दिए हैं, कहीं बाप उन्हीं की जिद्द न करे, तो बेचना तो उचित नहीं है। और जब उसने कहा, भविष्य इन पर निर्भर है; तो उसने एक तिजोड़ी में सब बीजों को बंद करके, ताला लगाकर चाबी सम्हालकर रख ली।

तीसरे बेटे ने बीजों को जाकर बो दिया बग़ीचे में। क्योंकि बीज कहीं तिजोड़ी में सम्हाले जाते हैं? और बाप ने जो अमानत दी है, वह कोई बाजार में बेचने की बात है? फिर खरीदकर भी लौटा देंगे, तो वे वही बीज तो न होंगे। और बीज तो विकासमान है। उसको सम्हालकर रखने में तो या तो वह सकेगें, खराब होगा। और एक बीज तो करोड़ बीज हो सकता है। जब पिता लौटेंगे, तब तक और बहुत बीज लग जाएंगे।

तीन वर्ष बाद जब पिता लौटा तो उसने बड़े बेटे को कहा। वह भागा बाजार की तरफ। उसने कहा, रुकिए, अभी लाता हूं। वह बाजार से बीज खरीद लाया, ठीक उसी मात्रा में थे। लेकिन बाप ने कहा, ये मेरे बीज नहीं हैं। जो मैंने दिए थे वे तूने कहीं गंवा दिए। ये कोई और बीज होंगे। लेकिन जो मैंने तुम्हें सम्हालने ‘को दिए थे वे कहा हैं?

दूसरे बेटे को कहा। उसने तिजोड़ी सामने लाकर खोल दी। वहा से सिर्फ दुर्गंध उठी। क्योंकि सब बीज सड़ गए थे। राख थी वहा अब। बाप ने कहा, मैंने तुम्हें बीज दिए थे और तुम राख लौटाते हो! तो बेटे ने कहा, ये वही बीज हैं। बाप ने कहा, ये वही नहीं हैं। दूसरे ने तो कम से कम बीज लौटाए हैं-दूसरे बीज हैं, तुम्हारे तो बीज भी नहीं हैं। यह तो राख है। मैंने तुम्हें बीज दिए थे। बीज का मतलब होता है, जो अंकुरित हो सके। क्या यह राख अंकुरित हो सकेगी? क्या इसमें फूल लग सकेंगे? तीसरे बेटे को पूछा। बेटे ने कहा, आप मकान के पीछे आएं, क्योंकि बीज वहा हैं जहां उन्हें होना चाहिए। पीछे करोड़ों फूल खिले थे। और बेटे ने कहा, अभी जल्दी फसल आने के करीब है, हम बीज आपके लौटा देंगे। लेकिन हम उतने ही लौटाने में असमर्थ हैं जितने आपने दिए थे। करोड़ गुना हो गए। और उतने ही क्या लौटाना! क्योंकि बीज का अर्थ ही होता है, जो बढ़ रहा है, जो प्रतिपल विकासमान है। उसको उतना ही कैसे लौटाया जा सकता है? उसको उतना ही लौटाने का तो पहला उपाय है जो बड़े भाई ने किया। बेच दिया बाजार में, दूसरे खरीद लाया। और वही बीज भी मैं आपको नहीं लौटा सकता हूं उनकी संतान लौटा सकता हूं। चूंकि वही बीज तो सड़ जाते। उनके लौटाने का तो ढंग वही है जो मेरे दूसरे भाई ने किया; जिसने आपको राख दी। लेकिन जिन बीजों से सुगंध उठ सकती है उनको दुर्गंध की शकल में लौटाना मुझे न भाया। ये आपके बीज हैं, आप सम्हाल लें। ये सारे फूल आपके हैं। थोड़े से बीज करोड़ गुना हो गए थे। नहीं, कबीर ने जो कहा है वह अतिशयोक्ति नहीं, उन्होंने सत्य को बड़े धीमे स्वर में कहा है, ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया। बुद्धों ने चदरिया को और भी निखारकर लौटाया है। जो बीज थे उसको फूल की तरह लौटाया है। पवित्रता बढ़ती है प्रतिपल, जैसे अपवित्रता बढ़ती है। तुम जिसे सम्हालोगे वही बढ़ने लगता है। जीवन में कोई चीज रुकी हुई नहीं है, सभी चीजें गतिमान हैं। जीवन एक प्रवाह है। या तो पीछे की तरफ जाओ, या आगे की तरफ जाओ, रुकने का कोई उपाय नहीं है। जो जरा भी रुका, वह भटका।

ये पंक्तियां ध्यान से सुनो–

जुस्तजु-ए-मंजिल में इक जरा जो दम लेने

काफिले ठहरते हैं राह भूल जाते हैं जरा दम लेने!

जुस्तजु-ए-मंजिल में इक जरा जो दम लेने

इस जिंदगी की राह पर, यात्रा पर जरा दम लेने को भी जो ठहरते हैं।

काफिले ठहरते हैं राह भूल जाते हैं

जो रुका, वह भूला। जो जरा ठहर।’, वह भटका। क्योंकि जो आगे न गया, वह पीछे गया। जो बढ़ा नहीं, वह गिरा। जो चला नहीं, वह पीछे सरका। क्योंकि जीवन गति है, यहां ठहराव नहीं है। एडिंगटन का बहुत प्रसिद्ध वचन है कि मनुष्य की भाषा में रेस्ट शब्द-ठहराव-सबसे झूठा शब्द है। क्योंकि ऐसी कोई घटना कहीं नहीं। कोई चीज ठहरी हुई नहीं है।

तुम यहां बैठे हो, ठहरे हुए नहीं हो। तुम लगते हो बैठे हो। चल रहे हो। प्रतिपल बढ़ रहे हो। रात सो रहे हो, तब भी ठहरे हुए नहीं हो। बिस्तर पर भी हजारों प्रक्रियाएं चल रही हैं। तुम्हारा जीवन गतिमान है। रात भी नदी बह रही है, सुबह भी नदी बह रही है, दिन भी नदी बह रही है। अंधेरा हो कि उजाला, आकाश में बादल घिरे हों कि आकाश खुला हो, नदी बह रही है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि रात सोते समय भी तुम्हारा मस्तिष्क पूरा काम कर रहा है। सीना पूरा काम कर रहा है। श्वास चल रही है। शरीर में खून शुद्ध किया जा रहा है। भोजन पचाया जा रहा है। तुम के हो रहे हो, जवान हो रहे हो। कुछ घट रहा है। रुकाव जैसी कोई चीज नहीं है। पत्थर भी ठहरा हुआ नहीं है। क्योंकि पत्थर भी रेत होने के रास्ते पर आगे बढ़ा जा रहा है। आज पत्थर है, कल रेत हो जाएगा। कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। ठहराव झूठ है। ठहराव भ्रांति है। गति सत्य है।

बुद्ध ने तो गति को इतने आत्यंतिक ऊंचाई पर उठाया कि बुद्ध ने कहा कि जहां भी तुम्हें कोई चीज ठहरी हुई मालूम पड़े, वहीं समझ लेना झूठ है।

इसलिए बुद्ध ने परमात्मा शब्द का उपयोग नहीं किया। क्योंकि परमात्मा शब्द में ही ठहराव. मालूम होता है। परमात्मा का मतलब है, जो हो चुका और अब नहीं हो सकता। जिसमें कोई गति नहीं। परमात्मा में गति कैसे होगी? क्योंकि. गति तो अपूर्ण में होती है। पूर्ण में कैसी गति? वह तो है ही वही जो होना चाहिए। अब उसमें कुछ और हो नहीं सकता। परमात्मा का नहीं हो रहा, ज्यादा तानी नहीं हो रहा, अज्ञानी नहीं हो रहा, पवित्र नहीं हो रहा, अपवित्र नहीं हो रहा।

बुद्ध ने कहा, ऐसी कोई चीज है ही नहीं। बुद्ध ने कहा, ‘है’ शब्द झूठ है; ‘होना’ शब्द सत्य है। जब तुम कहते हो, पहाड़ है, तो बुद्ध कहते हैं, ऐसा मत कहो, पहाड़ है। ऐसा कहो, पहाड़ हो रहा है। बुद्ध के प्रभाव में जो भाषाएं विकसित हुईं, जैसे बर्मी, जो कि बुद्ध-धर्म के पहुंचने के बाद भाषा बनी, तो वहा ‘है’ जैसा कोई शब्द नहीं है बर्मी भाषा में। जब पहली दफा बाइबिल का अनुवादकिया बर्मी भाषा में तो बड़ी कठिनाई आयी।’ गॉड इज’, इसको कैसे अनुवाद करो? ‘ईश्वर है’-इसके लिए कोई ठीक-ठीक रूपांतरण बर्मी भाषा में नहीं होता। और जब रूपांतरण करो तो उसका मतलब होता है-‘गॉड इज बिकर्मिग’ –ईश्वर हो रहा है। क्योंकि वह बुद्ध के प्रभाव में भाषा बनी है। बुद्ध ने कहा, हर चीज हो रही है। तुम जवान हो, ऐसा कहना ठीक नहीं है। जवान हो रहे हो। के हो, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। बूढ़े हो रहे हो। जीवन है, ऐसा कहना ठीक नहीं। जीवन हो रहा है। मृत्यु है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं। मृत्यु हो रही है। जगत में क्रियाएं हैं, घटनाएं नहीं।

इसलिए बुद्ध ने कहा, कोई परमात्मा नहीं है। और बुद्ध ने कहा, कोई आत्मा भी नहीं है। क्योंकि ये तो थिर चीजें मालूम पड़ती है। आत्मा, जैसे कोई ठहरा हुआ पत्थर भीतर रखा है। बुद्ध ने कहा, ऐसा कुछ भी नहीं है। चीजें हो रही हैं।

बुद्ध ने जो प्रतीक लिया है जीवन को समझाने के लिए, वह है दीए की ज्योति। सांझ को तुम दीया जलाते हो। रातभर दीया जलता है, अंधरे से लड़ता है। सुबह तुम दीया बुझाते हो। क्या तुम वही ज्योति बुझाते हो जो तुमने रात जलायी थी? वही ज्योति तो तुम कैसे बुझाओगे? वह ज्योति तो करोड़ बार बुझ चुकी। ज्योति तो प्रतिपल बुझ रही है, धुआ होती जा रही है। नयी ज्योति उसकी जगह आती जा रही है। रात तुमने जो ज्योति जलायी थी वह सुबह तुम उसे थोड़े ही बुझाओगे। उसी की श्रृंखला को बुझाओगे, उसी को नहीं। वह तो जा रही है, भागी जा रही है, तिरोहित हुई जा रही है आकाश में। नयी ज्योति प्रतिपल उसकी जगह आ रही है।

तो बुद्ध ने कहा, तुम्हारे भीतर कोई आत्मा है ऐसा नहीं, चित्त का प्रवाह है। एक चित्त जा रहा है, दूसरा आ रहा है। जैसे दीए की ज्योति आ रही है। तुम वही न मरोगे जो तुम पैदा हुए थे। जो पैदा हुआ था, वह तो कभी का मर चुका। जो मरेगा वह उसी संतति में होगा, उसी श्रृंखला में होगा, लेकिन वही नहीं।

यह बुद्ध की धारणा बड़ी अनूठी है। लेकिन बुद्ध ने जीवन को पहली दफा जीवंत करके देखा। और जीवन को क्रिया में देखा, गति में देखा। और जो भी आलस्य में पडा है, जो रुक गया है, ठहर गया है, जो नदी न रहा और सरोवर बन गया, वह सड़ेगा।

‘विषय-रस में अशुभ देखते हुए विहार करने वाले, इंद्रियों में संयत, भोजन में मात्रा जानने वाले, श्रद्धावान और उद्यमी पुरुष को मार वैसे ही नहीं डिगाता जैसे आधी शैल-पर्वत को।’

तुम्हारी निर्बलता और दुर्बलता का सवाल है। जब तुम हारते हो, अपनी दुर्बलता से हारते हो। जब तुम जीतते हो, अपनी सबलता से जीतते हो। वहां कोई तुम्‍हें हराने को बैठा नहीं है। इस बात को खयाल में ले लो। शैतान है नहीं, मार है नहीं। तुम्हारी दुर्बलता का ही नाम है। जब तुम दुर्बल हो, तब शैतान है। जब तुम सबल हो, तब शैतान नहीं है। तुम्हारा भय ही भूत है। तुम्हारी कमजोरी ही तुम्हारी हार है।

इसलिए यह जो हम बहाने खोज लेते हैं अपना उत्तरदायित्व किसी के कंधे पर डाले देने का, कि शैतान ने भटका दिया, कि क्या करें मजबूरी है, पाप ने पकड़ लिया। कोई पाप है कहीं जो तुम्हें पकड़ रहा है? तुमने भला पाप को पकड़ा हो, पाप तुम्हें कैसे पकड़ेगा?

तो मार तो केवल एक काल्पनिक शब्द है। इस बात की खबर देने के लिए कि तुम जितने कमजोर होते हो उतना ही तुम्हारी कमजोरी के कारण, तुम्हारी कमजोरी से ही आविर्भूत होता है तुम्हारा शत्रु। तुम जितने सबल होते हो, उतना ही शत्रु विसर्जित हो जाता है।

सबल होने की कला योग है। कैसे तुम अपने भीतर संयत हो जाओ। तो हर चीज सम्यक होनी चाहिए। इंद्रियों का उपयोग संयम से भरा होना चाहिए। बुद्ध अपने भिक्षुओं को कहते थे, जब तुम राह पर चलो, चार कदम आगे से ज्यादा मत देखो। कोई जरूरत नहीं है। चार कदम आगे देखना पर्याप्त है। उतना संयम है। लेकिन तुम भी चलते हो रास्ते पर। जिस दीवाल पर लिखे हुए इश्तहार को तुम हजार बार पढ़ चुके हो, उसको आज फिर पढ़कर आए हो। वह चाहे हिमकल्याण तेल हो, या बंदर छाप काला दंतमंजन हो, उसको तुम कितनी बार पढ़ चुके हो। उसे तुम क्यों बार-बार पढ़ रहे हो?

तुम उसे पढ़ो न-बुद्ध की तरह अगर तुम चार कदम नीचे देखकर चलो-तो दीवाले अपने आप साफ हो जाएं। लोग लिखना बंद कर दें। तुम पढ़ते हो, इसलिए वे लिखते हैं। तुम जब तक पढ़ते रहोगे तब तक वे लिखते रहेंगे। क्योंकि बार-बार पढ़कर तुम्हारे मन में एक सम्मोहन पैदा होता है। बंदर छाप काला दंतमंजन, बंदर छाप काला दंतमंजन…। जब तुम दुकान पर दंतमंजन खरीदने जाओगे, तुम्हें याद ही न पड़ेगा तुम्हारे मुंह से कब निकल गया-बंदर छाप काला दंतमंजन।

तुम सोचते हो सोच-विचार कर खरीद रहे हो। वह बार-बार की पुनरुक्ति ने तुम्हें सम्मोहित किया। बार-बार की पुनरुक्ति ने तुम्हारे मन पर संस्कार छोड़ दिए। तुम उन्हीं को दोहराए चले जा रहे हो। इसलिए तो विज्ञापन का इतना भारी उपयोग है। लोग चीजें बाद में बनाते हैं, विज्ञापन पहले चला देते हैं।

अमरीका में तो दो-तीन साल बाद प्रोडक्शन शुरू होगा उस चीज का, उत्पत्ति शुरू होगी, तीन साल पहले विज्ञापन शुरू हो जाता है। क्योंकि बाजार पहले बनाना पड़ता है। माग पहले पैदा करनी पड़ती है। और जब माग पैदा हो जाती है, तो ही बाजार में सामान लाने की कोई जरूरत है। और आदमी ऐसा पागल है कि किसी भी चीज के लिए उसको तुम खरीदने के लिए राजी कर सकते हो, सिर्फ दीवालों पर, अखबारों में, रेडियो पर, टेलीविजन पर दोहराने की जरूरत है। कुछ भी दोहराओ, आदमी तैयार हो जाएगा खरीदने को। क्योंकि उसे लगेगा कि पता नहीं कौन सा सुख मैं चूका जा रहा हूं? जो इस चीज से मिलने वाला है।

सुख की भ्रांति दो, सुख की आशा बंधाओ और कोई भी चीज बेची जा सकती है। आदमी से ज्यादा मूढ़ कोई और दूसरा जानवर पृथ्वी पर नहीं है। तुम किसी भैंस को भी राजी नहीं कर सकते। वह अपनी प्रकृति से जीती है। जो घास खाना है, वही खाती है। तुम कितना ही विज्ञापन करो, तुम कितना ही बैंड-बाजा बजाओ, वह बिलकुल फिकर न करेगी। लेकिन आदमी, तत्क्षण! क्योंकि आदमी अपनी प्रकृति भूल गया है। तो ऐसी चीजें खा रहा है जिनमें कुछ, कोई भी पौष्टिकता नहीं है। लेकिन विज्ञापन चला रहा है उन चीजों को, तो वह खाएगा।

धीरे-धीरे सभी चीजें अपनी पौष्टिकता खोती जा रही हैं। क्योंकि यह सवाल ही नहीं है कि उनमें जीवनदायी-तत्व होने चाहिए। रंग अच्छा होना चाहिए, गंध अच्छी होनी चाहिए। अब रंग और गंध से कोई पौष्टिकता का संबंध नहीं है। रंग और गंध तो ऊपर से डाली जा सकती हैं। डाली जा रही हैं। भोजन रंगीन दिखना चाहिए, सुगंध अच्छी आनी चाहिए; फिर उससे खून बनता है या नहीं, यह सवाल नहीं है। फिर उससे हड्डी बनती है या नहीं, यह सवाल नहीं है। तुम किसी जानवर को धोखा नहीं दे सकते। वह जानता है कि क्या उसके जीवन में उपयोगी है। लेकिन आदमी को धोखा दिया जा सकता है। दिया जा रहा है। हर चीज के लिए तुम उसे राजी कर सकते हो, ठीक विज्ञापन की जरूरत है।

बुद्ध कहते थे, चार कदम से आगे देखना ही मत। क्योंकि उतना चलने के लिए पर्याप्त है। इसको वह संयम कहते हैं। बुद्ध कहते, जो सुनने योग्य नहीं है, उसे सुनना मत। जो छूने योग्य नहीं है, उसे छूना मत। जितना जीवन में जरूरी है, आवश्यक है, उससे पार मत जाना। और तुम अचानक पाओगे, तुम्हारे जीवन में शाति की वर्षा होने लगी। अशात तुम इसलिए हो कि जो गैर-जरूरी है उसके पीछे पड़े हो। जो मिल जाए तो कुछ न होगा, और न मिले तो प्राण खाए जा रहा है। गैर-जरूरी वही है जिसके मिलने से कुछ भी न मिलेगा, लेकिन जब तक नहीं मिला है तब तक रात की नींद हराम हो गयी है। तब तक सो नहीं सकते, शाति से बैठ नहीं सकते, क्योंकि मन में एक ही उथल-पुथल चल रही है कि घर में दो कार होनी चाहिए। एक कार गरीब आदमी के घर में होती है। दो कार होनी चाहिए।

पहले अमरीका में वे विज्ञापन करते थे कि कम से कम घर में एक कार होनी ही चाहिए। अब इतनी कारें तो घरों-घरों में हो गयी हैं-एक-एक कार तो हर घर में है। तब उन्होंने दूसरा विज्ञापन शुरू किया कि एक कार तो गरीब घर में होती है। अगर तुम सफल हो, तो कम से कम दो कार घर में होनी चाहिए। अब दो कार घर में होनी चाहिए! चाहे एक में भी बैठने वाले पर्याप्त न हों। लेकिन दो कार घर में होनी ही चाहिए। नहीं तो वह प्रतिष्ठा का सवाल है। अब कार कोई बैठने के लिए नहीं खरीदता अमरीका में, वह प्रतिष्ठा की बात है, वह प्रतिष्‍ठा, पावर। उससे शक्ति का पता चलता है कि तुम कितने शक्तिशाली हो।

अब उन्होंने वहां प्रचार करना शुरू किया है कि अगर तुम सफल हो गए हो, तो एक घर पहाड़ पर, एक घर समुद्र के तट पर और एक घर शहर में, कम से कम तीन घर तो होने ही चाहिए। आदमी एक ही घर में रह सकता है! तुम्हारे पास कितने कपड़े हैं? तुमने कितने इकट्ठे कर रखे हैं? कितने कपड़े तुम एक बार में पहन सकते हो? कितने जूते के अंबार लगा रखे हैं तुमने?

मैं घरों में ठहरता रहा हूं। कभी-कभी दंग होता हूं। भगवान की मूर्ति के लिए जगह नहीं है, जूतों के लिए अलमारियां लगा रखी हैं। एक जूता तुम पहनते हो। इतने जूते अनिवार्य नहीं हैं। जरा भी आवश्यक नहीं हैं। व्यर्थ इनको झाड़ना-पोंछना पड़ता है। तुम नाहक चमार बन गए हो। सुबह से इनको नाहक पोंछो, झाड़ो, तैयार करके रखो, एक तुम पहनोगे। लेकिन कोई तुम्हें समझा रहा है कहीं से, कि ऐसा होना चाहिए।

तुम अगर अपने जीवन की फेहरिश्त बनाओ कि तुमने कितना गैर-जरूरी इकट्ठा कर लिया है, तो तुम नब्बे प्रतिशत गैर-जरूरी पाओगे। और उस नब्बे प्रतिशत के लिए तुमने कितना श्रम उठाया! कितनी चिंता ली! कितने व्याकुल हुए! कितना व्यर्थ जीवन गंवाया! और अगर तुमसे कोई कहे ध्यान, इबादत, प्रार्थना, तुम कहते हो समय कहा है? समय है नहीं। समय होगा भी कैसे! क्योंकि व्यर्थ के लिए इतना समय दिया जा रहा है।

बुद्ध ने कहा है, जिस व्यक्ति को भी यह समझ में आ गया कि विषयों में रस नहीं है, वह संयत होने लगता है, अपने आप संयत होने लगता है। तब उसका जीवन वासनाग्रस्त नहीं होता। आवश्यकता से निश्चित ही मर्यादित होता है, लेकिन वासना से ग्रस्त नहीं होता। आवश्यकता की सीमा है। वासना की कोई सीमा नहीं। वासना

है एक तरह की विक्षिप्तता। आवश्यकता जीवन की जरूरत है। भोजन चाहिए, कपड़ा चाहिए, छप्पर चाहिए। एक आवश्यकता है, उतनी पूरी होनी चाहिए। और हर आदमी उसे पूरी कर लेता है। उसके कारण कोई चिंता नहीं है तुम्हारे भीतर। चिंता तुम्हारे भीतर उन चीजों के कारण है जो आवश्यक नहीं हैं। उन्हीं का तुम्हें रोग खाए जा रहा है।

‘विषय-रस में अशुभ देखते हुए विहार करने वाले, इंद्रियों में संयत, भोजन में मात्रा जानने वाले, श्रद्धावान और उद्यमी पुरुष को मार वैसे ही नहीं डिगाता जैसे आधी शैल-पर्वत को।’

बुद्ध के संघ में बहुत समय तक बुद्ध ने स्त्रियों को दीक्षा न दी। बहुत आग्रह करने पर, और एक बड़ी अनूठी महिला कृशा गौतमी के अत्यंत निवेदन करने पर बुद्ध ने स्वीकार किया। लेकिन तब उन्होंने कुछ नियम बनाए। जब वे नियम बनाते थे, तो उन्होंने भिक्षुओं से कई सवाल पूछे, नियम बनाने के निमित्त। और आनंद ने बहुत से प्रश्न उठाए नियमों के संबंध में, ताकि सब नियम विस्तारपूर्ण हो जाएं। तो आनंद ने पूछा कि कोई भिक्षु अगर किसी स्त्री को मार्ग पर मिले, या भिक्षुणी को मार्ग पर मिले, तो क्या व्यवहार होना चाहिए? तो बुद्ध ने कहा, भिक्षुणी, चाहे भिक्षु उम्र में उससे छोटा भी हो, तो भी उसे प्रणाम करे। यह बात जरा बुद्ध के मुंह में जमती नहीं। महावीर ने भी यही नियम बनाया-कि भिक्षुणी, साध्वी, चाहे सत्तर साल की हो, चाहे दीक्षा लिए हुए उसे पचास साल हो गए हों, और अभी कल के दीक्षित साधु के सामने भी आ जाए तो झुककर नमस्कार करे। साधु को ऊपर बिठाए, ‘स्वयं नीचे बैठे। यह बात महावीर के मुंह में भी जमती नहीं। क्योंकि दोनों स्वतंत्रता के बड़े, समानता के बड़े परिपोषक थे।

जैन और बौद्ध दोनों परेशान रहे हैं कि कैसे इन बातों को छिपाया जाए। वे उनकी चर्चा नहीं उठाते। लेकिन मैं इसमें बड़ा गहरा कारण देखता हूं। क्योंकि बुद्ध और महावीर जब ऐसी बात कहते हैं तो बड़े अर्थ हैं उनके। एक मनुष्य के मन की बड़ी गहरी बात बुद्ध ने पकड़ी। अगर कोई स्त्री पुरुष को सम्मान दे, तो फिर पुरुष की वासना उसके प्रति बहनी मुश्किल हो जाती है, कठिन हो जाती है। अगर कोई स्त्री तुम्हारे पैर छू ले, तो फिर वासना असंभव हो जाती है-उसने द्वार बंद कर दिया। क्योंकि पुरुष वासना में उसी स्त्री के प्रति झुक सकता है जिसने उसे सम्मान न दिया हो, जिसने उसे आदर न दिया हो। क्योंकि वासना में झुकने का मतलब है पुरुष खुद अपनी ही आंखों में अपने से नीचे गिरता है। इसलिए वेश्या के साथ तुम जितने वासना का संबंध बना सकते हो किसी और के साथ नहीं बना सकते। क्योंकि उसके सामने नीचे गिरने में कोई डर नहीं है। उसने कभी तुम्हें’ कोई आदर दिया नहीं। बुद्ध और महावीर ने, दोनों ने पुरुष के अहंकार को पकड़ लिया ठीक जगह, कि उसका अहंकार ही अगर रुक जाए तो ही रुक सकेगा, अन्यथा वासना का प्रवाह हो जाएगा। अगर कोई स्त्री तुम्हें बहुत सम्मान से चरण छू ले, तो उसने तुम्हें इतना सम्मान दिया कि अब तुम्हें इस सम्मान की रक्षा. करनी पड़ेगी। अब तुम्हें ऐसा व्यवहार करना पड़ेगा जिसमें उसका दिया गया सम्मान खंडित न हो। अब तुम वासना के तल पर नीचे न उतर सकोगे। उसने रास्ता रोक दिया।

आनंद ने पूछा कि अगर कोई ऐसी घड़ी आ जाए कि स्त्री और पुरुष साथ-साथ हों, भिक्षु-भिक्षुणी साथ-साथ हों, तो एक-दूसरे का स्पर्श? तो बुद्ध ने कहा, नहीं। पुरुष स्त्री को न छुए। स्त्री पुरुष को न छुए। आनंद ने कहा, और अगर कोई ऐसी मजबूरी आ जाए कि भिक्षुणी बीमार हो, या भिक्षु बीमार हो और सेवा करनी पड़े? तो बुद्ध ने कहा, वैसी दशा में छुए, लेकिन होश रखे।

पहले तो देखे न। अगर देखना पड़े, तो छुए न। अगर छूना पड़े तो मूर्च्छा में न रहे, होश रखे। भीतर जागा रहे। क्योंकि मनुष्य के मन की जो वासनाएं हैं उनकी आदत तो बड़ी प्राचीन है, और होश बड़ा नया है। ध्यान तो अभी साधा है, साधना शुरू किया है, और वासना बड़ी प्राचीन है। जन्मों-जन्मों की है। उसके संस्कार बड़े गहरे हैं। और जरा सी भी भूल-चूक हुई, जरा सा भी मन मूर्च्छित हुआ कि वासना के मार्ग से जीवन बहना शुरू हो जाता है, एक क्षण में। इधर तुम भूले, उधर वासना का प्रवाह शुरू हुआ। अगर जागे ही रहो, अगर भीतर होश को रखो, तो ही संभव है कि धीरे-धीरे पुरानी परिपाटी टूटे, पुरानी लीक मिटे, नया रास्ता बने। मार के साथ संबंध पुराने हैं। राम के साथ संबंध बनाने हैं।

‘जो असार को सार समझते हैं और सार को असार, वे मिथ्या संकल्प के भाजन लोग सार को प्राप्त नहीं होते।’

अगर तुमने सार को असार समझा है, असार को सार समझा है; अगर ऐसी विपरीत तुम्हारी बुद्धि है, तो फिर तुम कैसे सार को प्राप्त हो सकोगे? तुम तो फिर असार को सार समझकर खोजते रहोगे।

इसलिए तो एक बहुत मजे की घटना जीवन में घटती है। वह घटना यह है कि जब तक तुम्हें धन नहीं मिलता तब तक पता नहीं चलता कि धन असार है। जब मिलता है तब पता चलता है। ठीक भी है। क्योंकि जब तक मिला नहीं तब तक पता कैसे चले? तब तक तो तुम्हें सार दिखायी पड़ता है। जब मिल जाता है, तब बड़ी मुश्किल खड़ी होती है। क्योंकि जिसको सार मानकर इतने दिन खोजा, इतना श्रम उठाया, इतनी स्पर्धा की, इतने जूझे, इतना जीवन गंवाया, वह जब मिलता है, तब अचानक तुम हैरान हो जाते हो कि सार तो कहीं भी नहीं है। फिर भला तुम दूसरों से न कहो। क्योंकि अब -दूसरों से कहकर और फजीहत क्या करवानी है! और दूसरे हसेंगे। लेकिन तुम्हें समझ में आ जाता है।

इस संसार में जिनको तुम सफल कहते हो, उनको जितनी अपनी असफलता दिखायी पड़ती है उतनी किसी को भी दिखायी नहीं पड़ती। जिनको तुम अमीर कहते

हो, उनको जितनी अपनी गरीबी का पता चलता है उतना किसी को भी नहीं चलता। जिनको तुम पंडित कहते हो, उनको जितने अपने अज्ञान का बोध होता है, किसी को भी नहीं होता। कहें भले न। कहने के लिए हिम्मत चाहिए। कहने के लिए बड़ा दुस्साहस चाहिए। क्योंकि कहने का मतलब यह होगा कि मैं अपने पूरे जीवन को व्यर्थ घोषित करता हूं कि अब तक मैंने जो खोजा, जो मैंने श्रम उठाया, वह दो कौड़ी का साबित हुआ। मैं गलती में था। बड़ा मुश्किल होता है यह मानना कि मैं गलती में था। और सफलता के शिखर पर मानना तो अहंकार के बिलकुल प्रतिकूल हो जाता है।

लेकिन यही कथा है।

असफल ही सोचता है कि सार होगा धन में, सार होगा पद में। जो पद पर हैं, जो धन पर हैं, वे नहीं सोचते। सोच ही नहीं सकते। भले दिखावा करते हों, लेकिन भीतर से भवन गिर गया है। ऊपर से साज-सजावट बनाए रखते हों, नींव खिसक गयी है। अगर तुममें थोड़ी भी समझ हो और गहरे देखने की क्षमता हो, तो हर सफल आदमी में तुम असफलता को पाओगे। और हर आदमी की यश-कीर्ति में तुम बड़ा संतप्त हृदय पाओगे, रोता हुआ हृदय पाओगे। मुस्कुराहटों में अगर झांकने की क्षमता आ जाए, तो तुम छिपे हुए आंसू देख पाओगे।

‘जो असार को सार समझते हैं और सार को असार, वे मिथ्या संकल्प के भाजन लोग सार को प्राप्त नहीं होते।’

होंगे भी कैसे!

‘जो सार को सार जानते हैं और असार को असार, वे सम्यक संकल्प के भाजन लोग सार को प्राप्त होते हैं।’

सार क्या है, इसे जान लेना आधा पा लेना है। क्या है सार? अब तक जिंदगी में तुमने जो खोजा है, उसमें से तुम्हें क्या ऐसा लगता है जिसे सार कहा जा सके? धन खोज लिया; कल तुम मरोगे, वह पड़ा रह जाएगा। जो साथ न जा सके वह सार कैसे होगा? प्रशंसा पा ली, लोगों ने तालियां बजायीं और गजरे पहना दिए। गजरे क्षणभर बाद कुम्हला जाएंगे, तालियों की आवाज हो भी न पाएगी और खो जाएगी। और सारी दुनिया भी ताली बजाए तो भी सार क्या होगा? मिलेगा क्या? उससे तुम्हें कौन सी जीवन-संपदा उपलब्ध होगी? और फिर भरोसा कहा है? जो आज ताली बजाते हैं, वे कल गाली देने लगते हैं।

असल में जिसने भी ताली बजायी, वह गाली देगा ही। वह बदला लेगा। जब ताली बजायी थी तो वह कोई प्रसन्नता में नहीं बजा रहा था। लोग दूसरों से अपने लिए ताली बजवाना चाहते हैं, तब प्रसन्न होते हैं। तुम भी जब कोई ताली तुम्हारे लिए बजाता है तब तुम प्रसन्न होते हो। जब तुम्हें बजानी पड़ती है, तुम मजबूरी में बजाते हो। शायद इस आशा में बजाते हो कि हम दूसरों के लिए बजाएंगे, तो दूसरे हमारे लिए बजाएंगे। चलो अभी हम तुम्हारे लिए बजाए देते हैं, कल तुम हमारे लिए बजा देना। ऐसा पारस्परिक लेन-देन चलता है। हम तुम्हारी प्रशंसा कर देते हैं, तुम हमारी कर देना। लेकिन कौन किसी दूसरे के सुख के लिए चेष्टा कर रहा है? लोग अपने सुख की चेष्टा कर रहे हैं।

इसलिए जो आदमी भी तुम्हारी प्रशंसा करेगा, वह कभी न कभी बदला लेगा। उसके भीतर काटा गड़ता ही रहेगा कि प्रशंसा करनी पड़ी। देखेंगे किसी उचित समय पर, जब हमारा हाथ ऊपर होगा और तुम्हारा नीचे होगा। यहां कौन अपना है? इस जिंदगी का कुल हिसाब इतना है-

कुछ हंसी ख्वाब और कुछ आंसू

उम्र भर की यही कमाई है

कुछ सुंदर सपने और कुछ आंसू उम्रभर की यही कमाई है। सपने देखते रहो, सपनों को संजोते रही और टूटे सपनों के लिए रोते रहो। इधर टूटे सपने इकट्ठे होते जाते हैं, तुम नए सपने देखते रहो। अतीत तुम्हारा आंसू बनता जाता है, भविष्य हसीन ख्वाब। बस, इन दोनों के बीच में तुम जीते हो। कल जो बीत गया कुछ भी पाया नहीं, रेगिस्तान हो गया। आने वाले कल में तुम मरूद्यान बसाए हो, वह भी कल बीता जाता है। वह भी आज हो गया, वह भी कल हो जाएगा-वह भी जा रहा है। मरते वक्त तुम पाओगे, पूरा जीवन एक रेगिस्तान की यात्रा थी-लंबी, थकान भरी, धूल-धवांस भरी। हार, संताप, चिंता सब था, लेकिन और कुछ हाथ न लगा। धूल हाथ लगी।

कुछ अपना नहीं हो पाता। और जो अपना नहीं है, वह सार नहीं हो सकता। सार तो वही है जो तुम्हारा हो जाए, तुम्हारे भीतर हो जाए, और कभी तुमसे अलग न हो। जो तुम्हारी सत्ता बन जाए, तुम्हारा अस्तित्व बन जाए। सार की हमारी परिभाषा यही है। असार वही है, जो तुमसे बाहर रहे। आज तुम्हारा है, कल पराया हो जाए। हो ही जाएगा। कल किसी और का था। कोई घर यहां मकान नहीं है। सभी सराय हैं। कल कोई और ठहरा था, आज तुम ठहरे हो, कल कोई और ठहर जाएगा।

दुनिया का एतबार करें भी तो क्या करें

आंसू तो अपनी आख का अपना हुआ नहीं

अपनी आख का आंसू भी यहां अपना नहीं होता, और अपना क्या हो सकता है? जिनको हम अपना कहते हैं वे भी अपने नहीं हैं। अपने अतिरिक्त अपना यहां कुछ भी नहीं। स्वयं के अतिरिक्त और कोई संपत्ति नहीं है।

इसलिए जिसने जीवन को स्वयं की खोज में लगाया है; उसने ही सार की खोज में लगाया है। और जो और कुछ भी खोज रहा हो स्वयं को छोड़कर, वह चाहे सारी पृथ्वी की संपदा पा ले, सारा साम्राज्य पा ले, आखिर में पाएगा हाथ खाली हैं। हृदय एक रोता हुआ भिखारी का पात्र है, जिसमें कुछ भी न पड़ा। और जीवन ऐसे ही गया।

जो जितनी जल्दी जाग जाए उतना समझदार है। बुद्धि की और प्रतिभा की यही कसौटी है कि कितनी जल्दी तुम जागे। और थोड़े ही कोई बुद्धिमाप है। पश्चिम में बुद्धिमाप को नापने का ढंग है वह बहुत सस्ता है। हमने पूरब में एक अलग ढंग निकाला था। हम आदमी की प्रतिभा इस बात से मापते थे कि कितनी जल्दी उसने पहचाना कि असार -असार है और सार-सार है। कितनी जल्दी? जो जितनी जल्दी पहचान लिया, उतना ही प्रतिभाशाली है। जो मरते दम तक नहीं पहचान पाता, जो आखिरी घड़ी आ जाती है और कहे चला जाता है-

गो हाथ को जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है

रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

वह प्रतिभाहीन है। वह मूढ़ है। उसमें कोई समझ नहीं है। वह कितना ही समझदार हो दुनिया की नजरों में, वह अपने ही भीतर अनुभव करेगा कि उस समझदारी से उसने दूसरों को धोखा भले दिया हो, अस्तित्व को धोखा नहीं दे पाया। अस्तित्व के सामने तो वह नंगा भिखारी ही रहेगा।

‘जो सार को सार जानते हैं और असार को असार, वे ही सम्यक संकल्प के भाजन लोग सार को प्राप्त होते हैं।’

पहचान, पाने का पहला कदम है। हीरा-हीरा समझ में आ जाए तो खोज शुरू होती है। पत्थर-पत्थर समझ में आ जाए, तो छोड़ना शुरू हो गया, छूट ही गया। ठीक को पहचान लेना, महावीर ने सम्यक ज्ञान कहा है। शंकर ने विवेक कहा है। सम्यक दृष्टि। ठीक से देख लेना, क्या अपना हो सकता है। अपने अतिरिक्त और कुछ अपना नहीं हो सकता है। इसलिए वही खोजने योग्य है।

जीसस ने कहा है, तुम सारे संसार को पा लो और खुद को गंवा दो, तो तुमने कुछ भी नहीं पाया। और तुम खुद को पा लो और सारा संसार गंवा दो, तो तुमने कुछ भी नहीं गंवाया। जो अपना नहीं था, वह अपना था ही नहीं। जो अपना था, वही अपना है।

‘जिस तरह ठीक प्रकार से न छाए हुए घर में वर्षा का पानी घुस जाता है उसी प्रकार ध्यान- भावना से रहित चित्त में राग घुस जाता है।’

‘जिस प्रकार ठीक से छाए हुए घर में वर्षा का पानी नहीं घुस पाता है, उसी प्रकार ध्यान- भावना से युक्त चित्त में राग नहीं घुस पाता है।’

राग को तुम छोड़ न पाओगे। ध्यान को जगाना पड़ेगा। इतनी पहचान पहले तुम्हें आ जाए कि क्या व्यर्थ है और क्या सार्थक है, फिर तुम ध्यान को जगाओ। फिर राग को छोड़ने में मत लग जाना। क्योंकि वह भूल बहुतों ने की है। राग को पकड़ो, तो भी राग से उलझे रहोगे; राग को छोड़ो, तो भी राग से उलझे रहोगे। असली सवाल राग का नहीं है।

तो बुद्ध बड़ा ठीक उदाहरण दे रहे हैं। सीधा, सरल, कि ठीक से घर के छप्पर पर इंतजाम न किया गया हो, खपड़ेल ठीक से न छायी हो, तो वर्षा का पानी घुस जाता है। फिर ठीक से आच्छादित हो घर, खपड़ेल ठीक से साज-संवार कर रखी गयी हो, वर्षा का पानी नहीं घुस पाता। ध्यान से छायी हुई आत्मा में राग प्रवेश नहीं करता। राग घुस रहा है तो इसका इतना ही संकेत समझना कि आत्मा पर ठीक से छावन नहीं की गयी है, ध्यान का छप्पर छेद वाला है।

इसलिए राग को छोड़ने की फिक्र मत करना। वह तो ऐसा ही होगा कि ठीक से घर छाया हुआ नहीं है, वर्षा आ गयी, आषाढ़ के मेघ घिर गए, पानी बरसने लगा और तुम घर का पानी उलीचने में लगे हो। तुम उलीचते रहो पानी, इससे कोई फर्क न पड़ेगा। क्योंकि घर का छप्पर नए पानी को लिए आ रहा है। राग को उलीचने से कुछ भी न होगा। छप्पर को ठीक से छा लेना जरूरी है।

इसलिए समस्त प्रज्ञावान पुरुषों का जोर ध्यान पर है। और जो महात्मा तुम्हें साधारणतया समझाते हैं कि राग छोड़ो, गलत समझाते हैं। वे तुमसे कह रहे हैं, पानी उलीचो। नाव में छेद है, वे कहते हैं, पानी उलीचो। पर तुम पानी उलीचते रहो, नाव का छेद नया पानी भीतर ला रहा है। पानी तो उलीचो जरूर, पहले छेद को बंद करो। फिर पानी को उलीचने में कोई कठिनाई न होगी। छप्पर को छा दो, फिर जो थोड़ा- बहुत पानी बचा रह गया है, उसे बाहर कर देने में क्या अड़चन होने वाली है? ध्यान जो साध लेता है, उसका राग अपने आप मिट जाता है। राग से जो लड़ता है, उसका राग तो मिटता ही नहीं, ध्यान भी सधना मुश्किल हो जाता है।

मेरे पास रोज लोग आते हैं। वे कहते हैं, किसी तरह क्रोध चला जाए। मैं उनसे कहता हूं? तुम क्रोध की फिकर मत करो, तुम ध्यान करो। वे कहते हैं, ध्यान से क्या होगा? आप तो हमें क्रोध छोड़ने की तरकीब बता दें। ऐसे लोग भी आ जाते हैं वे कहते हैं, हमें ध्यान-व्यान से कुछ लेना-देना नहीं; हमारा तो मन अशात है, यह भर शात हो जाए। अब वे क्या कह रहे हैं, उन्हें पता नहीं!

अभी चार दिन पहले एक वृद्ध सज्जन ने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस मेरे मन में चिंता सवार रहती है, सो नहीं सकता ठीक से, कंपता रहता हूं? डरता रहता हूं बस यह मेरा मिट जाए। न मुझे मोक्ष चाहिए, न मुझे आत्मा के ज्ञान का कुछ लेना-देना है, न मुझे भगवान का कोई प्रयोजन है, बस मेरी चिंता मिट जाए। अब यह आदमी यह कह रहा है कि यह जो वर्षा का पानी घर में भर गया है, यह भर न भरे। मुझे खप्पर छाने नहीं; मुझे मोक्ष, परमात्मा, आत्मा से कुछ लेना-देना नहीं। अब कुछ भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह समझ ही नहीं रहा है कि- बीमारी कहा है।

धन छोडने में मत लगना, ध्यान को पाने में लगना। क्योंकि छोड़ने में जो शक्ति लगाओगे उतनी ही शक्ति से ध्यान पाया जा सकता है। मुफ्त तो छोड़ना भी नहीं

होता, उसमें भी ताकत लगानी पड़ती है। वह ताकत व्यर्थ गंवा रहे हो तुम। पहला काम है, घर के छप्पर को ठीक से छा लो।

जीवन का एक आधारभूत नियम, एक सारभूत नियम कि गलत को छोड़ने में मत लगना, ठीक को पाने में लगना। अंधेरे को हटाने में मत लगना, दीए को जलाने में लगना। एस धम्मो सनंतनो। यही सनातन धर्म है।

आज इतना ही।

http://anandprashad.wordpress.com/2014/01/31/%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-1-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5-3/

10-AUG-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: त्रिदुःख सूत्र- बहुजन जनता के दुखों के कारण और निवारण ….समयबुद्धा

varn vyastahहम में से ज्यादातर लोगों ने सुना होगा की बौद्ध धम्म का लक्ष्य किसी काल्पनिक ईश्वर या स्वर्ग को पाना नहीं, अपितु संसार से मानवता और अन्य जीवों के दुखों का समाधान खोजना व् करना है विज्ञानं और न्याय ही बौद्ध धम्म है| सभी मानवों और जीवों के दुःख के समाधान की खोज के दौरान गौतम बुद्ध ने संसार को जीवन के चार आर्य सत्य दिए हैं। गौतम बुद्ध की यह देशना सर्वकालिक है, ये बात उन्होंने ढाई हजार वर्ष पूर्व कही थी पर उनके बताये हुए मार्ग उस समय भी सटीक थे, आज भी हैं और जब तक मनुष्य है तब तक रहेंगे। उन्होंने मनुष्य के स्वभाव और चेतना की बात की है- श्रद्धा को छोड़ तर्क और विज्ञान पर जोर दिया। उन्होंने एक जीवन विज्ञान दिया, उन्होंने केवल दर्शन शास्त्र की बात ही नहीं की बल्कि रोग व चिकित्सा की बात की है। उन्होंने किसी और पर जैसे राजा या ईश्वर पर आश्रित होने को नहीं कहा परन्तु स्वयं के जागरण व होश को महत्व दिया। उनका सारा जोर इस बात पर था की मनुष्य की पीड़ा कैसे दूर हो, उसमें कैसे रूपांतर आए और वह स्वयं ही आनंद रूपी स्वभाव की पहचान कर सके।बौद्ध धम्म की शुरुआत ही दुःख पर आधारित चार आर्ये सत्यों से होती है, गौतम बुद्ध ने जिन चार आर्य सत्यों की बात की वो हैं
पहला आर्य सत्य है, दुःख !
दूसरा आर्य सत्य है, दुःख का कारण
तिसरा आर्य सत्य है, दुःख का निवारण !
चौथा आर्य सत्य है, दुःख निवारण का तरीका

चौथा आर्य सत्य है, दुःख निवारण का तरीका इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं क्योंकि अष्टांगिक मार्ग से ही दुःख दूर होते हैं, वे अष्टांग ये हैं :-
1. सम्यक् दृष्टि, 2. सम्यक् संकल्प, 3. सम्यक् वचन, 4. सम्यक् कर्मांत, 5. सम्यक् आजीव, 6. सम्यक् व्यायाम, 7. सम्यक् स्मृति, 8. सम्यक् समाधि।

अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक देखें:
https://samaybuddha.wordpress.com/2014/05/19/gautam-buddh-char-arye-satye/

buddha karl marks

ये तो हुई बौद्ध धम्म के सिद्धांतों में दुःख की बात पर एक झलक, इसको पढ़ कर संसार अक्सर समझता है की बौद्ध धम्म निराशावादी है, पर ऐसा नहीं है धम्म में दुखों की बात शुरू में करता है पर इससे आगे सब कुछ इन दुखों के समाधान की ही शिक्षा देता है| ये आशावादी और जगाने वाला है|

मैं थोड़ा अलग सोचता हूँ, और शायद बुद्ध का भी यही मतलब रहा होगा, मुझे लगता है -दुःख और सुख – दोनों ही जीवन के जरूरी पहलू हैं | जीवन को चुनना हो, तो मृत्यु से भागना संभव नहीं | सुख में गहरे गोते मारने हों, तो दुःख भी उतना ही गहरा जाना होगा| लहर जितनी ऊंची हो, उतनी ही गहरी भी होती है – ये दोनों एक दुसरे से अलग हो ही नहीं सकते |अगर कभी कड़वा या नमकीन खाया होगा तभी मीठे के स्वाद की कीमत पता चलती है,अगर केवल मीठा ही मीठा खाओ तो मीठा ही दुःख हो जायेगा| सोचिये – यदि दुःख है – तो उसे दूर करने के प्रयास हैं, और उनके सफल होने पर सुख की अनुभूति भी | परन्तु जब सुख ही सुख हो – तो प्रयास किस चीज़ के लिए हो ? कितनी निराशा हो जायेगी – शायद वह निराशा अभी के दुखों से भी बड़ी लगने लगे ?दुखों के समाधान में लगे रहना ही तो जीवन है|

मेरे हिसाब से जीवन में तीन प्रकार के दुःख होते हैं, इसे मैं त्रि-दुख सूत्र कहता हूँ :
:
१. पहले प्रकार का दुःख होता है प्राकृतिक दुःख: जैसे मृत्यु भूकम्प ,सूखा,बाढ़, कोई शारीरिक या मानसिक विकृति आदि, इनके लिए कोई धर्म या कोई ईश्वर कुछ नहीं कर सकते, हाँ विज्ञानं या धम्म ने इन दुखों के निवारण पर भी अपनी कुछ पकड़ बना ली है और ये पकड़ मजबूत होती जा रही है|

२. दुसरे प्रकार का दुःख होता है व्यक्तिगत दुःख: ये वो दुःख होते हैं जो हमारे गलत कर्मों के करने के कारन हमे मिलते हैं, जैसे कोई गलत खानपान या जीवन शैली की वजह से कोई बीमारी, कुसंगति की वजह से गलत मानसिकता परिणाम स्वरुप अपराध की सजा| लालच या तृष्णा की वजह से असंतोष,परिजन से बिछड़ना आदि, इन सभी दुखों के मूल कारन धम्म में बताये गए पंचशील तो तोडना ही है मलब १-हत्या,२ चोरी या बेईमानी,३- काम पापाचार या अनैतिक रिश्ते,४-झूठे, कठोर और अनावश्यक वचन,५- किसी भी नशीली चीज़ों का सेवन या नशा करना| अगर हम पंचशील से चलेंगे तो व्यक्तिगत दुखों से पार पा सकते हैं|

३. तीसरे प्रकार का दुःख होता है राजनैतिक दुःख: राजनीती ही वो जगह हैं जहाँ मानव ही नहीं अन्ये जीवों की दशा, दिशा, भूत वर्तमान और भविष्य का फैसला किया जाता है| उदाहरण के लिए गलत सरकारी नीतियों की वजह से, जनता में असंतोष,कुपोषण,अशिक्षा,युद्ध, अपराध,भेदभाव, जातिवाद और वर्णव्यस्था, धर्म और ईश्वरवाद का दुरूपयोग, पुरोहितवाद, राष्ट्रीय संपत्ति और संसाधनों का अनुचित बटवारा जिससे अमेरि और गरीबी में बड़ा फर्क आदि
हे बहुजनों ! किसी भी प्रकार के दुःख की शुरुआत का सबसे पहला कदम होता है, ध्यान न देना या नजरअंदाज या अनसुनी करना|क्योंकि जब हम अनसुनी करेंगे तो हम जानेंगे नहीं जब जानेंगे नहीं तो समाधान कैसे खोजेंगे, खोजेंगे नहीं तो पाएंगे कैसे| ध्यान पर बौद्ध मत बहुत ज्यादा जोर देता हैं गौतम बुद्ध की मूर्ती ही ध्यान मुद्रा में इसी सन्देश को देने हेतु बनायीं गयी है| ध्यान का मतलब खली बौठे रहना नहीं, खली बैठने से गौतम बुद्ध का मतलब है दिमाग चलना, जीवन में जिन बातों से हमारा सामना हो उनपर ध्यान दो और उसके बारे में सोचो|अगर आपने मेरी देशना के बारे में नहीं सोचा तो ये आपके सामने से ऐसे ही गुज़र जायेगी जैसे आप सोये रहो और बहार बारिश निकल जाए | ध्यान का कोई कुछ भी मतलब समझाए पर जो मैं समझ हूँ और आपसे समझा रहा हूँ वो यही है की ध्यान का असल मतलब यही है की अपने आस पास होने वाली हर घटना हर बात पर ध्यान दो और वहां से अपने लिए मुख्ये रूप से निम्न चार चीज़ों के बारे में सतर्क रहो-
१- हमारी शक्ति बढ़ानी वाली बात,
२- हमारी कमजोरी बढ़ाने वाली बात,
३. हमारी तरक्की के अवसर
४- और हमारे लिए कोई खतरा

ये अंग्रेजी का SWOT  सिद्धांत है| ध्यान न देना ही वो कारन हैं जिनकी वजह से धरती पर बुद्ध पुरुष आते हैं और चले जाते हैं पर दुःख ख़त्म नहीं होते| किसी भी व्यक्ति या कौम की दुर्दशा होने की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब वो तथ्यों या ज्ञान की बातों को ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करना शुरू करता है|आप खुद ये बात नोट करना की जो नाकामयाब व्यक्ति होगा वो ज्ञान की बात को पूरा सुनने से पहले ही ख़ारिज कर देगा,जबकी कामयाब आदमी हर बात को पहले सुनता है, सोचता है फिर उसे अपनाता या ख़ारिज करता है|

जो लोग ध्यान दे देते हैं उनके दुःख बहुत काम हो जाते हैं | गौतम बुद्ध जब आये तो उनके सन्देश को समझने और अपना के लाभ उठाने वाले भी ब्राह्मण ही थे, जबकि जिन बहुजनों के लिए उन्होंने ज्ञान वर्षा की वो ध्यान न देने के कारन कोई लाभ नहीं उठा सके| बहुजन ध्यान न देने का कारन ये बताते हैं की वो श्रमजीवी है वो अपनी आजीविका कमाए या ध्यान दे, यकीनन बात सही है| पर आप अपने आस पास देखो की बहुजन चौबीस घंटे तो श्रम नहीं करता,कुछ समय वो मनोविनोद और बात चीत में लगता है| तो आपने यही करना है की वो जो बात चीत है वो बेफिजूल की न हो, मैंने ऊपर जो चार तरह के ध्यान बताएं हैं हमारी बातें इन्हीं पर आधारित होनी चाहिए| आप पाओगे की धीरे धीरे आपके जीवन में दुःख काम हो जायेगा| उदाहरण के लिए टीवी में ज्ञान भी है बेफिजूल टाइमपास भी ये आपपर है आप क्या चुनते हो|

दुःख कम करने का धम्म मार्ग कभी बेकार नहीं जा सकता, इसमें समय तो लग सकता है पर कभी विफल नहीं होता|आपको जानकर हैरानी होगी जी जिन ब्राह्मणवादियों को आप पक्के ईश्वरवादी या धार्मिक समझकर धर्म में लग जाते हो,असल में उसने धर्म और ईश्वरवाद आपके लिए बनाया है और खुद बुद्ध के मार्ग पर चलता है और बुद्ध से घृणा करना का नाटक करता है| भारत में आज़ादी के आस पार जब जनतंत्र को चुना गया तो ब्राह्मणों को लगा वो अल्पसंख्यक हो जायेंगे ऐसे में वे ईश्वर भरोसे नहीं बैठे रहे उन्होंने बुद्ध की बात मानी ‘अप्प दीपो भव’ और सवेवसेवक संघ बनाकर राजनीती शुरू कर दी, कुछ पीढ्यां जरूर खप गयीं पर आज उन्हीं की सरकार बन गयी है|ध्यान रहे तथाकथित ईश्वर भी उसी की मदत करता है जो खुद की मदत खुद करता है

धम्म के मार्ग में समय लगता है और आम जनता तुरंत दुखों का समाधान चाहती है इसीलिए पाखंडी बाबाओं के गंडा तावीज, कर्मकांड, पूजा,बलि, पांडा पुरोहितवाद के चक्कर में लगी रहती है|पांडा पुरोहितवाद का नकली इलाज आपकी नकली बीमारी को तो ठीक कर सकता है पर असली को कभी नहीं ठीक कर सकता| नकली बीमारी से मेरा मतलब है आपका भ्रम या गलत सोच, जैसे मेरे घर में भूत है, अब भूत घर में नहीं आपके दिमाग में है, आपको अब कुछ ऐसा चाहिए जो आपके दिमाग से इस घर कर गयी बात को उखाड़ फेके| ऐसे में पूरे कॉंफिडेंट के साथ पण्डे आपके घर में ढोंग करते हैं मतलब नकली इलाज और आपकी नकली बीमारी ठीक हो जाती है| ये एक मनोविज्ञान है|

तो जब आप ध्यान दोगे तो समझ जाओगे की जीवन में चालीस प्रतिशत दुःख व्यक्तिगत होता है पर साठ प्रतिशत दुःख राजनैतिक कारणों से पैदा होता है, तो ये हुआ कुल सौ प्रतिशत दुःख | जीवन में प्राकृतिक दुःख या तो होता है या नहीं होता है मतलब ०% या १०० %, कुछ अपवादों को छोड़कर इसको दुखों के प्रतिशत में नहीं रखा जा सकता| तो चालीस प्रतिशत व्यक्तिगत दुखों के समाधान आपके अपने हाथों में हैं, पंचशील अपनाओ और व्यक्तिगत दुखों से मुक्ति पाओ| अब बात करते हैं साठ प्रतिशत राजनैतिक दुखों की,

राजनैतिक दुखों की बात शायद अब भी समझ में न आई होगी, दुःख के राजनैतिक कारन हेतु देखो अपनी दशा आप हर तरफ से गुलाम बनते जा रहे हो और आपको पता भी नहीं चल रहा, यही तो है ब्राह्मणवाद, आज सारी संवेधानिक संस्थाएं नाकाबिल कर दी गयीं हैं और उनके मुकाबले ब्राह्मणवादी संस्थाएं खड़ी कर दी गयीं हैं| उदाहरण के लिए सरकारी टीवी रेडियो चैनल, अखबार की जगह कई प्राइवेट चैनल और अखबार जो केवल ब्राह्मणवादी अजेंडे का प्रचार करते हैं| सरकारी स्कूल विफल, ये बहुजनों को सिर्फ मजदूर बना रहे हैं, प्राइवेट स्कूल में गुरुकुल की तरह केवल राजा सेठ और पुरोहित के बच्चे पड़ते हैं| बीमार हो जाओ तो इलाज को सरकारी अस्पताल विफल कर दिया गए हैं और प्राइवेट में जिसके पास पैसा है वही इलाज करा सकता है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी अब ब्राह्मणवादियों की,सरकारी एयरलाइन्स विफल अब नज़र रेल पर, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है, समझदार के लिए इशारा ही काफी है|चलो ये तो होना ही था पर ये क्या बात है की इन सबके मालिक केवल ब्राह्मणवादी ही हो सकते हैं, मूलनिबासी नहीं| होना ये चाहिए की जिसकी जितनी जनसँख्या उसकी उतनी भागीदारी|india poverty

जानते हैं गुलामी क्या है, वही पहले जैसे दिन आ गए बस नाम और रूप बदल गया, जैसे पहले आप अपने जीवन की हर चीज़ के लिए ब्राह्मणवादी पर निर्भर थे, जैसे काम उनके खेतों में, बाजार उनकी दुकानों से, कर्ज इन्ही साहूकारों से, आदि आदि वैसे ही आज है | सोचिये जब बच्चा पैदा होता है तो किसी ब्राह्मणवादी के हस्पताल में, फिर स्कूल पढ़ने जाता है ब्राह्मणवादी के स्कूल में फिर कॉलेज जाता है ब्राह्मणवादी की यूनिवर्सिटी फिर नौकरी करता है ब्राह्मणवादी की कंपनी में, अभी तो ठीक है पर धीरे धीरे सिकंजा कसता जाएगा और आप ब्राह्मणवादियों के इशारे पर जीने मरने को पहले की तरह मजबूर हो जायेंगे|राष्ट्रीय संपत्ति या संसाधनों का ये अनुचित बटवारा ही तो मानवता के दुःख का मूल कारन है, यही तो बौद्धों ने दुःख का मूल कारन बताया है, और इसके खिलाफ जो क्रांति थी वही तो बौद्ध धम्म था और है, इसके आलावा तो सब ब्राह्मणवादी मिलावट है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने पुस्तक ‘कार्ल मार्क्स और भगवान बुद्ध’ लिखी, इसीलिए उन्होंने कहा है की बौद्ध धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है| जागो कब तक सोये रहोगे, ये मजे जो ले रहे हो ज्यादा दिनों के लिए नहीं हैं सावधान|

राजनैतिक कारण या गलत सरकारी नीतिओं की वजह से ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है और आज भी है| और आज भी है.इसी के कारण भूख,कुपोषण,गरीबी,वेश्या वृत्ति, विच्छिन्नतावाद,उग्रवाद जैसी दूसरी अन्य कई समस्यायों की सृष्टि होती रही है.यही वह सबसे बड़ी समस्या है इस संसार में प्रकृति के पास सभी जीवों एक मनुष्यों के लिए इंतज़ाम है पर कुछ लालची लोगों के लालच के कारन ही संसार दुखमय हो गया| देखो अपने आस पास देश के नब्भे प्रतिशत संसाधन जैसे जमीन,पूँजी केवल दस प्रतिशत के पास है और नब्बे प्रतिशत बहुजन10 प्रतिशत से भी कम संसाधनों में जीने को मजबूर है|इसीलिए जनता के लिए ये जरूरी है की वो राजनीती में हिस्सा ले और उसपर अंकुश रखे|

गौतम बुद्ध ने किसी धर्म की खोज नहीं की बल्कि उन्होंने तो मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ के खिलाफ एक व्यस्थित क्रांति की और उसकी विचारधारा दी, अधिक जानकारी के लिए ही एच0 एल0 दुसाध जी के लेख देखो, लिंक निम्न प्रकार से है

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/01/29/h-l-dushad-what-are-reasons-for-miseries-of-bahujan-in-india/

 

…समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखाय

एक बार एक नवयुवक किसी जेन मास्टर के पास पहुंचा .

“ मास्टर , मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ , कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं !” , युवक बोला .

मास्टर बोले , “ पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो .”

युवक ने ऐसा ही किया .

“ इसका स्वाद कैसा लगा ?”, मास्टर ने पुछा।

“ बहुत ही खराब … एकदम खारा .” – युवक थूकते हुए बोला .

मास्टर मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक लेलो और मेरे पीछे -पीछे आओ . “

दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए .

“ चलो , अब इस नमक को पानी में दाल दो .” , मास्टर ने निर्देश दिया।

युवक ने ऐसा ही किया .

“ अब इस झील का पानी पियो .” , मास्टर बोले .

युवक पानी पीने लगा …,

एक बार फिर मास्टर ने पूछा ,: “ बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है ?”

“नहीं , ये तो मीठा है , बहुत अच्छा है ”, युवक बोला .

मास्टर युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले , “ जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं ; न इससे कम ना ज्यादा . जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है , बिलकुल वही . लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं . इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो …ग़्लास मत बने रहो झील बन जाओ .”

भारत के तिरंगे में जो अशोक चक्र या धम्म चक्र है वो बौद्धों के बुनियादी सिद्धांत प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत का चिन्ह है, ये बौद्धों का धार्मिक चिन्ह है…. team SBMT

Do you know what 24 spokes of Ashoka chakra or Buddhism religious symbol means:

It means Buddhism PATICCA SAMUPPADA theory

 

dhammchakra pratitye sam utpaad

 

धर्मचक्र का प्रतीक अशोक चक्र ………

सम्राट अशोक के बहुत से शिलालेखों पर प्रायः एक चक्र (पहिया) बना हुआ है ।
इसे अशोक चक्र कहते हैं।
यह चक्र धर्मचक्र का प्रतीक है । उदाहरण के लिये सारनाथ स्थित सिंह-चतुर्मुख (लॉयन कपिटल) एवं अशोक स्तम्भ पर अशोक चक्र विद्यमान है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिया गया है।
अशोक चक्र में चौबीस तीलियाँ (स्पोक्स्) हैं जो दिन के चौबीस घंटो का प्रतीक है।
अशोक चक्र, सम्राट अशोक के बाद अस्तित्व में आया था।
चक्र का अर्थ संस्कृत में पहिया होता है।
किसी बार-बार दुहराने वाली प्रक्रिया को भी चक्र कहते हैं।
चक्र स्वत: परिवर्तित होते रहने वाले समय का प्रतीक है।

12 spokes for Origination200px-Ashoka_Chakra_svg

12 for termination

cycle of LIFE i.e. birth and death

PATICCA SAMUPPADA Part 1 – YouTube.flv

1st part is http://www.youtube.com/watch?v=htHOWPLXhQ0

   

PATICCA SAMUPPADA Parts 2 3 – YouTube.flv

http://www.youtube.com/watch?v=hWNejKExQtE

प्रतीत्यसमुत्पाद :  प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है।प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक(कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र होता है|कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है,हर घटना मूलतः शुन्य होती है।

 

प्रतीत्य समुत्पादअथवा पतीच्च समुप्पादबौद्ध दर्शन से लिया गया शब्द है . इसका शाब्दिक अर्थ है एक ही मूल से जन्मी दो अवियोज्य/इनसेपरेबल चीज़ें यानी एक को चुनने के बाद आप दूसरी को न चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं रह जाते . यानी एक को चुनने की अनिवार्य परिणति है दूसरी को चुनना .

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है । प्राणियों के लिये इसका अर्थ है – कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र । क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्म (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है । हर घटना मूलतः शून्य होती है । परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते है

प्रतीत्यसमुत्पाद सारे बुद्ध विचारों की रीढ़ है। बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि में इसी के अनुलोम-प्रतिलोम अवगाहन से बुद्ध ने बुद्धत्व का अधिगत किया। प्रतीत्यसमुत्पाद का ज्ञान ही बोधि है। यही प्रज्ञाभूमि है। अनेक गुणों के विद्यमान होते हुए भी आचार्यों ने बड़ी श्रद्धा और भक्तिभाव से ऐसे भगवान बुद्ध का स्तवन किया है, जिन्होंने अनुपम और अनुत्तर प्रतीत्यसमुत्पाद की देशना की है। चार आर्यसत्य, अनित्यता, दु:खता, अनात्मता क्षणभङ्गवाद, अनात्मवाद, अनीश्वरवाद आदि बौद्धों के प्रसिद्ध दार्शनिक सिद्धान्त इसी प्रतीत्यसमुत्पाद के प्रतिफलन हैं।

 

वेदना (सुख, दुःख, की भावना) के कारण तृष्णा (पाने की तीव्र इच्छा) उत्पन्न होती है , तृष्णा के कारण पर्येषण (=खोजना), पर्येषण के कारण लाभ, लाभ के कारण विनिश्चय (=दृढ़-विचार), विनिश्चय के कारण छंद-राग (=प्रयत्न्न की इच्छा), छंद-राग के कारण अध्यवसान (प्रयत्न्न); अध्यवसान के कारण परिग्रह (=जमा करना), परिग्रह के कारण मात्सर्य (=कंजूसी), मात्सर्य के कारण आरक्षा (=हिफाजत), आरक्षा के कारण ही दंड-ग्रहण, शास्त्र ग्रहण, विग्रह, विवाद, ‘तू’ ‘तू’ मैं-मैं (=तुवं, तुवं), चुगली, झूठ बोलना, अनेक पाप=बुराईयाँ (=अ=कुशल-धर्म) (धर्म=मन का विचार) होती हैं।

नाम-रूप (संज्ञा-भौतिक अकार, विचार-अकार, विचार-पदार्थ, विचार-शरीर, विचार-आकृति) के कारण विज्ञान (चित, मन) है. विज्ञान के कारण नाम-रूप है। नाम-रूप के कारण स्पर्श है (आँखों से देखना, जिव्हा से चखना, नाक से सूंघना, कानों से सुनना भी ‘स्पर्श’ है क्योंकि ऐसे पदार्थ जैसे प्रकाश, ध्वनि तरंगों आदि का स्पर्श इन्द्रियों को होता है)। स्पर्श के कारण वेदना है। वेदना के कारण तृष्णा है। तृष्णा के कारण उपादान (आसक्ति, अनुराग, बंधन, व्यसन, एक तरह से तीव्र तृष्णा से चिपके रहना; उपादान (आसक्ति) चार प्रकार के हैं : 1. कामुपदान = एन्द्रिय, विषय, इन्द्रिय सम्बन्धी उपादान/आसक्ति/बंधन/तीव्र इच्छा/तृष्णा, 2. दित्थुपादान = वैचारिक उपादान, 3. शीलबातुपादान = नियम/विधि और अनुष्ठान/संस्कार में उपादान/आसक्ति, अट्टा-वादुपादान = व्यक्तित्व श्रद्धा / नायक-महिमा) में उपादान/आसक्ति/बंधन) है। उपादान के कारण भव (होना) है। भव के कारण जन्म (=जाति) है। जन्म के कारण जरा-मरण है। जरा-मरण के कारण शोक, परिवेदना (=रोना पीटना), दुःख, दौर्मनस्य (=मनःसंताप) उपायास (=परेशानी) होते हैं। इस प्रकार इस केवल (=सम्पूर्ण) -दुःख-पुंज (रूपी लोक) का समुदाय (= उत्पत्ति) होता है।

नोट : इस लेख को अपने नोट में संभाल कर रखें और प्रिंट निकालें। यह आपको दुनिया की किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा। भगवान बुद्ध के इस सिद्धांत ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ को इतनी सरलता से समझाया आपको कहीं नहीं मिलेगा। यही समस्त आधुनिक विज्ञान है, यही सृष्टि की उत्पत्ति और जीव विकास के उद्भव का सिद्धांत है जो कि चार्ल्स डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को स्पष्ट करता और समझता है।

लेखक: निखिल सबलानिया। स्रोत: दीघ निकाय (अनुवादक : भिखु/भिक्षु राहुल सांकृत्यायन और भिक्षु जगदीश काश्यप) (दीघ निकाय भगवान बुद्ध के धम्म-उपदेशों के संग्रहों में से एक है जो 2550 वर्ष पुराना है।) और Buddhist Dictionary by Venerable Bhante Nyanatiloka.

साम्यवाद का सिध्दान्त क्या है? यह कहां से शुरू होता है। ….Badal Singh Ahirwar

साम्यवाद का सिध्दान्त क्या है? यह कहां से शुरू होता है। :——————————————————————
कम्यूनिज्म का सिद्धान्त इस विचार पर आधारित है कि दुनिया मे शोषण है,अमीर गरीबों का शोषण करते है अौर वे जन सामान्य को गुलाम बना लेते हैं । यह गुलामी कष्ट और गरीबी का कारण बनती है। कार्ल मार्क्स यही से अपना सिध्दान्त शुरू करते है। उन्होने ‘शोषण’ शब्द का इस्तेमाल किया है। कार्लमार्क्स इसका क्या इलाज बताते है? कार्लमार्क्स ने इसका इलाज यह बताया है कि गरीबी और कष्ट को दूर करने के लिए आवश्यक है कि निजी संपत्ति समाप्त कर दी जाए। किसी के पास भी निजी संपत्ति नही होनी चाहिए, क्योंकि निजी संपत्ति का मालिक ही श्रमिकों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की ‘सरप्लस वैल्यू’ (लाभ) को हड़प लेता है। श्रमिक को अपने उत्पादन की ‘सरप्लस वैल्यू’ नहीं मिलती । कार्लमार्क्स पूछते हैं कि श्रमिकों के श्रम से हुए उत्पादन की ‘सरप्लस वैल्यू’ को मालिक. क्यों हड़प लेता है? उनका जवाब है कि एकमात्र मालिक ‘राज्य ‘ होना चाहिए । इन्हीं कारणों से मार्क्स ने यह सिध्दान्त प्रतिपादित किया कि सर्वहारा की तानाशाही होनी चाहिए । सरकार शोषित वर्ग की होनी चाहिए, शोषक वर्ग की नही। सर्वहारा की तानाशाही का यही अाशय है। रूसी कम्यूनिज्म कार्ल मार्क्स के इसी मूल सिद्धान्त पर आधारित है।

मैत्री के बारे में बोलते हुए भगवान बुद्ध ने कहा…Team SBMT

buddh poornima
मैत्री के बारे में बोलते हुए भगवान बुद्ध ने कहा।
” मान लो एक आदमी पृथ्वी को खोदने के लिए आता है, तो क्या पृथ्वी उसका विरोध करती है?
भिक्षुओन उत्तर दिया ” भगवान ! नही।
” मान लो एक आदमी लाख और रंग लेकर आकाश में चित्र बनाना चाहता है। क्या तुम समज़ते हो की वह बना सकेगा ?”
” भगवान ! नहीं। “क्यों ?” भिक्शु बोले ” क्योकि आकाशा काला नहीं है।”
” इसी प्रकार तुम्हारे मन में कोई कालिख नहीं होनी चाहिए , जो की तुम्हारे राग – द्वेष का परिणाम है।”
” मान लो आदमी जलती हुई मशाल लेकर गंगा नदी में आग लगाने आता है , तो क्या वह आग लगा सकेगा?” ” भगवान ! नहीं। “क्यों ?”
भिक्शुओने उत्तर दिया – ” क्योकि गंगा जल में जलनेका गुण नहीं है।
” अपना प्रवचन समाप्त करते हुए तथागत ने कहा – भिक्षुओ ! जैसे पृथ्वी आघात अनुभव करती और विरोध नहीं करती, जिस प्रकार हवा की प्रतिक्रिया नहीं होती, जिस प्रकार गंगा नदी का जल अग्नि से अप्रभावित होकर बहते रहता है ; इसी प्रकार हे भिक्शुओ ! यदि तुम्हारा कोई अपमान भी कर दे, यदि तुम्हारे साथ कोई अन्याय भी करे तो भी तुम अपने विरोधियो प्रति म मैत्रि की भावना अपनाये रखो।
“भिक्षुओ मैत्रिकी धारा सदा प्रवाहित रहनी चाहिए। तुम्हारा मन पृथ्वी की तरह दृढ़ हो , वायु की तरह स्वच्छ हो और गंगा नदी की तरह गंभीर हो। यदि तुम मैत्री का अभ्यास रखोगे तुम्हारे साथ कैसा भी अप्रीतिकर व्यवहार करे, तुम्हारा चित्त विचलित नहीं होगा। क्योकि विरोधी शीघ्र थक जायेंगे। ” तुम्हारी मैत्री विश्व की तरह व्यापक होनी चाहिए और तुम्हारी भावनाए असीम होनी चाहिए , जिसमे कही द्वेष का लेश भी ना हो।

विश्व के अब तक की महान 16 क्रांतिकारी महिलाओ की सूचि में, भारत की बहुजन महिला ‘फूलन देवी’ “बैंडिट-क्वीन” को चौथे (4 th) स्थान पर जगह मिली है…Rajkamal Bauddh

विश्व के अब तक की महान 16 क्रांतिकारी महिलाओ की सूचि में, भारत के ‘फूलन देवी’ “बैंडिट-क्वीन” को चौथे (4 th) स्थान पर जगह मिली है… इन 16 महिलाओं के बारे में पूरे विश्व में चर्चा हो रही है, लेकिन भारत को छोड़कर….. क्यूंकि भारत की दोगली मीडिया को फूलन देवी पसंद नहीं हैं…

दुनिया की सबसे बड़ी पत्रिका TIME ने ‘फूलन देवी’ को विश्व इतिहास की 16 शीर्ष विद्रोहिणियों की लिस्ट में चौथे नंबर पर रखा है जो भारत से यह एकमात्र एंट्री है…
दुनिया फूलन देवी को जॉन ऑफ आर्क और आंग सान सू की लिस्ट में रखकर सलाम करती है.. देखें दुनिया की सबसे बड़ी पत्रिका TIME की ये लिस्ट…..

1. तवाकुल कर्मन (यमन), foolan devi
2. औंग सेन सू कई (बर्मा),
3. कोराजोन अकुइनो (फिलिप्पिंस),

4. फूलन देवी (इंडिया),

5. गोल्डा मीर (इजरायल),
6. अंजेला डेविस (यू.एस.),
7. विल्मा लुसिला एस्पिन (क्यूबा),
8. जिआंग किन्ग (चाइना),
9. नादेजहदा क्रुप्स्काया (रूस),
10. सुसान बी. एंथोनी (यू.एस.),
11. एम्मेलिन पनखुर्स्त (ब्रिटेन),
12. हेर्रीएट टबमेन (यू.एस.),
13. मैरी वोल्ल्स्टोनेक्राफ्ट (ब्रिटेन),
14. जौन ऑफ़ आर्क (फ्रांस),
15. बोउदिका (ब्रिटेन)
16. मिसिज जगन (शिकागो, ईल्लिनोइस).