मैत्री के बारे में बोलते हुए भगवान बुद्ध ने कहा…Team SBMT


buddh poornima
मैत्री के बारे में बोलते हुए भगवान बुद्ध ने कहा।
” मान लो एक आदमी पृथ्वी को खोदने के लिए आता है, तो क्या पृथ्वी उसका विरोध करती है?
भिक्षुओन उत्तर दिया ” भगवान ! नही।
” मान लो एक आदमी लाख और रंग लेकर आकाश में चित्र बनाना चाहता है। क्या तुम समज़ते हो की वह बना सकेगा ?”
” भगवान ! नहीं। “क्यों ?” भिक्शु बोले ” क्योकि आकाशा काला नहीं है।”
” इसी प्रकार तुम्हारे मन में कोई कालिख नहीं होनी चाहिए , जो की तुम्हारे राग – द्वेष का परिणाम है।”
” मान लो आदमी जलती हुई मशाल लेकर गंगा नदी में आग लगाने आता है , तो क्या वह आग लगा सकेगा?” ” भगवान ! नहीं। “क्यों ?”
भिक्शुओने उत्तर दिया – ” क्योकि गंगा जल में जलनेका गुण नहीं है।
” अपना प्रवचन समाप्त करते हुए तथागत ने कहा – भिक्षुओ ! जैसे पृथ्वी आघात अनुभव करती और विरोध नहीं करती, जिस प्रकार हवा की प्रतिक्रिया नहीं होती, जिस प्रकार गंगा नदी का जल अग्नि से अप्रभावित होकर बहते रहता है ; इसी प्रकार हे भिक्शुओ ! यदि तुम्हारा कोई अपमान भी कर दे, यदि तुम्हारे साथ कोई अन्याय भी करे तो भी तुम अपने विरोधियो प्रति म मैत्रि की भावना अपनाये रखो।
“भिक्षुओ मैत्रिकी धारा सदा प्रवाहित रहनी चाहिए। तुम्हारा मन पृथ्वी की तरह दृढ़ हो , वायु की तरह स्वच्छ हो और गंगा नदी की तरह गंभीर हो। यदि तुम मैत्री का अभ्यास रखोगे तुम्हारे साथ कैसा भी अप्रीतिकर व्यवहार करे, तुम्हारा चित्त विचलित नहीं होगा। क्योकि विरोधी शीघ्र थक जायेंगे। ” तुम्हारी मैत्री विश्व की तरह व्यापक होनी चाहिए और तुम्हारी भावनाए असीम होनी चाहिए , जिसमे कही द्वेष का लेश भी ना हो।

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