नास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद (en:Atheism) पर आधारित मानवीय व्यस्था और ईश्वरवाद पर आधारित अमानवीय व्यस्था…दशरथ बैथये


DHAMMA or DHARMAनास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद (en:Atheism) वह सिद्धांत जो जगत् की सृष्टि करने वाले, इसका संचालन और नियंत्रण करनेवाले किसी भी ईश्वर के अस्तित्व को सर्वमान्य प्रमाण के न होने के आधार पर स्वीकार नहीं करता । (नास्ति = न + अस्ति = नहीं है , अर्थात ईश्वर नहीं है।) नास्तिक लोग ईश्वर (भगवान) के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण न होने कारण झूठ करार देते हैं । अधिकांश नास्तिक किसी भी देवी देवता, परालौकिक शक्ति, धर्म और आत्मा को नहीं मानते । हिन्दू दर्शन में नास्तिक शब्द उनके लिये भी प्रयुक्त होता है जो वेदों को मान्यता नहीं देते । नास्तिक मानने के स्थान पर जानने पर विश्वास करते हैं । वहीं आस्तिक किसी न किसी ईश्वर की धारणा को अपने धर्म, संप्रदाय, जाति, कुल या मत के अनुसार बिना किसी प्रमाणिकता के स्वीकार करता है । नास्तिकता इसे अंधविश्वास कहती है क्योंकि किसी भी दो धर्मों और मतों के ईश्वर की मान्यता एक नहीं होती है । नास्तिकता रूढ़िवादी धारणाओं के आधार नहीं बल्कि वास्तविकता और प्रमाण के आधार पर ही ईश्वर को स्वीकार करने का दर्शन है । नास्तिकता के लिए ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के लिए अभी तक के सभी तर्क और प्रमाण अपर्याप्त है ।
दर्शन का अनीश्वरवाद के अनुसार जगत स्वयं संचालित और स्वयं शासित है। ईश्वरवादी ईश्वर के अस्तित्व के लिए जो प्रमाण देते हैं, अनीश्वरवादी उन सबकी आलोचना करके उनको काट देते हैं और संसारगत दोषों को बतलाकर निम्नलिखित प्रकार के तर्कों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि ऐसे संसार का रचनेवाला ईश्वर नहीं हो सकता।

ईश्वरवादी कहते है कि मनुष्य के मन में ईश्वरप्रत्यय जन्म से ही है और वह स्वयंसिद्ध एवं अनिवार्य है। यह ईश्वर के अस्तित्व का द्योतक है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि ईश्वरभावना सभी मनुष्यों में अनिवार्य रूप से नहीं पाई जाती और यदि पाई भी जाती हो तो केवल मन की भावना से बाहरी वस्तुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मन की बहुत सी धारणाओं को विज्ञान ने असिद्ध प्रमाणित कर दिया है।

जगत में सभी वस्तुओं का कारण होता है। बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। कारण दो प्रकार के होते हैं-एक उपादान, जिसके द्वारा कोई वस्तु बनती है, और दूसरा निमित्त, जो उसको बनाता है। ईश्वरवादी कहते हैं कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी एक कार्य (कृत घटना) है अतएव इसके भी उपादान और निमित्त कारण होने चाहिए। कुछ लोग ईश्वर को जगत का निमित्त कारण और कुछ लोग निमित्त और उपादान दोनों ही कारण मानते हैं। इस युक्ति के उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी किसी समय उत्पन्न और आरंभ हुआ था। इसका प्रवाह अनादि है, अत: इसके स्रष्टा और उपादान कारण को ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है। यदि जगत का स्रष्टा कोई ईश्वर मान लिया जाय जो अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा; यथा, उसका सृष्टि करने में क्या प्रयोजन था? भौतिक सृष्टि केवल मानसिक अथवा आध्यात्मिक सत्ता कैसे कर सकती है? यदि इसका उपादान कोई भौतिक पदार्थ मान भी लिया जाय तो वह उसका नियंत्रण कैसे कर सकता है? वह स्वयं भौतिक शरीर अथवा उपकरणों की सहायता से कार्य करता है अथवा बिना उसकी सहायता के? सृष्टि के हुए बिना वे उपकरण और वह भौतिक शरीर कहाँ से आए? ऐसी सृष्टि रचने से ईश्वर का, जिसको उसके भक्त सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और कल्याणकारी मानते हैं, क्या प्रयोजन है, जिसमें जीवन का अंत मरण में, सुख का अंत दु:ख में संयोग का वियोग में और उन्नति का अवनति में हो? इस दु:खमय सृष्टि को बनाकर, जहाँ जीव को खाकर जीव जीता है और जहाँ सब प्राणी एक दूसरे शत्रु हैं और आपस में सब प्राणियों में संघर्ष होता है, भला क्या लाभ हुआ है? इस जगत् की दुर्दशा का वर्णन योगवासिष्ठ के एक श्लोक में भली भाँति मिलता है, जिसका आशय निम्निलिखत है–

कौन सा ऐसा ज्ञान है जिसमें त्रुटियाँ न हों, कौन सी ऐसी दिशा है जहाँ दु:खों की अग्नि प्रज्वलित न हो, कौन सी ऐसी वस्तु उत्पन्न होती है जो नष्ट होनेवाली न हो, कौन सा ऐसा व्यवहार है जो छलकपट से रहित हो? ऐसे संसार का रचनेवाला सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी ईश्वर कैसे हो सकता है?

ईश्वरवादी एक युक्ति यह दिया करते हैं कि इस भौतिक संसार में सभी वस्तुओं के अंतर्गत, और समस्त सृष्टि में, नियम और उद्देश्यसार्थकता पाई जाती है। यह बात इसकी द्योतक है कि इसका संचालन करनेवाला कोई बुद्धिमान ईश्वर है इस युक्ति का अनीश्वरवाद इस प्रकार खंडन करता है कि संसार में बहुत सी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका कोई उद्देश्य, अथवा कल्याणकारी उद्देश्य नहीं जान पड़ता, यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़, आग लग जाना, अकालमृत्यु, जरा, व्याधियाँ और बहुत से हिंसक और दुष्ट प्राणी। संसार में जितने नियम और ऐक्य दृष्टिगोचर होते हैं उतनी ही अनियमितता और विरोध भी दिखाई पड़ते हैं। इनका कारण ढूँढ़ना उतना ही आवश्यक है जितना नियमों और ऐक्य का। जैसे, समाज में सभी लोगों को राजा या राज्यप्रबंध एक दूसरे के प्रति व्यवहार में नियंत्रित रखता है, वैसे ही संसार के सभी प्राणियों के ऊपर शासन करनेवाले और उनको पाप और पुण्य के लिए यातना, दंड और पुरस्कार देनेवाले ईश्वर की आवश्यकता है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी यह कहता है कि संसार में प्राकृतिक नियमों के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं दिखाई पड़ते। पाप और पुण्य का भेद मिथ्या है जो मनुष्य ने अपने मन से बना लिया है। यहाँ पर सब क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं और सब कामों का लेखा बराबर हो जाता है। इसके लिए किसी और नियामक तथा शासक की आवश्यकता नहीं है। यदि पाप और पुण्य के लिए दंड और पुरस्कार का प्रबंध होता तथा उनको रोकने और करानेवाला कोई ईश्वर होता; और पुण्यात्माओं की रक्षा हुआ करती तथा पापात्माओं को दंड मिला करता तो ईसामसीह और गांधी जैसे पुण्यात्माओं की नृशंस हत्या न हो पाती।

इस प्रकार अनीश्वरवाद ईश्वरवादी सूक्तियों का खंडन करता है और यहाँ तक कह देता है कि ऐसे संसार की सृष्टि करनेवाला यदि कोई माना जाय तो बुद्धिमान और कल्याणकारी ईश्वर को नहीं, दुष्ट और मूर्ख शैतान को ही मानना पड़ेगा।

पाश्चात्य दार्शनिकों में अनेक अनीश्वरवादी हो गए हैं, और हैं। भारत में जैन, बौद्ध, चार्वाक, सांख्य और पूर्वमीमांसा दर्शन अनीश्वरवादी दर्शन हैं। इन दर्शनों में दी गई युक्तियों का सुंदर संकलन हरिभद्र सूरि लिखित षड्दर्शन समुच्चय के ऊपर गुणरत्न के लिखे हुए भाष्य, कुमारिल भट्ट के श्लोकवार्तिक, और रामानुजाचार्य के ब्रह्मसूत्र पर लिखे गए श्रीभाष्य में पाया जाता है।
धर्म मनुष्य को बाटँनेँ का काम करता है । अतः ईश्वर सिर्फ जनता का अफीम होता है।

नास्तिक अर्थात् अनीश्वरवादी लोग सभी देशो और कालों में पाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में नास्तिकों की कमी नहीं है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि ऐसे लोग आजकल बहुत कम मिलेंगे जो नास्तिक (अनीश्वरवादी) नहीं है। नास्तिकों का कहना यह है कि ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। सर्जक मानने की आवश्यकता तो तभी होगी जब कि यह प्रमाणित हो जाए कि कभी सृष्टि की उत्पत्ति हुई होगी। यह जगत् सदा से चला आ रहा जान पड़ता है। इसके किसी समय में उत्पन्न होने का कोई प्रमाण ही नहीं है। उत्पन्न भी हुआ तो इसका क्या प्रमाण है कि इसकी विशेष व्यक्ति ने बनाया हो, अपने कारणों से स्वत: ही यह बन गया हो। इसका चालक और पालक मानने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि जगत् में इतनी मारकाट, इतना नाश और ध्वंस तथा इतना दु:ख और अन्याय दिखाई पड़ता है कि इसका संचालक और पालक कोई समझदार और सर्वशक्तिमान् और अच्छा भगवान् नहीं माना जा सकता, संभवतः वो एक विक्षिप्त शक्तिधारक ही हो सकता है। संसार में सर्जन और संहार दोनों साथ साथ चल रहे हैं। इसलिए यह कहना व्यर्थ है, कि किसी दिन इसका पूरा संहार हो जाएगा और उसके करने के लिए ईश्वर को मानने की आवश्यकता है। नास्तिकों के विचार में आस्तिकों द्वारा दिए गए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सभी प्रमाण प्रमाणाभास हैं ।

 

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2000 वर्ष तक कोई भी भगवान हमारी मदद
करने को नहीं आया| किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि ये भी इन्सान है
इनको भी जीने का अधिकार है |
किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि इनको भी मैंने बनाया है फिर
मै इनको मंदिर में प्रवेश करने से क्यों रोकूँ ?
किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि इनकी भी आवश्यकताए है,
इनको भी सुविधापूर्वक, सरल जीवन जीने
का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा जिस पानी को पशु पी सकते है
वो पानी इन इंसानों के पीने से कैसे अपवित्र
हो सकता है ? किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा इनकी भी जरूरते है इसलिए
इनको भी भविष्य के लिए धन और संपत्ति संचय
करने का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा जो लोग गाय का मूत्र पीकर
अशुद्ध नहीं होते है वो किसी इन्सान
की छाया पड़ने से कैसे अपवित्र हो सकते है?
किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि इनको भी ऊपर उठने
का अधिकार है और इनको भी शिक्षा प्राप्त
करने का अधिकार है ? किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि जब ये धरती पशु पक्षियों और
इन तथाकथित उच्च वर्ण के लोगो के मलमूत्र से
अपवित्र नहीं होता है तो फिर इन लोगो के
थूक और पदचाप से कैसे अपवित्र हो सकती है ?
फिर उस भगवान को मै क्यों मानू जिस
भगवान ने इंसानों में ही फर्क किया और
इंसानों को6743 से अधिक
श्रेणियों यानि कि जातियों में बाँट
दिया | जिस भगवान ने ये
नहीं सोचा सभी को समानता का अधिकार
है और सबको आजादी से जीने का अधिकार है,
उस भगवान को मै क्यों मानू ? मै उस इन्सान
को मानता हूँ जिसने इन
सभी बातो को जाना और हमको हर तरह
की से मुक्ति दिलाने के लिए अपना सर्वस्व
न्योछावर कर दिया|उन्होंने सारा जीवन
हमको पशु से इन्सान बनाने के लिए बलिदान कर
दिया और हमको इन्सान बना कर ही दम
लिया |
मेरे भगवान तो वही बाबा साहब DR.BHIM
RAO AMBEDKAR JI है जिनकी वजह से मै आज
आजाद हूँ |जिनकी वजह से मैंने शिक्षा प्राप्त
की, वही मेरे भगवान है | जिनकी वजह से मै आज
सिर उठाकर चल सकता हूँ वही बाबा साहब
मेरे भगवान है और मै उन बाबा साहब DR. BHIM
RAO AMBEDKAR JI को नमन करता हूँ ………
जय भीम Namo buddhay .
……. Jay bharat……..

 

5 thoughts on “नास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद (en:Atheism) पर आधारित मानवीय व्यस्था और ईश्वरवाद पर आधारित अमानवीय व्यस्था…दशरथ बैथये

  1. भगवान् बुद्ध के १० अव्याकृत (3)

    To
    jileraj@gmail.com
    CC
    me
    Dec 6 at 3:19 PM
    || नमो बुद्धाय || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब धम्मानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब संघानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते || जम्मुद्वीप (प्राचीन भारत ) की सबसे पुरातन सभ्यता अभी तक जो खोजी गयी है वह सिन्धु घाटी की सभ्यता है | सिन्धु घाटी
    सभ्यता में बहुत सारी सामग्री प्राप्त हुई है जैसे की मिट्टीके बर्तन , पीपल के पत्ते की चित्रकारी , हाथी ,सांड, टाइगर ,गैंडा आदि पशुओं की seals प्राप्त हुई हैं | एक चित्रकारी में योगिक मुद्रा में एक पुरुष बैठा है उसके चारो ओर ये चार पशु दिखाए गए हैं , उस समय की सभ्यता में जो पुरुष दिखाया गया है वो कोई शिव की मूर्ती नहीं है बल्कि बुद्ध की मूर्ती है , अब आप कहेंगे कि गोतम बुद्ध तो
    सिन्धु सभ्यता के भी २००० से २५०० वर्ष हुए तो कैसे ये बुद्ध हैं |तो पढ़िए बुद्ध वचन सुत्त पीटक का एक ग्रन्थ दीघनिकाय उसमें भगवान् गोतम बुद्ध ने साफ़-२ कहा है कि मुझसे पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं जिनमें ६ बुद्धों की जीवनी तो स्वयं गोतम बुद्ध ने बतायी है , पढ़ें महापदान सुत्त हिंदी एडिशन २०१० पेज १७६ – २२ वें बुद्ध विपस्सी ,२३ वें सिखी..,वेस्सभू ,ककुसंध ,कोणागमन ,कस्सप ,एवं
    २८ वाँ मैं स्वयं गोतम बुद्ध | इसमें ९१ कल्प पूर्व विपस्सी बुद्ध हुए थे ऐसा भगवान् ने बताया है | और सिन्धु सभ्यता में सतिया की दो सील हैं १-जो आज प्रचलित है और २ सरी उसकी उल्टी जैसी की जर्मनी के फ्लैग पर है | सतिया शब्द पुरातन प्राकृत भाषा का है जिसे बाद में भगवान् के मुख से सुव्यवस्थित रूप में सुत्तों के रूप में जब कहा गया तो प्राकृत भाषा को पालि कहा गया क्योंकि पालि का अर्थ
    ही होता है सूत्र | इसी सभ्यता में एक मूर्ती में एक स्त्री ने एक हाथ में चूड़ियाँ ऊपर तक पहनी हैं और एक हाथ में केवल दो , जो कि आज भी निम्न वर्ग की स्त्रियाँ राजस्थान में ऐसे ही चूड़ियाँ पहनती हैं जबकि उच्च जातियों की स्त्रियाँ दोनों हाथों में केवल दो-२ या अधिक पर कोहनी के नीचे तक ही पहनती हैं | इससे भी पता चलता है कि ब्राह्मण लोग सिन्धु सभ्यता को नष्ट करके प्राचीन भारत में आये
    थे और वे इतने असभ्य थे कि उन्हें ठीक से साज श्रृंगार भी नहीं आता था , जब वे इस देश में वास करने लगे तो हमारी सभ्यता का तो असर आना स्वाभाविक था उनमें भी | वो लोग अग्निपूजक थे और हम सम्मा दृष्टि वाले थे तो अंगारी पर पानी डालकर पूजा करते थे ना कि हवन , जो आज भी हमारे देश में गाम -२ में प्रचलित है | तो भगवान् बुद्ध की ये बात कितनी सटीक है कि उनके पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं | अब बात
    आती है कि बुद्ध नास्तिक हैं , या अनीश्वरवादी :- तो देखिये पहले आप जानिये कि बुद्ध ना तो नास्तिक्वादी हैं ना ही अनीश्वरवादी बुद्ध हैं अनात्मवादी और विभाज्यवादी वे कहते हैं कि इस संसार(universe) में ३१ आयतन हैं और इन ३१ आयतनों में ३१ वाँ आयतन “न संज्ञा न असंज्ञा आयतन ” कहा जाता है जो materialistic नहीं है यही निराकार अनंत आयतन की लास्ट अवस्था है | भगवान् इससे आगे की अवस्था निब्बान की शिक्षा
    भी देते हैं जिसे प्राप्त कर योगी अर्हत बन जाता है , फिर उसका कभी जन्म नहीं होता है – सभी दुखों से मुक्त अवस्था है यह | बुद्ध ने कहा पौस्करसाती ब्राह्मण से कि तु क्या जानना चाहता है तो उसने कहा भगवान् मुझे तो आप बस ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये क्योंकि वह हमें पसंद भी है और पैतृक भी , तो भगवान् ने कहा कि पौस्करसाती क्या तूने कभी ब्रह्मा को देखा है या तेरे पुराने किसी ऋषि जैसे
    अष्टक , वामक, वामदेव , अंगिरा, भरद्वाज, वशिष्ठ , विश्वामित्र आदि ने देखने का वर्णन किया हो | पौस्करसाती कहता है कि नहीं — तो गोतम कहते हैं कि पौस्करसाती मैंने ब्रह्मा को अपनी आंख से देखा है और उस तक पहुँचने का म,आर्ग भी मैं जनता हूँ पर मैं उससे भी ऊपर के लोकों को भी जनता हूँ , पौस्करसाती कहता है बस आप मुझे ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये | तो सुन कह भगवान् कहते हैं कि ब्रह्म लोक को
    पहुंचाने वाले ४ मार्ग हैं (१) मैत्री (२) करुणा(३) मुदिता(४) उपेक्खा | जब कोई मानुष या देव इन चार मार्गों को सिद्ध कर लेता है तो वह मृत्यु हो ब्रह्म लोक में उत्पन्न होता है ऐसा कहा भगवान् ने | अब जानिये भगवान् कैसे अनात्म वादी और विभज्यवादी हैं — भगवान् कहते हैं यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है (१) अग्नि(२) वायु(३) आपो(४)पृथ्वी(५) आकास (६) विज्ञान (=sense=consciousness) , हे भिक्खुओं मैं इस संसार
    में इनके अतिरिक्त अन्य कोई धातु नहीं देखता | ref. अंगुत्तर निकाय | ये सारे के सारे धर्म (=धातु) अनित्य हैं (=unstable i.e. they change always there is no stay for a little bit time ) सभी रूप चाहे अदृश्य या दृश्य हों एक fundamental unit = अट्टकलाप से निर्मित हैं इसे ही अभिधम्म में आठ विनिब्भोग रूप कहा गया है | भगवान् जीवित प्राणी को नामरूप कहते हैं , रूप=अग्नि+वायु+जल+पृथ्वी का संयोग है आकाश धातु में और नाम कहा क्योंकि अनात्म वादी हैं i.e.
    नाम=not+self=वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान | और ये आठ के आठ ही सदा परिवर्तनशील हैं इसलिए भगवान् को अनित्यवादी कहा जाता है और रूप तथा विज्ञान को भी उसके न्यूनतम अवस्थाओं में explain करते हैं इसलिए विभाज्य्वादी कहा जाता है | तो भाईयों क्यों भगवान् की निंदा करते हो उन्हें नास्तिक वादी कहकर या अनीश्वर वादी कहकर | अब आपका कहना है कि लोगों को बौध धर्म धर्म के रूप में नहीं मानना चाहिए ambedkarism
    के रूप में मानना चाहिए तो भैया कौन से लोक से आये हैं आप और कौन सी दुनिया में रहते हैं कि जो आप इतने मोह से भरे हैं , ये भी नहीं जानते कि बुद्ध ने nonsectorian relegion(=धम्म=धर्म ) बताया है ना कि सम्प्रदाय (= relegion) | भाषाओं के बदल जाने से किसी वस्तु का धर्म(=character=गुण ) थोड़े ही बदल जाता है | तो धम्म कहो या धर्म एक ही बात है , हाँ ये बात और कि आजकल लोग धर्म को सम्प्रदाय और सम्प्रदाय को ही धर्म कहने लगे हैं
    क्योंकि किसी भी सम्प्रदाय में ज्यादातर लोग मोह-मूढ़ता से भरे हैं और अपने-२ सम्प्रदायों की रूढ़ियों में बंधे हैं बेचारे हैं क्या करें | पर एक बात और धर्म का भी कोई तो सम्प्रदाय बनाना पडेगा ही नहीं तो सारे फूल अलग-२ होंगे और जब कभी भी हवा का झोंखा या आंधी आएगी तो ये मोती बिखर जायेंगे और गर्त में चले जायेंगे , पर जब एक माला में होंगे तो बिखरेंगे नहीं जहां जायेंगे साथ ही जायेंगे
    और servive करते रहेंगे खुशबू फैलाते रहेंगे | अब लो मूर्ती क्या है ? मूर्ती है अभिव्यक्ति का तीसरा प्रकार –(१) वाणी (२) लिपि(३) चित्रकला=मूर्तिकला | तो भैया जरा देखिये बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ध्यान साधना :- ध्यान के पाँच अंग हैं (१)वितक्क(२) विचार(३) पीति (४)वेदना(५) एकग्गता | और ध्यान को प्राप्त करने दो मार्ग भगवान् ने बताये हैं १-समथ यानिक- जो समथ भावना के मार्ग पर चलकर २सरी – विपस्सना
    भावना द्वारा अभिज्ञा को प्राप्त करता है | १ली में कसिण साधना की जाती है जब साधक कसिण साधना में पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो वह विपस्सना साधना द्वारा वह रुपावचर (साकार ब्रह्म) अवस्था —अरूपावचर (अरूप ब्रह्म) अवस्था — लोकुत्तर चित्तावस्था(अर्हत) को प्राप्त करता है one bye one . अतः बाद में ध्यान को सरल बनाने हेतु कुछ भिक्खुओं ने कसिण साधना को धर्म कि तीसरी प्रकार वाली व्याख्या
    (चित्रकला=मूर्ती) पर ध्यान लगवाकर अल्पबुद्धि मानुषों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया था | इसमें भगवान् के मार्ग को दोष देना या उन भिक्खुओं को जो करुणा वश जगत का भला ही कर रहे थे | अब लोग मार्ग पर ना चलें अन्धविश्वासी होकर आरती उतारने लगें मूर्ती की तो कोई भी गुरु या भगवान् क्या करे | जरा भगवान् बुद्ध के वचनों को जानिए पहले
    कि वो क्या कहते हैं भगवान् बुद्ध ईश्वर के बारे में चुप नहीं हैं । भगवान् के 10 अव्याकृत हैं अर्थात जिन्हें वाणी से या अन्य पंचिन्द्रियों से नहीं व्यक्त किया जा सकता इसलिए अव्याकृत हैं क्योंकि इन्द्रियातीत अवस्था में इन दस अव्याकृतो को जाना जा सकता है और वह अवस्था एक अर्हत ही प्राप्त कर सकता है। ये दस अव्याकृत हैं- 1 लोक नित्य है 2लोक अनित्य है 3 लोक शांत है 4 लोक अनंत है 5जीव
    और शरीर एक हैं 6 जीव और शरीर अलग अलग हैं 7 तथागत मरने के बाद रहते हैं 8 तथागत मरने के बाद नहीं रहते हैं 9 तथागत मरने के बाद रहते भी हैं नहीं भी रहते हैं 10 तथागत मरने के बाद न रहते हैं न नहीं रहते हैं । तो ये तथागत के 10 अव्याकृत अर्थात भगवान् ने भिक्खुओं को बताया कि इन्हें समझने हेतु इन्द्रियातीत अवस्था की समाधि को प्राप्त करके ही समझा जा सकता है और किसी भी इंद्री से इन दस को
    व्यक्त नहीं किया जा सकता । यहाँ ईश्वर आदि के बारे में भगवान् मौन नहीं है बल्कि स्पष्ट कहा है भगवान् ने पढ़ें संखारुप्पत्ति सुत्त मज्झिम निकाय और पढ़ें अभिधम्म पिटक कि भगवान् ने बताया है यह लोक 8 नरक लोक 1 मनुष्य लोक 6 देव लोक 16 ब्रह्म लोक साकार वाले and 4 निराकार ब्रह्म अनंत आयतन वाला है। और जो मैं धर्म बताता हूँ वह इन सभी मरणशील लोक और इनमे रहने वाले नश्वर प्राणियों से भी ऊपर
    की अजर अमर अवस्था को समझाने वाला और पहुंचाने वाला धर्म है । वह मार्ग मैंने स्वयं खोजा है । यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है १-अग्नि २-वायु ३-जल ४- पृथ्वी ५-आकाश ६- विज्ञान । और जीवित शरीर बना है रूपनाम से रूप बना है अग्नि वायु जल पृथ्वी से और नाम बना है वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान से मिलकर । रूप की सबसे छोटी इकाई है अट्टकलाप । तो भगवान् ने कहा है कि जगत करता कोई नहीं और ये
    लोकपाल (ईश्वर=देव) भी मरणशील हैं। अपने-२ कर्म फल भोगकर मर जाते हैं । सबसे बड़ा है मन पर मन भी मरणशील है अर्थात परिवर्तनशील so everything is unstable in this universe always all things become change without any stay a little bit . अतः भगवान कहते हैं तुम्हारे बदले न कोई कर्म करता है और न कोई फल भोगता है । तभी तो धम्मपद में कहा भगवां ने ” मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया ” ।।भवतु सब्ब मंगलं || और जरा ये भी जान लें तो अच्छा होगा कि
    भगवान और इश्वर एक ही बातें नहीं हैं भगवान् कहे जाते हैं क्योंकि उन्होंने राग दोस मोह को सदा के लिए भग्न कर दिया है । इसीलिए कहा भी है पालि में — भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो इतपि सो भगवां अरहं सम्मा सम्बुद्धस्स ।। एवं इश्वर अर्थात किसी लोक का स्वामी / राजा / सबसे बड़ा अधिकारी । और भगवान् के धर्म में सर्वशक्ति मान है मन this is the lord of all in this world whatever appears first that appears in firstly in मन और मन पर समय का भी
    कोई वश नहीं चलता अभी यहाँ और अभी चन्द्रमा पर ; तो देखिये दोनों ही बातो करने में मन को बराबर वक़्त लगता है क्योंकि मन से तेज़ संसार में कुच्छ भी नहीं । ओर इससे सुस्त भी कोई नहीं चाहे तो शून्य हो जाये

  2. आपसे मेरा बस यही जानने का अनुरोध है कि आप अपने और अपने बच्चों के धर्म वाले कॉलम में स्कूल कॉलेज या नौकरी के फॉर्म में क्या लिखते हैं ?
    यदि हिन्दू ही लिख रहे हैं तो बात बचकानी हो जाती है कथनी करनी में विरोधाभास हो जाएगा , फिर ना व्यक्ति अम्बेडकरवादी हो सकता है और बुद्ध्वादी तो कहाँ से होगा ?
    दूसरी बात लोग केवल बोधिसत्त डॉ बी आर अम्बेडकर के दिए आरक्षण को लेने के लिए अम्बेडकरवादी होने का दिखावा करते फिरते हैं और उनके घरों में उनकी पत्नियां बच्चे पुरोहितवादी ब्राह्मण के पाखण्ड पर ही चल रहे हैं |
    तथागत भगवान् बुद्ध ने कभी भी नास्तिकवाद कि पैरोकारी नहीं कि और ना ही आस्तिकवादी धर्म की , भगवान् बुद्ध तो मध्यम मार्ग के उपदेष्टा हैं और वह मध्यम मार्ग शुरू होता है :-
    दो अतियों के त्यागसे –
    १-तपन- यानि व्यक्ति उपवास आदि रखकर भूखा-प्यासा रहकर शरीर को कष्ट दे, अर्थात ईश्वरवादी
    २-भोग-यानि व्यक्ति भोगविलास अर्थात भौतिकवादी दृष्टि के साथ जिए और केवल ये सोचे कि केवल यही जनम है मृत्यु के बाद कोई न लोक ना परलोक है , जो भोगना है यहीं भोग ले और खूब मौज-मस्ती कर जीवन जिए , अर्थात जैसा कि नास्तिकवादी सोचता है |
    इन दोनों अतियों को त्याग जो मार्ग भगवान् बुद्ध ने बताया है वह है मध्यम मार्ग :-
    यह मध्यम मार्ग ३७ बोधिपक्षिय धर्मों का योग है |
    १- चार सतिपट्ठान
    २-चार सम्यक प्रधान
    ३-चार ऋद्धिपाद
    ४-पाँच (अध्यात्मिक )इन्द्रिय
    ५-पाँच (अध्यात्मिक )बल
    ६-सात बोध्यंग
    ७-आठ आर्य अष्टान्गिक मार्ग
    यह है पूरा बौद्ध धर्म जो कि ८४००० सूत्रों वाला तिपिटक के नाम से प्रथम संगीति में में अरहत भिक्खुओं द्वारा संकलित किया गया | इस प्रथम संगीति में केवल अरहत भिक्खुओं को ही शामिल किया गया था | और संगीति के पूर्व ही भिक्खु आनंद को सुत्त पिटक का अध्यक्ष चुना गया था , जबकि विनय पिटक के अध्यक्ष भिक्खु उपालि को चुना गया था और अभिधम्म पिटक के दो अध्यक्ष चुने गए १- थेर महाकस्सप २-अनुरुद्ध थेर
    इस प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन महाराज अजात्सत्तु ने करवाया था | इस संगीति में भिक्खु आनंद को तभी शामिल किया गया अर्थात जब आनंद ने अर्हत्व को पा लिया , और इस बात को सिद्ध करने के लिए कि वह अब अरहत हो गए हैं आनंद थेर ने अरहत भिक्खु संघ के समक्ष अरहत ऋद्धि का प्रदर्शन किया , वह था उनका पृथ्वी में डुबकी लगाकर ( जैसे जल में सामान्य पुरुष लगाता है ) भिक्खु संघ के बीच में पृथ्वी में से बाहर उछलकर उपस्थित होना |

    नमो बुद्धाय ||
    भवतु सब्ब मंगलं ||

  3. ये title हिन्दू लगाने से कुछ नहीं होता और प्रजापति लगाने से कोई प्रजापति या ब्रह्मा जी की औरस संतान या वंशज नहीं हो जाता । प्रजापति आजकल कुछ कुम्हार जाति के जो शूद्र वर्ण के हिन्दू है वे भी लगाते हैं तो कुम्हारों को पुरोहित बनने का अधिकार मिल गया ।
    पहले ये बताओ तुम्हारा गोत्र क्या है जाति क्या है । अपने डाक्यूमेंट्स और अपने बच्चों के डाक्यूमेंट्स में जाति क्या लिखते हो?

    बीमार मानसिकता का सम्प्रदाय और उसके बीमार सड़े हुए धर्म ग्रन्थ ।

    वैसे तुमने ये भी नहीं लिखा की तुम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र कौन हो ? और शूद्रों में भी दो वर्ग छूत शूद्र या अछूत शूद्र ।

    दुनिया के सभी धर्म सम्प्रदायों में धर्म सम्प्रदाय का नाम बोले तो बात ख़त्म हो जाती है पर जब हिन्दू बोले तो बात शुरू होती है कौन हो ब्राह्मण हो या बनिए या चौहान ठाकुर अर्थात तुम्हारी जाति क्या है ? क्योंकि जाति पता करनी होती है फिर उसी के अनुसार उससे व्यवहार किया जाता है ।
    यदि किसी को कैंसर हो जाए तो उसे उस फोड़े को पालना अच्छा है या उसका ऑपेरशन करा बाहर निकलवा जिंदगी बचानी चाहिए । जो मूर्ख है वह कैंसर के फोड़े को पाल सकता है जो बुद्धिमान है वो तो निकालेगा ही इलाज़ करेगा ही ।।
    विप्राणां वेसविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम्।
    शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मों नैश्रेयसः परः ।। मनुस्मृति ch 9 श्लोक 334
    अर्थात
    वेदज्ञ ब्राह्मणों और यशस्वी गृहस्थों की सेवा करना ही शूद्र का परम कल्याणकारी धर्म है ।।
    वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् ।
    तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ।। मनुस्मृति ch9 श्लोक 418
    अर्थात राजा को चाहिए कि वैश्यों को और शूद्रों को यत्नपूर्वक अपने अपने कामों में लगा रखे ;क्योंकि इनके अपने-2कार्यों में न लगने से ये इस जगत में (धन के मद से)बड़ा दुंद मचाते हैं ।।
    क्षत्रस्यातिप्रबृद्धस्य ब्राह्मणांप्रति सर्वशः।
    ब्रह्मैव सन्नियंतृ स्यात्क्षत्रं ही ब्रह्मसंभवम्।।मनुस्मृति ch9 श्लोक 320
    अर्थात अतिसमृद्ध क्षत्रिय यदि ब्राह्मणों को पीड़ा दे तो ब्राह्मण उसे दंड दे,क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मण से पैदा हुआ है ।।

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