10-AUG-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: त्रिदुःख सूत्र- बहुजन जनता के दुखों के कारण और निवारण ….समयबुद्धा


varn vyastahहम में से ज्यादातर लोगों ने सुना होगा की बौद्ध धम्म का लक्ष्य किसी काल्पनिक ईश्वर या स्वर्ग को पाना नहीं, अपितु संसार से मानवता और अन्य जीवों के दुखों का समाधान खोजना व् करना है विज्ञानं और न्याय ही बौद्ध धम्म है| सभी मानवों और जीवों के दुःख के समाधान की खोज के दौरान गौतम बुद्ध ने संसार को जीवन के चार आर्य सत्य दिए हैं। गौतम बुद्ध की यह देशना सर्वकालिक है, ये बात उन्होंने ढाई हजार वर्ष पूर्व कही थी पर उनके बताये हुए मार्ग उस समय भी सटीक थे, आज भी हैं और जब तक मनुष्य है तब तक रहेंगे। उन्होंने मनुष्य के स्वभाव और चेतना की बात की है- श्रद्धा को छोड़ तर्क और विज्ञान पर जोर दिया। उन्होंने एक जीवन विज्ञान दिया, उन्होंने केवल दर्शन शास्त्र की बात ही नहीं की बल्कि रोग व चिकित्सा की बात की है। उन्होंने किसी और पर जैसे राजा या ईश्वर पर आश्रित होने को नहीं कहा परन्तु स्वयं के जागरण व होश को महत्व दिया। उनका सारा जोर इस बात पर था की मनुष्य की पीड़ा कैसे दूर हो, उसमें कैसे रूपांतर आए और वह स्वयं ही आनंद रूपी स्वभाव की पहचान कर सके।बौद्ध धम्म की शुरुआत ही दुःख पर आधारित चार आर्ये सत्यों से होती है, गौतम बुद्ध ने जिन चार आर्य सत्यों की बात की वो हैं
पहला आर्य सत्य है, दुःख !
दूसरा आर्य सत्य है, दुःख का कारण
तिसरा आर्य सत्य है, दुःख का निवारण !
चौथा आर्य सत्य है, दुःख निवारण का तरीका

चौथा आर्य सत्य है, दुःख निवारण का तरीका इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं क्योंकि अष्टांगिक मार्ग से ही दुःख दूर होते हैं, वे अष्टांग ये हैं :-
1. सम्यक् दृष्टि, 2. सम्यक् संकल्प, 3. सम्यक् वचन, 4. सम्यक् कर्मांत, 5. सम्यक् आजीव, 6. सम्यक् व्यायाम, 7. सम्यक् स्मृति, 8. सम्यक् समाधि।

अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक देखें:
https://samaybuddha.wordpress.com/2014/05/19/gautam-buddh-char-arye-satye/

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ये तो हुई बौद्ध धम्म के सिद्धांतों में दुःख की बात पर एक झलक, इसको पढ़ कर संसार अक्सर समझता है की बौद्ध धम्म निराशावादी है, पर ऐसा नहीं है धम्म में दुखों की बात शुरू में करता है पर इससे आगे सब कुछ इन दुखों के समाधान की ही शिक्षा देता है| ये आशावादी और जगाने वाला है|

मैं थोड़ा अलग सोचता हूँ, और शायद बुद्ध का भी यही मतलब रहा होगा, मुझे लगता है -दुःख और सुख – दोनों ही जीवन के जरूरी पहलू हैं | जीवन को चुनना हो, तो मृत्यु से भागना संभव नहीं | सुख में गहरे गोते मारने हों, तो दुःख भी उतना ही गहरा जाना होगा| लहर जितनी ऊंची हो, उतनी ही गहरी भी होती है – ये दोनों एक दुसरे से अलग हो ही नहीं सकते |अगर कभी कड़वा या नमकीन खाया होगा तभी मीठे के स्वाद की कीमत पता चलती है,अगर केवल मीठा ही मीठा खाओ तो मीठा ही दुःख हो जायेगा| सोचिये – यदि दुःख है – तो उसे दूर करने के प्रयास हैं, और उनके सफल होने पर सुख की अनुभूति भी | परन्तु जब सुख ही सुख हो – तो प्रयास किस चीज़ के लिए हो ? कितनी निराशा हो जायेगी – शायद वह निराशा अभी के दुखों से भी बड़ी लगने लगे ?दुखों के समाधान में लगे रहना ही तो जीवन है|

मेरे हिसाब से जीवन में तीन प्रकार के दुःख होते हैं, इसे मैं त्रि-दुख सूत्र कहता हूँ :
:
१. पहले प्रकार का दुःख होता है प्राकृतिक दुःख: जैसे मृत्यु भूकम्प ,सूखा,बाढ़, कोई शारीरिक या मानसिक विकृति आदि, इनके लिए कोई धर्म या कोई ईश्वर कुछ नहीं कर सकते, हाँ विज्ञानं या धम्म ने इन दुखों के निवारण पर भी अपनी कुछ पकड़ बना ली है और ये पकड़ मजबूत होती जा रही है|

२. दुसरे प्रकार का दुःख होता है व्यक्तिगत दुःख: ये वो दुःख होते हैं जो हमारे गलत कर्मों के करने के कारन हमे मिलते हैं, जैसे कोई गलत खानपान या जीवन शैली की वजह से कोई बीमारी, कुसंगति की वजह से गलत मानसिकता परिणाम स्वरुप अपराध की सजा| लालच या तृष्णा की वजह से असंतोष,परिजन से बिछड़ना आदि, इन सभी दुखों के मूल कारन धम्म में बताये गए पंचशील तो तोडना ही है मलब १-हत्या,२ चोरी या बेईमानी,३- काम पापाचार या अनैतिक रिश्ते,४-झूठे, कठोर और अनावश्यक वचन,५- किसी भी नशीली चीज़ों का सेवन या नशा करना| अगर हम पंचशील से चलेंगे तो व्यक्तिगत दुखों से पार पा सकते हैं|

३. तीसरे प्रकार का दुःख होता है राजनैतिक दुःख: राजनीती ही वो जगह हैं जहाँ मानव ही नहीं अन्ये जीवों की दशा, दिशा, भूत वर्तमान और भविष्य का फैसला किया जाता है| उदाहरण के लिए गलत सरकारी नीतियों की वजह से, जनता में असंतोष,कुपोषण,अशिक्षा,युद्ध, अपराध,भेदभाव, जातिवाद और वर्णव्यस्था, धर्म और ईश्वरवाद का दुरूपयोग, पुरोहितवाद, राष्ट्रीय संपत्ति और संसाधनों का अनुचित बटवारा जिससे अमेरि और गरीबी में बड़ा फर्क आदि
हे बहुजनों ! किसी भी प्रकार के दुःख की शुरुआत का सबसे पहला कदम होता है, ध्यान न देना या नजरअंदाज या अनसुनी करना|क्योंकि जब हम अनसुनी करेंगे तो हम जानेंगे नहीं जब जानेंगे नहीं तो समाधान कैसे खोजेंगे, खोजेंगे नहीं तो पाएंगे कैसे| ध्यान पर बौद्ध मत बहुत ज्यादा जोर देता हैं गौतम बुद्ध की मूर्ती ही ध्यान मुद्रा में इसी सन्देश को देने हेतु बनायीं गयी है| ध्यान का मतलब खली बौठे रहना नहीं, खली बैठने से गौतम बुद्ध का मतलब है दिमाग चलना, जीवन में जिन बातों से हमारा सामना हो उनपर ध्यान दो और उसके बारे में सोचो|अगर आपने मेरी देशना के बारे में नहीं सोचा तो ये आपके सामने से ऐसे ही गुज़र जायेगी जैसे आप सोये रहो और बहार बारिश निकल जाए | ध्यान का कोई कुछ भी मतलब समझाए पर जो मैं समझ हूँ और आपसे समझा रहा हूँ वो यही है की ध्यान का असल मतलब यही है की अपने आस पास होने वाली हर घटना हर बात पर ध्यान दो और वहां से अपने लिए मुख्ये रूप से निम्न चार चीज़ों के बारे में सतर्क रहो-
१- हमारी शक्ति बढ़ानी वाली बात,
२- हमारी कमजोरी बढ़ाने वाली बात,
३. हमारी तरक्की के अवसर
४- और हमारे लिए कोई खतरा

ये अंग्रेजी का SWOT  सिद्धांत है| ध्यान न देना ही वो कारन हैं जिनकी वजह से धरती पर बुद्ध पुरुष आते हैं और चले जाते हैं पर दुःख ख़त्म नहीं होते| किसी भी व्यक्ति या कौम की दुर्दशा होने की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब वो तथ्यों या ज्ञान की बातों को ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करना शुरू करता है|आप खुद ये बात नोट करना की जो नाकामयाब व्यक्ति होगा वो ज्ञान की बात को पूरा सुनने से पहले ही ख़ारिज कर देगा,जबकी कामयाब आदमी हर बात को पहले सुनता है, सोचता है फिर उसे अपनाता या ख़ारिज करता है|

जो लोग ध्यान दे देते हैं उनके दुःख बहुत काम हो जाते हैं | गौतम बुद्ध जब आये तो उनके सन्देश को समझने और अपना के लाभ उठाने वाले भी ब्राह्मण ही थे, जबकि जिन बहुजनों के लिए उन्होंने ज्ञान वर्षा की वो ध्यान न देने के कारन कोई लाभ नहीं उठा सके| बहुजन ध्यान न देने का कारन ये बताते हैं की वो श्रमजीवी है वो अपनी आजीविका कमाए या ध्यान दे, यकीनन बात सही है| पर आप अपने आस पास देखो की बहुजन चौबीस घंटे तो श्रम नहीं करता,कुछ समय वो मनोविनोद और बात चीत में लगता है| तो आपने यही करना है की वो जो बात चीत है वो बेफिजूल की न हो, मैंने ऊपर जो चार तरह के ध्यान बताएं हैं हमारी बातें इन्हीं पर आधारित होनी चाहिए| आप पाओगे की धीरे धीरे आपके जीवन में दुःख काम हो जायेगा| उदाहरण के लिए टीवी में ज्ञान भी है बेफिजूल टाइमपास भी ये आपपर है आप क्या चुनते हो|

दुःख कम करने का धम्म मार्ग कभी बेकार नहीं जा सकता, इसमें समय तो लग सकता है पर कभी विफल नहीं होता|आपको जानकर हैरानी होगी जी जिन ब्राह्मणवादियों को आप पक्के ईश्वरवादी या धार्मिक समझकर धर्म में लग जाते हो,असल में उसने धर्म और ईश्वरवाद आपके लिए बनाया है और खुद बुद्ध के मार्ग पर चलता है और बुद्ध से घृणा करना का नाटक करता है| भारत में आज़ादी के आस पार जब जनतंत्र को चुना गया तो ब्राह्मणों को लगा वो अल्पसंख्यक हो जायेंगे ऐसे में वे ईश्वर भरोसे नहीं बैठे रहे उन्होंने बुद्ध की बात मानी ‘अप्प दीपो भव’ और सवेवसेवक संघ बनाकर राजनीती शुरू कर दी, कुछ पीढ्यां जरूर खप गयीं पर आज उन्हीं की सरकार बन गयी है|ध्यान रहे तथाकथित ईश्वर भी उसी की मदत करता है जो खुद की मदत खुद करता है

धम्म के मार्ग में समय लगता है और आम जनता तुरंत दुखों का समाधान चाहती है इसीलिए पाखंडी बाबाओं के गंडा तावीज, कर्मकांड, पूजा,बलि, पांडा पुरोहितवाद के चक्कर में लगी रहती है|पांडा पुरोहितवाद का नकली इलाज आपकी नकली बीमारी को तो ठीक कर सकता है पर असली को कभी नहीं ठीक कर सकता| नकली बीमारी से मेरा मतलब है आपका भ्रम या गलत सोच, जैसे मेरे घर में भूत है, अब भूत घर में नहीं आपके दिमाग में है, आपको अब कुछ ऐसा चाहिए जो आपके दिमाग से इस घर कर गयी बात को उखाड़ फेके| ऐसे में पूरे कॉंफिडेंट के साथ पण्डे आपके घर में ढोंग करते हैं मतलब नकली इलाज और आपकी नकली बीमारी ठीक हो जाती है| ये एक मनोविज्ञान है|

तो जब आप ध्यान दोगे तो समझ जाओगे की जीवन में चालीस प्रतिशत दुःख व्यक्तिगत होता है पर साठ प्रतिशत दुःख राजनैतिक कारणों से पैदा होता है, तो ये हुआ कुल सौ प्रतिशत दुःख | जीवन में प्राकृतिक दुःख या तो होता है या नहीं होता है मतलब ०% या १०० %, कुछ अपवादों को छोड़कर इसको दुखों के प्रतिशत में नहीं रखा जा सकता| तो चालीस प्रतिशत व्यक्तिगत दुखों के समाधान आपके अपने हाथों में हैं, पंचशील अपनाओ और व्यक्तिगत दुखों से मुक्ति पाओ| अब बात करते हैं साठ प्रतिशत राजनैतिक दुखों की,

राजनैतिक दुखों की बात शायद अब भी समझ में न आई होगी, दुःख के राजनैतिक कारन हेतु देखो अपनी दशा आप हर तरफ से गुलाम बनते जा रहे हो और आपको पता भी नहीं चल रहा, यही तो है ब्राह्मणवाद, आज सारी संवेधानिक संस्थाएं नाकाबिल कर दी गयीं हैं और उनके मुकाबले ब्राह्मणवादी संस्थाएं खड़ी कर दी गयीं हैं| उदाहरण के लिए सरकारी टीवी रेडियो चैनल, अखबार की जगह कई प्राइवेट चैनल और अखबार जो केवल ब्राह्मणवादी अजेंडे का प्रचार करते हैं| सरकारी स्कूल विफल, ये बहुजनों को सिर्फ मजदूर बना रहे हैं, प्राइवेट स्कूल में गुरुकुल की तरह केवल राजा सेठ और पुरोहित के बच्चे पड़ते हैं| बीमार हो जाओ तो इलाज को सरकारी अस्पताल विफल कर दिया गए हैं और प्राइवेट में जिसके पास पैसा है वही इलाज करा सकता है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी अब ब्राह्मणवादियों की,सरकारी एयरलाइन्स विफल अब नज़र रेल पर, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है, समझदार के लिए इशारा ही काफी है|चलो ये तो होना ही था पर ये क्या बात है की इन सबके मालिक केवल ब्राह्मणवादी ही हो सकते हैं, मूलनिबासी नहीं| होना ये चाहिए की जिसकी जितनी जनसँख्या उसकी उतनी भागीदारी|india poverty

जानते हैं गुलामी क्या है, वही पहले जैसे दिन आ गए बस नाम और रूप बदल गया, जैसे पहले आप अपने जीवन की हर चीज़ के लिए ब्राह्मणवादी पर निर्भर थे, जैसे काम उनके खेतों में, बाजार उनकी दुकानों से, कर्ज इन्ही साहूकारों से, आदि आदि वैसे ही आज है | सोचिये जब बच्चा पैदा होता है तो किसी ब्राह्मणवादी के हस्पताल में, फिर स्कूल पढ़ने जाता है ब्राह्मणवादी के स्कूल में फिर कॉलेज जाता है ब्राह्मणवादी की यूनिवर्सिटी फिर नौकरी करता है ब्राह्मणवादी की कंपनी में, अभी तो ठीक है पर धीरे धीरे सिकंजा कसता जाएगा और आप ब्राह्मणवादियों के इशारे पर जीने मरने को पहले की तरह मजबूर हो जायेंगे|राष्ट्रीय संपत्ति या संसाधनों का ये अनुचित बटवारा ही तो मानवता के दुःख का मूल कारन है, यही तो बौद्धों ने दुःख का मूल कारन बताया है, और इसके खिलाफ जो क्रांति थी वही तो बौद्ध धम्म था और है, इसके आलावा तो सब ब्राह्मणवादी मिलावट है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने पुस्तक ‘कार्ल मार्क्स और भगवान बुद्ध’ लिखी, इसीलिए उन्होंने कहा है की बौद्ध धम्म का प्रचार ही मानवता की सच्ची सेवा है| जागो कब तक सोये रहोगे, ये मजे जो ले रहे हो ज्यादा दिनों के लिए नहीं हैं सावधान|

राजनैतिक कारण या गलत सरकारी नीतिओं की वजह से ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है और आज भी है| और आज भी है.इसी के कारण भूख,कुपोषण,गरीबी,वेश्या वृत्ति, विच्छिन्नतावाद,उग्रवाद जैसी दूसरी अन्य कई समस्यायों की सृष्टि होती रही है.यही वह सबसे बड़ी समस्या है इस संसार में प्रकृति के पास सभी जीवों एक मनुष्यों के लिए इंतज़ाम है पर कुछ लालची लोगों के लालच के कारन ही संसार दुखमय हो गया| देखो अपने आस पास देश के नब्भे प्रतिशत संसाधन जैसे जमीन,पूँजी केवल दस प्रतिशत के पास है और नब्बे प्रतिशत बहुजन10 प्रतिशत से भी कम संसाधनों में जीने को मजबूर है|इसीलिए जनता के लिए ये जरूरी है की वो राजनीती में हिस्सा ले और उसपर अंकुश रखे|

गौतम बुद्ध ने किसी धर्म की खोज नहीं की बल्कि उन्होंने तो मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ के खिलाफ एक व्यस्थित क्रांति की और उसकी विचारधारा दी, अधिक जानकारी के लिए ही एच0 एल0 दुसाध जी के लेख देखो, लिंक निम्न प्रकार से है

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/01/29/h-l-dushad-what-are-reasons-for-miseries-of-bahujan-in-india/

 

…समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखाय

एक बार एक नवयुवक किसी जेन मास्टर के पास पहुंचा .

“ मास्टर , मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ , कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं !” , युवक बोला .

मास्टर बोले , “ पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो .”

युवक ने ऐसा ही किया .

“ इसका स्वाद कैसा लगा ?”, मास्टर ने पुछा।

“ बहुत ही खराब … एकदम खारा .” – युवक थूकते हुए बोला .

मास्टर मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक लेलो और मेरे पीछे -पीछे आओ . “

दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए .

“ चलो , अब इस नमक को पानी में दाल दो .” , मास्टर ने निर्देश दिया।

युवक ने ऐसा ही किया .

“ अब इस झील का पानी पियो .” , मास्टर बोले .

युवक पानी पीने लगा …,

एक बार फिर मास्टर ने पूछा ,: “ बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है ?”

“नहीं , ये तो मीठा है , बहुत अच्छा है ”, युवक बोला .

मास्टर युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले , “ जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं ; न इससे कम ना ज्यादा . जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है , बिलकुल वही . लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं . इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो …ग़्लास मत बने रहो झील बन जाओ .”

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