बौद्ध धम्म में बहुजनों का पुनः लौटना और बर्मा देश की मान्यता….Team SBMT

बौद्ध धम्म में बहुजनों का पुनः लौटना और बर्मा देश की मान्यता

बर्मा देश में यह मान्यता थी कि बुध्द महापरिनिर्वाण को 2500 साल पुर्ण होणे पर ‘भारत में बुध्द का धर्म गतिमान होंकर विश्वकल्याण होंगा’, यह बर्मावासीयों कि मान्यतता अकारण नही थी ? इसका भी एक कारण है सम्राट अशोक के गुरू महास्थवीर माेगलिपुत्त तिष्य व्दारा बर्मा देश में सोन और उत्तंर नाम के दो अर्हंत बौध्द भिक्षुओं को भेजकर महास्थवीर माेगलिपुत्त तिष्य ने यह भविष्यवानी कि थी कि बुध्द के महापरिनिवार्ण से 500 साल बाद बुध्द का धम्म लुप्त होंगा एंव बुध्द के महापरिनिर्वान से 2500 साल बाद फिर से भारत में बुध्द का धम्म मानवकल्याण के लिये पुर्णजिवीत होंगा, यह मान्यता बर्मा में प्रचलित थी। महास्थवीर मागलिपुत्त तिष्य कि भविष्यवाणी काल्पनीक मान्यताओं का लेखा नही था, बल्कि वास्तिविकता थी।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा लाखों लोंगो को ‘धर्मदिक्षा’ देकर लोग लाभाविंत हुयें यह दिन 14 ऑक्टों 1956 था लेकिन बुध्द संवत् (Calendar) के अनुसार यह दिन अशोका विजयादशमी था और इसी दिन को ही 2500 साल पुर्ण होते है। सम्राट अशोक के गुरू महास्थवीर मोगलीपुत्त तिष्य के भविष्यवानी को भारत के धरती पर किसीने क्रिर्यान्वितं किया है वह मात्र डॉ. बी.आर.आंबेडकर है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने कभी यह नही कहा कि मै 14 ऑक्टोंबर 1956 को ‘धम्मदिक्षा’ लेकर ‘धम्मदिक्षा’ दुंगा, बल्कि स्पष्ट रूप से कहा कि मै अशोक विजयादक्षमी को ‘धम्म दिक्षा’ लुंगा और दुंगा क्योंकि यह दिन सम्राट अशोक का ‘विश्व धम्म विजय’ दिन है। डॉ. बी. आर. आंबेडकर आगे यह भी स्पष्ट करते है कि ‘धम्मदिक्षा’ दिन को अशोक विजयादक्षमी के उपलक्ष में हर्षउल्लहास के साथ मनाये ताकि यह ‘धम्मविजय’ दिन विश्वधम्म दिन बनकर चिरविस्मृत बना रहे। अशोक विजयादक्षमी के दिन ही आर.एस.एस. कि भी स्थापना कि गई थी क्योंकि इनके पुर्वजनोंने इस दिन को अंतिम मार्य सम्राट ब्रहद्त कि हत्या कि गई थी।
बैगर मानव-संसाधन से हम बुध्द के धम्म को संचारित नही कर सकते, डॉ. बी.आर.आंबेडकर द्वारा लाखों अनुयायायों को ‘धर्मदिक्षा’ देकर बुध्द के धम्म को संचारित करने के लिये मानव-संसाधन का स्त्रोत निर्माण किया। लेकिन डॉ. बी.आर.आंबेडकर के धम्मदिक्षा दिन को लेकर ना समझी से देश और जनता में यह प्रचार किया गया कि 14 ऑक्टोंषबर 1956 को ही ‘धम्मंदिक्षा’ समारोंह का आयोजन करके ‘दिक्षाभुमी’ जाना चाहीये ना कि अशोका का विजयादक्षमी को ? इस प्रकार के तर्कहिन विस्मृती से 14 ऑक्टोंबर 1956 तथा अशोका विजयादक्षमी में भ्रम का प्रचलन चल पडा जिससे मानवजगत तथा उच्च शिक्षीत लोग तर्कहिन भ्रम के धक्के खाकर अज्ञान बने है।
धम्मदिक्षा दिन के लिये आप अग्रंजी संवत् (Calendar) के 14 ऑक्टोंबर 1956 के तारीख को महत्व देते है तो फिर धम्मदिक्षा के दिन को 2500 साल पुर्ण नही होते और नाही डॉ. बी.आर.आंबेडकर के विवेचन को महत्व रहेंगा, क्योंकि सम्राट अशोक के गुरू महास्थीवीर मोगलिपुत्त तिष्य कि भविष्यवानी का आधार अग्रंजी संवत् (Calendar) नही था, बल्कि बुध्द संवत् (Calendar) है। और बुध्द संवत् (Calendar) मगध का बौध्द सम्राट अजातशत्रु ने बुध्द महापरिनिर्वान के दिन को शुन्य बिन्दु का आधार मानकर बुध्द संवत् (Calendar) कि विधीवत गनना प्रथम बौध्द संगयती से सुरू कि गई थी और इसी बुध्द संवत् (Calendar) को आधार मानकर सम्राट अशोक ने अपने शासन काल में बुध्द संवत् (Calendar) को महत्व दिया था, इसके प्रमाण आपको रूकमीनी शिलालेख (लुंबिनी) में मिल ही जायेंगे, यह बुध्द संवत् (Calendar) दुनिया का प्रमाणित तथा लिखीत Calendar है इसकि प्रतिया आप श्रीलंका से प्राप्त कर सकते है। इस लिये डॉ. अमर्त्य सेन दुनिया के सभी Calendar को नकारते हुये कहा है कि दुनिका प्रमाणित Calendar मात्र बुध्द संवत् (Calendar) है कलि-विक्रम संवत् के संदर्भ में कहा है कि यह पुरा बोगस Calendar है क्योंंकि इस में शुन्य बिंन्दु का आधार नही…..

अधिक जानकारी के लिए विपस्षणा गुरु गोयनका जी का ये वीडियो देखे सुनें

 

नास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद (en:Atheism) पर आधारित मानवीय व्यस्था और ईश्वरवाद पर आधारित अमानवीय व्यस्था…दशरथ बैथये

DHAMMA or DHARMAनास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद (en:Atheism) वह सिद्धांत जो जगत् की सृष्टि करने वाले, इसका संचालन और नियंत्रण करनेवाले किसी भी ईश्वर के अस्तित्व को सर्वमान्य प्रमाण के न होने के आधार पर स्वीकार नहीं करता । (नास्ति = न + अस्ति = नहीं है , अर्थात ईश्वर नहीं है।) नास्तिक लोग ईश्वर (भगवान) के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण न होने कारण झूठ करार देते हैं । अधिकांश नास्तिक किसी भी देवी देवता, परालौकिक शक्ति, धर्म और आत्मा को नहीं मानते । हिन्दू दर्शन में नास्तिक शब्द उनके लिये भी प्रयुक्त होता है जो वेदों को मान्यता नहीं देते । नास्तिक मानने के स्थान पर जानने पर विश्वास करते हैं । वहीं आस्तिक किसी न किसी ईश्वर की धारणा को अपने धर्म, संप्रदाय, जाति, कुल या मत के अनुसार बिना किसी प्रमाणिकता के स्वीकार करता है । नास्तिकता इसे अंधविश्वास कहती है क्योंकि किसी भी दो धर्मों और मतों के ईश्वर की मान्यता एक नहीं होती है । नास्तिकता रूढ़िवादी धारणाओं के आधार नहीं बल्कि वास्तविकता और प्रमाण के आधार पर ही ईश्वर को स्वीकार करने का दर्शन है । नास्तिकता के लिए ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के लिए अभी तक के सभी तर्क और प्रमाण अपर्याप्त है ।
दर्शन का अनीश्वरवाद के अनुसार जगत स्वयं संचालित और स्वयं शासित है। ईश्वरवादी ईश्वर के अस्तित्व के लिए जो प्रमाण देते हैं, अनीश्वरवादी उन सबकी आलोचना करके उनको काट देते हैं और संसारगत दोषों को बतलाकर निम्नलिखित प्रकार के तर्कों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि ऐसे संसार का रचनेवाला ईश्वर नहीं हो सकता।

ईश्वरवादी कहते है कि मनुष्य के मन में ईश्वरप्रत्यय जन्म से ही है और वह स्वयंसिद्ध एवं अनिवार्य है। यह ईश्वर के अस्तित्व का द्योतक है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि ईश्वरभावना सभी मनुष्यों में अनिवार्य रूप से नहीं पाई जाती और यदि पाई भी जाती हो तो केवल मन की भावना से बाहरी वस्तुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मन की बहुत सी धारणाओं को विज्ञान ने असिद्ध प्रमाणित कर दिया है।

जगत में सभी वस्तुओं का कारण होता है। बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। कारण दो प्रकार के होते हैं-एक उपादान, जिसके द्वारा कोई वस्तु बनती है, और दूसरा निमित्त, जो उसको बनाता है। ईश्वरवादी कहते हैं कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी एक कार्य (कृत घटना) है अतएव इसके भी उपादान और निमित्त कारण होने चाहिए। कुछ लोग ईश्वर को जगत का निमित्त कारण और कुछ लोग निमित्त और उपादान दोनों ही कारण मानते हैं। इस युक्ति के उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी किसी समय उत्पन्न और आरंभ हुआ था। इसका प्रवाह अनादि है, अत: इसके स्रष्टा और उपादान कारण को ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है। यदि जगत का स्रष्टा कोई ईश्वर मान लिया जाय जो अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा; यथा, उसका सृष्टि करने में क्या प्रयोजन था? भौतिक सृष्टि केवल मानसिक अथवा आध्यात्मिक सत्ता कैसे कर सकती है? यदि इसका उपादान कोई भौतिक पदार्थ मान भी लिया जाय तो वह उसका नियंत्रण कैसे कर सकता है? वह स्वयं भौतिक शरीर अथवा उपकरणों की सहायता से कार्य करता है अथवा बिना उसकी सहायता के? सृष्टि के हुए बिना वे उपकरण और वह भौतिक शरीर कहाँ से आए? ऐसी सृष्टि रचने से ईश्वर का, जिसको उसके भक्त सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और कल्याणकारी मानते हैं, क्या प्रयोजन है, जिसमें जीवन का अंत मरण में, सुख का अंत दु:ख में संयोग का वियोग में और उन्नति का अवनति में हो? इस दु:खमय सृष्टि को बनाकर, जहाँ जीव को खाकर जीव जीता है और जहाँ सब प्राणी एक दूसरे शत्रु हैं और आपस में सब प्राणियों में संघर्ष होता है, भला क्या लाभ हुआ है? इस जगत् की दुर्दशा का वर्णन योगवासिष्ठ के एक श्लोक में भली भाँति मिलता है, जिसका आशय निम्निलिखत है–

कौन सा ऐसा ज्ञान है जिसमें त्रुटियाँ न हों, कौन सी ऐसी दिशा है जहाँ दु:खों की अग्नि प्रज्वलित न हो, कौन सी ऐसी वस्तु उत्पन्न होती है जो नष्ट होनेवाली न हो, कौन सा ऐसा व्यवहार है जो छलकपट से रहित हो? ऐसे संसार का रचनेवाला सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी ईश्वर कैसे हो सकता है?

ईश्वरवादी एक युक्ति यह दिया करते हैं कि इस भौतिक संसार में सभी वस्तुओं के अंतर्गत, और समस्त सृष्टि में, नियम और उद्देश्यसार्थकता पाई जाती है। यह बात इसकी द्योतक है कि इसका संचालन करनेवाला कोई बुद्धिमान ईश्वर है इस युक्ति का अनीश्वरवाद इस प्रकार खंडन करता है कि संसार में बहुत सी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका कोई उद्देश्य, अथवा कल्याणकारी उद्देश्य नहीं जान पड़ता, यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़, आग लग जाना, अकालमृत्यु, जरा, व्याधियाँ और बहुत से हिंसक और दुष्ट प्राणी। संसार में जितने नियम और ऐक्य दृष्टिगोचर होते हैं उतनी ही अनियमितता और विरोध भी दिखाई पड़ते हैं। इनका कारण ढूँढ़ना उतना ही आवश्यक है जितना नियमों और ऐक्य का। जैसे, समाज में सभी लोगों को राजा या राज्यप्रबंध एक दूसरे के प्रति व्यवहार में नियंत्रित रखता है, वैसे ही संसार के सभी प्राणियों के ऊपर शासन करनेवाले और उनको पाप और पुण्य के लिए यातना, दंड और पुरस्कार देनेवाले ईश्वर की आवश्यकता है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी यह कहता है कि संसार में प्राकृतिक नियमों के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं दिखाई पड़ते। पाप और पुण्य का भेद मिथ्या है जो मनुष्य ने अपने मन से बना लिया है। यहाँ पर सब क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं और सब कामों का लेखा बराबर हो जाता है। इसके लिए किसी और नियामक तथा शासक की आवश्यकता नहीं है। यदि पाप और पुण्य के लिए दंड और पुरस्कार का प्रबंध होता तथा उनको रोकने और करानेवाला कोई ईश्वर होता; और पुण्यात्माओं की रक्षा हुआ करती तथा पापात्माओं को दंड मिला करता तो ईसामसीह और गांधी जैसे पुण्यात्माओं की नृशंस हत्या न हो पाती।

इस प्रकार अनीश्वरवाद ईश्वरवादी सूक्तियों का खंडन करता है और यहाँ तक कह देता है कि ऐसे संसार की सृष्टि करनेवाला यदि कोई माना जाय तो बुद्धिमान और कल्याणकारी ईश्वर को नहीं, दुष्ट और मूर्ख शैतान को ही मानना पड़ेगा।

पाश्चात्य दार्शनिकों में अनेक अनीश्वरवादी हो गए हैं, और हैं। भारत में जैन, बौद्ध, चार्वाक, सांख्य और पूर्वमीमांसा दर्शन अनीश्वरवादी दर्शन हैं। इन दर्शनों में दी गई युक्तियों का सुंदर संकलन हरिभद्र सूरि लिखित षड्दर्शन समुच्चय के ऊपर गुणरत्न के लिखे हुए भाष्य, कुमारिल भट्ट के श्लोकवार्तिक, और रामानुजाचार्य के ब्रह्मसूत्र पर लिखे गए श्रीभाष्य में पाया जाता है।
धर्म मनुष्य को बाटँनेँ का काम करता है । अतः ईश्वर सिर्फ जनता का अफीम होता है।

नास्तिक अर्थात् अनीश्वरवादी लोग सभी देशो और कालों में पाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में नास्तिकों की कमी नहीं है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि ऐसे लोग आजकल बहुत कम मिलेंगे जो नास्तिक (अनीश्वरवादी) नहीं है। नास्तिकों का कहना यह है कि ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। सर्जक मानने की आवश्यकता तो तभी होगी जब कि यह प्रमाणित हो जाए कि कभी सृष्टि की उत्पत्ति हुई होगी। यह जगत् सदा से चला आ रहा जान पड़ता है। इसके किसी समय में उत्पन्न होने का कोई प्रमाण ही नहीं है। उत्पन्न भी हुआ तो इसका क्या प्रमाण है कि इसकी विशेष व्यक्ति ने बनाया हो, अपने कारणों से स्वत: ही यह बन गया हो। इसका चालक और पालक मानने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि जगत् में इतनी मारकाट, इतना नाश और ध्वंस तथा इतना दु:ख और अन्याय दिखाई पड़ता है कि इसका संचालक और पालक कोई समझदार और सर्वशक्तिमान् और अच्छा भगवान् नहीं माना जा सकता, संभवतः वो एक विक्षिप्त शक्तिधारक ही हो सकता है। संसार में सर्जन और संहार दोनों साथ साथ चल रहे हैं। इसलिए यह कहना व्यर्थ है, कि किसी दिन इसका पूरा संहार हो जाएगा और उसके करने के लिए ईश्वर को मानने की आवश्यकता है। नास्तिकों के विचार में आस्तिकों द्वारा दिए गए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सभी प्रमाण प्रमाणाभास हैं ।

 

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2000 वर्ष तक कोई भी भगवान हमारी मदद
करने को नहीं आया| किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि ये भी इन्सान है
इनको भी जीने का अधिकार है |
किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि इनको भी मैंने बनाया है फिर
मै इनको मंदिर में प्रवेश करने से क्यों रोकूँ ?
किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि इनकी भी आवश्यकताए है,
इनको भी सुविधापूर्वक, सरल जीवन जीने
का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा जिस पानी को पशु पी सकते है
वो पानी इन इंसानों के पीने से कैसे अपवित्र
हो सकता है ? किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा इनकी भी जरूरते है इसलिए
इनको भी भविष्य के लिए धन और संपत्ति संचय
करने का अधिकार है | किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा जो लोग गाय का मूत्र पीकर
अशुद्ध नहीं होते है वो किसी इन्सान
की छाया पड़ने से कैसे अपवित्र हो सकते है?
किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि इनको भी ऊपर उठने
का अधिकार है और इनको भी शिक्षा प्राप्त
करने का अधिकार है ? किसी भी भगवान ने ये
नहीं सोचा कि जब ये धरती पशु पक्षियों और
इन तथाकथित उच्च वर्ण के लोगो के मलमूत्र से
अपवित्र नहीं होता है तो फिर इन लोगो के
थूक और पदचाप से कैसे अपवित्र हो सकती है ?
फिर उस भगवान को मै क्यों मानू जिस
भगवान ने इंसानों में ही फर्क किया और
इंसानों को6743 से अधिक
श्रेणियों यानि कि जातियों में बाँट
दिया | जिस भगवान ने ये
नहीं सोचा सभी को समानता का अधिकार
है और सबको आजादी से जीने का अधिकार है,
उस भगवान को मै क्यों मानू ? मै उस इन्सान
को मानता हूँ जिसने इन
सभी बातो को जाना और हमको हर तरह
की से मुक्ति दिलाने के लिए अपना सर्वस्व
न्योछावर कर दिया|उन्होंने सारा जीवन
हमको पशु से इन्सान बनाने के लिए बलिदान कर
दिया और हमको इन्सान बना कर ही दम
लिया |
मेरे भगवान तो वही बाबा साहब DR.BHIM
RAO AMBEDKAR JI है जिनकी वजह से मै आज
आजाद हूँ |जिनकी वजह से मैंने शिक्षा प्राप्त
की, वही मेरे भगवान है | जिनकी वजह से मै आज
सिर उठाकर चल सकता हूँ वही बाबा साहब
मेरे भगवान है और मै उन बाबा साहब DR. BHIM
RAO AMBEDKAR JI को नमन करता हूँ ………
जय भीम Namo buddhay .
……. Jay bharat……..

 

भारत सरकार द्वारा प्रकाशित बाबा साहिब डॉ अम्बेडकर की सम्पूर्ण लेखनी (21 पुस्तकों का सेट) डाक सहित मात्र रु 1000 भारत में कहीं भी प्राप्त करें।…Nikhil Sablania

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Nikhil Sablania
M. 8527533051, 9013306236, L. 011 23744243

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