9-Sept-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: ‘विधिवत शिक्षा व् हुनर’- हमारे समाज को ईश्वर या धर्म नहीं चाहिए उन्हें शिक्षा और धम्म(न्याय व्यस्था) चाहिए|मैं सारे समाज से अपील करता हूँ की चाहे एक वक़्त को रोटी की क़ुरबानी देनी पड़े पर अगर उस क़ुरबानी के बदले आप अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकने में कामयाब रहे तो वो बहुत सस्ता सौदा होगा|…समयबुद्धा


avidhya fooleविधिवत शिक्षा प्राप्त करना या हुनर सीखने का तो कोई और विकल्प नहीं है, केवल यही जीविका और सम्मानित जीवन के बहरीन रास्ते हैं|हमारे समाज की मुक्ति का सबसे कारगर औजार शिक्षा एवं हुनर से प्राप्त क्षमता ही है, इसीलिए ढंग से पढने वाले और कम से कम 60 % अंकों से पास होने वाले बच्चों को तो पढने दे और जो 14 साल की उम्र में फेल हो जाएँ या बहुत कम अंकों से पास हों उन्हें किसी हुनर सीखने में लग जाना चाहिए या लगा देना चाहिए| बच्चा केवल 12 वर्ष तक ही अपना बच्चा रहता है फिर वो इस दुनिया के अन्य व्यक्तिओं की तरह अन्य व्यक्ति हो जाता है| ये वक़्त लाड प्यार का नहीं बल्कि उसे सही रास्ते पर ख़ुशी या जबरदस्ती से डालने का होता है|  विधिवत शिक्षा का अर्थ है स्कूल और कॉलेज से नियमित पढाई करना|

स्कूल  व कोलेज  ने ज्ञान को व्यस्थित कर के विद्यार्थी को धीरे धीरे सीढ़ी दर सीढ़ी सिखाने की व्यस्था  की गई है| सरकारी शिक्षा बोर्ड, स्कूल,कॉलेज, पाठ्यक्रम  इसी व्यवस्ता का हिस्सा है जो कई सदियों के अनुभव के बाद बनाई गए हैं |इस पुस्तक में मैंने जितनी बातें कहीं है इनमे से ज्यादातर बातें शिक्षा ग्रहण करने के दौरान हम उदहारण सहित सीख लेते हैं और अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लेते हैं |विधिवत शिक्षा का मुकाबला किसी भी प्रकार से सीखे  ज्ञान के तरीकों से नहीं किया जा सकता हाँ अनुभव फिर भी भरी ही रहेगा इसका कोई तोड़ नहीं है |

 

मैं सारे समाज से अपील करता हूँ की चाहे एक वक़्त को रोटी की क़ुरबानी देनी पड़े पर अगर उसके क़ुरबानी के बदले आप अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकने में कामयाब रहे तो वो बहुत सस्ता सौदा होगा| ये लेख जिसे आप पढ़  रहें है इसकी शुरुआत मेरे पिता के  उस एक विचार से हो गई थी जिसमें उन्होंने फैसला लिया था की वे मुझे एक अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाएंगे| आज मैं जो भी हूँ उसके दो ही कारण है एक मेरे माता पिता की मुझे शिक्षा और चौमुखी विकास के अवसर देना दूसरा मेरा इन अवसरों को समझना और इनका फायदा उठाना | ज्यादातर माता पिता अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा देना चाहते  हैं  पर अगर बच्चा ही न लेना चाहे तो इसमें माता पिता की क्या गलती|एक बात तो तय है की सभी के सभी उचायिओं  पर नहीं पहुचते पर हाँ सभी खुशहाल जरूर हो सकते हैं | इसलिए मेरा मानना है की हमें समाज के बच्चों को दो भागों में वर्गीकरण करना चाहिए एक जो बुद्धिमान और आज्ञाकारी हैं और पढने में तेज़ है दूसरे जो पढ़ाई  में पीछे हैं| उदाहरण के लिए पढाई  में ५० या ६० % अंक से कम लाने  वाले कुछ को छोड़कर ज्यादातर बच्चे, नौकरी पाने में असफल रहते हैं, ,अपवाद हर जगह होते हैं |

 

ये तो हम सभी जानते हैं  आज के युग में नौकरी पाने के लिए ज्यादा लोगों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, उदहारण के लिए किसी भी १० नौकरी  के लिए १० लाख लोग आवेदन करते हैं| अब इन दस लाख लोगों में टॉप १० प्रतिभा को ही चुना जायेगा बाकि के लोगों की निराश होना पड़ेगा| तो अगर नौकरी पानी है तो खुद को इतना ज्यादा बुलंद करना पड़ेगा की आप कोम्पटीसन या प्रतिस्पर्धा में जीत सकें| ऐसे प्रतिस्पर्धा में कम अंक लाने वाले बच्चे या वे जो जो कम मेहनत करते है उनका निकल पाना थोडा मुशकिल है | इसलिए पढाई के बारे में मेरा मानना है की या तो ढंग  से  से पढो  वरना  समय रहते पढाई छोड़ कर कोई हुनर सीख लो,ये सुनने में थोडा बुरा लग सकता है पर यही सच्चाई है |  ये तो आप भी मानते ही होगे की हर कोई अफसर तो नहीं बन सकता, हाथ का काम करने वाले भी समाज को चाहिए| इसमें में एक बात जरूर कहूँगा की कोई भी हुनर सीखने से पहले साक्षर होना अर्थात कम से कम पांच  से आठ कक्षा तक पढ़ाई करनी ही चाहिए अन्यथा केवल हुनर से भी उचायिओं को नहीं पाया जा सकता |

 

मैंने अक्सर लोगों को ये कहते सुना है की हमारे समाज के रहीसों  के बच्चे बिगड़ जाते हैं और सक्षम समाज के रहीसों की बच्चे नहीं बिगड़ते|  ऐसे होने की वजह है

  1. बच्चे को ज्यादा आराम देना और संगर्ष न करने देना
  2. माता पिता खुद कुछ ज्यादा ही दिखावेमें में चलना चलाना
  3. बच्चे कीगलतियों  को नज़रंदाज़ करना या अपने रुतबे की अकड़ में सही ठहराना
  4. बच्चे को जरूरत से ज्यादा रूपए देना और उनका सही हिसाब न लेना
  5. बच्चे के सभी शौक पूरे करना व उसे ज्यादा शौक़ीन बनाना
  6. अपने पिता के रुतबे और ताकत का नशा बच्चे के दिमाग में होना

ये सभी बातें ज्यादातर समझते होंगे पर इसका समाधान क्या है| जितने भी ज्यादा रहीस लोग होते हैं उनके बच्चे अलग ही तरह के स्कूल में पड़ते हैं, उनमे से जो भी बिगड़ने लगते हैं समय रहते उन्हें घर की विलासी जिन्दगी से दूर बोर्डिंग स्कूल और हॉस्टल के संगर्ष को भेज दिया जाता है|वहां उसे रोज रोज का संगर्ष जिन्दगी के नियम सिखा कर इतना जिम्मेदार बना देता है की वो अपनी अपर संपत्ति का सदुपयोग कर सके |

 

मैंने सभी समाजों में इस विषय पर ध्यान दिया है और इस नतीजे पर पहुंचा  हूँ की खानदानी रहीसों को छोड़कर  दो ही तरह के लोग कामयाब हैं:

=>एक वे जिन्होंने विधिवत शिक्षा लेकर अच्छा परिणाम लिया है और किसी न किसी कोम्पटीसन या प्रतिस्पर्धा में जीत हासिल की है(जैसे IIT-JEE,IAS,IPS,SSC,GATE,IES,UPSC EXAMS,MNC/COMPANIES INERVIEWS, CPMT, DPMT, LAW tests ETC.)

=>दूसरे वे जिन्होंने समय रहते कोई हाथ का हुनर सीख लिया हो

(जैसे : सिलाई,मिस्त्री,किसी मशीन के मकेनिक,बाल काटना,मोटर/साइकल या कार मकेनिक,ठेकेदारी,फब्रीकेसन,अपनी दूकान आदि|

 

इसके अलावा जो तीसरी श्रेणी के लोग हैं जिन्होंने न तो पढाई की न ही हुनर सीखा वे बेरोज़गारी,मजदूरी, टेम्परेरी नौकरी,अपराध आदि में लगे हुए हैं,  इनमे से कईयों की आर्थिक स्तिथि दुखदाई है |

इस सब के अलावा एक और श्रेणी है जो हमारे समाज में सबसे ज्यादा हो चली है, पढ़े लिखे होकर भी नाकामयाब| मैं आपको दो व्यक्तिओं A Bका उदहारण देता हूँ : A ने नियमित पढाई और मेहनत से बी0ऐ० की  शिक्षा हासिल की है व सही माइने में ज्ञानी  है, वहीँ B ने  ओपन या जुगाड़ से बिना पढ़े बी0ऐ० की  शिक्षा हासिल की है | अब दोनों के पास एक ही जितनी अहमियत रखने वाली डिग्री तो है पर कोन  कोम्पटीसन जीत कर नौकरी हासिल कर सकता है कौन  नहीं ये आप समझ सकते हैं यहाँ बताने की जरूरत नहीं है| मैं मानता हूँ की कुछ अपवाद हो सकते हैं,जुगाड़ की डिग्री वाले भी कामयाब हो जाते हैं पर उनका अनुपात बेहद कम होता है| बिना मेहनत की डिग्री वाले लोगों को दूसरों की  मेहनत की वजह से कामयाबी मिलती है,जिसके उदाहरण निन्मलिखित हैं :

१. अभिभावक,जानकार  या रिश्तेदारों की कमाई हुए साख और इज्ज़त की वजह से

२. अभिभावक की कमाई हुई दौलत के बल पर

३.व्यक्तिगत रिश्ते,सूझ बूझ और स्मार्टनेस की वजह से

४. डिग्री भले ही जुगाड़ की हो पर बाद में खुद मेहनत करके ज्ञान हासिल कर लिया हो

(पर ऐसा बेहद कम होता है क्योंकि मेहनत करना एक आदत होती है)

 

संपन्न समाज के लोग को ऊपर लिखे चारों वजह का लाभ तो मिल सकता है पर हमारे समाज में इनका मिलना कितना मुश्किल है ये आप सभी जानते हैं| पर ख़ुशी की बात ये है ही हमारा समाज धीरे धीरे  संगठित हो रहा है और एक दूसरे की मदत की अहमियत समझने लगा है|

 

आइये  अब समझते हैं की कम अंक लेने वाले या जुगाड़ की पढाई वाले लोग क्या करते हैं:

  1. क्योंकि वे खुद को पढ़ा लिखा मानते हैं इसलिए वे मेहनत या हाथ का काम करने में शर्म महसूस करते हैं और बेरोजगार रहना पसंद करते हैं,
  2. बेरोजगारी की वजह से ऐसे लोग अपने माता पिता की जमापूंजीपर हावी रहते हैं|
  3. खली बैठकर अपने अधूरेज्ञान के शेखी बघारकर समय नष्ट करते हैं |
  4. अपनी क्षमता को न पहचान कर भाग्य औरमाता पिता को दोष देते हैं|
  5. छोटी मोटीनौकरी करते हैं जिसकी कमाई हुनर की कमाई से भी कम होती है |
  6. जिन्दगी का हर काम सही रास्ते से न करके सबसे पहले जुगाड़ सेबनाने  की सोचते हैं |
  7. अपने समान शैक्षणिक योग्यता वाले कामयाबसाथियों से ने जलन करते हैं |
  8. समय पर न कमा पाने की वजह से शादी में देरी होती है जो कुंठा को बढ़ता है|
  9. कुंठित, निराश और नकारात्मकता से भर जाते हैं और नशेकी लत लगा बैठते हैं |

 

ऐसे लोग नकात्मकता,बेरोजगारी,खाली दिमाग,कुसंगति,अपने क्षमता से बड़ी सोच और बिन मेहनत के सुख की चाह में अपराध का रास्ता पकड़ते हैं |समाज के इस घटनाक्रम को करीब से देखने और समझने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ और ये मेरी अपने समाज को अपील है:

 “ढंग  से पढने वाले और  कम से कम 50 या 60 % अंकों से पास होने वाले बच्चों को तो पढने दे और जो 12 से 14  साल की उम्र में फेल हो जाएँ या बहुत कम अंकों से पास हों उन्हें किसी हुनर सीखने में लगा देना चाहिए |” 

 

पढ़े लिखे निखट्टू  से कम पढ़ा दस्तकार ज्यादा खुशहाली पता है |हाँ इसमें एक बात और है आजकर ओपन से और सरकार ने डिसटेंस लर्निंग अर्थात पत्राचार से घर बेठे डिग्री पाने की काफी व्यवस्थाये कर दी हैं | तो जो बच्चे हुनर सीखते हुए भी पढना चाहें वे पढ़ सकते हैं,ये पढाई  उसके अपने हुनर को  आगे चलकर धंधा बनाने में बहुत सहायक हो सकती है जैसे किसी धंधे का लईएसेन्स  लेना आदि| हालाँकि पत्राचार से पढाई करना कठिन होता है पर होनहार कहीं भी किसी भी परिस्थिति  में खुद को ढाल  लेता है और कामयाब हो जाता है  | हमारे समाज के माता पिता 40-50% अंक पाने वालों को भी पढने वालों में गिनते हैं | असल में गलती  उनकी नहीं है उन्हें आगे चलकर होने वाले कॉम्पटीसन या प्रतिस्पर्धा में आने वाले लोगों की पढाई का स्थर नहीं मालूम होता|शिक्षा के आभाव में उन्हें इतनी दूर द्रिस्टी नहीं होती की प्राइवेट स्कूल,महगी फीस,अच्छा रहन सहन,खानपान और टुएसन  के चलते तयार हुए बच्चे जिन्हें अपने माता पिता के सामाजिक नेटवर्क की सिफारिश का भी सहयोग होता है उनसे मुकाबला करना कितना मुस्किल है| जब बच्चा विफल हो जाता है तो माता पिता ओर बच्चे दोनों में एक दूसरे पर दोषारोपण  की जैसे चलन ही चल जाता है| तब न शिक्षा के रहते हैं न हुनर सीखने के, परिणाम स्वरुप अस्थाई और चलताऊ प्राइवेट नौकरी जैसे एजेंट, सेल्समेन आदि बनना पड़ता है |

 

अपने बच्चे से 14-15 साल की उम्र में पढाई छुड़ाने से माता पिता इसलिए हिचकते हैं क्योंकि आगे चलकर बच्चा उन्हें परेशान करेगा और ये बोलेगा की “मैं तो पढ़ लेता  तुम लोगों ने मुझे नहीं पढाया और इसलिए  आज मेरी स्तिथि ख़राब है|”मैं एक कडवी और सच्ची बात कहता हूँ हर माता पिता को अपने बचे की प्रतिभा,दिमाग और मेहनत करने का जज्बा पता होता है| वे अपने बच्चे के कम मेहनती होने को नज़रंदाज़ करके उसे कम अंक लेने के बावजूद पढ़ाना  जरी रखते हैं |जिसका परिणाम मैं ऊपर लिखे लेख ‘कम अंक लेन वाले या जुगाड़ की पढाई वाले लोग क्या करते हैं’ में कर चूका हूँ |मेरे समाज के सभी माता पिता से अपील है की अपने इस डर को अपने बच्चे के हित में निकाल फेकिये और एक काम कीजिए की बैठ कर अपने बच्चे से बात करे | 12 साल के बाद का बच्चा इस लायक होता है की उससे बात चीत करके फैसले लिए जा सकें,तुरंत निम्नलिखित काम करो :

 

– पूरा परिवार एक साथ बैठ कर स्तिथि की शांति से समीक्षा करें और आगे की प्लानिंग करें

– अपने परिवार के रुतबे के वजह से अपने बच्चे को हुनर सीखने से वंचित न करें

– अपने पडोसिओं और रिश्तेदारों  के कामयाब बच्चों से अपने बच्चे की तुलना करना छोड़ दो

– उनपरपढने का जोरदेना या पढाई करने को थोपना छोड़ देन  उससे पूछे की क्या वाकई वो पढना चाहता है ?
– अगर पड़ना चाहते हैं तो उन्हें एक मौका और दे,अपने बच्चे की संगती,कोलोनी और स्कूल जल्द से जल्द बदल दे|
– यदि इसके बावजूद पिछले साल जैसे बुरा रिजल्ट आये तो फिर आपकी जिम्मेदार ख़त्म, फिर आपसे आपका बच्चा नहीं कहेगा की मौका नहीं दिया| बच्चे के बड़े होकर अपराधी बनने से अच्छा है की वो आपको ये तानादे की अपने उसे पद्य नहीं काम सिखा दिया|
– अपने बच्चे को किसी भी हुनर के उस्ताद के पास भेजें और हर परेशानी के बावजूद उसे काम सीखने के लिए प्रोत्साहित करें

 

पढाई छुड़ाने के हक में मैं इसलिए हूँ क्योंकि हुनर सीखने की उम्र 12 से 16 साल तक ही होती है उसके बाद बच्चा बड़ा हो जाता है और अपने उस्ताद या  गुरु की  डांट सहन नहीं कर पता| ये  तो हम सभी समझ सकते हैं की जो अपने गुरु या उस्ताद से जबान दरजी करने लगे वो हुनर चाहकर भी नहीं सीख पायेगा|काम कोई बुरा नहीं होता, आप खुद बताइए की टेलर का काम ज्यादा बेहतर है या निकामा जीवन और अपराधी होकर जेल जाना बेहतर है ?अपने मुस्लिम भाइयों को देखो वे हुनर सीखने के चलते इतने आत्मनिर्भर हैं की  अगर उनको सरकार से भी कोई मदत या आरक्षण न मिले तो भी खुशहाल जीवन बिताते हैं| ये केवल माता पिता की ही जिम्मेदारी  नहीं है की वे अपने बच्चों को हुनर सीखने में डालें बल्कि उनसे भी ज्यादा जिम्मेदारी  बच्चे की खुद की है की वो अपनी पढाई  और अपनी स्तिथि को समझे और समय रहते अपनी रूचि के अनुसार काम सीख ले|

 

आप  अपने माइन्डसेट या पूर्वाग्रह  को त्याग दे की हुनर सिखाने से आप अपने बच्चे का पदोंअवनति कर रहे है या उसका स्टेटस  गिरा रहे हैं| आप जिन्दगी का नियम जिसकी जितनी क्षमता उसको उतना मिलता ही है याद रखें ,उदहारण के लिए कार मेकेनिक  जरूरी नहीं  सारी जिन्दगी मेकेनिक ही बना रहे, कम पढ़े होने के बावजूद अगर उसमे दिमाग है और जिन्दगी के नियम जान गया है तो किसी न किसी रोज़ उसका अपना गेराज  होगा| ये तो आप  सभी समझ सकते हैं की प्राइवेट कम्पनी में मेनेजर की नौकरी से अपनी खुद की गेराज होना ज्यादा स्वाभिमान और उन्नति की बात है|

 

ये जिन्दगी का नियम है की अपना खुद का काम और हुनर किसी की भी नौकरी से बेहतर है, नौकरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो नौकरी नौकरी होती है| नौकरी का लाभ  केवल नौकरी करने वाली पीढ़ी को ही  मिल पता है उससे अगली पीढ़ी फिर से पहले सीढ़ी से अपना करिअर शुरु करना होता है| पर हुनर सीखना उसको धंदे में परिवर्तित करना किसी भी परिवार की स्थाई सम्पति हो जाती है जिसमे अगली पीढ़ी वहाँ से शुरु करती है जहाँ से पिछली पीढ़ी छोडती है| नौकरी के पीछे भागना और हुनर को अंतिम वरीयता देना ही वो कारण है जिसकी वजह से हमारे समाज से एक पीढ़ी तो उठ जाती है पर अगली पीढ़े उसे फिर गिरा कर उसे जगह ले आती है |आज जो बड़े बड़े उद्योगपति है उनके उद्योग के कभी न कभी शुरुआत हुई होगी और पीढ़ी दर पीढ़ी आने वाले सुसंतनों से उसे बढाया होगा| शिक्षा अगली पीढ़ी को नहीं दी जा सकती पर हुनर और अनुभव दिया जा सकता है | अपने ही समाज का उदाहरण लो हमारी  स्तिथि केवल हुनर सीखने की वजह से सुधरी है वरना पुरानी धन संपत्ति के मामले में हममे से ज्यादातर लोग पिछड़े हुए हैं |ये हुनर का भरोसा और सुरक्षा ही है जीके बल पर हमारे लोग अपना अपना गाँव छोड़कर शहर निकल आये और यहाँ हुनर की वजह से ही बेहतर जिन्दगी बिता रहे हैं | ये हमारा पिछली एक दो पीढ़ी का इतिहास है की जिस पीढ़े ने हुनर सीखा वो इतनी खुशहाल हो गई की अपनी अगली पीढ़ी को अच्छी शिक्षा दिला सके, अच्छी शिक्षा लेने वाले कामयाबी की बुलंदियों को छु रहे हैं| पर जो इसी बात पर रहे की करेंगे तो अफसरी नहीं तो कुछ नहीं आज फटेहाल हैं | शिक्षा भी तो हुनर सीखना  ही है बस ये हुनर सीखने का जरा व्यस्थित और साफ़ सुथरा रास्ता है |  हमारे सिख भाईओं की किसी पीढ़ी ने जब ट्रक चलने और मरमत  का हुनर सीखा था तभी तो आज किसी भी शहर के स्पेयर पार्ट  और ट्रांसपोर्टनगर के ज्यादातर शोरूम केवल सिख भाइयों के ही हैं| हाथ के काम,मेहनत,ट्रांसपोर्ट का धंदा, खेती, समाजिक एकता और  जबरदस्त और अतुलनिये क़ुरबानी  से पाई सम्पन्नता  से ही आज भारत में ही नहीं सारी दुनियां में सिख भाइ सम्मान की जिन्दगी बिता रहे हैं|

 

हमारे समाज में ऐसे कई मिस्त्री हैं जो एक ही पीढ़ी में बिल्डिंग बनाने के ठेकेदार बन गए हैं, ऐसे कई मेकेनिक हैं जिनका मोटर साइकल और कार   का खुद का गेराज है| आप एक बात सोचिये और बताईये  की  किसी शौपिंग माल में नौकरी करने से क्या आप शौपिंग माल बना सकते हैं? नहीं न !  पर अगर आप कार की मरम्मत सीख लेते हैं तो आप क्या आप अपना गेराज बना सकते है| तो हुनर भी वही सीखना चाहिए जिससे आगे चलकर आप अपना काम कर सकें |आपका हुनर ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है। अगर आप में हुनर है तो आप किसी भी मुसीबत का सामना कर सकते है।

एक बूढ़ा संगीतकार किसी जंगल से गुजर रहा था। उसके पास बहुत सी स्वर्ण मुद्राएं थीं। रास्ते में कई डाकुओं ने उसे पकड़ लिया। उन्होंने उसका सारा धन तो छीन ही लिया साथ ही वाइलिन भी। वह अपने संगीत से उस वाइलिन से बहुत प्यार करता था। संगीतकार ने डाकुओं से बड़ी ही नम्रता से अपना वाइलिन मांगा। वे डाकू बड़े चकित हुए। उन्होंने सोचा कैसा पागल आदमी है। धन वापस ना मांगकर ये बाजा मांग रहा है। डाकुओं ने सोचा कि यह बाजा हमारे किस काम का और उसे वापस लौटा दिया।

वह संगीतकार उसे पाकर नाचने लगा और उसे वहीं बैठकर बजाने लगा। अमावस्या की अंधेरी रात सुनसान वन ऐसे वाइलिन का मीठा स्वर शुरू में तो डाकु अनमने मन से सुनते रहे फिर उनकी आंखों मे भी नमी आ गई। वे भाव विभोर हो उठे और उन्होंने न सिर्फ उसका सारा धन लौटा दिया बल्कि उसे वन के बाहर तक सुरक्षित भी पंहुचाया ।

संगीत उस संगीतकार का मूल स्वभाव भी था और हुनर भी, सो उसने डाकुओं से अपना हुनर, अपना साधन मांग लिया। यही हुनर उसके काम आया और डाकुओं ने उसके संगीत से प्रभावित होकर सारा धन भी लौटा दिया। जिन्दगी का यही नियम है की  आप जब भी परेशानी में घिरें तो अपने स्वभाव और अपने हुनर पर भरोसा रखें, उसी को बचाएं, अगर हुनर बचा रहा तो धन-दौलत फिर मिल जाएंगे।

ये हुनर का भरोसा और सुरक्षा ही है जिसके  बल पर आप बिना सहारे के भी किसी भी जगह जा सकते हैं और वहाँ पर धन संपत्ति जुटा सकते हैं, नौकरी चली जाए तो बहुत परेशानी हो जाती है पर हुनर के भरोसे बुरे से बुरे समय में भी नयी शुरुआत कर सकते हैं|

आज हमारे समाज का लगभग हर व्यक्ति शिक्षा का महत्व समझता है और वह अपनी संतान को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए यथासंभव प्रयास करता है। मनुष्य अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अच्छे स्कूल का चयन करता है इसके अतिरिक्त अपने घर वालों का पेट काटकर बच्चे की पढ़ाई का प्रबंध करता है पर फिर भी वो अपने बच्चों को बेतर पढाई नहीं दे पा रहा है|शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील,वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें. किन्तु भारतीय शिक्षा पद्दति अपने इस उद्देश्य मे पूर्ण सफलता नही प्राप्त कर सकी है इसके बहुत से कारण हैं, मुझे जो समझ में आते हैं वो निम्न प्रकार से हैं:

  • मुख्य कारण है की भ्रस्टाचारके चलते  पूरी की पूरी शिक्षा व्यस्त अब एक धन कमाने का बिजनस बन चुका है, फलस्वरूप शिक्षा बहुत महंगी हो गई है| शिक्षा को अब केवल जो अमीर है वही अपने बच्चे को दे सकता है गरीब चाहकर भी नहीं दे सकता, जिसके चलते अब समाज में गरीब को गरीब और अमीर को अमीर रखने की साजिश चल रही है | आज प्राइवेट स्कूल इतिहास के राजशाही गुरुकुल हो गए है और सरकारी स्कूल इतिहास के अनपढ़ों की चौपाल |
  • राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है,इस देश का शाशन ऐसे नेता चला रहे हैं जो या तो कम पढ़े लिखे है या अगर ज्यादा पढ़े लिखे भी हैं तो भी वे मनुवादी सोच रख्नते हैं| ये नेता या सत्ता में बेठे लोग ही है जो परोक्ष रूप से वे तय करते है कि बच्चों को क्या पढना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद है वो भी अपनी मनुवादी दायरे और विचारधाराओं से बन्धे है, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचना ही नहीं चाहते|पाठ्यक्रम तय करने वाले संस्थाओं में हमारे लोग कम हैं और जो हैं उनकी राये कितनी चलती होगी ये आप समझ सकते हैं| इसका उदहारण देखिये भगवान् बुद्ध के देश में उन्ही के साहित्य की भाषा पली प्राकृत और उनकी अमूल्य शिक्षाओं
    को कोई खास स्थान नहीं दिया गया है |

 

मै किसी एक पर दोषारोपण नही करना चाहता, शिक्षा पद्दति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमे मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है.आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे है, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नही, क्या यही हमारा एक मात्र उद्देश्य है? आज जब धीरे धीरे सत्ता अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के हाथो मे फिसलती जा रही है, तो हम उनसे क्या क्या आशा रखें. सारी राजनैतिक पार्टियां अपने अपने तरीके से इतिहास को बदलने की कोशिश कर रही है, ये सभी कुछ इतना घटिया लग रहा है कि मेरे पास इनकी भर्तत्सना करने के लिये शब्द नही है|
शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो हमारे जीवन को एक नयी विचारधारा,नया सवेरा देता है, ये हमे एक परिपक्व समाज बनाने मे मदद करता है. यदि शिक्षा के उद्देश्य सही दिशा मे हों तो ये इन्सान को नये नये प्रयोग करने के लिये उत्साहित करते है.शिक्षा और संस्कार साथ साथ चलते है, या कहा जाये तो एक दूसरे के पूरक है.शिक्षा हमे संस्कारों को समझने और बदलती सामाजिक परिस्थियों के अनुरूप उनका अनुसरण करने की समझ देता है. आज शिक्षा जिस मुकाम पर पहुँच चुकी है वहाँ उसमे आमूल परिवर्तन की गुंन्जाइश है, आज हमे मिल बैठकर सोचना चाहिये, कि यदि शिक्षा हमारे उद्देश्यों को पूरा नही करती तो ऐसी शिक्षा का कोई मतलब नही है.

 

आज जब भगुवाधारी अपना ऐजेन्डा चला रहे है, दूसरी तरफ सो काल्ड धर्मनिरपेक्ष वाले अपना कांग्रेसी एजेन्डा और तीसरी तरफ मदरसों द्वारा शिक्षा का इस्लामीकरण किया जा रहा है तो किसी से क्या उम्मीद रखें. आप खुद ही बताइये कि भगुवाकरण,खादीकरण और इस्लामीकरण से हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे है, हम लोगो को लोगो से दूर कर रहे है. हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे है जो अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्मो से गिरा हुआ मानेगा और कभी दूसरे धर्म की बेइज्जती करने से नही चूकेगा | कट्टर धर्म वाली शिक्षा में तो  धार्मिक कट्टरता से बच्चा अपनी जिन्दगी को ही धर्म की अमानत समझने मे बिता देगा. क्या यही उद्देश्य है शिक्षा के?

 

मेरे कुछ सुझाव हैं: यूरोपीय देशों की तरह शिक्षा सभी के लिए एक सी और एक ही कीमत पर उपलब्ध होनी चाहिए, अमीरों के बच्चों के लिए अलग और गरीबों के लिए अलग स्कूल का चलन ख़त्म करना चाहिए| शिखा में प्राइवेट का सरकारी स्कूलों वाली  दो धाराओं को समाप्त करना होगा| पूरे देश का एक ही जैसा पठएक्रम होना चाहिए, हाँ अपने राज्ये की भाषा अलग हो सकती है |ग्रामीण शिक्षा के स्तर को सुधारा जाना बेहद आवश्यक है. इसपर अभी बहुत ज्यादा और जल्द से जल्द काम किया जाना बाकी है|पिछड़ों की शिक्षा के लिये स्वयं सेवी संगठनो को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन एवं सहायता दी जानी चाहिये| समय का चलन कह रहा है की बौध विहारों पर शिक्षा के दरवाजे खोलने से ही हम अपने समाज को सही दिशा दे पाएंगे |

 

…..समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

2 thoughts on “9-Sept-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: ‘विधिवत शिक्षा व् हुनर’- हमारे समाज को ईश्वर या धर्म नहीं चाहिए उन्हें शिक्षा और धम्म(न्याय व्यस्था) चाहिए|मैं सारे समाज से अपील करता हूँ की चाहे एक वक़्त को रोटी की क़ुरबानी देनी पड़े पर अगर उस क़ुरबानी के बदले आप अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकने में कामयाब रहे तो वो बहुत सस्ता सौदा होगा|…समयबुद्धा

  1. मैं भी आपकी बात से सहमत हूँ कि जो लोग बच्चों को भंते बनाकर उनकी शिक्षा में बाधा डाल रहे हैं; बहुत ही अन्यायपूर्ण है | बच्चों को शिक्षा देना आवश्यक है जिसके ऊपर हमारे समाज़ का कल का भविष्य टिका है | हाँ, धम्म के विचारों को मानें | न कि अंध- भक्ति से धर्म में घुसें | शिक्षा से बढ़कर कोई दूसरा रास्ता नहीं है कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें | अतः निवेदन है कि बच्चों को शिक्षा के साथ- साथ धम्म से जोड़कर, धम्म के विचारों को ध्यान में रखकर बच्चों को समाज़ के साथ जोड़ें और उन्हें अच्छी शिक्षा देने की कोशिश करें | इसी कामना के साथ – गौतम, न्यू जर्सी

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