हम बुद्ध शिक्षाओं को धम्म कहते हैं पर दुनिया धर्म समझती समझाती है, आइये धर्म और धम्म में फर्क समझें …अभिजीत गणेश भिवा


DHAMMA or DHARMA

बुद्ध की शिक्षाएं  धर्म के रूप में किसी काम की नहीं, ये धम्म के रूप में ही हमारा भला कर सकती हैं| अगर आप वाकई बौद्ध धम्म को जानना चाहते हो तो डॉ आंबेडकर की लिखी पुस्तकें पढ़ें| अगर आप पड़ने में काम रूचि रखते हैं और ऑडियो वीडियो सुनना चाहते हैं ओशो की “अस्स धम्मो सनन्तनों” नामक  धम्मपद पर ऑडिओ रिकॉर्डिंग सुनें| मैं ओशो का प्रशंसक नहीं, मैं ओशो को नहीं मानता मैं उसकी उन बातों को मानता हूँ जो बुद्ध की वास्तविक शिक्षा को समझने का प्रयास करतीं हैं|  अमन और शांति  से पहले भारत की बहुजन जनता को सुरक्षा और संसाधन चाहिए|
http://oshoworld.com/discourses/audio_hindi.asp?album_id=30

धर्म और धम्म में क्या अंतर है ? ये महत्व पूर्ण सवाल बहोत बार पूछा जाता है | कुछ लोगो का कहना है की धर्म और धम्म में सिर्फ भाषा का फर्क है धर्म हिंदी का शब्द है उसी को पली में धम्म कहते हैं,पर मुझे ये कथन अपूर्ण लगता है | धर्म शब्द कि व्याख्या के बारे में कोई भी तर्क या विचार व्यक्त करना बहुत ही मुश्किल है क्योकि इसपर अलग अलग विद्वान ने अलग अलग मत हैं | धम्म का अर्थ तथागत के शब्दों से लगाया जा सकता है | अत: मैं इस विषय पर प्रकाश डालने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा हू |

इस विषय कि संवेदन शीलता समझने के लिए एक महत्वपूर्ण घटना का यहाँ उल्लेख करना बहुत जरुरी लगता है | बुद्ध धम्म के आज तक के महत्वपूर्ण विद्वानों में से अग्रणी हैं,जिन्हें की बोधिसत्व का पद/उपाधि प्रदान की गई है:- डॉ. भीम राव आंबेडकर जी |उनका इस विषय से सबसे गहरा ताल्लुक है |भारतीय बौद्ध धर्मिय लोगो के महत्वपूर्ण ग्रन्थ “बुद्ध और उनका धम्म” का निर्माण करते वक्त डॉ. आंबेडकर जी ने पहले इस महत्वपूर्ण किताब का नाम ‘बुद्ध और उनका तत्वज्ञान’ ( Buddh And his Gospel ) रखा था| पर बीच मे उन्होंने इस किताब का नाम बदलकर बुद्ध और उनका धम्म ( Buddha And his Dhamma) कर दिया | यह अपने आप में बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण घटना है | उन्होंने ऐसा क्यों किया ? उन्होंने धम्म जैसे पाली के शब्द का इस्तेमाल क्यों किया ? धर्म ( Religion ) शब्द क्यों इस्तेमाल नहीं किया ? इस बात को स्पष्ट करने हेतु वे अपने ग्रन्थ में धर्म और धम्म में अंतर स्पस्ट करते हैं |

आज पूरी दुनिया में सबसे बड़े चार धर्म समुदाय नजर आते है ईसाइयत,मुस्लिम,हिंदू/ब्राह्मण धर्मी और बौद्ध | ईसाइयत ,मुस्लिम हिंदू ये तीन अगर धर्म हैं तो फिर अकेले बुद्ध कि शिक्षाओं को धर्म कहने में क्या समस्या है ?

उपरी तीनों धर्मो में कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत के बारे में बहुत ही चमत्कारीक समानताएं है,जो की उन धर्म की जड़े मानी जाती है | पर बुद्ध धम्म उन बातों को पूरी तरह से विरोध करता है या फिर कही असहमति दर्शाता है |

सबसे पहला फर्क ये है कि धर्म का उद्देश्ये दुनिया की उत्पत्ति स्पष्ट करना है और धम्म का उद्देश जीवों का दुःख मिटाकर दुनिया की पुनर्रचना करना है |बुद्ध का कथन है , ” कोई भी यह साबित नहीं कर सकता की पृथ्वी का निर्माण ईश्वर ने करवाया है “|

दूसरा फर्क है कि अन्य धर्म ईश्वर कि संकल्पना को मान्यता ही नहीं देते बल्कि उसे अपने धर्म का सर्वोच्च स्थान भी प्रदान करते है, पर धम्म में ईश्वरीय परिकल्पना को सभी जीवों के लिए गैरजरूरी बताया गया है |बुद्ध का ये वचन और ऐसे कई उपदेश ईश्वर की संकल्पना को स्पष्ट रूप से नकार देते है | अन्य तीनों धर्मों के संस्थापक/व्याख्याता ईश्वर से अपना रिश्ता स्पष्ट करते हुए नजर आते है | पर बुद्ध उस ईश्वर संकल्पना को ख़ारिज कर देते है | बुद्ध ने ईश्वर पर विश्वास करना अधम्म बताया है| ईश्वर की संकल्पना की जगह बुद्ध धम्म में नीतिमत्ता विद्यमान है | जैसे की तीनों धर्मो में ईश्वर की संकल्पना विद्यमान है वैसे ही शैतान ,भूत ,पिशाच,देवता अदि की संकल्पनाए भी विद्यमान है | बुद्ध ने इस तरह की किसी संकल्पना को अपने उपदेश में स्थान नहीं दिया |

तीसरा फर्क तीनों धर्म में आत्मा की संकल्पना नजर आती है, बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास को सम्यक दृष्टी के मार्ग की अड़चन बताया और आत्मा पर विश्वास करना अधम्म बताया |

चौथा फर्क है कि तीनों धर्मो के संस्थापक स्वयं को मोक्षदाता/पैगम्बर/ईश्वर का बेटा आदि घोषित करते है,मतलब ईश्वर के अस्तित्व को buddha is not godमान्यता देते हैं और ईश्वर के साथ अपना विशेष नाता स्थापित करते हैं,चमत्कार करते हैं जिसे न मानने पर जनता मोक्ष (मृत्यु उपरांत स्वर्ग में जाना ) प्राप्त नहीं कर सकते| बुद्ध ने अपने धम्म में अपने लिए विशेष स्थान अपने आप निर्धारित नहीं किया, बुद्ध ने अपने को एक जागृत मानव अर्थात बुद्ध कहा है, बुद्ध चमत्कार को विरोध करते है| बुद्ध ने कभी भी कही भी ऐसा कथन नहीं किया की मैं मोक्षदाता हूँ उन्होंने कहाँ कि मैं मार्गदाता हूँ |

बुद्ध ने “स्वर्ग और नर्क की कल्पना को मृत्यु उपरांत ना मानते हुए अपने कर्म से उस अवस्था को जीवित रहते हुए आप प्राप्त करते हो” ऐसे कहा है | संसार में सबसे पहले कर्म और फल का सिद्धांत देते हुए बुद्ध ने हर व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार फल मिलने का आश्वासन दिया| मोक्ष की कल्पना को छोड़ निर्वाण नामक अवस्था कि देशना कि, जो की हर व्यक्ति अपने ही जीवन में जीवित रहते हुए प्राप्त कर सकता है |इसीलिए धम्म में यही मन जाता है कि मृत्यु के पहले या मृत्यु के उपरांत आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा |

अन्ये तीनो धर्मो की कुछ विशिष्ट धार्मिक किताब है और उन्हें ईश्वर की देंन समझा और समझाया जाता है या फिर ईश्वर के किसी रिस्तेदार व्यक्ति ने लिखी हुई समझा जाता है | बुद्ध ने किसी भी धार्मिक ग्रन्थ पर विश्वास रखना इस बात को तिलांजलि देते हुए बुद्ध दीघ निकाय १/१३ मे अपने शिष्य कलामों उपदेश देते हुए कहते है:

” हे कलामों , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह तूम्हारे सुनने में आई है , किसी बात को केवल ईसलिए मत मानो कि वह परंपरा से चली आई है -आप दादा के जमाने से चली आई है , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी हुई है , किसी बातको केवल इसलिए मत मानो की वह न्याय शास्त्र के अनुसार है किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की उपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होतीहै , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह हमारे विश्वास या हमारी दृष्टी के अनुकूल लागती है,किसि बात को इसलिए मत मनो की उपरीतौर पर सच्ची प्रतीत होती है किसीबात को इसलिए मत मानो की वह किसी आदरणीय आचार्य द्वारा कही गई है .

कालामों ;- फिर हमें क्या करना चाहिए …….???? बुद्ध ;- कलामो , कसौटी यही है की स्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्या ये बात को स्वीकार करना हितकर है? क्या यह बात करना निंदनीय है ? क्या यह बात बुद्धिमानों द्वारा निषिद्ध है , क्या इस बात से कष्ट अथवा दुःख ; होता है कलमों, इतना ही नही तूम्हे यह भी देखना चाहिए कि क्या यह मत तृष्णा, घृणा ,मूढता ,और द्वेष की भावना की वृद्धि में सहायक तो नहीहै , कालामों, यह भी देखना चाहिए कि कोई मत -विशेष किसी को उनकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नही बनाता, उसे हिंसा में प्रवृत्त तोनही करता , उसे चोरी करने को प्रेरित तो नही करता , अंत में तुम्हे यह देखना चाहिए कि यह दुःख; के लिए या अहित के लिए तो नही है ,इन सब बातो को अपनी बुद्धि से जांचो, परखो और तूम्हे स्वीकार करने लायक लगे , तो ही इसे अपनाओ…….

इस छूट कि वजह से ही हर देश का बुद्ध धम्म अलग सा लगता है क्योंकि वहाँ बुद्धा शिक्षाओं के साथ साथ अपने देश कि संस्कृति और मान्यताओं को भी मिला दिया गया है

तीनों धर्मो में उनकी किताबो में जो बाते लिखी है उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता और इन धर्मो के संस्थापक ने जो कह दिया वह अंतिम सत्य कहा गया | बुद्ध ने ऐसा कोई दावा न करते हुए मानव को अपने बुद्धि से विचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की | और यही नहीं तो धम्म को कालानुरूप बदलने की स्वतंत्रता प्रदान की | ऐसी स्वतंत्रता दुनिया में कोई भी धर्म अपने अनुयायी को नहीं दे सका | इतना विश्वास किसी भी धर्म ने अपने अनुयायी पर कभी भी कही भी नहीं दिखाया है |

प्रत्येक धर्म के संस्थापक ने अपना विशेष ऐसा स्थान निर्माण कर लिया | बुद्ध ने कभी भी अपने स्वयं के लिए ऐसा विशेष स्थान का कोई हेतु नहीं रखा | बुद्ध ने अपने व्यक्तिगत जीवन को कभी भी महत्व नहीं दिया | किसी भी धर्म संस्थापक के करीब तक आप नहीं पहुच सकते | पर बुद्ध यह एक पद है और वहा तक कोई भी व्यक्ति अपने प्रयत्न से पहुच सकता है | बुद्ध ने स्वयं को चुनौती देने को अपने अनुयायी को हमेशा से ही प्रेरित किया | ऐसा करने वाला वो दुनिया का एकमात्र धर्म संस्थापक है | जिस समय बुद्ध का महापरिनिर्वाण हो रहा था तो अंतिम शब्दों में वे कहते है ” हे भिक्षुओ अगर किसी भी प्रकार की शंका आपके मन में धम्म के प्रति हो तो कृपया कहो , कही ऐसा न हो की मेरे महापरिनिर्वाण के बाद आपके मन में विचार आये की हमारा शास्ता जब यहाँ मौजूद था उस वक्त हमने उससे हमारी शंका कथन नहीं की ” | अपने जीवन की आखरी घडी में भी बुद्ध अपने अनुयायी को शंका पूछने के लिए उकसाते है | ऐसा करने वाला वो दुनिया का एकमात्र धर्म संस्थापक है | अन्ये धर्मो ने अपने धर्म के गुरु निर्माण करते हुए , उनके आदेशानुसार चलने पर लोगो को विवश कर दिया पर बुद्ध ने अपने संघ का निर्माण धम्म के आदेशो पर चलने वाला लोकसमुदाय है और वह जैसा बोलता है वैसा चलता है|

अन्य धर्मों में तो बलि प्रथा को बड़ा ही पवित्र माना पर बुद्ध ने किसी भी प्राणी की हत्या करने पर अपने धम्म में आने वाले को पहले ही पंचशील में वैसा शील रखकर प्रतिबन्ध लगाना चाहा | बुद्ध ने चार्वाक का तर्क स्वीकार किया | चार्वाक कहते है ” बलि दिए जाने वाले को यदि स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो आप लोगो ने अपने स्वयं के पिता की बलि देनी चाहिए ” | बुद्ध कहते है , ” बलि के प्राणी के जगह मेरे प्राणों की आहुति देने पर आपको ज्यादा पुण्य प्राप्त हो सकता है ” ऐसा राजा से कहने वाला बुद्ध एकमात्र धर्म संस्थापक है |

अन्य धर्मों में स्त्रियों को बड़ा ही निचला दर्जा प्रदान किया गया है ( उदाहरण देना मुझे जरुरी नहीं लगता ) | ” स्त्री वर्ग को धम्म का भिक्षु पद देकर स्त्री को समानता का दर्जा देने वाला बुद्ध सबसे पहला धर्म संस्थापक है | बुद्ध अपने उपदेश में कहते है ” स्त्री पुरुष से महान होती है क्योकि वो चक्रवर्ती सम्राट को जन्म दे सकती है | वो एक बुद्ध को जन्म दे सकती है “| ऐसे उपदेश देकर बुद्ध ने उस वक्त की सामाजिक व्यवस्था को पूरा हिला दिया | ” स्त्री अपने प्रयासों से निर्वाण पद , अर्हत पद , बुद्ध पद पर भी पहुच सकती है ” यह बुद्ध के धम्म की मान्यता है |

“मानव के कर्म से मानव ऊँचा या निचा सिद्ध होता है जन्म से नहीं ” ऐसा बुद्ध ने स्पष्ट रूप से कहा | उस वक्त के भारत में धार्मिक जातीयता को पूरी तरह से रोंदते हुए उसने अपने संघ में अछूत माने जाने वाले समाज को भी आदर प्राप्त करने का अवसर दिया, हर पद पर पहुचने का अवसर दिया |

बौद्ध धम्म ने संसार को “लोकतंत्र” व्यस्था दी जिमें केवल बहुजन अर्थात बहुसंख्यक जनता का भला होता है अन्य व्यस्ताहों कि तरह नहीं जिनमें कुछ शाशकों का भला होता है बाकि जनता दुखी रहती है|धम्म संघ के कई नियम आज कई देशो में लोकतंत्र में इस्तेमाल किये जाते है |

धर्म कौन सा मानना है ? या कौनसे ईश्वर की पूजा करनी है ? ये तो पूरी तरह व्यक्तिगत बात है पर धम्म व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक है | अकेले आदमी को धम्म की कोई आवश्यकता नहीं पर जब आदमी के बिच के संबंधो की बात आती है तब धम्म बिना समाज होना संभव नहीं है क्योकि नीतिमत्ता मतलब धम्म मतलब संविधान मतलब कानून और न्याय कि नज़र में सब सामान हैं चाहते वो किसी भी धर्म या ईश्वर को मने या न माने | इंसान के बिच के सम्बन्ध से ही धम्म की शुरुवात होती है | धम्म ( नीतिमत्ता ) के बिना समाज जंगली हो जाएगा इसलिए आपको नीतिमत्ता समाज में प्रस्थापित करने के लिए धम्म अपनाना ही पड़ता है | धर्म में दो आदमी के बिच के संबंधो को महत्व ना देते हुए स्वयं के मोक्ष को ज्यादा महत्व है |

अनीश्वरवादी या निरीश्वरवादी रहने वाले व्यक्ति को धर्म गद्दार समझता है | उदा .नास्तिक जिसका कोई अस्तित्व नहीं ), काफ़िर (जो मानवता को गद्दार हो चूका हो ) …….ऐसे शब्द निरीश्वरवादी लोगो के लिए धर्म इस्तेमाल करता है | ऐसे शब्दों से ही वे धर्म निरीश्वरवादी व्यक्ति के प्रति नफ़रत करते है ऐसा सिद्ध होता है | धम्म निरीश्वरवाद को ही मान्यता देता है और इतना ही नहीं तो विरोध का हमेशा ही स्वागत करता है |

धर्म ईश्वर , नर्क इन जैसी बातों का खौफ दिखाकर हर बात को इंसान के ऊपर जबरन थोपता है | बुद्ध अपने उपदेशो को अपने बुद्धि की कसौटी पर ताड़ना , परखना इस बात पर जोर देते है | धर्म के हिसाब से हर काम पहले से ईश्वर ने पूर्व नियोजित किये होते है |

धर्म में ऐसा भी मन जाता है कि सब ईश्वर ने पहले से तय करके रखा है,आदमी मात्र कटपुतली है,मानव के जन्म का धर्म कोई प्रयोजन स्पष्टीकरण नहीं करता | धम्म इस बात को पूरी तरह से नकारते हुए बता है कि निसर्ग व्यवस्था इंसान के कर्म व्यवस्था पर निर्भर है और मानव का जन्म उस व्यवस्था को सँभालने के लिए हुआ है |धम्म मानव के जन्म का ध्येय धम्म स्पष्ट करता है और धर्म पूजा,अर्चना,ईश्वर की स्तुति,कर्मकांड में विश्वास करना इन जैसी बातों को महत्व देता है पर धम्म आचरण को महत्व देता है | धर्म में आचरण करना आप अपने मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हो या ईश्वर के खौफ से करते हो | और धम्म में सभी को सुखी रखना और स्वयं सुखी होकर अपने निर्वाण तक पहुचने के लिए आचरण को महत्व दिया जाता है |

धर्म अज्ञानता या श्रद्धा से मान लेने पर टिका करता है जबकि धम्म हर बात को जांचने , परखने के लिए कहता है | धम्म किसी भी बात पर महज विश्वास करने की शिक्षा को नकारता है | धम्म स्वयं को भी जांचने ,परखने की कसौटी पर खरा उतरता है | धम्म गरीबी को दुखी मानता है | धम्म शील को महत्व देता है | धम्म करुणा (मानव ने मानव प्रति प्रेम करना ) की शिक्षा देता है | धम्म करुणा के भी आगे जाकर मैत्री ( सभी प्राणिमात्र से प्रेम करना ) सीख देता है |इस वजह से आपकी किसी भी प्राणी की हिंसा करने की इच्छा न हो | धम्म पंचशील देता है,जो की सारे मानव प्राणी को सुखी होने के लिए जरुरी है | धर्म ऐसी बाते समाज को नहीं सिखाता नहीं उस पर चलने का महत्व प्रतिपादन करता है |

धम्म कि बाते कभी पुरानी और गेर जरूरी नहीं होती ,जैसे जैसे विज्ञानं तरक्की करता है धम्म कि शिक्षाएं स्पस्ट होती जाती हैं जबकि धर्म कि कई शिक्षाएं गलत साबित होती जाती हैं|

ऐसे महत्वपूर्ण फर्क होने के कारन दुनिया के विद्वान बुद्ध के धम्म को धर्म मानने के लिए तैयार नहीं होते | इन जैसी बातों पर गौर किया जाए तो फिर बुद्ध का अपना पाली शब्द ‘ धम्म ‘ अधिक योग्य लगने लग जाता है | वास्तविक धर्म का पाली शब्द धम्म ही है पर दुनिया के किसी भी धर्म की तुलना बुद्ध के धम्म से करने पर बहुत ही फर्क दिखाई देने लगते है | इसलिए सवाल खड़ा हो जाता है की उसे धर्म कहना उचित होगा या नहीं ? ” एक विशिष्ट महामानव के उपदेश पर चलने वाला मानव समूह उसे उस धर्म का व्यक्ति कहा जाता है ” ऐसी कुछ सयुक्तिक व्याख्या अगर धर्म की लगाईं जाए तो ही बुद्ध के धम्म को धर्म कहने में ठीक लगेगा | वैसे आज की दुनिया में अगर धम्म को धर्म कहा जाए क्योकि वो एक भाषा का फर्क है तो ठीक है पर इतने बड़े फर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ऐसे मेरा मानना है | धन्यवाद

( अभिजीत गणेश भिवा )
http://abhijitganeshb0.blogspot.in/2011/10/blog-post.html

institution of god and religion

One thought on “हम बुद्ध शिक्षाओं को धम्म कहते हैं पर दुनिया धर्म समझती समझाती है, आइये धर्म और धम्म में फर्क समझें …अभिजीत गणेश भिवा

  1. धर्म अर्थात अध्यात्म (अ= not,ध्या = concentration ,आत्म= self ,अर्थात मैं पन का ध्यान न करना ही अध्यात्म है = concentration of selflessness is called the real meditation ) अर्थात विश्व /व्यक्ति / शरीर का भीतरी आयतन i.e. internal view =reality of the things or world or all universe . सामान्यतः आज के समय में जनसामान्य धर्म को संप्रदाय और संप्रदाय को ही धर्म समझते हैं अपितु धर्म शब्द की उत्पत्ति पुरातन भारतीय भाषाओं :- प्राकृत एवं पालि से हुई है। पुरातन पालि भाषा में धम्म शब्द प्रयुक्त होता था जिसका संस्कृत भाषा में रूपान्तरण होकर धर्म हो जाता है , जबकि धम्म शब्द तो आज तक भी हमारे देश की विभिन्न जातियों ,गोत्रों और कबीर तुलसी के काव्यों में भी पाया जाता है । इतना ही नहीं हमारे देश में जो चार धाम हैं उन्हें धाम इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे धम्म (= धर्म ) स्थल हैं । इस बात का अटूट प्रमाण तो यही है कि जिस प्रकार समय के साथ- साथ सामाजिक परिवर्तन होता जाता है ,ठीक उसी प्रकार किसी देश अथवा क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं में भी परिवर्तन होता जाता है । परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि पुरानी भाषा बिल्कुल बदल जाती है ,बदलाव केवल इतना ही होता है कि पुरानी भाषा में कुछ नये शब्द किसी दूसरे देश अथवा क्षेत्र से आकर बस जाने वाले लोगों की भाषाओं के मिलते जाते हैं । परंतु अत्यधिक संख्या में तो पुरातन भाषा के शब्द ही ऐसे के ऐसे या कुछ विकृत होकर प्रयुक्त होते रहते हैं । जैसे देखिये पालि भाषा में बच्चा तो हिन्दी में भी बच्चा , जच्चा ,पिया , दिया,सच्चा ,कम्म=काम ,यान ,खेत , जोत , जोतना ,पोतना ,खोटना ,पुच्छ=पूछना ,पत्त=पतन=गिरना=झडना ,रतन=रतन=रत्न ,पुत्त=पूत=पुत्र ,चित्त=चित , मन ,चक्क=चक्का=चाकी ,मही=मट्टी=माटी , इसि=ऋषि , देव=देवता ,इस्सर=ईश्वर ,अत्त=आत्म=self ,दीप=दीपक ,चक्खु =चक्षु ,केस=केश =hair ,नक्ख=नाखून ,रस=रस्सा =soup ,सीह=सिंह ,गोत्त=गोत्र ,सोत्त=सोत्र=स्रोत = any stream from ground , पुब्ब=पूर्व=earlier ,सेट्ठ=श्रेष्ठ ,कुम्भ=कुंभकार=कुम्हार , चमर=चँवर=चौर , पुच्छ=पूछना =ask ,भव=happen ,सब्ब=सब=सर्व ,मंगल=भला=nice ,रक्ख=राख़=रखना ,सदा=always ,हिरी=ह्री=लज्जा=shyness ,मुंड=सरदार=गंजे सिर वाला लाल वस्त्र धारी = religious teacher = head , अविज्जा=अविद्दा =unknownness ,संखार=संस्कार , रुक्ख=वृक्ष ,भरोस्सी, आरहा ,खल ,खेम (=क्षेम) जैसे खेमचंद , हल ,पच्च=पचना , धातु , चक्खु= चक्षु आदि अनगिनत शब्द आज भी ज्यों के त्यों उत्तर भारत में बोले जाते हैं , उन सभी शब्दों का उल्लेख इस छोटे से ग्रंथ में करना हमारा उद्देश्य नहीं बल्कि पाठकों को सीधी सी बात को समझाने का प्रयास है । जैसे उत्तर भारत में बोली जाने वाली हिन्दी ही अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ विभिन्नता के साथ बोली जाती है । जिस प्रकार आप देखेंगे कि “ क्या कर रहा है ।’’ हिन्दी का एक किताबी वाक्य है जिसे मुरादाबाद के आगे के क्षेत्र में “ के कर रो है ” , बिजनौर क्षेत्र में “ क्या कर रिया है “ और गंगा पार के क्षेत्र मुजफ्फर नगर , मेरठ , बागपत आदि में “ के करन लाघ रा सै ।” बोला जाता है। जनसामान्य इस बात से बिल्कुल भी परीचित नहीं कि इस जगत में विभिन्न भाषाओं (=बोलीयों ) का विकास होता है उसके बाद लेखनी (=लिपि=writing system ) का विकास (=developement ) होता है । और जैसे –जैसे एक देश अथवा क्षेत्र के लोग किसी दूसरे क्षेत्र में आते जाते हैं या वहाँ बस जाते हैं तो लोग अपनी – अपनी भाषाओं को एक दूसरे को समझाने के प्रयास में अपनी- अपनी भाषाओं के व्याकरण(=grammer) के नियम बनाते हैं परंतु वे सभी नियम चाहे कितने भी सटीक बनायें पर उस भाषा की सम्पूर्ण रूप से व्याख्या नहीं कर पाते , क्योंकि नियम किसी विशेष समय/ काल में कुछ विद्वान लोगों द्वारा बनाये जाते हैं जबकि भाषा का विकास व्याकरण के नियमों और लेखनी से भी अत्यधिक पुरातन काल से नैसर्गिक (=कुदरती ) रूप से होता आया है । इसी कारण चाहे कोई भी व्याकरण चाहे कितना भी सटीक हो ,वह अपनी ही भाषा पर पूरी पकड़ नहीं रखता । सबसे सुव्यवस्थित व्याकरण संस्कृत भाषा का माना जाता है परंतु यह भी पूरी पकड़ अपनी भाषा संस्कृत पर नहीं रखता ।इसका अनुभव तो ऋग्वेद को पढ़कर किया जा सकता है जिसकी भाषा को छांदस कहा जाता है , जैसे आप गायत्री मंत्र को ही देखिये जो छंद की व्याकरण के अनुसार लंगड़ा छंद है । तो कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा का विकास व्याकरण से बहुत पुराना है तथा भाषा निरंतर बदलती जाती है ,इस बदलाव को रोकने का कोई उपाय जनमानस के पास नहीं है, क्योंकि पुरानी कहावत है कि :-कोस-कोस पै पानी बदलै ,चार कोस पै बानी || तो पहले जम्मुद्वीप (आज के भारतवर्ष ) में पुरातन भाषा बोली जाती थी जो कि आज भी जैन धर्म की धार्मिक भाषा है , बाद में जब ईरान की खाड़ी देशों के सजायाफ्ता मुजरिम घुमक्कड़ असभ्य लोगों ने भारतवर्ष में प्रवेश किया तो सिंधु घाटी की पुरातन सौम्य – सुव्यवस्थित – सुसभ्य संस्कृति को छिन्न – भिन्न कर डाला , परंतु वे लोग भी चाहे अपनी पुरानी ईरानियन भाषा अवेस्तान के सूत्रों को बाँचते रहे परंतु उनकी वह पुरातन भाषा सिंधु की पुरातन भाषा प्राकृत-पालि के प्रभाव से अछूती न रह सकी , जिसका फल यह हुआ कि एक नयी मिश्रित भाषा संस्कृत का प्रादुर्भाव हुआ । इसका एक अटूट प्रमाण तो यही है कि संस्कृत की व्याकरण हु-ब-हु (same) अवेस्तान की व्याकरण जैसी है क्योंकि अवेस्तान और संस्कृत भाषा में एक वचन(=singular ) , द्विवचन(=dual ) एवं बहुवचन (= plural ) के आधार पर व्याकरण है जबकि प्राकृत, पालि और दुनिया की अन्य भाषाओं में केवल एकवचन एवं बहुवचन के आधार पर व्याकरण है । जो कि एक नैसर्गिक भाषा की नैसर्गिक रूप से विकसित व्याकरण है । परंतु सिंधु की प्राकृत भाषा के प्रभाव को हम संस्कृत में साफ-साफ देख सकते हैं कि संस्कृत में प्राकृत– पालि के शब्दों को ऐसे का ऐसे ही या थोड़ा विकृत करके प्रयोग किया गया । जैसे :- पालि भाषा संस्कृत भाषा पुरिस पुरुष इसि ऋषि ( ऋ में इ की बोलने की आवाज मौजूद है बस इ के पहले र जोड़ दिया गया है इत्थि (त्+थ+इ=त्री ) स्त्री (इ की बोलने की आवाज मौजूद है केवल इ की जगह स् का प्रयोग कर दिया गया है ) इस्सर ईश्वर मग्ग मार्ग बाल बालक सच्च सत्य सत्त (=जीव ) सत्व वसल (=नीच ) वृषल कम्म कर्म खेम (क का ख और ख का क्ष हो जाता है ) क्षेम i.e. k>kh>ksh गोत्त गोत्र चक्क चक्र चित्त चित पिय प्रिय पियहर (=पीहर)=मायका प्रियजन तं त्वं देव देव धम्म धर्म पुत्त पुत्र मित्त मित्र नोट:-पालि एवं प्राकृत हमारे देश भारतवर्ष की प्राचीनतम भाषाएँ हैं और सबसे मजे की बात यह है कि पतंजलि ऋषि के गुरु पाणिनि ऋषि ने वेदिक साहित्य की व्याकरण बनायी थी जिसे संस्कृत की व्याकरण कहा गया ।पतंजलि लगभग १५० ईसापूर्व हुए जो कि भगवान गोतम बुद्ध के ४०० वर्ष बाद हुए और बुद्ध के जीवित रहते समय ही उनके शिष्य मोग्गलान (=मोद्गल्यान्) ने भगवान गोतम के ८२००० व उनके अर्हत शिष्यों के २००० सूत्रों कुल ८४००० सूत्रों के आधार पर पालि व्याकरण बनाई थी । अतः व्याकरण का निर्माण संस्कृत के पहले पालि का ही हुआ था ।अब पतंजलि के योगसूत्र में देखिये कि योग की अगर बात करें तो प्राचीन भारत में सर्वोत्तम योगी भी गोतम बुद्ध हुए । जिसका प्रैक्टिकल रूप से विवरण बुद्ध द्वारा दीघनिकाय के सतिपट्ठान सुत्त में किया गया है ।बुद्ध ने योग (=अध्यात्म ) के आठ मार्ग बताये हैं (१) सम्मा दिट्ठी (२)सम्मा संकप्पो (३)सम्मा वाचा (४)सम्मा कम्मन्तो (५)सम्मा आजीवो (६)सम्मा वायामो (७)सम्मा सति (८) सम्मा समाधि । इन आठ मार्गों की संज्ञा(=name) और थोडा कर्म बदलकर अपने नाम से अष्ठान्गिक योग बनाया जिसे पतंजलि का योगसूत्र भी कहा जाता है ।जो कि इस प्रकार हैं (१)यम :-अहिंसा ,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह ।(२)नियम:-सौंच (cleanness),संतोष,तप,स्वाध्याय,ईश्वर प्रणिधान (=self surrender to god ) (३) आसन (= relaxable posture of body) (४) प्राणायाम (=आश्वास-प्रश्वास i.e. inspiration-expiration ) (५)प्रत्याहार (=मन को पाँच वाह्य इन्द्रियों के विषयों से अलग कर लेना ) (६) धारणा (=restorative thought about goal=दृढ संकल्प ) (७)ध्यान (=practice of concentration of mind ) (८) समाधि (=fully concentrated mind =मन का मन में अवस्थित हो जाना ) । इन आठ अंगों में पहले ६ तो पंचेंद्रियों को पूर्णतः वश में करने के लिए हैं और ७,८ वें कैवल्य (=मोक्ष ) प्राप्त करने हेतु हैं ।इन आठ की व्याख्या चार भागों में की है (१)-समाधि पाद:- चित की वृत्तियों के निरोध के जो मार्ग हैं उन सबको योग कहा जाता है।अतः चित वृत्तियों के निरोध की अवस्था को समाधि कहा गया है । (२)- साधनपाद :-इन्द्रियों के विषयों को त्याग ध्यान द्वारा मन को समाधिष्ठ करने के जो साधन हैं । जैसे प्रथम ६ साधनों द्वारा ध्यान में अवस्थित होया जाता है । (३)-विभूतिपाद:-पूर्ण ध्यानस्थ अवस्था में साधक विभिन्न प्रकार की दिव्य शक्तियों का अनुभव करने लगता है ,जैसे दिव्य श्रोत , आकाश में शरीर सहित गमन करना,अदृश्य हो जाना आदि ।अतः साधक को कैवल्य अवस्था को प्राप्त करने का ज्ञान हो जाता है । (४)-कैवल्य पाद:-जब साधक का शरीर और मन एक ही हो जाता है अर्थात अविच्छिन समाधि । तब साधक का मोक्ष हो जाता है यानि पुरुष और मन एक हो जाते हैं एवं शरीर और मन में कुछ भी अशुद्धि नहीं रह जाती अर्थात सत्व(=मन) और पुरुष (=शरीर) पूर्णतः राग आदि दोषों का बीज सहित नाश हो जाता है , साधक ब्रह्म अवस्था को प्राप्त हो जाता है । इसे ही कैवल्य कहा जाता है । पतंजलि ने साधनपाद के १३ वें एवं ४९ वें सूत्रों में सति शब्द का प्रयोग किया है जो कि संस्कृत के शब्द नहीं हैं और खूब ढूँढने से भी नहीं मिल पाए जबकि वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत शब्द कोश में भी नहीं है ये सति शब्द । सबसे मजे कि बात तो ये है कि सति शब्द का अर्थ ही नहीं समझ पाए संस्कृत के विद्वान् १३वें सूत्र में जो बताया गया है कि जीवित प्राणी भिन्न-२ प्रकार के विपाक (=फल) भोगता है , उनके मूल (=कारण=causes) के प्रति सति=सजग (=conscious) होना ।एवं ४९ वें सूत्र में प्राणायाम (=inspiration-expiration) करते समय सजग रहना ।जबकि सति शब्द पालि वांग्मय (=बुद्ध वचनों का संग्रह) का एक विशिष्ट शब्द है जैसे भगवान गोतम बुद्ध के द्वारा महासति पट्ठान सुत्त (दीघनिकाय २२.२/९ )में चार सति पट्ठान १-कायानुपस्सना ( = इसमें आसन और आश्वास-प्रश्वास आदि की practice है ) २-वेदानानुपस्सना ३-चित्तानुपस्सना ४- धर्मनुपस्सना को विस्तार पूर्वक समझाया है कि किस प्रकार एक भिक्खु (=साधक) विपस्सना द्वारा सम्यक समाधि प्राप्त करता है ।इससे भी पता चलता है कि पतंजलि ने महावीर और बुद्ध के योग मार्ग को नाम बदलकर प्रयोग किया , पर ढंग से योग को नहीं समझा पाए क्योंकि वो कभी भी बुद्ध महावीर के मार्ग को practically नहीं जिए तो केवल शास्त्रीय गुणगान ही कर सके वो भी क्रमबद्ध तरीके से नहीं किया, क्योंकि केवल काय के योग तक ही सीमित रह गए । सम्यक ध्यान और कैवल्य को भी नहीं जान पाए practically , विपस्सना और निब्बान को तो बेचारे क्या जान पाते। अतः आप देख सकते हैं कि संस्कृत में प्राकृत-पालि के शब्दों में र की वृद्धि अथवा आधे अक्षर को आधे र में परिवर्तित करके प्रयोग कर दिया गया है । इसी कारण संस्कृत कभी भी जनसामान्य की भाषा नहीं रही केवल पुरोहितों की किताबी भाषा है । जबकि आज की हिन्दी तो सम्पूर्ण रूप से प्राकृत और पालि से ही मेल खाती है, हाँ ये बात और है कि कुछ नयी भाषाओं के शब्द जरूर हिन्दी में मिश्रित होते रहे हैं । यह तो हम पूर्व में ही बता आए हैं कि जैसे – जैसे विभिन्न संप्रदायों और क्षेत्रों के लोग भारतवर्ष में आते रहे तो उनकी भाषाओं के शब्द भी हमारी भाषा में मिश्रित होते रहे हैं , जैसे आज अनपढ़ व्यक्ति भी English के bulb शब्द को बल्ब = कोई-कोई तो बलप ही बोलता है । अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि पुरातन काल में भारतवर्ष में जितने भी संप्रदाय थे उनमें धर्म शब्द का अर्थ यही था कि इस संसार की वास्तविकता क्या है इसे समझने और जानने का जो भी वास्तविक मार्ग है उसे धम्म (=धर्म ) कहते थे ।हाँ ये बात ठीक है कि धर्म को समझने और जानने के भिन्न-भिन्न मार्ग भिन्न-भिन्न संप्रदायों में प्रचलित थे । परंतु आज तो हालत ये है कि ज़्यादातर भारतीय संप्रदायों में भी , अब अपने-अपने संप्रदायों के वास्तविक मार्गों का कुछ अता-पता नहीं है । केवल अंधविश्वास का ही बोलबाला है क्योंकि बेचारे मूर्ख बचे हैं , उन्हें खुद ही अपने पुरातन गुरुजनों के बताए वास्तविक अर्थ का पता नहीं है बस पेटपूजा के लिए पुरोहिती करते रहते हैं । अंधों की पांती है आगे वाला भी नहीं देखता बीच वाला भी नहीं देखता और पीछे वाला भी नहीं देखता है । देखिये कबीरदास जी ने कहा भी है – “ जाका गुर है आंधरा चेला काह कराय ,अंधा अंधु पेलिया दोनों कूप पराय ” अर्थात जिसका गुरु ही मूर्ख हो अंधविश्वासी हो उसका शिष्य तो बेचारा है, लगा है अपने अंधे गुरु के पीछे और एक दूसरे को धक्का मार – मार के एक दिन कुएं (=अर्थात दुख के भव सागर ) में जा गिरेंगे । अर्थात पुरातन धर्म शब्द का यही अर्थ है कि संसार अथवा ऋत अथवा जन्म – मृत्यु एवं शरीर और यह जगत (=प्रकृति ) है क्या चीज और यह लगातार क्यों बदल रही है ? क्या ? इस सबको चलाने वाला भी कोई व्यक्तित्व (= पुरुष ) ठीक इसी प्रकार है जिस प्रकार किसी देश अथवा घर को चलाने वाला कोई व्यक्ति होता है । तो हुआ ये कि भिन्न – भिन्न प्रकार के लोगों ने अपनी –अपनी विचार धारा के अनुसार विभिन्न प्रकार के देवताओं (=विभिन्न लोकों के स्वामियों =इस्सरों =ईश्वरों ) को उनका साक्षात्कार करके अपना-अपना ईश्वर मान लिया जैसे-साकार ब्रह्मा ,विष्णु , महेश , निराकार ब्रह्मा , god ,अल्लाह आदि की संज्ञा देकर उनकी पूजा शुरू कर दी । बाद में तो आगे आने वाली पीढीयों ने ना तो उनका कभी साक्षात्कार किया न कभी अपने पूर्वजों की बातों पर चिंतन मनन किया । अपितु काल्पनिक घोड़ों पर सवार इन मूर्खों ने अपने – अपने संप्रदाय खड़े कर डाले और इससे भी बुरा ये हुआ कि अलग –अलग संप्रदायों के पुरोहितों (=पुजारियों ) ने अपने हितों के लिए अथवा अज्ञानतावश अपने-अपने ईश्वरों को सर्वश्रेष्ठ एवं इस सम्पूर्ण जीव और निर्जीव जगत का रचियता और कर्ता-धर्ता ही घोषित कर डाला ,एवं अकर्मण्यता (=निकम्मेपन,भिकारीपन ) के सिद्धान्त का प्रतिपादन कर डाला, केवल लोगों की मेहनत की कमाई को निकम्मेपन से आरामपूर्वक बैठकर खाते रहने के लिए ।यह स्थिति दुनिया भर के संप्रदायों की हो गई और वर्तमान समय में तो भेड़ चाल है, चले जा रहे हैं बिना सोचे – समझे कि वास्तविक्ता क्या है , धर्म क्या है ?और संप्रदाय क्या है ? धर्म तो सभी जीव- अजीव संसार के लिए एक ही है कि जिस प्रकार का कार्य करोगे वैसा ही तो फल मिलेगा उस फल में कोई भी देव या ईश्वर कुछ न मिला सकता है न घटा सकता है । इस अकर्मण्यता (= निकम्मापन ) के सिद्धान्त के कारण फिर दुनिया में आपा- धापी मच गई धर्म का मार्ग डूबता चला गया और इसका परिणाम ये हुआ कि प्राचीन जम्मुद्वीप (= भारतवर्ष ) अनेकों बार विदेशी लोगों का गुलाम हुआ ।आज तो भारतवर्ष का बहुत बुरा हाल है , जो पुरातन संस्कृति कभी विश्व-गुरु कहलाती थी वह आज धूलधूसरित हो गई ।और देश की अमूल्य प्राकृत सभ्यता नष्ट होती चली गई ,आज तो धर्मांधता का ये हाल है कि धर्म की चित्रकलात्मक व्याख्या {=जो पत्थरों और गुफाओं में उकेरी गई है जैसे सिव=शिव की मुद्रा में शिव के गुणों को दर्शाने के लिए ऐसा बनाया गया है सिव पालि भाषा का शब्द है और शिव संस्कृत भाषा का शब्द है सिव का अर्थ पालि / प्राकृत भाषाओं में ये है कि वह व्यक्ति अथवा साधु जिसने सिद्ध कर लिया है सैंतीस बोधिपक्षिय धर्मों और जिसने अपनी वीतरागता (=ब्रह्मचर्य ) पूर्ण कर लिया है , इस कारण अजन्मा हो गया है , अब आगे उसका कोई भी जन्म नहीं होना है इस कारण इस व्याख्या को सिव (=शिव ) शब्द से निरूपित किया गया है। इस कारण सिव एक अवस्था है जिसे अरहत भी कहा जाता है । विस्तार के लिए देखें –संयुत्त निकाय कट्ठहार सुत्त ७,२,८ एवं ४१,१,२ और विसुद्धिमग्ग ed २००८ p-१४०,३१९} को ही अधर्मी मूढ़ लोग अंधविश्वास में ग्रसित हो ईश्वर मानकर पूजा – पाठ कर रहे हैं , और मूर्ख पुरोहितों द्वारा नित नए-नए कर्मकाण्ड उत्पन्न किए जा रहे हैं । जो यह सब आज हमारे देश में चल रहा है कोई केवल अज्ञानता के कारण ही नहीं बल्कि जो लोग धर्म के ठेकेदार हैं , चाहे वे किसी संप्रदाय या जाति के हों ,उनके द्वारा ही बड़े ज़ोर शोर से प्रचारित-प्रसारित किया जाता है । क्योंकि यह इन निकम्मे लोगों द्वारा अनभिज्ञ और वास्तविक्ता से कोसों दूर जनसामान्य की मेहनत की कमाई को आराम से बैठकर खाने का एक सर्वोत्तम साधन है । और देखिये कितने मूर्ख और अधर्मी ये लोग स्वयं हैं कि इतना भी नहीं जानते हैं कि इस ऋत (=प्रकृति=universal laws) का यह अटूट कभी न बदलने वाला नियम है कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे –वैसा ही फल मिलेगा । अतः न ही तो ये धार्मिक हैं न ही नास्तिक , ये तो पल्ले दर्जे के मूर्ख और लालची लोग हैं । धर्म का वास्तविक पुरातन अर्थ तो यही है कि इस संसार में ये इतने दुक्ख क्यो हैं,ये जनम – मरण क्यों हैं ? इनकी उत्पत्ति कैसे होती है ? और क्या इनका विनाश संभव है ? यदि है तो वो कौन सा मार्ग है ? जिसके द्वारा इन दुखों से छुटकारा मिल जाये । इस सबको जानना और समझना ही धर्म है बाकी तो सब संप्रदायिकता है और सभी संप्रदायों में धर्म नाम की चीज़ तो आज उन-उन संप्रदायों के पुजारी लोग भी नहीं जानते बेचारे तो जनसामान्य क्या ?जानेगा । इसलिए चल रहे हैं , अन्धों की पांती है आगे , बीच और पीछे वाला कोई भी जानता ही नहीं कि धर्म का मार्ग क्या है ? बेचारे गुरु – चेले सब के सब अंधे हैं तो कौन मार्ग दिखाये और उससे भी बुरी बात यह है कि अकल से पैदल ये लोग अपने-अपने संप्रदायों में इतने कस कर बंधे है कि अब तो बेचारा ईश्वर भी अगर इनको स्वयं आकाशवाणी करे या अवतार लेकर साक्षात बताये कि भाई ये क्या अधर्म का मार्ग पकड़ लिया , धर्म को समझो यह समझने – जानने की चीज है और जीवन में धर्म (=ऋत के नियमों ) का पालन करने से ही लाभ मिलता है न कि अंधविश्वास का अंधानुकरण करके कुछ मिलने वाला है । अपितु इतना और होता है कि तुम स्वयं की खून पसीने की कमाई को निकम्मे और अधर्मी लोगों के लिए खर्च कर देते हो ! जिससे तुम्हारे अपने बच्चे और अन्य जरूरतमन्द लोग वंचित रह जाते हैं और तुम्हारी आने वाली नस्लें इस पागलपन की गुलाम बनी रहती हैं , वे कभी भी उन्नति नहीं कर पाती एवं जीवन के दुखों का वास्तविक कारण नहीं जानने के कारण पूरा जीवन दुखों में ही व्यतीत होता है तुम्हारा और तुम्हारी संतानों का , यह चक्र निरंतर तब तक चलता है जब तक अंधविश्वास और लालच चलता है । फिर भी लोग इतने मूर्ख और स्वार्थी हैं कि इतना भी समझने- जानने की कोशिश नहीं करना चाहते कि चाहे दिव्य प्राणी (= अदृश्य देवगण ) हों या मनुष्य लोक के स्थूल प्राणी , कोई भी अजर- अमर नहीं बल्कि सभी की अपने-अपने शरीर के अनुसार आयु होती है और कोई किसी पर बिना वजह कृपा नहीं करता , सभी को कुछ भी प्राप्त करने के लिए कर्म करना पड़ता है ।हाँ ये बात तो सच्च है कि इस संसार में कितने ही दृश्य और अदृश्य लोक हैं जैसे:- निराकार ब्रह्म लोक ,साकार ब्रह्म लोक , स्वर्ग लोक , मनुष्य लोक , नरक लोक इत्यादि हैं जैसे-मज्झिम निकाय के संखारुपत्ति सुत्त में बड़े विस्तार पूर्वक लोकों के बारे में भगवान गोतम बुद्ध ने भिक्खुओं को बताया है। जिसमें की ८ नरक लोक- प्रथम नरक लोक जिसे अवीची नरक कहा जाता है, महापृथ्वी के गर्भ में है जिसका द्वार महाहिमालय के नीचे है। और अन्य ६ नरक लोक मही(=पृथ्वी) एवं ६ देवलोकों के बीच-बीच में पड़ते हैं और ८ वाँ नरक लोक छटें देव लोक एवं प्रथम ब्रह्म लोक के बीच में है ,एक मनुष्य लोक ,६ देव लोक ,१६ ब्रह्म लोक एवं ४ निराकार(=ब्रह्म) अनंत आयतन बताए हैं ,यह स्थिति एक चक्रवाल (=ब्रह्माण्ड) =UNIVERSE की है , जबकि अनंत चक्रवाल इस लोक में हैं। और जिस प्रकार इस मनुष्य लोक में एक घर का स्वामी ,एक गाँव का स्वामी ,एक नगर का स्वामी , जिले का स्वामी,प्रदेश का स्वामी , देश का स्वामी एवं पूरे संसार में किसी सबसे मजबूत देश का स्वामी आदि देखे जाते हैं , परंतु उनमें कोई भी सदा के लिए न तो जिंदा रहता है और न उस पद पर ही । जिस प्रकार मनुष्य लोक में लोग पदों पर बदलते रहते हैं ठीक उसी प्रकार दिव्य लोकों के स्वामी देवगण और ब्रह्म ,ईश्वर आदि भी बदलते रहते हैं और अपनी स्वाभाविक मृत्यु को भी प्राप्त होते रहते हैं । इसका प्रमाण तो तुम्हारे सम्प्रदायों के ग्रन्थों में भी भरा पड़ा है कि इंद्र देव का आसन डोलने लगा , जब किसी ने घोर तपस्या की तो । और इससे भी मजे की बात तो ये है कि जिस प्रकार मनुष्य लोक में किसी भी स्वामी (=डी.एम. , पुलिस ,जज ,मंत्री , प्रधान मंत्री आदि ) का दूसरों के मनों पर राज नहीं चलता , ठीक उसी प्रकार देवताओं , ईश्वरों का भी जगत के अन्य प्राणीयों के मन पर कोई राज नहीं चलता । इसी कारण तो दुनियाँ में इतनी अराजकता और मार-काट है ,कोई भी देवता , ईश्वर इसे नहीं रोक पाता । तभी तो भगवान गोतम बुद्ध ने कहा भी है “ मनो पुब्बंगमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया ” अर्थात जितने भी धर्म (=thoughts & acts ) हैं , वे सर्वप्रथम मन में उत्पन्न होते हैं , मन ही सब धर्मों का मुखिया (=lord ) है । आजकल लोग ईश्वर और भगवान का एक ही अर्थ समझते हैं जबकि पुरातन काल में ईश्वर किसी देव लोक के स्वामी के लिए प्रयुक्त होता था और भगवान उस देव या मनुष्य के लिए प्रयुक्त था जिसके मन में राग (=attachment=संलिप्तता ),द्वेष (=jealousy=ईर्ष्या ) ,एवं मोह (=stupidness=मूढ़ता ) न रह गयी हों , जिसने इन तीनों का सदा-सदा के लिए नाश कर दिया हो , वही भगवान कहलाता था । इसीलिए तो पालि में कहा गया है “ भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो इतपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धस्स ” अर्थात जो वे अरहत (=मुक्त )सम्यक संबुद्ध हैं उन्होने अपने सभी प्रकार के राग, द्वेष , मोह को भग्न (= नाश ) कर दिया है इसी कारण वे भगवान कहे जाते हैं । भगवान शब्द की उत्पत्ति पालि के भगवा शब्द से हुई । भगवां =भगवान= भग्ग+वां भग्ग का अर्थ पालि में नष्ट करना है और वां शब्द neutar gender में वा से वां हो जाता है जैसे हिन्दी के शब्द कारवां का अर्थ है करने वाला , ठीक इसी प्रकार पालि के भगवां शब्द का अर्थ है नष्ट करने वाला । तो भगवान इसलिए कहा कि राग, द्वेष, मोह को नष्ट करने वाले और दूसरों को भी इसका मार्ग बताने वाले हैं इसलिए भगवान हैं । तो कहने का तात्पर्य ये है कि ईश्वर और देव अदृश्य एवं महाशक्तिशाली भले ही हों ,पर भगवान की तरह ना तो शक्तिशाली होते हैं और ना ही राग – द्वेष – मोह से मुक्त होते हैं ,एवं बार – बार जनम –मरण के चक्र में ये ईश्वर , देव फसें ही रहते हैं और जब यदि ये भगवत्ता को प्राप्त हो जाते हैं आर्य अष्ठांगिक मार्ग (=1-सम्मा दिट्ठी =perfect understanding, 2-सम्मा संकप्पो =perfect thought or determination ,3-सम्मा वाचा =perfect speaking, 4-सम्मा कम्मन्तो =perfect acts either of body or mind, 5-सम्मा आजीवो=perfect profession to get lived the life, 6-सम्मा वायामो=perfect efforts to keeping healthy body & mind, 7-सम्मा सति=perfect consciousness, 8-सम्मा समाधि=perfect concentration ) पर चल कर, तो भगवान बन जाते हैं और फिर कभी भी उनका जन्म नहीं होता ,वे निब्बान (=निर्वाण) को प्राप्त हो जाते हैं । अतः जनम – मृत्यु एवं सभी प्रकार के दुखों से मुक्त होने का जो मार्ग है वही धर्म है यदि इसके आगे पीछे कुछ लगा है तो समझ लो कि वह धर्म नहीं संप्रदाय है जाति है अधर्म है , धर्म तो धर्म है सबका एक है। ********* तो दुनिया वास्तव में अधर्म (=अकुशल कर्म =imperfect acts )से चल रही है। इसी कारण जनम-मृत्यु एवं दुखों के चक्कर में फंसी रहती है । इसीलिए भगवान गोतम बुद्ध ने कहा भी है “ जनम भी दुक्ख ,जाति भी दुक्ख , मरण भी दुक्ख ” अर्थात संक्षेप में पञ्चविज्ञान काय (= रूपनाम) ही दुक्ख है (=अर्थात एक यह काया और इसके चार भीतरी आयतन { A= [१-रूप=body ]+B= नाम [ = २- वेदना (feeling) ३-संज्ञा ( identifier) ४- संखार=संस्कार (memory) ५- विज्ञान (=sense=चेतना)] } इसे ही भगवान गोतम बुद्ध ने रूपनाम कहा है यही पञ्चविज्ञान काय कहलाता है । इसमें जो रूप(=body ) है वह या तो स्थूल ( मनुष्य, पेड़ आदि का ) है या अस्थूल । जो स्थूल रूप है वह चार धातुओं १-अग्नि २-वायु ३- जल ४-पृथिवी का आकाश में संयोग होने से मिलकर बना है और जो दिव्य रूप है वह केवल आकाश धातु वाला है इसीलिए अदृश्य है , इसीलिए हम स्थूल प्राणी देवताओं को स्पर्श नहीं कर सकते और ना ही अपनी इन स्थूल आँखों से देख सकते हैं । और जिसे पुरातन भाषा में नाम (=समस्त प्रकार की चेतनाओं का समूह ) कहा गया है , वह भी चार चैतसिक धातुओं (=१-वेदना २-संज्ञा ३-संस्कार ४-विज्ञान ) से मिलकर बना है । विज्ञान और मन एक ही हैं जबकि नाम शब्द भगवान गोतम बुद्ध ने पहले-पहल इसलिए प्रयुक्त किया कि जिसे अज्ञानी लोग आत्म=आत्मा ( self ) कह रहे थे ,अनश्वर कह रहे थे , अविभाजित वस्तु समझ रहे थे उसे भगवान गोतम बुद्ध ने नाम = ना + म = ना=not+ म=self=आत्म अर्थात यह कोई एक वस्तु नहीं जिसे आत्मा (= self ) कहा जाये , यहाँ तो सभी कुछ विभाज्य है अर्थात चेतना भी । जो विज्ञान= मन है वो भी विभाज्य है सामान्य मनुष्य या देव में ८९ प्रकार के और अर्हत = मुक्त पुरुष में १२१ प्रकार के विज्ञान जागृत रहते हैं। जैसे :-जो अर्हत नहीं (=मुक्त नहीं ) उनमें ८९ प्रकार के विज्ञान हैं – (१) २१ कुशल विज्ञान (=perfect senses=शुभ कर्म करने वाले विज्ञान ) (२) १२ अकुशल विज्ञान (=imperfect senses=अशुभ कर्म वाले विज्ञान) (३) ३६ विपाक (=result producing senses=फल का निर्माण करने वाले विज्ञान ) (४) २० क्रिया विज्ञान (=working senses=जो जीव से कर्म करवाते हैं ) इस प्रकार अनअर्हत (=अमुक्त) मनुष्य के कुल ८९ प्रकार के विज्ञान हैं। जो अर्हत पुरुष हैं उनके कुल १२१ प्रकार के विज्ञान भगवान गोतम बुद्ध ने बताये हैं- जो अर्हत हो गये हैं उनमें १२१ विज्ञान जागृत हैं एवं जो अर्हत होने के मार्ग पर हैं उनके उत्तरो-उत्तर (=एक के बाद एक ) ८९ से बढ़कर १२१ तक पहुँच जाते हैं । जो अर्हत होने के मार्ग पर हैं वे चार प्रकार के पुरुष हैं (१) सोत्तापन (=स्रोतापन=falled into stream of birthlessness ) (२) सक्कदागामी (=सक्रदागामी =who does not do any wrong act) (३) अनागामी (=जो अब कभी मनुष्य लोक,स्वर्ग लोक,नीचे के ११ साकार ब्रह्म लोक,आदि में जनम नहीं लेंगे बल्कि उससे ऊपर के जो पाँच शुद्धावास भवन के ब्रह्म लोक हैं या उससे ऊपर के चार निराकार ब्रह्म अनन्त आयतन हैं उन्हीं लोकों में से किसी लोक में जन्म लेकर मुक्त हो जायेंगे। शुद्धवास भवन के पाँच साकार ब्रह्म लोकों एवं निराकार ब्रह्म के चार आयतनों में जिसका जन्म होता है वो पुनः कभी भी इनसे नीचे के लोकों मे जन्म ग्रहण नहीं करता है , अपितु उन्हीं ९ लोकों में जन्म ग्रहण करता है । इसी कारण ० से ९ तक ही गिनती है क्योंकि ऊपर के ९ लोकों के नीचे के सभी लोकों के प्राणी राग-द्वेष-मोह से भरे हैं और दुःख भोगते रहते हैं , यहाँ तक की दिव्य योनी के प्राणी भी नरक में भी जनम ग्रहण कर लेते हैं |यह चक्र वत हैं तो शून्य हैं ये अवस्थाएं सदा के लिए नहीं रह सकती अतः ० हैं | (४) अर्हत अर्थात वह पुरुष जो मुक्त हो गया है , अजन्मा हो गया है =सिव (=पालि में )=शिव हो गया है , इसी जन्म में जिसने निब्बान=निर्वाण प्राप्त कर लिया है ,सभी प्रकार के दुखों का जिसने अन्त कर लिया है । (१) सोत्तापन के विज्ञान :- अनअर्हत पुरुष के जों ८९ विज्ञान हैं उन्हीं में से २ विज्ञान परिवर्तित होकर ५ मार्ग और ५ फल कुल १० कुशल विज्ञान बन जाते हैं , इस प्रकार स्रोतापन के कुल ९७ विज्ञान हो जाते हैं । (२) सक्कदागामी के विज्ञान :- सामान्य के ८९ में से ४ के २०(=१० मार्ग+१० फल) विज्ञान हो गए तो कुल १०५ विज्ञान सक्कदागामी में हो जाते हैं । (३)अनागामी के विज्ञान :- सामान्य के ८९ में से ६ के ३०(=१५ मार्ग+१५ फल) विज्ञान होकर कुल ११३ विज्ञान अनागामी के हुए । ***** यहाँ तीनों अवस्थाओं (=stages ) तक कुछ अकुशल विज्ञान बचे रहते हैं तभी तो जन्म –मरण के चक्र से ये भी मुक्त नहीं हैं । पर इनका मोक्ष हो गया है क्योंकि ये अपने अक्ष (=मैं+अक्ष =मोक्ष ) में मिल गए हैं फिर भी बार – बार जन्म मरण में फंसे रहते हैं । (४) अर्हत के विज्ञान :- सामान्य के ८९ में से ८ के ४० विज्ञान(=२० मार्ग+२० फल) होकर कुल १२१ विज्ञान अर्हत के होते हैं। ********* इन चार पुरुषों के चार मार्ग और चार विपाक (=फल) होते हैं । जैसे स्रोतापन्न के ५ मार्ग और ५ मार्गों के ५ फल , सक्रदागामी (=सक्कदागामी ) के १० मार्ग और १० फल ,अनागामी के १५ मार्ग और १५ फल एवं अर्हत के २० मार्ग और २० फल होते हैं । ********* अर्हत पुरुष के विज्ञान १२१ इस प्रकार विभाजित हैं – २९ कुशल विज्ञान ,५२ विपाक (=फल ) देने वाले विज्ञान एवं ४० क्रिया विज्ञान (= working senses=मार्ग पर चलाने वाले विज्ञान ) ।अर्हत पुरुष में केवल शुद्ध (=कुशल =perfect ) विज्ञान ही होते हैं । प्रश्न होता है कि उन अकुशल विज्ञानों का क्या हुआ ? तो ४ अकुशल विज्ञान तो अर्हत के २० मार्ग (= क्रिया विज्ञान ) बन गये और बचे हुए ८ अकुशल विज्ञान भिक्खुपन (=भिक्षुपन = कषाय वस्त्रधारी ) के समय में अष्ठ्शील (=भिक्खु के ८ शील ) का पालन करते – करते अष्ठ्शील के पूर्ण होने पर कुशल विज्ञान में परिवर्तित हो गए । और ३६ विपाक विज्ञान में से ४ के २० विपाक विज्ञान हो गए , इस प्रकार अर्हत के ५२ विपाक विज्ञान हुए । अतः अर्हत में जब कोई अकुशल विज्ञान बचा ही नहीं तो वह स्थिति सर्वोत्तम निर्वाणी अवस्था हो गई । राग, द्वेष ,मोह से रहित ये १२१ विज्ञान के साथ जीवित रहते हुए भी अर्हत पुरुष विपस्सना ध्यान के द्वारा कभी भी संज्ञावेदितनिरोध समापत्ति (=शून्य के भी परे निर्वाण अवस्था ) का साक्षात्कार करता है और परिनिर्वाण (= निर्वाण में प्रवेश के समय शरीर का त्याग ) करके निर्वाण में प्रवेश कर जाता है । निर्वाण में प्रवेश के बाद उसके १२१ विज्ञान भी नहीं रहते | सब एक जैसे होकर निर्वाण ही बन जाते हैं । अब फिर न जन्म न जरा न दुक्ख न मृत्यु होता है। यही सब दुखों का अन्त है। अर्हत हो जाने पर सारी दिव्य शक्तियाँ , सभी अर्हतों में उत्पन्न हो जाती हैं , इसीकारण अर्हत को सिव=शिव भी कहा जाता है जो एक अवस्था है यानि अर्हत्व । भगवान गोतम बुद्ध ने संसार (=all multi-universe ) को ६ धातुओं से निर्मित बताया है (१) पृथ्वी धातु (= all types of solid material ) (२) जल धातु (= all types of liquid ) (३) वायु धातु (=all types of gas ) (४) अग्नि धातु (= all types of temperature ) (५) आकाश धातु (= vaccum volume ) (६) विज्ञान धातु (=all types of senses= सर्व चेतनाएं ) भगवान ने भिक्षुओं को बताया भिक्षुओं ! इन छः धातुओं के अतिरिक्त और कोई धातु नहीं है सारा का सारा संसार (= विभिन्न प्रकार के लोक एवं सभी दृश्य अदृश्य प्राणी ) इन छः धातुओं से ही निर्मित हैं । { विस्तार के लिए देखें संयुत्त निकाय,अंगुत्तर निकाय } जब विज्ञान , जो छटीं धातु है अपने कर्म द्वारा अपने अन्य तीन प्रतिरूप – वेदना , संज्ञा , संस्कार बना लेता है तो वह मन (= mind = वेदना + संज्ञा + संस्कार + विज्ञान ) कहलाता है । ये मन ही वेदना –संज्ञा – संस्कार के कारण उत्पन्न राग- द्वेष – मोह के वशीभूत होकर यहाँ वहाँ प्रत्येक बार नय

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s