हिन्दू दलितों को गुलामी से जगाने की कोशिशों में बहुत कष्ट मिलता है, अधिकतर कोशिश बंजर भूमि में बीज डालने जैसी साबित होती है| मानसिक शारीरिक और आर्थिक रूप से इतने धक्के मिलते हैं की मन रो जाता है| इसी कश्मकश में मन से कुछ पंक्तियाँ निकली थी जो यहाँ प्रस्तुत हैं…समयबुद्धा


samaybuddha vyatha

हिन्दू दलितों को गुलामी से जगाने की कोशिशों में बहुत कष्ट मिलता है, अधिकतर कोशिश बंजर भूमि में बीज डालने जैसी साबित होती है| मानसिक शारीरिक और आर्थिक रूप से इतने धक्के मिलते हैं की मन रो जाता है| इसी कश्मकश में मन से कुछ पंक्तियाँ निकली थी जो यहाँ प्रस्तुत हैं:

हुक्मरानों और गुलामों के बीच हम तो पिसे जा रहे हैं
जागने के बाद हम न गुलाम ही रहे न हुक्मरान ही बन पा रहे हैं|

यु तो बन जाए हुक्मरान हम भी,रास्ता जान गए हैं अब
पर हमसे जुल्म न होगा गुलामों पर इन्हे हम अपनों में गिने जा रहे हैं|

खुश रहने को यूँ तो जिंदगी में कमीं नहीं कुछ भी हमारी
हम तो बस गुलामों को जगाने के शौक में तकलीफें पा रहे हैं|

हमारी गुलामी छूट चली, ये हुक्मरानी की कोशिशों का वक्त है
ऐसे मोड़ पर भी हम गुलामों को पुकारे जा रहे हैं|

जो अब तू गिरा तो न हुक्मरान न गुलाम ही अपनाएंगे
इनसे बच के इनको पुकारो, दिल को बस यही समझाते जा रहे हैं|

जो बुद्ध, रविदास, नानक,कबीर और आंबेडकर से भी न जागे
ये अब क्या जागेंगे जो सदियों से नींद लिए जा रहे हैं |

क्यों जगा रहा हूँ इनको मैं इसका जवाब ढूंढ लिया है मैंने अब
हम तो बस इस सदी में सत्य की लौ को बुझाने से बचाये जा रहे हैं|

समयबुद्धा

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