जीवन तीन सिद्धांतों पर आधारित है ….बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये


BIRTH TO DEATH

जीवन तीन सिद्धांतों पर आधारित है

१.भोजन-  विकास के लिए
२.सुरक्षा-  अधिक समय तक जीवन की सम्भावना के लिए
३.सेक्स-   अपना वंस आगे बढ़ाने के लिए

यह तीन बातें जीवन का प्राथमिक सिधांत हैं ,चाहे वह चींटी, हाथी, शेर, मछर,अमीबा हो या मानव उसका पूरा जीवन इन्हीं तीन सैद्दांतिक आवश्यकताओं पर ही केन्द्रित रहता है

सुरक्षा की भावना ही डर को जन्म देती है और यही डर आज संसार के सभी जीवों के आस्तित्व में होने का कारण भी है

इसलिए डर इन्सान के जीवन का अभिन्न हिस्सा ह

इन्सान प्रत्येक उस चीज से डरता है जो उसे नुकसान पहुंचा सकती है जैसे -आग ,पानी, खूंखार जानवर इत्यादि,

इन सब के आलावा जो इन्सान को सबसे बड़ा डर है वो है मृत्यु का डर या यूं कहें की स्वयं के आस्तित्व के खोने का डर ,

पुरापाषाण काल के मानव के इसी एक डर ने कालान्तर में कई सारी कल्पनाओं को जन्म दिया जैसे -भगवान, आत्मा, परलोक, स्वर्ग-नरक, देविदेवता, ताकि स्वयं को तसल्ली दे सके की उसका आस्तित्व मृत्यु के बाद भी रहेगा

यही कल्पनाएँ जिन्हें मानव की सहज बुद्धि ने मृत्यु के डर को निष्क्रिय करने के लिए किया था आगे चलकर तरह-तरह के कर्मकांडों और अंधविश्वासों में परिवर्तित हुईं

जिसके फलस्वरूप इन्ही कर्मकांडों और अंधविश्वासों ने धीरे-धीरे व्यवसाय का रूप ले लिया , आज सैंकड़ों धर्मों के रूप में अज्ञानता का वही व्यवसाय हमारे सामने है

इसीलिए आज भी धर्म दुनिया के तीन सबसे बड़े व्यवसायों में प्रथम स्थान पर है बाकि दो हैं दवा और हथियार

आज जब मानव उस महान अन्धकार युग को बहुत पीछे छोड़ कर नए वैज्ञानिक युग में अपने कदम रख चुका है जहाँ से वह ब्रह्माण्ड के रहस्यों की परतें खोल रहा है , पृथ्वी अब उसके लिए रहस्य नहीं रही , जीवन और मृत्यु की पहेलियाँ अब पहले सी जटिल नहीं रहीं , ऐसे में उसे उस धर्म की आज कोई आवश्यकता ही नहीं जिसे उसने अपनी अज्ञानता काल में मन बहलाने हेतु खिलौना बनाया था

या उसके अज्ञान काल में आस्तित्व में आई बल्कि मानवता की प्रगति में आज सबसे बड़ी रूकावट ही धर्म ह

धर्म आज दुनिया के लिए अफीम के सामान है लेकिन धर्म के व्यवसाई किसी भी कीमत पर इसे समाप्त नहीं होने देना चाहते बल्कि इस अफीम का व्यापार करने वाले इसको समाप्त करने के बजाये इसका नशा और तेज करने में लगे हुए है

मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है उससे डर कैसा , मृत्यु के बाद क्या होगा वो बताने के लिए तो आज तक कोई लौट कर नहीं आया , जीवन जलती हुई मोमबत्ती के लौ के सामान है जब मोमबत्ती का ऊर्जा क्रम टूट जाता है तब वो लौ समाप्त हो जाती है , इसी तरह जब हमारी खरबों कोशिकायें कमजोर हो जाती हैं तो हम बूढ़े हो जाते हैं और जब सभी कोशिकाएं पूरी तरह काम करना बंद कर देती है तो हम मर जाते हैं, यही जीवन की सच्चाई है , इसे समझते ही धर्म का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है

क्यूंकि आत्मा ही तो परमात्मा का आधार है और ये दोनों धर्म का आधार ,जहाँ आत्मा मरी वहीँ परमात्मा भी मर जायेगा और इन दोनों के मरते ही धर्म अपने आप ही समाप्त हो जायेगा जो हमें सदियों से आत्मा और परमात्मा के नाम पर डरा कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है

जरा सोचिये – हम कुत्ते से डरते है, शेर से डरते हैं , भेडिये से डरते हैं , सांप से डरते हैं, बिच्छु से डरते हैं, इन्हीं सब के कारण अँधेरे से डरते हैं लेकिन भगवान से हमको डराया जाता है क्यूँ ?

क्यूंकि हमारे इसी डर में तो उनकी जीत छुपी है जो इंसानियत को डरा रहे हैं ,  तो बंधुओं हमें इस डर को भगाना है क्यूंकि इस डर के आगे इंसानियत की जीत है.

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