बहुजन जिस ब्राह्मणवाद और मनुवाद द्वारा गुलाम शोषित और सताए हुए हैं, उसी ब्राह्मणवाद और मनुवाद के विरोध की बजाये उल्टा uski रक्षा ये लोग अपने प्राण देकर करते आये हैं| बहुजन अपनी दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार है …- पुस्तक: युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर: जीवन संघर्ष एवं राष्ट्र सेवाऍ, लेखक: शंकरानंद शास्त्री


सभी युवाओँ से यह अपील है इसे ज़रूर पढेँ।

डॉ आंबेडकर: “हमारे लोग आजतक परोपकार करने में अपने आप को गौरवशाली समझते हैं”

एक दिन बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने करीबी युवक शंकरानन्द शास्त्री से वार्तालाप में उसे वह कूटनिति समझाई कि कैसे अपने लोगों के हितों की ऐसे समाज में रक्षा की जाती है जहाँ गुटबाजी सफलता की कुंजी है।hungary indian

मुझे (लेखक को) बाबासाहेब ने उद्योग विभाग में इन्स्पेक्टर सिविल सप्लाईज -पंजाब में रु 400 – 800 के ग्रेड में, केंद्र सरकार की ऊंची नौकरी पर नवम्बर, 1943 में नियुक्त करवाया था। मेरा प्रधान कार्यालय लाहौर में था। मैं लाहौर विश्वविद्यालय का पोस्ट ग्रेजुएट था। बहुत समय तक लाहौर का सार्वजनिक विद्यार्थी रहा था। वहाँ पर मेरे एक साथी थे। वे हिंदू थे। उन्होंने एम. ए. (इंग्लिश) किया था। मैं संस्कृत का एम. ए. , एम्. एल. ओ. था। लेकिन हम दोनों गहरे मित्र थे। बाबासाहेब के स्नेह और उनकी कृपा से मेरी अच्छी अधिकार संपन्न नौकरी लग गई थी। किन्तु अभी मेरी नौकरी लगी ही थी। मैं प्रायः पंजाब से यानी लाहौर से बाबासाहेब की चरण वंदना करने दिल्ली हर साप्ताह आता जाता था।
उन्हीं के बंगले पर ठहरता था। 20 दिसंबर, 1943 के दिन प्रात: कालीन नाश्ता करते समय बाबासाहेब के प्रसन्न मन को जान कर मैंने यों ही बाबासाहेब से प्रार्थना की कि मेरे एक दोस्त को भी कहीं नौकरी पर लगवा दें। मैंने अपने हिंदू दोस्त की सारी योग्यताओं को बताया। उसके बायोडाटा का कागज़ उनके सामने रख दिया ।
उस कागज़ को पढने के बाद बाबासाहेब ने मेरी और गंभीरता से देखा और कहा, “मेरे लोगों का पेट भरते ही दूसरी कौम वालों की नौकरी की चिंता लग जाती है।” उस समय दूसरे लोग-कुछ अधिकारी और आगंतुक भी टेबल पर साथ ही बैठे थे। लगभग सभी अपने ही लोग थे। बाबासाहेब मेरी और देखते हुए बोले, “हमारे लोग आजतक परोपकार करने में अपने आप को गौरवशाली समझते हैं। देखो इस लड़के को, अभी-अभी नौकरी पर लगा है, इसे हमारे समाज के गरीब लोगों की शिक्षा की चिंता नहीं है। इसे अपने हिंदू मित्र की चिंता है? अपने लोगों की सहायता करने के लिए मैं केंद्रीय सरकार या प्रांतीय सरकारों में एक अकेला हूँ। जबकि हिंदू या मुसलमान अपने धर्म के शिक्षित लड़कों की सहायता करने के लिए हजारों आफिसर और मंत्री विद्यमान हैं। ऐसे परोपकार करनेवाले हमारे समाज में ही मिलेंगे!” इस सम्बन्ध में उन्होंने एक एतिहासिक कथा भी सुनाई:-
“चौदहवीं सदी में गोधरा (गुजरात) में महाराजा कृष्ण प्रसाद का राज्य था। उसके राज्य में अकाल पडा। बामण ज्योतिषियों ने राजा को बताया कि यदि नगर के विशाल तालाब में किसी मनुष्य की बलि दी जाए तो उससे जलदेवी, जो स्वयं प्यासी तड़प रही है, मनुष्य के खून को पीकर तृप्त होगी और वर्षा कर देगी। महाराज ने अपने सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो कोई भाई जल की देवी के लिए अपना बलिदान करेगा उसे महापुण्य का फल प्राप्त होगा और वह स्वर्ग में जा कर महादिव्य सुख पाएगा। उसके बलिदान से जलदेवी प्रसन्न होकर सारी प्रजा के लिए जल की वर्षा करेगी। बलिदान की तिथि निश्चित कर दी गई और तालाब पर राजा का यज्ञ आरम्भ हो गया। लेकिन निश्चित तिथि तक किसी भी हिंदू धर्म वाले ने, अपनी बलि देने के लिए अपने आप को स्वर्ग जाने की इच्छा से राज ज्योतिषी के सुपुर्द नहीं किया। राजाज्ञा का कोई प्रभाव उसकी हिंदू प्रजा पर नहीं पडा।

वर्षा न होने के कारण चारों और त्राहि – त्राहि मच रही थी। बामणों को छोड़ कर सभी प्यासे और भूखे मर रहे थे। बामनों में राजा अन्न बाँट रहा था। तालाब पर तमाशा देखने के लिए लोग हजारों की संख्यां में एकत्र हुए थे। बहुत से बकरे-बकरियों और गायों को काट-काट कर वर्षा की देवी पर चढ़ाया जा चुका था। अब केवल नर-बलि ही करना बाकी रह गया था। फिर से ढिंढोरा पिटा गया लेकिन उसके बाद भी कोई हिंदू आगे नहीं आया। तब एक भूखा अधनंगा, दीनहीन आदमी भीड़ में से निकला और उसने अपनेआप को बलि होने के लिए राजा के सुपुर्द किया। वह व्यक्ति अछूत था। वह जंगल में वास करता था। उसी तालाब में बामणि हत्यारों ने उसका गला काट दिया। उसके बलिदान से वर्षा हुई या नहीं, इस सम्बन्ध में इतिहास लिखने वाले चुप हैं लेकिन नर-बलि से वर्षा होती तो संसार में कहीं पर भी अकाल नहीं पड़ता। इसिलए यह केवल बामणि धोखेबाजी थी। ठीक यही अवस्था हमारे लोगों की है। अत्याचार करनेवाले, शोषण करनेवाले और दिन दहाड़े हमारी झोपड़ियों में आग लगानेवालों की रक्षा करने के लिए हमारे लोग सदा ही तैयार रहते हैं।” मेरी ओर इशारा करते हुए बाबासाहेब ने कहा – “इस लड़के की कुर्बानी इससे कम नहीं है। यह अपने बंधू-बांधवों और समाज के बेरोजगार नौजवानों की सहायता करे। इसी में समाज की भलाई है।”

– पुस्तक: युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर: जीवन संघर्ष एवं राष्ट्र सेवाऍ, लेखक: शंकरानंद शास्त्री   ….भाई हेमन्त बौद्ध द्वारा

आज भी  हमारे नौजवानों में एक ख़ास कमी भी होती है , बाबा साहेब के महान बलिदानों की बदौलत जब वो थोडा बहुत पढ़ लिख लेते है , कुछ आत्मनिर्भर होकर स्वावलंबी भी हो जाते हैं तो बजाये दुसरे नौजवानों का मार्गदर्शन कर उन्हें भी आत्मनिर्भरता एवं स्वावलंबन की और अग्रसर करने के वे स्वयं ही धर्म के अँधेरे कोनों में गुम हो जाते हैं , या हिंदुत्व नामक गऊ की पूछ के पीछे भागते हुए पहुँच से दूर हो जाते है

कुछ नौजवान जिनमें कुछ करने का जूनून होता है उनके अन्दर मानवता का कीड़ा काटने लगता है ! बिना अपनी क्षमताओं का अवलोकन किये वे NGO’s के चक्कर में फसते है या स्वयं ही कोई स्वयं सेवी संस्था बना लेते है ! इससे मानव कल्याण तो होता नहीं उलटे इनकी महान क्षमताएं किसी न किसी तरह ब्राह्मणवाद के उपयोग में ही आती है

आवश्यकता है की हम ऐसे नौजवानों को जो अभी आजीविका हेतु ज्ञानार्जन में लगे है या बामन बनिया अर्थतंत्र की गुलामी कर रहे है उन तक विचारधारा पहुंचाने की जी तोड़ मेहनत कर उनको बाबा साहेब के मिशन से जोडे !….शकील प्रेम

जनता जिस भी चीज़ को प्रेम करती है , ब्राह्मण उसी के नाम पर उसके के पीछे छुप कर जनता को लूटते हैं, कभी ईश्वर के पीछे छुप कर कभी धर्म के और आजकल देश प्रेम के पीछे छुपकर| यही करम हैं की मेरे भोले भाले नासमझ बहुजन समझ ही नहीं पाते की आखिर उनका शोषण कौन कर रहा है| उसकी दुर्दशा गलत ब्राह्मणवादी नीतिओं की वजह से होती है और वो कभी धर्म को तो कभी ईश्वर को तो कभी वर्तमान सरकार को दोषी ठहराकर असल शोषक तक पहुंच ही नहीं पाते| उल्टा असल शोषक को तो वो बड़े सम्मान के साथ अपने सर माथे पर बैठता है|अगर कोई बहुजन नेता जनता को समझाने में सफल भी हो जाता है तो ये अपनी संस्था का नाम बदल लेते है, नए नाम और रूप से बहुजन फिर धोखा खा जाते हैं|बहुजनों की नासमझी और ब्राह्मणवादियों की अति चतुराई, इनका तो कोई मुकाबला ही नहीं ये जंग तो एक तरफ़ा हैं जहाँ जीतने वाला और हारने वाला तो सदियों से पहले ही तय है,कमाल है !!!..|इसीलिए इस जंग में बुद्ध से लेकर कबीर,नानक,रविदास, डॉ आंबेडकर आदि तक सभी ने बुद्धि विकसित करने पर जोर दिया, इसीलिए डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धम्म में वापस लौटना चुना न की किसी वर्तमान धर्म को चुना| आप समझ सकते हो की अगर वो किसी वर्तमान धर्म को चुनते तो लोगों का धर्म बदल जाता गुलामी वहीँ की वहीँ रहती| बुद्धि का विकास ही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है और याद रहे जब तक आपने अपनी बुद्धि को ज्ञान से विकसित नहीं किया दुनिया की कोई राजनीतिज्ञ,राजा, देव, देवी,ईश्वर, धर्म या महापुरुष और कर्मकांड आपको मुक्ति नहीं दिला सकता| ध्यान रहे पढ़ो और ज्ञान बढ़ाओ, बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर गुज़रता है| अप्प दीपो भव अर्थात अपना मार्गदर्शक स्वेव बनो ….समयबुद्धा

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