पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ?…बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

nalandaruins1तमिलनाडु में खुदाई में मिला प्राचीन बौद्ध स्मारक -दैनिक भास्कर
बिहार के केसरिया में खुदाई में मिला दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप
मध्यप्रदेश में खुदाई में मिली बुद्ध की विशाल मूर्ती
केरल में खुदाई से प्राप्त हुआ विशाल बुद्ध विहार के अवशेष…….

पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ? खुदाई में अति प्राचीन कोई ब्राह्मण मंदिर अथवा 33 करोड़ देवताओं में से किसी एक की भी कोई विशाल प्रतिमा क्यूँ नहीं प्राप्त होती ? क्या बड़े बड़े बौद्ध मंदिर बौद्ध स्तूप बौद्ध विहार विशाल बौद्ध शिलालेख एवं विशाल बुद्ध प्रतिमाएं समय के अंतराल में स्वतः ही भूमिगत हो गईं ! यदि ऐसा होता तो
प्राचीन हिन्दू मंदिरों के अवशेष भी अवश्य मिलने चाहिए थे ! वैदिक संस्कृति को दुनिया की सबसे प्राचीन और परिष्कृत सभ्यता होने का ढिंढोरा पीटने वाले बताये की आपके 11 लाख वर्ष पहले पैदा होने वाले राम की कोई प्राचीन प्रतिमा अथवा मंदिर समय के अंतराल में दफ़न क्यूँ नहीं हुआ ! आपके अनुसार सात हजार साल पहले पैदा हुए कृष्ण का कोई मंदिर खुदाई में क्यों नहीं निकला ? खुदाई में आपके किसी भी देवी देवता अवतार या भगवन से सम्बंधित कोई भी वास्तु क्यों नहीं प्राप्त हुई ?

या तो आपकी संस्कृति इतनी समृद्ध नहीं थी या फिर बुद्ध से सम्बंधित संस्कृति आपकी संस्कृति से हजारों गुणा श्रेष्ठ,उन्नत,परिष्कृत, एवं विशाल थी ! यदि ऐसा था तो फिर इतनी विशाल सभ्यता जमीन के निचे कैसे चली गई ? मिस्र के पिरामिड जो की रेगिस्तान के भयंकर तूफानों को झेलकर भी भूमिगत नहीं हुए , उन्हें खोद कर नहीं निकाला गया , जो बुद्ध से भी दो ढाई हजार साल पुराने है और भारत में बुद्ध से सम्बंधित अधिकांस स्थानों को खुदाई द्वारा ही ढूंडा गया है ! भारत की मूल प्राचीन सिन्धु संस्कृति के पूरे के पूरे शहर को ही 1922 में संयोग वश की गई खुदाई में ही ढूंडा गया !

इसका कारण हम आपको बताते है ! असल में 189 ई.पू. में जब सम्राट अशोक के वंसज वृह्दुत्त की हत्या ब्राह्मणों ने पूरे योजनाबद्ध तरीके से उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुङ्ग द्वारा करवाई ! उससे पहले पूरे भारत में भारत के कोने कोने में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित बुद्ध धम्म का ही परचम लहराता था , उस समय भारत के कोने कोने मे बुद्ध स्मारक , बौद्ध स्तूप ,बौद्ध मठ , बौद्ध विहार , और बुद्ध से सम्बंधित अन्यविशाल स्मारक ही थे , कोई भी ब्राह्मण मठ अथवा मंदिर नहीं था ,

वृह्दत्त की हत्या के बाद चले ब्राह्मण और श्रमणों(बौद्धों) के लम्बे एक तरफ़ा संघर्ष में ब्राह्मण अपनी कुटिल और धुर्त नीतिओ के कारन जीत गए , व्यापक पैमाने पर बौद्ध भिक्षुओ और बौद्धों का नरसंहार किया गया , और उनके इतिहास को सदा के लिए जानबूझकर जमीं के नीचे दफ़न कर दिया गया ! और अपने षड्यंत्रो के सबूतों को भी साथ में दफना दिया , उन्हीं सबूतों को हमारे लोग खोद कर निकालने का प्रयास कर रहे हैं आइये खोद कर निकाले गए कुछ सद्यंत्रों के अवशेषों को देखते है

“अशूकावदान” नमक पुस्तक से पता चलता है की पुष्य मित्र ने पाटलिपुत्र से लेकर जालंधर तक सभी बौद्ध विहारों कओ जलवा दिए गए और यह घोषणा की की जो मुझे एक बौद्ध का सर लाकर देगा मैं उसे सोने की सौ मुद्राये प्रदान करूँगा

सातवी सदी में बंगाल के राजा शशांक ने बौद्धों के विरुद्ध बहशीपन की सीमा पार कर दी ! चीनी यात्री ह्वानशांग लिखता है की उसने कुशीनगर से वाराणसी के बिच के सभी बौद्ध विहारों को तबाह कर दिया ! पटलीपुत्र में बुद्ध के पधचिन्न्हो को गंगा में फिंकवा दिया और ब्राह्मणों के इशारों पर उसने गया के बौद्ध वृक्ष को कटवा दिया तथा बुद्ध की मूर्ती के स्थान पर शिव की मूर्ति रखवा दी !

तमिल के पेरिया-प्रनानम नमक ग्रन्थ के अनुसार राजा महेन्द्र वर्मन ने असंख्यो बुद्ध स्मारकों और विहारों को आग लगवा दी

11वि सदी में मैसूर के राजा विष्णु वर्मन ने बौद्ध और जैन मंदिरों को ध्वस्त करवा दिया

महावंश पुराण के 93 वै परिच्छेद के 22 श्लोक के अनुसार तथा सिंघली कथाओं में भी उल्लिखित है की राजा राजा जय सिंह ने बौद्धों पर इतने भयंकर अत्याचार करवाए की पूरा सिंघल द्वीपबौद्धों से खाली हो गया !

शंकर दिग्विजय के अनुसार “राजा सुधन्वा ने अपने व्राह्मण गुरु कुमारिल भट्ट की आज्ञा से अपने सेवकों को ये आदेश दिया की रामेश्वर से लेकर हिमालय तक के सारे भूभाग पर जो भी बौद्ध मिले , चाहे वो बूढ़ा हो या बच्चा उसे क़त्ल कर दो जो ऐसा नहीं करेगा उसे मैं कट कर दूंगा ” शंकर दिग्विजय अ.1, श्लोक 93-94)

इस प्रकार के और भी हजारों उदहारण भरे पड़े है इन्ही द्वारा लिखित साहित्यों में …………!

क्या यह उदहारण काफी नहीं है ये समझने के लिए की बुद्ध से समंधित इतिहास जमीं के निचे क्यूँ और कैसे चला गया ?

बोधिसत्व भाई शकील प्रेम

ब्राह्मणवादी मीडिया का दिया हुआ कलंक है “दलित” शब्द इसे त्यागो संवेधानिक नाम जैसे SC/ST/OBC/Minorities इस्तेमाल करो| श्रमण,बहुजन,मूलनिवासी अन्ये नाम हैं, अंतिम स्थाई और सटीक नाम है= “बौद्ध:…Team SBMT

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जो कौम अपना नाम भी खुद नहीं रख सकती विरोदियों का दिया कलंकित नाम “दलित” को ढो रही है वो उन ब्राह्मणवादियों से क्या मुकाबला करेगी जो सदियों से संगर्ष/ षडियंत्र  कर रहे हैं|ब्राह्मणवादी ताकतें फूले-आंबेडकरी आंदोलन को कमजोर बनाने के लिए महानायक बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को ‘दलित’ कहकर उनका अपमान कर रही है. इसके साथ ही जिन लोगों ने भारत में बौद्ध धम्म को अपनाया है उनको भी ‘दलितबौद्ध’ कहना प्रारंभ किया है. इतना ही नहीं बल्कि दलित और बौद्ध यह दोनों समानार्थि शब्द के रुप में प्रचारित करने का कार्य भी हो रहा है. ‘दलित’ और ‘हिंदू’ ये दोनों पहचाने नागों के विरोध में है. इन दोनों पहचानों तथा जाति की पहचानों को बाबासाहेब अम्बेडकर ने नकारा था.

जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं| इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी…समयबुद्धा

हमारे समाज को अपना “दलितपन” छोड़ना होगा….!

मैं भारत के दलितों की दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हूँ| लेकिन मैं अधिक दुखी दलितों का “दलितपन” देखकर होता हूँ|”दलितपन” दलितों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है|”दलितपन” एक प्रकार का “भिख्मंगपन” बन गया है|जिस प्रकार कोइ भिखारी कभी शासक नहि बन सकता उसी प्रकार बिना अपना “दलितपन” छोड़ें कोई समाज शासक नही बन सकता| माँगने वाले हाथों को देने वाले हाथ बनाना होगा| यानी कि उन्हे शासनकर्ता जमात बनना होगा| अगर आप शासक नही बन पाते है तो हमारी समस्याओ का कोई हल नही हो सकता है| लेकिन दलित अथवा भिखारी रहते हुय आप शासक नही बन सकते है| इसलिए आपको अपना “दलितपन”छोड़ना होगा|अगर आप शासक बन जते है तो आपकी सभी समस्याओं का हल आप स्व्यं कार सकते है…. मा. कांशीराम जी…..

 

मैं भारत के दलितों की दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हूँ| लेकिन मैं अधिक दुखी दलितों का “दलितपन” देखकर होता हूँ|”हमारे समाज को अपना “दलितपन” छोड़ना होगा……मान्यवार कांशीराम

(मान्यवार कांशीराम  ने यह लेख “बहुजन संगठन”, नई दिल्ली, अंक-2, तारीख-22 से 28 जनवरी, 2001 में लिखा था)

 

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मैंने एक जगह पढ़ा कि, लोगों को ऐसे नेता मिल जाते हैं जैसे लोग होते हैं. जब मैं महाराष्ट्र छोड़कर दिल्ली में आया, उत्तर प्रदेश में आया तो मुझे बार-बार सुनने को मिला कि हमारे नेता बिक गए हैं. हमारे नेता, जिनको बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने तैयार किया था वो बिक गए हैं. मैं बड़ा दूःखी हुआ कि जब जहां महाराष्ट्र में थोक में बिकते हैं, मैं वहां से चलकर आया हूं और यहां भी कहते हैं कि बिकते हैं. महाराष्ट्र में बाबासाहेब को मानने वाले, मूवमेंट चलाने वाले थोक में बिके और आज भी बिक रहे हैं, और उत्तर प्रदेश में जो थोड़े बहुत उनके साथ थे, वो भी बिकते नजर आए. मेरे पास ज्यादा साधन तो नहीं था, फिर भी चंद साथियों को तैयार करके मैंने साईकिल उठाया. सौ साईकिल सवार लेकर मैं उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में घूमा, यह प्रचार करने के लिए कि भई पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हमारे नेता बिक गए हैं.

मैंने ये बात सुनी है, समझी है, पढ़ी है कि जैसे लोग होते हैं वैसे ही उनको नेता मिल जाते हैं इसलिए मुझे लगता है कि आपके नेता बिक गए हैं, तो आप लोग भी बिकते होंगे. यो बात दूसरी है कि नेता ज्यादा कीमत में बिकते हैं और आप लोग कम कीमत हमें न बिकने वाला समाज बनाना होगा. क्योंकि न बिकने वाले समाज में अगर बिकने वाला नेता होगा तो एक बिकेगा, तो न बिकने वाला समाज दल नेता पैदा कर सकता है. लेकिन अगर समाज भी बिकाऊ है तो फिर उसमें से बिकने वाले ही नेता पैदा होंगे. इसलिए आओ मिलकर अगर बाबासाहेब अंबेडकर की मूवमेंट को आगे बढ़ाना है, मंजिल तक पहुंचाना है तो हमें न बिकने वाले नेता पैदा करने होंगे.खुशी की बात है कि उत्तर प्रदेश में लोगों ने मेरी बात मानी. देश भर में मैं कोशिश कर रहा हूं, लेकिन उत्तर प्रदेश में लोगों ने मेरी बात बड़े पैमाने पर मानी और जब मैंने 1989 में इलाहाबाद से उपचुनाव लड़ा, तो मैं जब एक वोट के साथ एक नोट देने के लिए, दलितों की बस्तियों में घूम रहा था, तब मैं उनसे यही कह रहा था कि भई मेंने बहुत प्रचार किया है, आप लोगों ने सुना है कि हमें न बिकने वाला समाज पैदा करना है, इसलिए मैं चुनाव लड़ रहा हूं और मुझे पता चला है आपकी बस्ती में लोग मुझे वोट देने वाले हैं. जब वोट देने का दिन आएगा तो इलेक्शन कमीश्नर आपके डब्बे (मत पेटियां) लेकर आएगा, उसमें आपको अपने वोट डालने हैं. लेकिन उससे पहले आज मैं अपना डिब्बा (एक वोट के साथ एक नोट वाला डिब्बा) लेकर आपकी बस्ती में आया हूं. इस डिब्बे में आपने नोट डालना है. मुझे मालुम है कि आप निर्धन समाज के लोग हैं, इसलिए मैं सिर्फ एक रुपया का एक नोट चाहता हूं. आप लोग मेरे डिब्बे में एक नोट डालें. अगर आपने मेरे डिब्बे में एक नोट नहीं डालना है तो मैं आप लोगों से अपील करता हूं कि आपने मेरे डिब्बे में जिस दिन इलेक्शन कमीश्नर का डिब्बा आएगा, उसमें वोट नहीं डालना है. आपका वोट बेकार जाएगा, अगर मुझे नोट न दिया तो, क्योंकि मुझे धनवानों से मुकाबला करना है. इसलिए आपको वोट के साथ नोट जरुर देना होगा.

तो जिस दिन चुनाव खत्म हुआ और इलेक्शन कमीश्नर ने वोटों की गिनती के लिए अपने डिब्बे खोले और मैंने अपना डिब्बा खोला तो मेरे डिब्बे में से कांशीराम के 86 हजार वोट मिले. मुझे 32 हजार नोट मिले और 86 हजार वोट मिले. जबकि कांग्रेस पार्टी को मेरे से सिर्फ 6 हजार ज्यादा वोट मिले. कांग्रेस पार्टी को करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद 92 हजार ही वोट मिले. इसलिए जो मैंने प्रचार किया था, उस प्रचार का लोगों को प्रैक्टीकल करने का मौका मिला. और प्रैक्टीकल का नतीजा यह निकला कि जितने मुझे नोट मिले उससे तीन गुना अधिक वोट मिले. जब मायवती बिजनौर, हरिद्वार से चुनाव लड़ी थी, जहां पर दोनों जगह इन्हें अच्छे वोट मिले लेकिन कांग्रेस फिर भी जीत गई थी तो कांग्रेस ने मीरा कुमार को पार्टी का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में यह प्रचार करने के लिए भेजा कि उत्तर प्रदेश के लोगों आप बहुजन समाज पार्टी को वोट क्यों देते हो. अपना वोट क्यों कराब कर रहे हो, आखिर जीतती तो कांग्रेस पार्टी बुरी तरह से हारी. फिर वो नहीं कह सकी कि आखिर जीतती तो कांग्रेस ही है. इसके बाद उनका प्रचार क्या चला कि ये अंबेडकर को मानने वाले लोग भी नहीं जीत सके हैं वो गांधी जी के चरणदास बनकर हमारे चरणों में (कांग्रेस में आकर) काम कर रहे हैं और ये लोग (बहुजन समाज पार्टी वाले) भी एक न एक दिन हमारे चरणों में आ जाएंगे. इसलिए इन लोगों का खाता नहीं खुलेगा. जून 1988 में ऐसा कहना शुरु हुआ. लेकिन जब एक साल बाद जून 1989 में लोकसभा व उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए तो उत्तर प्रदेश से बहुजन समाज पार्टी के दो एम. पी. और 15 एम. एल. ए. बने और पार्टी को मान्यता प्राप्त हुई. उसके बाद पार्टी आगे बढ़ती रही. आप सब लोग जानते हैं. लेकिन मैं कहना क्या चाहता हूं कि हम लोगों ने इस बात को समझकर कि हमारा समाज निर्धन समाज है. हमारा समाज मेहनतकश लोगों का समाज है, लेकिन इस देश में इस समाज व्यवस्था के चलते, जो मेहनतकश लोग हैं वो मेहनत करते हैं, धन पैदा करते हैं और निर्धन बन जाते हैं. अगर हमें धनवानों से निर्धन समाज बनाना बहुत जरुरी है. इसलिए साथियों, उत्तर प्रदेश में हमारा तजुर्बा बड़े पैमाने पर कामयाब हुआ. आज उत्तर प्रदेश में हमारा समाज बहुत बड़े पैमाने पर न बिकने वाला समाज बना हुआ है और न बिकने के लिए हम लोगों ने उनको सिर्फ एक जगह पैसा देने की आदत नहीं डाली बल्कि जगह-जगह मैंने मीटिंगे लेकर, मेरे पास बेचने के लिए कुछ नहीं था तो मैंने अपनी मीटिंग बेचना शुरु किया.

पहले मेरे बजन के हिसाब से 100 मीटिंगें बिकी, फिर मेरी उम्र के हिसाब से मीटिंगे बिकी. इस तरह से मीटिंगे बेच कर हम लोगों ने अपने निर्धन समाज से धन इकट्ठा किया और उस धन को धनवानों का मुकाबला करने के लिए इस्तेमाल किया. इस तरह से साथियों, ये आदत बनती गई. हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के अलावा इधर पहुंचे दूसरे प्रदेशों के लोग भी सुन रहे हों, उनको मैं ज्यादा सुनाना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश की आदत अगर देशभर में फैलती हैं तो वोटों वाला समाज (बहुजन समाज) जीतेगा और नोटों वाला समाज (मनुवादी समाज) हारेगा. अगर आप नोटों वाले समाज की चीत को रोकना चाहते हैं, वोटों वाले समाज (बहुजन समाज) को जिताना चाहते हैं तो थोड़ा-थोड़ा धन इकट्ठा करना यह बड़ा जरुरी है. पिछले जन्म दिन पर मायावती जी ने अपील की तो, 85 लाख रुपया उत्तर प्रदेश के लोगों ने इनको नोटों की शक्ल में दिया. मैंने उसको उड़ीसा और बिहार में इस्तेमाल किया जिससे कुछ बात उधर भी आगे बढ़ी.उत्तर प्रदेश में कभी भी चुनाव हो सकता है और अभी भी जो सरकार चल रही है वो हेराफेरी के कारण चल रही है. मैंने मायावती जी से कहा कि आपका जन्म दिन आया है. उत्तर प्रदेश के लोगों से अपील करें कि इस जन्म दिन के मौके पर जरुर कुछ न कुछ निर्धन समाज जितना दे सकता है उतना धन देने की कोशिश करे. मैंने इनसे कहा कि पिछली बार अपील की तो 85 लाख रुपया इकट्ठा हो गया. तब 85 लाख रुपया तो उड़ीसा और बिरार पर खर्ज हुआ है, इसलिए शायद उत्तर प्रदेश के लोगों की अब धन देने की ज्यादा दिलचस्पी ना हो. लेकिन अगर वो मूवमेंट को ध्यान में रखते हैं तो उनकी दिलचस्पी ज्यादा होनी चाहिए, अगर वो उत्तर प्रदेश का हित ही ध्यान में रखते हैं तो उनकी दिलचस्पी कम होगी, लेकिन अब तो उत्तर प्रदेश में चुनाव कभी भी हो सकता है, इसलिए निर्धन समाज का धनवानों का मुकाबला करने के लिए उत्तर प्रदेश के बहुजन समाज को तैयार करें. मुझे लगता है कि 85 लाख की बजाय आपको एक करोड़ रुपये तक मूवमेंट के लिए जन्म दिन के मौके पर मिल तकता है, ऐसा मेरा अंदाजा था. मैंने माया जी से पूछा कि आपको क्या लगता है. वो बोली कि कहीं लोग थक न गए हों. हमेशा मैं थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा करती रहती हूं, इसलिए कहीं थक न गए हों. पता नहीं एक करोड़ इकट्ठा हो गया या नहीं.

मैंने इनसे कहा कि जिनसे हमारा मुकाबला है उन पार्टियों के तो 10-12 सेठिए काफी हैं हजारों करोड़ रुपया इकट्ठा करने के लिए, लेकिन हमारे पास तो करोड़ों लोग हैं. अगर करोड़ों लोग एक करोड़ भी इकट्ठा कर लेते है तो उस धन से हम हजारों करोड़ का मुकाबला कर पाएंगे. 10-12 सेठियों का हजारों करोड़ रुपया और करोड़ों लोगों का 1-2 करोड़ रुपया भी उनका मुकाबला कर सकता है और आज तक हम लोगों ने मुकाबला करके दिखाया है. तभी तो बात आगे बढ़ी है. इसलिए मुझे लगता है कि बहुजन समाज के लोग इस बात को समझकर और न बिकने वाले लोग जरूर आपको एक करोड़ रुपया दे सकेंगे, थकावट के बावजूद. जब मैंने 14 जनवरी की शाम को पूछा, इन्होंने बताया कि एक करोड़ पार कर गए हैं, फिर मैंने सोचा कि थकावट के बावजूद जब ये एक करोड़ पार कर गए हैं तो जन्म दिन तो कल (15 जनवरी को) है. तो जब आज (15 जनवरी को) मैंने दोपहर को पता किया तो बताया कि हम दो करोड़ पार कर गए हैं. इसलिए साथियों यो जन्म दिन सिर्फ खाने-पीने के लिए नहीं हैं. जन्म दिन तो बहाना है. इस मूवमेंट को आगे बढ़ाने के लिए हम जितनी कोशिश कर तकते हैं आप लोगों ने की है, हम लोग करेंगे. और मुझे भरोसा है इसलिए मैं रिस्क ले लेता हूं. जिस तरह पूरे देश में हमारा कारोबार बढ़ चुका है, पार्टी नेशनल बन गई है, कारोबार सारे देश में बढ़ गया है, सारे देश में भी हमारी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उनके लिए मैंने दफ्तर वालों को बोला कि उनको निमंत्रण दो ताकि वो आएं और देखें कि उत्तर प्रदेश में हमने अपने समाज में जो सुधार पैदा किया है वैसा सुधार हर प्रदेश में हो और हर प्रदेश में हमारी बात तेजी से आगे बढ़े.हमारा समाज जो दलित बनकर रह गया है. दलित का मतलब बेगर (भिखारी). क्योंकि दलित का हाथ हमेशा मांगने वाला रहता है लेकिन जब वह बहुजन बन जाता है तो उनका हाथ देने वाला हो जाता है. इसलिए दलितपन (मांगने की आदत) छोड़ो और बहुजन (देने वाले) बनो. उससे वोट बैंक भी बढ़ेगा और नोट बैंक भी बढ़ेगा. इसलिए साथियों, इस मौके पर आप लोगों से अपील करने के लिए मैं इधर खड़ा हुआ हूं.

मैंने अपनी बात आप लोगों के सामने इस भरी महफिल में रखना जरूरी समझा और इधर जो धन देने वालों को धन्यवाद देने के लिए मैं आपके सामने खड़ा हुआ हूं. जिस तरह से आप लोगों ने थकान महसूस नहीं की, तो जब तक हम मंजिल तक नहीं पहुंचते हैं तब तक थकान महसूस नहीं करेंगे. हम उत्तर प्रदेश में मायावती जी को दो बार मुख्यमंत्री बना चुके हैं. दो बार तो बहुत से और लोग भी मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन तीन बार कोई नहीं बना है. इसलिए मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और उत्तर प्रदेश में अपने अधूरे कार्यों को पूरा करें और पूरे देश में बहुजन समाज को आगे बढ़ाने के लिए मेरी सहायता करें, क्योंकि इस मौके पर भी मैं आठ सूबों में लगा हूं और आठ सूबों मे जो मुझे दिक्कत महसूस हो रही है, उसे मैं ही जानता हूं. हर सूबे में हमारे लोग मांगने वाला हाथ किए हुए हैं. यहां तक कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के सूबे में हमारे लोग मांगने वाला हाथ इतना फैलाए हुए हैं कि दे दो भाई कुछ न कुछ दे दो. महाराष्ट्र की यह आदत दक्षिण भारत में भी तेजी से फैल गई है. इसलिए उधर एक तो इस आदत को रोकना है और दूसरा जो दलितपन होकर हाथ फैलाया हुआ समाज है उसको बहुजन बनाकर उनके हाथ को देने वाला करना है. इसलिए मैंने उन सम लोगों को भी इधर बुलाया है. उनसे भी मैं अपील कर रहा हूं कि भाई उत्तर प्रदेश से सीखने की आप लोग भी कोशिश करें. अपने प्रदेश में जाकर बहुजन समाज बनाएं.

जाति के आधार पर तोड़े हुए लोगों को जोड़कर बहुजन बनाएं और जो उनकी बिकने की आदत है उस आदत को रोकें और न बिकने वाला समाज बनाकर उनके वोट का सही इस्तेमाल करके बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के सपनों को साकार करने की कोशिश करें. क्योंकि महाराष्ट्र में जब मुझे रहने का मौका मिला तो महाराष्ट्र के महार भाई कहा करते थे कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने हमें कहा था कि जाओ अपनी दिवारों पर लिख लो कि हमें इस देश की शासनकर्ता जमात बनना है, हमें इस देश के हुक्मरान बनना है. लेकिन आज जब मैं उनको कहता हूं तो वो गर्दन नीची कर लेते हैं. क्योंकि उनको मांगना पड़ता है. मांगने के लिए वो बाबासाहेब को ठुकरा चुके हैं, इसलिए पहले मुझे डर लग रहा था कि शायद जब बाबासाहेब को महाराष्ट्र में महार और उत्तर प्रदेश के जाटव भाईयों ने ठुकरा दिया है अब कही सब ने ठुकरा दिया तो फिर हम गूवमेंट को कैसे रिवाईव कर सकेंगे. लेकिन खुशी की बात है कि महाराष्ट्र के महार अब थोड़ी-थोड़ी बात सुनने को तैयार हुए हैं और जब मायावती मुख्यमंत्री बनी तो जाटव भाई भी सोचने लगे हैं, तो साथियों इन सारी चीजों से हमें सबक सीखना होगा. इन सब चीजों से सबक सीखकर इसी तरह से मूवमेंट को आगे बढ़ाने में मेरा और मायावती जी का हौंसला बढ़ाते रहेंगे. हमें आगे बढ़ने में मदद करेंगे. आगे के लिए ऐसी अपील करते हुए जो आप लोगों ने अब तक सहयोग दिया हैं, धन दिया है उसके लिए आपका धन्यवाद करते हुए मैं आप लोगों से विदा लेता हूं. जय भीम-जय भारत

इंसानों की पांच प्रजातियाँ होती है ….बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

NAMEइंसानों की पांच प्रजातियाँ होती है ,

1 बुद्धिमान – इस प्रजाति के लोग अपनी बौद्धिक कुशलता और ज्ञान विज्ञान द्वारा स्वयं उर्जावान हो कर दुनिया को भी अपने ज्ञान द्वारा बदलने का प्रयास करते हैं

2-सामर्थ्यवान – इस प्रजाति के लोग अपनी मेहनत द्वारा स्वयं कामयाब हो कर दुनिया के लिए प्रेरणा दाई बनकर लाखों को आत्मनिर्भरता पुर्वक जीने की कला सिखाते है

3 चातुर्य वान – इस प्रजाति के मानव अपनी चातुर्य क्षमता से सफलता प्राप्त तो कर लेते है परन्तु इनकी सफलता एकांकी ही सिद्ध होती है किसी और को ये कुछ भी नहीं दे सकते

4- धुर्तवान : इस प्रजाति के मनुष्य अपने लाभ के लिए दुसरे की क्षति करने में संकोच नहीं करते ! जहाँ इनका कोई लाभ नहीं होता वहां भी इनका अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप अवश्य होता है उस काम को बिगाड़ने में , इनका भला तो सब भला , इस प्रजाति के लोग दुसरे की क्षति में ही अपना लाभ देखते है ,  इस प्रजाति के लोग कौन हैं  ? मुझे बताने की आवश्यकता नहीं आप स्वयं समझदार है !

5 मुर्खवान- इस प्रजाति का मनुष्य दुसरे के लाभ के लिए स्वयं का नुक्सान करता है इसलिए सदा दुखी रहता है , और अपने प्रत्यक्ष दुखों के लिए किसी अप्रत्यक्ष सहारे को ढूंढता फिरता है ! अपने दुखों के सही कारणों का विश्लेषण करने की क्षमता उसमे नहीं होती इसलिए वो मुर्ख होता है इस प्रजाति की मुर्खता का सबसे बड़ा लाभ धूर्तवानों को होता है और वह इस मुर्ख भीड़ को अपनी संपत्ति समझ कर इसे अपने धर्म नामक डंडे से हांकता रहता है

मानवों की यह पांच प्रजातियाँ अपने इन्हीं गुणों को अपने वंशो द्वारा आगे बढाती है और इस तरह यह पांच प्रजातियाँ अपने विशेष गुणों और दोषों को पीडी दर पीडी वंशानुगत रखती जाती है

शकील प्रेम

देश को दिशा देने वाले डॉ. साहेब भीमराव अम्बेडकर… By आज की आवाज़ टीम

ambedkarहमारे देश में जब छुआ-छूत का प्रभाव जोर-शोर से सारे देश में फैला हुआ था, उसी दौरान डॉ॰ भीमराव रामजी अम्बेडकर का  जन्म 14 अप्रैल 1891, आंबेडकर एक भारतीय विधिवेत्ता थे। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ,  भारतीय सविधान के मुख्य वास्तुकार भी थे।

उन्हें बाबासाहेब के लोकप्रिय नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था।

भीम राव अंबेडकर एक नेता, वकील, गरीबों के मसीहा और देश के बहुत बड़े नेता थे जिन्होंने समाज की बेड़ियां तोड़ कर विकास के लिए कार्य किए। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म  की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित बौध आन्दोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। बाबासाहेब अम्बेडकर को भारत रत्न  से भी सम्मानित किया गया है, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।

कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं।

अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश में गये आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ. आंबेडकर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है।

आंबेडकर के शोध का विषय “भारत का राष्ट्रीय लाभ” था। इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से एवं आवासिय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङकर बम्बई जाना पङा। बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ संकीर्ण विचारधारा के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङा।

इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढते रहे। उनका दृण विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुनः लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे।

हालांकि उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा। बचपन से ही बाबा साहेब ने छुआ-छूत की पीङा महसूस की थी। जाति के कारण उन्हें संस्कृत भाषा पढने से वंचित रहना पड़ा था। कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ ने भीमराव जी को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ती प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की ।

श्रेष्ठ चिन्तक, ओजस्वी लेखक, तथा यशस्वी वक्ता एवं स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री डॉ॰ भीमराव आंबेडकर विधि विशेषज्ञ, अथक परिश्रमी एवं उत्कृष्ट कौशल के धनी व उदारवादी, परन्तु सुदृण व्यक्ति के रूप में डॉ. आंबेडकर ने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक भी माना जाता है।

1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धी में चार चाँद लग गया।

डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी। वह इसे मानव की एक पद्धति (Way of Life) मानते थे। उनकी दृष्टी में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य “समाज की आन्तरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।“ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- “किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।“

अनेक कष्टों को सहन करते हुए, अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को “प्रारूप-समिति” जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।

संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण उनके द्वारा बङी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणाम स्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।

आंबेडकर द्वारा सविधान का निर्माण

अपने विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।

संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है।

अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :

मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।

1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

1948 में बाबा साहेब मधुमेह से पीड़ित हो गए। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से भी ग्रस्त रहे। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर इह लोक त्यागकर परलोक सिधार गये। 7 दिसंबर को बौद्ध शैली के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता , धन्य है वो भारत भूमि जिसने ऐसे महान सपूत को जन्म दिया ।

 

देश को दिशा देने वाले डॉ. साहेब भीमराव अम्बेडकर

मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) के आंदोलन और राजनीति की कमियाँ …..प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली …BBC

मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) के आंदोलन और राजनीति की कमियाँ  प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

kansiram change sutra
मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता  बाबा साहेब अंबेडकर का आंदोलन मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति का आंदोलन था और मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति से मेरा मतलब है कि वर्ण व्यवस्था के अभिशाप से मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज को कैसे छुटकारा मिले. मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों की सदियों से जो समस्या चली आ रही है, चाहे वो छुआ-छूत की हो, अशिक्षा की हो, ग़रीबी की हो, सामाजिक बहिष्कार की हो, इन सबके मूल में वैदिक धर्म था. अंबेडकर जी ने इसी वैदिक व्यवस्था पर अपने आक्रमण से आंदोलन की शुरुआत की थी.

साथ ही उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज को जाग्रत करने की नीव डाली. उनके पहले ऐसा काम गौतम बुद्ध को छोड़कर और किसी ने नहीं किया था.

उन्होंने मनु-स्मृति को जलाकर अपने आंदोलन की शुरुआत की थी. महाड़ में जाकर पानी के लिए आंदोलन किया. मंदिर प्रवेश की समस्या को उठाया. उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों के लिए गणेश-पूजा की माँग भी उठाया. उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों को जनेउ पहनाने का भी काम किया.

हालांकि वो ख़ुद धर्म में विश्वास नहीं करते थे पर मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) की मानवाधिकार की लड़ाई में उन्होंने इन बुनियादी सवालों से काम करना शुरु किया था.

अंबेडकर जैसा कोई विकल्प नहीं:

अंबेडकर का विकल्प कैसे पैदा होगा जब उनके विचार को ही नहीं अपनाया जाएगा.आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता पूरी तरह से भटक गए हैं. अंबेडकर को कोई नहीं अपनाता है. कोई सत्ता का नारा देता है तो कोई सत्ता में भागीदारी का नारा देता है और इन सबका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ ही हैउस सोच से आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता पूरी तरह से भटक गए हैं. अंबेडकर को कोई नहीं अपनाता है. कोई सत्ता का नारा देता है तो कोई सत्ता में भागीदारी का नारा देता है और इन सबका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ ही है.आज के नेतृत्व में सोच का ही अभाव है और इसीलिए जो काम बिना चुनावी राजनीति में गए अंबेडकर ने कर दिखाया उसे आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता बहुमत पाने या सरकार बनाने के बाद भी नहीं कर पाते.

अंबेडकर जी के अनुभवों से एक बात तो स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है कि जैसे ही मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) संगठित होना शुरू करते हैं, हिंदू धर्म में तुरंत प्रतिक्रिया होती है और धर्म को बचाने का जिम्मा लेने वाले तुरंत लचीलापन दिखाना शुरू कर देते हैं पर इस बात को मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज का नेतृत्व नहीं अपना रहा है.

खैरलांजी की घटना वैदिक काल में मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों पर हुए अत्याचारों की पुनरावत्ति ही है जिससे यह साफ है कि वैदिक परंपरा पर हमला किए बिना मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति की बात करना बेमानी है.

जातीय सत्ता का दौर:

मंडल आयोग से पहले तक राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता में आती थीं. मंडल आयोग की रिपोर्ट के सामने आने के बाद से अब जातियाँ सत्ता में आती है.जातीय सत्ता का यह जो दौर है इसे मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि इसमें तो लोग जाति पर कब्जा करके उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं|जातीय सत्ता का यह जो दौर है इसे मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि इसमें तो लोग जाति पर कब्जा करके उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.सामाजिक व्यवस्था को बदलने का अभियान, जो कि मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति का मुख्य मुद्दा हुआ करता था, वो मुद्दा मुद्दा ही रह गया है.

जातीय राजनीति से सत्ता में आने का लाभ कुछ लोगों को ज़रूर होता है. उस जाति के भी कुछ गिने-चुने लोगों को लाभ हो जाता है पर जातीय सत्ता ने न तो मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों का कल्याण हो सकता है और न ही जाति व्यवस्था का अंत हो सकता है.आज का मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता हिंदुत्व पर कोई हमला नहीं कर रहा बल्कि हिंदुत्ववादी शक्तियों के साथ समझौते का काम कर रहा है. मायावती तो हर जगह जा-जाकर बता रही हैं कि ब्राह्मण ही बड़े शोषित और पीड़ित हैं.अब तो इसी समीकरण के साथ काम हो रहा है कि कुछ ब्राह्मणों को ठीक कर लो, कुछ क्षत्रियों को मिला लो, कुछ बनियों को साथ ले लो और सत्ता में बहुमत हासिल कर लो. सत्ता की यह होड़ न तो सामाजिक मुक्ति की होड़ है और न ही सामाजिक परिवर्तन की.

तुलसीराम मानते हैं कि आज जातीय सत्ता का दौर आ गया है

पेरियार और अंबेडकर:

दक्षिण में जो आंदोलन चला वो पेरियार के ब्राह्मण विरोध की उपज थी. बहुत ही सशक्त आंदोलन था पर दुर्भाग्य की बात यह है कि वो ब्राह्मण विरोधी आंदोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं बन पाया.ब्राह्मणों की सत्ता तो ज़रूर ख़त्म हुई और पिछड़ी जातियों के नेता सामने आए पर लेकिन हिंदुत्ववादी दायरे में रहते हुए उन्हीं कर्मकांडों को वो भी मान रहे हैं जिन्हें कि ब्राह्मण मानते थे.दक्षिण में जो आंदोलन चला वो पेरियार के ब्राह्मण विरोध की उपज थी. बहुत ही सशक्त आंदोलन था पर दुर्भाग्य की बात यह है कि वो ब्राह्मण विरोधी आंदोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं बन पाया |

एक दूसरे ढंग का ब्राह्मणवाद वहाँ आज भी क़ायम है:

उत्तर भारत में कोई ब्राह्मण विरोधी आंदोलन नहीं चला. जो भी चला वो अंबेडकर का ही आंदोलन था.अंबेडकर के आंदोलन का प्रभाव उत्तर में ज़्यादा रहा भी पर यहाँ मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) उस तरह से सत्ता पर कब्ज़ा नहीं कर पाए जिस तरह से पिछड़े वर्ग के लोगों ने दक्षिण में किया.मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति का जहाँ तक प्रश्न है, दक्षिण भारत में पिछड़ों की राजनीति मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति को निगल गई है. वहाँ तो मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति के नाम पर कुछ नहीं है.जो भी है वो उत्तर भारत में हैं पर उसमें समझ की भी कमी है और बिखराव भी है. सही मायने में देखें तो यह अंबेडकर का मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) आंदोलन भी नहीं है और अंबेडकर की बताई हुई मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति भी नहीं है.

(पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

http://www.bbc.co.uk/hidr tulsiramndi/regionalnews/story/2006/12/061205_dalit_special_tulsiram.shtml

 

प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

 

 

 

 

 

 

 

 

नोट जैसा की समयबुद्धा मिशन की पालिसी है की ब्राह्मणवादी मीडिया द्वारा दिया गया अपमानजनक शब्द “दलित” का इस्तेमाल नहीं करना है इसलिए इस लेख में ‘दलित’ शब्द को “भारत के मूलनिवासी बहुजनों SC=ST+OBC” से REPLACE  कर दिया गया है, बाकि लेख ज्यों का त्यों ही प्रस्तुत है|

 

 

सारे विश्व के मानवतावादी बुद्धिजीवी,आधुनिक विचारक तथा वैज्ञानिक आदि महामानव गौतम बुद्ध के बारे में क्या विचार रखते है आइये इस आर्टिकल में प्रस्तुत उनके विचारों के संग्रह से जानते हैं. …लाला बौद्ध

einstienबुद्ध की श्रेष्ठता को श्रद्धासुमन :

तथागत बुद्ध का जन्म 2500 वर्ष पूर्व हुआ था. आधुनिक विचारक तथा वैज्ञानिक उनके और उनके धम्म के बारे में क्या कहते हैं? इस विषय पर उनके विचारों को यहां संग्रह किया गया है.

1. प्रो. एस.एस. राघवाचार्य कहते हैं- “बुद्ध के जीवनकाल से पहले का समय भारतीय इतिहास का सर्वाधिक अंधकारमय युग था. चिन्तन की दृष्टि से यह पिछड़ा हुआ युग था. उस समय का विचार धर्म-ग्रंथों के प्रति अंधभक्ति से बंधा हुआ था. नैतिकता की दृष्टि से भी यह अंधकारपूर्ण युग था. हिन्दुओं के लिये नैतिकता का अर्थ था धर्म-ग्रंथों के अनुसार यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठानों को ठीक ठीक करना. स्व-त्याग या चित्त की पवित्रता आदि जैसे यथार्थ नैतिक विचारों को उस समय के नैतिक चिंतन में कोई उपयुक्त स्थान प्राप्त नहीं था.”
2. माननीय आर.जे.जैक्सन का कहना है- “तथागत बुद्ध की शिक्षाओं की अनुपम विशेषता भारतीय धार्मिक विचारधारा के अध्ययन से ही स्पष्ट होती है. ऋग्वेद की ऋचाओं में हम पाते हैं कि आदमी का विचार स्वयं से अलग, बहिर्मुखी है, उसका सारा चिंतन देवताओं की ओर अभिमुख है. बुद्ध धम्म ने स्वयं आदमी के अन्दर छिपी हुई उसकी अपनी सामर्थ्य की ओर उसका ध्यान आकर्षित किया. वेदों में हमें प्रार्थना, प्रशंसा और पूजा ही मिलती है. बुद्ध धम्म में हमें प्रथम बार चित्त को सही रास्ते पर चलाने के क्रम की शिक्षा मिलती है.”
3. माननीय विनवुड रीडे का कथन है-
जब हम प्रकृति की पुस्तक खोलकर देखते हैं, जब हम लाखों वर्षों का खून और आँसुओं में लिखा विकास का इतिहास पढ़ते हैं, जब हम जीवन पर नियन्त्रण करने वाले नियमों को पढ़ते हैं, और उन नियमों को, जो विकास को जन्म देते हैं, तो हमें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि, यह सिद्धान्त कि परमात्मा प्रेम-रूप है, कितना भ्रामक है. हर चीज में बदमासी भरी पड़ी है और अपव्यय का कहीं कोई ठिकाना नहीं है. जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनमें बचने वालों की संख्या बहुत थोड़ी है. समुद्र में देखो चाहे हवा में, चाहे जंगल में, हर जगह यही नियम है, दूसरों को खाओ, तथा दूसरों के द्वारा खाये जाने को लिये तैयार रहो. हत्या ही विकास-क्रम का कानून है. परन्तु बुद्ध ने मानव से मानव को दुःख पहुंचाये जाने वाले कारकों पर बड़ी बारीकी से मनन किया और अपने उपदेशों द्वारा संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये नैतिक नियम बनाये. इन नैतिक नियमों को ही बुद्ध धम्म कहते हैं. बुद्ध धम्म सब धम्मों से कितना भिन्न है. रीडे ने यह बात “Martydom of Man” नामक पुस्तक में कही है.

4. डाॅ रंजन राय का कहना है, “उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तीन कानूनों की तूती बोलती थी. किसी ने उन्हें अस्वीकार करने का साहस नहीं किया. ये कानून थे- (1) जड़ पदार्थ का कानून, (2) जड़ पदार्थ के समूह का कानून, (3) शक्ति का कानून.
ये उन कथित आदर्शवादी चिन्तकों के जयघोष थे, जो समझते थे कि ये तीनों अविनाशी हैं.
उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों के अनुसार ये तीनों कानून सृष्टि के संचालक थे.
उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों के अनुसार ये तीनों कानून सृष्टि के मूल तत्व थे.
उनका मानना था कि विश्व अविनाशी अणुओं का समूह है.
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में श्री जे.जे. थामस और उनके अनुयाइयों ने अणुओं पर हथौड़े चलाना प्रारंभ किया.
आश्चर्य की बात हुई, अणुओं के भी टुकड़े-टुकड़े होने लगे. इनको परमाणु कहा जाने लगा.
जिन अणुओं को मैक्लवैल अविनाशी आधार मानते थे, वे खण्ड-खण्ड हो गये.
फिर परमाणु के छोटे-छोटे खण्ड हुये- इलैक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रान. इनमें इलैक्ट्रान, प्रोटोन में क्रमसः ऋणात्मक, धनात्मक विद्युत आवेश देखा गया.
अविनाशी जड़ पदार्थ-समूह की कल्पना विज्ञान से विदा हुई.
तथागत बुद्ध के अनित्यता के सिद्धांत को समर्थन प्राप्त हुआ.
विज्ञान ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि विश्व की गति चीजों के मेल से किसी चीज के बनने , उसके खण्ड-खण्ड हो जाने तथा फिर मिलने के नियमों पर ही आश्रित है.
आधुनिक विज्ञान के अनुसार अंतिम तत्व अनेक होकर एक भासित होने वाला है.
आधुनिक विज्ञान तथागत बुद्ध के अनित्यता तथा अनात्मवाद के सिद्धांत की प्रतिध्वनि है.

5. ई.जी.टेलर ने अपने Buddhism and Modern Thought में लिखा है –
बहुत समय से आदमी बाहरी ताकतें के शासन में रहा है. यदि उसे सच्चे अर्थ में सभ्य बनना है तो उसे अपने ही नियमों द्वारा अनुशासित रहना सीखना होगा. बौद्ध धम्म ही वह प्राचीनतम नैतिक प्रणाली है, जिसमें आदमी को स्वयं अपना अनुशासक बनने की शिक्षा दी गयी है. इसीलिये इस प्रगतिशील संसार को बौद्ध धम्म की आवश्यकता है, ताकि वह श्रेष्ठतम शिक्षा प्राप्त कर सके.

6. ईसाई धर्म के यूनिटेरियन समप्रदाय के पादरी लेसली बोलटन का कथन है- बौद्ध धम्म में आध्यात्मिक मनोविज्ञान को मैं बहुत महत्वपूर्ण योगदान मानता हूँ. बौद्धों की तरह हम यूनिटेरियन सम्प्रदाय के मानने वाले भी परंपरा, पुस्तकों व मतों के बाह्य अधिकार को प्रमाण नहीं मानते. हम आदमी के भीतर ही मार्गदर्शक प्रदीप देखते हैं. यूनिटेरियन मत के अनुयाइयों को ईसा और बुद्ध श्रेष्ठ जीवन के श्रेष्ठ व्याख्याकार प्रतीत होते हैं.

7. प्रो. डेविट गोडर्ड का कथन है-
संसार में जितने भी धर्म संस्थापक हुये हैं, उनमें बुद्ध को ही यह गौरव प्राप्त है कि उन्होंने आदमी में मूलतः विद्यमान उस निहित शक्ति को पहचाना, जो बिना किसी बाह्य निर्भरता के उसे निर्वाण के पथ पर अग्रसर कर सकती है.
किसी वास्तविक महान पुरुष का महात्म्य इसी बात में है कि वह महानता की कितनी मात्रा में महानता की ओर अग्रसर करता है, तो तथागत से बढ़कर दूसरा कौन सा आदमी महान हो सकता है?
बुद्ध ने किसी बाह्य शक्ति को आदमी के ऊपर बिठाकर उसका दर्जा नहीं घटाया, बल्कि उसे प्रज्ञा और मैत्री के शिखर पर ले जाकर बिठा दिया है.

8. बुद्धिज्म ग्रंथ के लेखक श्री ई.जे.मिलर का कहना है-
किसी दूसरे धम्म में विद्या को इतना महत्व नहीं दिया गया और अविद्या की इतनी भर्तस्ना नहीं की गयी, जितनी बुद्ध धम्म में.
कोई दूसरा धम्म अपनी आँख खुली रखने पर इतना जोर नहीं देता.
किसी दूसरे धम्म ने आत्म-विकास की इतनी विस्तृत, इतनी गहरी तथा इतनी व्यवस्थित योजना पेश नहीं की.

9. अपने बुद्धिस्ट इथिक्स में प्रो.डब्ल्यू. टी.स्टास ने लिखा है-
बौद्ध धम्म का नैतिक आदर्श पुरुष अर्हत न केवल सदाचार की दृष्टि से, बल्कि मानसिक विकास की दृष्टि से भी महान है. वह दार्शनिक और श्रेष्ठ आचारवान दोनों एक साथ है.
बौद्ध धम्म ने विद्या को मुक्ति के लिये, तथा अविद्या, तृष्णा को निर्वाण के लिये प्रधान बाधक कारण स्वीकार किये हैं.
इसके विरुद्ध ईसाई आदर्श पुरुष के लिये ज्ञानी होना कभी आवश्यक नहीं माना गया. क्योंकि ईसा का अपना स्वरूप ही अदार्शनिक था. इसलिये ईसाईयत में दार्शनिकता का आदमी की नैतिकता से कोई संबंध नहीं माना गया.
संसार के दुःखों के मूल में शरारत से कहीं अधिक अज्ञान और अविद्या ही है. तथागत बुद्ध ने इसके लिये जगह नहीं रखी.
इन महान विचारकों ने बुद्ध धम्म को कितना महान और अनुपम माना, आपने अभी पढ़ा.
कौन है जो येसे तथागत बुद्ध को अपना शास्ता स्वीकार न करना चाहेगा.

प्रस्तुति  मान्यवर लाला बौद्ध lala baudh

डॉ अम्बेडकर के कहा था कि मेरी दिलाई सुविधाएं आज हैं पर कल नहीं होंगी इसलिए व्यवसायी बने, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनने की जरुरत है। .. Nikhil Sablania

डॉ भीमराव अम्बेडकर का सन्देश: व्यवसायी बने, आत्मनिर्भर बनें
क्या आप स्कूली शिक्षा ठीक से नहीं कर पाए या कॉलेज नहीं जा पाए ? क्या आप नौकरी करना पसंद नहीं करते और चाहते हैं कि आप व्यापार करें? क्या आप रिटायरमेंट के बाद कोई कारोबार या निवेश की सोच रहे हैं? क्या आप विद्यार्थी हैं और बिल गेट्स या स्टीव जॉब्स की तरह सफल व्यापारी बनाना चाहते हैं? क्या आप एक ऐसे भारतीय हैं जो यह सोचते हैं कि विदेशी कंपनियों में नौकरी की जगह अपने खुद के धंधे होने चाहिए और आप खुद ऐसा करना चाहते हैं ? क्या आपके पास धन नहीं है पर फिर भी आप व्यापार या निवेश करना चाहते हैं ? ऐसे बहुत से जटिल प्रश्नों के उत्तर आपको इन पुस्तकों में मिल जाएंगे। व्यवसाय और निवेश की वित्त शिक्षा आपको मानसिक रूप से तैयार करेगी कि आपको किस प्रकार व्यवसाय या निवेश में कदम रखना है। जरुरी नहीं आपके पास कोई शिक्षा की डिगी हो। केवल आपको सरल हिंदी आनी चाहिए जिससे आप इन्हे पढ़ सकें। भारत में पहली बार अमरीका के उन वित्त शिक्षा लेखको की यह पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध है जो न केवल ऐसे सफल लेखक हैं जिनकी पुस्तकों की प्रतिया करोड़ों में बिक चुकी है और जो दुनिया भर में वित्त शिक्षा देते हैं, बल्कि ऐसे लेखक भी हैं जो कि सफल व्यापारी और निवेशक भी है।
पिछले एक वर्ष से मैं कुछ इस प्रकार की शिक्षा की तलाश में था जो हमारे लोगों में व्यवसाय और वाणिज्य सम्बब्धी वित्त शिक्षा का ज्ञान प्रवाह कर सके। बाबा साहिब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने भी कहा था कि मेरी दिलाई सुविधाएं आज हैं पर कल नहीं होंगी इसलिए हमे आत्मनिर्भर बनना होगा। आज भारत से लेकर अमरीका तक नौकरियां सरकारी और गैर सरकारी, दोनों ही क्षेत्रों में सिकुड़ रही हैं। मेरी एक साल की खोज और दो सालों के अध्यन्न के बाद यह पुस्तकें मेरे हाथ लगी हैं जिन्हे मैं ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुंचा कर उन्हें वित्तीय शिक्षा देना चाहता हूँ। इसके लिए मैंने कई हज़ारों रुपयों का जोखिम उठा कर यह पुस्तकें खरीदी है और अपने लोगों में यह शिक्षा देने का प्रण लिया है। अब आपको इस शिक्षा को ग्रहण करना है। आपको यह पुस्तकें खरीदनी है जिससे की यह कारवां और अधिक लोगों तक पहुँच सके। आपको इस कारवां को न केवल अपने वर्गों में बल्कि भारत के उन सभी हिन्दीभाषी वर्गों में ले जाना है जिन्हें इनकी जरुरत है और चाहे वह किसी भी जाती या धर्म से हो क्योंकि गरीबी की मार सब ही झेलते हैं और अमीरी की शिक्षा बहुत कम स्रोतों से मिल पाती है। आप चाहें विद्यार्थी हों, नौकरीपेशा, व्यापारी, कारोबारी अथवा किसी भी क्षेत्र से हों यह पुस्तकें सभी के लिए उपयोगी हैं। हिंदी भाषा में अनुवादित हुई यह पुस्तकें अमरीका के उन लेखकों द्वारा लिखी गई है जो न केवल लेखक हैं बल्कि अरबो खरबो रूपये की सम्पति के मालिक भी और जिसे उन्होंने अपनी वित्तीय शिक्षा को मजबूत करके बनाया है। तो आप भी इन पुस्तकों को पढ़ें और वित्तीय शिक्षा को सीखें और अपने परिवार को सिखाएं। यह पुस्तकें सरल हिंदी में है और आसानी से समझ आ जाती हैं। मैं आपको यह वादा करता हूँ कि इन पुस्तकों को खरीदना आपके जीवन का सबसे अच्छा निवेश होगा जो न केवल आपको बल्कि आपके द्वारा आपके परिवार और आनेवाली पीढ़ियों को व्यवसाय और निवेश सम्बन्धी वित्तीय शिक्षा दे देंगे।
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डॉ अम्बेडकर के कहा था कि मेरी दिलाई सुविधाएं आज हैं पर कल नहीं होंगी इसलिए स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनने की जरुरत है। 
 

जब विदेश में डॉ अम्बेडकर अपनी पी एच डी की थीसिस लिख रहे थे तो उनके दिमाग में शायद भारत का वह शोषित और पिछड़ा समाज रहा होगा जो निर्धनता के कारण निम्नन साधनों से भी वंचित था। बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने अपनी रिसर्च का विषय चुना ‘भारत में रुपये की समस्या :इसका उद्भव और समाधान’ और अपनी उस रिसर्च में भारत की मुद्रा (करेंसी) रूपये के विषय के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और वाणिज्य पर भी बहुत गहराई से अध्यन्न करके उसे लेखनी के माध्यम से आनेवाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित किया। अपने इस कार्य से बाबा साहिब आनेवाली पीढ़ियों को यह सन्देश देना चाहते थे कि उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा वाणिज्य एवं मुद्रा ज्ञान का संग्रह करके स्वयं का आर्थिक विकास करना है जिससे कि वह अपना शोषण समाप्त कर सके।

परन्तु यह बहुत दुखद बात है कि डॉ अम्बेडकर की इस हिदायत के देने के बावजूद, कि आज मेरे दिलाई सुविधाएं हैं पर कल नहीं होंगी, लोगों ने बाबा साहिब की इस बात को नजर अंदाज कर दिया। लोग भूल गए कि डॉ अम्बेडकर शोषित और पिछड़े समाज को नौकरी लेनेवाला नहीं बल्कि नौकरी देनेवाला बनाना चाहते थे। डॉ अम्बेडकर शुरू से ही चाहते थे कि गरीब, शोषित और पिछड़ा तबका व्यवसायी बने। भारत में ऐसे बहुत से सम्प्रदाय हैं जो अधिका-अधिक व्यवसायों से जुड़े हैं और अपनी आर्थिक शक्ति के होने के कारण, अपनी बहुत कम जनसंख्या होते हुए भी, अपनी आर्थिक शक्ति से एक मजबूत समाज है।

असल में किसी भी देश का समाज तब एक मजबूत समाज बनता है जब वहाँ अधिाक-से-अधिक लोग व्यवसायी हों और कम-से-काम लोग वेतन भोगी हों। व्यवसाय वह कुंजी है जिसके माध्यम से मनुष्य अधिका-अधिक लोगों से जुड़ता है और उसके जुड़ने का माध्यम ‘मुद्रा’ और वह ‘समान’ या ‘सेवा’ होते हैं जिन्हे वह लोगों तक पहुंचता या पहुंचाती है। तो जितने अधिक लोगों से एक व्यवसायी जुड़ती या जुड़ता है उतना ही वह उनको समझता (समझती) है और उनको समझ कर जब वह अपना सामान या सेवा देता (देती) है तो उतनी ही मुद्रा बढ़ती है। इससे न सिर्फ व्यवसायी आर्थिक रूप से मजबूत बनता है बल्कि मानव का विकास भी होता है और सामान और सेवाओं को और अधिक विकसित (बेहतर) बनाने हेतु, वैज्ञानिकी और कला का विकास भी होता है।

क्या डॉ अम्बेडकर का सन्देश केवल पिछड़े और शोषित समाज के लिए है? जी नहीं, ऐसे कतई भी नहीं है कि उनका सन्देश केवल कुछ वर्गों के लिए है। परन्तु हाँ यह बात जरूर है कि जितनी जरूररत पिछड़े और शोषित समाज को वाणिज्य और मुद्रा के ज्ञान की जानकारी की जरुरत है उतनी भारत में विकसित समूहों को नहीं है। जहाँ तक भारत से बाहर और विकसित देशों की बात है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति वाणिज्य और मुद्रा की शिक्षा लेता है, उन देशों में ऐतिहासिक तौर पर जातिवादी जैसी कोई सामाजिक बुराई नहीं रही जिसकी वजह से केवल दो-चार समूहों को छोड़ कर शेष लोग शिक्षा और व्यवसायों से वंचित रहे हों। इसलिए वहाँ यह शिक्षा वर्षों से सबको मिलती आ रही है और सब ही लगभग शिक्षित है सो इस शिक्षा को आगे बढ़ा रहे है है और ज्यादा से ज्यादा इसकी गहराईयों में जा रहे हैं। परन्तु भारत में इसलिए यह शिक्षा आवश्यक हो जाती है की एक तो यहाँ एक बड़ा वंचित समाज है जो हर तरह से पिछड़ा और शोषण का शिकार है और दूसरा यह कि विकसित तबके की भी निरंतर जनसंख्या बढ़ने के कारण उसमें भी वंचित लोगों की संख्या बढ़ गई है सो उन्हें भी इस शिक्षा की बहुत जरुरत है। इसलिए भारत में वाणिज्य और मुद्रा की उस शिक्षा की बहुत आवश्यकता है जो कि हमें एक सफल व्यवसायी या निवेशक बना सके।

मैंने इस कार्य को करने का जिम्मा अपने ऊपर लिया है। मैंने प्रण लिया है कि मैं जिस प्रकार सामाजिक अन्याय के खिलाफ डॉ अम्बेडकर की मुहीम को पिछले चार सालों से आगे बढ़ा रहा हूँ, उसी मुहीम को आगे बढ़ाते हुए अब मैं डॉ अम्बेडकर के उस विचार को भी आगे बढ़ाना चाहता हूँ जो उनके मस्तिक्ष में अपनी पी एच डी की थीसिस लिखते समय थे। मैंने चाहता हूँ कि हिंदी बोलनेवाली हमारी जनसंख्या, चाहे वह किसी भी जाती या धर्म से हो, जो भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं मैं उन्हें वाणिज्य और मुद्रा की शिक्षा दे कर मजबूत बनाऊं। पिछले ढाई वर्षों से मैं इंटरनेट के माध्यम से यह शिक्षा ले रहा हूँ और अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा कर आर्थिक रूप से स्वतन्त्र व सशक्त हो रहा हूँ और मैं यह इसलिए कर पाया कि मेरी इंग्लिश भाषा पर पकड़ अच्छी थी। परन्तु मैं जनता हूँ कि हमारे भारत में, और खासकर हिन्दीभाषी क्षेत्र में और उसमें भी दलित, पिछड़े और आदिवासी और अन्य गरीब लोगों में इंग्लिश की पकड़ उतनी नहीं है। सो इसके लिए मैंने हिंदी में वाणिज्य और मुद्रा की वह पुस्तकें उपलब्ध कराने का निश्चय किया है जिन्हें मैं पढ़ चुका हूँ और उनसे शिक्षा प्राप्त करके एक सफल व्यवसायी बन चुका हूँ। अब मैं चाहता हूँ कि आप भी उस शिक्षा का लाभ उठाएं। पुस्तकों की कीमत देखते हुए यह संशय या संकोच मन में न पालें कि कीमत ज्यादा है। अगर आर्थिक विकास का ज्ञान चंद रुपयों में मिल जाए और आपकी और आपके आनेवाली पीढ़ी की जिंदगियां संवर जाए तो उस ज्ञान को प्राप्त करने की कीमत देने में कंजूसी करना मूर्खता होगी। मैं भी तो पहले पुस्तकें खरीद कर उन्हें आगे बेच रहा हूँ और यह रिस्क उठा रहा हूँ। मैंने अपना समय पहले इंग्लिश सीखने में दिया और फिर पुस्तकें पढ़ने और व्यवसाय में। मुझे तो सफलता ही मिली है। अब मेरा यह ज्ञान और डॉ अम्बेडकर का सपना मैं सब तक ले जाना चाहताा हूँ। आप यह ध्यान रखें कि मैं हिन्दीभाषी क्षेत्र में वह पहला व्यक्ति हूँ जो यह कदम उठा रहा है कि आप तक यह शिक्षा पहुंचा रहा है। यह पुस्तकें वैसे तो हिंदी भाषा में वर्षों से प्रकाशित हो चुकी है परन्तु लोगों को इनकी और इनके भीतर लिखे ज्ञान की जानकारी मैं इस प्रकार पहली बार दे रहा हूँ।

आप अधिक-से-अधिक इन्हें खरीदें और स्वयं पढ़ने के साथ-साथ मित्रों को भी इन्हें भेंट करें। इससे एक तो आप और आपके साथ के लोग इस शिक्षा से विकसित होंगे और साथ-ही-साथ मेरा व्यापार बढ़ने से मैं और भी ऐसे लोगों तक इस शिक्षा को पहुंचाउंगा जिन तक इंटरनेट नहीं पहुँच पाता या जो पुस्तकें नहीं खरीद पाते। पर वह सब तब ही हो पाएगा जब आप एक बार यह पुस्तकें खरीदेंगे। पुस्तकें मुझ से ही से खरीदे क्योंकि मैं ही इस मुहीम को शुरू कर रहा हूँ और इस मुहीम के आर्थिक लाभ का सही हकदार हूँ। दूसरे विक्रेताओं के लिए यह पुस्तकें मात्र हैं परन्तु मेरी लिए लोगों की जिंदगियां संवारने का माध्यम और मेरे जीवन का एक ध्येय। तो आज ही पुस्तकें सीधे हमारे वेबसाईट पर जा कर आर्डर करें। पेमेंट आप ऑनलाईन बैंकिंग, डेबिट कार्ड अथवा क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। अथवा बैंक में रूपये जमा करवाने के लिए इस नंबर पर फोन करे – 8527533051. हम पुस्तकें भारत में कहीं भी डाक द्वारा भेज देंगे।

तो इस मुहीम का हिस्सा बनिए और डॉ अम्बेडकर की सोच को आगे बढ़ाने और भारत को एक स्वावलम्बी और स्वतन्त्र भारत बनाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा यह पुस्तकें लोगों को भेंट करें।  आज के दौर में आर्थिक निर्भरता गुलामी से भी बदतर है।  आर्थिक स्वतंत्रता केवल और केवल व्यवसाय और निवेश देता है। एक व्यवसायी बनाना कोई मुश्किल नहीं है। भारत में ही सर पर टोकरा रख कर सामान बेचने वाले या पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले बड़े-बड़े व्यवसायी और निवेशक बन गए है। जरुरी नहीं है कि आपके पास कोई पैतृक खजाना हो। अमरीका में सड़क पर सब्जी बेचनेवाला आज अमरीका के सबसे बड़े खाने के स्टोर्स का मालिक है। तो अब आप ज्यादा इन्तजार नहीं करिए और तुरंत इन पुस्तकों को खरीद कर पढ़ डालिए।

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NIKHIL Sablania

 

1-11-2014

ग्रामीण छात्र को भाया डॉ भीमराव अम्बेडकर का सन्देश: कहा व्यवसायी बनूंगा

 

मुझे यह बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि कल रांची के आदिवासी क्षेत्र के एक छात्र ने हमारी व्यवसाय और निवेश की शिक्षा देने वाली सात पुस्तकों का सैट खरीदा। जो बात खुश करनेवाली है वह यह है कि उन्होंने डॉ भीमराव अम्बेडकर के उस सन्देश पर चलते हुए हमारी यह पुस्तकें खरीदी जिसमें कि डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि मेरी दिलाई सुविधाएं आज हैं पर कल नहीं होंगी, इसके लिए हमें आत्मनिर्भर बनाने की जरुरत है। रांची के छात्र ने जब हमें फोन किया तो यह कहा कि वह डॉ अम्बेडकर की इस सोच पर चलना चाहते हैं। वह नौकरी के सहारे मुहताज न रह कर व्यवसायी बनाना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि वह अपने पैरों पर खड़े हों जिससे कि अपने परिवार और समाज को भी कुछ दे सकें। जब उन्होंने पहली बार मुझे फोन किया तो उनके पास पुस्तकों को खरीदने के पूरे पैसे भी नहीं थे। पर एक हफ्ते में उन्होंने और रूपये जोड़े और पुस्तकें खरीद लीं। उनकी यह सोच प्रशंसनीय है। इस सोच से न केवल उन्होंने मेरा ही उत्साहवर्धन किया बल्कि मुझे विशवास है कि वह एक दिन सफल व्यवसायी और फिर निवेशक भी जरूर बनेंगे। आनेवाले समय में मैं जिस तरह भी हो सका उनका मार्गदर्शन करता रहूंगा।

प्रिय मित्रों, आपमें से बहुत से लोग डॉ अम्बेडकर पुस्तकालय, बौद्ध फेडरेशन आदि कुछ-न-कुछ संस्था चलाते हैं। यदि आप अपनी संस्थान के लोगों तक भी यह विचार पहुंचाएं कि अब हमें आगे बढ़ते हुए केवल नौकरियाँ ही नहीं बल्कि व्यवसाय और निवेश की तरफ भी अपना रुख लेना चाहिए और डॉ अम्बेडकर के उस विचार को आगे बढ़ाना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था कि मेरी दिलाई सुविधाएं आज हैं पर कल नहीं होंगी और हमें आनेवाले समय के लिए आत्मनिर्भर बनना होगा, तो इससे समाज को एक नई राह मिलेगी। भारत में एक तरफ तो एक-दो प्रतिशत की जनसंख्या वाले ऐसे समुदाय जो व्यवसायों से जुड़े हैं वह आर्थिक रूप से इतने मजबूत हैं कि देश की सत्ता बदलने का दम-ख़म रखते हैं। और फिर दूसरी तरफ दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज है जो कि अपनी विशाल जनसंख्या होने पर भी आर्थिक रूप से पिछड़ा है। इसलिए जरूरत है आर्थिक रूप से उठने की। आर्थिक रूप से हम तब ही उठ सकते हैं जब तक कि हम व्यवसाय और निवेश में अपने पैर न जमा लें।

यह सच है कि हमारे पास न केवल धन की ही कमी है, बल्कि हमारे पास व्यवसाय और निवेश की कोई शिक्षा भी नहीं है। पिछले सत्तर सालों में हमारे पूर्वजों ने नौकरी को ही रोजी-रोटी का साधन बनाया और व्यवसाय व निवेश से और दूर हो गए। व्यवसाय और निवेश की शिक्षा के अभाव में जब हम इन क्षेत्रों में कदम रखते हैं तो अनुभवहीनता और व्यवसाय और निवेश की शिक्षा न होने के कारण असफल हो जाते हैं। अकसर यह कहा जाता है कि पैसे से ही पैसा बनता है। परन्तु यह बात पूरी तरह सही नहीं है। पैसा शिक्षा से भी बनता है। यदि किसी को वयवसाय और निवेश की सही शिक्षा मिल जाती है तो उसके प्रयास सही और सटीक होते हैं। ऐसे में उसे वह अनुभव प्राप्त होता है जो कि उसे आगे भी सफल बनाता है। व्यवसाय और निवेश की शिक्षा के अभाव में उसके प्रयास निरंतर असफल होते हैं और वह ऐसे अनुभव पाता है जिससे उसे निराशा हाथ लगती है। इसलिए अक्सर लोग वयवसाय में हाथ डालने से कतराते हैं या निवेश में असफल हो जाते हैं।

परन्तु हमने यह प्रण उठाया है कि हम आपको सही शिक्षा और मार्ग दें। हमने जो सात पुस्तकें आपके लिए चुनी हैं उनका मैं खुद दो सालों से अध्यन्न कर चुका हूँ और उनकी शिक्षा न केवल अपने काम धंधों में ही लगाता हूँ बल्कि और लोगों को भी आज व्यवसाय और निवेश सम्बन्धी शिक्षा देता हूँ। यह सात पुस्तकें अमरीका के उन लेखकों द्वारा लिखी गई हैं जो न केवल लेखक ही हैं बल्कि सफल व्यवसायी और अरबपति दौलतमंद भी हैं। यह सात पुस्तकें न्यूयार्क में सर्वाधिक बिकनेवाली पुस्तकों की श्रेणी (न्यूयार्क बेस्ट सेलर्स) में रह चुकी हैं। इनके प्रमुख लेखक का इस साल दिल्ली और बेंगलोर में सेमीनार था जिसमें पांच हजार रूपये की फीस देकर बहुत से लोगों ने यह शिक्षा ग्रहण की। मैंने भी ऐसे सेमीनार रखने का निश्चय किया है जिससे कि मैं आपसे रूबरू हो कर और अच्छे से यह शिक्षा दे सकूं और अपने अनुभव बता सकूं। सेमीनार के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं। परन्तु तब तक आप यदि हमारी सात पुस्तकों का अध्यन्न कर लें तो आपको व्यवसाय और निवेश की शिक्षा आसानी से मिल जाएगी और आप जब भी कोई व्यवसाय या निवेश करेंगे तो यह शिक्षा पाने से आपके ज्ञान के चक्षु कुछ इस प्रकार खुल जाएंगे कि आप न केवल हार ही न मानेंगे बल्कि सफल भी रहेंगे।

हमारी सात पुस्तकें सरल हिंदी में लिखी हैं। आप न केवल इन्हें स्वयं ही पढ़ सकते हैं बल्कि उपहार के रूप में किसी को भेंट भी कर सकते हैं। किसी भी उम्र के कोई भी हो, सभी के लिए यह पुस्तकें हैं। व्यवसाय चाहे करें या न करें निवेश तो आपको किसी न किसी रूप में एक दिन करना ही पड़ेगा। कोई प्रॉपर्टी खरीदनी हो, किसी बैंक की स्कीम में रूपये लगाने हों या और किसी भी रूप में कैसे अपने रूपये को लगाना है या नहीं लगाना है, इसका निर्णय तो आपको कई बार लेना ही पड़ेगा। इसके लिए जरूरी है कि आप व्यवसाय और निवेश की शिक्षा पहले से ले लें।

आपको यदि डॉ अम्बेडकर के विचार और कार्यों को आगे बढ़ाना हैं तो आपको एक-न-एक दिन आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा। आप यदि बाबा साहिब अम्बेडकर के सच्चे अनुयायी हैं तो आपको एक-न-एक दिन नौकरी लेनेवाला नहीं बल्कि नौकरी देनेवाला बनाना पड़ेगा। जब भारत सरकार ने एक समुदाय के किसी भवन को क्षति पहुंचाई और फिर यह पेशकश रखी कि वह सरकारी खर्चे से क्षतिग्रस्त भवन को ठीक करवा देंगे तो उस समुदाय के लोगों ने सरकार की पेशकश ठुकरा दी और स्वयं ही अपने भवन को न केवल ठीक ही किया बल्कि और भवनों का भी निर्माण खुद के रुपयों से किया। ऐसा वे इसलिए कर पाए क्योंकि उस समुदाय के अधिकांश्तर लोग व्यवसाय और निवेश से जुड़े हैं। ऐसे ही आज आपको दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज को अग्रसर करना है। आपको डॉ अम्बेडकर का कार्य पूरा करना है कि समाज को आगे बढ़ाना है। आपके पास ज्यादा समय नहीं है। आप भूल जाइए कि नौकरी जैसी कोई चीज़ है। आप निश्चय करें कि आप भी एक दिन अम्बानी या टाटा की तरह बड़े व्यवसायी और निवेशक बनेंगे। इस निश्चय के साथ कार्य करिए। आप सौ प्रतिशत नहीं तो पचास प्रतिशत तो सफल जरूर होंगे। उतनी सफलता भी एक बहुत बड़ी सफलता होगी।

इसी के साथ मैं अपना यह लेख यहीं रोकता हूँ और यह आशा करता हूँ कि आप न केवल यह पुस्तकें खरीद कर पढ़ेंगे और भेंट करेंगे बल्कि डॉ अम्बेडकर का यह सन्देश भी आगे बढ़ांएगे कि अब आपको आत्मनिर्भर बनना है। आपको पानी के बुलबुले नहीं बल्कि सुनामी की लहर बनना है। वह लहर जो शक्तिशाली होती है। वह लहर जिसके आगे कोई नहीं टिक पाता। आपको अपने निश्चय और कार्य में ऐसी लहर बनना है जो कि मजबूत हो और विशाल हो। तो बढ़िए आगे और व्यवसाय और निवेश की शिक्षा लेकर आप खुद को एक ऐसी ही सुनामी की लहर बनाईए। – जय भीम। – निखिल सबलानिया

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सभी भारतवासियों को धम्म क्रांति दिवस 14-oct की हार्दिक शुभकामनायें,आज ही के दिन बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने भारत के मूलनिवासी बहुजन समाज को अपने खुद के बौद्ध धम्म में वापस लौटने की क्रांति की थी| ( मूल लेख :डॉ. अम्बेडकर का मत परिवर्तन और बौद्ध धर्म…विजय कुमार)

nagpur-deekshaवर्तमान भारत में जब-जब भगवान बुद्ध को स्मरण किया जाता है, तब-तब स्वाभाविक रूप से बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर का भी नाम लिया जाता है। क्योंकि स्वतंत्रता के बाद बहुत बड़ी संख्या में एक साथ डा0 अम्बेडकर के नेतृत्व में ही मत परिवर्तन हुआ था। 14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में यह दीक्षा सम्पन्न हुई।

दीक्षा विधि की विस्तृत योजना तैयार करने वाले उनके सहकारी वामनराव गोडबोले के अनुसार बाबा साहब ने सुबह से ही तैयारी की। उन्होंने दिल्ली से मंगाया सफेद लम्बा कोट, सफेद रेशमी कुरता और कोयम्बटूर से मंगायी सफेद धोती पहनी। पैर में बिना फीते वाला जूता पहना। इस प्रक्रिया में उनकी पत्नी डा0 सविता अम्बेडकर (माईसाहब) और रत्ताू ने उनकी सहायता की। इसके बाद वे विशेष रूप से बनाये गये दीक्षा स्थान पर गये।

बाबा साहब श्याम होटल में ठहरे थे। वहां से निकलने से पहले अपने सहयोगी गोडबोले को उन्होंने कहा कि आज जो कुछ होने जा रहा है, यह मेरे पिताजी के कारण ही संभव हो पा रहा है। वे बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने ही मेरा धार्मिक मानस बनाया है। इसलिए दीक्षा से पूर्व सबको उन्हें श्रध्दांजलि देनी चाहिए। गोडबोले की सूचना पर सबने दो मिनट मौन खड़े होकर स्व0 रामजी सकपाल को श्रध्दांजलि दी।

दीक्षा विधि प्रारम्भ होने पर सर्वप्रथम उन्होंने और माई साहब ने मत परिवर्तन किया। उन्होंने तत्कालीन भारत के वयोवृद्ध भन्ते चंद्रमणि से बौद्ध मत का अनुग्रह पाली भाषा में लिया। बाबासाहब हिन्दू और बौद्ध मत को एक वृक्ष की दो शाखा मानते थे। उनके मन में हिन्दू धर्म के प्रति कितना प्रेम था, यह इस बात से प्रकट होता है कि जब उन्होंने यह कहा कि आज से मैं हिन्दू धर्म का परित्याग करता हूं, तो उनके नेत्र और कंठ भर आये। यह कार्यक्रम 15 मिनट में पूरा हो गया। इसके बाद महाबोधि सोयायटी ऑफ इंडिया के सचिव श्री वली सिन्हा ने उन दोनों को भगवान बुद्ध की धर्मचक्र प्रवर्तक की मुद्रा भेंट की, जो सारनाथ की मूर्ति की प्रतिकृति थी।

इसके बाद बाबा साहब ने जनता को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब आपमें से जो भी बौद्ध धर्म ग्रहण करना चाहें, वे हाथ जोड़कर खड़े हो जाएं। लगभग पचास-साठ हजार लोग खड़े हो गये। मंचस्थ लोग भी इसी मुद्रा में खड़े हुए। बाबा साहब ने उन्हें 22 शपथ दिलाईं, जो उन्होंने स्वयं तैयार की थीं। इस प्रकार दो घंटे में यह पूरा कार्यक्रम सम्पन्न हो गया।

बाबा साहब को आशा थी कि केवल हिन्दू ही उनके साथ मत परिवर्तन करेंगे; पर कुछ मुसलमान और ईसाइयों ने भी बौद्ध मत ग्रहण किया। जब बाबा साहब के ध्यान में यह आया, तो उन्होंने कहा कि हमें अपनी प्रतिज्ञाओं में कुछ बदल करना होगा, क्योंकि उनमें हिन्दू देवी-देवताओं और अवतारों को न मानने की ही बात कही थी। यदि मुस्लिम और ईसाई बौद्ध बनना चाहते हैं, तो उन्हें मोहम्मद और ईसा को अवतार मानने की धारणा छोड़नी होगी। यद्यपि यह काम नहीं हो पाया, क्योंकि इस समारोह के डेढ़ माह बाद छह दिसम्बर, 1956 को बाबा साहब का देहांत हो गया।

यह धर्म परिवर्तन था या मत परिवर्तन, यह बहस का विषय हो सकता है; पर डा0 अम्बेडकर ने इसे धर्म परिवर्तन ही कहा है। उन्होंने स्वीकार किया है कि सबसे पहले 13 अक्तूबर 1935 को येवला में जब उन्होंने धर्म परिवर्तन की घोषणा की, तो उनसे अनेक लोगों ने सम्पर्क किया। इनमें सिख पंथ के लोग थे, तो आगा खां व निजाम जैसे मुस्लिम व ईसाई मजहब वाले भी।

निजाम हैदराबाद ने पत्र लिखकर उन्हें प्रचुर धन सम्पदा का प्रलोभन तथा मुसलमान बनने वालों की शैक्षिक व आर्थिक आवश्यकताओं की यथासंभव पूर्ति की बात कही, तो ईसाइयों ने भी ऐसे ही आश्वासन दिये; पर डा0 अम्बेडकर का स्पष्ट विचार था कि इस्लाम और ईसाई विदेशी मजहब हैं। इनमें जाने से अस्पृश्य लोग अराष्ट्रीय हो जाएंगे। यदि वे मुसलमान होते, तो मुस्लिमों की संख्या भारत में दोगुनी हो जाती तथा देश में उनका वर्चस्व बढ़ जाता। यदि वे ईसाई बनते, तो उनकी संख्या पांच-छह करोड़ हो जाने से ब्रिटिश सत्ताा की पकड़ मजबूत हो जाती। इस कारण बाबा साहब इन मजहबों में जाने के विरुद्ध थे।

दूसरी ओर वे भारत भूमि में जन्मे तथा यहां की संस्कृति में रचे बसे सिख पंथ के समर्थक थे। एक समय तो उन्होंने अपने समर्थकों सहित सिख बनने का निर्णय कर ही लिया था। अप्रैल 1936 में अमृतसर के गुरुद्वारे में एक सभा हुई, जिसमें डा0 अम्बेडकर सिख वेश में उपस्थित थे। 18 जून, 1936 को बाबासाहब की हिन्दू महासभा के एक बड़े नेता डा0 मुंजे से भेंट हुई। इसके बाद डा0 मुंजे 22 जून को मुंबई गये, जहां उन्होंने बाबासाहब के इस निर्णय को हिन्दू समाज का समर्थन दिलाने का प्रयास किया।

इससे हिन्दू सभा के नेता बैरिस्टर जयकर, सेठ जुगलकिशोर बिड़ला, विजय राघवाचारियर, राजा नरेन्द्रनाथ तथा शंकराचार्य जैसे लोग उनके समर्थन में आये; पर किसी कारण से यह योजना स्थगित हो गयी। आगे चलकर डा0 अम्बेडकर के ध्यान में आया कि सिख पंथ भी जातिभेद से पीड़ित है। अत: उन्होंने सिख बनने का विचार त्याग दिया।

अब बाबासाहब ने जातिभेद से मुक्त बौद्ध मत की ओर ध्यान दिया। 1935 से 1956 तक की उनकी यात्रा इसी ओर संकेत करती है। उन्होंने इटली के भिक्खु सालाडोर सहित अनेक बौद्ध भिक्खुओं से चर्चा की। रैशनलिस्ट एसोसिएशन, मद्रास के कार्यक्रम में उन्होेंने 1944 में ‘बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म’ विषय पर भाषण दिया। 1948 में अपने प्रसिद्ध एवं बहुचर्चित ग्रंथ ‘हू वर शूद्राज’ में उन्होेंने भगवान बुद्ध को भी शूद्र बताया। जनवरी 1950 में उन्होंने बुद्ध जयंती सार्वजनिक रूप से मनायी। 1950 में महाबोधि सोसायटी के मुखपत्र में उन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में अपने विचार व्यक्त किये। 5 मई, 1950 को ‘जनता’ समाचार पत्र में उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति अपने झुकाव को अधिकृत रूप से घोषित किया।

इसी मास में श्रीलंका में आयोजित बौद्ध धर्म परिषद में वे निरीक्षक के नाते उपस्थित रहे तथा वहां के अस्पृश्यों को बौद्ध मत ग्रहण करने का आह्नान किया। जुलाई 1950 में वरली में बुद्ध मंदिर के उद्धाटन के समय उन्होंने अपना शेष जीवन भगवान बुद्ध की सेवा में समर्पित करने की घोषणा की। 1954 में विश्व बौद्ध परिषद के तृतीय अधिवेशन में में रंगून (बर्मा) गये। वहां उन्होंने श्रीलंका और बर्मा के अपने अनुभव के आधार पर बौद्ध धर्म में ऊपरी तामझाम और समारोहप्रियता की आलोचना की। उन्होंने इस पर होने वाले व्यय को धर्मप्रचार पर करने को कहा।

1955 में उन्होंने मुंबई में ‘भारतीय बौद्धजन सभा’ की स्थापना की। दीक्षा लेने के बाद इस संस्था का नाम ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ हो गया। मार्च 1956 में अश्वघोष रचित ‘बुद्ध चरित’ पर आधारित उनका ‘दि बुद्ध एंड हिज धम्म’ नामक ग्रंथ प्रकाशित हुआ। मई 1956 में बी.बी.सी लंदन से उनका बौद्ध धर्म पर व्याख्यान प्रसारित हुआ। स्पष्ट है कि वे धीरे-धीरे इस ओर आकृष्ट हो रहे थे।

बाबा साहब ने बौद्ध मत को तत्कालीन प्रचलित परम्पराओं के बदले उसके संशोधित रूप में स्वीकार किया। ‘दि बुद्ध एंड हिज द्दम्म’ तथा 1951 से 1956 के उनके भाषणों से यह प्रकट होता है। भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण्ा से पूर्व अपने शिष्य आनंद को अपनी बुध्दि और सत्य की शरण में जाने को कहा था। बाबा साहब ने भी धर्मान्तरण से काफी समय पूर्व अपने अनुयायियों को कहा था कि मैं आपसे बौद्ध धर्म में आने का आग्रह तो करता हूं; पर इससे आपस में फूट नहीं पड़नी चाहिए। जो इसमें आना चाहें, वे केवल भावना के वश होकर नहीं, अपितु विचारपूर्वक इसे ग्रहण करें।

बाबा साहब ने बौद्ध धर्म में प्रचलित चमत्कार व कथाओं को नहीं माना। 29 वर्ष की अवस्था में सिध्दार्थ के गृहत्याग के बारे में कहा जाता है कि एक वृद्ध, एक बीमार और एक मृतक को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। बाबा साहब का मत था कि इस अवस्था तक यह संभव नहीं कि उन्होंने कभी वृद्ध, बीमार या मृतक को न देखा हो। इसी प्रकार उन्होंने चार आर्य सत्यों को बौद्ध धर्म की मूल मान्यताओं के विपरीत बताते हुए कहा है कि ये भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित नहीं हैं। यदि जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म सब दुख है, तो फिर मनुष्य की आशा नष्ट हो जाती है और व्यक्ति निराशावादी बनता है। इसलिए अपने ग्रंथ में उन्होंने इन चारों का उल्लेख नहीं किया।

बाबा साहब बौद्ध धर्म की वर्तमान संघ व्यवस्था के भी समर्थक नहीं थे। इसलिए उन्होंने दीक्षा के समय ‘संघ शरणं गच्छामि’ नहीं कहा। विश्व में बौद्ध मत में हीनयान और महायान नामक दो पंथ मुख्यत: प्रचलित हैं। बाबा साहब ने इन दोनों को यथारूप में स्वीकार नहीं किया। इस विषय में श्री माडखोलकर ने उनसे पूछा कि तब क्या आपके पंथ को भीमयान कहें ? बाबा साहब ने हंसते हुए कहा कि चाहे तो आप इसे नवयान कहें; पर मैं इसे भीमयान कहकर स्वयं को भगवान के बराबर खड़ा नहीं कर सकता। मैं तो एक छोटा आदमी हूं। मैंने संसार को नया विचार नहीं दिया। हां, भगवान द्वारा प्रवर्तित धर्मचक्र जो पिछले हजार साल से इस देश में रुका हुआ था, मैंने केवल उसे पुन: प्रवर्तित किया है।

बाबा साहब का मत था कि बौद्ध धर्म अंतरराष्ट्रीय होने के बाद भी हर देश में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उसमें कुछ प्रथाएं जुड़ गयी हैं। ऐसी प्रथाएं सारे विश्व में एक समान हों, यह आवश्यक नहीं। उदाहरणार्थ तिब्बत में किसी व्यक्ति के मरने पर लामा उसके शव के टुकड़े कर उन्हें मसलकर गोले बनाकर ऊपर फेंकते हैं, जिससे गिद्ध उन्हें खा जाएं; पर भारत में यह परम्परा चलाना संभव नहीं है। बाबा साहब ने बौद्ध धर्म में दीक्षा विधि प्रारम्भ की, जबकि इसका प्रतिपादन भी भगवान बुद्ध ने नहीं किया तथा यह बौद्धधर्मी अन्य देशों में प्रचलित नहीं है।

उनका मत था कि एक समय पूरा भारत बौद्धधर्मी हो गया था; पर जब शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता पुनर्स्थापित की, तो सारे बौद्ध फिर हिन्दू बन गये। बाबा साहब के अनुसार बौद्ध धर्म में कोई दीक्षा विधि न होने के कारण बौद्ध बने लोगों ने हिन्दू देवी-देवता, पर्व, त्यौहार आदि को मानना नहीं छोड़ा। हिन्दुओं ने भी बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार मान कर अपने धर्म में समाविष्ट कर लिया।

उनका कहना था यदि ऐसा न किया, तो हो सकता है कि हिन्दू मुझे विष्णु का 11वां अवतार कह कर हमारे लोगों को फिर हिन्दू बना देंगे। इसलिए उन्होंने दीक्षा विधि की कठोर प्रतिज्ञाओं में हिन्दू देवी-देवताओं को न मानने को प्रमुखता से समाविष्ट किया। वे बौद्ध विद्वान, प्रवचनकार और शास्त्रार्थ करने वाले तैयार करना चाहते थे; पर समयाभाव के कारण यह संभव नहीं हो पाया।

यहां यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बाबा साहब के इस कार्य से देश और हिन्दू धर्म को क्या लाभ हुआ ? इसके उत्तार में यही कहा जा सकता है कि बौद्ध मत भारत की मिट्टी से उपजा होने के कारण बौद्ध लोगों की निष्ठा कभी देश से बाहर नहीं हो सकती, जबकि मुस्लिम और ईसाई मजहब के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए बाबा साहब का देश और हिन्दू समाज पर बहुत बड़ा उपकार है। उन्होंने समाज के निर्धन, निर्बल और वंचित वर्ग के लिए एक ‘सेफ्टी वाल्व’ बना दिया, इसके न होने पर उनमें से अनेक लोग धन, शिक्षा या नौकरी आदि के लालच में मुस्लिम या ईसाई बन सकते थे।

इस मत परिवर्तन से हिन्दू समाज के कई बड़े नेताओं ने अपने व्यवहार में परिवर्तन किया। बाबासाहब द्वारा धर्मान्तरण की घोषणा के बाद मैसूर शासन ने राजाज्ञा द्वारा अस्पृश्यों को दशहरा दरबार में आने की अनुमति दी। त्रावणकोर शासन ने भी अपने अधिकार के 30,000 मंदिरों को सबके लिए खोल दिया।

डॉ. अम्बेडकर का मत परिवर्तन और बौद्ध धर्म

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर – 6, नई दिल्ली – 110022
नोट: यहाँ बौद्ध धम्म को धर्म कहकर इसलिए सम्भोदित किया जा रहा है क्योंकि ये लेख जिन्होंने जिखा है वो इसे धर्म की समझते समझाते होंगे| आप ध्यान रखे हमारा भला धम्म से होगा धर्म से नहीं|
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डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं. ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं.इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म,जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है. प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:

  1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
  4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
  5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
  6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
  7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
  8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
  9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
  10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
  11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
  12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
  13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
  14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
  15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
  16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
  17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
  18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
  19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
  20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
  21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
  22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.

8-OCT-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: ”ब्राह्मणवादी वर्ण व्यस्था” शोषितों की क्रांति रोकने वाला औज़ार है

varn vyastahहे मानवतावादियों आज की धम्म देशना में हम ब्राह्मणवाद के सबसे घातक हतियार वर्णव्यस्था के बारे में चर्चा करेंगे, इस चर्चा की शुरुवात हे मानवतावादियों आज की धम्म देशना में हम ब्राह्मणवाद के सबसे घातक हतियार वर्णव्यस्था के बारे में चर्चा करेंगे, इस चर्चा की शुरुवात के निम्न शब्दों से करते हैं  के निम्न शब्दों से करते हैं  डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहा है की “हिन्दू सोसायटी उस बहुमंजिली मीनार कि तरह है जिसमे प्रवेश करने के लिए न कोई सीढ़ी है न दरवाजा। जो जिस मजिल में पैदा हो जाता है उसे उसी मंजिल में मरना होता है .”

जो लोग मानते हैं की वर्ण व्यस्था और जातिवाद ख़त्म हो गया होता उन्होंने आज के समय के चलन पर गौर नहीं किया है| बचपन से लेकर लगभग पच्चीस तीस साल तक अमूमन लोग मानवतावादी होते हैं सबसे घुलते मिलते हैं, और उनके आस पास का संसार खुशनुमा होता है| पर जैसे जैसे उम्र बढ़ती है लोग अपनी जाती और अपने धर्म के प्रति कट्टर होते जाते हैं, कट्टर वही लोग होते हैं जो अपने अपने धर्म और अपनी जाती के इतिहास को जानते जाते हैं| इसके बाद होता है वो दौर शुरू जब लोग इंसानों को अपने और परायों में बांटते हैं और इसी प्रकार का व्याहार करते हैं , मतलबपन और कौमी कट्टरवाद के चलत्ते स्वभाविक मिलनसारिता खत्म हो जाती है, परिणामस्वरूप सभी दुखी  हो जाते हैं| अब आप ही सोचिये की क्या देता है आपको जातिवाद और धर्म, आपकी इंसानियत और ख़ुशी छीन कर आपको ब्राह्मणवादी बना डालता है| असल बौद्ध धम्म इन्हीं धर्म और जाती की दीवारों की तोड़कर वापस मानवता में लौटने का आग्रह करता है| अपनी ग़लतफ़हमी ठीक करो और ‘बौद्ध धम्म’ को बौद्ध धर्म न समझो,किस भी धर्म में आपकी कुछ नहीं मिलेगा| याद रहे धर्म नहीं धम्म.

सभी लोग जानते हैं की ब्राह्मणवादी वर्णव्यस्था और जातिवाद के सताए हुए बौद्ध लोगों ने ही इस्लाम ईसाइयत सिख  आदि  अन्ये धर्मों में शरण ली| अपना पूरा इतिहास खंगालने के बाद डॉ आंबेडकर ने वपर अपने खुद के बौद्ध धम्म में ही जाना स्वीकार किया

ब्राह्मणवादी वर्ण व्यस्था  में  समस्त मानवता को   को चार विभाग में बांटा -ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वेश्य और शुद्र  प्रश्न उठता है ब्राह्मण कौन?या शुद्र कौन? जब से मानव सभ्य हुआ है तब के केवल दो ही वर्ग रहे हैं एक अमीर और एक गरीब, इन्हीं दोनों वर्गों में संगर्ष रहा है जिसके परिणाम स्वरुप कभी किसी की सत्ता आती है कभी किसी की| धूर्त और षडियंत्रकारी ने ब्राह्मणवादियों ने बुद्धि का इस्तेमाल किया और अपनी सत्ता सुनिश्चित करने हेतु दो वर्गों को चार वर्गों में बदल दिया जो हैं ब्राह्मण, क्षत्रिये, बनिया और शूद्र| इससे हुआ ये की ब्राह्मणवाद के खिलाफत करने के लिए तीन वर्गों को एक साथ आना पड़ेगा जो कभी हुआ नहीं| खुशहाल बनने के लिए आपके पास  होना चाहिए -ज्ञान और धन, ये दोनों इन चारो वर्गों में जिसके पास हैं वो हैं ब्राह्मण और बनिया ये दोनों वर्ग तो कभी विद्रोह नहीं करेंगे| इन दोनों के आलावा बचे वर्ण हैं क्षत्रिय और शूद्र ,आम जनता के इन दोनों वर्गों से विद्रोह हो सकता हैं इसलिए केवल इन्हीं दोनों वर्णों को जातियों में बाँट दिया|जातियों के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अंतर्जातीय विवाह के चलन पर जोर और जाती से बहार विवाह पर जबरदस्त रोक लगाई राखी गई| इतना ही नहीं आम जनता की इन जातियों में से जो भी ब्राह्मणवाद के पक्ष में हैं उसको धर्म की रक्षा के लिए उसकी जान लेने के लिए उसे क्षत्रिये बना दिया और जो विपक्ष में है उसे शूद्र बना कर आभाव और घृणा का पात्र बना दिया|अब अगर कोई जाती विद्रोह करती है तो ये दूसरी जाती को अपना रक्षक बनाकर उसके सामने खड़ा कर देते हैं, इसमें मारने और मरने वाला दोनों बहुजन होते हैं|यकीन न हो तो समाज में देखो पूरे ब्राह्मण और बनिया वर्ग में आपस में एकता है और रोटी बेटी का सम्बंद है जबकि बाकि के दोनों वर्णों में जातिगत फुट है| वर्ण व्यस्था और जातिवाद जितना कमजोर होगा भारत और भारतवासी जनताdalit bhangi  and khateek history rewritten उतनी सुखी होगी और ये जितने शक्तिशाली होगे ब्राह्मणवादी उतना ही शक्तिशाली होगा और जनता उतनी ही कमजोर होती जाएगी|इसीलिए डॉ आंबेडकर ने भारतीय संविधान में किसी को किसी भी जाती में विवाह करने की छूट दी है ताकि देश मजबूत हो और ब्राह्मण बनियों द्वारा देश के संसाधनों पर मोनोपोली खत्म होकर जनता के हाथ भी कुछ संसाधन पहुंचे| यकीन न हो तो अपने परदादा और अपनी आर्थिक स्तिथि की तुलना कर के देख लो|बहुत+जनता =बहुजन हित में गौतम बुद्ध से लेकर डॉ अम्बेडकर तक सभी ने मेहनत की पर जनता इनसे घृणा करती है और धर्म से प्यार तो जनता संविधान के नहीं धर्म के पक्ष में है और दुःख भुगत रही है|ध्यान रहे धर्म सदियों चलने वाली राजनीती के आलावा कुछ नहीं, यही है वो सत्य जो गौतम बुद्ध ने खोज निकला था और बहुजन हित और बहुजन सुख की व्यस्था के निर्माण हेतु बौद्ध धम्म की स्थापना की, जिसे हम धर्म समझने की ग़लतफ़हमी में जानना ही नहीं चाहते|

वर्णव्यस्था में शूद्र और क्षत्रिये इन दो वर्णों में जश्न को अपग्रेड या डाउनग्रेड  किया जाता है, ये सदियों चलने वाली प्रक्रिया है| उदाहरण के लिए अभी हाल ही में अम्बेड्करवादी और संगर्शील  जागरूक जातियां खटीक भंगी  और चमार को शूद्र वर्ण से निकालकर क्षत्रिये वर्ण में उनका इतहास बदल कर डाला जा रहा है|

 

दुनिया के हर देश में दलित होते हैं किसी न किसी रूप में| क्या  आपने सोचा की कोई कौम दलित कैसे बनती है ? इसका सीधा सा जवाब है की जो कौम  युद्ध हार जाती है या जो कौम अपने मन वचन और कर्म से युद्ध की तैयारी छोड़ देते हैं वो दलित बन जाते हैं| सदा ध्यान रहे युद्ध सबसे बड़ा सत्य है इसे नज़रअंदाज़ करने से दलित बनने की शुरुआत होती है |किसी भी युद्ध की जीत हार का फैसला तीन बातों से होता है  टेक्नोलॉजी,  नीति,  और आपसी विश्वास या सहयोग| जिस कौम में ये तीनों दूसरी से ज्यादा होंगे वो जीत जाएगी| बदलाव चाहिए तो बल प्रयोग करना ही होगा क्योकि  ये जिन्दगी का नियम है की जो जिस गति में हैं उसी गति में रहना चाहता है अगर उसकी गति या दिशा बदलनी है तो किसी बल का प्रयोग करना पड़ता है|केवल एक बड़ी क्रांति का ‘बल’ ही परिस्थिति बदल पता है|

ये तो लगभग सभी समझ गए हैं और पहले भी समझते ही होंगे की कोई क्रांति ही दशा बदल सकती है , पर भारत में क्रांति क्यों नहीं होती  इसका जवाब जानने के लिए  क्रांति को रोकने वाली वर्णव्यस्था पर ओशो के निम्न विचार पढ़ो

” …तो सब लोग तहे दिल से संतुष्ट होंगे, और यही वजह है कि भरत देश में कभी क्रांति नहीं हुई और न ही कभी हो सक्ति है। दुनियां में जिस भी देश में क्रन्ति होति है उस क्रन्ति कि शुरुआत उस देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग करते है, वो असल मे खुद  क्रांति नहीं करते हैं, लेकिन वे इसकी विचारधारा देते है. भारत में ब्राह्मण बुद्धिजीवी वर्ग है, हर क्रांति स्वाभाविक रूप से उसके खिलाफ चली जायेगी , इसलिए वह कभी क्रांति की विचारधारा नहीं दे सकता| वो तो ऐसी विचारधारा देगा जो क्रन्ति के किसी भी सपने को रोक सके| बेशक राजा, योद्धा, क्षत्रिये भी क्रन्ति के पक्ष में नहीं हो सकते हर क्रांति उनके खिलाफ चली जायेगी. वे राज गद्दि से उतार दिये जायेंगे व्यापारी भी क्रांति के पक्ष में नहीं हो सकता क्योंकि सभी क्रांतियां अमीर के खिलाफ होतीं हैं|

गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया वो शहर के बाहर रहता है वो शहर के अंदर नहीं रह सकता. गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है और राजा के पास अपने कुँए है ही।अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है , उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है.

वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है| “इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा” तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं.”

और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथ ‘कुछ और’ भी चाहिए. ये जो ‘कुछ और’ और है यही तो बुद्धि हो जाता है,बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है|लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं| इस सदी में भारत से बाहर केवल दो व्यक्तियों ने मनु की सराहना की है.

एक फ्रेडरिक नीत्शे है, अन्य एडॉल्फ हिटलर है. एडोल्फ हिटलर फ्रेडरिक नीत्शे का एक शिष्य था फ्रेडरिक नीत्शे फ़ासिज़्म के दार्शनिक था: एडोल्फ हिटलर बस नीत्शे की सीख का अभ्यास कर रहा था. रिश्ते बिल्कुल मार्क्स और लेनिन के बीच के रूप में है. मार्क्स दार्शनिक थाजिसने साम्यवाद की पूरी विचारधारा दे दी है, और लेनिन ने उसे साकार किया उसी तरह फ्रेडरिक नीत्शे और एडॉल्फ हिटलर के बीच रिश्ता था. यह एक संयोग नहीं है कि उन दोनों ने भारत में लिखित पुस्तक की सराहना की . दोनों ने इसकी सराहना की क्योंकि दोनों ही देख सकते थे कि  मनु कितना भव्य मास्टर योजनाकार रहा होगा जिसने एक ऐसी व्यवस्थ बना दी जो अभी भी जिंदा है। उसने हजारों साल के लिए क्रांति को रोका, और शायद वह हमेशा के लिए इसे रोका पाएगा. शायद भारत में कभी क्रांति नहीं हो सकती है.”

Source:  Book Title: The Last Testament, Vol. 2. // Chapter 6: The Intelligent Way  http://www.osho.com/library/online-library-revolution-lenin-india-f65a91d0-351.aspx

आपने कभी सोचा की सदियाँ गुज़र गयीं पर वर्णव्यस्था और जातिवाद ख़त्म क्यों नहीं हो रहा| जानते हैं क्यों क्योंकि आप लोग ही इससे प्रेम करते हैं, आपको अष्ष्हरए हुआ , हाँ यही है सच्चाई असल में आप धर्म और ईश्वरवाद के आईडिया या सिद्धांत को प्रेम करते हो  एयर यही धर्म और ईश्वरवाद के आईडिया या सिद्धांत को भेद की खाद है जो वर्णव्यस्था और जातिवाद नमक भेड़िये ने पहन रखी है| यही है सबसे बड़ा सच|

जो भी संसार का इतिहास जानते हैं वो समझ सकते हैं की सारे संसार में जितने भी बड़े युद्ध और नरसंघार हुए उन सबकी जड़ में धर्म और ईश्वर सिद्धांत के नाम पर मानवीय बंटवारा रहा है|धर्म और ईश्वर का सिद्धांत मानवता को उतना नहीं देता जितना ईनको जिन्दा रखने के कीमत मानवता को चुकानी पड़ती है| आप भी गौर करोगे तो जान जाओगे की धर्म और ईश्वर का सिद्धांत इंसानी कमजोरियों जैसे  डर,अज्ञानता,भेड़चाल, आदि  से पैदा होता है और पुरोहित वर्ग को राजनैतिक सरक्षण द्वारा इसी कमजोरी का दोहन करके राजनैतिक लाभ लिया जाता है| धर्म और ईश्वर का सिद्धांत कौमी अहंकार और मान की जगह ले लेता हैं| इसीलिए ऐसे में ये जानते हुए भी की उनका धर्म और ईश्वर का सिद्धांत गलत है फिर भी इसके छोड़ने की बजाये लड़ने मरने को तैयार रहते हैं|पता नहीं आप कुछ समझे या नहीं पर मुझे लगता है आप इतना तो समझ ही सकते हो की धर्म और ईश्वर का सिद्धांत उतना अच्छा नहीं जितना आप इसे समझते आये हो| ज्यादा समझने के लिए इतिहास और धर्म और पांडा पुरोहितवाद की जड़ में जाना होगा|अगर कुछ समझे हो तो धर्म और ईश्वर के सिद्धांत से ज्यादा मानवता को अहमियत दो इसी में सबका भला है|

मैं धर्म की गुलामी के लिए ब्राह्मणों को दोष नहीं देता । ये तो हमको ही लात खाने की आदत पड़ी हुई है वर्ना ब्राह्मणों ने तो अपने धर्म से हमको दूर रखने की पूरी कोशिश की थी ।उन्होंने हमको अपने धार्मिक ग्रंथो को पढने से दूर रखा ।उन्होंने अपने ग्रंथो को सुनने से दूर रखा और ऐसा करने पर कानों में पिघला शीशा डालने की सजा का भी प्रावधान किया ।उन्होंने हमको अपने धर्म के मन्त्र आदि उच्चारित करने से भी दूर रखा और ऐसा करने पर जुबान काटने का भी प्रावधान किया ।उन्होंने हमको अपने मंदिरों से भी दूर रखा ।उन्होंने अपने ग्रंथो में भी लिखा कि ये देवी देवता सिर्फ द्विजों का भला करते हैं ।फिर भी हम वो ही करते हैं जिनको वो मना करते हैं और दोष ब्राह्मणों को देते हैं । लात खाने की हमारी आदत जाती ही नहीं है । इतने सारे प्रतिबन्ध होने के बावजूद भी हमारे धार्मिक गुलाम होने के क्या कारण हैं |डॉ आंबेडकर ने सही कहा है ‘ब्राह्मणवादी शोषण ब्राह्मणों के ज्ञान की वजह से नहीं बल्कि शूद्रों के अज्ञान की  वजग से है ‘

आज देश में जो कुछ भी गलत है उसकी जड़ में ब्राह्मणवाद या मनुवाद की वर्ण व्यस्था और जातिवादी व्यस्था है और जो कुछ भी सही है उसकी जड़ में अम्बेडकरवादी संविधान या धम्म है| उदाहरण के लिए दुनिया का दूसरा आबादी में बड़ा देश जो आज मंगल गृह पर पहुंच गया है, आंबेडकर संविधान से पहले दो हज़ार सालों तक यहाँ कोई अच्छी मानवीय तरक्क़ी नहीं हुई थी, बस हर विदेशी अकर्मणकारी  से हारता रहा| ऐसा क्यों क्या इतनी बड़ी जनसँख्या में में कोई भी प्रतिभावान नहीं था या है| ये बात आप भी समझ सकते हो की ये असंभव है की इतनी बड़ी आबादी में से हम प्रतिभावान वैज्ञानिक, खिलाडी, नीतिज्ञ, कानूनविद आदि न खोज पाये| पर अगर हम केवल तीन प्रतिशत ब्राह्मण में से ही खोजेंगे और बाकि के देश वालों को किसी लायक नहीं समझेंगे तो फिर क्या, मिला तो ठीक नहीं तो देश पीछे| मतलब ये हुआ की भले ही देश की जनसँख्या सवा करोड़ हो पर मूल रूप से केवल दस करोड़ ही है क्योंकि मौके ही नहीं दिए जाते| बाकि कोई अगर एक्लव्ये की तरह मौका ले भी ले तो उसका अंघूठा काट लिया जाता है| तो ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि रखनी की कीमत चुकाते चुकाते भारत देश जो बौद्ध काल में विश्व गुरु था सोने की चिड़िया था, अम्बेडकर संविधान के लागू होने से पहले तक ऐसे दुर्दशा और गर्त में पहुंच गया था की लोग भूखों मरने लगे थे| फिर अम्बेडकर संविधान यानि धम्म के लागू होने के बाद जब प्रतिभाएं केवल ब्राह्मणों में खोजने तक ही सीमित न रही सारे देश में खोजी गयी तो आज भारत मंगल गृह पर पहुंच गया और भारत दिन दूनी रात चौगनी तरक्की कर रहा है|अब भी जो कसर बाकि रही है वो फिर वही ब्राह्मणवाद और जातिवाद की वजह से है| हे भारतवासियों सावधान अब भी ब्राह्मणवादी शरारती तत्व देश को वापस ब्राह्मणवादी अन्धकारी युग में धकेलने पर लगे हुए हैं, अब भी ये लोग अम्बेडकर संविधान को हटा कर मनुविधान लागू करने के लिए माहौल बना रहे हैं जबरदस्त षडियंत्र और संगर्ष कर रहे हैं|

 

…समयबुद्धा