पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ?…बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

nalandaruins1तमिलनाडु में खुदाई में मिला प्राचीन बौद्ध स्मारक -दैनिक भास्कर
बिहार के केसरिया में खुदाई में मिला दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप
मध्यप्रदेश में खुदाई में मिली बुद्ध की विशाल मूर्ती
केरल में खुदाई से प्राप्त हुआ विशाल बुद्ध विहार के अवशेष…….

पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ? खुदाई में अति प्राचीन कोई ब्राह्मण मंदिर अथवा 33 करोड़ देवताओं में से किसी एक की भी कोई विशाल प्रतिमा क्यूँ नहीं प्राप्त होती ? क्या बड़े बड़े बौद्ध मंदिर बौद्ध स्तूप बौद्ध विहार विशाल बौद्ध शिलालेख एवं विशाल बुद्ध प्रतिमाएं समय के अंतराल में स्वतः ही भूमिगत हो गईं ! यदि ऐसा होता तो
प्राचीन हिन्दू मंदिरों के अवशेष भी अवश्य मिलने चाहिए थे ! वैदिक संस्कृति को दुनिया की सबसे प्राचीन और परिष्कृत सभ्यता होने का ढिंढोरा पीटने वाले बताये की आपके 11 लाख वर्ष पहले पैदा होने वाले राम की कोई प्राचीन प्रतिमा अथवा मंदिर समय के अंतराल में दफ़न क्यूँ नहीं हुआ ! आपके अनुसार सात हजार साल पहले पैदा हुए कृष्ण का कोई मंदिर खुदाई में क्यों नहीं निकला ? खुदाई में आपके किसी भी देवी देवता अवतार या भगवन से सम्बंधित कोई भी वास्तु क्यों नहीं प्राप्त हुई ?

या तो आपकी संस्कृति इतनी समृद्ध नहीं थी या फिर बुद्ध से सम्बंधित संस्कृति आपकी संस्कृति से हजारों गुणा श्रेष्ठ,उन्नत,परिष्कृत, एवं विशाल थी ! यदि ऐसा था तो फिर इतनी विशाल सभ्यता जमीन के निचे कैसे चली गई ? मिस्र के पिरामिड जो की रेगिस्तान के भयंकर तूफानों को झेलकर भी भूमिगत नहीं हुए , उन्हें खोद कर नहीं निकाला गया , जो बुद्ध से भी दो ढाई हजार साल पुराने है और भारत में बुद्ध से सम्बंधित अधिकांस स्थानों को खुदाई द्वारा ही ढूंडा गया है ! भारत की मूल प्राचीन सिन्धु संस्कृति के पूरे के पूरे शहर को ही 1922 में संयोग वश की गई खुदाई में ही ढूंडा गया !

इसका कारण हम आपको बताते है ! असल में 189 ई.पू. में जब सम्राट अशोक के वंसज वृह्दुत्त की हत्या ब्राह्मणों ने पूरे योजनाबद्ध तरीके से उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुङ्ग द्वारा करवाई ! उससे पहले पूरे भारत में भारत के कोने कोने में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित बुद्ध धम्म का ही परचम लहराता था , उस समय भारत के कोने कोने मे बुद्ध स्मारक , बौद्ध स्तूप ,बौद्ध मठ , बौद्ध विहार , और बुद्ध से सम्बंधित अन्यविशाल स्मारक ही थे , कोई भी ब्राह्मण मठ अथवा मंदिर नहीं था ,

वृह्दत्त की हत्या के बाद चले ब्राह्मण और श्रमणों(बौद्धों) के लम्बे एक तरफ़ा संघर्ष में ब्राह्मण अपनी कुटिल और धुर्त नीतिओ के कारन जीत गए , व्यापक पैमाने पर बौद्ध भिक्षुओ और बौद्धों का नरसंहार किया गया , और उनके इतिहास को सदा के लिए जानबूझकर जमीं के नीचे दफ़न कर दिया गया ! और अपने षड्यंत्रो के सबूतों को भी साथ में दफना दिया , उन्हीं सबूतों को हमारे लोग खोद कर निकालने का प्रयास कर रहे हैं आइये खोद कर निकाले गए कुछ सद्यंत्रों के अवशेषों को देखते है

“अशूकावदान” नमक पुस्तक से पता चलता है की पुष्य मित्र ने पाटलिपुत्र से लेकर जालंधर तक सभी बौद्ध विहारों कओ जलवा दिए गए और यह घोषणा की की जो मुझे एक बौद्ध का सर लाकर देगा मैं उसे सोने की सौ मुद्राये प्रदान करूँगा

सातवी सदी में बंगाल के राजा शशांक ने बौद्धों के विरुद्ध बहशीपन की सीमा पार कर दी ! चीनी यात्री ह्वानशांग लिखता है की उसने कुशीनगर से वाराणसी के बिच के सभी बौद्ध विहारों को तबाह कर दिया ! पटलीपुत्र में बुद्ध के पधचिन्न्हो को गंगा में फिंकवा दिया और ब्राह्मणों के इशारों पर उसने गया के बौद्ध वृक्ष को कटवा दिया तथा बुद्ध की मूर्ती के स्थान पर शिव की मूर्ति रखवा दी !

तमिल के पेरिया-प्रनानम नमक ग्रन्थ के अनुसार राजा महेन्द्र वर्मन ने असंख्यो बुद्ध स्मारकों और विहारों को आग लगवा दी

11वि सदी में मैसूर के राजा विष्णु वर्मन ने बौद्ध और जैन मंदिरों को ध्वस्त करवा दिया

महावंश पुराण के 93 वै परिच्छेद के 22 श्लोक के अनुसार तथा सिंघली कथाओं में भी उल्लिखित है की राजा राजा जय सिंह ने बौद्धों पर इतने भयंकर अत्याचार करवाए की पूरा सिंघल द्वीपबौद्धों से खाली हो गया !

शंकर दिग्विजय के अनुसार “राजा सुधन्वा ने अपने व्राह्मण गुरु कुमारिल भट्ट की आज्ञा से अपने सेवकों को ये आदेश दिया की रामेश्वर से लेकर हिमालय तक के सारे भूभाग पर जो भी बौद्ध मिले , चाहे वो बूढ़ा हो या बच्चा उसे क़त्ल कर दो जो ऐसा नहीं करेगा उसे मैं कट कर दूंगा ” शंकर दिग्विजय अ.1, श्लोक 93-94)

इस प्रकार के और भी हजारों उदहारण भरे पड़े है इन्ही द्वारा लिखित साहित्यों में …………!

क्या यह उदहारण काफी नहीं है ये समझने के लिए की बुद्ध से समंधित इतिहास जमीं के निचे क्यूँ और कैसे चला गया ?

बोधिसत्व भाई शकील प्रेम

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ब्राह्मणवादी मीडिया का दिया हुआ कलंक है “दलित” शब्द इसे त्यागो संवेधानिक नाम जैसे SC/ST/OBC/Minorities इस्तेमाल करो| श्रमण,बहुजन,मूलनिवासी अन्ये नाम हैं, अंतिम स्थाई और सटीक नाम है= “बौद्ध:…Team SBMT

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जो कौम अपना नाम भी खुद नहीं रख सकती विरोदियों का दिया कलंकित नाम “दलित” को ढो रही है वो उन ब्राह्मणवादियों से क्या मुकाबला करेगी जो सदियों से संगर्ष/ षडियंत्र  कर रहे हैं|ब्राह्मणवादी ताकतें फूले-आंबेडकरी आंदोलन को कमजोर बनाने के लिए महानायक बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को ‘दलित’ कहकर उनका अपमान कर रही है. इसके साथ ही जिन लोगों ने भारत में बौद्ध धम्म को अपनाया है उनको भी ‘दलितबौद्ध’ कहना प्रारंभ किया है. इतना ही नहीं बल्कि दलित और बौद्ध यह दोनों समानार्थि शब्द के रुप में प्रचारित करने का कार्य भी हो रहा है. ‘दलित’ और ‘हिंदू’ ये दोनों पहचाने नागों के विरोध में है. इन दोनों पहचानों तथा जाति की पहचानों को बाबासाहेब अम्बेडकर ने नकारा था.

जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं| इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी…समयबुद्धा

हमारे समाज को अपना “दलितपन” छोड़ना होगा….!

मैं भारत के दलितों की दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हूँ| लेकिन मैं अधिक दुखी दलितों का “दलितपन” देखकर होता हूँ|”दलितपन” दलितों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है|”दलितपन” एक प्रकार का “भिख्मंगपन” बन गया है|जिस प्रकार कोइ भिखारी कभी शासक नहि बन सकता उसी प्रकार बिना अपना “दलितपन” छोड़ें कोई समाज शासक नही बन सकता| माँगने वाले हाथों को देने वाले हाथ बनाना होगा| यानी कि उन्हे शासनकर्ता जमात बनना होगा| अगर आप शासक नही बन पाते है तो हमारी समस्याओ का कोई हल नही हो सकता है| लेकिन दलित अथवा भिखारी रहते हुय आप शासक नही बन सकते है| इसलिए आपको अपना “दलितपन”छोड़ना होगा|अगर आप शासक बन जते है तो आपकी सभी समस्याओं का हल आप स्व्यं कार सकते है…. मा. कांशीराम जी…..

 

मैं भारत के दलितों की दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हूँ| लेकिन मैं अधिक दुखी दलितों का “दलितपन” देखकर होता हूँ|”हमारे समाज को अपना “दलितपन” छोड़ना होगा……मान्यवार कांशीराम

(मान्यवार कांशीराम  ने यह लेख “बहुजन संगठन”, नई दिल्ली, अंक-2, तारीख-22 से 28 जनवरी, 2001 में लिखा था)

 

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मैंने एक जगह पढ़ा कि, लोगों को ऐसे नेता मिल जाते हैं जैसे लोग होते हैं. जब मैं महाराष्ट्र छोड़कर दिल्ली में आया, उत्तर प्रदेश में आया तो मुझे बार-बार सुनने को मिला कि हमारे नेता बिक गए हैं. हमारे नेता, जिनको बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने तैयार किया था वो बिक गए हैं. मैं बड़ा दूःखी हुआ कि जब जहां महाराष्ट्र में थोक में बिकते हैं, मैं वहां से चलकर आया हूं और यहां भी कहते हैं कि बिकते हैं. महाराष्ट्र में बाबासाहेब को मानने वाले, मूवमेंट चलाने वाले थोक में बिके और आज भी बिक रहे हैं, और उत्तर प्रदेश में जो थोड़े बहुत उनके साथ थे, वो भी बिकते नजर आए. मेरे पास ज्यादा साधन तो नहीं था, फिर भी चंद साथियों को तैयार करके मैंने साईकिल उठाया. सौ साईकिल सवार लेकर मैं उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में घूमा, यह प्रचार करने के लिए कि भई पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हमारे नेता बिक गए हैं.

मैंने ये बात सुनी है, समझी है, पढ़ी है कि जैसे लोग होते हैं वैसे ही उनको नेता मिल जाते हैं इसलिए मुझे लगता है कि आपके नेता बिक गए हैं, तो आप लोग भी बिकते होंगे. यो बात दूसरी है कि नेता ज्यादा कीमत में बिकते हैं और आप लोग कम कीमत हमें न बिकने वाला समाज बनाना होगा. क्योंकि न बिकने वाले समाज में अगर बिकने वाला नेता होगा तो एक बिकेगा, तो न बिकने वाला समाज दल नेता पैदा कर सकता है. लेकिन अगर समाज भी बिकाऊ है तो फिर उसमें से बिकने वाले ही नेता पैदा होंगे. इसलिए आओ मिलकर अगर बाबासाहेब अंबेडकर की मूवमेंट को आगे बढ़ाना है, मंजिल तक पहुंचाना है तो हमें न बिकने वाले नेता पैदा करने होंगे.खुशी की बात है कि उत्तर प्रदेश में लोगों ने मेरी बात मानी. देश भर में मैं कोशिश कर रहा हूं, लेकिन उत्तर प्रदेश में लोगों ने मेरी बात बड़े पैमाने पर मानी और जब मैंने 1989 में इलाहाबाद से उपचुनाव लड़ा, तो मैं जब एक वोट के साथ एक नोट देने के लिए, दलितों की बस्तियों में घूम रहा था, तब मैं उनसे यही कह रहा था कि भई मेंने बहुत प्रचार किया है, आप लोगों ने सुना है कि हमें न बिकने वाला समाज पैदा करना है, इसलिए मैं चुनाव लड़ रहा हूं और मुझे पता चला है आपकी बस्ती में लोग मुझे वोट देने वाले हैं. जब वोट देने का दिन आएगा तो इलेक्शन कमीश्नर आपके डब्बे (मत पेटियां) लेकर आएगा, उसमें आपको अपने वोट डालने हैं. लेकिन उससे पहले आज मैं अपना डिब्बा (एक वोट के साथ एक नोट वाला डिब्बा) लेकर आपकी बस्ती में आया हूं. इस डिब्बे में आपने नोट डालना है. मुझे मालुम है कि आप निर्धन समाज के लोग हैं, इसलिए मैं सिर्फ एक रुपया का एक नोट चाहता हूं. आप लोग मेरे डिब्बे में एक नोट डालें. अगर आपने मेरे डिब्बे में एक नोट नहीं डालना है तो मैं आप लोगों से अपील करता हूं कि आपने मेरे डिब्बे में जिस दिन इलेक्शन कमीश्नर का डिब्बा आएगा, उसमें वोट नहीं डालना है. आपका वोट बेकार जाएगा, अगर मुझे नोट न दिया तो, क्योंकि मुझे धनवानों से मुकाबला करना है. इसलिए आपको वोट के साथ नोट जरुर देना होगा.

तो जिस दिन चुनाव खत्म हुआ और इलेक्शन कमीश्नर ने वोटों की गिनती के लिए अपने डिब्बे खोले और मैंने अपना डिब्बा खोला तो मेरे डिब्बे में से कांशीराम के 86 हजार वोट मिले. मुझे 32 हजार नोट मिले और 86 हजार वोट मिले. जबकि कांग्रेस पार्टी को मेरे से सिर्फ 6 हजार ज्यादा वोट मिले. कांग्रेस पार्टी को करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद 92 हजार ही वोट मिले. इसलिए जो मैंने प्रचार किया था, उस प्रचार का लोगों को प्रैक्टीकल करने का मौका मिला. और प्रैक्टीकल का नतीजा यह निकला कि जितने मुझे नोट मिले उससे तीन गुना अधिक वोट मिले. जब मायवती बिजनौर, हरिद्वार से चुनाव लड़ी थी, जहां पर दोनों जगह इन्हें अच्छे वोट मिले लेकिन कांग्रेस फिर भी जीत गई थी तो कांग्रेस ने मीरा कुमार को पार्टी का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में यह प्रचार करने के लिए भेजा कि उत्तर प्रदेश के लोगों आप बहुजन समाज पार्टी को वोट क्यों देते हो. अपना वोट क्यों कराब कर रहे हो, आखिर जीतती तो कांग्रेस पार्टी बुरी तरह से हारी. फिर वो नहीं कह सकी कि आखिर जीतती तो कांग्रेस ही है. इसके बाद उनका प्रचार क्या चला कि ये अंबेडकर को मानने वाले लोग भी नहीं जीत सके हैं वो गांधी जी के चरणदास बनकर हमारे चरणों में (कांग्रेस में आकर) काम कर रहे हैं और ये लोग (बहुजन समाज पार्टी वाले) भी एक न एक दिन हमारे चरणों में आ जाएंगे. इसलिए इन लोगों का खाता नहीं खुलेगा. जून 1988 में ऐसा कहना शुरु हुआ. लेकिन जब एक साल बाद जून 1989 में लोकसभा व उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए तो उत्तर प्रदेश से बहुजन समाज पार्टी के दो एम. पी. और 15 एम. एल. ए. बने और पार्टी को मान्यता प्राप्त हुई. उसके बाद पार्टी आगे बढ़ती रही. आप सब लोग जानते हैं. लेकिन मैं कहना क्या चाहता हूं कि हम लोगों ने इस बात को समझकर कि हमारा समाज निर्धन समाज है. हमारा समाज मेहनतकश लोगों का समाज है, लेकिन इस देश में इस समाज व्यवस्था के चलते, जो मेहनतकश लोग हैं वो मेहनत करते हैं, धन पैदा करते हैं और निर्धन बन जाते हैं. अगर हमें धनवानों से निर्धन समाज बनाना बहुत जरुरी है. इसलिए साथियों, उत्तर प्रदेश में हमारा तजुर्बा बड़े पैमाने पर कामयाब हुआ. आज उत्तर प्रदेश में हमारा समाज बहुत बड़े पैमाने पर न बिकने वाला समाज बना हुआ है और न बिकने के लिए हम लोगों ने उनको सिर्फ एक जगह पैसा देने की आदत नहीं डाली बल्कि जगह-जगह मैंने मीटिंगे लेकर, मेरे पास बेचने के लिए कुछ नहीं था तो मैंने अपनी मीटिंग बेचना शुरु किया.

पहले मेरे बजन के हिसाब से 100 मीटिंगें बिकी, फिर मेरी उम्र के हिसाब से मीटिंगे बिकी. इस तरह से मीटिंगे बेच कर हम लोगों ने अपने निर्धन समाज से धन इकट्ठा किया और उस धन को धनवानों का मुकाबला करने के लिए इस्तेमाल किया. इस तरह से साथियों, ये आदत बनती गई. हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के अलावा इधर पहुंचे दूसरे प्रदेशों के लोग भी सुन रहे हों, उनको मैं ज्यादा सुनाना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश की आदत अगर देशभर में फैलती हैं तो वोटों वाला समाज (बहुजन समाज) जीतेगा और नोटों वाला समाज (मनुवादी समाज) हारेगा. अगर आप नोटों वाले समाज की चीत को रोकना चाहते हैं, वोटों वाले समाज (बहुजन समाज) को जिताना चाहते हैं तो थोड़ा-थोड़ा धन इकट्ठा करना यह बड़ा जरुरी है. पिछले जन्म दिन पर मायावती जी ने अपील की तो, 85 लाख रुपया उत्तर प्रदेश के लोगों ने इनको नोटों की शक्ल में दिया. मैंने उसको उड़ीसा और बिहार में इस्तेमाल किया जिससे कुछ बात उधर भी आगे बढ़ी.उत्तर प्रदेश में कभी भी चुनाव हो सकता है और अभी भी जो सरकार चल रही है वो हेराफेरी के कारण चल रही है. मैंने मायावती जी से कहा कि आपका जन्म दिन आया है. उत्तर प्रदेश के लोगों से अपील करें कि इस जन्म दिन के मौके पर जरुर कुछ न कुछ निर्धन समाज जितना दे सकता है उतना धन देने की कोशिश करे. मैंने इनसे कहा कि पिछली बार अपील की तो 85 लाख रुपया इकट्ठा हो गया. तब 85 लाख रुपया तो उड़ीसा और बिरार पर खर्ज हुआ है, इसलिए शायद उत्तर प्रदेश के लोगों की अब धन देने की ज्यादा दिलचस्पी ना हो. लेकिन अगर वो मूवमेंट को ध्यान में रखते हैं तो उनकी दिलचस्पी ज्यादा होनी चाहिए, अगर वो उत्तर प्रदेश का हित ही ध्यान में रखते हैं तो उनकी दिलचस्पी कम होगी, लेकिन अब तो उत्तर प्रदेश में चुनाव कभी भी हो सकता है, इसलिए निर्धन समाज का धनवानों का मुकाबला करने के लिए उत्तर प्रदेश के बहुजन समाज को तैयार करें. मुझे लगता है कि 85 लाख की बजाय आपको एक करोड़ रुपये तक मूवमेंट के लिए जन्म दिन के मौके पर मिल तकता है, ऐसा मेरा अंदाजा था. मैंने माया जी से पूछा कि आपको क्या लगता है. वो बोली कि कहीं लोग थक न गए हों. हमेशा मैं थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा करती रहती हूं, इसलिए कहीं थक न गए हों. पता नहीं एक करोड़ इकट्ठा हो गया या नहीं.

मैंने इनसे कहा कि जिनसे हमारा मुकाबला है उन पार्टियों के तो 10-12 सेठिए काफी हैं हजारों करोड़ रुपया इकट्ठा करने के लिए, लेकिन हमारे पास तो करोड़ों लोग हैं. अगर करोड़ों लोग एक करोड़ भी इकट्ठा कर लेते है तो उस धन से हम हजारों करोड़ का मुकाबला कर पाएंगे. 10-12 सेठियों का हजारों करोड़ रुपया और करोड़ों लोगों का 1-2 करोड़ रुपया भी उनका मुकाबला कर सकता है और आज तक हम लोगों ने मुकाबला करके दिखाया है. तभी तो बात आगे बढ़ी है. इसलिए मुझे लगता है कि बहुजन समाज के लोग इस बात को समझकर और न बिकने वाले लोग जरूर आपको एक करोड़ रुपया दे सकेंगे, थकावट के बावजूद. जब मैंने 14 जनवरी की शाम को पूछा, इन्होंने बताया कि एक करोड़ पार कर गए हैं, फिर मैंने सोचा कि थकावट के बावजूद जब ये एक करोड़ पार कर गए हैं तो जन्म दिन तो कल (15 जनवरी को) है. तो जब आज (15 जनवरी को) मैंने दोपहर को पता किया तो बताया कि हम दो करोड़ पार कर गए हैं. इसलिए साथियों यो जन्म दिन सिर्फ खाने-पीने के लिए नहीं हैं. जन्म दिन तो बहाना है. इस मूवमेंट को आगे बढ़ाने के लिए हम जितनी कोशिश कर तकते हैं आप लोगों ने की है, हम लोग करेंगे. और मुझे भरोसा है इसलिए मैं रिस्क ले लेता हूं. जिस तरह पूरे देश में हमारा कारोबार बढ़ चुका है, पार्टी नेशनल बन गई है, कारोबार सारे देश में बढ़ गया है, सारे देश में भी हमारी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उनके लिए मैंने दफ्तर वालों को बोला कि उनको निमंत्रण दो ताकि वो आएं और देखें कि उत्तर प्रदेश में हमने अपने समाज में जो सुधार पैदा किया है वैसा सुधार हर प्रदेश में हो और हर प्रदेश में हमारी बात तेजी से आगे बढ़े.हमारा समाज जो दलित बनकर रह गया है. दलित का मतलब बेगर (भिखारी). क्योंकि दलित का हाथ हमेशा मांगने वाला रहता है लेकिन जब वह बहुजन बन जाता है तो उनका हाथ देने वाला हो जाता है. इसलिए दलितपन (मांगने की आदत) छोड़ो और बहुजन (देने वाले) बनो. उससे वोट बैंक भी बढ़ेगा और नोट बैंक भी बढ़ेगा. इसलिए साथियों, इस मौके पर आप लोगों से अपील करने के लिए मैं इधर खड़ा हुआ हूं.

मैंने अपनी बात आप लोगों के सामने इस भरी महफिल में रखना जरूरी समझा और इधर जो धन देने वालों को धन्यवाद देने के लिए मैं आपके सामने खड़ा हुआ हूं. जिस तरह से आप लोगों ने थकान महसूस नहीं की, तो जब तक हम मंजिल तक नहीं पहुंचते हैं तब तक थकान महसूस नहीं करेंगे. हम उत्तर प्रदेश में मायावती जी को दो बार मुख्यमंत्री बना चुके हैं. दो बार तो बहुत से और लोग भी मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन तीन बार कोई नहीं बना है. इसलिए मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और उत्तर प्रदेश में अपने अधूरे कार्यों को पूरा करें और पूरे देश में बहुजन समाज को आगे बढ़ाने के लिए मेरी सहायता करें, क्योंकि इस मौके पर भी मैं आठ सूबों में लगा हूं और आठ सूबों मे जो मुझे दिक्कत महसूस हो रही है, उसे मैं ही जानता हूं. हर सूबे में हमारे लोग मांगने वाला हाथ किए हुए हैं. यहां तक कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के सूबे में हमारे लोग मांगने वाला हाथ इतना फैलाए हुए हैं कि दे दो भाई कुछ न कुछ दे दो. महाराष्ट्र की यह आदत दक्षिण भारत में भी तेजी से फैल गई है. इसलिए उधर एक तो इस आदत को रोकना है और दूसरा जो दलितपन होकर हाथ फैलाया हुआ समाज है उसको बहुजन बनाकर उनके हाथ को देने वाला करना है. इसलिए मैंने उन सम लोगों को भी इधर बुलाया है. उनसे भी मैं अपील कर रहा हूं कि भाई उत्तर प्रदेश से सीखने की आप लोग भी कोशिश करें. अपने प्रदेश में जाकर बहुजन समाज बनाएं.

जाति के आधार पर तोड़े हुए लोगों को जोड़कर बहुजन बनाएं और जो उनकी बिकने की आदत है उस आदत को रोकें और न बिकने वाला समाज बनाकर उनके वोट का सही इस्तेमाल करके बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के सपनों को साकार करने की कोशिश करें. क्योंकि महाराष्ट्र में जब मुझे रहने का मौका मिला तो महाराष्ट्र के महार भाई कहा करते थे कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने हमें कहा था कि जाओ अपनी दिवारों पर लिख लो कि हमें इस देश की शासनकर्ता जमात बनना है, हमें इस देश के हुक्मरान बनना है. लेकिन आज जब मैं उनको कहता हूं तो वो गर्दन नीची कर लेते हैं. क्योंकि उनको मांगना पड़ता है. मांगने के लिए वो बाबासाहेब को ठुकरा चुके हैं, इसलिए पहले मुझे डर लग रहा था कि शायद जब बाबासाहेब को महाराष्ट्र में महार और उत्तर प्रदेश के जाटव भाईयों ने ठुकरा दिया है अब कही सब ने ठुकरा दिया तो फिर हम गूवमेंट को कैसे रिवाईव कर सकेंगे. लेकिन खुशी की बात है कि महाराष्ट्र के महार अब थोड़ी-थोड़ी बात सुनने को तैयार हुए हैं और जब मायावती मुख्यमंत्री बनी तो जाटव भाई भी सोचने लगे हैं, तो साथियों इन सारी चीजों से हमें सबक सीखना होगा. इन सब चीजों से सबक सीखकर इसी तरह से मूवमेंट को आगे बढ़ाने में मेरा और मायावती जी का हौंसला बढ़ाते रहेंगे. हमें आगे बढ़ने में मदद करेंगे. आगे के लिए ऐसी अपील करते हुए जो आप लोगों ने अब तक सहयोग दिया हैं, धन दिया है उसके लिए आपका धन्यवाद करते हुए मैं आप लोगों से विदा लेता हूं. जय भीम-जय भारत

इंसानों की पांच प्रजातियाँ होती है ….बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

NAMEइंसानों की पांच प्रजातियाँ होती है ,

1 बुद्धिमान – इस प्रजाति के लोग अपनी बौद्धिक कुशलता और ज्ञान विज्ञान द्वारा स्वयं उर्जावान हो कर दुनिया को भी अपने ज्ञान द्वारा बदलने का प्रयास करते हैं

2-सामर्थ्यवान – इस प्रजाति के लोग अपनी मेहनत द्वारा स्वयं कामयाब हो कर दुनिया के लिए प्रेरणा दाई बनकर लाखों को आत्मनिर्भरता पुर्वक जीने की कला सिखाते है

3 चातुर्य वान – इस प्रजाति के मानव अपनी चातुर्य क्षमता से सफलता प्राप्त तो कर लेते है परन्तु इनकी सफलता एकांकी ही सिद्ध होती है किसी और को ये कुछ भी नहीं दे सकते

4- धुर्तवान : इस प्रजाति के मनुष्य अपने लाभ के लिए दुसरे की क्षति करने में संकोच नहीं करते ! जहाँ इनका कोई लाभ नहीं होता वहां भी इनका अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप अवश्य होता है उस काम को बिगाड़ने में , इनका भला तो सब भला , इस प्रजाति के लोग दुसरे की क्षति में ही अपना लाभ देखते है ,  इस प्रजाति के लोग कौन हैं  ? मुझे बताने की आवश्यकता नहीं आप स्वयं समझदार है !

5 मुर्खवान- इस प्रजाति का मनुष्य दुसरे के लाभ के लिए स्वयं का नुक्सान करता है इसलिए सदा दुखी रहता है , और अपने प्रत्यक्ष दुखों के लिए किसी अप्रत्यक्ष सहारे को ढूंढता फिरता है ! अपने दुखों के सही कारणों का विश्लेषण करने की क्षमता उसमे नहीं होती इसलिए वो मुर्ख होता है इस प्रजाति की मुर्खता का सबसे बड़ा लाभ धूर्तवानों को होता है और वह इस मुर्ख भीड़ को अपनी संपत्ति समझ कर इसे अपने धर्म नामक डंडे से हांकता रहता है

मानवों की यह पांच प्रजातियाँ अपने इन्हीं गुणों को अपने वंशो द्वारा आगे बढाती है और इस तरह यह पांच प्रजातियाँ अपने विशेष गुणों और दोषों को पीडी दर पीडी वंशानुगत रखती जाती है

शकील प्रेम

देश को दिशा देने वाले डॉ. साहेब भीमराव अम्बेडकर… By आज की आवाज़ टीम

ambedkarहमारे देश में जब छुआ-छूत का प्रभाव जोर-शोर से सारे देश में फैला हुआ था, उसी दौरान डॉ॰ भीमराव रामजी अम्बेडकर का  जन्म 14 अप्रैल 1891, आंबेडकर एक भारतीय विधिवेत्ता थे। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ,  भारतीय सविधान के मुख्य वास्तुकार भी थे।

उन्हें बाबासाहेब के लोकप्रिय नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था।

भीम राव अंबेडकर एक नेता, वकील, गरीबों के मसीहा और देश के बहुत बड़े नेता थे जिन्होंने समाज की बेड़ियां तोड़ कर विकास के लिए कार्य किए। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म  की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित बौध आन्दोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। बाबासाहेब अम्बेडकर को भारत रत्न  से भी सम्मानित किया गया है, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।

कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं।

अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश में गये आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ. आंबेडकर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है।

आंबेडकर के शोध का विषय “भारत का राष्ट्रीय लाभ” था। इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से एवं आवासिय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङकर बम्बई जाना पङा। बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ संकीर्ण विचारधारा के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङा।

इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढते रहे। उनका दृण विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुनः लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे।

हालांकि उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा। बचपन से ही बाबा साहेब ने छुआ-छूत की पीङा महसूस की थी। जाति के कारण उन्हें संस्कृत भाषा पढने से वंचित रहना पड़ा था। कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ ने भीमराव जी को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ती प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की ।

श्रेष्ठ चिन्तक, ओजस्वी लेखक, तथा यशस्वी वक्ता एवं स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री डॉ॰ भीमराव आंबेडकर विधि विशेषज्ञ, अथक परिश्रमी एवं उत्कृष्ट कौशल के धनी व उदारवादी, परन्तु सुदृण व्यक्ति के रूप में डॉ. आंबेडकर ने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक भी माना जाता है।

1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धी में चार चाँद लग गया।

डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी। वह इसे मानव की एक पद्धति (Way of Life) मानते थे। उनकी दृष्टी में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य “समाज की आन्तरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।“ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- “किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।“

अनेक कष्टों को सहन करते हुए, अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को “प्रारूप-समिति” जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।

संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण उनके द्वारा बङी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणाम स्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।

आंबेडकर द्वारा सविधान का निर्माण

अपने विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।

संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है।

अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :

मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।

1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

1948 में बाबा साहेब मधुमेह से पीड़ित हो गए। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से भी ग्रस्त रहे। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर इह लोक त्यागकर परलोक सिधार गये। 7 दिसंबर को बौद्ध शैली के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता , धन्य है वो भारत भूमि जिसने ऐसे महान सपूत को जन्म दिया ।

 

http://www.aajkiawaaz.com/dr-br-ambedkar-who-guided-the-country

मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) के आंदोलन और राजनीति की कमियाँ …..प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली …BBC

मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) के आंदोलन और राजनीति की कमियाँ  प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

kansiram change sutra
मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता  बाबा साहेब अंबेडकर का आंदोलन मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति का आंदोलन था और मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति से मेरा मतलब है कि वर्ण व्यवस्था के अभिशाप से मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज को कैसे छुटकारा मिले. मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों की सदियों से जो समस्या चली आ रही है, चाहे वो छुआ-छूत की हो, अशिक्षा की हो, ग़रीबी की हो, सामाजिक बहिष्कार की हो, इन सबके मूल में वैदिक धर्म था. अंबेडकर जी ने इसी वैदिक व्यवस्था पर अपने आक्रमण से आंदोलन की शुरुआत की थी.

साथ ही उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज को जाग्रत करने की नीव डाली. उनके पहले ऐसा काम गौतम बुद्ध को छोड़कर और किसी ने नहीं किया था.

उन्होंने मनु-स्मृति को जलाकर अपने आंदोलन की शुरुआत की थी. महाड़ में जाकर पानी के लिए आंदोलन किया. मंदिर प्रवेश की समस्या को उठाया. उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों के लिए गणेश-पूजा की माँग भी उठाया. उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों को जनेउ पहनाने का भी काम किया.

हालांकि वो ख़ुद धर्म में विश्वास नहीं करते थे पर मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) की मानवाधिकार की लड़ाई में उन्होंने इन बुनियादी सवालों से काम करना शुरु किया था.

अंबेडकर जैसा कोई विकल्प नहीं:

अंबेडकर का विकल्प कैसे पैदा होगा जब उनके विचार को ही नहीं अपनाया जाएगा.आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता पूरी तरह से भटक गए हैं. अंबेडकर को कोई नहीं अपनाता है. कोई सत्ता का नारा देता है तो कोई सत्ता में भागीदारी का नारा देता है और इन सबका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ ही हैउस सोच से आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता पूरी तरह से भटक गए हैं. अंबेडकर को कोई नहीं अपनाता है. कोई सत्ता का नारा देता है तो कोई सत्ता में भागीदारी का नारा देता है और इन सबका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ ही है.आज के नेतृत्व में सोच का ही अभाव है और इसीलिए जो काम बिना चुनावी राजनीति में गए अंबेडकर ने कर दिखाया उसे आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता बहुमत पाने या सरकार बनाने के बाद भी नहीं कर पाते.

अंबेडकर जी के अनुभवों से एक बात तो स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है कि जैसे ही मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) संगठित होना शुरू करते हैं, हिंदू धर्म में तुरंत प्रतिक्रिया होती है और धर्म को बचाने का जिम्मा लेने वाले तुरंत लचीलापन दिखाना शुरू कर देते हैं पर इस बात को मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज का नेतृत्व नहीं अपना रहा है.

खैरलांजी की घटना वैदिक काल में मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों पर हुए अत्याचारों की पुनरावत्ति ही है जिससे यह साफ है कि वैदिक परंपरा पर हमला किए बिना मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति की बात करना बेमानी है.

जातीय सत्ता का दौर:

मंडल आयोग से पहले तक राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता में आती थीं. मंडल आयोग की रिपोर्ट के सामने आने के बाद से अब जातियाँ सत्ता में आती है.जातीय सत्ता का यह जो दौर है इसे मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि इसमें तो लोग जाति पर कब्जा करके उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं|जातीय सत्ता का यह जो दौर है इसे मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि इसमें तो लोग जाति पर कब्जा करके उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.सामाजिक व्यवस्था को बदलने का अभियान, जो कि मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति का मुख्य मुद्दा हुआ करता था, वो मुद्दा मुद्दा ही रह गया है.

जातीय राजनीति से सत्ता में आने का लाभ कुछ लोगों को ज़रूर होता है. उस जाति के भी कुछ गिने-चुने लोगों को लाभ हो जाता है पर जातीय सत्ता ने न तो मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों का कल्याण हो सकता है और न ही जाति व्यवस्था का अंत हो सकता है.आज का मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता हिंदुत्व पर कोई हमला नहीं कर रहा बल्कि हिंदुत्ववादी शक्तियों के साथ समझौते का काम कर रहा है. मायावती तो हर जगह जा-जाकर बता रही हैं कि ब्राह्मण ही बड़े शोषित और पीड़ित हैं.अब तो इसी समीकरण के साथ काम हो रहा है कि कुछ ब्राह्मणों को ठीक कर लो, कुछ क्षत्रियों को मिला लो, कुछ बनियों को साथ ले लो और सत्ता में बहुमत हासिल कर लो. सत्ता की यह होड़ न तो सामाजिक मुक्ति की होड़ है और न ही सामाजिक परिवर्तन की.

तुलसीराम मानते हैं कि आज जातीय सत्ता का दौर आ गया है

पेरियार और अंबेडकर:

दक्षिण में जो आंदोलन चला वो पेरियार के ब्राह्मण विरोध की उपज थी. बहुत ही सशक्त आंदोलन था पर दुर्भाग्य की बात यह है कि वो ब्राह्मण विरोधी आंदोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं बन पाया.ब्राह्मणों की सत्ता तो ज़रूर ख़त्म हुई और पिछड़ी जातियों के नेता सामने आए पर लेकिन हिंदुत्ववादी दायरे में रहते हुए उन्हीं कर्मकांडों को वो भी मान रहे हैं जिन्हें कि ब्राह्मण मानते थे.दक्षिण में जो आंदोलन चला वो पेरियार के ब्राह्मण विरोध की उपज थी. बहुत ही सशक्त आंदोलन था पर दुर्भाग्य की बात यह है कि वो ब्राह्मण विरोधी आंदोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं बन पाया |

एक दूसरे ढंग का ब्राह्मणवाद वहाँ आज भी क़ायम है:

उत्तर भारत में कोई ब्राह्मण विरोधी आंदोलन नहीं चला. जो भी चला वो अंबेडकर का ही आंदोलन था.अंबेडकर के आंदोलन का प्रभाव उत्तर में ज़्यादा रहा भी पर यहाँ मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) उस तरह से सत्ता पर कब्ज़ा नहीं कर पाए जिस तरह से पिछड़े वर्ग के लोगों ने दक्षिण में किया.मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति का जहाँ तक प्रश्न है, दक्षिण भारत में पिछड़ों की राजनीति मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति को निगल गई है. वहाँ तो मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति के नाम पर कुछ नहीं है.जो भी है वो उत्तर भारत में हैं पर उसमें समझ की भी कमी है और बिखराव भी है. सही मायने में देखें तो यह अंबेडकर का मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) आंदोलन भी नहीं है और अंबेडकर की बताई हुई मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति भी नहीं है.

(पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

http://www.bbc.co.uk/hidr tulsiramndi/regionalnews/story/2006/12/061205_dalit_special_tulsiram.shtml

 

प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

 

 

 

 

 

 

 

 

नोट जैसा की समयबुद्धा मिशन की पालिसी है की ब्राह्मणवादी मीडिया द्वारा दिया गया अपमानजनक शब्द “दलित” का इस्तेमाल नहीं करना है इसलिए इस लेख में ‘दलित’ शब्द को “भारत के मूलनिवासी बहुजनों SC=ST+OBC” से REPLACE  कर दिया गया है, बाकि लेख ज्यों का त्यों ही प्रस्तुत है|

 

 

सारे विश्व के मानवतावादी बुद्धिजीवी,आधुनिक विचारक तथा वैज्ञानिक आदि महामानव गौतम बुद्ध के बारे में क्या विचार रखते है आइये इस आर्टिकल में प्रस्तुत उनके विचारों के संग्रह से जानते हैं. …लाला बौद्ध

einstienबुद्ध की श्रेष्ठता को श्रद्धासुमन :

तथागत बुद्ध का जन्म 2500 वर्ष पूर्व हुआ था. आधुनिक विचारक तथा वैज्ञानिक उनके और उनके धम्म के बारे में क्या कहते हैं? इस विषय पर उनके विचारों को यहां संग्रह किया गया है.

1. प्रो. एस.एस. राघवाचार्य कहते हैं- “बुद्ध के जीवनकाल से पहले का समय भारतीय इतिहास का सर्वाधिक अंधकारमय युग था. चिन्तन की दृष्टि से यह पिछड़ा हुआ युग था. उस समय का विचार धर्म-ग्रंथों के प्रति अंधभक्ति से बंधा हुआ था. नैतिकता की दृष्टि से भी यह अंधकारपूर्ण युग था. हिन्दुओं के लिये नैतिकता का अर्थ था धर्म-ग्रंथों के अनुसार यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठानों को ठीक ठीक करना. स्व-त्याग या चित्त की पवित्रता आदि जैसे यथार्थ नैतिक विचारों को उस समय के नैतिक चिंतन में कोई उपयुक्त स्थान प्राप्त नहीं था.”
2. माननीय आर.जे.जैक्सन का कहना है- “तथागत बुद्ध की शिक्षाओं की अनुपम विशेषता भारतीय धार्मिक विचारधारा के अध्ययन से ही स्पष्ट होती है. ऋग्वेद की ऋचाओं में हम पाते हैं कि आदमी का विचार स्वयं से अलग, बहिर्मुखी है, उसका सारा चिंतन देवताओं की ओर अभिमुख है. बुद्ध धम्म ने स्वयं आदमी के अन्दर छिपी हुई उसकी अपनी सामर्थ्य की ओर उसका ध्यान आकर्षित किया. वेदों में हमें प्रार्थना, प्रशंसा और पूजा ही मिलती है. बुद्ध धम्म में हमें प्रथम बार चित्त को सही रास्ते पर चलाने के क्रम की शिक्षा मिलती है.”
3. माननीय विनवुड रीडे का कथन है-
जब हम प्रकृति की पुस्तक खोलकर देखते हैं, जब हम लाखों वर्षों का खून और आँसुओं में लिखा विकास का इतिहास पढ़ते हैं, जब हम जीवन पर नियन्त्रण करने वाले नियमों को पढ़ते हैं, और उन नियमों को, जो विकास को जन्म देते हैं, तो हमें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि, यह सिद्धान्त कि परमात्मा प्रेम-रूप है, कितना भ्रामक है. हर चीज में बदमासी भरी पड़ी है और अपव्यय का कहीं कोई ठिकाना नहीं है. जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनमें बचने वालों की संख्या बहुत थोड़ी है. समुद्र में देखो चाहे हवा में, चाहे जंगल में, हर जगह यही नियम है, दूसरों को खाओ, तथा दूसरों के द्वारा खाये जाने को लिये तैयार रहो. हत्या ही विकास-क्रम का कानून है. परन्तु बुद्ध ने मानव से मानव को दुःख पहुंचाये जाने वाले कारकों पर बड़ी बारीकी से मनन किया और अपने उपदेशों द्वारा संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये नैतिक नियम बनाये. इन नैतिक नियमों को ही बुद्ध धम्म कहते हैं. बुद्ध धम्म सब धम्मों से कितना भिन्न है. रीडे ने यह बात “Martydom of Man” नामक पुस्तक में कही है.

4. डाॅ रंजन राय का कहना है, “उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तीन कानूनों की तूती बोलती थी. किसी ने उन्हें अस्वीकार करने का साहस नहीं किया. ये कानून थे- (1) जड़ पदार्थ का कानून, (2) जड़ पदार्थ के समूह का कानून, (3) शक्ति का कानून.
ये उन कथित आदर्शवादी चिन्तकों के जयघोष थे, जो समझते थे कि ये तीनों अविनाशी हैं.
उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों के अनुसार ये तीनों कानून सृष्टि के संचालक थे.
उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों के अनुसार ये तीनों कानून सृष्टि के मूल तत्व थे.
उनका मानना था कि विश्व अविनाशी अणुओं का समूह है.
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में श्री जे.जे. थामस और उनके अनुयाइयों ने अणुओं पर हथौड़े चलाना प्रारंभ किया.
आश्चर्य की बात हुई, अणुओं के भी टुकड़े-टुकड़े होने लगे. इनको परमाणु कहा जाने लगा.
जिन अणुओं को मैक्लवैल अविनाशी आधार मानते थे, वे खण्ड-खण्ड हो गये.
फिर परमाणु के छोटे-छोटे खण्ड हुये- इलैक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रान. इनमें इलैक्ट्रान, प्रोटोन में क्रमसः ऋणात्मक, धनात्मक विद्युत आवेश देखा गया.
अविनाशी जड़ पदार्थ-समूह की कल्पना विज्ञान से विदा हुई.
तथागत बुद्ध के अनित्यता के सिद्धांत को समर्थन प्राप्त हुआ.
विज्ञान ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि विश्व की गति चीजों के मेल से किसी चीज के बनने , उसके खण्ड-खण्ड हो जाने तथा फिर मिलने के नियमों पर ही आश्रित है.
आधुनिक विज्ञान के अनुसार अंतिम तत्व अनेक होकर एक भासित होने वाला है.
आधुनिक विज्ञान तथागत बुद्ध के अनित्यता तथा अनात्मवाद के सिद्धांत की प्रतिध्वनि है.

5. ई.जी.टेलर ने अपने Buddhism and Modern Thought में लिखा है –
बहुत समय से आदमी बाहरी ताकतें के शासन में रहा है. यदि उसे सच्चे अर्थ में सभ्य बनना है तो उसे अपने ही नियमों द्वारा अनुशासित रहना सीखना होगा. बौद्ध धम्म ही वह प्राचीनतम नैतिक प्रणाली है, जिसमें आदमी को स्वयं अपना अनुशासक बनने की शिक्षा दी गयी है. इसीलिये इस प्रगतिशील संसार को बौद्ध धम्म की आवश्यकता है, ताकि वह श्रेष्ठतम शिक्षा प्राप्त कर सके.

6. ईसाई धर्म के यूनिटेरियन समप्रदाय के पादरी लेसली बोलटन का कथन है- बौद्ध धम्म में आध्यात्मिक मनोविज्ञान को मैं बहुत महत्वपूर्ण योगदान मानता हूँ. बौद्धों की तरह हम यूनिटेरियन सम्प्रदाय के मानने वाले भी परंपरा, पुस्तकों व मतों के बाह्य अधिकार को प्रमाण नहीं मानते. हम आदमी के भीतर ही मार्गदर्शक प्रदीप देखते हैं. यूनिटेरियन मत के अनुयाइयों को ईसा और बुद्ध श्रेष्ठ जीवन के श्रेष्ठ व्याख्याकार प्रतीत होते हैं.

7. प्रो. डेविट गोडर्ड का कथन है-
संसार में जितने भी धर्म संस्थापक हुये हैं, उनमें बुद्ध को ही यह गौरव प्राप्त है कि उन्होंने आदमी में मूलतः विद्यमान उस निहित शक्ति को पहचाना, जो बिना किसी बाह्य निर्भरता के उसे निर्वाण के पथ पर अग्रसर कर सकती है.
किसी वास्तविक महान पुरुष का महात्म्य इसी बात में है कि वह महानता की कितनी मात्रा में महानता की ओर अग्रसर करता है, तो तथागत से बढ़कर दूसरा कौन सा आदमी महान हो सकता है?
बुद्ध ने किसी बाह्य शक्ति को आदमी के ऊपर बिठाकर उसका दर्जा नहीं घटाया, बल्कि उसे प्रज्ञा और मैत्री के शिखर पर ले जाकर बिठा दिया है.

8. बुद्धिज्म ग्रंथ के लेखक श्री ई.जे.मिलर का कहना है-
किसी दूसरे धम्म में विद्या को इतना महत्व नहीं दिया गया और अविद्या की इतनी भर्तस्ना नहीं की गयी, जितनी बुद्ध धम्म में.
कोई दूसरा धम्म अपनी आँख खुली रखने पर इतना जोर नहीं देता.
किसी दूसरे धम्म ने आत्म-विकास की इतनी विस्तृत, इतनी गहरी तथा इतनी व्यवस्थित योजना पेश नहीं की.

9. अपने बुद्धिस्ट इथिक्स में प्रो.डब्ल्यू. टी.स्टास ने लिखा है-
बौद्ध धम्म का नैतिक आदर्श पुरुष अर्हत न केवल सदाचार की दृष्टि से, बल्कि मानसिक विकास की दृष्टि से भी महान है. वह दार्शनिक और श्रेष्ठ आचारवान दोनों एक साथ है.
बौद्ध धम्म ने विद्या को मुक्ति के लिये, तथा अविद्या, तृष्णा को निर्वाण के लिये प्रधान बाधक कारण स्वीकार किये हैं.
इसके विरुद्ध ईसाई आदर्श पुरुष के लिये ज्ञानी होना कभी आवश्यक नहीं माना गया. क्योंकि ईसा का अपना स्वरूप ही अदार्शनिक था. इसलिये ईसाईयत में दार्शनिकता का आदमी की नैतिकता से कोई संबंध नहीं माना गया.
संसार के दुःखों के मूल में शरारत से कहीं अधिक अज्ञान और अविद्या ही है. तथागत बुद्ध ने इसके लिये जगह नहीं रखी.
इन महान विचारकों ने बुद्ध धम्म को कितना महान और अनुपम माना, आपने अभी पढ़ा.
कौन है जो येसे तथागत बुद्ध को अपना शास्ता स्वीकार न करना चाहेगा.

प्रस्तुति  मान्यवर लाला बौद्ध lala baudh