8-OCT-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: ”ब्राह्मणवादी वर्ण व्यस्था” शोषितों की क्रांति रोकने वाला औज़ार है


varn vyastahहे मानवतावादियों आज की धम्म देशना में हम ब्राह्मणवाद के सबसे घातक हतियार वर्णव्यस्था के बारे में चर्चा करेंगे, इस चर्चा की शुरुवात हे मानवतावादियों आज की धम्म देशना में हम ब्राह्मणवाद के सबसे घातक हतियार वर्णव्यस्था के बारे में चर्चा करेंगे, इस चर्चा की शुरुवात के निम्न शब्दों से करते हैं  के निम्न शब्दों से करते हैं  डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहा है की “हिन्दू सोसायटी उस बहुमंजिली मीनार कि तरह है जिसमे प्रवेश करने के लिए न कोई सीढ़ी है न दरवाजा। जो जिस मजिल में पैदा हो जाता है उसे उसी मंजिल में मरना होता है .”

जो लोग मानते हैं की वर्ण व्यस्था और जातिवाद ख़त्म हो गया होता उन्होंने आज के समय के चलन पर गौर नहीं किया है| बचपन से लेकर लगभग पच्चीस तीस साल तक अमूमन लोग मानवतावादी होते हैं सबसे घुलते मिलते हैं, और उनके आस पास का संसार खुशनुमा होता है| पर जैसे जैसे उम्र बढ़ती है लोग अपनी जाती और अपने धर्म के प्रति कट्टर होते जाते हैं, कट्टर वही लोग होते हैं जो अपने अपने धर्म और अपनी जाती के इतिहास को जानते जाते हैं| इसके बाद होता है वो दौर शुरू जब लोग इंसानों को अपने और परायों में बांटते हैं और इसी प्रकार का व्याहार करते हैं , मतलबपन और कौमी कट्टरवाद के चलत्ते स्वभाविक मिलनसारिता खत्म हो जाती है, परिणामस्वरूप सभी दुखी  हो जाते हैं| अब आप ही सोचिये की क्या देता है आपको जातिवाद और धर्म, आपकी इंसानियत और ख़ुशी छीन कर आपको ब्राह्मणवादी बना डालता है| असल बौद्ध धम्म इन्हीं धर्म और जाती की दीवारों की तोड़कर वापस मानवता में लौटने का आग्रह करता है| अपनी ग़लतफ़हमी ठीक करो और ‘बौद्ध धम्म’ को बौद्ध धर्म न समझो,किस भी धर्म में आपकी कुछ नहीं मिलेगा| याद रहे धर्म नहीं धम्म.

सभी लोग जानते हैं की ब्राह्मणवादी वर्णव्यस्था और जातिवाद के सताए हुए बौद्ध लोगों ने ही इस्लाम ईसाइयत सिख  आदि  अन्ये धर्मों में शरण ली| अपना पूरा इतिहास खंगालने के बाद डॉ आंबेडकर ने वपर अपने खुद के बौद्ध धम्म में ही जाना स्वीकार किया

ब्राह्मणवादी वर्ण व्यस्था  में  समस्त मानवता को   को चार विभाग में बांटा -ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वेश्य और शुद्र  प्रश्न उठता है ब्राह्मण कौन?या शुद्र कौन? जब से मानव सभ्य हुआ है तब के केवल दो ही वर्ग रहे हैं एक अमीर और एक गरीब, इन्हीं दोनों वर्गों में संगर्ष रहा है जिसके परिणाम स्वरुप कभी किसी की सत्ता आती है कभी किसी की| धूर्त और षडियंत्रकारी ने ब्राह्मणवादियों ने बुद्धि का इस्तेमाल किया और अपनी सत्ता सुनिश्चित करने हेतु दो वर्गों को चार वर्गों में बदल दिया जो हैं ब्राह्मण, क्षत्रिये, बनिया और शूद्र| इससे हुआ ये की ब्राह्मणवाद के खिलाफत करने के लिए तीन वर्गों को एक साथ आना पड़ेगा जो कभी हुआ नहीं| खुशहाल बनने के लिए आपके पास  होना चाहिए -ज्ञान और धन, ये दोनों इन चारो वर्गों में जिसके पास हैं वो हैं ब्राह्मण और बनिया ये दोनों वर्ग तो कभी विद्रोह नहीं करेंगे| इन दोनों के आलावा बचे वर्ण हैं क्षत्रिय और शूद्र ,आम जनता के इन दोनों वर्गों से विद्रोह हो सकता हैं इसलिए केवल इन्हीं दोनों वर्णों को जातियों में बाँट दिया|जातियों के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अंतर्जातीय विवाह के चलन पर जोर और जाती से बहार विवाह पर जबरदस्त रोक लगाई राखी गई| इतना ही नहीं आम जनता की इन जातियों में से जो भी ब्राह्मणवाद के पक्ष में हैं उसको धर्म की रक्षा के लिए उसकी जान लेने के लिए उसे क्षत्रिये बना दिया और जो विपक्ष में है उसे शूद्र बना कर आभाव और घृणा का पात्र बना दिया|अब अगर कोई जाती विद्रोह करती है तो ये दूसरी जाती को अपना रक्षक बनाकर उसके सामने खड़ा कर देते हैं, इसमें मारने और मरने वाला दोनों बहुजन होते हैं|यकीन न हो तो समाज में देखो पूरे ब्राह्मण और बनिया वर्ग में आपस में एकता है और रोटी बेटी का सम्बंद है जबकि बाकि के दोनों वर्णों में जातिगत फुट है| वर्ण व्यस्था और जातिवाद जितना कमजोर होगा भारत और भारतवासी जनताdalit bhangi  and khateek history rewritten उतनी सुखी होगी और ये जितने शक्तिशाली होगे ब्राह्मणवादी उतना ही शक्तिशाली होगा और जनता उतनी ही कमजोर होती जाएगी|इसीलिए डॉ आंबेडकर ने भारतीय संविधान में किसी को किसी भी जाती में विवाह करने की छूट दी है ताकि देश मजबूत हो और ब्राह्मण बनियों द्वारा देश के संसाधनों पर मोनोपोली खत्म होकर जनता के हाथ भी कुछ संसाधन पहुंचे| यकीन न हो तो अपने परदादा और अपनी आर्थिक स्तिथि की तुलना कर के देख लो|बहुत+जनता =बहुजन हित में गौतम बुद्ध से लेकर डॉ अम्बेडकर तक सभी ने मेहनत की पर जनता इनसे घृणा करती है और धर्म से प्यार तो जनता संविधान के नहीं धर्म के पक्ष में है और दुःख भुगत रही है|ध्यान रहे धर्म सदियों चलने वाली राजनीती के आलावा कुछ नहीं, यही है वो सत्य जो गौतम बुद्ध ने खोज निकला था और बहुजन हित और बहुजन सुख की व्यस्था के निर्माण हेतु बौद्ध धम्म की स्थापना की, जिसे हम धर्म समझने की ग़लतफ़हमी में जानना ही नहीं चाहते|

वर्णव्यस्था में शूद्र और क्षत्रिये इन दो वर्णों में जश्न को अपग्रेड या डाउनग्रेड  किया जाता है, ये सदियों चलने वाली प्रक्रिया है| उदाहरण के लिए अभी हाल ही में अम्बेड्करवादी और संगर्शील  जागरूक जातियां खटीक भंगी  और चमार को शूद्र वर्ण से निकालकर क्षत्रिये वर्ण में उनका इतहास बदल कर डाला जा रहा है|

 

दुनिया के हर देश में दलित होते हैं किसी न किसी रूप में| क्या  आपने सोचा की कोई कौम दलित कैसे बनती है ? इसका सीधा सा जवाब है की जो कौम  युद्ध हार जाती है या जो कौम अपने मन वचन और कर्म से युद्ध की तैयारी छोड़ देते हैं वो दलित बन जाते हैं| सदा ध्यान रहे युद्ध सबसे बड़ा सत्य है इसे नज़रअंदाज़ करने से दलित बनने की शुरुआत होती है |किसी भी युद्ध की जीत हार का फैसला तीन बातों से होता है  टेक्नोलॉजी,  नीति,  और आपसी विश्वास या सहयोग| जिस कौम में ये तीनों दूसरी से ज्यादा होंगे वो जीत जाएगी| बदलाव चाहिए तो बल प्रयोग करना ही होगा क्योकि  ये जिन्दगी का नियम है की जो जिस गति में हैं उसी गति में रहना चाहता है अगर उसकी गति या दिशा बदलनी है तो किसी बल का प्रयोग करना पड़ता है|केवल एक बड़ी क्रांति का ‘बल’ ही परिस्थिति बदल पता है|

ये तो लगभग सभी समझ गए हैं और पहले भी समझते ही होंगे की कोई क्रांति ही दशा बदल सकती है , पर भारत में क्रांति क्यों नहीं होती  इसका जवाब जानने के लिए  क्रांति को रोकने वाली वर्णव्यस्था पर ओशो के निम्न विचार पढ़ो

” …तो सब लोग तहे दिल से संतुष्ट होंगे, और यही वजह है कि भरत देश में कभी क्रांति नहीं हुई और न ही कभी हो सक्ति है। दुनियां में जिस भी देश में क्रन्ति होति है उस क्रन्ति कि शुरुआत उस देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग करते है, वो असल मे खुद  क्रांति नहीं करते हैं, लेकिन वे इसकी विचारधारा देते है. भारत में ब्राह्मण बुद्धिजीवी वर्ग है, हर क्रांति स्वाभाविक रूप से उसके खिलाफ चली जायेगी , इसलिए वह कभी क्रांति की विचारधारा नहीं दे सकता| वो तो ऐसी विचारधारा देगा जो क्रन्ति के किसी भी सपने को रोक सके| बेशक राजा, योद्धा, क्षत्रिये भी क्रन्ति के पक्ष में नहीं हो सकते हर क्रांति उनके खिलाफ चली जायेगी. वे राज गद्दि से उतार दिये जायेंगे व्यापारी भी क्रांति के पक्ष में नहीं हो सकता क्योंकि सभी क्रांतियां अमीर के खिलाफ होतीं हैं|

गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया वो शहर के बाहर रहता है वो शहर के अंदर नहीं रह सकता. गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है और राजा के पास अपने कुँए है ही।अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है , उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है.

वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है| “इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा” तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं.”

और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथ ‘कुछ और’ भी चाहिए. ये जो ‘कुछ और’ और है यही तो बुद्धि हो जाता है,बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है|लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं| इस सदी में भारत से बाहर केवल दो व्यक्तियों ने मनु की सराहना की है.

एक फ्रेडरिक नीत्शे है, अन्य एडॉल्फ हिटलर है. एडोल्फ हिटलर फ्रेडरिक नीत्शे का एक शिष्य था फ्रेडरिक नीत्शे फ़ासिज़्म के दार्शनिक था: एडोल्फ हिटलर बस नीत्शे की सीख का अभ्यास कर रहा था. रिश्ते बिल्कुल मार्क्स और लेनिन के बीच के रूप में है. मार्क्स दार्शनिक थाजिसने साम्यवाद की पूरी विचारधारा दे दी है, और लेनिन ने उसे साकार किया उसी तरह फ्रेडरिक नीत्शे और एडॉल्फ हिटलर के बीच रिश्ता था. यह एक संयोग नहीं है कि उन दोनों ने भारत में लिखित पुस्तक की सराहना की . दोनों ने इसकी सराहना की क्योंकि दोनों ही देख सकते थे कि  मनु कितना भव्य मास्टर योजनाकार रहा होगा जिसने एक ऐसी व्यवस्थ बना दी जो अभी भी जिंदा है। उसने हजारों साल के लिए क्रांति को रोका, और शायद वह हमेशा के लिए इसे रोका पाएगा. शायद भारत में कभी क्रांति नहीं हो सकती है.”

Source:  Book Title: The Last Testament, Vol. 2. // Chapter 6: The Intelligent Way  http://www.osho.com/library/online-library-revolution-lenin-india-f65a91d0-351.aspx

आपने कभी सोचा की सदियाँ गुज़र गयीं पर वर्णव्यस्था और जातिवाद ख़त्म क्यों नहीं हो रहा| जानते हैं क्यों क्योंकि आप लोग ही इससे प्रेम करते हैं, आपको अष्ष्हरए हुआ , हाँ यही है सच्चाई असल में आप धर्म और ईश्वरवाद के आईडिया या सिद्धांत को प्रेम करते हो  एयर यही धर्म और ईश्वरवाद के आईडिया या सिद्धांत को भेद की खाद है जो वर्णव्यस्था और जातिवाद नमक भेड़िये ने पहन रखी है| यही है सबसे बड़ा सच|

जो भी संसार का इतिहास जानते हैं वो समझ सकते हैं की सारे संसार में जितने भी बड़े युद्ध और नरसंघार हुए उन सबकी जड़ में धर्म और ईश्वर सिद्धांत के नाम पर मानवीय बंटवारा रहा है|धर्म और ईश्वर का सिद्धांत मानवता को उतना नहीं देता जितना ईनको जिन्दा रखने के कीमत मानवता को चुकानी पड़ती है| आप भी गौर करोगे तो जान जाओगे की धर्म और ईश्वर का सिद्धांत इंसानी कमजोरियों जैसे  डर,अज्ञानता,भेड़चाल, आदि  से पैदा होता है और पुरोहित वर्ग को राजनैतिक सरक्षण द्वारा इसी कमजोरी का दोहन करके राजनैतिक लाभ लिया जाता है| धर्म और ईश्वर का सिद्धांत कौमी अहंकार और मान की जगह ले लेता हैं| इसीलिए ऐसे में ये जानते हुए भी की उनका धर्म और ईश्वर का सिद्धांत गलत है फिर भी इसके छोड़ने की बजाये लड़ने मरने को तैयार रहते हैं|पता नहीं आप कुछ समझे या नहीं पर मुझे लगता है आप इतना तो समझ ही सकते हो की धर्म और ईश्वर का सिद्धांत उतना अच्छा नहीं जितना आप इसे समझते आये हो| ज्यादा समझने के लिए इतिहास और धर्म और पांडा पुरोहितवाद की जड़ में जाना होगा|अगर कुछ समझे हो तो धर्म और ईश्वर के सिद्धांत से ज्यादा मानवता को अहमियत दो इसी में सबका भला है|

मैं धर्म की गुलामी के लिए ब्राह्मणों को दोष नहीं देता । ये तो हमको ही लात खाने की आदत पड़ी हुई है वर्ना ब्राह्मणों ने तो अपने धर्म से हमको दूर रखने की पूरी कोशिश की थी ।उन्होंने हमको अपने धार्मिक ग्रंथो को पढने से दूर रखा ।उन्होंने अपने ग्रंथो को सुनने से दूर रखा और ऐसा करने पर कानों में पिघला शीशा डालने की सजा का भी प्रावधान किया ।उन्होंने हमको अपने धर्म के मन्त्र आदि उच्चारित करने से भी दूर रखा और ऐसा करने पर जुबान काटने का भी प्रावधान किया ।उन्होंने हमको अपने मंदिरों से भी दूर रखा ।उन्होंने अपने ग्रंथो में भी लिखा कि ये देवी देवता सिर्फ द्विजों का भला करते हैं ।फिर भी हम वो ही करते हैं जिनको वो मना करते हैं और दोष ब्राह्मणों को देते हैं । लात खाने की हमारी आदत जाती ही नहीं है । इतने सारे प्रतिबन्ध होने के बावजूद भी हमारे धार्मिक गुलाम होने के क्या कारण हैं |डॉ आंबेडकर ने सही कहा है ‘ब्राह्मणवादी शोषण ब्राह्मणों के ज्ञान की वजह से नहीं बल्कि शूद्रों के अज्ञान की  वजग से है ‘

आज देश में जो कुछ भी गलत है उसकी जड़ में ब्राह्मणवाद या मनुवाद की वर्ण व्यस्था और जातिवादी व्यस्था है और जो कुछ भी सही है उसकी जड़ में अम्बेडकरवादी संविधान या धम्म है| उदाहरण के लिए दुनिया का दूसरा आबादी में बड़ा देश जो आज मंगल गृह पर पहुंच गया है, आंबेडकर संविधान से पहले दो हज़ार सालों तक यहाँ कोई अच्छी मानवीय तरक्क़ी नहीं हुई थी, बस हर विदेशी अकर्मणकारी  से हारता रहा| ऐसा क्यों क्या इतनी बड़ी जनसँख्या में में कोई भी प्रतिभावान नहीं था या है| ये बात आप भी समझ सकते हो की ये असंभव है की इतनी बड़ी आबादी में से हम प्रतिभावान वैज्ञानिक, खिलाडी, नीतिज्ञ, कानूनविद आदि न खोज पाये| पर अगर हम केवल तीन प्रतिशत ब्राह्मण में से ही खोजेंगे और बाकि के देश वालों को किसी लायक नहीं समझेंगे तो फिर क्या, मिला तो ठीक नहीं तो देश पीछे| मतलब ये हुआ की भले ही देश की जनसँख्या सवा करोड़ हो पर मूल रूप से केवल दस करोड़ ही है क्योंकि मौके ही नहीं दिए जाते| बाकि कोई अगर एक्लव्ये की तरह मौका ले भी ले तो उसका अंघूठा काट लिया जाता है| तो ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि रखनी की कीमत चुकाते चुकाते भारत देश जो बौद्ध काल में विश्व गुरु था सोने की चिड़िया था, अम्बेडकर संविधान के लागू होने से पहले तक ऐसे दुर्दशा और गर्त में पहुंच गया था की लोग भूखों मरने लगे थे| फिर अम्बेडकर संविधान यानि धम्म के लागू होने के बाद जब प्रतिभाएं केवल ब्राह्मणों में खोजने तक ही सीमित न रही सारे देश में खोजी गयी तो आज भारत मंगल गृह पर पहुंच गया और भारत दिन दूनी रात चौगनी तरक्की कर रहा है|अब भी जो कसर बाकि रही है वो फिर वही ब्राह्मणवाद और जातिवाद की वजह से है| हे भारतवासियों सावधान अब भी ब्राह्मणवादी शरारती तत्व देश को वापस ब्राह्मणवादी अन्धकारी युग में धकेलने पर लगे हुए हैं, अब भी ये लोग अम्बेडकर संविधान को हटा कर मनुविधान लागू करने के लिए माहौल बना रहे हैं जबरदस्त षडियंत्र और संगर्ष कर रहे हैं|

 

…समयबुद्धा

 

One thought on “8-OCT-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: ”ब्राह्मणवादी वर्ण व्यस्था” शोषितों की क्रांति रोकने वाला औज़ार है

  1. ब्राह्मण/द्विज वर्ण है ,जाति नहीं ,सचमुच जातियां श्रम का विभाजन का स्वरूप है ,जिनका आर्थिक उत्पादन से ही कुछ लेना देना है ,परन्तु केवल शूद्र वर्ण में जातियां होती है ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य वर्ण में जातियाँ नहीं होती ,बल्कि गोत्र होता है और शूद्र गोत्र विहीन क्यों ? इस विषय पर उस गोष्ठी में कुछ नहीं कहा गया है ,न ही इस विषय पर चर्चा की गयी है की वर्ण के उत्पति का उद्गम क्या था और जातियों के यानी शूद्र के बिच क्रमागत विभेद के कोई सह्त्यिक और पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता है तो क्यों ?
    Ashok Dusadh 8:22pm Mar 27
    अब चंडीगढ़ में ”जाति -प्रश्न और मार्क्सवाद ” पर गोष्ठी हुई जिसका अंततः निष्कर्ष निकल गया वह इस प्रकार व्यक्त हुआ ….
    1) उत्पादन के साधन और श्रम -विश्लेषण से तय हुआ जाति व्यस्था सामंत व्यस्था की दें है ,अब पूंजीवाद इस जाति व्यस्था को जिन्दा रखे है .
    2) डॉ अम्बदेकर एक विफल चिन्तक थे ,उनके पास कोई परियोजना नहीं थी जिसे जाति व्यस्था ख़त्म हो .
    3) मार्क्सवाद को अब एक परियोजना तैयार करनी होगी ,जिससे जाती व्यस्था ख़त्म हो।
    तीनो स्थापनाओ में कोई जान नहीं है ,नहीं ये ब्राह्मण/द्विज ‘मार्क्सवादी ‘कोई क्रांतिकारी वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत कर पाए ,उन्हें ये तो पता नहीं है की ब्राह्मण/द्विज वर्ण है ,जाति नहीं ,सचमुच जातियां श्रम का विभाजन का स्वरूप है ,जिनका आर्थिक उत्पादन से ही कुछ लेना देना है ,परन्तु केवल शूद्र वर्ण में जातियां होती है ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य वर्ण में जातियाँ नहीं होती ,बल्कि गोत्र होता है और शूद्र गोत्र विहीन क्यों ? इस विषय पर उस गोष्ठी में कुछ नहीं कहा गया है ,न ही इस विषय पर चर्चा की गयी है की वर्ण के उत्पति का उद्गम क्या था और जातियों के यानी शूद्र के बिच क्रमागत विभेद के कोई सह्त्यिक और पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता है तो क्यों ? और क्यों इन शूद्र जातियों के परस्पर आपस में जातिभेद पनप गया ,जाति व्यस्था पर वर्ण का शास्त्रीय वर्ण -विभेद का असर क्योंकर हुआ कोई विश्लेषण ये मार्क्सवादी नहीं प्रस्तुत कर पाए ?.डॉ आंबेडकर को बिना कारण और तर्क के विफल कहना उनके जातीय पूर्वाग्रह का नग्न पर्दर्शन क्यों न माना जाए ?.वे भविष्य कोई परियोजना बनाना चाहते है तो बनाये जिससे जाती व्यस्था ख़त्म हो जायेगी ,पहले वो परियोजन प्रस्तुत करे तब बहुजन से संवाद करे ….Palash Biswas

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