मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) के आंदोलन और राजनीति की कमियाँ …..प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली …BBC


मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) के आंदोलन और राजनीति की कमियाँ  प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

kansiram change sutra
मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता  बाबा साहेब अंबेडकर का आंदोलन मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति का आंदोलन था और मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति से मेरा मतलब है कि वर्ण व्यवस्था के अभिशाप से मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज को कैसे छुटकारा मिले. मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों की सदियों से जो समस्या चली आ रही है, चाहे वो छुआ-छूत की हो, अशिक्षा की हो, ग़रीबी की हो, सामाजिक बहिष्कार की हो, इन सबके मूल में वैदिक धर्म था. अंबेडकर जी ने इसी वैदिक व्यवस्था पर अपने आक्रमण से आंदोलन की शुरुआत की थी.

साथ ही उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज को जाग्रत करने की नीव डाली. उनके पहले ऐसा काम गौतम बुद्ध को छोड़कर और किसी ने नहीं किया था.

उन्होंने मनु-स्मृति को जलाकर अपने आंदोलन की शुरुआत की थी. महाड़ में जाकर पानी के लिए आंदोलन किया. मंदिर प्रवेश की समस्या को उठाया. उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों के लिए गणेश-पूजा की माँग भी उठाया. उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों को जनेउ पहनाने का भी काम किया.

हालांकि वो ख़ुद धर्म में विश्वास नहीं करते थे पर मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) की मानवाधिकार की लड़ाई में उन्होंने इन बुनियादी सवालों से काम करना शुरु किया था.

अंबेडकर जैसा कोई विकल्प नहीं:

अंबेडकर का विकल्प कैसे पैदा होगा जब उनके विचार को ही नहीं अपनाया जाएगा.आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता पूरी तरह से भटक गए हैं. अंबेडकर को कोई नहीं अपनाता है. कोई सत्ता का नारा देता है तो कोई सत्ता में भागीदारी का नारा देता है और इन सबका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ ही हैउस सोच से आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता पूरी तरह से भटक गए हैं. अंबेडकर को कोई नहीं अपनाता है. कोई सत्ता का नारा देता है तो कोई सत्ता में भागीदारी का नारा देता है और इन सबका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ ही है.आज के नेतृत्व में सोच का ही अभाव है और इसीलिए जो काम बिना चुनावी राजनीति में गए अंबेडकर ने कर दिखाया उसे आज के मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता बहुमत पाने या सरकार बनाने के बाद भी नहीं कर पाते.

अंबेडकर जी के अनुभवों से एक बात तो स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है कि जैसे ही मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) संगठित होना शुरू करते हैं, हिंदू धर्म में तुरंत प्रतिक्रिया होती है और धर्म को बचाने का जिम्मा लेने वाले तुरंत लचीलापन दिखाना शुरू कर देते हैं पर इस बात को मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) समाज का नेतृत्व नहीं अपना रहा है.

खैरलांजी की घटना वैदिक काल में मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों पर हुए अत्याचारों की पुनरावत्ति ही है जिससे यह साफ है कि वैदिक परंपरा पर हमला किए बिना मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति की बात करना बेमानी है.

जातीय सत्ता का दौर:

मंडल आयोग से पहले तक राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता में आती थीं. मंडल आयोग की रिपोर्ट के सामने आने के बाद से अब जातियाँ सत्ता में आती है.जातीय सत्ता का यह जो दौर है इसे मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि इसमें तो लोग जाति पर कब्जा करके उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं|जातीय सत्ता का यह जो दौर है इसे मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) मुक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि इसमें तो लोग जाति पर कब्जा करके उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.सामाजिक व्यवस्था को बदलने का अभियान, जो कि मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति का मुख्य मुद्दा हुआ करता था, वो मुद्दा मुद्दा ही रह गया है.

जातीय राजनीति से सत्ता में आने का लाभ कुछ लोगों को ज़रूर होता है. उस जाति के भी कुछ गिने-चुने लोगों को लाभ हो जाता है पर जातीय सत्ता ने न तो मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) ों का कल्याण हो सकता है और न ही जाति व्यवस्था का अंत हो सकता है.आज का मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) नेता हिंदुत्व पर कोई हमला नहीं कर रहा बल्कि हिंदुत्ववादी शक्तियों के साथ समझौते का काम कर रहा है. मायावती तो हर जगह जा-जाकर बता रही हैं कि ब्राह्मण ही बड़े शोषित और पीड़ित हैं.अब तो इसी समीकरण के साथ काम हो रहा है कि कुछ ब्राह्मणों को ठीक कर लो, कुछ क्षत्रियों को मिला लो, कुछ बनियों को साथ ले लो और सत्ता में बहुमत हासिल कर लो. सत्ता की यह होड़ न तो सामाजिक मुक्ति की होड़ है और न ही सामाजिक परिवर्तन की.

तुलसीराम मानते हैं कि आज जातीय सत्ता का दौर आ गया है

पेरियार और अंबेडकर:

दक्षिण में जो आंदोलन चला वो पेरियार के ब्राह्मण विरोध की उपज थी. बहुत ही सशक्त आंदोलन था पर दुर्भाग्य की बात यह है कि वो ब्राह्मण विरोधी आंदोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं बन पाया.ब्राह्मणों की सत्ता तो ज़रूर ख़त्म हुई और पिछड़ी जातियों के नेता सामने आए पर लेकिन हिंदुत्ववादी दायरे में रहते हुए उन्हीं कर्मकांडों को वो भी मान रहे हैं जिन्हें कि ब्राह्मण मानते थे.दक्षिण में जो आंदोलन चला वो पेरियार के ब्राह्मण विरोध की उपज थी. बहुत ही सशक्त आंदोलन था पर दुर्भाग्य की बात यह है कि वो ब्राह्मण विरोधी आंदोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं बन पाया |

एक दूसरे ढंग का ब्राह्मणवाद वहाँ आज भी क़ायम है:

उत्तर भारत में कोई ब्राह्मण विरोधी आंदोलन नहीं चला. जो भी चला वो अंबेडकर का ही आंदोलन था.अंबेडकर के आंदोलन का प्रभाव उत्तर में ज़्यादा रहा भी पर यहाँ मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) उस तरह से सत्ता पर कब्ज़ा नहीं कर पाए जिस तरह से पिछड़े वर्ग के लोगों ने दक्षिण में किया.मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति का जहाँ तक प्रश्न है, दक्षिण भारत में पिछड़ों की राजनीति मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति को निगल गई है. वहाँ तो मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति के नाम पर कुछ नहीं है.जो भी है वो उत्तर भारत में हैं पर उसमें समझ की भी कमी है और बिखराव भी है. सही मायने में देखें तो यह अंबेडकर का मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) आंदोलन भी नहीं है और अंबेडकर की बताई हुई मूलनिवासी बहुजनों (SC+ST+OBC) राजनीति भी नहीं है.

(पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

http://www.bbc.co.uk/hidr tulsiramndi/regionalnews/story/2006/12/061205_dalit_special_tulsiram.shtml

 

प्रोफ़ेसर तुलसीराम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

 

 

 

 

 

 

 

 

नोट जैसा की समयबुद्धा मिशन की पालिसी है की ब्राह्मणवादी मीडिया द्वारा दिया गया अपमानजनक शब्द “दलित” का इस्तेमाल नहीं करना है इसलिए इस लेख में ‘दलित’ शब्द को “भारत के मूलनिवासी बहुजनों SC=ST+OBC” से REPLACE  कर दिया गया है, बाकि लेख ज्यों का त्यों ही प्रस्तुत है|

 

 

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