पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ?…बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये


nalandaruins1तमिलनाडु में खुदाई में मिला प्राचीन बौद्ध स्मारक -दैनिक भास्कर
बिहार के केसरिया में खुदाई में मिला दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप
मध्यप्रदेश में खुदाई में मिली बुद्ध की विशाल मूर्ती
केरल में खुदाई से प्राप्त हुआ विशाल बुद्ध विहार के अवशेष…….

पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ? खुदाई में अति प्राचीन कोई ब्राह्मण मंदिर अथवा 33 करोड़ देवताओं में से किसी एक की भी कोई विशाल प्रतिमा क्यूँ नहीं प्राप्त होती ? क्या बड़े बड़े बौद्ध मंदिर बौद्ध स्तूप बौद्ध विहार विशाल बौद्ध शिलालेख एवं विशाल बुद्ध प्रतिमाएं समय के अंतराल में स्वतः ही भूमिगत हो गईं ! यदि ऐसा होता तो
प्राचीन हिन्दू मंदिरों के अवशेष भी अवश्य मिलने चाहिए थे ! वैदिक संस्कृति को दुनिया की सबसे प्राचीन और परिष्कृत सभ्यता होने का ढिंढोरा पीटने वाले बताये की आपके 11 लाख वर्ष पहले पैदा होने वाले राम की कोई प्राचीन प्रतिमा अथवा मंदिर समय के अंतराल में दफ़न क्यूँ नहीं हुआ ! आपके अनुसार सात हजार साल पहले पैदा हुए कृष्ण का कोई मंदिर खुदाई में क्यों नहीं निकला ? खुदाई में आपके किसी भी देवी देवता अवतार या भगवन से सम्बंधित कोई भी वास्तु क्यों नहीं प्राप्त हुई ?

या तो आपकी संस्कृति इतनी समृद्ध नहीं थी या फिर बुद्ध से सम्बंधित संस्कृति आपकी संस्कृति से हजारों गुणा श्रेष्ठ,उन्नत,परिष्कृत, एवं विशाल थी ! यदि ऐसा था तो फिर इतनी विशाल सभ्यता जमीन के निचे कैसे चली गई ? मिस्र के पिरामिड जो की रेगिस्तान के भयंकर तूफानों को झेलकर भी भूमिगत नहीं हुए , उन्हें खोद कर नहीं निकाला गया , जो बुद्ध से भी दो ढाई हजार साल पुराने है और भारत में बुद्ध से सम्बंधित अधिकांस स्थानों को खुदाई द्वारा ही ढूंडा गया है ! भारत की मूल प्राचीन सिन्धु संस्कृति के पूरे के पूरे शहर को ही 1922 में संयोग वश की गई खुदाई में ही ढूंडा गया !

इसका कारण हम आपको बताते है ! असल में 189 ई.पू. में जब सम्राट अशोक के वंसज वृह्दुत्त की हत्या ब्राह्मणों ने पूरे योजनाबद्ध तरीके से उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुङ्ग द्वारा करवाई ! उससे पहले पूरे भारत में भारत के कोने कोने में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित बुद्ध धम्म का ही परचम लहराता था , उस समय भारत के कोने कोने मे बुद्ध स्मारक , बौद्ध स्तूप ,बौद्ध मठ , बौद्ध विहार , और बुद्ध से सम्बंधित अन्यविशाल स्मारक ही थे , कोई भी ब्राह्मण मठ अथवा मंदिर नहीं था ,

वृह्दत्त की हत्या के बाद चले ब्राह्मण और श्रमणों(बौद्धों) के लम्बे एक तरफ़ा संघर्ष में ब्राह्मण अपनी कुटिल और धुर्त नीतिओ के कारन जीत गए , व्यापक पैमाने पर बौद्ध भिक्षुओ और बौद्धों का नरसंहार किया गया , और उनके इतिहास को सदा के लिए जानबूझकर जमीं के नीचे दफ़न कर दिया गया ! और अपने षड्यंत्रो के सबूतों को भी साथ में दफना दिया , उन्हीं सबूतों को हमारे लोग खोद कर निकालने का प्रयास कर रहे हैं आइये खोद कर निकाले गए कुछ सद्यंत्रों के अवशेषों को देखते है

“अशूकावदान” नमक पुस्तक से पता चलता है की पुष्य मित्र ने पाटलिपुत्र से लेकर जालंधर तक सभी बौद्ध विहारों कओ जलवा दिए गए और यह घोषणा की की जो मुझे एक बौद्ध का सर लाकर देगा मैं उसे सोने की सौ मुद्राये प्रदान करूँगा

सातवी सदी में बंगाल के राजा शशांक ने बौद्धों के विरुद्ध बहशीपन की सीमा पार कर दी ! चीनी यात्री ह्वानशांग लिखता है की उसने कुशीनगर से वाराणसी के बिच के सभी बौद्ध विहारों को तबाह कर दिया ! पटलीपुत्र में बुद्ध के पधचिन्न्हो को गंगा में फिंकवा दिया और ब्राह्मणों के इशारों पर उसने गया के बौद्ध वृक्ष को कटवा दिया तथा बुद्ध की मूर्ती के स्थान पर शिव की मूर्ति रखवा दी !

तमिल के पेरिया-प्रनानम नमक ग्रन्थ के अनुसार राजा महेन्द्र वर्मन ने असंख्यो बुद्ध स्मारकों और विहारों को आग लगवा दी

11वि सदी में मैसूर के राजा विष्णु वर्मन ने बौद्ध और जैन मंदिरों को ध्वस्त करवा दिया

महावंश पुराण के 93 वै परिच्छेद के 22 श्लोक के अनुसार तथा सिंघली कथाओं में भी उल्लिखित है की राजा राजा जय सिंह ने बौद्धों पर इतने भयंकर अत्याचार करवाए की पूरा सिंघल द्वीपबौद्धों से खाली हो गया !

शंकर दिग्विजय के अनुसार “राजा सुधन्वा ने अपने व्राह्मण गुरु कुमारिल भट्ट की आज्ञा से अपने सेवकों को ये आदेश दिया की रामेश्वर से लेकर हिमालय तक के सारे भूभाग पर जो भी बौद्ध मिले , चाहे वो बूढ़ा हो या बच्चा उसे क़त्ल कर दो जो ऐसा नहीं करेगा उसे मैं कट कर दूंगा ” शंकर दिग्विजय अ.1, श्लोक 93-94)

इस प्रकार के और भी हजारों उदहारण भरे पड़े है इन्ही द्वारा लिखित साहित्यों में …………!

क्या यह उदहारण काफी नहीं है ये समझने के लिए की बुद्ध से समंधित इतिहास जमीं के निचे क्यूँ और कैसे चला गया ?

बोधिसत्व भाई शकील प्रेम

3 thoughts on “पूरे भारत में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यदि कुछ प्राचीन मिलता है तो वो बुद्ध से या सम्राट अशोक के काल से सम्बंधित होता है ! कभी आपने सोचा ऐसा क्यूँ ?…बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

  1. बुद्ध स्तूप और संस्कृति. आ. भाई शकील प्रेम जी, क्या इन आर्यों को बुद्ध संस्कृति की श्रेष्ठता और समृद्ध संस्कृति पसंद नहीं थी? | उन्होंने इस विशाल सभ्यता को क्यों मिटाना चाहा? जो सभ्यता- एशिया, यूरोप, तथा नई दुनियाँ (अमेरिका ) तक फैली थी |

    इतना सारा विनाश कई हज़ार वर्षों के बाद संभव हुआ क्योंकि इसे नष्ट करना भी अपने आप में एक चुनौती थी | जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता था उसके विनाश को केवल वहां से जुड़े लोगों और भिक्षुओं को मारकर ही संभव था | क्योंकि जब उसकी देख-रेख नहीं होगी तो वह स्वंय गिर जायेगी | स्तूपों की बनावट कई मंज़िलों में थी जिनमें बरसात, जाड़ा, और गर्मी से बचने के लिए सुरक्षित जगह थी | स्तूप में घुसने के लिए केवल एक ही जगह थी वह भी इतनी आसानी से नहीं ढूंढी जा सकती थी |

    यदि हम स्तूपों को सावधानी से अध्ययन करें तो उनकी बनावट, आकृति, अंदर की सीढ़ियाँ, हवा- प्रकाश के लिए छेद स्वाभिक नहीं थे | जिन्हें आप जूनागढ़ (गुजरात), केसरिया स्तूप (बिहार), स्लीपिंग बुद्धा पार्क (लाओस- एशिया) में देख सकते हैं |

    जूनागढ़- गुजरात की गुफाओं में स्तूप की ऊँचाई दब गयी है फिर भी उसमें अंदर घुस कर उसके निर्माण कार्य और व्यवस्थित वास्तुकला को देखा जा सकता है मुझे इस गुफा में घुसते ही पता चल गया था कि यह बुद्ध स्तूप है क्योंकि मैं इससे पहले जमीन पर खड़ा तीन- चार मंज़िल का स्तूप लाओस में देख चुका था | लाओस में अभी भी सच्चे बुद्ध – संस्कृति के अवशेष और सभ्यता विद्यमान है | केसरिया स्तूप- बिहार का ये स्तूप शायद संसार का सबसे बड़ा स्तूप था | जिसकी ऊँचाई अन्य स्तूपों से अधिक थी | इसकी गोलाकर चौड़ाई आज़ भी देखी जा सकती है | इसके चारों ओर कमल के फूल कि आकृति अभी भी देखी जा सकती है | यदि नीचे से खड़े होकर देखें तो इस स्तूप को दस मंज़िल कहा जा सकता है | इस स्तूप का महत्व इसलिए है कि यहाँ सिद्धार्थ गौतम ने एक बड़ी नदी को पार करके शाही वस्त्रों को त्यागकर केसरिया-चीवर धारण किया था | यह कुशीनगर (कुशीनारा) से पटना (पाटिलपुत्र) जाते समय रास्ते में पड़ता है | आज़ इसके पीछे उत्तर-पूर्व में हिन्दू मंदिर का निर्माण हो गया है क्योंकि बुद्ध समुदाय इसका विरोध नहीं कर पा रहा है | कमल की आकृति को मिटाने के लिए वहां से ईंटें निकालीं जा रहीं हैं जिसे स्तूप तक जाने के रास्ते और मंदिर में प्रयोग किया जा रहा है | इस रास्ते के दोंनों तरफ बहुत बड़े पानी के तालाब हैं जहां लिली, कमल आदि के फूल अभी भी खिलते हैं | लाओस-पीडीआर (थाईलैंड) यह एक बहुत छोटा बुद्धिष्‍ट देश है जहाँ बुद्ध सभ्यता और वहां के लोगों को इसका अनुसरण करते सुबह छ: से सात बजे तक देखा जा सकता है | जहाँ उपासक भिक्षुओं को भोजन देते हुए देखा जा सकते हैं | भिक्षु भी भिक्षापात्र लिए नंगे पैर हर गली में जाते हैं और उपासकों को धम्म- आशीष देते हुए अपने निवास विहार को चले जाते हैं | इस देश में आज़ भी रेल व्यवस्था नहीं है और न बड़े- बड़े हाईवे हैं | बुद्धा पार्क का स्तूप और उसमें विद्यमान हिन्दू अवतार, एहरावत हाथी, समुन्द्र मंथन जैसे कई अन्य पत्थरों पर तराशे हुए आकर्षण हैं जिससे इसे हर यात्री उसे देखना चाहता है | बुद्ध की लगभग ४५ फुट लम्बी सोते हुए ध्यान में देखी जा सकती है जिसने इस पार्क की बिशेष चित्रकारी और बुद्ध संस्कृति को उभारा है |

    इस बुद्धा पार्क के स्तूप में आठ बीमों पर सधी हर मंज़िल को देखा जा सकता है, हर मंज़िल पर जाने के लिए सकरी सीढ़ियाँ हैं जिससे और अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये स्तूप सैन्य सुरक्षा जैसे स्थल भी रहे होंगे | इसका इतिहास नहीं मिल सका था क्योंकि मैं कुछ घंटों के लिए पहली बार वहां गया था | फिर भी एहरावत हाथी जिसके तीन सिर होते हैं अतः छ: आँखें, छ: कान और तीन सूँड थे जो महाभारत के समय लड़ाई में प्रयोग किया गया था पहली बार देखा था | यहाँ की सभ्यता में यहाँ के लोगों का लकड़ी की चित्र-कला में देखा जा सकता है | इस प्रकार बुद्ध संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ संस्कृति को कभी भी मिटाया नहीं जा सकता है | कोशिश ही की जा सकती है | जिसा संस्कृति ने मानव को मानव के रूप में पहिचाना और उसका सम्मान किया, न सेना की आवश्यकता पड़ी और न पुलिस- सिपाही की | देश और विश्व को ज्ञान देने वाली उस संस्कृति और सभ्यता को जब हमें विश्व- गुरू और सोने की चिड़िया कहा गया | ऐसी संस्कृति और सभ्यता को नमन, उस बुद्ध-सिद्धार्थ को नमन जिसने अपनी करुणा का वैभव संसार में फैलाया और मानव को जागृत किया | रामबाबू गौतम, न्यू जर्सी (अमेरिका) ( अक्टूबर २३, २०१४ )

  2. “अतीत का पीछा न करो ।
    भविष्य के भ्रम जाल मे न फ़ंसो।
    अतीत व्यतीत हो गया ।
    भविष्य अभी अनागत है ।
    यहाँ अभी इस क्षण जीवन जैसा है , उसी को धारण करो
    साधनाभ्यासी ,स्थिरता और मुक्त भाव मे जीता है ।
    कल की प्रतीक्षा की , तो विलम्ब होगा।
    मृत्यु अचानक धर दबोचती है
    उससे हम क्या समझोता कर सकते हैं ?
    भिक्खुजन उसी का आह्वान करते हैं
    जो दिन और रात
    सचेतानावस्था मे जागृत रहता है
    जो जानता है कि
    एकान्तवास का उत्तमतर मार्ग क्या है । ”
    स्त्रोत : मॆट्टा सुत्त(M. 131); भदिद्कारता सुत्त, आंनद भद्दकारता सुत्त

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