26Nov संविधान दिवस विशेष-“”संविधान: जिसने देश को दी नई दिशा””…जिसने आपको नया जीवन दिया वह है आपका संविधान और इस जीवन का थोडा समय जरूर दे इसे पढने में।

संविधान विशेष!!26nov1949!!

“26Nov संविधान दिवस विशेष”

जिसने आपको नया जीवन दिया वह है आपका संविधान और इस जीवन का थोडा समय जरूर दे इसे पढने में। “लिखने वाले ने मेहनत से लिखा है आपके पढने के लिए”ambedkar-samvidhan sadhye

“”संविधान: जिसने देश को दी नई दिशा””

भारत का संविधान 26Nov 1949 में स्वीकार किया गया। संविधान के मायने क्या होते है, शायद उस समय भारत के लोगो को यह पता नहीं था। लेकिन दुनिया में संविधान का महत्व स्थापित हो चुका था। अमेरिका में 1779 में संविधान बन चुका था। हालांकि UK में उस तरह का संविधान नहीं है लेकिन वंहा MAGNA CARTA जैसी संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था कायम हो चुकी थी जिसके तहत राजा ने अपनी जनता की साथ अपने अधिकारों को बाट लिया था। वंहा अब तक इसी तरह कई settlement से बनी व्यवस्था कायम हैऔर 15जून2015 को उसके (MAGNA CARTA) के 800साल होने वाले है।
संविधान असल में समूह में बंटे लोग जो राष्ट्र बनना चाहते है, को मानवीय अथिकार दिलाता है। इसके तहत लोगो के लिए स्वतंत्रता , बंधुता ,समानता और न्याय के लिए व्यवस्था का निर्माण किया जाता है। यह सभी मनुष्यों को समान अधिकार भी देता है और इनके बीच भेदभाव को अपराध भी घोषित करता हैे।
1950 के बाद विश्व के लगभग 50देशो ने अपना संविधान बनाया जिसमे भारत उनमे से पहले स्थान पर है और भारत का संविधान ही अन्य देशो के लिए प्रेरणा बना।हालांकि यंहा यह भी साफ़ कर देना होगा कि भारत की “आज़ादी का आन्दोलन” और ” भारत के संविधान” का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है , दोनों ही अलग अलग घटनाएं है। जब सन1928 में simon commission भारत आया तो उस समय constitutional settlement की बात उठी। अंग्रेजो ने यह तय करना जरूरी समझा कि भारत कोब्सत्ता के हस्तांतरण के बाद भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही लागू हो और इस पूरी प्रक्रिया में Baba Saheb Dr आंबेडकर की भूमिका प्रमुख रही।अगर हम ए.बी.ए. साहेब के सम्पूर्ण जीवन को देखे तो यह साफ़ हो जाएगा कि वे constitutional settelment को लेकर कितने गंभीर थे। उनका मानना था कि देश मे सामाजिक क्रांति तभी स्थाई होगी जब संवैधानिक गारंटी होगी। वह संविधान के जरिये देश में समानता स्थापित करना चाहते थे। वह चाहते थे भारत में असमानता ख़त्म हो और समानता आये और लोगो को उनका fundamental right मिले। संवैधनिक तौर पर भारत में जाति और वर्णजैसी व्यवस्थाऔर मनुस्मृति के तहत बनाये गये क़ानून का खत्म होने का वक़्त आ गया था।
ज्योतिबा फुल,े साहूजी महाराज, गाडके बाबा, नारायण गुरु , पेरियार और बाबासाहब डॉ आंबेडकर के माध्यम से जो सामाजिक क्रांति आई थी , उसे एक पहचान चाहिए थी। इसके लिए भारत में एक संविधान की जरूरत थी, हालांकि यंह यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत में राजनैतिक क्रांति की बजाय सामाजिक क्रांति की वजह से संविधान बना है। क्योंकि जो लोग राजनैतिक क्रांति में सक्रीय थे वो नहीं चाहते थे कि भारत में संविधान हो । वह बिना संविधान के ही देश भारत देश को चलाना चाहते थे। लेकिन भारत में सामाजिक क्रांति के कारण इतने ज्यादा मजबूत थे कि राजनैतिक लोग चाह कर भी संविधान निर्माण रोक नहीं पाए। Dr आंबेडकर जी के लगातार सक्रिय रहने के कारण british लोग भी भारत में मौजूद असमानताओ को समझ चुके थे और वे आंबेडकर तथा संविधान के पक्ष में थे। इस तरह से भारत में संविधान बनने की प्रक्रिया पर मोहर लगी।

इन सारी चीजो की वजह से 9Aug 1946 को 296 सदस्यों की संविधान सभा बनी। देश का विभाजन होने के कारण इसमें से 89 सदस्य चले गय। इस तरह भारतीय संविधान सभा में 207सदस्य बचे और इनकी पहली बैठक में सिर्फ 207 सदस्य ही उपस्थित थे इसमें से बाबा साहेब Dr Ambedkar पहली बार 9dec1946 को बंगाल से चुनकर आये (मुश्लिम vote द्वारा) और इसके तुरंत बाद विभाजन हो गया जिसके बाद बाबा साहेब जिस संविधान परिषद की सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे उसे पाकिस्तान को दे दिया गया। इस तरह से बाबा साहेब अ निर्वाचन रद्द हो गया। विभाजन की साजिस इसलिए भी रची गई ताकि dr ambedkar संविधान सभा में नहीं रह पाए। हालांकि इन सभी साज़िसो को दरकिनार करते हुए बाबा साहेब दुबारा 14जुलाई1947 को चुनकर आये।

‘अब Dr Ambedkar दुबारा कैसे चुने गए? ‘

असल में डा आंबेडकर जब पहली बार संविधान सभा में चुन कर आये और विभाजन के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र के पाकिस्तान में चले जाने के कारण संविधान सभा का हिस्सा नहीं रहे, उस वक़्त UK की Parliyament में Indian Constitution Assembly का बहुत कड़ा विरोध हुआ और विरोध को दबाने के लिए नेहरु को UK के नेताओं को समझाने के लिए britain जाना पड़ा था। इस विरोध की गंभीरता को इससे समझा जा सकता है कि कद्दावर नेता ‘चर्चिल’ ने यंहां तक कह दिया कि भारतीय लोग संविधान बनाने लायक नहीं है। इन लोगो को आज़ादी देना ठीक नहीं होगा। दरी बात Britishiors अल्पसंख्यको के हितो को लेकर काफी गंभीर थे। तात्कालिक स्थिति मेंUK पार्लियामेंट का कहना था कि अगर भारत में constitutional settlement होता है तो इसमें अल्पसंख्यको के हितो की गारंटी नहीं होगी, क्योंकि बाबा साहेब का कहना था कि इस पूरी प्रक्रिया में SCऔरST नहीं है खासतौर से अछूत हिन्दू नहीं है। बाबा साहेब ने इसको साबित करते हुए SC-ST के लिए seperate safegaurd की बात कही थी। बाबा साहेब की इस बात पर UK के पार्लियामेंट में लम्बी बहस हुई थी। इस बहस से ये स्थिति पैदा हो गई थी कि अगर भारत में अधिकार के आधार पर, बराबरी के आधार पर अल्पसंख्यको( इसमें sc -st भी थे) के अधिकारो का settlement नहीं होगा तो भारत का संविधान नहीं बन पायेगा और इसे वैधता नहीं मिलेगी और अगर संविधान नहीं बनेगा तो भारत को आज़ादी नहीं मिलेगी। ऐसी स्थिति में बाबा साहेब को चुनकर लाना कांग्रेस और पुरे देश की मजबूरी हो गई और इस प्रकार बाबा साहेब संविधान निर्माता के रूप में संघर्षरत रहे।बाबा साहेब अगर UK की constitutional assembly में नहीं होते तो अछूतो के अधिकारों का संवैधानिक सेटलमेंट होने की बात नहीं मानी जाती और इससे भारत के संविधान को मान्यता नहीं मिलती।

जिस सामाजिक क्रांति की बदौलत भारत के संविधान का निर्माण हुआ, उसमे साहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले,नारायण गुरु और बाबा साहेब आम्बेडकर का बहुत बड़ा योगदान था । इन तमाम महापुरुषों के संघर्षो के बाद बाबा साहेब आम्बेडकर के जरिये भारत में जो सामाजिक क्रांति आई वह एकमात्र कारण है जिससे भारत कइ समविधान का निर्माण हुआ। यह नहीं होता और संविधान नहीं होता तो लोगो के मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी न होती। यानी बोलने की, लिखने की, अपनी मर्ज़ी से पेश चुनने की ,संगठन खड़ा करने की, मीडिया चलाने की आज़ादी नहीं होती। जातिगत भेदभाव को गलत नहीं माना जाता , छुवाछुत को कानून में अपराध घोषित नहीं किया जाता, स्त्री स्वतंत्रता की बात कौन करता।

भारतीय संविधान का इतिहास Granville Austin ने एक किताब लिखी है जिसमे उन्होंने Dr Ambedkar को भारतीय संविधान सभा का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति माना है। भारतीय संविधान एक बहुत लम्बी प्रक्रिया के बाद बना। 30 Aug 1947 को इसकी पहली बैठक हुई। संविधान बनाने के लिए constituent assembly को 141 दिन काम करना पडा। सुरुवाती दौर में इसमें 315article पर विचार किया गया, 13आर्टिकल schedule किया। इसमे 7635 संसोधनो का प्रस्ताव किया गया था, जिसमे2473 संसोधन सभा में लाये गए। 395 आर्टिकल और 8 schedule के साथ भारत के लोगो ने भारत के संविधान को अपने प्रिय मुक्तिदाता डॉ आंबेडकर के जरिये 26Nov1949 को भारत के सुपुर्द किया। आज भारत के संविधान में 448आर्टिकल है। असल में नम्बरों के हिसाब से यह आज भी 395 ही है लेकिन बीच में (1) (2) या (a) (b) के जरिये बढता गया। इसके 22भाग 12schedule है। संविधान बनने के बाद अब तक संसद के सामने 120 संसोधन लाये गए है लेकिन इनमे 98 संसोधन ही स्वीकारे गए।

अगर अन्य देशो की तुलना करे तो England के लोगो को भी अधिकार टुकडो में मिला इंग्लैंड की महिलायो को voting का अधिकार 1920 में मिला। इसी तरह अमेरिका का संविधान 1779 में ही बन गया था लेकिन वंहां के संविधान में black लोगो को नागरिकता नहीं थी। 1865 में जब संविधान में 13वा संसोधन लाया गया तब अमेरिका के black लोगो को नागरिकता मिली। यंहां यह बताना जरूरी है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 1857 में काले लोगो को dred scoutt केस में अमेरिकी नागरिक मानने से इनकार कर दिया तब Abrahm Lincon ने 1865 में 13वा संसोधन लेकर आये और काले लोगो को नागरिकता का अधिकार दिया। जबकि भारत में संविधान में पहली ही बार में यह घोसीत कर दिया गया कि सभी मनुष्य समानहै। जाति , धर्म, वर्ग,वर्ण, जन्म ,स्थान आदि से परे देश के सभी मनुष्य सामान हैऐसा संविधान में लिखा है और सव्को एक सूत्र में पिरोते हुए सभी को भारतीय माना है और ‘हिन्दुस्तान’ शब्द को मिटा दिया।
2500 सालो का इतिहास जो गुलामी का इतिहास था जो ब्राह्मणी मनुस्मृति जो ब्राह्मणों का संविधान था उसे बाबा साहेब ने 25dec1927 को जलाया था और 26nov1949 को नया संविधान स्थापित किया जो समानता,स्वतंत्रता और बंधुता पर आधारित है। इसकी सुरक्षा हमारा प्रथम कर्तव्य हैऔर ब्राह्मणों की तीखी नज़र इस पर है वे इसे ख़त्म कर फिर से मनुस्मृति की कल्पना करते है और कर रहे है। इस देश में जो शासक बनने का सपना तक नहीं देख पाते थे आज वे इस संविधान के अधिकार द्वारा राजा बन रहे। जिस देश में रानी के पेट से राजा बनते थे उस देश में अब संविधान से राजा बनने लगे। इस तरह देश को नई दिशा मिली।

25Nov 1949 को बाबा साहेब ने संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो वह अपने आप लागू नहीं होता है, उसे लागू करना पडता है। ऐसे में जिन लोगो के ऊपर संविधान लागो करने की जिम्मेदारी होती है, यह उन पर निर्भर करता है कि वो संविधान को कितनी इमानदारी और प्रभावी ढंग से लागू करते है।
इस लेख को जितनी मेहनत से लिखा गया उससे कंही ज्यादा मन से आपने पड़ा और संविधान को आपने सम्मान दिया उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

जय भीम जय संविधान ।।।

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सम्राट अशोक महान का अखंड बौद्धमय भारत और उसकी सुव्यस्था -नीलिमा मौर्या

सम्राट अशोक महान का अखंड बौद्धमय  भारत और उसकी सुव्यस्था -नीलिमा मौर्या 

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सुखदायी है बुद्धों का उत्पन्न होंना, सुखदायी है सद्धर्म का उपदेश । सुखदायी है संघ की एकता, सुखदाई है एक-साथ तपना (रहना) “collective livinghood”। सम्राट अशोक द्वारा 84000 स्तुपोका निर्माण करना ये मात्र धम्म प्रचार का हिस्सा नहीं था एवं यह सम्राट अशोक, के संघहीय राजनितिकी के रणनीति (Strategy) का भी हिस्सा था !!! भारत के सविधान ने सभी को प्रधानमंत्री बन्ने का हक्क दिया है । सवाल खडा होता है की आंबेडकरवाद के राजनीती की “रणनीति (Strategy) क्या होंगी” ?

सम्राट अशोक ने बुद्ध के धम्म को राजाश्रय दिया वह शासक था । ८४००० स्तुपो का निर्माण करना यह उसके नितिमुल्यो के राजनीतिकी का हिस्सा था!! शासक नीतिमान हो तो उसका प्रथम कर्तव्य होता है की मेरे राज्य की जनता नितिमुल्यवान बने, “समता-स्वतंत्रता-बन्धुत्व और न्याय स्थापित हो, और भय मुक्त हो। अशोक ने ८४००० स्तुपा निर्माण करके बौद्ध भिक्षुओ को राजाश्रय दिया और बौद्ध भिक्षुओ ने जनता-जनार्धन को बुद्ध के नितिमुल्यो की शिक्षा देकर सभी की बुद्ध के नितिमुल्यो की मानसिकता बदल दी, चारित्र्यवान लोगो का विकास किया अर्थात “समता-स्वतंत्रता-बन्धुत्व और न्याय स्थापित” किया । सम्राट अशोक के और मौर्य शासन काल में कभी कलह नहीं हुवा। भ्रष्टाचार & अनैतिकता का नामोनिशान नहीं था, जिसका आधार “collective livinghood” सामूहिक जीवन चर्या जो बुद्ध के सामाजिक और आर्थिक निति के सिद्धांत थे । ८४००० स्तुपो के का निर्माण करना यह सम्राट अशोक के राजनीती की रणनीति का हिस्सा था। 

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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने काठमांडू के भाषण में काल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत पर टिपणी करते हुए कहा था, काल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत यह कोई नए सिद्धांत नहीं है, बुद्ध ने २५०० साल पहले ही विश्व जगत को आर्थिक नीतियों के “collective livinghood” सामूहिक जीवनचर्या के माध्यम से आर्थिक सिद्धांत विश्व जगत को दिए है…डॉ बाबासाहेब आंबेडकर भी सेमनरी (Residential Buddhist education system) के माध्यम से देश की भ्रष्ट राजनीतिकी धारा बदल कर बुद्ध के नितिमुल्यो के राजनिति के आधार पर मानव विकास चहाते थे…. और सौमनस्य-मैत्री के आधार पर “समता-स्वतंत्रता-बन्धुत्व और न्याय स्थापित हो…एशिया के बौद्ध राष्ट्रों के राजनेताओं का राजनीती का आधार “Emperor Ashoka” के राजनीती के आधार को ही अपनाते है ।

सम्राट अशोक ने सत्ता संभालते ही पूर्व तथा पश्चिम दोनो दिशाओं के भारत के खंडित छोटे-छोटे राज्यों को एक करके, आधुनिक मालदीव से लेकर असम से ईरान की सीमा तक के अखंड भारत का साम्राज्य केवल “आठ वर्षों” में विकशित किया था। और उपगुप्त (मोग्लिपुत्त तिस्स) बौद्ध भिक्षु जिनके हातो से बौद्ध धम्म की दीक्षा सम्राट अशोक ने लिए वह बहुजन समाज से (शुद्र) (Ref.Si-yu-ki, Buddhist Records of the Western World, by beal Samuel & Three Chinese travelers by M.S.More pp48) था। और अखंड भारत को बुद्ध के केन्द्रीय संघीय सिद्धांत के राजप्रणाली के सविधान के तहत अपने साम्राज्य में बौद्ध नितिमुल्ल्यो की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था विकसित किया था। वर्णव्यवस्था के जाती के जहर का नामोनिशान मानव जाती के मन में नहीं था, सभी मानव जाती में मैत्री-सौमनस्य लघभग 98% विकसित हो गया था। रोटी और बेटी का रिश्ता था, सभी कार्य बुद्ध के संघ के विनयपीटक (सविधान) तहत होते थे।

मानव अधिकारों के हत्यारे पाखंडीवर्ण के लोग यह कैसे कह सकते की सम्राट अशोक और मौर्य वंश का शासन कमजोर था ? भारत के इतिहास को उकेर डालो ब्राम्हणवर्ण के किसी राजा ने इतने बड़े भूभाग पर कभी राज नहीं किया ? और इतने बड़े भूभाग की प्रशानिक व्यवथा कभी इन्होने नहीं संभाली । इसे यह सपष्ट होता है की ब्राम्हणवर्ण के लोगो के पास किसी प्रकार की कोई योग्यता नहीं थी और ना है । ब्राम्हणवर्ण के लोगो की योग्यता मात्र ब्राम्हण जाती का प्रभुत्व बनाए रखने में है और उसी में ब्राम्हणवर्ण के लोग व्यस्त रहते है……

प्रियदर्शी सम्राट अशोक द्वारा शिलालेख- स्मारक-स्तुप स्थापित करना यह कोई निर्जीव दिखावा नहीं था । यह कार्य बुद्ध के नितिमुल्लो के शिक्षा के अनुशान को “प्रजा” जाने, इसके अनुसार आचरण करे और यह कार्य चिरस्थाई रहे इसलिए स्थापित किये गए थे। यह शिलालेख- स्मारक-स्तुप बुद्ध की नितिमुल्यो के शिक्षा का अखंड भारत का सविधान था प्रजा के हित सु:ख और कल्याणकारी अनुसासन के लिए !!

विनयाधिष्ठित भदंतगण “बुद्ध-धम्म और संघ” में हमारी और विश्व समुदाय की अमूल्य श्रद्धा और आस्था है। हे भदंतगण जो भी भगवान् बुद्ध ने कहा है वह सब मनुष्य-प्राणियों के हित और सुख के लिए अछा और कल्याणकारी है। पर हमें समजना चाहिए की जिससे बुद्ध की शिक्षा का सद्धर्म चिरस्थाई रहेंगी वह विनय समुत्कर्ष अर्थात विनयका महत्व, अलियवसाणी (आनेवाला भय), मैनेयसुत्र, उपतिष्य प्रशन, राहुलवाद, जिसमे भगवान् बुद्ध ने बार बार कहा है झूठ ना बोले! इस बुद्ध वाणी को भदंतगण और भिक्षुणिया बार-बार श्रवण करे और मन से अनुकरण करे। इसी प्रकार उपासक तथा उपासिकाएं भी सुने और धारण करे। यह इसलिए की बुद्ध की शिक्षा अनंत का तक चिरस्थाई रहे..

Source

http://www.facebook.com/photo.php?fbid=582828731745186&set=a.574366769258049.144780.574366712591388&type=1&theater

 

बौद्ध सम्राट हर्षवर्धन का छोटा सा परिचय

King_Harsha_pays_homage_to_Buddha

 

हर्षवर्धन

वर्धन वंश की नींव छठी शती के प्रारम्भ में पुष्यभूतिवर्धन ने थानेश्वर में डाली। इस वंश का पाँचवा और शक्तिशाली राजा प्रभाकरनवर्धन (लगभग 583 – 605 ई.) हुआ था। उसकी उपाधि ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज’ थी। उपाधि से ज्ञात होता है कि प्रभाकरवर्धन ने अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था।

  • बाणभट्टद्वारा रचित ‘हर्षचरित‘ से पता चलता है कि इस शासक ने सिंधगुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया था।
  • गांधारप्रदेश तक के शासक प्रभाकरवर्धन से डरते थे तथा उसने हूणों को भी पराजित किया था।
  • राजा प्रभाकरवर्धन के दो पुत्रराज्यवर्धनहर्षवर्धन और एक पुत्री राज्यश्री थी।
  • राज्यश्री काविवाह कन्नौज के मौखरी वंश के शासक गृहवर्मन से हुआ था। उस वैवाहिक संबंध के कारण उत्तरी भारत के दो प्रसिद्ध मौखरी और वर्धन राज्य प्रेम-सूत्र में बँध गये थे, जिससे उन दोनों की शक्ति बहुत बढ़ गई थी।
  • ‘हर्षचरित’ से ज्ञात होता है कि प्रभाकरवर्धन ने अपनी मृत्यु से पहले राज्यवर्धन को उत्तर दिशा में हूणों का दमन करने के लिए भेजा था। संभवत: उस समय हूणों का अधिकार उत्तरीपंजाब और कश्मीर के कुछ भाग पर ही था।
  • शक्तिशाली प्रभाकरवर्धन का शासन पश्चिम मेंव्यास नदी से लेकर पूर्व में यमुना तक था।

 

हर्षवर्धन या हर्ष (606ई.-647ई.), राज्यवर्धन के बाद लगभग 606 ई. में थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा। हर्ष के विषय में हमें बाणभट्ट के हर्षचरित से व्यापक जानकारी मिलती है। हर्ष ने लगभग 41 वर्ष शासन किया। इन वर्षों में हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तारजालंधरपंजाबकश्मीरनेपाल एवं बल्लभीपुर तक कर लिया। इसने आर्यावर्त को भी अपने अधीन किया। हर्ष को बादामी के चालुक्यवंशी शासक पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में इसका उल्लेख मिलता है।

 

यात्रियों में राजकुमारनीति का पण्डित एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहे जाने वाला चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 630 से 640 ई. के बीच भारत की धरती पर पदार्पण किया। हर्ष के विषय में ह्वेनसांग से विस्तृत जानकारी मिलती है। हर्ष ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। हर्ष को एक और नाम शिलादित्य से भी जाना जाता है। इसने परम् भट्टारक मगध नरेश की उपाधि ग्रहण की। हर्ष को अपने दक्षिण के अभियान में असफलता हाथ लगी। चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को ताप्ती नदी के किनारे परास्त किया। तत्कालीन भारतीय समाज का जो आईना ह्वेनसांग ने प्रस्तुत किया है वह प्रभावित करता है तथापि एक घटना ने मुझे चौंकाया भी है। बात ६४३ ई. की है जब महाराजा हर्षवर्धन ने कन्नौज में धार्मिक महोत्सव आयोजित किया था। इस आयोजन में साम्राज्य भर से बीस राजा, तीन सहस्त्र बौद्ध भिक्षु, तीन हजार ब्राम्हण, विद्वान, जैन धर्माचार्य तथा नालंदा विश्वविद्यालय के अध्यापक सम्मिलित हुए थे। ह्वेनसांग ने स्वयं इस आयोजन में महायान धर्म पर व्याख्यान व प्रवचन दिये थे तथा उन्हें यहाँ विद्वान घोषित कर सम्मानित भी किया गया था। यह आयोजन अत्यधिक विवादों में रहा। कहते हैं कि हर्षवर्धन ने अन्यधर्मावलंबियों को स्वतंत्र शास्त्रार्थ से वंचित कर दिया था। कई विद्वान लौट गये तो कुछ ने गड़बड़ी फैला दी। आयोजन के लिये निर्मित पंडाल और अस्थायी विहार में आग लगा दी गयी यहाँ तक कि सम्राट हर्षवर्धन पर प्राणघातक हमला भी किया गया। यह घटना उस युग में भी स्थित धार्मिक प्रतिद्वन्द्विता को समझने में नितांत सहायता करती है।

यह निर्विवाद है कि हमें ह्वेनसांग का कृतज्ञ होना चाहिये। नालंदा विश्वविद्यालय के पुरावशेष देखने के पश्चात हर पर्यटक और शोधार्थी को मेरी सलाह है कि एक बार ह्वेनसांग स्मृति संग्रहालय अवश्य जाएँ। इस संग्रहालय को सम्मान दे कर वस्तुत: हम अपने इतिहास की कडियों को प्रामाणिकता से जोड़ने वाले उस व्यक्ति को सम्मानित कर रहे होते हैं जिसने भारतीय होने के हमारे गर्व के कारणों का शताब्दियों पहले दस्तावेजीकरण किया था।

 

हर्ष का शासन प्रबन्ध

हर्ष स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेता था। सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् गठिन की गई थी। बाणभट्ट के अनुसार अवन्ति युद्ध और शान्ति का सर्वोच्च मंत्री था। सिंहनाद हर्ष का महासेनापति था। बाणभट्ट ने हर्षचरित में इन पदों की व्याख्या इस प्रकार की है-

  1. अवन्ति– युद्ध और शान्ति का मंत्री।
  2. सिंहनाद– हर्ष की सेना का महासेनापति।
  3. कुन्तल– अश्वसेना का मुख्य अधिकारी।
  4. स्कन्दगुप्त– हस्तिसेना का मुख्य अधिकारी।

राज्य के कुछ अन्य प्रमुख अधिकारी भी थे– जैसे महासामन्त, महाराज, दौस्साधनिक, प्रभातार, राजस्थानीय, कुमारामात्य, उपरिक, विषयपति आदि।

  1. कुमारामात्य– उच्च प्रशासनिक सेवा में नियुक्त।
  2. दीर्घध्वज– राजकीय संदेशवाहक होते थे।
  3. सर्वगत– गुप्तचर विभाग का सदस्य।

सामन्तवाद में वृद्धि

हर्ष के समय में अधिकारियों को वेतन, नकद व जागीर के रूप में दिया जाता था, पर ह्वेनसांग का मानना है कि, मंत्रियों एवं अधिकारियों का वेतन भूमि अनुदान के रूप में दिया जाता था। अधिकारियों एवं कर्मचारियों को नकद वेतन के बदले बड़े पैमाने पर भूखण्ड देने की प्रक्रिया से हर्षकाल में सामन्तवाद अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। हर्ष का प्रशासन गुप्त प्रशासन की अपेक्षाकृत अधिक सामन्तिक एवं विकेन्द्रीकृत हो गया। इस कारण सामन्तों की कई श्रेणियां हो गई थीं।

राष्ट्रीय आय एवं कर

हर्ष के समय में राष्ट्रीय आय का एक चौथाई भाग उच्च कोटि के राज्य कर्मचारियों को वेतन या उपहार के रूप में, एक चौथाई भाग धार्मिक कार्यो के खर्च हेतु, एक चौथाई भाग शिक्षा के खर्च के लिए एवं एक चौथाई भाग राजा स्वयं अपने खर्च के लिए प्रयोग करता था। राजस्व के स्रोत के रूप में तीन प्रकार के करों का विवरण मिलता है- भाग, हिरण्य, एवं बलि। ‘भाग’ या भूमिकर पदार्थ के रूप में लिया जाता था। ‘हिरण्य’ नगद में रूप में लिया जाने वाला कर था। इस समय भूमिकर कृषि उत्पादन का 1/6 वसूला जाता था।

सैन्य रचना

ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष की सेना में क़रीब 5,000 हाथी, 2,000 घुड़सवार एवं 5,000 पैदल सैनिक थे। कालान्तर में हाथियों की संख्या बढ़कर क़रीब 60,000 एवं घुड़सवारों की संख्या एक लाख पहुंच गई। हर्ष की सेना के साधारण सैनिकों को चाट एवं भाट, अश्वसेना के अधिकारियों को हदेश्वर पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत एवं महाबलाधिकृत कहा जाता था।

महान विद्वान राहुल संस्कृत्यायन जी का साहित्य…..अमित इंदुरकर

महान विद्वान राहुल संस्कृत्यायन जी का साहित्य:-385px-Rahul_Sankrityayan

(क) हिंदी

1) उपन्यास-कहानी:-

क) मौलिक

1)-1) सतमी के बच्चे(कहानी)    लेखनकाल:- 1935       प्रकाशक:- किताब महल
2)-2) जिने के लिये   लेखनकाल:- 1940   प्रकाशक:- किताब महल
3)-3) सिंह सेनापती  लेखनकाल:- 1944      प्रकाशक:- किताब महल
4)-4) जय यौधेय   लेखनकाल:-1944      प्रकाशक:- किताब महल
5)-5) वोल्गा से गंगा(कहानी)   लेखनकाल:- 1944      प्रकाशक:- किताब महल
6)-6) मधुर स्वप्न   लेखनकाल:- 1946   प्रकाशक:- आधुनिक पुस्तक
7)-7) बहुरंगी मधुपुरी(कहानी)     लेखनकाल:- 1953      प्रकाशक:- राहुल प्रकाशन
8)-8) विस्मृत यात्री    लेखनकाल:- 1954     प्रकाशक:- किताब महल
9)-9) कैनलाकी कथा(कहानी)   लेखनकाल:- 1955     प्रकाशक:- किताब महल
10)-10) सप्तसिंधु
ख) अनुवाद

11)-1) शैतान कि आंख    लेखनकाल:- 1943      प्रकाशक:- किताब महल
12)-2) विस्मृती के गर्भ मे      लेखनकाल:- 1943      प्रकाशक:- किताब महल
13)-3) जादू का मुल्क   लेखनकाल:- 1943    प्रकाशक:- किताब महल
14)-4) सोने कि ढाल    लेखनकाल:- 1943   प्रकाशक:- किताब महल
15)-5) दाखुन्दा   लेखनकाल:- 1947   प्रकाशक:- किताब महल
16)-6) जो दास थे   लेखनकाल:- 1947     प्रकाशक:- किताब महल
17)-7) अनाथ  लेखनकाल:- 1948     प्रकाशक:- किताब महल
18)-8) अदीना    लेखनकाल:- 1951   प्रकाशक:- राहुल पुस्तक प्रतिष्ठान
19)-9) सुदखोर कि मौत   लेखनकाल:- 1951    प्रकाशक:- राहुल पुस्तक प्रतिष्ठान
20)-10) शादी    लेखनकाल:- 1952     प्रकाशक:- करेंट बुक डिपो

2) शब्दकोश

21)-1) ****शब्दकोश    लेखनकाल:- 1948     प्रकाशक:- हिंदी साहित्य संमेलन
22)-2) राष्ट्रभाषा कोश       लेखनकाल:- 1951      प्रकाशक:- राष्ट्रभाषा समिती

3) जिवनी

23)-1) मेरी जीवन यात्रा (1,2)       लेखनकाल:- 1944       प्रकाशक:- किताब महल
24)-2) सरदार पृथ्वीसिंह         लेखनकाल:- 1944         प्रकाशक:- ज्ञान मंडल
25)-3) नये भारत के नये नेता        लेखनकाल:- 1944        प्रकाशक:- किताब महल
26)-4) राजस्थानी रनिवास       लेखनकाल:- 1953      प्रकाशक:- राजकमल प्रकाशन
27)-5) बचपन कि स्मृतियाँ        लेखनकाल:- 1953        प्रकाशक:- किताब महल
28)-6) अतीत से वर्तमान       लेखनकाल:- 1953      प्रकाशक:- हिंदी प्रचारक
29)-7) स्तालिन       लेखनकाल:- 1954      प्रकाशक:- पी.प.हौस
30)-8) कार्ल मार्क्स       लेखनकाल:- 1954       प्रकाशक:- किताब महल
31)-9) लेनिन      लेखनकाल:- 1954      प्रकाशक:- पी.प.हाऊस
32)-10) माओ चे त्सुंग      लेखनकाल:- 1954      प्रकाशक:- किताब महल
33)-11) घुमक्कड स्वामी      लेखनकाल:- 1956      प्रकाशक:- किताब महल
34)-12) असहयोग के मेरे साथी      लेखनकाल:- 1956     प्रकाशक:- किताब महल
35)-13) जिनका मै कृतज्ञ       लेखनकाल:- 1956      प्रकाशक:- किताब महल

4) दर्शन

36)-1) वैज्ञानिक भौतिकवाद       लेखनकाल:- 1942      प्रकाशक:- आधुनिक पुस्तक
37)-2) दर्शन दिग्दर्शन      लेखनकाल:- 1942      प्रकाशक:- किताब महल
38)-3) बौद्ध दर्शन      लेखनकाल:- 1942      प्रकाशक:- ****

5) देश दर्शन
39)-1) सोवियत भुमी (1,2)      लेखनकाल:- 1938      प्रकाशक:- किताब महल
40)-2) सोवियत मध्य-एशिया      लेखनकाल:- 1947      प्रकाशक:- युनिव्हर्सल प्रेस
41)-3) किन्नर देश      लेखनकाल:- 1948      प्रकाशक:- किताब महल
42)-4) दार्जिलिंग परिचय      लेखनकाल:- 1950      प्रकाशक:- आधुनिक पुस्तक
43)-5) कुमाऊ       लेखनकाल:- 1951       प्रकाशक:- ज्ञान मंडल
44)-6) गढवाल      लेखनकाल:- 1952      प्रकाशक:- लाँ जर्नल ***
45)-7) नेपाल       लेखनकाल:- 1953       प्रकाशन:- मोहन प्रेस
46)-8) हिमाचल प्रदेश       लेखनकाल:- 1954       प्रकाशक:- ******
47)-9) जैनसागर-देहरादून       लेखनकाल:- 1955      प्रकाशक:- ******

6) बौद्ध धम्म

48)-1) बुद्ध चर्या    लेखनकाल:- 1930     प्रकाशक:- महाबोधि सभा सारनाथ
49)-2) धम्मपद      लेखनकाल:- 1933      प्रकाशक:- महाबोधि सभा सारनाथ
50)-3) मज्जिम निकाय      लेखनकाल:- 1933     प्रकाशक:- महाबोधि सभा सारनाथ
51)-4) विनय पिटक      लेखनकाल:- 1934     प्रकाशक:- महाबोधि सभा सारनाथ
52)-5) दिघनिकाय     लेखनकाल:- 1935    प्रकाशक:- महाबोधि सभा सारनाथ
53)-6) महामानव बुद्ध     लेखनकाल:- 1956    प्रकाशक:- महाबोधि सभा सारनाथ

7) भोजपुरी (नाटक)

54)-56)-(1,3) तीन नाटक     लेखनकाल:- 1944    प्रकाशक:- किताब महल
57)-61)-(4-8) पांच नाटक     लेखनकाल:- 1944     प्रकाशक:- अच्युतानंद सिंह छापरा

8) यात्रा

62)-1) मेरी लद्दाख यात्रा         लेखनकाल:- 1926      प्रकाशक:- किताब महल
63)-2) लंका     लेखनकाल:- 1927-28     प्रकाशक:- किताब महल
64)-3) तिब्बत मे सव्वा वर्ष     लेखनकाल:- 1932     प्रकाशक:- किताब महल
65)-4) मेरी युरोप यात्रा       लेखनकाल:- 1934       प्रकाशक:- किताब महल
66)-5) मेरी तिब्बत यात्रा      लेखनकाल:- 1934     प्रकाशक:- किताब महल
67)-6) यात्रा के पन्ने      लेखनकाल:- 1934-36     प्रकाशक:- सा.सदन
68)-7)********      लेखनकाल:- 1935     प्रकाशक:- अच्युतानंद
69)-8)********      लेखनकाल:- 1935-37     प्रकाशक:- नव भारती
70)-9) रूस मे पच्चीस मास      लेखनकाल:- 1935-37     प्रकाशक:- आलोक प्रकाशन
71)-10) घुमक्कड शास्त्र      लेखनकाल:- 1946      प्रकाशक:- किताब महल
72)-11) एशिया के दुर्गम खंडो मे       लेखनकाल:- 1956       प्रकाशक:- नव भारती

9) राजनिती, साम्यवाद

73)-1) बाईसवीं सदी       लेखनकाल:- 1933      प्रकाशक:- किताब महल
74)-2) साम्यवाद ही क्यो?        लेखनकाल:- 1934      प्रकाशक:- किताब महल
75)-3) दिमागी गुलामी         लेखनकाल:- 1937        प्रकाशक:- किताब महल
76)-4) क्या करे?        लेखनकाल:- 1937        प्रकाशक:- किताब महल
77)-5) तुम्हारी क्षय        लेखनकाल:- 1947        प्रकाशक:- किताब महल
78)-6) सोवियत न्याय        लेखनकाल:- 1939       प्रकाशक:- वाणी
79)-7) राहुल जी का अपराध         लेखनकाल:- 1939         प्रकाशक:- त्रिवेदी
80)-8) सोवियत कम्युनिस्ट पार्टि का ईतिहास         लेखनकाल:- 1939         प्रकाशक:- प्रयाग
81)-9) मानव समाज          लेखनकाल:- 1942          प्रकाशक:- आधुनिक पुस्तक
82)-10) आज कि समस्यायें          लेखनकाल:- 1944         प्रकाशक:- किताब महल
83)-11) आज कि राजनिती           लेखनकाल:- 1949           प्रकाशक:- आधुनिक पुस्तक
84)-12) भागो नही बदलो           लेखनकाल:- 1944          प्रकाशक:- किताब महल
85)-13) कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं?            लेखनकाल:- 1953            प्रकाशक:- राजकमल प्रकाशन

10) विज्ञान   86)-1) विश्व कि रूपरेखा        लेखनकाल:- 1942        प्रकाशक:- किताब महल

11) साहित्य:-

87)-1) इस्लाम धर्म कि रूपरेखा       लेखनकाल:- 1933       प्रकाशक:- किताब महल
88)-2) तिब्बत मे बौद्ध धर्म        लेखनकाल:- 1935        प्रकाशक:- किताब महल
89)-3) पुरातत्व निबंधावली          लेखनकाल:- 1936          प्रकाशक:- ********
90)-4) हिंदी काव्यधारा(अपभ्रंश)          लेखनकाल:- 1936          प्रकाशन:- ********
91)-5) बौद्ध संस्कृती         लेखनकाल:- 1949         प्रकाशक:- आधुनिक पुस्तक
92)-6) साहित्य निबंधावली         लेखनकाल:- 1949         प्रकाशक:- किताब महल
93)-7) आदि हिंदी कि कहानियाँ         लेखनकाल:- 1950         प्रकाशक:- राहुल पुस्तक
94)-8) दक्खिनी हिंदी काव्यधारा          लेखनकाल:- 1952          प्रकाशक:- रा.भा.परिषद
95)-9) मध्य एशिया का इतिहास         लेखनकाल:- 1952        प्रकाशक:- रा.भा.परिषद
96)-10) सरहू दोहा कोश        लेखनकाल:- 1954       प्रकाशक:- रा.भा.परिषद
97)-11) रूग्वेदिक आर्य        लेखनकाल:- 1956        प्रकाशक:- किताब महल
98)-12) अकबर        लेखनकाल:- 1956        प्रकाशक:- किताब महल
99)-13) भारत मे अंग्रेजी राज्य के संस्थापक        लेखनकाल:- 1957        प्रकाशक:- करेंट बुक डिपो
100)-14) तुलसी रामायण संक्षेप           लेखनकाल:- 1957          प्रकाशक:-******

(ख) संस्कृत

12) संस्कृत (टिका, अनुवाद)
101) संस्कृत पाठशाला (पांच भाग)         लेखनकाल:- 1958         प्रकाशक:- चौखम्भा
102)-6) अभिधमकोश (टिका)           लेखनकाल:- 1930          प्रकाशक:- काशी विद्यापिठ
103)-7) विज्ञप्तिमात्रता सिद्धिः          लेखनकाल:- 1934         प्रकाशक:- विहार रिसर्च
104)-8) प्रमाणवार्तिक वृत्ती         लेखनकाल:- 1937         प्रकाशक:- किताब महल
105)-9) हेतु बिंदु           लेखनकाल:- 1944        प्रकाशक:- गायकवाड
106)-10) संबंध परिक्षा          लेखनकाल:- 1944        प्रकाशक:- जयस्वाल
107)-11) निदान सुत्र         लेखनकाल:- 1955       प्रकाशक:- बुद्धविहार लखनऊ
108)-12) महापरिनिर्वाण सुत्र         लेखनकाल:- 1955         प्रकाशक:- बुद्धविहार लखनऊ
109)-13) संस्कृत काव्य धारा        लेखनकाल:- 1955        प्रकाशक:- किताब महल
110)-14) प्रमाणवार्तिक (अंग्रेजी)          लेखनकाल:-*********          प्रकाशक:-**********

(ग) तिब्बती तिब्बती व्याकरण

111)-1) तिब्बत बालशिक्षा          लेखनकाल:- 1933         प्रकाशक:- महाबोधि सभा
112)-*********(1,3)         लेखनकाल:-1933         प्रकाशन:- यंगमैन असोसिएशन लद्दाख
119)-5) तिब्बती व्याकरण        लेखनकाल:- 1933        प्रकाशक:- महाबोधिसभा

(घ) संस्कृत तालपोथी सम्पादन

14) दर्शन, धर्म

120)-1) वाद न्याय         लेखनकाल:- 1935         प्रकाशक:- विहार रिसर्च
121)-2) प्रमाणवातिक          लेखनकाल:- 1935           प्रकाशक:- विहार रिसर्च
122)-3) अध्यर्धशतक           लेखनकाल:-1935            प्रकाशक:- विहार रिसर्च
123)-4) विग्रहव्यावर्त्तनी             लेखनकाल:- 1935           प्रकाशक:- विहार रिसर्च
124)-5) प्रमाणवात्तिकभाष्य             लेखनकाल:- 1935           प्रकाशक:- जयस्वाल ईंस्टिट्युशन
125)-6) प्रमाणवार्तिकवृत्ती             लेखनकाल:- 1936              प्रकाशक:- विहार रिसर्च सो.
126)-7) प्रमाणवार्तिकस्ववृत्ती टिका           लेखनकाल:- 1937           प्रकाशक:- किताब महल
127)-8) विनय सुत्र          लेखनकाल:- 1943           प्रकाशक:- भारतीय विद्या भवन
128) कप्तान लाल
129) सिंहल घुमक्कड           प्रकाशक:- जयवर्धन

130) सिंहल वीर
131) तिब्बती हिंदी शब्दकोष
132) पालि काव्य धारा
133) पालि साहित्य का इतिहास
134) सुत्र’कृतांग (अनुवाद)
135) निबंध संग्रह खंडो मे
136) दिवोदास
137) नव दिक्षित बौद्ध- भारत मे नव दिक्षित बौद्धों के प्रतिवमहापंडित राहुल का वक्तव्य
138) संस्कृत महावदान सुत्र मुल ग्रन्थ मे किंतु चिनी भाषावमे पुनरूद्धार किया था।

दोस्तों जहा पर ******** यह चिन्ह हैं हम जानकारि ढूंढते वक्त कुछ किताबों के नाम स्पष्ट नही दिखाई दे रहे थे ईसलिए हमे वह निशान देना पडा। किंतु हम जल्द ही वे नाम ढुंढकर आपके सामने रखेंगे।

:- अमित इंदुरकर

सम्राट धनानंद मगध के शक्तिशाली लोकप्रिय एवं अनीश्वरवादी राजा थे ! उनके शासन में कोई भी निर्धन नहीं था सभी धन एवं धान्य से परिपूर्ण थे जनता पूर्णतः सुखी थी क्यूंकि ब्राह्मणवादी जातिवाद नहीं था !…बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

Dhana-Nanda1महाराज धनानंद के बारे में बहुत ही कम लिखा जाता है ! और जो भी लिखा जाता है या लिखा गया है वो एकदम ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण द्वारा विकृत होता है !

सम्राट धनानंद मगध के शक्तिशाली लोकप्रिय एवं अनीश्वरवादी राजा थे ! उनके शासन में कोई भी निर्धन नहीं था सभी धन एवं धान्य से परिपूर्ण थे जनता पूर्णतः सुखी थी क्यूंकि ब्राह्मणवादी जातिवाद नहीं था ! जातियां थी जो घृणा की  नहीं श्रम के विभिन्न विभागों का प्रतिक थी , किसी भी जाती का व्यक्ति अपनी विशिष्ठ कार्यकुशलता द्वार ग्रामप्रधान जिला प्रमुख या राजा बन सकता था  !

धनानंद नाइ समाज से निकल कर अपनी बुद्धि और कार्यकुशलता द्वारा राजा बना था ! जनता में वह पूरी तरह स्वीकार्य था उसने राज्य की सुख समृद्धि को स्थाई रखने के लिए कुछ कठोर नियम बनाये उन्ही नियमों में से एक था ब्राह्मणों का राज्य की सीमा में प्रवेश निषिद्ध करना और इसको सुनिश्चित करने के लिए उसने एक गुप्तचरों की टुकड़ी बनाई हुई थी जिसका काम था ब्राह्मणों की राज्य के बाहर की देशद्रोही गतिविधियों पर नजर रखना !

एक बार राजा ने बुद्ध्पूर्निमा पर सामूहिक भोज का आयोजन करवाया और राज्य भर की जनता को न्योता भिजवा दिया ! इस भोज में विष्णुगुप्त नामक एक ब्राह्मण घुसपैठिया भी भेष बदल कर सम्मिलित हो गया था ! उसने स्वयं को मूलनिवासियों जैसा दिखने के लिए श्यामवर्ण में बदल लिया था लेकिन बुद्धिमान गुप्तचरों की निगाहों को धोखा ना दे पाया और पकड़ा गया उसे सम्राट के सामने लाया गया सम्राट ने उसपर दया कर उसे कुछ अपमानित करके ही छोड़ दिया जो की आगे चलकर सम्राट की भयंकर भूल साबित हुई  !

यही विष्णुगुप्त आगे चलकर चाणक्य बना और सम्राट धनानंद के पतन का कारण बना ! धनानद को बर्बाद करने के लिए इस कुटिल चाणक्य ने विदेशी आक्रमणकारियों को निमंत्रण देकर देश को भयंकर युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया !

इस ऐतिहासिक दुर्घटना को अधिक महत्त्व न दिए जाने का एक कारन यह भी है की चाणक्य ने नन्दसत्ता का पतन करवा कर चन्द्रगुप्त मौर्य को सत्ता दिलवाई और चन्द्रगुप्त का पोता महान बौद्ध सम्राट अशोक हुए !

इस सत्ताहस्तांतरण के खेल में चाणक्य स्वयं राजा नहीं बना ये उसकी कोई महानता नहीं मानी जा सकती क्यूंकि ये उसकी मज़बूरी थी की सत्ता के केंद्र में कोई मूलनिवासी ही हो !

ब्राह्मणसत्ता जनता कभी स्वीकार ना करती और विद्रोह कर देती इसलिए चाणक्य ने मूलनिवासी चन्द्रगुप्त का इस्तेमाल किया क्युकी चन्द्रगुप्त मौर्य उसके बाद बिदुसार मौर्य जैसे राजा उसके लिए वैसे ही थे जैसे ब्राह्मणों के षड्यंत्र में फंसा राजा राम

उन्होंने मौर्य वंश द्वारा भारत को अपना धार्मिक गुलाम बनाने का पूरा षड्यंत्र किया था वो तो उनके दुर्भाग्य वश और हमारे सौभाग्यवश सम्राट अशोक ब्राह्मणवाद को शीघ्र समझ गए और उन्होंने बुद्धिज्म को स्वीकार कर देश को ब्राह्मणों के भयंकर षड्यंत्रों से बचा लिया !

अनार्य भारत🙏🙏🙏

हमारे बाबा साहब डॉ भीम रामजी आंबेडकर, छोटा सा जीवन परिचय ….निर्वाण बौद्ध

ambedkar20वीं शताब्दी के श्रेष्ठ चिन्तक, ओजस्वी लेखक, तथा यशस्वी वक्ता एवं स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माणकर्ता हैं।। डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक  है।

छुआ-छूत का प्रभाव जब सारे देश में फैला हुआ था, उसी दौरान 14 अप्रैल, 1891 को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ था। बचपन से ही बाबा साहेब ने छुआ-छूत की पीङा महसूस की थी। जाति के कारण उन्हें संस्कृत भाषा पढने से वंचित रहना पड़ा था। कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ ने भीमराव जी को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ती प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की ।
उनके शोध का विषय “भारत का राष्ट्रीय लाभ” था। इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से एवं आवासिय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङकर बम्बई जाना पङा। बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ संकीर्ण विचारधारा के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङा। इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढते रहे। उनका दृण विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुनः लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे।
1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धी में चार चाँद लग गया।

डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी। वह इसे मानव की एक पद्धति (Way of Life) मानते थे। उनकी दृष्टी में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य “समाज की आन्तरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।“ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- “किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।“
अनेक कष्टों को सहन करते हुए, अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को “प्रारूप-समिति” जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठ ायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण उनके द्वारा बङी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणाम स्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।

1948 में बाबा साहेब मधुमेह से पीड़ित हो गए । जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से भी ग्रस्त रहे । अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर इह लोक त्यागकर परलोक सिधार गये। 7 दिसंबर को बौद्ध शैली के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता , धन्य है वो भारत भूमि जिसने ऐसे महान सपूत को जन्म दिया

 

….निर्वाण बौद्ध