मानवतावादी महामानव गौतम बुद्ध ने ऐसे धर्म की स्थापना की जिसमे ईश्वरवाद की जगह मानवतावाद, ईश्वर महिमा की जगह इंसानी न्याय व्यस्था, पाखंड और किताबी बातों की जगह दुःख मुक्ति का मार्ग दिया, लोग बुद्ध की शिक्षा को धर्म समझते हैं पर ये धम्म है…. के डी सिंह

jano tabi manoबुध्द ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है।बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बिच में बुध्द का सारा बोध है। संदेह को धम्मं का आधार बनाया और शून्य को धम्मं की उपलब्धि।

बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुध्द धम्मं को समझने के लिएजिज्ञासा चाहिए। बुद्ध कहते है, माननेसे नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहींहै। लेकिन बुध्द का धम्मं तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भीबड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे.वह तुम्हारे बुध्दी पर का भरोसा होगा।अगर बुध्दी में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमार होगा।मंदिर अंधेरेमे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे की सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पापवहां चलते है। विश्वास के नीछे सब तरह का झूठचलताहै। धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात मेंही चूक हो जाती है। क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुध्द ने कहा तोडो विश्वास, छोडो विश्वास.सब धारणाए गिरादेनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माणहोना चाहिए.बुध्द कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं हैक्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा?। यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले हीजाना है मरते वक्त तक।

बुध्द ने कहाअतः दीप भव! अपने ही दीए बनो। मैमरा तो रो मत। मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू।चलना तुम्हे है। मै रहू तो भी ना रहू तो भी चलना तुम्हे ही है.: बौध धम्म कोई ‘धर्म’ नहीँ हैँ। धम्म और धर्म मेँबुनियादी फर्क हैँ, दरअसल धम्म और धर्म का अर्थएक ही समझा जाता हैँ जबकि इनके अर्थ अलग अलगहैँ। ‘धम्म’ यह भारत के मूलनिवासीयोँ की मूलभाषा ‘पाली’ काशब्द हैँ जिसका अर्थ होता हैँ’मार्ग’। ब्राम्हणोँ ने इस बारेमेँ जो पाठपढाया वो ये कि धम्म का ही बिगङा रुप धर्म हैँ,धर्म और धम्म का एक ही अर्थ हैँ। जबकि धर्मका अर्थ होता हैँ एक विशेष प्रकार का बँधनया कानून। धर्म यानि कि एक ऐसा कानूनजिसका हमेँ पालन करना ही करना हैँ चाहेहमसहमत हो या ना होँ। स्वयं तथागत बुध्द कहते हैँकि मैँ तुम्हैँ बंधनोँ(धर्मोँ) से मुक्त करने के लिये धम्मशिक्षा दे रहा हुँ ताकि तुम जीवन को सत्य औरवास्तविकता के साथ बँधन मुक्त होकर जीसको।धर्म दूसरे धर्मोँ का विरोध करता हैँ, अपने कानून परचलने को बाध्य करता हैँ जबकि धम्म मेँकिसी का विरोध औरकिसी प्रकार का बंधननहीँ हैँ। बुध्दा कहते हैँ आप मेरे धम्म को देखो इसेजाँचो परखो अपनी बुध्दी और विवेक सेइसका परिक्षण करो फिर अगर तुम्हेँ अच्छा लगेतो आओ अन्यथा नहीँ अर्थात धम्म मेँ कोई जोरजबरदस्ती नहीँ हैँ, जो समझ जायेगा वो धम्म परचलेगा और जिसमेँ तर्कशक्ति नहीँ होगी वो धर्मको मरते दम तक ढोता रहेगा।

धर्मोँ मेँअतार्किकबातेँ हैँ जैसे आत्मा-परमात्मा,भूत-भगवान, देवी-देवता जबकि धम्म वेज्ञानिक द्रष्टिकोण परआधारित हैँ, धम्म तर्क औरबुध्दी को प्राथमिकता देता हैँ इसलिये ईश्वरको नकारता हैँ। धर्म मेँ असामनता हैँ भेदभाव हैँ,ऊँच-नीच हैँ जबकि धम्म मेँ सब एक हैँ सब बराबर हैँ,कोई भेदभाव नहीँ हैँ धम्म एक शिक्षा एक ज्ञान हैँजो सबके लिये हैँ। धर्म मेँ विभाजन हैँ अधिकारवर्गोँ मेँ विभाजित हैँ जबकि धम्म मेँवर्गहीनता हैँअधिकार और ज्ञान सभी के लिये हैँ। धर्म मेँ कोईब्रम्हा को श्रष्टि का रचियता बताता हैँ तो कोईस्वयं को ईश्वर का दूत जबकि धम्म शिक्षा देने वालेने खुद को ईश्वर का दूत ना बताकर एक सच्चा मार्गदिखाने वाला मनुष्य बताया। तथागत गौतम बुध्द,’बुध्द’ का अर्थ बताते हुए कहते हैँ- ‘बुध्द’ यह एक’अवस्था अथवा स्थति’ का नाम हैँ, एकऐसी स्थति जो मानवीय ज्ञान की चरमअवस्था हैँ, जब मनुष्य अपने तर्क और ज्ञान से एकदुर्लभ अवस्था(बोधिसत्व) को पा लेता हैँ वो ‘बुध्द’कहलाता हैँ। बाबा साहब डॉ.आम्बेडकरजीकोभी बोधिसत्वका दर्जा दीया गया हैँ, जो कार्य तथागतगौतमबुध्द ने अपने ज्ञान की बदोलतकिया वैसा ही कार्य डॉ. आम्बेडकरजी ने भी अपनेज्ञान की बदौलत किया, वो भी ‘बुध्द’ हुए।धर्मोँ मेँ कानून की कठोरता है जबकि धम्मको मानने ना मानने मेँआप पूर्णतया स्वतंन्त्र हो,धम्म आप पर कोई कानून नहीँ थोपता। धर्म मेँ सबकुछफिक्श होता हैँ जैसे जो धर्मग्रँथो मेँलिखा वही सत्य हैँउसकी पालना किसी भी कीमत पर आवश्यक हैँ,जबकि धम्म परिस्थितियोँ के आधार पर मानवहितके लिये परिवर्तन को मानता हैँ, यह वेज्ञानिकद्रष्टिकोण रखता हैँ क्योँकि धम्म यह ‘ज्ञान’ हैँइसलिये इसके तर्क और शिक्षा मेँबढोतरी हो सकती हैँ जबकि धर्म यह मानवनिर्मित ‘कानून’ हैँ, ये जो भी नीला-पीला हैँवही हैँ।

धर्म मेँ आप ईश्वर के खिलाफ नहीँ बोलसकते, धर्मग्रंथो की अवेहलना नहीँ कर सकते,अपनी बुध्दी का प्रयोग नहीँ कर सकते, जबकि धम्ममेँ तो स्वयं जाँचने-परखने औरअपनी बुध्दी का प्रयोग करने की शिक्षाहैँ। धर्मकहता हैँ कि तेरा भला करने तथाकथित भगवानटाइप कोई ताकत आयेगी जबकि धम्म कहता हैँ- अपनेदीपक स्वयं बनो। बुध्दा भी कहते हैँ- ना मैँमुक्तिदाता हुँ ना मैँ मोक्षदाता हुँ,मैँ मार्गदिखाने वाला हुँ। धम्म अर्थात जीवन जीनेका सर्वोतम मानवतावादी आधार, जबकि धर्म मेँमानवतावाद से जादा कानून मायने रखता हैँ। भौतलोग मानतेहोँगे कि धर्म और धम्म एक हीहैँ उन्हेँविश्लेषण करने की जरुरत हैँ। धर्म मेँजन्मलेना पङता हैँ जबकि धम्म(शिक्षा) प्राप्तकरनी पङती हैँ जिसे कोई भी प्राप्त कर सकता हैँ।अर्थात बौध धम्म कोई धर्म नहीँ हैँ|आखिर मैँयही कहना चाहुँगा जब बाबा साहब डॉ.आम्बेडकरजी ने 14 अक्टुम्बर के दिन धम्म-वापसी की तब उन्होँने अपने अनुयाइयोँ सेकहा था कि हम धर्म-परिवर्तन नहीँ कर रहे हैँबल्कि धम्म-वापसी(पुन:धम्म मेँ लोटना,वापिसधम्ममेँ लोटना) कर रहे हैँ क्योँकि हमारे पूर्वजबुधिस्ट थे फिर हम इस गंदगी(हिन्दू) मेँ फंसे और अबवापिस अपने धम्म मेँ लोट रहे हैँना किधर्मपरिवर्तन कर रहे हैँ |

साभार-

K.d. Singh