मानवतावादी मार्गदाता महामानव बुद्ध ने क्या अस्वीकार किया, क्या परिवर्तित किया, क्या स्वीकार किया!……लाला बौद्ध


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बुद्ध ने क्या अस्वीकार किया, क्या परिवर्तित किया, क्या स्वीकार किया!
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📕 बुद्ध ने क्या अस्वीकार किया !

📚 जिस काल में तथागत बुद्ध अपने उपदेश दे रहे थे, उस समय कुछ विचारों ने लोगों के दिमाग को जकड़ रखा था.

📚 बुद्ध ने मानव जाति के कल्याण में बाधक विचारों को अस्वीकार किया वे हैं-

📚 1. मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आया हूँ? आदि निराधार कल्पना पर आधारित विचारों को बेकार बताया.

📚 2. उन्होंने आत्मा के अनधिकृत मत को अस्वीकार किया. उन्होंने कहा, “आत्मा को शरीर, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान आदि कुछ नहीं है.

📚 3. धार्मिक उपदेशकों द्वारा प्रतिपादित सभी उच्छेदवादी मतों का उन्होंने बहिष्कार किया.

📚 4. उन्होंने नास्तिकों के मतों की निन्दा की.

📚 5. विश्व विकास के आरंभ का ज्ञान विदित है ये सिद्धात उन्होंने नहीं माना.

📚 6. “ईश्वर ने आदमी का निर्माण किया था” उन्होंने इस सिद्धांत खंडन किया.

📚 7. उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार किया.

📕 बुद्ध ने क्या परिवर्तित किया !

📚 1. कार्य-कारण के महान नियम को प्रतीत्यसमुत्पाद के रूप में स्वीकार किया.

📚 2. उन्होंने जीवन के निराशावादी भाग्यवादी दृष्टिकोण का खण्डन किया. उन्होंने इस मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण का भी खण्डन किया कि किसी ईश्वर ने पहले से निश्चित कर दिया है कि आदमी और संसार के साथ क्या घटित होने वाला है.

📚 3. उन्होंने इस सिद्धान्त को अस्वीकार किया कि पूर्व जन्मों में किये गये कर्म वर्तमान कार्यों को कमजोर या निष्क्रिय बनाने की सामर्थ्य रखते हैं. कर्म के इस निराशावादी भाग्यवादी दृष्टिकोण का उन्होंने त्याग किया. उन्होंने पुराने कर्म-वाद के स्थान पर एक अधिक वैज्ञानिक कर्म-सिद्धान्त की स्थापना की.

📚 4. आत्मा के एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में जाने की बात के स्थान पर उन्होंने संसरण-रहित पुनर्जन्म को स्वीकार किया.

📚 5. उन्होंने मोक्ष (आत्मा की मुक्ति) के स्थान पर निर्वाण के सिद्धान्त की स्थापना की.

📕 बुद्ध ने क्या स्वीकार किया !

📚 1. बुद्ध ने माना कि मन सभी चीजों का केन्द्र बिन्दु है तथा मन सभी प्रवृत्तियों का पूर्वगामी है. मन प्रवृत्तियों पर अधिकार रखता है, उन्हें उत्पन्न करता है. यदि मन को वश में कर लिया जाये तो सभी प्रवृत्तियाँ वश में हो जाती हैं. मन सभी प्रवृत्तियों का प्रधान और अगुआ है. अतः सर्वप्रथम मन को सुसंस्कृत करने में ध्यान देना है.

📚 2. मन ही सब अच्छाइयों और बुराइयों का मूल स्रोत है, जो हमारे भीतर पैदा होती हैं और जिनका हमें शिकार होना पड़ता है.

📚 3. सभी अच्छाइयाँ, सभी बुराइयाँ मन की ही उपज हैं.

📚 4. यदि कोई बुरे मन से कुछ बोलता है या करता है तो दुःख उसके पीछे उसी तरह चलता है जैसे गाड़ी को खींचने वाले बैलों के पीछे गाड़ी के पहिये. इसलिये चित्त को निर्मल बनाये रखना ही धम्म का सार है.

📚 5. सभी बुरे कर्मों से दूर रहना, बुद्ध की शिक्षाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

📚 6. बुद्ध का वास्तविक धम्म धार्मिक-ग्रंथों में नहीं  बल्कि धम्म सिद्धान्तों के पालन करने में है.

वेद, मानव समाज और मानवता :

📕 वेद मंत्रों / स्तोत्रों / ऋचाओं / स्तुतियों का संग्रह हैं. इन ऋचाओं का पाठ करने वालों को ऋषि कहते हैं. ये मंत्र इंद्र, वरुण, अग्नि, सोम, ईशान, प्रजापति, ब्रह्मा, महद्धि, यम तथा अन्य देवताओं का आह्वान (प्रार्थनायें) मात्र हैं.

📕 आह्वान (प्रार्थनायें) केवल शत्रुओं के विरुद्ध सहायता प्राप्त करने, उपहार स्वरूप धन प्राप्त करने तथा भक्तों से भोजन, मांस और सुरा की भेंट स्वीकार करने के लिये हैं.

📕 वेदों में दर्शन की मात्रा अधिक नहीं है. तत्कालीन अघमर्षण, प्रजापति परमेष्ठी, वृहस्पति, अनिल, दीर्घतमा, नारायण, हिरण्यगर्भ तथा विश्वकर्मा नामक ऋषियों ने दार्शनिक ढ़ग की निराधार परिकल्पनायें दीं. इन वैदिक ऋषियों / दार्शनिकों के मुख्य विचारणीय बिन्दु थे – संसार की उत्पत्ति कैसे हुई? अलग-अलग वस्तुओं की उत्पत्ति कैसे हुई? उनकी एकता और अस्तित्व क्यों है? किसने उत्पत्ति की और किसने व्यवस्था की? यह संसार किससे उत्पन्न हुआ? और फिर किसमें विलीन हो जायेगा?

📕 बुद्ध को वेद मंत्रों में येसा कुछ भी नहीं दिखा जो मानव के नैतिक उत्थान में सहायक हो. बुद्ध की दृष्टि में वेद मरुभूमि की तरह बेकार हैं. इसलिये बुद्ध ने वेद मंत्रों का बहिष्कार किया और उन्हें इस योग्य नहीं समझा कि उनसे कुछ सीखा या ग्रहण किया जाये.

📕 इसी प्रकार बुद्ध को वैदिक ऋषियों के दर्शन में भी कोई सार दिखायी नहीं दिया. ऋषि सत्य की खोज में थे किन्तु वे सत्य तक पहुंच नहीं पाये. उनके सिद्धान्त केवल मनोकल्पना की उड़ानें थीं, जो न ही तर्क और न ही यथार्थ पर आधारित थे. दर्शन के क्षेत्र में उनके योगदान ने किसी भी सामाजिक मूल्य की उत्पत्ति नहीं की. इसलिये बुद्ध ने वैदिक ऋषियों के दर्शन को बेकार जानकर अस्वीकार कर दिया.

📕 अतः बुद्ध की दृष्टि में वेद मानव समाज और मानवता के लिये मरुभूमि की तरह बेकार हैं..

🙏 नमो बुद्धाय 🙏

lala baudh
लाला बौद्ध

One thought on “मानवतावादी मार्गदाता महामानव बुद्ध ने क्या अस्वीकार किया, क्या परिवर्तित किया, क्या स्वीकार किया!……लाला बौद्ध

  1. Dear sir/ madam
    aapki ye post padhke bahot kuchh sikhne ko milta hai he mai ye sab padhne ke bad ise facebook par post karta hu jisase achhe like milte hai comment milte hai

    thanx

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