बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर ही गुज़रता है इसलिए किताबों से मन लगाओ, बाबा साहब डॉ आंबेडकर को किताबों से बहुत ही ज्यादा लगाव था ….निर्वाण बौद्ध


ladna padhnaबाबा साहेब को अगर किसी चीज से लगाव था, तो वह थीं पुस्तकें।न्यूयार्क में अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने बहुत सी किताबें खरीदीं।पुस्तकें पढ़ना और लिखना उनके लिए मात्र शौक ही नहीं बल्कि एक जुनून बन गया था। वह जानते थे कि बिना अध्ययन और ज्ञान के शक्ति नहीं आ सकती। अगर हम किसी व्यवस्था के विरुद्ध लड़ना चाहते
हैं, तो पहले हमें इसके प्रति खुद को समर्थ बनाना होगा।
ब्राह्मण धर्म से लड़ने के लिए हमें इसकी सामजिक व्यवस्था और इसके परिणाम तथा राजनीतिक समस्या व इसका हल जैसे विषयों पर पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। बहुजन समाज को सम्बोधित कर वह कहा करते थे, कि उन्हें नहीं मालूम कि आपको अध्ययन के लिए कितना समय मिलता है पर प्रभावी ढंग से खुद को प्रस्तुत करने के लिए आपको समय निकालना ही होगा। अपनी बात बताते हुए उन्होंने कहा कि जब एक बार वह इंग्लैण्ड से
वापस आ रहे थे तो वीनस से मुम्बई पहुंचने की अवधि में उन्होंने कुल 8000 पृष्ठ पढ़ डाले थे। ऐसा उन्होंने 6 दिनों की यात्रा अवधि के दौरान किया था।

किसी पुस्तक की आवश्यकता होने पर उसे खरीदने हेतु वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं को भी छोड़ देते थे। जब वे  न्यूयॉर्क में थे तो उन्होंने लगभग 2000 पुस्तकें खरीदीं। वहीं गोलमेज सम्मलेन के दौरान उन्होंने पुस्तकों से भरे 32 बड़े संदूकों को भारत भिजवाया। बाबा साहेब ने एक बार कहा था कि ऐसा कोई भी विषय अछूता नहीं है, जिसका उन्होंने अध्ययन न किया हो। मुम्बई के अपने मकान में उन्होंने खुद का पुस्तकालय बनवाया जिसमें लगभग 50000 पुस्तकें हैं। इनसाईड एशिया के लेखक जॉन गुंथर ने भी यह माना है कि संसार भर के निजी पुस्तकालयों में डॉ अम्बेडकर का पुस्तकालय सबसे बड़ा था।

इतना ही नहीं उनके पास पुस्तकों का विपुल संग्रह था, जो एक-एक करके उन्होंने बड़ी मेहनत से इकठ्ठा किया था। मदन मोहन मालवीय बीएचयू के लिए उस पुस्तकालय को 2 लाख की कीमत पर खरीदना चाहते थे पर बाबा साहेब ने इसके लिए साफ़ इंकार कर दिया। उनके लिए पुस्तकें अपनी पत्नी और बच्चों से भी अधिक प्रिय थीं। कुछ पुस्तकों को पढ़कर वह रो भी पड़े थे। वह पुस्तकें लाइफ ऑफ टॉलस्टॉय, लेस मिजरेबल (ह्यूगो) और फाट फ्रॉम द मैडिग क्राउड थीं।

अमेरिका में अध्ययन हेतु वह 18 घंटे दिया करते थे जो वाकई अद्भुत हैं। पढ़ते समय उनको खाने-पीने का कोई होश न रहता था। जैसा कि राष्ट्रपिता फुलेजी ने कहा कि एक अविद्या के कारण ही बहुजन समाज का अनर्थ हुआ,वैसी ही सोच बाबा साहेब भी रखते थे। वह इस बात को लेकर बेहद ही चिंतित रहते थे कि हमारे लोग अध्ययन नहीं करते पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
आज बहुजन समाज के वे लोग जो संसाधन युक्त हैं, उन्हें बाबा साहेब के सन्देश को समझना चाहिए। शिक्षा ही वह आयाम है जहां से असमानता की सभी बेड़ियां तोड़ी जा सकती हैं। आज बाबा साहेब ने जो कुछ भी हासिल किया है, वह उनकी शिक्षा की वजह से हैं। शिक्षा के प्रति असाधारण जुनून ने उन्हें विश्व के सर्वाधिक शिक्षित व्यक्तियों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया हैं।
किसी ने सच ही कहा है जो पढ़ा-लिखा व्यक्ति पुस्तकें नहीं पढ़ता, वह अनपढ़ के समान ही होता है.

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