पुनर्जन्म : तथागत बुद्ध का दृष्टिकोण….लाला बौद्ध


hUMAN LIFE CYCLE REINCARNATIONपुनर्जन्म : तथागत बुद्ध का दृष्टिकोण
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👉 क्या तथागत बुद्ध पुनर्जन्म को मानते थे?
👉 उत्तर “हाँ” में है.
📕 आइये, समझते हैं. पुनर्जन्म के बारे में तथागत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण.

अगर इस प्रश्न को हम दो भागों में बाँट लें तो पुनर्जन्म को बेहतर तरीके से समझा जा सकता था.
👉 (1) किस चीज का पुनर्जन्म?
👉 (2) किस व्यक्ति का पुनर्जन्म?

📕 पहले हम प्रश्न एक को लें- पुनर्जन्म किस चीज का?
👉 इस प्रश्न की अक्सर अवहेलना की जाती है. उपरोक्त दोनों प्रश्नों को एक बना देने की वजह से पुनर्जन्म के बारे में इतना भ्रम पैदा हुआ है.
बुद्ध के अनुसार अस्तित्व के 4 भौतिक पदार्थ हैं, 4 महाभूत हैं जिनसे शरीर बनता है.
(1) पृथ्वी (2) जल (3) अग्नि (4) वायु

👉 जब शरीर का मरण होता है तो इन चारों महाभूतों का क्या होता है?
👉 क्या वे भी शरीर के साथ मर जाते हैं?

👉 तथागत बुद्ध ने कहा नहीं. वे आकाश में सामूहिक रूप से विद्यमान समान भौतिक पदार्थों में मिल जाते हैं. इन विद्यमान समान भौतिक पदार्थों में से जब इन चारों महाभूतों का पुनर्मिलन होता है, तथागत बुद्ध इसी पुनर्मिलन को पुनर्जन्म मानते हैं.

👉 आइये, इसे विस्तार से समझते हैं.
आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा – इन पाँच इन्द्रियों को लें. प्रत्येक का विषय अलग है, क्षेत्र अलग है.

👉 अब प्रश्न उठता है, इनका अन्तिम आधार क्या है? कौन है जो पाँचों इन्द्रियों के विषयों और क्षेत्रों का उपभोग करता है?

👉 उत्तर है- “मन.”

👉 “ये पाँचों इन्द्रियाँ किस पर निर्भर करती हैं?

👉 “चेतना (जीवित इन्द्रियों) पर.”

👉 “चेतना किस पर निर्भर करती है?”

👉 “उष्णता पर”.

👉 “उष्णता किस पर निर्भर करती है?”

👉 “चेतना पर”.

👉 “आप कहते है, चेतना उष्णता पर निर्भर करती है और उष्णता चेतना पर निर्भर करती है. इसका ठीक-ठीक क्या अर्थ समझा जाये?”

👉 “एक उदाहरण से समझाता हूँ. जैसे दीपक के प्रकाश से दीपक की लौ प्रकट होती है और दीपक की लौ से दीपक का प्रकाश प्रकट होता है, उसी प्रकार चेतना उष्णता पर निर्भर करती है और उष्णता चेतना पर निर्भर करती है.”

👉 “ऐसी कितनी चीजें हैं, जिनसे मुक्त होने पर शरीर मरा हुआ समझा जाता है?”

👉 “जीवित इन्द्रिय, उष्णता और विज्ञान”.

👉 “मृत देह में और ध्यानी भिक्षु में क्या अन्तर है?”

👉 “मृत देह में न केवल शरीर, वाणी और मन की क्रिया शाँत हो जाती है, बल्कि चेतना भी नहीं रहती, उष्णता भी नही रहती और इन्द्रियों का भी मूलोच्छेद हो जाता है, जबकि ध्यानी भिक्षु की चेतना बनी रहती है, उष्णता बनी रहती है, इन्द्रियां भी बनी रहती हैं, हाँ श्वास-प्रश्वास बन्द हो जाती है, इन्द्रियों के वितर्क-विचार, संज्ञा आदि क्रियायें शान्त हो जाती हैं.”

👉 “उष्णता से क्या तात्पर्य है?”

👉 “उष्णता का मतलब है, ‘ऊर्जा’ या ‘शक्ति’. मरने के बाद शरीर ऊर्जा उत्पन्न करना बन्द कर देता है. मृत्यु के बाद शरीर की ऊर्जा निकल कर आकाश के ऊर्जा-समूह के साथ मिलकर एक हो जाती है. इसलिये मृत्यु के दो अर्थ हैं- एक : शरीर में नई ऊर्जा की उत्पत्ति रुक जाना, दो : विश्व में जो ऊर्जा संचरित हो रही है उसमें वृद्धि हो जाना.”

👉 इन पहलुओं के कारण ही बुद्ध ने कहा कि वे ‘उच्छेदवादी’ नहीं थे. आत्मा की बात पर वे उच्छेदवादी थे, किन्तु रूप की बात है वे उच्छेदवादी नहीं थे.

👉 इस प्रकार तथागत बुद्ध का मत वर्तमान विज्ञान के सर्वथा अनुकूल है. शक्ति या ऊर्जा कभी शून्य में परिणित नहीं होती. विज्ञान का यह पक्का सिद्धान्त है. मृत्यु के बाद कुछ नहीं रहता, ये कहना विज्ञान के विरुद्ध होगा. तथागत बुद्ध इसी अर्थ में पुनर्जन्म में विश्वास करते थे.

📕 अब दूसरे प्रश्न को लिया जाये.
👉 “पुनर्जन्म किस व्यक्ति का?” यह एक कठिन प्रश्न है.
👉 क्या वही मृत व्यक्ति नया जन्म ग्रहण करता है?
👉 बुद्ध का उत्तर है, “इसकी कम से कम संभावना है.” यदि मृत व्यक्ति के शरीर के सभी भौतिक अंश पुनः नये सिरे से मिलकर एक नये शरीर का निर्माण कर सके, तभी यह मानना संभव है कि उसी आदमी का पुनर्जन्म हुआ. यदि भिन्न-भिन्न मृत शरीरों के अंशों के मेल से एक नया शरीर बना तो वह पुनर्जन्म तो हुआ, परन्तु यह उसी आदमी का पुनर्जन्म नहीं हुआ.
🙏 नमो बुद्धाय 🙏lala baudh

प्रस्तुति

लाला बौद्ध 

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