सम्राट अशोक महान का अखंड बौद्धमय भारत और उसकी सुव्यस्था -नीलिमा मौर्या


सम्राट अशोक महान का अखंड बौद्धमय  भारत और उसकी सुव्यस्था -नीलिमा मौर्या 

ashoka

सुखदायी है बुद्धों का उत्पन्न होंना, सुखदायी है सद्धर्म का उपदेश । सुखदायी है संघ की एकता, सुखदाई है एक-साथ तपना (रहना) “collective livinghood”। सम्राट अशोक द्वारा 84000 स्तुपोका निर्माण करना ये मात्र धम्म प्रचार का हिस्सा नहीं था एवं यह सम्राट अशोक, के संघहीय राजनितिकी के रणनीति (Strategy) का भी हिस्सा था !!! भारत के सविधान ने सभी को प्रधानमंत्री बन्ने का हक्क दिया है । सवाल खडा होता है की आंबेडकरवाद के राजनीती की “रणनीति (Strategy) क्या होंगी” ?

सम्राट अशोक ने बुद्ध के धम्म को राजाश्रय दिया वह शासक था । ८४००० स्तुपो का निर्माण करना यह उसके नितिमुल्यो के राजनीतिकी का हिस्सा था!! शासक नीतिमान हो तो उसका प्रथम कर्तव्य होता है की मेरे राज्य की जनता नितिमुल्यवान बने, “समता-स्वतंत्रता-बन्धुत्व और न्याय स्थापित हो, और भय मुक्त हो। अशोक ने ८४००० स्तुपा निर्माण करके बौद्ध भिक्षुओ को राजाश्रय दिया और बौद्ध भिक्षुओ ने जनता-जनार्धन को बुद्ध के नितिमुल्यो की शिक्षा देकर सभी की बुद्ध के नितिमुल्यो की मानसिकता बदल दी, चारित्र्यवान लोगो का विकास किया अर्थात “समता-स्वतंत्रता-बन्धुत्व और न्याय स्थापित” किया । सम्राट अशोक के और मौर्य शासन काल में कभी कलह नहीं हुवा। भ्रष्टाचार & अनैतिकता का नामोनिशान नहीं था, जिसका आधार “collective livinghood” सामूहिक जीवन चर्या जो बुद्ध के सामाजिक और आर्थिक निति के सिद्धांत थे । ८४००० स्तुपो के का निर्माण करना यह सम्राट अशोक के राजनीती की रणनीति का हिस्सा था। 

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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने काठमांडू के भाषण में काल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत पर टिपणी करते हुए कहा था, काल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत यह कोई नए सिद्धांत नहीं है, बुद्ध ने २५०० साल पहले ही विश्व जगत को आर्थिक नीतियों के “collective livinghood” सामूहिक जीवनचर्या के माध्यम से आर्थिक सिद्धांत विश्व जगत को दिए है…डॉ बाबासाहेब आंबेडकर भी सेमनरी (Residential Buddhist education system) के माध्यम से देश की भ्रष्ट राजनीतिकी धारा बदल कर बुद्ध के नितिमुल्यो के राजनिति के आधार पर मानव विकास चहाते थे…. और सौमनस्य-मैत्री के आधार पर “समता-स्वतंत्रता-बन्धुत्व और न्याय स्थापित हो…एशिया के बौद्ध राष्ट्रों के राजनेताओं का राजनीती का आधार “Emperor Ashoka” के राजनीती के आधार को ही अपनाते है ।

सम्राट अशोक ने सत्ता संभालते ही पूर्व तथा पश्चिम दोनो दिशाओं के भारत के खंडित छोटे-छोटे राज्यों को एक करके, आधुनिक मालदीव से लेकर असम से ईरान की सीमा तक के अखंड भारत का साम्राज्य केवल “आठ वर्षों” में विकशित किया था। और उपगुप्त (मोग्लिपुत्त तिस्स) बौद्ध भिक्षु जिनके हातो से बौद्ध धम्म की दीक्षा सम्राट अशोक ने लिए वह बहुजन समाज से (शुद्र) (Ref.Si-yu-ki, Buddhist Records of the Western World, by beal Samuel & Three Chinese travelers by M.S.More pp48) था। और अखंड भारत को बुद्ध के केन्द्रीय संघीय सिद्धांत के राजप्रणाली के सविधान के तहत अपने साम्राज्य में बौद्ध नितिमुल्ल्यो की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था विकसित किया था। वर्णव्यवस्था के जाती के जहर का नामोनिशान मानव जाती के मन में नहीं था, सभी मानव जाती में मैत्री-सौमनस्य लघभग 98% विकसित हो गया था। रोटी और बेटी का रिश्ता था, सभी कार्य बुद्ध के संघ के विनयपीटक (सविधान) तहत होते थे।

मानव अधिकारों के हत्यारे पाखंडीवर्ण के लोग यह कैसे कह सकते की सम्राट अशोक और मौर्य वंश का शासन कमजोर था ? भारत के इतिहास को उकेर डालो ब्राम्हणवर्ण के किसी राजा ने इतने बड़े भूभाग पर कभी राज नहीं किया ? और इतने बड़े भूभाग की प्रशानिक व्यवथा कभी इन्होने नहीं संभाली । इसे यह सपष्ट होता है की ब्राम्हणवर्ण के लोगो के पास किसी प्रकार की कोई योग्यता नहीं थी और ना है । ब्राम्हणवर्ण के लोगो की योग्यता मात्र ब्राम्हण जाती का प्रभुत्व बनाए रखने में है और उसी में ब्राम्हणवर्ण के लोग व्यस्त रहते है……

प्रियदर्शी सम्राट अशोक द्वारा शिलालेख- स्मारक-स्तुप स्थापित करना यह कोई निर्जीव दिखावा नहीं था । यह कार्य बुद्ध के नितिमुल्लो के शिक्षा के अनुशान को “प्रजा” जाने, इसके अनुसार आचरण करे और यह कार्य चिरस्थाई रहे इसलिए स्थापित किये गए थे। यह शिलालेख- स्मारक-स्तुप बुद्ध की नितिमुल्यो के शिक्षा का अखंड भारत का सविधान था प्रजा के हित सु:ख और कल्याणकारी अनुसासन के लिए !!

विनयाधिष्ठित भदंतगण “बुद्ध-धम्म और संघ” में हमारी और विश्व समुदाय की अमूल्य श्रद्धा और आस्था है। हे भदंतगण जो भी भगवान् बुद्ध ने कहा है वह सब मनुष्य-प्राणियों के हित और सुख के लिए अछा और कल्याणकारी है। पर हमें समजना चाहिए की जिससे बुद्ध की शिक्षा का सद्धर्म चिरस्थाई रहेंगी वह विनय समुत्कर्ष अर्थात विनयका महत्व, अलियवसाणी (आनेवाला भय), मैनेयसुत्र, उपतिष्य प्रशन, राहुलवाद, जिसमे भगवान् बुद्ध ने बार बार कहा है झूठ ना बोले! इस बुद्ध वाणी को भदंतगण और भिक्षुणिया बार-बार श्रवण करे और मन से अनुकरण करे। इसी प्रकार उपासक तथा उपासिकाएं भी सुने और धारण करे। यह इसलिए की बुद्ध की शिक्षा अनंत का तक चिरस्थाई रहे..

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