जीवन विरोधाभासी है, असंगतियों से भरा है, तो फिर तर्क, बुद्धि, व्यवस्था और अनुशासन का मार्ग बुद्ध ने क्यों बताया?….एस धम्‍मो सनंतनो–भाग-2 प्रवचन–(12)..OSHO बुद्ध का सारा चिंतन दुख पर खड़ा है। दुख है, क्यू के कारण हैं, दुख के कारण को मिटाने के साधन हैं, और दुख से मुक्त होने की संभावना है। ईश्वर चर्चा का एक विषय है। अनुभव का एक आयाम नहीं, जीवन को बदलने की एक आग नहीं, सिद्धातों की राख है।

jano tabi mano
प्रश्न जीवन का नहीं है। प्रश्न तुम्हारे मन का है। जीवन को मोक्ष की तरफ नहीं जाना है। जीवन तो मोक्ष है। जीवन नहीं भटका है, जीवन नहीं भूला है। जीवन तो वहीं है जहां होना चाहिए। तुम भटके हो, तुम भूले हो। तुम्हारा मन तर्क की उलझन में है। और यात्रा तुम्हारे मन से शुरू होगी। कहां जाना है, यह सवाल नहीं है। कहां से शुरू करना है, यही सवाल है।
मंजिल की बात बुद्ध ने नहीं की। मंजिल की बात तुम समझ भी कैसे पाओगे? उसका तो स्वाद ही समझा सकेगा। उसमें तो डूबोगे, तो ही जान पाओगे। बुद्ध ने मार्ग की बात कही है। बुद्ध ने तुम जहां खड़े हो, तुम्हारा पहला कदम जहां पड़ेगा, उसकी बात कही है। इसलिए बुद्ध बुद्धि, विचार, अनुशासन, व्यवस्था की बात नही कि उन्हें पता नहीं है कि जीवन कोई व्यवस्था नहीं मानता। जीवन कोई रेल की पटरियों पर दौड़ती हुई गाड़ी नहीं है। जीवन परम स्वतंत्रता है। जीवन के ऊपर कोई नियम नहीं है, कोई मर्यादा नहीं है। जीवन अमर्याद है। वहां न कुछ शुभ है, न अशुभ। जीवन में सर्वस्वीकार है। वहां अंधेरा भी और उजेला भी एक साथ स्वीकार है।
मनुष्य के मन का सवाल है। मनुष्य का मन विरोधाभासी बात को समझ ही नहीं पाता। और जिसको तुम समझ न पाओगे, उसे तुम जीवन में कैसे उतारोगे? जिसे तुम समझ न पाओगे, उससे तुम दूर ही रह जाओगे।
तो बुद्ध ने वही कहा जो तुम समझ सकते हो। बुद्ध ने सत्य नहीं कहा, बुद्ध ने वही कहा जो तुम समझ सकते हो। फिर जैसे-जैसे तुम्हारी समझ बढ़ेगी वैसे-वैसे बुद्ध तुमसे वह भी कहेंगे जो तुम नहीं समझ सकते।
बुद्ध एक दिन गुजरते हैं एक राह से जंगल की। पतझड़ के दिन हैं। सारा वन सूखे पत्तों से भरा है। और आनंद ने बुद्ध से पूछा है कि क्या आपने हमें सब बातें बता दीं जो आप जानते हैं न क्या आपने अपना पूरा सत्य हमारे सामने स्पष्ट किया है? बुद्ध ने सूखे पत्तों से अपनी मुट्ठी भर ली और कहा, आनंद! मैंने तुमसे उतना ही कहा है जितने सूखे पत्ते मेरी मुट्ठी में हैं। और उतना अनकहा छोड़ दिया है जितने सूखे पत्ते इस वन में हैं। वही कहा है जो तुम समझ सको। फिर जैसे तुम्हारी समझ बढ़ेगी वैसे-वैसे वह भी कहा जा सकेगा जो पहले समझा नहीं जा सकता था।
बुद्ध कदम-कदम बढ़े। आहिस्ता-आहिस्ता। तुम्हारी सामर्थ्य देखकर बढ़े हैं। बुद्ध ने तुम्हारी बूंद को सागर में डालना चाहा है।
ऐसे भी फकीर हुए हैं जिन्होंने सागर को बूंद में डाल दिया है। पर वह काम बुद्ध ने नहीं किया। उन्होंने बूंद को सागर में डाला है। सागर को बूंद में डालने से बूंद बहुत घबड़ा जाती है। उसके लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए। उसके लिए बड़ी हिम्मत चाहिए। उसके लिए दुस्साहस चाहिए। उसके लिए मरने की तैयारी चाहिए। बुद्ध ने तुम्हें रफ्ता-रफ्ता राजी किया है। एक-एक कदम तुम्हें करीब लाए हैं। इसलिए बुद्ध के विचार में एक अनुशासन है।
ऐसा अनुशासन तुम कबीर में न पाओगे। कबीर उलटबांसी बोलते हैं। कबीर तुम्हारी फिकर नहीं करते। कबीर वहां से बोलते हैं जहां वे स्वयं हैं, जहां मेघ घिरे हैं अदृश्य के, और अमृत की वर्षा हो रही है। जहा बिन घन परत फुहार-जहा मेघ भी नहीं हैं और जहा अमृत की वर्षा हो रही है। बेबूझ बोलते हैं।
तो कबीर को तो वे बहुत थोड़े से लोग समझ पाएंगे, जो उनके साथ खतरा लेने को राजी हैं। कबीर ने कहा है, जो घर बारै आपना चलै हमारे संग। जिसकी तैयारी हो घर में आग लगा देने की, वह हमारे साथ हो ले। किस घर की बात कर रहे हैं? वह तुम्हारा मन का घर, तुम्हारी बुद्धि की व्यवस्था, तुम्हारा तर्क, तुम्हारी समझ; जो उस घर को जलाने को तैयार हो, कबीर कहते हैं, वह हमारे साथ हो ले।
बुद्ध कहते हैं, घर को जलाने की भी जरूरत नहीं है। एक-एक कदम सही, इंच-इंच सही, धीरे- धीरे सही, बुद्ध तुम्हें फुसलाते हैं। इसलिए बुद्ध वहीं से शुरू करते हैं जहां तुम हो। उन्होंने उतना ही कहा है जो कोई भी तर्कनिष्ठ व्यक्ति समझने में समर्थ हो जाएगा। इसलिए बुद्ध का इतना प्रभाव पड़ा सारे जगत पर। बुद्ध जैसा प्रभाव किसी का भी नहीं पड़ा।
अगर दुनिया में मुसलमान हैं, तो मोहम्मद के प्रभाव की वजह से कम, मुसलमानों की जबर्दस्ती की वजह से ज्यादा। अगर दुनिया में ईसाई हैं, तो ईसा के प्रभाव से कम, ईसाइयों की व्यापारी-कुशलता के कारण ज्यादा। लेकिन अगर दुनिया में बौद्ध हैं, तो सिर्फ बुद्ध के कारण। न तो कोई जबर्दस्ती की गई है किसी को बदलने की, न कोई प्रलोभन दिया गया है। लेकिन बुद्ध की बात मौजूं पड़ी। जिसके पास भी थोड़ी समझ थी, उसको भी बुद्ध में रस आया।
थोड़ा सोचो, बुद्ध ईश्वर की बात नहीं करते। क्योंकि जो भी सोच-विचार करता है, उसे ईश्वर की बात में संदेह पैदा होता है। बुद्ध ने वह बात ही नहीं की। छोड़ो। उसको अनिवार्य न माना। बुद्ध आत्मा तक की बात नहीं करते क्योंकि जो बहुत सोच-विचार करता है, वह कहता है, यह मैं मान नही सकता कि शरीर के बाद बचूंगा। कौन बचेगा? यह सब शरीर का ही खेल है, आज है, कल समाप्त हो जाएगा। किसी ने कभी मरकर लौटकर कहा कि मैं बचा हूं? कभी किसी ने खबर की? ये सब यहीं की बातें हैं। मन को बहलाने के खयाल हैं।
बुद्ध ने आत्मा की भी बात नहीं कही। बुद्ध ने कहा यह भी जाने दो। क्योंकि ये बातें ऐसी हैं कि प्रमाण देने का तो कोई उपाय नहीं। तुम जब जानोगे, तभी जानोगे; उसके पहले जनाने की कोई सुविधा नहीं। और अगर तुम तर्कनिष्ठ हो, बहुत विचारशील हो, तो तुम मानने को राजी न होओगे। और बुद्ध कहते हैं, कोई ऐसी बात तुमसे कहना जिसे तुम इनकार करो, तुम्हारे मार्ग पर बाधा बन जाएगी। वह इनकार ही तुम्हारे लिए रोक लेगा। बुद्ध कहते हैं, यह भी जाने दो।
बुद्ध कहते हैं कि हम इतना ही कहते हैं कि जीवन में दुख है, इसे तो इनकार न करोगे? इसे तो इनकार करना मुश्किल है। जिसने थोड़ा भी सोचा-विचारा है, वह तो कभी इनकार नहीं कर सकता। इसे तो वही इनकार कर सकता है, जिसने सोचा-विचारा ही न हो। लेकिन जिसने सोचा-विचारा ही न हो वह भी कैसे इनकार करेगा, क्योंकि इनकार के लिए सोचना-विचारना जरूरी है। जिसके मन में जरा सी भी प्रतिभा है, थोड़ी सी भी किरण है, जिसने जीवन के संबंध में जरा सा भी चिंतन-मनन किया है, वह भी देख लेगा। अंधा भी देख लेगा। जड़ से जड़ बुद्धि को भी यह बात समझ में आ जाएगी, जीवन में दुख है। आंसुओ के सिवाय पाया भी क्या? इसे बुद्ध को सिद्ध न करना पड़ेगा, तुम्हारा जीवन ही सिद्ध कर रहा है। तुम्हारी कथा ही बता रही है। तुम्हारी भीगी आंखें कह रही हैं। तुम्हारे कंपते पैर कह रहे हैं। तो बुद्ध ने कहा, जीवन में दुख है। यह कोई आध्यात्मिक सत्य नहीं है, यह तो जीवन का तथ्य है। इसे कौन, कब इनकार कर पाया? और बुद्ध ने कहा, दुख है, तो अकारण तो कुछ भी नहीं होता, दुख के कारण होंगे। और बुद्ध ने कहा, दुख से तो मुक्त होना चाहते हो कि नहीं होना चाहते! ईश्वर को नहीं पाना चाहते, समझ में आता है। कुछ सिरफिरों को छोड़कर कौन ईश्वर को पाना चाहता है? कुछ पागलों को छोड़कर कौन आत्मा की फिक्र कर रहा है। समझदार आदमी ऐसे उपद्रवों में नहीं पड़ते। ऐसी झंझटें मोल नहीं लेते। जिंदगी की झंझटें काफी हैं। अब आत्मा और परमात्मा और मोक्ष, इन उलझनों में कौन पड़े?
बुद्ध ने ये बातें ही नहीं कहीं। तुम इनकार कर सको, ऐसी बात बुद्ध ने कही ही नहीं। इसका उन्होंने बड़ा संयम रखा। उन जैसा संयमी बोलने वाला नहीं हुआ है। उन्होंने एक शब्द न कहा जिसमें तुम कह सको, नहीं। उन्होंने तुम्हें नास्तिक होने की सुविधा न दी।
इसे थोड़ा समझना। लोगों ने बुद्ध को नास्तिक कहा है, और मैं तुमसे कहता हूं कि बुद्ध अकेले आदमी हैं पृथ्वी पर जिन्होंने तुम्हें नास्तिक होने की सुविधा नहीं दी। जिन्होंने तुमसे कहा ईश्वर है, उन्होंने तुम्हें इनकार करने को मजबूर करवा दिया। कहां है ईश्वर? जिन्होंने तुमसे कहा आत्मा है, उन्होंने तुम्हारे भीतर संदेह पैदा किया। बुद्ध ने वही कहा जिस पर तुम संदेह न कर सकोगे। बुद्ध ने आस्तिकता दी। न नहीं कहने की सुविधा छोड़ी, न का उपाय न रखा।
बुद्ध बड़े कुशल हैं। उनकी कुशलता को जब समझोगे तो चकित हो जाओगे, कि जिसको तुमने नास्तिक समझा है उससे बड़ा आस्तिक पृथ्वी पर दूसरा नहीं हुआ। और जितने लोगों को परमात्मा की तरफ बुद्ध ले गए, कोई भी नहीं ले जा सका। और परमात्मा की बात भी न की, हद की कुशलता है। चर्चा भी न चलाई। चर्चा तुम्हारी की, पहुंचाया परमात्मा तक। बात तुम्हारी उठाई, समझा-समझाया तुम्हें, सुलझाव में परमात्मा मिला। सुलझाया तुम्हें, सुलझाव में परमात्मा मिला। दुख काटा तुम्हारा, जो शेष बचा वही आनंद है। बंधन दिखाए, मोक्ष की बात न उठाई।
कारागृह में जो बंद है जन्मों-जन्मों से उससे मोक्ष की बात करके क्यों.. क्यों उसे शर्मिंदा करते हो? और जो कारागृह में बहुत दिनों तक बंद रह गया है, उसे मोक्ष का खयाल भी नहीं रहा। उसे अपने पंख भी भूल गए हैं। आज तुम उसे अचानक आकाश में छोड़ भी दो तो उड़ भी न सकेगा। क्योंकि उड़ने के लिए पहले उड़ने का भरोसा चाहिए। तड़फड़ाकर गिर जाएगा।
तुमने कभी देखा। तोते को बहुत दिन तक रख लो पिंजड़े में, फिर किसी दिन खुला द्वार पाकर भाग भी जाए, तो उड़ नहीं पाता। पंख वही हैं, उड़ने का भरोसा खो गया। हिम्मत खो गई। यह याद ही न रही कि हम भी कभी आकाश में उड़ते थे, कि हमने भी कभी पंख फैलाए थे, और हमने भी कभी दूर की यात्रा की थी। वह बातें सपना हो गयीं। आज पक्का नहीं रहा ऐसा हुआ था, कि सिर्फ सपने में देखा है। वह बातें अफवाह जैसी हो गयीं। और इतने दिन तक कारागृह में रहने के बाद कारागृह की आदत हो जाती है। तो तोता तो थोड़े ही दिन रहा है, तुम तो जन्मों-जन्मों रहे हो।
बुद्ध ने कहा, तुमसे मोक्ष की बात करके तुम्हें शर्मिंदा करें! तुमसे मोक्ष की बात करके तुम्हें इनकार करने को मजबूर करें!
क्योंकि ध्यान रखना, जो व्यक्ति बहुत दिन कारागृह में रह गया है वह यह कहना शुरू कर देता है कि कहीं कोई मुक्ति है ही नहीं। यह उसकी आत्मरक्षा है। वह यह कह रहा है कि अगर मोक्ष है तो फिर मैं यहां क्या कर रहा हूं मैं नपुंसक यहां क्यों पड़ा हूं? अगर मोक्ष है तो मैं मुका क्यों नहीं हुआ हूं? फिर सारी जिम्मेवारी अपने पर आ जाती है।
लोग ईश्वर को इसलिए थोड़े ही इनकार करते हैं कि ईश्वर नहीं है। या कि उन्हें पता है कि ईश्वर नहीं है। ईश्वर को इनकार करते हैं, क्योंकि अगर ईश्वर है तो हम क्या कर रहे हैं! तो हमारा सारा जीवन व्यर्थ है। लोग मोक्ष को इसलिए इनकार करते हैं कि अगर मोक्ष है तो हम तो केवल अपने बंधनों का ही इंतजाम किए चले जा रहे हैं। तो हम मूढ़ हैं। अगर मोक्ष है, तो जिनको तुम सांसारिक रूप से समझदार कहते हो उनसे ज्यादा मूढ़ कोई भी नहीं।
तो आदमी को अपनी रक्षा तो करनी पड़ती है। सबसे अच्छी रक्षा का उपाय है कि तुम कह दो, कहो है आकाश? कहां है मोक्ष? हम भी उड़ना जानते हैं, मगर आकाश ही नहीं है। हम भी परमात्मा को पा लेते-कोई बुद्धों ने ही पाया ऐसा नहीं-हम कुछ कमजोर नहीं हैं, हममें भी बल है, हमने भी पा लिया होता, लेकिन हो तभी न? है ही नहीं। ऐसा कहकर तुम अपनी आत्मरक्षा कर लेते हो। तब तुम अपने कारागृह को घर समझ लेते हो।
जिस कारागृह में बहुत दिन रहे हो, उसे कारागृह कहने की हिम्मत भी जुटानी मूश्किल हो जाती है। क्योंकि फिर उसमें रहोगे कैसे? अगर ईश्वर है, तो संसार में बेचैनी हो जाएगी खड़ी। अगर मोक्ष है, तो तुम्हारा घर तुम्हें काटने लगेगा, कारागृह हो जाएगा। तुम्हारे राग, आसक्ति के संबंध जहर मालूम होने लगेंगे। उचित यही है कि तुम कह दो कि नहीं, न कोई मोक्ष है, न कोई परमात्मा है, यह सब जालसाजों की बकवास है। कुछ सिरफिरों की बातचीत है। या कुछ चालबाजों की अटकलबाजिया है। इस तरह तुम अपनी रक्षा कर लेते हो।
बुद्ध ने तुम्हें यह मौका न दिया। बुद्ध ने किसी को नास्तिक होने का मौका न दिया। बुद्ध के पास नास्तिक आए और आस्तिक हो गए। क्योंकि बुद्ध ने कहा, दुखी हो। इसको कौन इनकार करेगा? इसे तुम कैसे इनकार करोगे? यह तुम्हारे जीवन का सत्य है। और क्या तुम कहीं ऐसा आदमी पा सकते हो जो दुख से मुका न होना चाहता हो? मोक्ष न चाहता हो, लेकिन दुख से मुका तो सभी कोई होना चाहते हैं। , पीड़ा है, बुद्ध ने कहा, काटा छिदा है। बुद्ध ने कहा, मैं चिकित्सक हूं, मैं कोई दार्शनिक नहीं। लाओ मैं तुम्हारा काटा निकाल दूं। कैसे इनकार करोगे इस आदमी को? यह शिक्षक की घोषणा ही नहीं कर रहा है कि मैं शिक्षक हूं, या गुरु हूं। यह तो इतना ही कह रहा है, सिर्फ एक चिकित्सक हूं।
और इस आदमी को देखकर लोगों को भरोसा आया। क्योंकि इस आदमी के जीवन में दुख का कोई काटा नहीं है। इस आदमी के जीवन में ऐसी परमशांति है, ऐसी विश्रांति है-सब लहरें खो गई हैं पीड़ा की, एक अपूर्व उत्सव नित-नूतन, प्रतिपल नया, अभी-अभी ताजा और जन्मा इस आदमी के पास अनुभव होता है। इस आदमी के पास एक हवा है, जिस हवा में आकर यह दो बातें कर रहा है – अपनी हवा से खबर दे रहा है कि आनंद संभव है, और तुम्हारे दुख की तरफ इशारा कर रहा है कि तुम दुखी हो। दुख के कारण हैं। दुख के कारण को मिटाने का उपाय है।
तो बुद्ध का सारा चिंतन दुख पर खड़ा है। दुख है, क्यू के कारण हैं, दुख के कारण को मिटाने के साधन हैं, और दुख से मुक्त होने की संभावना है। इस संभावना के वे स्वयं प्रतीक हैं। जिस स्वास्थ्य को वे तुम्हारे भीतर लाना चाहते हैं, उस स्वास्थ्य को वे तुम्हारे सामने मौजूद खड़ा किए हैं। तुम बुद्ध से यह न कह सकोगे कि चिकित्सक, पहले अपनी चिकित्सा कर। बुद्ध को देखते ही यह तो सवाल ही न उठेगा। और तुम बुद्ध से यह भी न कह सकोगे कि मैं दुखी नहीं हूं। किस मुंह से कहोगे? और कहकर तुम क्या पाओगे? सिर्फ गवांओगे।
इसलिए बुद्ध ने तुम्हें देखकर व्यवस्था दी। और बुद्ध यह जानते हैं कि जिस दिन तुम्हारा दुख न होगा, जिस दिन तुम्हारी पीड़ा गिर जाएगी, तुम्हारी आंख के अंधकार का पर्दा कटेगा, तुम जागोगे, उस दिन तुम देख लोगे-मोक्ष है। जो दिखाया जा सकता हो, और जो दिखाने के अतिरिक्त और किसी तरह समझाया न जा सकता हो, उसे दिखाना ही चाहिए। उसकी बात करनी खतरनाक है। क्योंकि अक्सर लोग बातों में खो जाते हैं।
कितने लोग बात के ही धार्मिक हैं। बातचीत ही करते रहते हैं। ईश्वर चर्चा का एक विषय है। अनुभव का एक आयाम नहीं, जीवन को बदलने की एक आग नहीं, सिद्धातों की राख है। शास्त्रों में लोग उलझे रहते हैं, बाल की खाल निकालते रहते हैं, उससे भी अहंकार को बड़ा रस आता है। बुद्ध ने शास्त्रों को इनकार कर दिया। बुद्ध ने कहा, यह पीछे तुम खोज कर लेना। अभी तो उठो, अभी तो अपने जीवन के दुख को काट लो। बुद्ध ने यह कहा हफीज के शब्दों में-
उठो सनमकदे वालो तलाश लाजिम है
इधर ही लौट पड़ेंगे अगर खुदा न मिला
उठो मंदिरों वालो, जो तुम बैठ गए हो मंदिरों और मस्जिदों में, सनमकदे वालों! तलाश लाजिम है।
इधर ही लौट पड़ेंगे अगर खुदा न मिला
थोड़ा दुख को मिटाने की कोशिश कर लो। अगर न मिटा, तो यह दुख तो है ही, फिर लौट पड़ेंगे। थोड़ा कारागृह के बाहर आओ, घबड़ाओ मत, अगर खुला आकाश न मिला, इधर ही लौट पड़ेंगे।
बुद्ध ने जिज्ञासा दी, आस्था नहीं। बुद्ध ने इंक्वायरी दी, अन्वेषण दिया, आस्था नहीं। बुद्ध ने इतना ही कहा, ऐसे मत बैठे रहो। ऐसे बैठे तो कुछ न होगा। बैठे-बैठे तो कुछ न होगा। खोज लाजिम है। तुम दुखी हो, क्योंकि तुमने जीवन की सारी संभावनाएं नहीं खोजी। तुम दुखी हो, क्योंकि तुमने जन्म के साथ ही समझ लिया कि जीवन मिल गया। जन्म के साथ तो केवल संभावना मिलती है जीवन की, जीवन नहीं मिलता। बम के बाद जीवन खोजना पड़ता है। जो खोजता है उसे मिलता है। और जन्म के बाद जो बैठा-बैठा सोचता है कि मिल गया जीवन, यही जीवन है, पैदा हो गए यही जीवन है, वह चूक जाता है।
तो बुद्ध ने यह नहीं कहा कि मैं तुमसे कहता हूं कि यह मोक्ष, यह स्वातंत्रय, यह आकाश, यह परमात्मा मिल ही जाएगा; यह मैं तुमसे नहीं कहता। मैं इतना ही कहता हूं–
उठो सनमकदे वालो तलाश लाजिम है
खोज जरूरी है।
इधर ही लौट पड़ेंगे अगर खुद न मिला
और घबड़ाहट क्या है? यह घर तो फिर भी रहेगा। तुम्हारे मन की धारणाओं में फिर लौट आना, अगर निर्धारणा का कोई आकाश न मिले। लौट आना विचारों में, अगर ध्यान की कोई झलक न मिले। अगर शात होने की कोई सुविधा-सुराग न मिले, फिर अशात हो जाना। कौन सी अड़चन है? अशात होकर बहुत दिन देख लिया है। अशांति से कोई शाति तो मिली नहीं। बुद्ध कहते हैं, मैं भी तुम्हें एक झरोखे की खबर देता हूं, थोड़ा इधर भी झांक लो-तलाश लाजिम है।
बुद्ध ने खोज दी, श्रद्धा नहीं। इसे थोड़ा समझो। बुद्ध ने तुम्हें तुम्हारे जीवन पर संदेह दिया, परमात्मा के जीवन पर श्रद्धा नहीं। यह दोनों एक ही बात हैं। अपने पर संदेह हो जाए, तो परमात्मा पर श्रद्धा आ ही जाती है। परमात्मा पर श्रद्धा आ जाए, तो अपने पर संदेह हो ही जाता है। तुम्हें अगर अपने अहंकार पर बहुत भरोसा है, तो परमात्मा पर श्रद्धा न होगी। तुम अगर अपने को बहुत समझदार समझ बैठे हो, तो फिर तुम्हें किसी मोक्ष, किसी आत्मा में भरोसा नहीं आ सकता। तुमने फिर अपने ज्ञान को आखिरी सीमा समझ ली। फिर विस्तार की जगह और सुविधा न रही। और ज्यादा जानने को तुम मान ही नहीं सकते, क्योंकि तुम यह नहीं मान सकते कि ऐसा भी कुछ है जो तुम नहीं जानते हो। जिसने अपने पर ऐसा अंधा भरोसा कर लिया, वही तो परमात्मा पर भरोसा नहीं कर पाता। जिसने इस तथाकथित जीवन को जीवन समझ लिया, वही तो महाजीवन की तरफ जाने में असमर्थ हो जाता है, पंगु हो जाता है।
तो दो उपाय हैं। बुद्ध को छोड़कर बाकी बुद्धपुरुषों ने परमात्मा की तरफ श्रद्धा जगाई। बुद्ध ने तुम्हारे जीवन के प्रति संदेह जगाया। बात वही है। किसी ने कहा गिलास आधा भरा है। किसी ने कहा गिलास आधा खाली है।
बुद्ध ने कहा गिलास आधा खाली है। क्योंकि तुम खाली हो, भरे को तुम अभी समझ न पाओगे। और आधा गिलास खाली है यह समझ में आ जाए, तो जल्दी ही तुम आधा भरा गिलास है उसके करीब पहुंचने लगोगे। तुमसे यह कहना कि आधा गिलास भरा है, गलत होगा, क्योंकि तुम खाली में जी रहे हो। नकार का तुम्हें पता है, रिक्तता का तुम्हें पता है, पूर्णता का तुम्हें कोई पता नहीं। इसलिए बुद्ध ने शून्य को अपना शास्त्र बना लिया।
बुद्ध ने तुम्हें देखा, तुम्हारी बीमारी को देखा, तुम्हारी नब्ज पर निदान किया। इसलिए बुद्ध से ज्यादा प्रभावी कोई भी नहीं हो सकता। क्योंकि मनुष्य के मन में बुद्ध को समझने में कोई अड़चन न आई।
बुद्ध बहुत सीधे-साफ हैं। ऐसा नहीं कि जिंदगी में जटिलता नहीं है, जिंदगी बड़ी जटिल है। लेकिन बुद्ध बड़े सीधे-साफ हैं। ऐसा समझो कि अगर तुम कबीर से पूछो, या महावीर से पूछो, या कृष्ण से पूछो, तो वे बात वहां की करते हैं-इतने दूर की, कि तुम्हारी आंखों में पास ही नहीं दिखाई पड़ता, उतना दूर तुम्हें कैसे दिखाई पड़ेगा! तो एक ही उपाय है, या तो तुम इनकार कर दो, जो कि ज्यादा ईमानदार है। इसलिए नास्तिक ज्यादा ईमानदार होते हैं बजाय आस्तिकों के। और या तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन तुम स्वीकार कर लो, क्योंकि जब महावीर को दिखाई पड़ता है, तो होगा ही। तो तुम भी ही में ही भरने लगो। और तुम कहो कि ही, मुझे भी दिखाई पड़ रहा है।
इसलिए जिनको तुम आस्तिक कहते हो, वे बेईमान होते हैं। नास्तिक कम से कम सचाई तो स्वीकार करता है, कि मुझे नहीं दिखाई पड़ रहा है। हालांकि वह कहता गलत ढंग से है। वह कहता है, ईश्वर नहीं है। उसे कहना चाहिए, मुझे दिखाई नहीं पड़ रहा। क्योंकि तुम्हें दिखाई न पड़ता हो इसलिए जरूरी नहीं है कि न हो। बहुत सी चीजें तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती हैं, और हैं। बहुत सी चीजें आज नहीं दिखाई पड़ती, कल दिखाई पड़ जाएंगी। और बहुत सी चीजें दिखाई आज पड़ सकती हैं, लेकिन तुम्हारी आंख बंद है।
नास्तिक के कहने में गलती हो सकती है, लेकिन ईमानदारी में चूक नहीं है। नास्तिक यही कहना चाहता है कि मुझे दिखाई नही पड़ता। लेकिन वह कहता है नहीं, ईश्वर नहीं है। उसके कहने का ढंग अलग है। बात वह सही ही कहना चाहता है। आस्तिक बड़ी झूठी अवस्था में जीता है। आस्तिक को दिखाई नहीं पड़ता, वह यह भी नहीं कहता कि मुझे दिखाई नहीं पड़ता। वह यह भी नहीं कहता कि ईश्वर नहीं है। जो नहीं दिखाई पड़ता उसे स्वीकार कर लेता है, किसी और के भरोसे पर। और तब यात्रा बंद हो जाती है। क्योंकि जो तुमने जाना नहीं और मान लिया, तुम उसे खोजोगे क्यों?
इसलिए बुद्ध ने कहा, तलाश लाजिम है। खोज जरूरी है। ईश्वर है या नहीं, यह फिक्र छोड़ो। लेकिन ऐसे बैठे-बैठे जीवन का ढंग दुखपूर्ण है। निराशा से भरा है, मूर्च्छित है। जागो। और बुद्ध ने करोड़ों-करोड़ों लोगों को परमात्मा तक पहुंचा दिया।
इसलिए मैं कहता हूं इस सदी में बुद्ध की भाषा बड़ी समसामयिक है। कटेंप्रेरी है। क्योंकि यह सदी बड़ी ईमानदार सदी है। इतनी ईमानदार सदी पहले कभी हुई नहीं। तुम्हें यह सुनकर थोड़ी परेशानी होगी, तुम थोड़ा चौंकोगे। क्योंकि तुम कहोगे, यह सदी और ईमानदार! सब तरह के बेईमान दिखाई पड़ रहे हैं। लेकिन मैं तुमसे फिर कहता हूं कि इस सदी से ज्यादा ईमानदार सदी कभी नहीं हुई। आदमी अब वही मानेगा, जो जानेगा।
अब तुम यह न कह सकोगे कि हमारे कहे से मान लो। अब तुम यह न कह सकोगे कि हम बुजुर्ग हैं, और हम बड़े अनुभवी हैं, और हमने बाल ऐसे धूप में नहीं पकाए हैं, हम कहते हैं इसलिए मान लो। अब तुम्हारी इस तरह की बातें कोई भी न मानेगा। अब तो लोग कहते हैं नगद स्वीकार करेंगे, उधार नहीं। अब तो हम जानेंगे तभी स्वीकार करेंगे। ठीक है, तुमने जान लिया होगा। लेकिन तुम्हारा जानना तुम्हारा है, हमारा नहीं। हम भटकेंगे अंधेरे में भला, लेकिन हम उस प्रकाश को न मानेंगे जो हमने देखा नहीं।
इसलिए मैं कहता हूं यह सदी बड़ी ईमानदार है। ईमानदार होने के कारण नास्तिक है, अधार्मिक है। पुरानी सदियां बेईमान थीं। लोग उन मंदिरों में झुके, जिनका उन्हें कोई अनुभव न था। उनका झुकना औपचारिक रहा होगा। सर झुक गया होगा, हृदय न झुका होगा। और असली सवाल वही है कि हृदय झुके। वे ईश्वर को मानकर झुक गए होंगे। लेकिन जिस ईश्वर को जाना नहीं है उसके सामने झुकोगे कैसे? कवायद हो जाएगी, शरीर झुक जाएगा, तुम कैसे झुकोगे? उन्होंने उस झुकने में से भी अकड़ निकाल ली होगी। वे और अहंकारी होकर घर आ गए होंगे, कि मैं रोज पूजा करता हूं? प्रार्थना करता हूं रोज माला फेरता हूं।
माला फेरने वालों को तुम जानते ही हो। उन जैसे अहंकारी तुम कहीं न पाओगे। उनका अहंकार बड़ा धार्मिक अहंकार है। उनके अहंकार पर राम-नाम की चदरिया है। उनका अहंकार बड़ा पवित्र मालूम होता है, शुद्ध, नहाया हुआ। पर है तो अहंकार ही। और जहर जितना शुद्ध होता है उतना ही खतरनाक हो जाता है।
नहीं, इस सदी ने साफ कर लिया है कि अब हम वही मानेंगे जो हम जानते हैं। ‘यह सदी विज्ञान की है। तथ्य स्वीकार किए जाते हैं, सिद्धात नहीं। और तथ्य भी अंधी आंखों से स्वीकार नहीं किए जाते हैं। सब तरफ से खोजबीन कर ली जाती है, जब असिद्ध करने का कोई उपाय नहीं रह जाता, तभी कोई चीज स्वीकार की जाती है।
इसलिए ऐसा घटता है-बर्ट्रेड रसल जैसा व्यक्ति जो नास्तिक है, इसलिए जीसस को श्रद्धा नहीं दे सकता, हालांकि ईसाई घर में पैदा हुआ है, सारे संस्कार ईसाई के हैं। लेकिन बर्ट्रेड रसल ने एक किताब लिखी है-व्हाय आई एम नाट ए क्रिश्चियन-मैं ईसाई क्यों नहीं हूं? ईसा पर बड़े शक उठाए हैं।
शक उठाए जा सकते हैं। क्योंकि ईसा की व्यवस्था में कोई तर्क नहीं है। ईसा कवि हैं। कहानियां कहने में कुशल हैं। विरोधाभासी हैं। उनके शब्द पहेलियां हैं। ही, जो खोज करेगा वह उन पहेलियों के आखिरी राज को खोल लेगा। लेकिन वह तो बड़ी खोज की बात है। और उस खोज में जीवन लग जाते हैं। लेकिन जो पहेली को सीधा-सीधा देखेगा, वह इनकार कर देगा।
रसल ने जीसस को इनकार कर दिया। लेकिन रसल ने कहा कि मैं नास्तिक हूं, मगर बुद्ध को इनकार नहीं कर सकता। बुद्ध को इनकार कैसे करोगे? यही तो मैं कह रहा हूं! रसल के मन में भी बुद्ध के प्रति वैसी ही श्रद्धा है, जैसी किसी भक्त के मन में हो। इनकार करने की जगह नहीं छोड़ी इस आदमी ने। इस आदमी ने ऐसी बात ही नहीं कही जो तर्क की कसौटी पर खरी न उतरती हो।
बुद्ध वैज्ञानिक द्रष्टा हैं। बुद्ध को इस भांति समझोगे तो तुम्हारे लिए बड़े कारगर हो सकते हैं। हालांकि ध्यान रखना, जैसे-जैसे गहरे उतरोगे पानी में, जैसे-जैसे बुद्ध के फुसलावे में आ जाओगे, वैसे-वैसे तुम पाओगे कि जितना तर्क पहले दिखाई पड़ता था वह पीछे नहीं है। मगर तब कौन चिंता करता है, अपना ही अनुभव शुरू हो जाता है। फिर कौन प्रमाण मांगता है? प्रमाण तो हम तभी मांगते हैं, जब अपना अनुभव नहीं होता। जब अपना ही अनुभव हो जाता है…।
मैं तुम्हें तर्क देता हूं और तर्क से इतना ही तुम्हें राजी कर लेता हूं कि तुम मेरी खिड़की पर आकर खड़े हो जाओ, बस। फिर तो खिड़की से खुला आकाश तुम्हीं को दिखाई पड़ जाता है। फिर तुम मुझसे नहीं पूछते कि आप प्रमाण दें आकाश के होने का। अब प्रमाण देने का प्रश्न ही नहीं उठता है-न तुम मलते हो, न मैं देता हूं।
और तुम मुझे धन्यवाद भी दोगे कि भला किया कि पहले मुझे तर्क से समझाकर खिड़की तक ले आए। क्योंकि अगर तर्क से न समझाया होता तो मैं खिड़की तक आने को भी राजी नहीं होता। मैं एक कदम न चलता। अगर तुमने पहले ही इस आकाश की बात की होती जो मेरे लिए अनजाना है, अपरिचित है, तो मैं हिला ही न होता अपनी जगह से। तुमने भला किया आकाश की बात न की, खिड़की की बात की; असीम की बात न की, सीमा की बात की। तुमने भला किया आनंद की बात न की, दुख-निरोध की बात की। तुमने भला किया ध्यान की बात न की, विचार से मुक्त होने की बात की। तुमने भला किया श्रद्धा न मांगी, वह मैं दे न सकता, तुमने मेरे संदेह का ही उपयोग कर लिया। तुमने काटे से काटा निकाल दिया। भला किया।
इसलिए बुद्ध के प्रति कृतज्ञता अनुभव होगी। यद्यपि बुद्ध ने तुम्हें धोखा दिया। जीसस तुम्हें इतना धोखा नहीं दे रहे हैं। वे बात वही कह रहे हैं जो है। जैसा आखिर में तुम पाओगे, जीसस ने पहले ही कह दिया।
बुद्ध कुछ और कह रहे हैं। तुम्हें देखकर कह रहे हैं। जैसा नहीं है वैसा कह रहे हैं। लेकिन तुम अनुगृहीत अनुभव करोगे कि कृपा की, करुणा की कि इतना धोखा दिया; अन्यथा मैं खिड़की पर न आता।
तुम चकित होओगे अगर मैं तुमसे कहूं? झेन फकीरों ने कहा भी है, झेन फकीर लिंची ने कहा है, बुद्ध से ज्यादा झूठ बोलने वाला आदमी नहीं हुआ। लिंची रोज पूजा करता है बुद्ध की, सुबह से फूल चढ़ाता है, आंसू बहाता है, लेकिन कहता है, बुद्ध से झूठ बोलने वाला आदमी नहीं। लिंची ने एक बार अपने शिष्यों से कहा कि ये बुद्ध के शास्त्रों को आग लगा दो, ये सब सरासर झूठ हैं। किसी ने पूछा, लेकिन तुम रोज आंसू बहाते हो, रोज सुबह फूल चढ़ाते हो, और हमने तुम्हें घंटों बुद्ध की प्रतिमा के सामने भाव-विभोर देखा है। इन दोनों को हम कैसे जोड़े? ये दोनों बातें बड़ी असंगत हैं। लिंची ने कहा, उनकी करुणा के कारण वे झूठ बोले। उनके झूठ के कारण मैं वहा तक पहुंचा जहा सच का दर्शन हुआ। बुद्ध अगर सच ही बोलते तो मैं पहुंच न पाता।
सभी ज्ञानी बहुत उपाय करते हैं तुम्हें पहुंचाने के। वे सभी उपाय सही नहीं है। जैसे तुम घर में बैठे हो, तुम कभी बाहर नहीं गए, मैंने बाहर जाकर देखा कि बड़े फूल खिले हैं, पक्षियों के अनूठे गीतों का राज्य है, सूरज निकला है, खुला मुक्तब। असीम आकाश है, सब तरफ रोशनी है, और तुम अंधेरे में दबे बैठे हो, और सर्दी में ठिठुर रहे हो; लेकिन तुम कभी बाहर नहीं गए, अब मैं तुम्हें कैसे बाहर ले जाऊं? तुमसे कैसे कहूं? तुम्हें कैसे खबर दूं बाहर के सूरज की? क्योंकि तुम्हारी भाषा में सूरज के लिए कोई पर्यायवाची नहीं है। तुम्हें कैसे बताऊं फूलों के बाबत? क्योंकि तुम्हारी भाषा में फूलों के लिए कोई शब्द नहीं है। रंग तुमने जाने ही नहीं, रंगों का उत्सव तुम कैसे सुनोगे-समझोगे? तुमने सिर्फ दीवाल देखी है। उस दीवाल को तुमने अपनी जिंदगी समझी है। तुमसे कैसे कहूं कि ऐसा भी आकाश है, जिसकी कोई सीमा नहीं? तुम कहोगे, हो चुकी बातें, लनतरानी है।
तुमने कहानी सुनी है कि एक मेंढक सागर से आ गया था और एक कुएं में उतर गया था। कुएं के मेंढक ने पूछा, मित्र कहां से आते हो? उसने कहा, सागर से आता हूं। कुएं के मित्र ने पूछा, सागर कितना बड़ा है? क्योंकि उस कुएं के मेंढक ने कुएं से बडी कोई चीज कभी देखी न थी। उसी में पैदा हुआ था, उसी में बड़ा हुआ था। कभी कुएं की दीवालों को पार करके बाहर गया भी न था। दीवालें बड़ी भी थीं। और पार इससे बड़ा कुछ हो भी सकता है, इसे मानने का कोई कारण भी न था। कभी बाहर से भी कोई मेंढक न आया था, जिसने खबर दी हो। सागर के मेंढक ने कहा, बहुत बड़ा है। लेकिन बहुत से कहीं पता चलता है! कुएं के मेंढक को बहुत बड़े का क्या मतलब? कुएं का मेंढक! आधे कुएं में छलांग लगाई उसने और कहा, इतना बड़ा। आधा कुआं, इतना बड़ा। उसने कहा कि नहीं-नहीं, बहुत बड़ा है। तो उसने पूरी छलांग लगाई। कहा, इतना बड़ा? लेकिन अब उसे संदेह पैदा होने लगा 1 सागर के मेंढक ने कहा, भाई! बहुत बड़ा है।
उसे भरोसा तो नहीं आया। लेकिन फिर भी उसने एक और आखिरी कोशिश की। उसने पूरा चक्कर कुएं का दौड़कर लगाया। कहा, इतना बड़ा? सागर के मेंढक ने कहा, मैं तुमसे कैसे कहूं? बहुत बड़ा है। इस कुएं से उसका कोई पैमाना नहीं। उसका कोई नाप-जोख नहीं हो सकता। तो कुएं के मेंढक ने कहा, झूठ की भी एक सीमा होती है। किसी और को धोखा देना। हम ऐसे नासमझ नहीं हैं। तुम किसको मूढ़ बनाने चले हो? अपनी राह लो। इस कुएं से बड़ी चीज न कभी सुनी गई, न देखी गई। अपने मां-बाप से, अपने पुरखों से भी मैंने इससे बड़ी चीज की कोई बात नहीं सुनी। वे तो बड़े अनुभवी थे, मैं नया हो सकता हूं। हम दर-पीढ़ी इस कुएं में रहे हैं।
अगर मैं तुमसे बाहर की बात आकर कहूं तुम्हारे अंधकार-कक्ष में, तुम भरोसा न करोगे। इसीलिए तो नास्तिकता पैदा होती है। जब भी कोई परमात्मा में जाकर लौटता है, और तुम्हें खबर देता है, और वह इतना लड़खड़ा गया होता है अनुभव से-वह इतना अवाक और आश्चर्यचकित होकर लौटता है कि उसकी भाषा के पैर डगमगा जाते हैं। अनुभव इतना बड़ा और शब्द इतने छोटे, शब्दों में अनुभव समाता नहीं। वह बोलता है, और बोलने की व्यर्थता दिखाई पड़ती है। वह हिचकिचाता है। वह कहता भी है, और कहते डरता भी है, कि जो भी कहेगा गलत होगा, और जो भी कहेगा वह सत्य के अनुकूल न होगा। क्योंकि भाषा तुम्हारी, अनुभव बाहर का। भाषा दीवालों की, अनुभव असीम का।
तो मैं क्या करूं तुम्हारे कमरे में आकर? लिंची ठीक कहता है, बुद्ध झूठ बोले। बुद्ध ने चर्चा नहीं की फूलों की, बुद्ध ने चर्चा नहीं की पक्षियों के गीत की, बुद्ध ने चर्चा नहीं की झरनों के कलकल नाद की; बुद्ध ने सूरज की रोशनी की और किरणों के विराट जाल की कोई बात नहीं की। नहीं कि उनको पता नहीं था। उनसे ज्यादा किसको पता था? उन्होंने बात कुछ और की। उन्होंने बात की तुम्हारी दीवालों की, उन्होंने बात की तुम्हारे अंधकार की, उन्होंने बात की तुम्हारी पीड़ा की, तुम्हारे दुख की; उन्होंने पहचाना कि तुम्हें बाहर ले जाने का क्या उपाय हो सकता है।
बाहर के दृश्य तुम्हें आकर्षित न कर सकेंगे। क्योंकि आकर्षण तभी होता है जब थोड़ा अनुभव हो। थोड़ा भी स्वाद लग जाए मिठास का, तो फिर तुम मिठाई के लिए आतुर हो जाते हो। लेकिन नमक ही नमक जीवन में जाना हो, कड़वाहट ही कड़वाहट भोगी हो, मिठास का सपना भी न आया हो कभी, क्योंकि सपना भी उसी का आता है जिसका जीवन में थोड़ा अनुभव हो, सपने भी जीवन का ही प्रतिफलन होते हैं!
तो बुद्ध ने तुमसे क्या कहा? बुद्ध ने कहा कि भागो, इस मकान में आग लगी है। आग लगी न थी। लिंची ठीक कहता है, बुद्ध झूठ बोले।
मगर लिंची रोज उनको धन्यवाद भी देता है कि तुम्हारी अनुकंपा कि तुम झूठ बोले, नहीं तो मैं भागता ही न। घर में आग लगी है! बुद्ध ने तुम्हें भयभीत कर दिया। तुम्हारे दुख के चित्र उभारे, तुम्हारे छुपे दुख को बाहर निकला। तुमने जो दबा रखा है अपने भीतर अंधकार, उसको प्रगट किया। तुम्हारे दुख को इतना उभारा कि तुम घबड़ा गए, तुम भयभीत हो गए। और जब बुद्ध ने कहा, इस घर में आग लगी है, तो तुम घबड़ाहट में भाग खड़े हुए। तुम भूल ही गए इनकार करना कि बाहर तो है ही नहीं, जाएं कहा? जब घर में आग लगी हो तो कौन सोच-विचार की स्थिति में रह जाता है? भाग खड़े हुए।
अमरीका में एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर रहा था। एक सिनेमागृह में जब लोग आधा घंटा तक पिक्चकर देखने में तल्लीन हो चुके थे अचानक एक आदमी जोर से चिल्लाया-आग! आग!! उस आदमी को बिठा रखा था एक मनोवैज्ञानिक ने। भगदड़ शुरू हो गई। मैनेजर चिल्ला रहा है कि कहीं कोई आग नहीं है, लेकिन कोई सुनने को राजी नहीं। जब एक दफा भय पकड़ ले!
लोगों ने दरवाजे तोड़ डाले, कुर्सियां तोड़ डालीं, भीड़-भड़क्कम हो गई। एक-दूसरे के ऊपर भाग खड़े हुए। बच्चे गिर गए, दब गए। बामुश्किल कब्जा पाया जा सका। जब लोग बाहर आ गए, तभी उनको भरोसा आया कि किसी ने मजाक कर दी। लेकिन एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर रहा था कि लोग शब्दों से कितने प्रभावित हो जाते हैं। आग! बस काफी है। फिर तुम यह भी नहीं देखते कि आग है भी, या नहीं।
बुद्ध ने तुम्हारे दुख को उभारा। बुद्ध चिल्लाए, आग! तुम भाग खड़े हुए। उसी ‘भागदौड़ में तुममें से कुछ बाहर निकल गए। लिंची उन्हीं में से है, जो बाहर निकल गया। अब वह कहता है, खूब झूठ बोले! कहीं आग न लगी थी। कहीं धुआ भी न था, आग तो दूर। मगर उसी भय में बाहर आ गए। इसलिए चरणों में सिर रखता है न तुम चिल्लाते, न हम बाहर आते।
मैं भी तुमसे न मालूम कितने-कितने ढंग के झूठ बोले जाता हूं। जानता हूं सौभाग्यशाली होंगे तुममें वे, जो किसी दिन उन झूठों को पहचान लेंगे। लेकिन वे तुम तभी पहचान पाओगे जब तुम बाहर निकल चुके होओगे। तब तुम नाराज न होओगे। तुम अनुगृहीत होओगे।
बुद्ध ने तुम्हारी भाषा बोली। तुम्हें जगाना है, तुम्हारी भाषा बोलनी ही जरूरी है। बुद्ध अपनी भाषा तुमसे नहीं बोले। ही, बुद्ध के पास कोई बुद्धपुरुष होता तो उससे वे अपनी भाषा बोलते।
एक सुबह वे फूल लेकर आए हैं। ऐसा कभी न हुआ था। कभी वे कुछ लेकर न आए थे। और वे बैठ गए हैं बोलने के लिए, भीड़ सुनने को आतुर है। और वे फूल को देखे चले जाते हैं। धीरे-धीरे भीड़ बेचैन होने लगी, क्योंकि लोग सुनने को आए थे, और बुद्ध उस दिन दिखा रहे थे। जो लोग सुनने को आए हैं वे देखने को राजी नहीं होते।
यह बड़े मजे की बात है। तुम अगर हीरे की बाबत सुनने आए हो, और मैं हीरा लेकर भी बैठ जाऊं तो भी तुम बेचैन हो जाओगे। क्योंकि तुम सुनने आए थे। तुम कानों का भरोसा करने आए थे। मैंने तुम्हारी आंखों को पुकारा, तुम्हारी आंखें बंद हैं। हीरे की बात करूं, तुम सुन लोगे। हीरा दिखाऊं, तुम्हें दिखाई ही न पड़ेगा। बुद्ध फूल लिए बैठे रहे। उस दिन बुद्ध ने एक परम उपदेश दिया, जैसा उन्होंने कभी न दिया था। उस दिन बुद्ध ने अपना बुद्धत्व सामने रख दिया। मगर देखने वाला चाहिए। सुनने वाले थे। आंख के अंधे थे, कान के कुशल थे।
तुम्हारे सब शास्त्र कान से आए है। सत्य आंख से आता है। सत्य प्रत्यक्ष है। सुनी हुई बात नहीं। सत्य कोई श्रुति नहीं है, न कोई स्मृति है। सत्य दर्शन है।
उस दिन बुद्ध बैठे रहे। लोग परेशान होने लगे। बुद्धत्व सामने हो, लोग परेशान होने लगे! अंधे रहे होंगे। घड़ी पर घड़ी बीतने लगी। और लोग सोचने लगे होंगे अब घर जाने की, कि यह मामला क्या है? और कोई कह भी न सका। बुद्ध से कहो भी क्या, कि आप यह क्या कर रहे हैं? बैठे क्यों हैं? बोलो कुछ। बोलो तो हम सुनें। शब्दों तब हमारी पहुंच है। किसी को यह न दिखाई पड़ा कि यह आदमी क्या दिखा रहा है।
फूल को बुद्ध देखते रहे। परमशून्य। एक विचार की तरंग भीतर नहीं। मौजूद, और मौजूद नहीं। उपस्थित और अनुपस्थित। विचार का कण भी नहीं। परम ध्यान की अवस्था। समाधि साकार। और हाथ में खिला फूल। प्रतीक पूरा था। ऐसी ( समाधि साकार हो, तो ऐसा जीवन का फूल खिल जाता है। कुछ और कहने को न था। अब और कहने को बचता भी क्या है? पर आंख के अंधे!
तुम्हीं सोचो। आज मैं बोलता न और फूल लेकर आकर बैठ गया होता! तुम इधर-उधर देखने लगते। तुम लक्ष्मी की तरफ देखते कि मामला क्या है? दिमाग खराब हो गया? तुम उठने की तैयारी करने लगते। तुम एक-दूसरे की तरफ देखते कि अब क्या करना है?
जब ऐसी बेचैनी की लहर सब तरफ फैलने लगी-उतने चैन के सामने भी लोग बेचैन हो गए, उतनी शाति के सामने भी लोग अशात हो गए-तब एक बुद्ध का शिष्य महाकाश्यप.. इसके पहले उसका नाम भी किसी ने न सुना था। क्योंकि आंख वालों का अंधों से मेल नहीं होता। इसका नाम भी पहले किसी ने नहीं सुना था, यह पहले मौके पर इसका नाम पता चला। जब लोगों को इतना बेचैन देखा तो वह खिलखिलाकर हंसने लगा। उस सन्नाटे में उसकी खिलखिलाहट ने और लोगों को चौंका दिया कि यहां एक ही पागल नहीं है-यह बुद्ध तो, दिमाग खराब मालूम होता है, एक यह भी आदमी पागल है। यह कोई हंसने का वक्त है? यह बुद्ध को क्या हो गया है? और यह महाकाश्यप क्यों हंसता है?
और बुद्ध ने आंख उठाई और महाकाश्यप को इशारा किया, और फूल उसे भेंट कर दिया। और भीड़ से यह कहा, जो मैं शब्दों से तुम्हें दे सकता था, तुम्हें दिया। जो शब्दों से नहीं दिया जा सकता, वह महाकाश्यप को देता हूं। एक यही समझ पाया। तुम सुनने वाले थे, यह एक देखने वाला था।
यही कथा झेन के जन्म की कथा है। झेन शब्द आता है ध्यान से। जापान में झेन हो गया, चीन में चान हो गया, लेकिन मूलरूप है ध्यान। बुद्ध ने उस दिन ध्यान दे दिया। झेन फकीर कहते हैं-ट्रांसमिशन आउटसाइड स्क्रि प्चर्स। शास्त्रों के बाहर दान। शास्त्रों से नहीं दिया, उस दिन शब्द से नहीं दिया। महाकाश्यप को सीधा-सीधा दे दिया। शब्द में डालकर न दिया। जैसे जलता हुआ अंगारा बिना राख के दे दिया। महाकाश्यप चुप ही रहा। चुप्पी में बात कह दी गई। जो बुद्ध ने कहा था, कि मुट्ठी भर सूखे पत्ते, ऐसा ही मैंने तुमसे जो कहा है, वह इतना ही है। और जो कहने को है, वह इतना है जितना इस विराट जंगल में सूखे पत्तों के ढेर।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं र उस दिन उस फूल में पूरा जंगल दे दिया। उस दिन कुछ बचाया नहीं। उस दिन सब दे दिया। उस दिन बुद्ध उडेल गए। उस दिन महाकाश्यप का पात्र पूरा भर गया। तब से झेन में यह व्यवस्था रही है कि गुरु उसी को अपना अधिकारी नियुक्त करता है, जो मौन में लेने को राजी हो जाता है। जो शब्द की जिद करता है, वह सुनता है, ठीक है। साधता है, ठीक है। लेकिन वह खोजता उसे है अपने उत्तराधिकारी की तरह, जो शून्य में और मौन में लेने को राजी हो जाता है। जैसे बुद्ध ने उस दिन महाकाश्यप को फूल दिया। ऐसे ही शून्य में, ऐसे ही मौन में।
तो ऐसा नहीं है कि बुद्ध ने जो कहा है वही सब है। वह तो शुरुआत है, वह तो बारहखड़ी है। उसका सहारा लेकर आगे बढ़ जाना। वह तो ऐसा ही है जैसे हम स्कूल में बच्चों को सिखाते हैं ग गणेश का-या अब सिखाते हैं ग गधा का। क्योंकि अब धार्मिक बात तो सिखाई नहीं जा सकती, राज्य धर्मनिरपेक्ष ‘है, तो गणेश की जगह गधा। गणेश लिखो तो मुसलमान नाराज हो जाएं, कि जैन नाराज हो जाएं। गधा सिस्यूलर है, धर्मनिरपेक्ष है। वह सभी का है। ग गणेश का। न तो ग गणेश का है, न ग गधे का है। ग-ग का है। लेकिन बच्चे को सिखाते हैं। फिर ऐसा थोड़े ही है कि वह सदा याद रखता है कि जब भी तुम कुछ पढ़ो तब बार-बार जब भी ग आ जाए, तो कहो ग गणेश का। तो पढ़ ही न पाओगे। पढ़ना ही मुश्किल हो जाएगा। जो साधन था वही बाधक हो जाएगा।
जो कहा है, वह तो ऐसा ही है-ग गणेश का। वह तो पहली कक्षा के विद्यार्थी की बात है। लेकिन बुद्ध ने पहली कक्षा की बात कही, क्योंकि तुम वहीं खड़े हो। उन्होंने विश्वविद्यालय के आखिरी छोर की बात नहीं कही। वहां तुम कभी पहुंचोगे, तब देखा जाएगा। और वहा पहुंच गए जब तुम, तो कहने की जरूरत नहीं रह जाती, तुम खुद ही देखने में समर्थ हो जाते हो।
शुरुआत है शून्य से, अंत है देखने से। शुरुआत है संदेह से, अंत है श्रद्धा पर। संदेह को कैसे श्रद्धा तक पहुंचाया जाए, नास्तिकता को कैसे आस्तिकता तक पहुंचाया जाए, नहीं को कैसे ही में बदला जाए यही बुद्ध की कीमिया है, यही बुद्ध- धर्म है। एस धम्मो सनंतनो।

दूसरा प्रश्न

कल आपने कहा कि मोक्ष, बुद्धत्व की आकांक्षा भी वासना का ही एक रूप है। और फिर कहा, जब तक बुद्धत्व प्राप्त न हो जाए तब तक चैन से मत बैठना। इस विरोधाभास को समझाएं।

मोक्ष की, बुद्धत्व की आकांक्षा भी बुद्धत्व में बाधा है। फिर मैंने तुमसे कहा, जब तक मोक्ष उपलब्ध न हो जाए तब तक तृप्त होकर मत बैठ जाना। तब तक अभीप्सा करना, तब तक आकांक्षा करना। स्वभावत: विरोधाभास दिखाई पड़ता है। लेकिन मैं यही कह रहा हूं कि जब तक आकांक्षारहितता उपलब्ध न हो जाए तब तक आकांक्षारहितता की आकांक्षा करते रहना। यह विरोधाभास दिखाई पड़ता है, क्योंकि मैं दो तलों को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। तुम जहां हो उसको, और तुम जहा होने चाहिए उसको जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। इसलिए विरोधाभास।
जैसे कोई बच्चा पैदा हो, अभी जन्मा है, और हमें उसे मौत की खबर देनी हो। यद्यपि जो जन्म गया वह मरने लगा, लेकिन बच्चे को मृत्यु की बात समझांनी बड़ी कठिन हो जाएगी। मृत्यु की बात विरोधाभासी मालूम पड़ेगी। अभी तो जन्म ही हुआ है, और यह मौत की क्या बात है? और जन्म के साथ मौत को कैसे जोड़ो? बच्चे को विरोधाभासी लगेगी, लेकिन विरोधाभासी है नहीं। क्योंकि जन्म के साथ ही मौत की यात्रा शुरू हो गई। जो जन्मा, वह मरने लगा।
जितने जल्दी मौत समझाई जा सके उतना ही अच्छा है। ताकि जन्म व्यर्थ न चला जाए। अगर जन्म के साथ ही मौत की समझ आ जाए तो जन्म और मृत्यु के
बीच में बुद्धत्व उपलब्ध हो जाता है। तो आदमी जाग जाता है जन्म और मृत्यु दोनों से। जिस जन्म की मृत्यु होनी है, उन दोनों के बीच जीवन तो नहीं हो सकता आभास होगा। तो जब जन्म की मृत्यु ही हो जानी है, तो इस जीवन का क्या भरोसा? तो फिर हम किसी और जीवन की खोज करें-किसी और जीवन की, जहां न जन्म हो, न मृत्यु।
समझें इस प्रश्न को अब।
यदि मैं तुमसे कहूं आकांक्षा न करो, तो तुम यात्रा ही शुरू न करोगे, जन्म ही न होगा। अगर मैं तुमसे यह न कहूं कि आकांक्षा भी छूट जानी चाहिए, तो तुम कभी पहुंचोगे नहीं। मोक्ष की आकांक्षा मोक्ष की यात्रा का पहला कदम है। और मोक्ष की आकांक्षा का त्याग मोक्ष की यात्रा का अंतिम कदम है। दोनों मुझे तुमसे कहने होंगे।
दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक हैं, जो कहते हैं, जब आकांक्षा से बाधा ही पड़ती है तो क्या मोक्ष की आकांक्षा करना! फिर हम जैसे हैं वैसे ही भले हैं। इससे यह मत समझ लेना कि उन्होंने संसार की आकांक्षाएं छोड़ दीं। उन्होंने सिर्फ मोक्ष की आकांक्षा न की। उन्होंने अपने को धोखा दे लिया। संसार की आकांक्षाए तो वे किए ही चले जाएंगे। क्योंकि संसार की आकांक्षाएं तो तभी छूटती हैं जब कोई मोक्ष की आकांक्षा करता है। जब कोई मोक्ष की आकांक्षा पर सब दाव पर लगाता है, पूरा दिल दाव पर लगाता है, तब संसार की आकांक्षाएं छूटती हैं। तब संसार की आकांक्षाओं में जो ऊर्जा संलग्न थी वह मुक्त होती है, मोक्ष की तरफ लगती है। लेकिन जो मोक्ष की तरफ की आकांक्षा किए चला जाता है, वह भी भटक जाता है। क्योंकि अंततः वह आकांक्षा भी बाधा बन जाएगी। एक दिन उसे भी छोड़ना है।
ऐसा समझो, रात हम दीया जलाते हैं। दीए की बाती और तेल, दीया जलना शुरू होता है। तो दीए की बाती पहले तो तेल को जलाती है। फिर जब तेल जल जाता है, तो दीए की बाती अपने को जला लेती है। सुबह न तेल बचता है, न बाती बचती है। तब समझो कि सुबह हुई। फिर भोर हुई।
तो पहले तो संसार की आकांक्षाओं का तुम तेल की तरह उपयोग करो, और मोक्ष की आकांक्षा का बाती की तरह। तो संसार की सारी आकांक्षाओं को जला दो मोक्ष की बाती को जलाने में। तेल का उपयोग कर लो, ईंधन का उपयोग कर लो। सारी आकांक्षाएं इकट्ठी कर लो संसार की, और मोक्ष की एक आकांक्षा पर समर्पित कर दो। झोंक दो सब। मगर ध्यान रखना, जिस दिन सब तेल चुक जाएगा, उस दिन यह बाती भी जल जानी चाहिए। नहीं तो सुबह न होगी। यह बाती कहीं बाधा न बन जाए।
तो एक तो सांसारिक लोग हैं, जो कभी मोक्ष की आकांक्षा ही नहीं करते। फिर दूसरे मंदिरों, मस्जिदों में बैठे हुए धार्मिक लोग हैं, जिन्होंने संसार की आकांक्षा छोड़ दी और परमात्मा की आकांक्षा पकड़ ली। अब उस आकांक्षा को नहीं छोड़ पा रहे हैं। ऐसा समझो कि कुछ तो ऐसे लोग हैं जो सीढ़ियों पर पैर ही नहीं रखते ऊपर जाने की यात्रा ही शुरू नहीं होती। और कुछ ऐसे हैं जो सीढ़ियों को पकड़कर बैठ गए हैं। सीढ़ियां नहीं छोड़ते। जो सीढ़ियों के नीचे रह गया, वह भी ऊपर न पहुंच पाया, और जो सीढ़ियों पर रह गया, वह भी ऊपर न पहुंच पाया। मैं तुमसे कहता हूं? सीढ़ियां पकड़ो भी, छोड़ो भी।
मैंने सुना है, एक तीर्थयात्रियों की ट्रेन हरिद्वार जा रही थी। अमृतसर पर गाड़ी खड़ी थी। और एक आदमी को लोग जबर्दस्ती घसीटकर गाड़ी में रखना चाह रहे थे। लेकिन वह कह रहा था कि भाई, इससे उतरना तो नहीं पड़ेगा? उन्होंने कहा, उतरना तो पड़ेगा। जब हरिद्वार पहुंच जाएगी, तो उतरना पड़ेगा। तो उस आदमी ने कहा-वह बड़ा तार्किक आदमी था-उसने कहा, जब उतरना ही है तो चढ़ना क्या? यह तो विरोधाभासी है। चढ़ों भी, फिर उतरो भी। लेना-देना क्या है? हम चढ़ते ही नहीं। गाड़ी छूटने के करीब हो गई है, सीटी बजनेलगी है, और भाग-दौड़ मच रही है।
आखिर उसके साथियों ने-जो उसके यात्री-दल के साथी थे-उन्होंने उसको पकड़ा और वह चिल्लाता ही जा रहा है कि जब उतरना है तो चढ़ना क्या, मगर उन्होंने कहा कि अब इसकी सुनें! समझाने का समय भी नहीं, उसको चढ़ा दिया। फिर वही झंझट हरिद्वार के स्टेशन पर मची। वह कहे कि उतरेंगे नहीं। क्योंकि जब चढ़ ही गए तो चढ़ गए। अब उतर नहीं सकते। वह आदमी तार्किक था। वह यह कह रहा है कि विरोधाभासी काम मैं नहीं कर सकता हूं। वह किसी विश्वविद्यालय में तर्क का प्रोफेसर होगा!
जब मैं तुमसे कहता हूं, संसार की आकांक्षा छोड़ो-अमृतसर की स्टेशन पर; फिर तुमसे कहता हूं? अब जिस ट्रेन में चढ़ गए वह भी छोड़ो-हरिद्वार पर। परमात्मा का घर आ गया, हरिद्वार आ गया, उसका द्वार आ गया, अब यह ट्रेन छोड़ो। तुम्हें उस आदमी पर हंसी आती है। लेकिन अगर तुम अपने भीतर खोजोगे, तुम उसी आदमी को छिपा हुआ पाओगे।
लूटे मजे उसी ने तेरे इंतजार के
जो हद्दे-इंतजार के आगे निकल गया
विरोधाभास है!
लूटे मजे उसी ने तेरे इंतजार के
जो हद्दे-इंतजार के आगे निकल गया
इंतजार का मजा ही तब है, जब इंतजार भी न रह जाए। याद तभी पूरी आती है, जब याद भी नहीं आती।
इसे थोड़ा कठिन होगा समझना। क्योंकि जब तक याद आती है, उसका मतलब अभी याद पूरी आई नहीं। बीच-बीच में भूल- भूल जाती होगी, तभी तो याद आती
है। जिसकी याद पूरी आ गई, उसकी फिर याद आने की जगह कहां रही! फिर भूलेंगेकहां? याद कैसे आएगी? याद तभी तक आती है जब भूलना जारी रहता है। जब भूलना ही मिट गया तो याद कैसी! भूलना मिट जाने के साथ याद भी खो जाती है।
हद्दे-इंतजार–अब सीमा पार हो गई। लेकिन तभी याद का मजा है जब याद भी नहीं आती। अब एक ही हो गए उससे। अब याद करने के लिए भी फासला और दूरी न रही। किसकी याद करे और कौन करे? किसको पुकारे और कौन पुकारे? जिसे चाहा था, जिसकी चाहत थी, वह जो प्रेमी था और जो प्रेयसी थी, वे दोनों एक हो गए। अपनी ही कोई कैसे याद करे!
लूटे मजे उसी ने तेरे इंतजार के
जो हद्दे-इंतजार के आगे निकल गया
और धर्म की सारी भाषा विरोधाभासी है। होगी ही। क्योंकि धर्म यात्रा का प्रारंभ भी है और अंत भी। वह जन्म भी है और मृत्यु भी। और वह दोनों के पार भी है। इसलिए जल्दी विरोधाभासों में मत उलझ जाना। और उनको हल करने की कोशिश मत करना, समझने की कोशिश करना। तब तुम पाओगे, दोनों की जरूरत है। जो सीढ़ी चढ़ाती है, वही रोक भी लेती है। अगर तुमने बहुत विरोधाभास देखे तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। क्योंकि तुम एक तो कर लोगे, फिर दूसरा करने में अटकोगे। तुमने अगर यह कहा,
तुमने अगर यह सुन लिया कि परमात्मा याद करने से मिलता है, और तुम याद ही करते रहे, और तुम कभी हद्दे-इंतजार के आगे न गए, तो कभी परमात्मा न मिलेगा। राम-राम जपते रहोगे, तोता-रटंत रहेगी। कंठ में रहेगा, हृदय तक न जाएगा। क्योंकि जो हृदय में चला गया, उसकी कहीं याद करनी पड़ती है? याद होती रहती है, करनी नहीं पड़ती। होती रहती है कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि दो याद के बीच भी खाली जगह कहां? सातत्य बना रहता है। तब हद्दे-इंतजार।
और ऐसी घड़ी जब घटती है, तो ऐसा नहीं है कि जब तुम विरोधाभास की सीमा के पार निकलते हो, और जब तुम पैराडाक्स और विरोधाभास का अतिक्रमण करते हो, तो ऐसा नहीं है कि तुम ही परम आनंद को उपलब्ध होते हो, तुम्हारे साथ सारा अस्तित्व उत्सव मनाता है। क्योंकि तुम्हारे साथ सारा अस्तित्व भी अतिक्रमण करता है। एक सीमा और पार हुई।
जब अपने नक्श पर इंसान फतह पाता है
जो गीत गाती है फितरत किसी को क्या मालूम
जो गीत गाती है फितरत किसी को क्या मालूम-जब सारी प्रकृति गीत गाती है, जब सारा अस्तित्व तुम्हारे उत्सव में सम्मिलित हो जाता है!
क्योंकि तुम अलग- थलग नहीं हो, तुममें अस्तित्व ने कुछ दांव पर लगाया है, तुम अस्तित्व के दाव हो, पासे हो, परमात्मा ने तुम्हारे ऊपर बड़ा दाव लगाया है,
और बड़ी आशा रखी है। जिस दिन तुम उपलब्ध होते हो, तुम ही नहीं नाचते, परमात्मा भी नाचता है। तुम ही अकेले नाचे तो क्या नाच! परमात्मा भी खुश होता है। सारा अस्तित्व खुश होता है। एक फतह और मिली। एक विजय-यात्रा का चरण और पूरा हुआ।
जब अपने नक्स पर इंसान फतह पाता है
जो गीत गाती है फितरत किसी को क्या मालूम
वह बड़ा चुप है गीत। इसलिए किसी को क्या मालूम! वह बड़ा मौन है। वह उन्हीं को दिखाई पड़ता है जिन्हें अदृश्य दिखाई पड़ने लगा। वह उन्हीं को सुनाई पड़ता है जो सन्नाटे को भी सुन लेते हैं। वह उन्हीं को स्पर्श हो पाता है जो अरूप का भी स्पर्श कर लेते हैं, निराकार से जिनकी चर्चा होने लगी।
जो गीत गाती है फितरत किसी को क्या मालूम

तीसरा प्रश्नह:

आकांक्षा मिटकर अभीप्सा बन जाती है। अभीप्सा की समाप्ति पर क्या कुछ बचता है? स्पष्ट करें।

आकांक्षा यानी संसार की आकांक्षाएं। आकांक्षा यानी आकांक्षाएं। एक नहीं, अनेक। संसार अर्थात अनेक। जब आकांक्षा मिटकर अभीप्सा बनती है—अभीप्साक यानी आकांक्षा, आकांक्षाएं नहीं। एक ही आकांक्षा का नाम अभीप्सा, अनेक की अभीप्सा का नाम आकांक्षा। जब सारी आकांक्षाओं की किरणें इकट्ठी हो जाती हैं और एक सत्य पर, परमात्मा पर, या मोक्ष पर, या स्वयं पर, निर्वाण पर, कैवल्य पर केंद्रित हो जाती हैं, तो अभीप्सा। आकांक्षा और आकांक्षाओं का जाल जब संग्रहीभूत हो जाता है, तो अभीप्सा पैदा होती है। किरणें जब इकट्ठी हो जाती हैं, तो आग पैदा होती है। किरणें अनेक, आग एक।
यहां तक तो समझ में बात आ जाती है कि आदमी धन को चाहता है, पद को चाहता है, पत्नी को चाहता है, बेटे को चाहता है, भाई को चाहता है, जीवन चाहता है, लंबी उम्र चाहता है। यह सब चाहत, ये सब चाहतें इकट्ठी हो जाती हैं और आदमी सिर्फ परमात्मा को चाहता है-यहां तक भी समझ में आ जाता है। क्योंकि बहुत आकांक्षाएं जिसने की हैं वह इसकी भी कल्पना तो कम से कम कर ही सकता है कि सभी आकांक्षाएं इकट्ठी हो गयीं, सभी छोटे नदी-नाले गिर गए एक ही गंगा में और गंगा बहने लगी सागर की तरफ। लेकिन जब आकांक्षा के बाद अभीप्सा भी खो जाती है तब क्या बचता है? नदी-नाले खो जाते हैं गंगा में; फिर जब गंगा खो जाती है सागर में, तो क्या बचता है? सागर बचता है। गंगा नहीं बचती।
अब इसे तुम समझो।
पहले तुम्हारी आकांक्षाएं खो जाएंगी, तुम बचोगे। फिर तुम भी खो जाओगे, परमात्मा बचेगा। जब तक तुम आकांक्षाओं में भटके हुए हो, तब तक तुम तीन-तेरह हो, टुकड़े-टुकड़े हो। जब तुम्हारी सारी आकांक्षाएं अभीप्सा बन जाएंगी, तुम एक हो जाओगे, तुम योग को उपलब्ध हो जाओगे। योग यानी जुड़ जाओगे।
सासांरिक आदमी खंड-खंड है, एक भीड़ है। एक मजमा है। धार्मिक आदमी भीड़ नहीं है, एक एकांत है। धार्मिक आदमी इकट्ठा है। योग को उपलब्ध हुआ है। सारी आकांक्षाएं सिकोड़ लीं उसने। लेकिन अभी है। अभी होना भर मात्र बाधा बची। अभी तुम हो-अभीप्सा में-और परमात्मा है। यद्यपि तुम एक हो गए हो, लेकिन परमात्मा अभी दूसरा है, पराया है।
इसे थोड़ा समझो।
सांसारिक आदमी भीड़ है। अनेक है। धार्मिक आदमी एक हो गया, इकट्ठा हो गया। इंटीग्रेटेड, योगस्थ। लेकिन अभी परमात्मा बाकी है। तो द्वैत बचा। सांसारिक आदमी अनेकत्व में जीता है, धार्मिक आदमी द्वैत में। भक्त बचा, भगवान बचा। खोजी बचा, सत्य बचा। सागर बचा, गंगा बची। अब भक्त को अपने को भी डुबा देना है, ताकि भगवान ही बचे, ताकि सागर ही बचे। गंगा को अपने को भी खोना है। अनेक से एक, फिर एक से शून्य, तब कौन बचेगा? तब सागर बचता है, जो सदा से था। तुम नहीं थे तब भी था। वही बचेगा। जहा से तुम आए थे, वहीं तुम लौट जाओगे। जो तुम्हारे होने के पहले था, वही तुम्हारे बाद बचेगा।
मरने के बाद आए हैं ऐ राहबर जहां
मेरा कयास है कि चले थे यहीं से हम
वर्तुल पूरा हो जाता है। जन्म के पहले तुम जहां थे, मरने के बाद वहीं पहुंच जाते हो। थोड़ा सोचो; गंगा सागर में गिरती है, गंगा सागर से ही आई थी-सूरज की किरणों पर चढ़ा था सागर का जल, सीढ़ियां बनाई थीं सूरज की किरणों की, फिर बादल घनीभूत हुए थे आकाश में, फिर बादल बरसे थे हिमालय पर, बरसे थे मैदानों में, हजारों नदी-नालों में बहे थे गंगा की तरफ-गंगोत्री से बही थी गंगा, मेघ से आई थी, मेघ सागर से आए थे; फिर चली वापस, फिर सागर में खो जाएगी।
मरने के बाद आए हैं ऐ राहबर जहां
मेरा कयास है कि चले थे यहीं से हम
वही बचेगा, जो तुम्हारे होने के पहले था। उसे सत्य कहो…। तुम एक लहर हो। सागर तुम्हारे पहले भी था। लहर खो जाएगी, सो जाएगी, सागर फिर भी होगा। और ध्यान रखना, सागर बिना लहरों के हो सकता है, लहर बिना सागर के नहीं हो सकती। कभी सागर में लहरें होती हैं, कभी नहीं भी होतीं। जब लहरें होती हैं, उसको हम सृष्टि कहते हैं। जब लहरें नहीं होतीं उसको हम प्रलय कहते हैं। अगर सारी लहरों को सोचें, तो सृष्टि और प्रलय। अगर एक-एक लहर का हिसाब करें, तो जन्म और मृत्यु। जब लहर नहीं होती, तो मृत्यु। जब लहर होती है, तो जन्म। लेकिन जब लहर मिट जाती है तब क्या सच में ही मिट जाती है? यही सवाल है गहरा। लहर सच में मिट जाती है? आकार मिटता होगा, जो लहर में था। जो लहर में वस्तुत: था, वह तो कैसे मिटेगा? जो था, वह तो नहीं मिटता, वह तो सागर में फिर भी होता है। बड़ा होकर होता है, विराट होकर होता है।
तुम रहोगे, तुम जैसे नहीं। तुम रहोगे, बूंद जैसे नहीं। तुम रहोगे, सीमित नहीं। पता-ठिकाना न रहेगा, नाम-रूप न रहेगा। लेकिन जो भी तुम्हारे भीतर घनीभूत है इस क्षण, वह बचेगा, विराट होकर बचेगा। तुम मिटोगे, लेकिन मिटना मौत नहीं है। तुम मिटोगे, मिटना ही होना है।

आखिरी प्रश्न

पिछले एक प्रश्नोत्तर में आपने समर्पण और भक्ति में भीतर होश, बाहर बेहोशी कही है, और ध्यानी और ज्ञानी को भीतर से बेहोशी और बाहर से होश कहा है। यह ध्यानी को किस तरह की भीतर की बेहोशी होती है? और बाहर फिर वह किस चीज का होश रखता है, किस तरह से होश रखता है, जब कि भीतर बेहोशी रहती है? क्या मेरे सुनने या समझने में कहीं गलती हो रही है? कृपया फिर से ठीक से समझाकर कहें।

नहीं–सुनने में कोई गलती नहीं हुई। समझने में गलती हो रही है। क्योंकि समझ विरोधाभास को नहीं समझ पाती। सुन तो लोगे; कितनी ही विरोधाभासी बात कहूं सुन तो लोगे। और यह भी समझ लोगे कि विरोधाभासी है, और यह भी समझ लोगे कि सुन लिया, लेकिन फिर भी समझ न पाओगे। क्योंकि जिसको तुम समझ कहते हो वह विरोधाभास को समझ ही नहीं सकती। इसीलिए तो विरोधाभास कहती है। मैं फिर से दोहरा देता हूं बात बड़ी सीधी है। जटिल मालूम होती है, क्योंकि बुद्धि सीधी-सीधी बात को नहीं पकड़ पाती।
एक तो है भक्त, प्रेमी। वह नाचता है। तुम उसकी बेहोशी को-जब मैं कहता हूं बेहोशी, तो मेरा मतलब है उसकी मस्ती-तुम उसके जाम को छलकते बाहर से भी देख लेते हो। मदिरा बही जा रही है। मीरा के नाच में, चैतन्य के भजन में, कुछ भीतर जाकर खोजना न होगा। उसकी मस्ती बाहर है। मौजे-दरिया, लहरों में है। फूलों में है। अंधे को भी समझ आ जाएगी। बहरे को भी सुनाई पड़ जाएगी। नाचती हुई है, गीत गाती हुई है। अभिव्यक्त है। यह जो मस्ती है, यह मस्ती तभी संभव है जब भीतर होश हो। नहीं तो यह मस्ती पागलपन हो जाएगी।
पागल और भक्त में फर्क क्या है? यही। पागल भी कभी नाचता है, मुस्कुराता है, गीता गाता है, लेकिन तुम पहचान लोगे। उसकी आंखों में जरा झांक कर देखना-उसमें बेहोशी तो है, लेकिन भीतर होश का दीया नहीं। भक्त बेहोश भी है और होश का दीया भी सम्हाले है। नाचता भी है, लेकिन दीए की लौ नहीं कंपती भीतर। बाहर नाच चलता है, भीतर सब ठहरा है-अकंप। तभी तो पागल और परमात्मा के दीवाने का फर्क है।
तो तुम्हें कभी-कभी परमात्मा का दीवाना भी पागल लगेगा, क्योंकि पागल और परमात्मा के दीवाने में बाहर तो एक ही जैसी घटना घटती है। और कभी-कभी पागल भी तुम्हें परमात्मा का दीवाना लगेगा।
लेकिन इसका मतलब यही हुआ कि तुम जरा भीतर न गए, बाहर से ही बाहर लौट आए। बाहर-बाहर देखकर लौट आए। जरा भीतर उतरो। जरा दों-चार सीढ़ियां भीतर जाओ। जरा पागल के नाच में और दीवाने-परमात्मा की मस्ती के नाच में जरा गौर करो। स्वाद भिन्न है, रंग-ढंग बड़ा भिन्न है। अलग-अलग अंदाज हैं। लेकिन थोड़ा गौर से देखोगे तो। ऐसे ही राह से चलते हुए देखकर गुजर गए तो भ्रांति हो सकती है। ऊपर से दोनों एक जैसे लगते हैं। पागल सिर्फ पागल है। बेहोश है। भक्त सिर्फ बेहोश नहीं है। बेहोश भी है, और कुछ होश भी है। बेहोशी के भीतर होश का दीया जल रहा है। यही विरोधाभास समझ में नहीं आता।
फिर एक और विरोधाभास, तो चीजें और जटिल हो जाती हैं।
यह तो भक्त हुआ, फिर ध्यानी हैं। यह तो मीरा हुई, फिर बुद्ध हैं। बुद्ध के बाहर तो कंपन भी न मिलेगा। वे मौजे-दरिया नहीं हैं, शात झील हैं। वे फूल के रंग जैसे बाहर दिखाई पड़ते हैं, ऐसे नहीं हैं। वे ऐसे हैं जैसे बीज में फूल छिपा हो। इंतजार-हजार रंग भीतर दबाकर बैठे हैं। स्वर हैं बहुत, लेकिन ऐसे जैसे वीणा में सोए स्वछप्त। सूर, किसी ने छेड़े न हों। तो बाहर बिलकुल सन्नाटा है।
तुम बुद्ध के बाहर होश पाओगे, मीरा के बाहर तुम मस्ती पाओगे। बुद्ध के बाहर तुम परम होश पाओगे। वहा जरा भी कंपन न होगा। और जैसे मीरा के बेहोशी। में भीतर होश है, ऐसा ही बुद्ध के बाहर के होश में भीतर बेहोशी होगी, क्योंकि दोनों साथ होने ही चाहिए, तभी परिपूर्णता होती है। अगर सिर्फ बाहर का होश ही हो और भीतर बेहोशी न हो, तो यह तो तुम साधारण त्यागी-विरक्त में पा लोगे। इसके लिए बुद्ध तक जाने की जरूरत नहीं। यही तो बुद्धों में और बुद्धों का अनुसरण करने वालों। फर्क है। बुद्ध में और पाखंडी में यही फर्क है।
मीरा और पागल में जैसे फर्क है, बुद्ध और पाखंडी में वैसे फर्क है। पाखंडी को देखकर अगर ऊपर-ऊपर से आ गए तो धोखा हो जाएगा। बगुले को देखा है खड़ा? कैसा बुद्ध जैसा खड़ा रहता है। इसीलिए तो बगुला भगत शब्द हो गया। कैसा भगत मालूम पड़ता है! एक टांग पर खड़ा रहता है। कौन योगी इतनी देर इस तरह खड़ा रहता है? लेकिन नजर मछली पर टिकी रहती है।
तो तुम्हें ऐसे लोग मिल जाएंगे-काफी है उनकी संख्या-क्योंकि सरल है बगुला बन जाना, बहुत आसान है। लेकिन उनकी नजर मछली पर लगी रहेगी। योगी बैठा हो भला आंख बंद किए, हो सकता है नजर तुम्हारी जेब पर लगी हो। बाहर से तो कोई भी साध ले सकता है आसन, प्राणायाम, नियम, मर्यादा। सवाल है भीतर का। यह निष्कंपता बाहर की ही तो नहीं है, अन्यथा सर्कस की है।
यह निष्कंपता अगर बाहर ही बाहर है, और भीतर कंपन चल रहा है, और भीतर आपाधापी मची है, और भीतर चिंतन और विचार चल रहा है, और वासनाएं दौड़ रही हैं, और भीतर कोई परमात्मा को पा लेने की मस्ती नहीं बज रही है, और भीतर कोई गीत की गुनगुन नहीं है, भीतर कोई नाच नहीं चल रहा है…..।
ऐसा समझो बुद्ध और मीरा बिलकुल एक जैसे हैं। फर्क इतना ही है कि जो मीरा के बाहर है, वह बुद्ध के भीतर है। जो मीरा के भीतर है, वह बुद्ध के बाहर है। एक सिक्का सीधा रखा है, एक सिक्का उलटा रखा है। सिक्के दोनों एक हैं। जो भीतर जाएगा वही पहचान पाएगा। और इसलिए मैं कहता हूं कि मुझे दोनों रास्ते स्वीकार हैं।
तुम अगर बुद्ध के अनुयायियों से मीरा की बात कहोगे, वे कहेंगे, कहा की अज्ञानी स्त्री की बात उठाते हो? जैनों से जाकर कहो, महावीर के अनुयायियों से कहो मीरा बात, वे कहेंगे कि आसक्ति, राग? कृष्ण का भी हुआ तो क्या! मोह? कहीं बुद्धपुरुष नाचते हैं? यह तो सांसारिकों की बात है। और कहीं बुद्धपुरुष ऐसा रोते हैं, याद करते हैं, ऐसा इंतजार करते हैं? कहीं बुद्धपुरुष ऐसा कहते हैं कि सेज सजाकर रखी है, तुम कब आओगे? न, जैन कहेंगे, यह तो अज्ञानी है मीरा।
जैन तो कृष्ण को भी ज्ञानी नहीं मान सकते। वह बांसुरी बाधा डालती है। ज्ञानी के ओंठों पर बांसुरी जंचती नहीं। करके देख लो कोशिश, किसी जैन-मंदिर में जाकर महावीर के मुंह पर बांसुरी रख आओ, वे पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे तुम्हारी, कि तुमने हमारे भगवान बिगाड़ दिए। यह दुष्कर्म होगा वहां। यह दुर्घटना मानी जाएगी! यहां तुम बांसुरी जैन-मंदिर में लेकर आए कैसे? और महावीर के ओंठ पर रखने की हिम्मत कैसे की?
अनुयायियों के साथ बड़ा खतरा है। वे ऐसे ही हो जाते हैं जैसे घोड़ों की आंखों पर पट्टियां बंधी होती हैं-बस एक तरफ दिखाई पड़ता है। तले में जुते घोड़े देखे? बस वैसे ही अनुयायी होते हैं। बस एक तरफ दिखाई पड़ता है। जीवन का विस्तार खो जाता है। संप्रदाय का यही अर्थ है।
धर्म तो बहुआयामी है। संप्रदाय एक आयामी है, वन डायमेंशनल है। बस उन्होंने बुद्ध को देखा, समझा कि बात खतम हो गई। बुद्ध बहुत खूब हैं, लेकिन बुद्ध होने के और भी बहुत ढंग हैं। जिंदगी बड़ी अनंत आयामी है। परमात्मा किसी पर चूक नहीं जाता। हजार-हजार रंगों में, हजार-हजार फूलों में, हजार-हजार ढंगों में अस्तित्व खिलता है और नाचता है।
मगर दो बड़े बुनियादी ढंग हैं। एक ध्यान का, और एक प्रेम का। मीरा प्रेम से पहुंची। जो प्रेम से पहुंचेगा, उसकी मस्ती बाहर नाचती हुई होगी, और भीतर ध्यान होगा। भीतर मौन होगा, सन्नाटा होगा। मीरा को भीतर काटोगे, तो तुम बुद्ध को पाओगे वहां। और मैं तुमसे कहता हूं अगर बुद्ध की भी तुम खोजबीन करो और भीतर उतर जाओ, तो तुम वहा मीरा को नाचता हुआ पाओगे। इसके अतिरिक्त हो नहीं सकता। क्योंकि जब तक ध्यान मस्ती न बने, और जब तक मस्ती ध्यान न बने, तब तक अधूरा रह जाता है सब।
इसलिए कभी यह मत सोचना कि जिस ढंग से तुमने पाया, वही एक ढंग है। और कभी दूसरे के ढंग को नकार से मत देखना। और कभी दूसरे के ढंग को निंदा से मत देखना, क्योंकि वह अहंकार की चालबाजियां हैं। सदा ध्यान रखना, हजार-हजार ढंग से पाया जा सकता है। बहुत हैं रास्ते उसके। बहुत हैं द्वार उसके मंदिर के। तुम जिस द्वार से आए, भला। और भी द्वार हैं। और दो प्रमुख-द्वार हैं। होने ही चाहिए। क्योंकि स्त्री और पुरुष दो व्यक्तित्व के मूल ढंग हैं।
स्त्री यानी प्रेम। पुरुष यानी ध्यान। पुरुष अकेला होकर उसे पाता है। स्त्री उसके साथ होकर उसे पाती है। पुरुष सब भांति अपने को शून्य करके उसे पाता है। स्त्री सब भांति अपने को उससे भरकर पाती है। मगर जब मैं स्त्री और पुरुष कह रहा हूं तो मेरा मतलब शारीरिक नहीं है। बहुत पुरुष हैं जिनके पास प्रेम का हृदय है, वे प्रेम से ही पाएंगे। बहुत स्त्रिया हैं जिनके पास ध्यान की क्षमता है, वे ध्यान से पाएंगी।
मगर यह बात तुम सदा ही ध्यान रखना कि जो तुम बाहर पाओगे, उससे विपरीत तुम भीतर पाओगे। क्योंकि विपरीत से जुड़कर ही सत्य निर्मित होता है। सत्य विरोधाभासी है। सत्य पैराडाक्स है।osho36

आज इतना ही।

ओशो

http://oshosatsang.org/2013/09/04/%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-2-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B-2/

धर्मान्तरण बनाम घर वापसी ….एच एल दुसाध

धर्मान्तरण बनाम घर वापसी

lohiya

मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी है, जो कि शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) का लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से उत्पन्न होती रही है. यही वह समस्या है जिसके खात्मे के लिए गौतम बुद्ध, मज्दक, सवोनरोला, विलियम गाड्विन, सेंट साइमhungry indiaन,वाल्टेयर, रॉबर्ट ओवन, मार्क्स, माओ, लेनिन, आंबेडकर इत्यादि जैसे अनेक महामानवों का उदय हुआ. इनके प्रयत्नों से मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या से पार पाने की दिशा में ठोस काम हुए, बावजूद इसके कमोबेश इसकी व्याप्ति दुनिया में सारी जगह है. किन्तु इस मामले में भारत जैसी बदतर स्थिति विश्व के अन्य किसी देश में नहीं है. दुनिया के किसी भी देश में हजारों साल के परम्परागत रूप से विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन लोगों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है. इस सुविधासंपन्न वर्ग द्वारा खड़ी की गयी विषमता की खाई के कारण देश गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, विच्छिन्न्तावाद, आतंकवाद के दलदल में बुरी तरह फँसा हुआ है. विषमता की यह स्थिति पूर्ववर्ती सरकारों की गलत नीतियों का परिणाम है, जिन्होंने शक्ति के स्रोतों के वाजिब बंटवारे की दिशा में सम्यक कदम नहीं उठाये. ऐसे में जब अच्छे दिन आने का सपना दिखा कर भारी बहुमत के साथ भाजपा की सरकार सत्ता में आयी तब इस पार्टी के ख़राब रिकार्ड के बावजूद अंततः जनता को उम्मीद थी कि राष्ट्र-भक्ति का सब समय उच्च उद्घोष करने वाली यह पार्टी इस बार विषमता के खात्मे की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाएगी तथा विभाजनकारी भावनात्मक मुद्दों से दूर रहेगी, जिसके लिए यह देश-विदेश में बदनाम है. किन्तु हुआ उल्टा. विषमता का मुद्दा पता नहीं कहाँ खो गया और अभूतपूर्व तरीके से उभरकर आ गया वह विभाजनकारी मुद्दा जिसे तुंग पर पहुंचाने की इस पार्टी और इसके सहयोगी संगठनों को महारत हासिल है.

आज इस पार्टी के सहयोगी संगठनों के सौजन्य से सारे आवश्यक मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं, मुख्य मुद्दा बन गया है धर्मान्तरण जिसे ‘घर वापसी’ का नाम दिया जा रहा है. यही आज सड़क से लेकर संसद और बौद्धिक बहसों का प्रधान मुद्दा बन गया है. अभी तक घर वापसी के निशाने पर कुछ खास जिले ही थे, किन्तु अब भाजपा के मातृ संगठन RSS के एक अनुषांगिक संगठन की ओर से 2021 तक भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की खुली घोषणा कर दी गयी है. इसके नेता ने खुलकर कह दिया है कि 2021 तक मुस्लिम और ईसाईयों को हिन्दू बना लिया जायेगा. बहरहाल संघ के तीन दर्जन अनुषांगिक संगठनों की गतिविधियों से यह स्पष्ट है कि यह आर्थिक और सामाजिक विषमता को पूर्ववत रखना चाहता है. ऐसा इसलिए कि जिन विशेषाधिकार युक्त व सुविधासंपन्न अल्पजनों का शक्ति के समस्त स्रोतों पर प्रायः एकाधिकार है, यह संगठन उन्हीं के हित का पोषण करने के उद्देश्य से बना है. ऐसे में अल्पजनों के प्रभुत्व को अटूट रखने लिए यह वंचितों की ऊर्जा विषमता के खात्मे की बजाय अन्य दिशा में मोड़ना चाहता है. इसलिए ही वह जज्बाती मुद्दे को तूल दे रहा है. बहरहाल आज की तारीख में जब सुविधाभोगी वर्ग के हित में वंचितों की उर्जा घर वापसी में लगाने की दिशा में संघ के आनुषांगिक संगठन सुपरिकल्पित रूप से आगे बढ़ रहे हैं, जनता उनसे अपने घर में झांकने की गुजारिश कर रही है. क्या जिस घर में वर्षों पूर्व घर छोड़े लोगों की वापसी करने की कवायद हो रही है, उसमें पहले से रह रहे लोग संतुष्ट हैं? मेरा प्रश्न है क्या कुछ विशिष्ट किस्म के ब्राह्मणों को छोड़कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण से कई सहस्रों मानव प्रजातियों में बंटे हिन्दू स्त्री-पुरुषों, जिनमे रंचमात्र भी आत्मसम्मान और विवेक है, को हिन्दू धर्म में रहना चाहिए?

याद करें भूमिहार, उपाध्याय, आचार्य, महापात्र, दुबे, तिवारी, चौबे वगैरह की नम्बुदरीपाद, वाजपेयी, मिश्र इत्यादि ब्राह्मणों के समक्ष सामाजिक मर्यादा. क्या इनकी तुलनात्मक सामाजिक मर्यादा हिन्दू धर्म से मुक्त होने के लिए प्रेरित नहीं करती? इसी तरह हिन्दू समाज में सिंहों की भांति विचरण करने वाले क्षत्रियों से हिन्दू धर्म यह कहता है कि सत्तर वर्ष के क्षत्रिय को चाहिए कि वह दस वर्ष के ब्राह्मण बालक को पिता जैसा मानते हुए प्रणाम करे, और बड़ी-बड़ी मूंछे फहराए क्षत्रिय ऐसा करते भी हैं. क्या यह शास्त्रादेश क्षत्रियों को हिन्दू-धर्म से मोहमुक्त होने के लिए प्रेरित नहीं करता? और हिन्दू धर्म में वैश्य मात्र वित्तवान होने के अधिकार से समृद्ध हैं, पर ब्राह्मण और क्षत्रियों के समक्ष उनकी हीनतर स्थिति क्या हिन्दू धर्म के परित्याग का आधार नहीं बनाती? आत्मसम्मान के अतिरिक्त हिन्दू-धर्म अर्थात वर्ण-धर्म के मात्र आंशिक अनुपालन से उपजी विवेकदंश की समस्या तो इनके साथ है ही, पर आत्मसम्मान और विवेक विसर्जित कर भी सवर्णों के हिन्दू धर्म में रहने की कुछ हद तक युक्ति है क्योंकि इसके विनिमय में उन्हें हजारों साल से शक्ति के स्रोतों में पर्याप्त हिस्सेदारी मिली है. पर, आत्मसम्मान व विवेक से समृद्ध सवर्ण नारियां व शुद्रातिशुद्रों से कैसे कोई प्रत्याशा कर सकता है कि वे हिन्दू धर्म में बने रहेंगे?

जिन्हें हिन्दू माना जाता है उनका हिंदुत्व वर्ण-धर्म के पालन पर निर्भर है. और वर्ण-धर्म के पालन का अर्थ है कि सच्चा हिन्दू वर्ण और कर्म-संकरता से दूर रहेगा. वर्ण-संकरता से बचने का मतलब एक सच्चे हिन्दू को जाति सम्मिश्रण की सम्भावना को निर्मूल करते जाना होगा. वहीं कर्म-संकरता से बचने का एकमेव मार्ग प्रत्येक जाति/वर्ण के हिन्दू को जन्मसूत्र से निर्दिष्ट कर्म/पेशे में ही लगा रहना होगा. अर्थात चमार व दुसाध जैसे चर्मकारी व सुअर पालन छोड़कर अध्यापक, पुजारी सैनिक इत्यादि नहीं बन सकते, उसी तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः हलवाही, कुलीगिरी, धोबीगिरी इत्यादि जैसा सेवा कर्म नहीं कर सकते. लेकिन किसी भी समाज को वर्ण व कर्म संकरता से बचाए रखना असंभव कार्य लगता है क्योंकि यह मानवीय इच्छा की पूर्णतया हत्या किये बिने संभव ही नहीं है. वैसे दुनिया में हिन्दू समाज को छोड़कर अन्य समाजों ने इसकी जरुरत ही महसूस नहीं की. लेकिन भारत में असंभव सा काम ब्रिटिशराज स्थापित होने के पूर्व तक ब्राह्मणों के शास्त्रों और क्षत्रियों के शस्त्रों के सम्मिलित प्रयास से सफलता पूर्वक अंजाम दिया गया. हिन्दू समाज को वर्ण व कर्म-संकरता से बचाए रखने में सवर्ण नारियों और अछूत घोषित लोगों को जिस तरह इस्तेमाल होना पड़ा है, वह अपने आप में बहुत गहरी ज़लालत है जो इनके आत्मसम्मान को गहराई से ललकारते हुए हिन्दू-धर्म से भागने की विकट आवाज लगाती है.

हिन्दू- धर्म स्त्रियों को किस रूप में देखता है इस तथ्य से गाँव की अनपढ़ कोरिन, चमारिन, दुसाधिन, अहीरिन वगैरह तो अनजान हो सकती हैं, किन्तु इंदिरा गाँधी, किरण बेदी, ऐश्वर्या राय बनने की आकांक्षी शहरी पढ़-लिखी महिलाएं तो जानती ही हैं कि हिन्दू-धर्म नारियों को जिस रूप में देखता है, उससे कोई भी स्वाधीन नारी एक पल भी इसमें नहीं रहना चाहेगी. वैसे तो आमतौर पर सभी नारियों को ही कुटिल, मिथ्याभाषिणी, रूप और उम्र का विचार किये बिना सदैव परपुरुष के सम्भोग की आकांक्षी इत्यादि बताते हुए हिन्दू-धर्म उन्हें सदा पुरुष की छाया में रखने की हिदायत देकर नीच साबित करता रहता है. किन्तु वर्ण-संकरता से समाज को बचाए रखने के लिए सती-विधवा-बालिका विवाह और बहु-पत्नीवादी-प्रथा के माध्यम से उच्च-वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय) नारियों का जीवन जिस तरह नारकीय बनाया गया है, वह किसी भी सभ्य व सुशिक्षित नारी को हिन्दू-धर्म परित्याग की घोषणा करने के लिए प्रेरित करेगा. पर भारत की सभ्य व सुशिक्षित मानी जाने वाली नारियां, जो मुख्यतः सवर्ण समुदाय से हैं, अभी भी पराधीन हैं और पति की दासी के रूप में जीवन का उपभोग करने की अभ्यस्त हैं, इसीलिए हिन्दू-धर्म में बनी हुई हैं. लेकिन इन्होने भी अब खुद को दलित कहना शुरू कर दिया है. जिस दिन इनमें अम्बेडकरवाद से दीक्षित दलितों का अहसास आ जायेगा उस दिन….

जहां तक अहसास का सवाल है, सवर्ण नारियों की तरह सछूत- शूद्र (ओबीसी) भी इससे मीलों दूर हैं. एक मशहूर एक्टिविस्ट के मुताबिक, ‘विदेशों में जिन्हें स्लेव (दास) कहते हैं, हिन्दू धर्म में वही शूद्र हैं. जिस दिन शूद्रों के अपने शूद्रत्व का अहसास हो जायेगा, उस दिन भारत में सामाजिक क्रांति हो जाएगी.’ शूद्र चूंकि आत्मसम्मान और दासत्व के अहसास से शून्य हैं इसलिए ही ये अभी भी हिन्दू धर्म में बने हुए हैं. पर क्या एक मिनट के लिए भी इनके हिन्दू धर्म में रहने की युक्ति है? आज हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था (वर्ण-व्यवस्था) के विकल्प के रूप में विकसित अम्बेडकरी आरक्षण व्यवस्था के सहारे कई हजार सालों से शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत शूद्र (दलित –पिछड़े) शासक-प्रशासक, अध्यापक, डाक्टर, इंजीनियर, व्यवसायी इत्यादि बनकर बेहतर जीवन जीने की ओर अग्रसर हैं. ऐसे लोग यदि उपलब्धि कर लें कि हिन्दू-धर्म के कारण ही हजारों सालों से उनके पुरखों को शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह वंचित होकर सवर्णों की मुफ्त सेवा में लगा रहना पड़ा तो क्या उनका आत्मसम्मान एक पल भी हिन्दू-धर्म में बने रहने की इजाजत देगा?

आज अम्बेडकरवाद से दीक्षित जिन लोगों में आत्मसम्मान व विवेक जाग्रत हो गया है, वे हिन्दू धर्म का परित्याग कर रहे हैं. अफ़सोस यही है कि ऐसा सिर्फ शिक्षित दलितों में ही हो पाया है, सवर्ण नारियों और शूद्रों में जाग्रत होना बाकी है. पर क्या इनका आत्मसम्मान व विवेक सदा सुप्त ही रहेगा? नहीं, संघ के लोग यह जान गए हैं कि देर- सवेर उनका भी आत्मसम्मान व विवेक जाग्रत होगा, फिर हिन्दू-धर्म तो वे हिन्दू धर्म को वीरान कर देंगे. इस अप्रिय भविष्य को ध्यान में रखकर ही सवर्णवादी संघ के आनुषांगिक संगठन मुस्तैद हो गए हैं. उनके घर वापसी अभियान का मुख्य लक्ष्य यह है कि धर्मान्तरण के मुद्दे को गरमा कर किसी तरह थोक भाव से होने वाले धर्मान्तरण पर रोक लगाने का कानून बनवा लिया जाय. बिना ऐसा किये वे अपने घर में रह रहे लोगों को घर छोड़ने से रोक नहीं पाएंगे.

HL DUSHAD(एच एल दुसाध की पोस्ट से साभार)
जय भीम

बहुजन विचरचरा या बौद्ध धम्म की विचाधारा – “ईश्वर और धर्म मुक्त नया युक्त समाज” के विषय को उठाती बॉलीवुड फिल्म ‘PK’ में उठाये गए दो सवालों पर एक समीक्षा ….Bharat Aman

pk amirफिल्म PK में तपस्वी महाराज (सौरभ शुक्ला) क्लाइमेक्स में PK से दो बहुत ही जबरदस्त सवाल पूछता हैं-

1. अगर किसी व्यक्ति को भगवान (इश्वर) को मानने से ( माथा टेकने से, टिका लगाने से या धागा बांध लेने से ) जीने की उम्मीद मिलती है तो तुम कौन होते हो उसकी इस उम्मीद को छिनने वाले ?

 

2. अगर लोगों से तुम उसका भगवान छिन लेना चाहते हो तो यह बताओ उसके बदले में तुम उन्हें क्या दोगे ??

 

PK इस सवाल का जवाब नास्तिकता से खुद को बिलकुल अलग रखते हुए निराकार एकेश्वरवाद से देता है और प्रचलित मानव निर्मित इश्वरीय स्वरुपो को झूठा क़रार देता है। पर इस सवाल के जरिए धर्म अपने सबसे सकारात्मक और मजबूत पक्ष को आपके सामने लाता है। मेरे विचार से इस सवाल का जवाब हर नास्तिक को देना चाहिय।

मेरा यह मानना है कि प्रश्न कर्ता ने अपने प्रश्न में खुद ही ईश्वर को मानने की बड़ी वजह मनुष्य की दुर्बलता को बताया है। प्रश्न जब जीने का हो या यु कहे की Survival का हो तो प्रकृति का बड़ा सीधा सा नियम है वो सबकुछ आजमाओ जिससे तुम्हारी या तुम्हारे कुनबे की जान बच सकती हैं वो हर चीज़ उचित है जो तुम्हारे या तुम्हारे कुनबे की जान बचा सकती है और अनुचित वो हर चीज़ है जो तुम्हारे Survival के chances कम करती हो। अगर किसी के अन्दर Survive करने की उम्मीद अपने आँगन में खड़े पेड़ को देखने से बढती है या गाँव के पहाड़ी के सामने हाँथ जोड़ने से या किसी ईश्वर के मंदिर में माथा टेकने से बढती है तो यह सारे माध्यम भी अनुचित नहीं दिखाई पड़ते। तो फिर किसी कल्पना पर विश्वास करना कब अनुचित बन जाता है। इस प्रश्न का उत्तर भी प्रकृति देती है- जब किसी कल्पना पर विश्वास आपके Survival के chances को कम करने लगता है या यु कहे की आपके और आपके कुनबे के उतोरोत्तर विकास में बाधक बन जाता है तब उस कल्पना पर विश्वास करना आपके और आपके कुनबे के लिए अनुचित बन जाता है। यह बिलकुल कुछ ऐसा है की झूठ आपको थोड़े समय के लिए सहारा तो दे सकता है परन्तु उसे ही सत्य मान लेना आपको सही रास्ते से दूर ले जाता है जिससे आपका उतोरोत्तर विकास रुक सकता है। इसलिए कब किसी चीज़ से उम्मीद करनी चाहिए और कब छोड़ देनी चाहिय इसका उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है और एक इंशान होने के नाते मेरा फ़र्ज़ है की मैं लोगो को यह बात बताऊ।

अब रहा दूसरा प्रश्न तो मेरा मानना है की ईश्वर की अवधारणा मात्र एक आकार या निराकार परिकल्पना नहीं है बल्कि एक वस्तृत दर्शन का अंग होता है। यह दर्शन आपके अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है। आप के लिय एक संस्कृति का निर्माण भी करता है और बतलाता है की आपके जीवन जीने का ढंग कैसा होना चाहिए। इस इश्वरीय दर्शन जिसे धर्म भी कहते है ने आरंभिक काल में मानव सभ्यता के विकास में अपनी भूमिका भी अवश्य निभाई होगी। परन्तु वर्तमान समय में क्या यह दर्शन मानव सभ्यता के विकास की असीम संभावनाओ मूर्त रूप दे सकता है ?? क्या इसमे ऐसी क्षमता दिखती है ??
जब हम इन प्रश्नों का विश्लेषण करते है तो पाते है इस दर्शन ने मध्यकाल से लेकर वर्तमान समय तक अनेको जाने ले ली है। इतना ही नहीं आज हम देखते है विश्व में वे समाज या देश ही मानव सभ्यता को नई उचाईयो तक ले जा रहे है जिन्होंने खुद को धार्मिक मामलो में सबसे ज्यादा उदार और सहिशुष्ण रखा है और जो देश या समाज इन मामलों में सबसे ज्यादा कट्टरपंथी है वहां सभ्यता का विकास रुक सा गया है और कही-कही तो विपरीत दिशा में जा रहा है जिसकी सबसे बड़ी वजह है झूठ की बुनियाद से चिपके रहना। अतः इस दर्शन को मानवता जो मनुष्य होने का सबसे बड़ा दर्शन है से replace कर देना चाहिए । मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए मनुष्य का नैतिक प्रयास ही काफी है किसी ईश्वर की जरुरत नहीं है अतः मानवतावादी संस्कृति में नैतिकता का वही स्थान होता है जो ईश्वर का धर्मो में होता है।

मैंने उत्तर खोजने की पूरी कोशिश की है पर शायद इन प्रश्नों का और भी बेहतर ढंग से जवाब दिया जा सकता है। ‪#‎PK‬

https://www.facebook.com/atulya.bharat.165/posts/390266184471669

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1. अगर किसी व्यक्ति को भगवान (इश्वर) को मानने से ( माथा टेकने से, टिका लगाने से या धागा बांध लेने से ) जीने की उम्मीद मिलती है तो तुम कौन होते हो उसकी इस उम्मीद को छिनने वाले ?

(न्याय की उम्मीद ही असली उम्मीद है जब न्याय नहीं मिलता तब ईश्वर की तरफ इंसान बढ़ता है .ठीक है करो जो करना है पर धम्म के राज में धर्म एक व्यक्तिगत मामला होगा सार्वजानिक नहीं, कोई भीड़ कोई पूजाघर कोई शोरशराबा नहीं चाइये सिर्फ न्याय व्यस्था चाहिए\ठीक है आप संबैधानिक न्याय और ईश्वर में से एक को चुनने के लिए आज़ाद हो, अगर ईश्वर चुनोगे तो आपको कोई भी संवेधानिक सरक्षण नहीं मिलेगा जो भी लेना है अपने ईश्वर से लो  )

2. अगर लोगों से तुम उसका भगवान छिन लेना चाहते हो तो यह बताओ उसके बदले में तुम उन्हें क्या दोगे ??

(हम देंगे धम्म या संविधान )

ईश्वर है या नहीं इस सवाल पर सदियों से चर्चा और लड़ाइयां हो रही हैं, ईश्वर अभी तक तो नहीं मिला| हाँ  इस विवाद में कई इंसानों और जीवों ने अतः दुःख भोग है , क़त्ल किये गए हैं| जब तक ईश्वर नहीं मिलता तब तक हमें मिल जुल कर अपनी समस्याओं का समाधान करते हुए अच्छा जीवन बिताना चाहिए यही है इन सवालों का जवाब| किसी के घर में आग लगी हो तो वो पहले आग बुझाएगा या उस आग  लगाने वाले को ढूंढेगा, इसी तरह मानवता को बहुत से दुःख हैं तो हमें उन दुखों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए न की  इन दुखो के तथाकथित करता धर्ता ईश्वर को खोजने में निकलना चाहिए| इतनी सदियों से नहीं मिला तो अब क्या मिलेगा| दुनियां  के धर्म कहते हैं की ईश्वर ने दुनिया को बनाया पर बौद्ध धम्म में हम जानते और तब मानते हैं की इंसान की बुद्धि ने ईश्वर को बनाया और कमल  की बात  देखिये  ध्यान रहे “जिन्होंने ईश्वर को बनाया है उनका ईश्वर भी बिल्कुम उनके जैसा है वे अन्यायी हैं तो उनका ईश्वर भी अन्यायी है वे मजलूम जैन तो उनका ईश्वर भी मजलूम है ”

for further reading on buddhism point of view…

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/08/27/buddhism-is-not-to-answer-paranormal-question-it-is-reserch-to-end-human-sorrows-osho/

https://samaybuddha.wordpress.com/where-was-your-god-before-ambedkar-constitution-protection/

भारत में मूर्ती पूजा का इतिहास …लाला बौद्ध

buddhaप्राचीन अवैदिक मानव पहले आकाश, समुद्र, पहाड़, बादल, बारिश, तूफान, जल, अग्नि, वायु, नाग, सिंह आदि प्राकृतिक शक्तियों की शक्ति से परिचित था और वह जानता था कि यह मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है, इसलिए वह इनकी प्रार्थना करता था. बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा. वह मानने लगा कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो इन सभी को संचालित करती है.

पूर्व वैदिक काल में वैदिक समाज जन इकट्ठा होकर एक ही वेदी पर खड़े रहकर ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करते थे. वे यज्ञ द्वारा भी ईश्वर और प्रकृति तत्वों का आह्वान और प्रार्थना करते थे.

वेद काल में न तो मंदिर थे और न ही मूर्ति. इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की स्तुतियां जरूर होती है, लेकिन उनकी मूर्तिपूजा नहीं होती थीं.
भारत में वैदिक काल के पतन और अनीश्वरवादी धर्म के उत्थान के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन शुरू हुआ.

अथर्ववेद की रचना के बाद वेदों में ईश्वर उपासना के दो रूप प्रचलित हो गए- साकार तथा निराकार. निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि ऋषि-मनीषियों ने दोनों उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया था.

बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां बनाई जाने लगीं.
शिवलिंग की पूजा का प्रचलन पुराणों की देन है. शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन हिन्दू-जैन धर्म में बढ़ने लगा.

मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं-
(1) जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए. ऐसे दुनियाभर में सात मंदिर थे.
(2) उन्होंने जो अपने पूर्वजों या प्रॉफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे.
(3) जिन्होंने अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे. हर कबीले का एक देवता होता था. कुलदेवता और कुलदेवी भी होती थी.

शोधकर्ताओं के अनुसार अरब में मक्का में पहले बुद्ध की मूर्तियां रखी हुई थी और संपूर्ण अरब ही मूर्तिपूजकों का स्थान था. तुर्किस्तान पहले नागवंशियों का गढ़ था. यहां नागपूजा का प्रचलन था. उत्तरी तुर्किस्तान को पुराणों में काम्बोज कहा गया है. तुर्क कश्यप गोत्रिय नागवंशी हैं. भारत में तुर्कों ने राज किया है.

कृष्ण के काल में लोग इन्द्र नामक देवता से जरूर डरते थे. कृष्ण ने ही उक्त देवी-देवताओं के डर को लोगों के मन से निकाला था.

हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथ वेद, उपनिषद और गीता भी मूर्ति पूजा को नहीं मानते हैं तो हिन्दू क्यों मूर्ति या पत्थर की पूजा करते हैं और इस पूजा का प्रचलन आखिर कैसे, क्यों और कब हुआ?

बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा और हजारों की संख्या में संपूर्ण देश में बौद्ध विहार बनने लगे. जिसमें बुद्ध की मूर्तियां रखकर उनकी पूजा होने लगी. इन मंदिरों में हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाने लगा जिसके चलते बाद में राम और कृष्ण के मंदिर बनाए जाने लगे और इस तरह भारत में मूर्ति आधारित मंदिरों का विस्तार हुआ.

मनमाने मंदिरों से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ, जो वेदसम्मत नहीं कहे जा सकते. इनको ब्राह्मण पुरोहितों ने अपने स्वार्थ में गढ़वाये हैं. परिणाम आपके सामने है. भारत में सबसे अधिक मूर्तियां हैं, मंदिर हैं, भारत के लोग सबसे ज्यादा अंधश्रद्धालु हैं, सबसे ज्यादा अंधविश्वासी हैं, सबसे ज्यादा अज्ञानी और निर्धन हैं.

वैदिक धर्मी, कब सनातनी बन गये? कब हिन्दू बन गये? आपको इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता. क्योंकि ये एक छलावा है, षड़यंत्र है. सबसे पहले देश में बुद्ध की मूर्तियां और बुद्ध-विहार अस्तित्व में आये. पुष्यमित्र शुंग के शासन में आने के बाद बुद्धविहारों को मंदिरों में तथा बुद्ध की मूर्तियों को विष्णु, राम आदि की मूर्तियों में बदला गया, तथा नये-नये मंदिरों का असीमित निर्माण शुरू हुआ जो आज भी जारी है.

lala baudhजय भीम

लाला बौद्ध

इतिहास जीतने वाला लिखवाता है और जीत केवल अधिक क्षमता की ही होती है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की अधिक क्षमता वाला व्यक्ति या कौम अच्छाई के रस्ते पर है की नहीं|……समयबुद्धा

इतिहास जीतने वाला लिखवाता है और जीत केवल अधिक क्षमता की ही होती है|

किसी भी कौम का सम्पूर्ण दमन करना हो तो उसकी किताबें उसके रीती रिवाज संस्कृति  उसके इतिहास तो नष्ट कर दो| उसके बाद नए सिरे से किताबें लिखो,नए रीती रिवाज संस्कृति  आदि पैदा करो , इतिहास को अपने तरीके से खोजो| इससे पहले की जिस देश के साथ ऐसा किया जा रहा है वो भूल जाये की वो क्या था क्या है?  ये सारी दुनिए  उनको भुला देगी| लोगों की शक्ति पाने का संगर्ष असल में याददास्त का भूलने से संगर्ष है …मिलन कुंदेरा

(Milan Kundera (Czech pronunciation: [ˈmɪlan ˈkundɛra]; born 1 April 1929) is the Czech Republic‘s most recognised living writer. Of Czech origin, he has lived in exile in France since 1975, having become a naturalised citizen in 1981. Having written in both Czech and French, he revises the French translations of all his books; these therefore are not considered translations but original works.)

आज का निति क्षमता बढ़ने वाली समयबुद्धा गाथा  इस प्रकार है:

 “जीतने वाले की हर गलत बात जानते हुए भी सही मानने को बाध्य होना पड़ता है और हारने वाले की हर सही और प्रमाणित बात को भी महत्व नहीं मिलता| इतिहास जीतने वाला लिखवाता है और जीत केवल अधिक क्षमता की ही होती है| क्षमताये तीन प्रकार की होती है- व्यक्तिगत,सामाजिक और कूटनीतिक इनको बढ़ाने पर केन्द्रित रहो”…समयबुद्धा

 

 

इतिहास जीतने वाला लिखवाता है, इस बात को समझने के लिए महाभारत का एक अंश देखते हैं जो  साबित करेगा की किस तरह विजेता ने हारने वालों की छवि ही नहीं नाम तक अपने हिसाब से लिखवाया है

जीत जीत होती है चाहे वो छल से हो या बल से, इस गाथा को बेहतर समझाने  के लिए मुझे भरत भूषण अग्रवाल जी की “महाभारत की एक सांझ” याद आ रही है जिसमें दुर्योधन (माफ़ कीजियेगा सुयोधन कहने की आदत भी नहीं है और लोग समझेंगे भी नहीं की किसकी बात हो रही है.. तो मुझे भी दुर्योधन ही कहना पड़ रहा है..) युधिस्ठिर (तथाकथित धर्मराज..) से कहता है.. “हाँ हाँ क्यों नहीं!! तुम अपनी देख रेख में अपने तरीके से इतिहास लिखावओगे…मेरा नाम तक मिटा कर रख दोगे..” (धर्मराज के “आने वाली पीदियाँ तुम्हें दुर्योधन ही कहेंगी.. ” के जवाब में..)

jeet kshmta

 महाभारत की एक सांझ

महाभारत का अंतिम चरण, एक भयंकर द्वन्द युद्ध व दुर्योधन की पराजय के साथ एक अधर्म का सर्वनाश, परन्तु लुप्त तथ्यों पर प्रकाश डालने पर एक प्रश्न उठता है की अधर्मी कौरव थे कि पांडव??
सांझ का समय,दुर्योधन अपनी अंतिम साँसों को गिन रहा है एकाएक एक स्वर दुर्योधन को पुकारता हुआ…भाई, भाई दुर्योधन…
दुर्योधन आँखें खोलता है तो देखता है की युधिष्टर उससे मिलने आया है. दोनों का ये संवाद एक विवादित पहलु उजागर करता है और यह सोचने पर विवश करता है की दुर्योधन का कर्म, कोई अधर्म नहीं था…बहुत साल पहले एक पाठ पढ़ा था जो कि माखन लाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित है. दुर्योधन आँखें खोलके जैसे ही युधिष्टर को देखता है, बोल पढता है-
दुर्योधन— जीवन भर मुझसे द्वेष रखा,मृत्यु पर तो मुझे चैन प्रदान होने देते, क्या देखने आये हो मेरी विवशता, या अब भी तुम्हारी छल पूर्ण विजय में कोई त्रुटी रह गयी??
युधिष्टर– नहीं भाई, तुमने जो किया वो अधर्म था और इसका यही अंत होना था…
युधिष्टर– और यह तुम्हे भी ज्ञात था दुर्योधन की तुमने सर्वदा अधर्म का साथ दिया.दुर्योधन– मृत्यु के वक़्त तो मुझे मेरे असली नाम से बुला लो अगर मुझसे इतनी ही सांत्वना है तो??
युधिष्टर– मुझे क्षमा करना,परन्तु तुम्हे पूरी सृष्टि दुर्योधन के नाम से जानेगी न की तुम्हारे असली नाम से…जो की ‘सुयोधन’ है.

दुर्योधन( एक पीड़ामई मुस्कान के साथ)
—सृष्टि…हाहा,ये सृष्टि और ये युग वही जानेगी जो इन्हें इतिहास बतायेगा,और मुझे ज्ञात है की तुम इतिहास अपनी देख- रेख में ही लिख्वाओगे.युधिष्टर-तुमने कर्म भी तोह ऐसे ही किये हैं भाई.
दुर्योधन– ऐसे क्या कर्म किये हैं?? मैंने क्या अनुचित किया?? तुम तो ५ भाई थे मेरे तो १०० भाई थे. क्या उत्तर देता सबको??
युधिष्टर– बड़ा भाई मैं था,राज काज का अधिकार मेरा था न की तुम्हारा?
दुर्योधन–ये अधिकार तुमको किसने दिया?? मेरे पिता( ध्रितराष्ट्र) बडे भाई थे और तुम्हारे पिता (पांडू) को राज का अधिकार कार्यवाहक के रूप में मिला था.
युधिष्टर-परन्तु राजा तो वही थे. हम परस्पर बैठ कर राज्य का विभाजन भी तो कर सकते थे? तुमने फिर भी युद्ध ही चुना, क्या वो सही था?? क्या वो सही था की तुम्हारी
विशाल सेना का सामना हम मात्र ५ भाइयो ने किया..तुमने छल और बल दोनों का उपयोग किया फिर भी परास्त हुए.
दुर्योधन( हँसते हुए)— ५?? तुम्हारे साथ तो सृष्टि के पालनहारे थे, श्री कृष्ण स्वयम तुम्हारे साथ थे…वरण तुम कहाँ हमको परास्त कर सकते थे? भीष्म पितामाह, द्रोणाचार्य सब युद्ध तो मेरी तरफ से रहे थे परन्तु विजय तुम्हारी चाहते थे…
युधिष्टर-क्युकी वो भी धर्म के साथ थे दुर्योधन.

दुर्योधन( क्रोध में)
— अब तो मर रहा हु,अब तो मुझे मेरे नाम से पुकार लो.

युधिष्टर— क्षमा करना सुयोधन…मेरा औचित्य तुम्हे ठेस पहुचाने का नहीं था.
दुर्योधन— रहने दो, मुझे सत्य का ज्ञात है, द्रोणाचार्य का प्रिय अर्जुन तो शत्रु था, फिर भी तुमने सबको धोखे से मारा??
युधिष्टर—धोखे से??
दुर्योधन— हाँ, धोखे से…भीष्म पितामह, कर्ण, मैं ….सबको.
युधिष्टर– और जैसे तुमने अभिमन्यु का वध किया था, वो तो एक बालक था.
दुर्योधन— मुझे कदापि ज्ञात नहीं था की ऐसा उसके साथ होगा,वोह चक्रव्यूह का औचित्य अर्जुन के लिए था…मुझे पता होता, तो मैं उसका वध नहीं होने देता.
युधिष्टर— तुमने हरसंभव प्रयास किया हमारा सर्वनाश करने का ..
दुर्योधन–व्यर्थ के तर्क देना बंद करो युधिष्टर…मैं जानता हूँ की उस ग्लानी का क्या अर्थ होता है जो मैंने बचपन से गुरुकुल में तुम भाइयो के सापेक्ष्य में भोगी….अर्जुन सर्वदा द्रोणाचार्य का प्रिय था…अगर वो इतना बड़ा धनुधर था क्यों एकलव्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा में द्रोणाचार्य ने मांग लिया?? क्युकी उनको पता था की एकलव्य बड़ा धनुधर बनेगा, अर्जुन से भी बड़ा.
अगर भीम इतना शक्तिशाली था तो क्यों उसने मुझे छल से हराया?? क्यों उसको कृष्ण के सहारे की ज़रूरत पड़ी??
यह सब भी छोडो,तुमने तो कर्ण को शुद्र पुत्र ठहरा दिया, जो असली योधा था, उसने मेरा साथ क्यों दिया होता अगर मैं अधर्मी होता?? वो सच्चा मित्र था,सच्चा योधा था,उसके साथ भी तुमने धोखा किया…मेरे अंधे माँ-बाप की मैं एक महत्वपूर्ण लाठी था,मेरा ही नहीं मेरे सारे भाइयो का वध कर दिया…मृत्यु पश्चात क्या मुह दिखाओगे??

युधिष्टर–तुम्हे अपना किया कुकर्म नहीं दिख रहा दुर्योधन..मैंने सोचा था की तुम पश्चताप करना चाहते होगे…परन्तु तुम
दुर्योधन– कैसा पश्चाताप?? कृष्ण ने तुम्हे बचाया,उन्होंने मेरी माता को छला,मुझे,सबको छला..
युधिष्टर– मदद में तुमने श्री कृष्ण की सेना को चुना, उनको नहीं
दुर्योधन–हाहा, वो लीला रचाते हैं,वो मेरी तरफ होते तब भी मैं हारता,मुझे पता था महाभारत का येही अंत होगा, परन्तु मैं घुटने नहीं टेक सकता था…और मुझे गर्व है खुद पे.

युधिष्टर( हंसते हुए)–झूठी प्रशंसा तुम्हारी आदत रही है शुरू से..अपने बुरे कर्मो पे कैसा गर्व??
दुर्योधन( क्रोध में)— हाँ, तुमने तो द्रौपदी को भी जुए के दाव में लगा दिया था धर्मराज, तुमने अपने सगे भाई कर्ण का वध भी धोखे से होने दिया…तुम्हारी माता ने तुम्हे सत्य नहीं बताया जो कर्ण जानता था..क्युकी वो योधा था,असली दानवीर और धर्मी.

युधिष्टर( थोड़ी देर बाद)–अब तुम्हारा अंतिम समय है सुयोधन,मुझे क्षमा करना कोई ठेस पहुची हो तो??

सुयोधन— नहीं,यह दिखावा मेरे सम्मुख मत करो…मैंने जो किया,वो मेरे और मेरे भाइयो के अधिकार के लिए था…मुझे पता है की सारे युग ‘इतिहास’ के द्वारा छले जायेंगे..मेरा नाम दुर्योधन पुकारा जायेगा,तुम वीर कहलाओगे…मुझे कोई ग्लानी नहीं है…मई अब सो रहा हूँ और बहुत शान्ति की निद्रा में लीं हो रहा हूँ, बचपन से नहीं सो पाया हूँ, बरगद के पेड़ के निचे पलने वाला पौधा बनके रह गया हूँ,परन्तु अब कोई अन्धकार नहीं है, कोई युधिस्टर,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव नहीं हैं…कोई राज्य नहीं है,कोई प्रजा नहीं है, कोई अधिकार नहीं नहीं है,कोई धर्म-अधर्म नहीं है, जिज्ञासा नहीं है, लालसा नहीं है, झूठ नहीं है और सच भी नहीं है

सिर्फ मेरी माता और उनकी गोद में मेरी लुप्त हुयी निद्रा है….आह!!!!

( अंतिम ‘वाक्य’ सुयोधन के मुख से)…..”मुझे सदैव एक बात का दुख रहेगा की मेरे पिता अंधे थे.” था…

व्यंग ;- “ऑफिस में जब से सभी कर्मियों का अभिनंदन जय भीम से करना शुरू किया है……”

पप्पू के पापा ने ऑफिस में जब से सभी कर्मियों का अभिनंदन जय भीम से करना शुरू किया है. ज्यादातर साथी कर्मी या तो पापा की ओर मुहँ भी नहीं करते या फिर उनका कोई उत्तर ही नहीं रहता और तो और महिला कर्मियों ने तो उनसे बात करना भी लगभग खत्म सा कर दिया है. हद तो तब हो गयी जब बाबा की दी हुई भीख से सिर तान कर बैठने वाले उनके बॉस ने तो उलटा उन्हें ऑफिस में राजनीतिक माहोल उत्पन्न करने के लिए नोटिस भी दे डाला. जबकि स्वयं वे कभी पेट्रोल के दाम वृद्धि पर, सांप्रदायिक दंगों पर, तो कभी महिलाओं के उत्पीडन पर अलग अलग दलों को कोसते हुए ठाट से सभी पर रॉब झाड़ते रहतें हैं.पापा के चहरे की परेशानी भांपकर पप्पू ने पापा को हिन्दू कोड बिल पर आने वाले एपिसोड के बारे में बताया. तब पापा के चहरे की मुस्कान ने मुझे जय भीम से उनके अन्दर आयी ताकत के असर को समझा दिया.अगले ही दिन पापा ने ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर एपिसोड के प्रसारित होने की पूरी जानकारी लिख कर शेयर कर दी.एपिसोड के प्रसारित होने के अगले दिन ऑफिस की महिला कर्मियों ने बाबा साहेब की एक तस्वीर लेकर ऑफिस में लगा दी, जिस पर ऊपर कुछ इस प्रकार लिखा हुआ था.”For a successful revolution it is not enough that there is discontent. What is required is a profound and thorough conviction of the justice, necessity and importance of political and social rights.”-Dr Bhimrao Ramji Ambedkarपापा के ऑफिस पहुँचने पर आज उन्हीं महिलाओं ने पापा का जय भीम बोल कर अभिनंदन किया. फिर बॉस के आने पर पापा के साथ साथ सभी महिलाओं ने भी जोर से जय भीम बोल कर उनका भी अभिनंदन किया, तो पलट कर बॉस ने पूछा ये जय भीम का मतलब क्या है.

पापा ने कहा जय भीम की खोज बाबा के एक सिपाही बाबू एल. एन. हरदास ने की थी, जिसका का मतलब है, समानता, स्वाभिमान, सम्मान, स्थापित करने वाला माउंट एवरेस्ट की तरह का शिखर.

महिलाओं ने भी कहा समस्त भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण को खत्म करने की ताकत का सूत्र.

बॉस के सिर पर इस हथोड़े की चोट ने तो उनका ही नहीं सभी साथियों का सिर हमेशा के लिए बाबा साहेब के सामने झुकने को मजबूर कर दिया, और मुझे अपना सिर ऊँचा रख कर बात करने लायक बना दिया.

घर पर भी पप्पू, अपनी छोटी बहन पिंकी को भी अब तुतलाती भाषा में दय भीम बोलने का अभ्यास कराने लगा है.

हाँ, इधर मेरे भी सभी दोस्तों ने मुझे पोस्ट पर जय भीम लिख कर एवं शेयर करके अपना सहयोग देना जारी रखा है. जय भीम

बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सन् 1956 में विजयदशमी के दिन नागपुर में सभी बहुजन (SC+ST+OBC+Converted Minorities) को वापस अपने धम्म में लौट चलने की शरुआत की थी| आईये तब के बाद भारत में बौद्ध धम्म की दशा दिशा और भविष्ये के बारे में जाने….आनंद श्रीकृष्ण

deksha bhoomi nagpur

बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सन् 1956 में विजयदशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली थी. यह वह तारीख थी, जब भारत में धम्म कारवां को नयी गति और दिशा मिली थी. अब उस तारीख के 57 साल पूरे होने जा रहे हैं. ऐसे में इन 57 सालों में धम्म कारवां की प्रगति, उसकी दशा, दिशा और भविष्य का अवलोकन करने की आवश्यकता है. लेकिन इन तमाम अवलोकनों की बुनियाद में पहला सवाल यह खड़ा है कि आखिर बाबासाहेब ने धर्म वापसी क्यों किया और धम्म कारवां क्यों आरंभ किया?

असल में डॉ. आंबेडकर ने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि भारत में प्रचलित जातिगत असमानता दलितों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है. 9 मई, 1916 को कोलम्बिया विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में अपने रिसर्च पेपर ‘भारत में जातियां-उनकी संरचना, उद्भव एवं विकास’ के जरिए डॉ. आंबेडकर ने यह साबित कर दिया था कि कुछ स्वार्थी लोगों ने जातिगत असमानता की व्यवस्था को शास्त्र सम्मत दिखाने की कोशिश की है और ये धारणा फैलाई है कि शास्त्र गलत नहीं हो सकते. भारत लौटने के बाद उन्होंने दलितों के मानवाधिकारों के लिए अलग-अलग मोर्चे पर प्रयास करना शुरू कर दिया. महाड सत्याग्रह द्वारा सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने के अधिकार, कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश का अधिकार, अंग्रेजी सरकार के सामने दलितों के लिए वयस्क मताधिकार का अधिकार, गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के अधिकार की लड़ाई ऐसी ही कोशिश थी. 1932 में ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की घोषणा भी कर दी थी लेकिन महात्मा गांधी द्वारा आमरण-अनशन करने के कारण डॉ़ आंबेडकर को तरह-तरह की धमकियां मिली. तब डॉ. आंबेडकर को मजबूर होकर पूना पैक्ट स्वीकार करना पड़ा और दलितों के लिए आरक्षण के बदले में पृथक निर्वाचन का हक छोड़ना पड़ा. इस संघर्ष के दौरान डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि हिन्दू धर्म में रहकर दलितों को राजनैतिक आजादी का अधिकार भले ही मिल जाए लेकिन उनको आर्थिक और सामाजिक बराबरी का हक नहीं मिल सकता. इसलिए 1935 में येवला (नाशिक) में डॉ. आंबेडकर ने घोषणा की थी कि वह हिन्दू धर्म में पैदा हुए थे यह उनके वश की बात नहीं थी लेकिन हिन्दू रहकर वह मरेंगे नहीं, यह उनके वश में है. डॉ. आंबेडकर ने धर्म-वापसी का निश्चय येवला की सभा में ही कर लिया था.

धर्म वापसी पर विचार करने के लिए 30 एवं 31 मई 1936 को बंबई में आयोजित महार परिषद को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा थाः -‘धर्म वापसी कोई बच्चों का खेल नहीं है. यह ‘मनुष्य के जीवन को सफल कैसे बनाया जाय’ इस सरोकार से जुड़ा प्रश्न है… इसको समझे बिना आप धर्म वापसी के संबंध में मेरी घोषणा के वास्तविक निहितार्थ का अहसास कर पाने में समर्थ नहीं होंगे. छुआछूत की स्पष्ट समझ और वास्तविक जीवन में इसके अमल का अहसास कराने के लिए मैं आप लोगों के खिलाफ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचारों की दास्तान का स्मरण कराना चाहता हूं. सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने का हक जताने पर या सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने का अधिकार जताने पर या घोड़ी पर दूल्हे को बैठाकर बारात को जुलूस की शक्ल में सार्वजनिक रास्तों से घुमाने के अधिकार आदि का इस्तेमाल करने पर आप लोगों को सवर्ण हिन्दुओं द्वारा मारे-पीटे जाने के उदाहरण तो बहुत आम हैं. लेकिन ऐसी और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण दलितों पर सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न का कहर ढाया जाता है… खरी बात पूछूं तो बताइये कि इस समय हिन्दुओं और आप लोगों के बीच क्या किसी प्रकार के समाजिक संबंध हैं?

जिस तरह मुसलमान हिन्दुओं से भिन्न हैं; उसी तरह दलित लोग भी हिन्दुओं से नितान्त भिन्न हैं. जिस तरह मुसलमानों और ईसाइयों के साथ हिन्दुओं का रोटी-बेटी का कोई सम्बन्ध नहीं होता है उसी तरह आप लोगों के साथ भी हिन्दुओं का किसी भी प्रकार का रोटी-बेटी का कोई संबंध नहीं है… आपका समाज और उनका समाज दो बिल्कुल अलग-अलग समूह हैं… हालांकि आप लोगों ने धर्मांतरण के महत्व को नहीं समझा है लेकिन निस्संदेह रूप से आप लोगों ने नामान्तरण यानि नाम वापसी के महत्व को समझ ही लिया है. अगर आप लोगों में से किसी व्यक्ति से उसकी जाति के बारे में सवाल कर दिया जाता है कि वह किस जाति का है तो वह दलित होने के रूप में अपना उत्तर देता है, लेकिन वह महार है या भंगी है, ऐसा बताने में संकोच करता है. जब तक कुछ विशेष परिस्थितियों की मजबूरी न हो तब तक कोई भी व्यक्ति अपना नाम नहीं बदल सकता. ऐसे नाम वापसी का कारण यह है कि एक अनजान आदमी तो दलित और सवर्ण के बीच कोई अन्तर कर नहीं सकता. और जब तक एक हिन्दू को किसी व्यक्ति की जाति का पता नहीं चल जाता तब तक उस व्यक्ति के दलित होने के कारण वह हिन्दू उस व्यक्ति के खिलाफ अपने मन में नफरत का भाव नहीं भर सकता. सवर्ण हिन्दुओं को जब तक साथ यात्रा कर रहे दलितों की जातियों की जानकारी नहीं होती है तब तक तो यात्रा के दौरान वे बड़े दोस्ताना अंदाज में व्यवहार करते हैं, लेकिन जैसे ही किसी हिन्दू को यह पता चलता है कि वह जिस व्यक्ति से बातचीत कर रहा है वह दलित है; तो उसका मुंह और मन तुरंत कसैला हो जाता है. आप लोगों के लिए इस तरह के अनुभव नये नहीं हैं.

आखिर ऐसा क्यों होता है? आप महार कहने के बजाय स्वयं को चोखामेला बता कर या भंगी कहने के बजाय वाल्मीकि बता कर दूसरों को चकमा देने की कोशिश करते हैं. लेकिन आप लोग यह तो जानते ही हैं कि दूसरे लोग इस तरह के झांसे में नहीं आते. आप लोग अपने को चाहे चोखामेला कहें या दलित कहें; लोग तो जान ही जाते हैं कि आप क्या हैं. आप लोगों ने अपनी छुपा-छुपी की ऐसी कारगुजारियों से ही नाम-वापसी की आवश्यकता को स्वयं ही सिद्ध कर दिया है. तो फिर धर्म-वापसी करने में आखिर क्या ऐतराज होना चाहिए? धर्म-वापसी करना नाम वापसी करने जैसा ही है. धर्म-वापसी करने के पश्चात ही नाम-वापसी आप लोगों के लिए ज्यादा लाभकारी होगा. अपने को एक मुसलमान, एक ईसाई, एक बौद्ध या एक सिक्ख कहना एक धर्म का वापसी मात्र नहीं है बल्कि एक नाम का भी वापसी है. यही सच्चा नाम वापसी है… जब तक आप हिन्दू धर्म में बने रहेंगे तब तक आपको अपने जाति नाम को छिपा कर नाम-वापसी करते रहने पर निरन्तर मजबूर होना पड़ेगा… इसलिए मैं आप लोगों से यह पूछता हूं कि बजाय इसके कि आप आज एक नाम बदलें, कल दूसरा नाम बदलें और पेंडुलम की तरह लगातार ढुलमुल हालत में बने रहें, आप लोगों को धर्म वापसी करके अपना नाम स्थाई रूप से क्यों नहीं बदल लेना चाहिये?’ डॉ. आंबेडकर द्वारा कही गई उपरोक्त बातें कमोबेश आज भी उतनी ही सत्य हैं जितनी कि सन् 1935 में थी.

इसी सभा में धर्म वापसी की आवश्यकता के बारे में डॉ. आंबेडकर ने कहा:

मुझे उस प्रश्न पर बस आश्चर्य ही होता है जिसे कुछ हिन्दू कुछ इस तरह उठाते हैं कि केवल धर्म-वापसी से क्या होने वाला है? भारत में वर्तमान समय के सिक्खों, मुसलमानों और ईसाईयों में से अधिसंख्य लोग तो पहले हिन्दू ही थे और उन में भी शूद्रों और दलितों की तादाद ही सबसे ज्यादा है…अगर ऐसा है भी तो धर्म-वापसी के बाद उनकी स्थिति में एक स्पष्ट प्रगति साफ दिखती है… समस्या पर गहन चिंतन-मनन करने के बाद हर किसी को यह मानना पड़ेगा कि दलितों के लिये धर्म-वापसी उसी प्रकार जरूरी है जिस प्रकार भारत के लिए स्वराज जरूरी है. दोनों का अंतिम लक्ष्य तो एक जैसा ही है, दोनों के लक्ष्य में कोई फर्क नहीं है और वह अंतिम लक्ष्य है स्वतंत्रता प्राप्त करना.”

20 वर्षों तक सभी धर्मों का गहन अध्ययन करने के बाद डॉ. आंबेडकर इस निश्चय पर पहुंचे कि बौद्ध धर्म सबसे उपयुक्त है, क्योंकि बौद्ध धर्म का जन्म भारत में ही हुआ है और बौद्ध धर्म समानता, करूणा, मैत्री, अहिंसा और भाई-चारे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है. इसमें ऊंच-नीच और छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं है. जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करने के पश्चात डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर, 1956 को बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर बौद्धधम्म के प्रचार-प्रसार को नई गति प्रदान की. उन्होंने 22 प्रतिज्ञाओं का एक नया फार्मूला दिया.

==============वर्तमान में धम्म==============================

भगवान बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले अषाढ़ पूर्णिमा के दिन धम्म चक्र प्रवर्तन करके धम्म कारवां की शुरूआत की थी. डॉ. आंबेडकर ने सन 1956 में विजयदशमी के दिन अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा लेकर धम्म चक्र का अनुपर्वतन किया. धम्म कारवां आज काफी फल-फूल चुका है. 1956 में पांच लाख लोगों की संख्या आज करोड़ों में पहुंच गई है. अंग्रेजी अखबार द टाईम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली संस्करण,10 नवंबर 2006) में प्रकाशित एक रपट के अनुसार भारत वर्ष में सन 2006 में 30 लाख लोगों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. 2001 की जनगणना के वक्त बढ़कर यह लगभग 81 लाख हो चुकी थी. जो कि 2011 की आखिरी जनगणना के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 97 लाख पहुंच गई हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ भारत में बौद्धों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख से भी अधिक मानते हैं. उनका मानना है कि जनगणना में वास्तविक संख्या इसलिए सामने नहीं आ पाती हैं क्योंकि काफी लोग बौद्ध होते हुए भी अपने को आधिकारिक दस्तावेजों में बौद्ध नहीं घोषित करते.

सांस्कृतिक रूप से देखा जाए तो लगभग सभी प्रदेशों में बौद्ध अनुयायियों ने अनेकों बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया है. पंजाब में 22 बुद्ध विहार निर्मित किए गए हैं. गुजरात में कई जगहों पर बुद्ध अनुयायियों ने बुद्ध विहारों का निर्माण करवाया है. यू.पी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक सहित देश के तमाम प्रदेशों में अनेकों बुद्ध विहारों का निर्माण करवाया जा चुका है. अमेरिका और यूरोप में भी बौद्ध धम्म बहुत तेजी से बढ़ती हुई जीवनशैली बनता जा रहा है. डॉ. आंबेडकर ने धम्म दीक्षा लेते हुए कहा था कि वो एक नए किस्म का धम्म कारवां आरंभ करने जा रहे हैं, जिसमें बौद्ध भिक्षु शील सदाचार का पालन करते हुए सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य करेंगे. इससे प्रभावित होकर एशिया के अन्य देशों में भी बौद्ध पुनर्जागरण तेजी से हुआ. जिनेवा आधारित ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक व आध्यात्मिक संगठन’ ने 2009 का ‘विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म का सम्मान’ बौद्ध धम्म को प्रदान किया.

====================धम्म कारवां की दिशा=============================

आज के वक्त में यह सोचना भी जरूरी है कि धम्म कारवां की दिशा क्या हो और उसमें हमारी भूमिका क्या हो?

बौद्धों का जीवन- बौद्धों को अपना जीवन और दैनिक क्रियाकलाप बौद्धधम्म की शिक्षाओं के अनुरूप जीना चाहिए. इसके लिए सबसे आवश्यक है कि देवी-देवताओं की पूजा का मोह त्यागना होगा. धम्म वंदना और दीक्षा प्रतिज्ञा गाथा के उस पालि सुत्त की बातें जीवन में उतारनी होगी जिसमें कहा गया है कि… ‘मैं भगवान बुद्ध के अलावा (बुद्ध मार्ग) अन्य किसी की भी शरण नहीं जाऊंगा. इस सत्य वचन से मेरा कल्याण हो. मैं धम्म के अलावा अन्य किसी की भी शरण नहीं जाऊंगा. धम्म ही मेरा श्रद्धा स्थान है, इस सत्य वचन से मेरा कल्याण हो. भिक्खु संघ के अलावा मैं अन्य किसी की भी शरण नहीं जाऊंगा; इस सत्य वचन से मेरा कल्याण हो.’

संस्कृति- बौद्धों को एक ऐसी संस्कृति का विकास करना चाहिए जिसमें प्रत्येक देशवासी को एक सम्मानित नागरिक माना जाए और प्रत्येक नागरिक की मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने का अवसर सुनिश्चित हो. देश में परस्पर भाईचारे के साथ प्रेम और सौहार्द की भावना हो. डॉ. आंबेडकर का कहना था कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उनमें सामाजिक-भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए… लेकिन इस भावना के विकास में जाति सबसे बड़ी बाधा है. डॉ आंबेडकर का निष्कर्ष था कि जाति की प्रकृति ही विखण्डन और विभाजन करना है. जाति का यह अभिशाप है. जाति भावनाओं से आर्थिक विकास रूकता है. इसलिए डॉ. अंबेडकर का लगातार यह प्रयत्न रहा कि भारत में एक ऐसी सांझी संस्कृति का निर्माण हो जिसमें जात-पात के आधार पर लोगों के साथ अन्याय और शोषण न हो और हर नागरिक अपनी क्षमताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सके. आपस में उपजातिवाद छोड़कर एक साझा पहचान जो बौद्ध पहचान है उसको अपनाना चाहिए और आपस में रोटी-बेटी का संबंध कायम करना चाहिए, जिससे कि राष्ट्रीय एकता के विकास में सहायता मिले. डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि समाज के सभी वर्गों में खान-पान का संबंध विकसित हो. जो लोग धम्म दीक्षा लेने के बाद भी जाति और उप-जाति बनाए रखना चाहते हैं या जाति-पात में विश्वास करते हैं वो बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि इससे बौद्ध धर्म में भी जाति का जहर फैल जाएगा.

विपस्सना- एक अन्य चर्चा विपस्सना को लेकर है. बहुत लोगों को यह गलतफहमी है कि विपस्सना लोगों को निष्क्रिय कर देती हैं, उनका क्रोध समाप्त हो जाता है जबकि दलित समाज को आंदोलित रखने के लिए क्रोध की आवश्यकता है और विपस्सना से समाज सेवा की भावना कम हो जाती है. इन सब मिथ्या प्रचार को हमें दूर करना होगा. गौतम बुद्ध ने छः वर्षों तक ध्यान साधना किया और विपस्सना का आविष्कार किया. विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व को प्राप्त किया. बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात 45 वर्षो तक शहरों, गांवों, कस्बों में जा-जाकर धम्म का प्रसार किया. यदि भगवान बुद्ध निष्क्रिय नहीं हुए तो फिर उनकी खोजी हुई विपस्सना करने से उनके अनुयायी कैसे निष्क्रिय हो सकते हैं?

भिक्खुओं द्वारा खुद पहल कर लोगों से नहीं मिलना भी एक समस्या है. बहुत से भिक्खु इस आशा में रहते हैं कि जब कोई बुद्ध विहार में आएगा तभी वो धम्म दीक्षा की बात करेंगे. इस बारे में भगवान बुद्ध का उदाहरण हमारे सामने है. भगवान बुद्ध बोधगया से चलकर सारनाथ आए थे और धम्मचक्र प्रवर्तन किया था. वह इस भरोसे में नहीं बैठे रहे कि लोग बोधगया आए और तब वो उनको धम्म सिखाएं. इसीलिए डॉं. आंबेडकर ने ‘इंगेज्ड बुद्धिज्म’ की परिकल्पना की थी. इस परिकल्पना को पूरी दुनिया में मान्यता मिली है. वियतनाम में भिक्खु संघ ने अमेरिका के आक्रमण के खिलाफ पूरी ताकत से विरोध किया और लोगों के बीच जाकर धर्म का प्रचार-प्रसार किया. ताईवान में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में वहां के भिक्खुनी संघ ने अहम भूमिका अदा की है. ताईवान में भिक्खुनी संघ स्कूल भी चलाता है, अस्पताल भी चलाता है और लोगों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं का निदान भी करता है. ताईवान के उदाहरण को भारत वर्ष में भी दोहराने की आवश्यकता है.

बौद्ध संस्कृति विकसित करना जरूरी – हर सिक्ख रविवार को अनिवार्य रूप से गुरूद्वारा जाता है, ईसाई चर्च जाते है. हर मुसलमान शुक्रवार की नमाज मस्जिद जाकर अता करता है. बौद्ध समाज के लोगों को भी ऐसी परंपरा डालनी होगी. प्रत्येक रविवार को अपने नजदीकी बौद्ध विहार में जाएं. जहां बौद्ध विहार नहीं है, वहां किसी के घर में और यदि वो भी संभव नहीं है तो किसी पार्क या सार्वजनिक स्थल पर कोई संगोष्ठी करें. ऐसी कोशिश भी की जा सकती है कि जीवन के उत्सव चाहे जन्मदिन का कार्यक्रम हो या सालगिरह, उसे बौद्ध विहार में मनाए. इसके साथ ही अपना जीवन पंचशीलों के अनुसार जीने की कोशिश करें. डॉ. आंबेडकर ने स्वयं बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने आवास को सजाना आरंभ किया और उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की. विवाह के लिए विवाह विधि का प्रतिपादन किया और बौद्ध चर्या पद्धति तैयार की. बौद्धों में शील और सदाचार का जीवन विकसित करने के लिए ‘बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना की जिसकी शाखाएं हर प्रदेश में स्थापित की गई. डॉ. आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1956 को सारनाथ के मृगदाय वन में 150 भिक्खुओं के समक्ष भाषण दिया था कि प्रत्येक बौद्ध के लिए अनिवार्य है कि वह हर रविवार को बौद्ध विहार में जाए और वहां उपदेश सुने. यदि ऐसा नहीं होगा तो नव दीक्षित बौद्ध को धम्म की जानकारी नहीं हो सकेगी. प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाए जिसमें सभा करने के लिए काफी स्थान रहे. बौद्ध विहारों को सभामंदिर होना चाहिए.

बाल साहित्य और बौद्ध साहित्य- सुरूचिपूर्ण बाल साहित्य और जनभाषा में बौद्ध साहित्य की भी काफी आवश्यकता है. इसके लिए आवश्यक है कि स्थानीय लोक भाषा में छोटी-छोटी पुस्तकें बड़े अक्षरों में छपवाई जाए और सस्ते दामों में लोगों को उपलब्ध कराई जाएं, क्योंकि साहित्य के बगैर धर्म का प्रचार-प्रसार कठिन होगा. जो भी बौद्ध साहित्य लिखा गया है, उसको और सरल और सुगम बनाकर कम से कम शब्दों में तैयार कर जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है जिससे कि किसान, मजदूर, गांव के लोग, कम पढ़े लिखे लोग, सभी लोग समझ सकें और उसको जीवन में उतार सकें. बुद्ध की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए शीलवान और पढ़े-लिखे भिक्खुओं की जरूरत है. इसके साथ ही, हमें एक समानांतर प्रचार व्यवस्था को विकसित करना होगा जिसमें नुक्कड़ नाटक, भजन मंडली, स्वांग मंडली, लोकगीत शामिल हैं जो लोगों तक आपकी बात पहुंचा सके.

पर्सनल लॉ की जरूरत- लगभग सभी अल्पसंख्यकों के अपने-अपने Personal Low हैं. ईसाईयों का Personal Low उनका बाईबिल है, मुसलमानों का Personal Low कुरान शरीफ द्वारा निर्धारित होता है. सिक्खों में आनंद कारज विवाह प्रथा को मान्यता प्राप्त है, लेकिन बौद्धों का अपना कोई Personal Low नहीं है. इसलिए जब तक सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता नहीं बन जाती, बौद्धों का भी अपना Personal Low होना चाहिए.

चारों महत्वपूर्ण अंगों को सामने आना होगा- बौद्ध धम्म के सामाजिक संगठन के चार महत्वपूर्ण अंग हैं. ये हैं भिक्षु संघ, भिक्षुणी संघ, उपासक संघ और उपासिका संघ. धम्म कारवां के आगे बढ़ने के लिए इन चारों संघों का शील-सदाचार पूर्ण जीवन जीना और सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप से मजबूत होना आवश्यक है. लेकिन ये एक बहुत बड़ी विडंबना है कि भारत में अकेले भिक्षु संघ काम कर रहा है. अभी तक न तो भिक्षुणी संघ बन पाया है, न ही उपासक संघ और न ही उपासिका संघ. इसलिए आवश्यक है कि बौद्ध अनुयायियों को इन संघों का निर्माण करना चाहिए और उनको मजबूत बनाया जाना चाहिए.

=======================धम्म कारवां का भविष्य==========================

धम्म के आम आदमी के जीवन में पड़ते प्रभाव और इसकी वैज्ञानिक जीवन पद्धति को देखकर यह कहा जा सकता है कि धम्म कारवां का भविष्य अत्यंत उज्जवल है. धम्म दीक्षा लेने वालों के जीवन में बहुत वापसी आया है और उनका चहुमुंखी विकास हुआ है.मशहूर समाजशास्त्री डी. एस. जनबन्धू और गौतम गावली द्वारा महाराष्ट्र में किए गए समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण के अनुसार जिन लोगों ने धम्म दीक्षा ली उनमें एक नई पहचान और आत्मसम्मान की भावना विकसित हुई, जिससे उनके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर में काफी सुधार आया. इन नवदीक्षित लोगों ने राष्ट्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसी प्रकार का एक शोध भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. संजय चहांडे ने किया और वो भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि धम्म दीक्षा लेने वालों का विकास धम्म दीक्षा न लेने वालों की तुलना में अधिक हुआ है. डॉ. संजय चहांडे ने इस विषय पर पीएचडी की है और वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद दलितों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में काफी अच्छे बदलाव आए हैं. उनका आत्मविश्वास बढ़ा है, जिसके कारण उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति की है.

एक सर्वे के अनुसार ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या सन् 1980 में 8 लाख थी जो 2001 में बढ़कर 55 लाख और 2006 में बढ़कर 80 लाख हो गई. इस तरह 26 सालों में ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या दस गुणा बढ़ी है. इसी अवधि में ताईवान में बुद्ध विहारों की संख्या 1157 से बढ़कर 4500 और बौद्ध भिक्षुओं की संख्या 3470 से बढ़कर 10 हजार पहुंच गई. ताईवान में भिक्षु और भिक्षुनियां अनेक प्रकार के समाजिक कार्य, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा जैसे व्यक्ति विकास के काम कर रहे हैं. इसी तरह चीन में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक हो गई है. थाईलैंड में 90 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या बौद्ध धर्म मानने वालों की है. यही स्थिति श्रीलंका, म्यामांर और भूटान जैसे देशों की है. भगवान बुद्ध के कारण एशिया के अधिकतर देश भारत को बहुत पवित्र मानते हैं और भारत की यात्रा करना अपना धर्म समझते हैं. जापान, कोरिया, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, श्रीलंका, ताईवान सहित अनेकों देशों के करोड़ों लोगों के मन में एक लालसा रहती है कि जीवन में कम से कम एक बार बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, संकिशा और सांची के दर्शन कर पाएं. इसलिए भारतवर्ष के लिए बुद्ध और उनकी शिक्षाओं द्वारा पूरे एशिया का अगुवा बनने का सुनहरा अवसर है.

==============================भ्रम फैलाने की कोशिश=========================

धम्म कारवां की लोकप्रियता से डरे कुछ लोगों और संगठनों द्वारा अनेकों दुष्प्रचार करने की घटना भी सामने आई हैं. इसमें एक दुष्प्रचार यह किया जा रहा है कि बौद्धधर्म केवल दलित अपना रहे हैं. जबकि हकीकत इससे अलग है. भगवान बुद्ध दलित नहीं थे. उनके प्रथम पांचों शिष्य ब्राह्मण थे. उसके बाद यश और उसके 54 साथी व्यापारी वर्ग से थे. उसके बाद धम्मदीक्षा लेने वाले उरूवेला कश्यप, नदी कश्यप, गया कश्यप और उनके 1000 शिष्य सभी ब्राह्मण थे. राजा बिबिंसार और राजा प्रसेनजित तथा शाक्य संघ के लोग सभी के सभी क्षत्रिय थे. वर्तमान समय में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मानंद कौशाम्बी, डी डी कौशाम्बी पूर्व में ब्राह्मण थे. इसी तरह भदन्त आनंद कौशलायन, आचार्य सत्यनारायण गोयनका, भन्तेसुरई सशई, अमेरिका के मशहूर फिल्म अभिनेता रिचर्ड गेरे, फिल्म प्रोड्यूसर टीना टर्नर कोई भी दलित वर्ग से नहीं है. इसलिए बौद्ध धर्म के विरोधियों के इस मिथ्या प्रचार को कि बौद्ध धर्म दलितो का धर्म होता जा रहा रोका जाना चाहिए.

इसी तरह एक प्रचार और किया जा रहा है कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. ऐसा प्रचार पहले भी होता रहा है. बुद्ध को अवतार मानने की बात सबसे पहले संभवतः छठी सदी के दौरान मत्स्यपुराण में की गई, मत्स्य पुराण का एक चरण 700 ईसवीं में महाबलीपुरम में, जहां मध्यकालीन ब्राह्मण पुस्तकों में 10 अवतारों की संकल्पना की गई है, पल्लव स्मारकों में उत्कीर्ण हैं. इस बिषय में नॉरमन कौसिन्स लिखते हैं कि बौद्ध धर्म का निर्माण होने पर हिन्दू धर्म ने उसके साथ होड़ नहीं लगाई, बल्कि उसे सोख लिया. बुद्ध को अवतार के रूप में शामिल करने का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धम्म को अवशोषित (सोख) कर उसका ब्राह्मणीकरण करना था, जिसे ब्राह्मण विरोध करके भी दबा नहीं पाए. इस प्रक्रिया में उन्होंने पशु-हिंसा छोड़कर, शाकाहार के आदर्श को अपना लिया. इस प्रक्रिया की अत्यंत चतुर चाल यह थी कि भगवान बुद्ध को वैदिक साहित्य में विष्णु के नवें अवतार के रूप में जबरन शामिल करना. निश्चित ही इस परिकल्पना ने बौद्ध धम्म की जड़ों को आघात पहुंचाया. बुद्ध को अवतार के रूप में स्थापित करने का काम एक राजनैतिक चाल के तहत किया गया. यह इस बात से स्वयं प्रमाणित हो जाता है कि हिन्दू साहित्य में बुद्ध को स्थान देने के बावजूद पुराणों और अन्य हिन्दू धर्म ग्रंथों में निरंतर बुद्ध और बौद्ध धम्म के प्रति एक विरोधात्मक एवं विद्रोहात्मक स्वर देखने को मिलता है.

ऐसे प्रचार को ध्यान में रखकर ही डॉ. आंबेडकर ने प्रतिज्ञा संख्या 5 में लिखा है कि भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार बताना धोखा और झूठ प्रचार है. डॉ. आंबेडकर के अनुसार बौद्ध अनुयायी इस सिद्धांत को सिरे से नकारते हैं कि बुद्ध विष्णु के एक अवतार थे. भगवान बुद्ध ने स्वयं ही अवतार के सिद्धांत को नकारा था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद उन्होंने यह उल्हास भरी घोषणा की थी-

‘अयं अन्तिमा जाति’ (अर्थातः यह मेरा अंतिम जन्म है),

‘नत्थिदानि पुनब्भवोति’ (अर्थात अब मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा)

डॉ. एम. एल. जोशी ने कहा है कि बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में प्रचारित करने का सटीक कारण यह है कि बुद्ध का व्यक्तित्व इतना महान था कि उसे नजरअंदाज करना किसी भी सूरत में संभव नहीं था. डॉ. जोशी के मुताबिक, ‘बुद्ध की भारतीय जनमानस में इतनी गहरी पैठ है कि पूरे देश में असंख्य विहारों के हजारों स्तंभों, दीवारों और दरवाजों पर उत्कीर्ण की गई. उनकी शिक्षाएं लगभग न समाप्त होने वाले पालि और संस्कृत साहित्य के अकूत खजाने के माध्यम से फैलाकर लोकप्रिय की गईं. अनेकों राजाओं और महान चिंतकों ने उनके युक्तिवादी व मानवतावादी मिशन को अत्यधिक ससम्मान से अपनाया. असंख्य भारतीय सदियों से उनकी प्रशंसा का गुणगान करते आ रहे हैं. वह सचमुच इतने महान थे जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी. स्वाभाविक रूप से वे उच्च स्थान प्राप्त सदस्य के रूप में अवतारों के तारामंडल में आ गए.’ बुद्ध को अवतारों की श्रेणी में रखने की दुर्भावनापूर्ण सोच इस बात से भी स्पष्ट होती है कि पौराणिक लोगों ने उनके सम्मान में किसी मंदिर का निर्माण नहीं कराया, इसलिए तार्किक दृष्टि से बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने का सिद्धांत दुर्भावनापूर्ण है. अगर बुद्ध को श्रद्धावश विष्णु का अवतार माना गया होता तो यह कैसे संभव है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और बंगाल से लेकर गुजरात तक हजारों हिन्दू मंदिरों में किसी में भी भगवान बुद्ध की मूर्ति नहीं होती? एक और तथ्य जानने योग्य है. बुद्ध का अर्थ ही होता है कि जन्म-मरण के संसार चक्र से पूरी तरह मुक्त हो जाना. अगर कोई दुबारा जन्म लेता है, तो फिर बुद्ध कैसे हुआ? इसलिए बुद्ध को अवतार बताना उनके बुद्धत्व को नकारना है. 19 नबवंर, 1999 को सारनाथ में विपस्सना के प्रधानाचार्य सत्यनारायण गोयन्का और कांचीकामकोटि पीठम के तत्कालीन शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने संयुक्त रूप से प्रेस विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की थी कि बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं थे.

एक टी. वी धारावाहिक में यह दिखाया गया है कि सिद्धार्थ गौतम का जन्म पुत्र कामेष्टि यज्ञ कराने के बाद हुआ था. बौद्ध विद्वानों का कहना है कि पूरे पालि साहित्य और बौद्धों के पवित्र ग्रंथ त्रिपिटकों में कहीं ऐसा उल्लेख नहीं है. इसलिए बौद्ध अनुयायियों को इस प्रकार के प्रचार से प्रभावित नहीं होना चाहिए. बुद्ध और बौद्ध धर्म से द्वेष रखने वाले कुछ लोग यह भी प्रचार करते हैं कि बौद्धों में कई पंथ है जैसे कि हीनयान, महायान और तंत्रयान. यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भगवान बुद्ध द्वारा उपदेशित मूल सिद्धांत में कोई मतभेद नहीं है. सभी बौद्ध गौतम बुद्ध को अपना शास्ता मानते हैं, सभी बौद्ध चार आर्य सत्य मानते हैं. सभी बौद्ध आर्य आष्टांगिक मार्ग मानते हैं. बौद्ध धर्म का सार शील, समाधि और प्रज्ञा है. जो अंतर है वो केवल बाहरी कपड़ों और पूजा विधि को लेकर है. इसलिए ऐसे दुष्प्रचार से बचने की आवश्यकता है.

डॉ. आंबेडकर सिर्फ नाममात्र का धर्मांतरण नहीं चाहते थे, बल्कि वे लोगों की सोच और जीवन में एक आमूलचुल वापसी लाना चाहते थे. अब यह बौद्ध अनुयायियों पर निर्भर करता है कि वो धम्म कारवां को कहां ले जाना चाहते हैं. भिक्षु संघ इस बात को लेकर बेहद सजग है. यही कारण है कि भारतीय बौद्ध अब अपनी विशेष पहचान और अलग संस्कृति का विकास करने में जुटे हैं. 22 जुलाई, 2013 को सारनाथ में भन्ते पी. सिवली महाथेरा की अध्यक्षता में धम्मचक्र प्रवर्तन महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्षुओं और उपासक-उपासिका शामिल हुए. इस मौके पर भारतीय चीवर पेश किया गया. अभी तक भारतीय चीवर नहीं था और इसका आयात श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड से किया जाता था. लेकिन अब भारतीय चीवर बनने के बाद चीवर की उपलब्धता आसान हो जाएगी. धम्म दीक्षा के समय डॉ. आंबेडकर ने कहा था ‘मैं आपलोगों के कंधे पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी डाल रहा हूं. आप ऐसा जीवन जीएं जिससे आप सम्मान के पात्र बन सकें. ऐसा मत सोचें कि यह धम्म आपके गले में जंजीर की तरह बांध दिया गया है. जहां तक बुद्ध धम्म का सवाल है, अपना देश तो इसमें रेगिस्तान हो चुका है. अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इस धम्म को उत्साह और पूरी ईमानदारी से निबाहें और ध्यान रखें कि किसी समय यह धम्म कितना वैभवशाली था. यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो लोग इस धर्मांतरण पर हंसेंगे. यह धर्म न केवल इस देश की अपितु दुनिया की सेवा कर सकता है. वैश्विक गतिविधियों के इन क्षणों में दुनिया में शांति के लिए बुद्ध धम्म अपरिहार्य है. धर्म वापसी के बाद मुझे उस असीम संतुष्टि और खुशी का अनुभव हो रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. मुझे लगता है कि जैसे मुझे एक नरक से छुटकारा मिल गया है. जो कार्य हमने अपने हाथ में लिया है, वह बहुत बड़ी जिम्मेदारी का है. आप निज केंद्रित न हों. अपने विचारों से स्वार्थी न बनें. आप लोग संकल्प लें कि अपनी आय का 1/2 भाग धम्म के प्रसार में खर्च करेंगे. बुद्ध ने अपने धम्म के प्रसार के लिए उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से सबसे उपयुक्त तरीका चुना. उसी तरह से हमें भी वर्तमान परिस्थितियों में सबसे उपयुक्त तरीका चुनना होगा. बौद्धों को कोशिश करनी चाहिए कि जहां-जहां भी बौद्ध विहार हैं, उनके सामने बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगाई जाए जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं को जैसे कि चार आर्य सत्य, आर्य आष्टांगिक मार्ग, पंचशील, बुद्ध से संबंधित धर्म स्थल, बौद्ध के त्योहार इत्यादि को मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जाए जिससे कि आम जनता और कम पढ़े-लिखे लोग भी इसको समझ सकें. जहां-जहां भी संभव हो, बौद्ध विहारों का निर्माण कराया जाए और उसमें गांव और कस्बों के सभी लोगों को शामिल किया जाए क्योंकि बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत सिर्फ दलितों को ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर उस व्यक्ति को है, जो अपना कल्याण चाहते हैं और जो दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.

बौद्ध अनुयायी यदि डॉ. आंबेडकर के सुझावों पर चलते रहेंगे तो धम्म कारवां का भविष्य उज्जवल ही रहेगा और धम्म कारवां इसी तरह बढ़ता जाएगा. वैसे भी भूमंडलीकरण के कारण लोगों में आर्थिक समृद्धि आने के साथ मानसिक तनाव बढ़ेगा और दुनिया में अशांति भी बढ़ेगी. इन सबसे निपटने में बुद्ध की शील-समाधि और प्रज्ञा पर आधारित शिक्षाएं बहुत काम आएगी क्योंकि दुनिया को ‘युद्ध’ की नहीं ‘बुद्ध’ की आवश्यकता है.

आनंद श्रीकृष्णलेखक आनंद श्रीकृष्ण एक बौद्ध विचारक, साहित्यकार और सामाजिक चिंतक हैं. उनसे संपर्क उनकी
emali id- anand622009@hotmail.com पर किया जा सकता है।

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http://www.dalitmat.com/index.php?option=com_content&view=article&id=1311:budhhism-after-1956&catid=122:mudda-aalesh12&Itemid=632