महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं….लाला बौद्ध (बुद्ध शिक्षाएं धर्म के रूप में बहुजनों का भला नहीं कर पाएंगी अगर इससे अपना भला चाहते हो तो अम्बेडकरवादी धम्म के रूप में ही स्वीकारों क्योंकि भारत में बौद्ध धर्म को मार डाला गया है| बौद्ध बनने के मार्ग में धम्म और धर्म में फर्क समझना सबसे पहला पाठ है)


महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं.   (भाग-एक)mayayaan vs heenyaan

महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं है. महायान बौद्ध धर्म के साथ विश्वासघात है. महायान ने बौद्ध धर्म को दरकिनार किया. महायान ने बौद्ध धर्म को प्रदूषित किया. महायान ने कालांतर में ब्राह्मण धर्म के साथ तालमेल बैठाया. महायान ने बुद्ध को ईश्वर बनाकर पेश किया. महायान ने बुद्ध की पूजा शुरू करवायी. महायान ने बुद्ध की मूर्ति की पूजा प्रारंभ की. बुद्ध को गुण-प्रदाता के रूप में पूजा जाने लगा. बुद्ध से मन्नतें मांगी जाने लगीं. महायान ने मानव बुद्ध को हिन्दू देवता बना दिया. महायान ने बुद्ध के ऐतिहासिक महत्व को धोकर उन्हें दैवीय और अलौकिक बना दिया. महायान बौद्ध धर्म की शाखा है ये सत्य नहीं है बल्कि महायान हिन्दू धर्म का एक पंथ है. महायान वैदिक धर्म का एक पंथ है. वी.डी.सावरकर तथा दलाई लामा बुद्ध-धम्म को हिन्दू धर्म की शाखा मानते हैं, जबकि बुद्ध-धम्म हिन्दू धर्म की शाखा नहीं है, ये शाखा महायान है. येसा होने से बड़ा भ्रम पैदा हुआ है. आदि-बुद्ध, मूल बुद्ध थेरवादी, श्रावकवादी बुद्ध कहे जाने लगे.
मूल बुद्ध-धम्म का हत्यारा, महायान, कहाँ से आया? महायान की पृष्ठभूमि क्या है? महायान उत्तरोत्तर शक्तिशाली कैसे हुआ? आइये इस विषय पर मनन करें.
बुद्ध इस धरती पर अस्सी साल रहे. बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में तथा महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. में हुआ था. उन्होंने स्वयं अपने धम्म का 45 साल तक प्रचार-प्रसार किया. करीब आधी शताब्दी, उन्होंने भ्रमण कर-कर के लोगों को अपने धम्म की रौशनी दी. बुद्ध धम्म के कारण अंध-विश्वास, असमानता, अज्ञान, हीनता कई शताब्दियों तक यहाँ से दूर रहे. बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म में कभी विश्वास नहीं किया. लेकिन उन्होंने समाज को योजनाबद्ध तरीके से समझाया कि दुःख से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है. उन्होंने लोगों को संगठित किया, जो छिन्न-भिन्न पड़े हुए थे. बुद्ध ने वैज्ञानिक, आधिकारिक, वास्तविक और तार्किक ढंग से लोगों को समझाया कि वे कैसे दुःख से मुक्ति पाकर प्रसन्न और शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं. इसके लिए उन्होंने कभी स्वयं को मोक्षदाता, पैगम्बर, ईश्वर या देवता नहीं कहा. उन्होंने कभी निरर्थक प्रदर्शन या विज्ञापन नहीं किया.
बुद्ध ने इस बात पर जोर दिया कि किस तरह मानव दुःख के खतरों से दूर रह सकता है. उन्होंने हमेशा मनुष्य की तरह शिक्षा दी, और दुखों को दूर करने के लिए मानवीय तरीकों को इस्तेमाल किया. उन्होंने दुःख को समूल नष्ट करने का मार्ग बताया. समझदार, बुद्धिमान, तर्कशील व्यक्ति की तरह उन्होंने बताया कि धम्म के मार्ग पर चलकर आदमी कैसे तेजस्वी और भद्रपुरुष बन सकता है. विशुद्ध दार्शनिक की तरह सत्य के मार्ग पर उनका प्रवचन, उनका आत्मविश्वास इतना परम था कि लोग उनके बताये धम्म को मानने और धम्म-मार्ग पर चलने के लिए विवश हो जाते थे. सत्य स्वयं शक्तिवान होता है, इसको किसी पैगम्बर, ईश्वर या किसी देवदूत की आवश्यकता नहीं होती. सत्य को किसी ईश्वर या पैगम्बर की सिफारिश की जरूरत नहीं होती. सत्य अपने पैरों पर स्वयं चलता है. सत्य को किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती. बुद्ध ने लोगों को उनके जीवन में आने वाले दुखों को दूर करने के उपाय बताये. उनके प्रवचनों में कोई अलौकिक या गूढ़ता नहीं थी, बुद्ध ने जीवन की वास्तविक कठिनाइयों और उनके समाधान को बड़े पारदर्शी और भरोसेमंद तरीके से रखा. उन्होंने “जन-कल्याण” तथा “अत्त दीप भव” पर लोगों को व्यवहारिक ज्ञान दिया.
बुद्ध की बताई बातें लोग पूरी तरह समझते थे. बहुत लोगों ने वर्णभेद के कारण उत्पन्न अपनी जिन्दगी के तमाम दुखों से छुटकारा पा लिया था. बुद्ध की वजह से उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का मौक़ा मिला था. लोग वैदिक धर्म के वर्णाश्रम के विपरीत बग़ावत पर उतर आये. लोगों ने महसूस किया कि बुद्ध के कारण मिले, इस स्वतंत्र वातावरण में उनके काम करने के हुनर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. बुद्ध के कारण लोगों में आत्म-स्वाभिमान बढ़ा. बहुत से लोगों ने वैदिक धर्म द्वारा बताये अपने परम्परागत कार्य को छोड़ दिया. बहुत से लोगों की जिन्दागी उनके सतत और कठोर उद्यम / चेष्टा से प्रकाशित हो उठी. बहुत से लोगों ने जाति के बोझ को उतार फेंका. एक नृत्यांगना “शीलवती” का पुत्र “जीवक” प्रसिद्ध और निपुण वैद्य बन गया, स्वच्छक सुनीत, उपाली नाई, अछूत सोपक और सुप्रिया, निम्नजाति सुमंगल, कुष्ठ-रोग प्रभावित सुप्रबुब्भा तथा और भी बहुत से लोगों ने धम्म अंगीकार कर लिया. बुद्ध ने डाकू अंगुलिमाल, बहुत से अनाथ और अवर्ण लोगों को धम्म-दीक्षित किया. इन सभी का जीवन बुद्ध के कारण प्रकाशित हो उठा.
ये वैदिक धर्म की मान्यताओं के विरुद्ध न्याय, सत्य, मानवता का धम्म-युद्ध था. धम्म के फैलने से असमानता को अपना आदर्श मानने वाले वैदिक लोग छिन्न-भिन्न होने लगे. इन लोगों ने अपने परम्परागत वैदिक जीवनशैली को नहीं छोड़ा. इन लोगों को ये महसूस हुआ कि बुद्ध और धम्म उनके लिए खतरनाक हैं. फलस्वरूप बुद्ध के जीवनकाल में ही उनके कई शत्रु बन गए. छंदा तथा उपनंदा बुद्ध के प्रति सदा शत्रुतापूर्ण रहे. देवदत्त बुद्ध की ख्याति को देखकर बुद्ध के प्रति और अधिक ईर्ष्यालु हो गया. बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु की मदद से देवदत्त ने बुद्ध को मरवाने के कई असफल प्रयास किये. लेकिन देवदत्त भिक्खु संघ को विभाजित करने में सफल हुआ. बुद्ध ने लोगों को नैतिक मूल्यों पर चलने के लिए हमेशा जोर दिया. नैतिक मूल्यों पर चलना कई लोगों को कठिन लगा. नैतिक मूल्यों पर चलना कई लोगों को सजा की तरह लगा. कई लोगों को नैतिक मूल्यों पर चलना अपनी आज़ादी में बाधक लगा. ईश्वर और आत्मा में विश्वास न करने की वजह से कुछ लोगों को धम्म रास नहीं आया. सुभद्र उनमें से एक था जिसे बुद्ध की मृत्यु से प्रसन्नता मिली.

अब वे लोग संगठित होने लगे, जिन्हें धम्म पसंद नहीं आया था. उन्होंने मूल धम्म त्यागकर “महासांघिक पंथ” बना लिया. “महासांघिक पंथ” को “महायान पंथ” में बदल दिया गया. ये कार्य बुद्ध के महापरिनिर्वाण के करीब 100 वर्ष बाद इन लोगों द्वारा वैशाली में आयोजित दूसरे बौद्ध अधिवेशन में किया गया. महायान उन लोगों ने पैदा किया जिन्हें बौद्ध धम्म रास नहीं आया. महायानियों द्वारा बुद्ध के मूल मिशन को एक तरफ रख दिया गया. महायानियों ने त्रिपिटक की पाली की मूल इबारत को संस्कृत में अनुवादित करके आम लोगों को अपठनीय बना दिया. इस तरह धीरे-धीरे पाली साहित्य नष्ट करके इन लोगों ने पाली भाषा को निर्बल बनाकर धम्म को विकृत किया.
बुद्ध ने लोगों को बताया कि वे इंसान हैं अतः उन्हें ईश्वर, पैगम्बर या देवदूत न मानें. लेकिन महायानियों ने उन्हें भगवान बना दिया. महायानियों ने बुद्ध को नास्तिक बुद्ध से आस्तिक बुद्ध बना दिया. बुद्ध पूजा और उपासना के विरुद्ध थे, लेकिन महायानियों ने उनकी पूजा उपासना प्रारंभ कर दी. दूसरी शताब्दी में एक ब्राह्मण नागार्जुन ने महायान अपनाया और बुद्ध का एक विशाल स्मारक बनवाया. तीसरी शताब्दी में पेशावर के एक ब्राह्मण पुत्र असंग ने महायान अपनाया और महायान को योगविद्या से जोड़ दिया. महायान का जन्म हालाँकि आन्ध्र प्रदेश में हुआ लेकिन वह शीघ्र ही पंजाब, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, तिब्बत, चीन, कोरिया, जापान, सिक्किम, भूटान, ताइवान, नेपाल में फैल गया, जहाँ मूर्तिपूजा, ध्यान, तंत्र साधना महायान का हिस्सा बन गए. शून्यवाद जो बाद में हिन्दुवाद का अद्वैतवाद बना, (ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, नागार्जुन की देन है. महायानियों ने न सिर्फ बुद्ध को ईश्वर माना बल्कि हिन्दुओं के ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कार्तिके, चामुंडा, गणपति, महाकाल आदि देवों की पूजा भी जारी रखी. महायानियों ने हिन्दुओं के नौग्रह, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर आदि की पूजा भी शुरू कर दी. इस तरह महायान को दैविक और चमत्कारिक विश्वासों में फंसा दिया गया.

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद जातक कथाएं लिखी गयीं. यह कहानियाँ बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियां हैं. बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों की सारी कहानियाँ बता रहे हैं. उन्हीं का संकलन जातक-कथायें कहा जाता है. जातक कथा के अंतर्गत राजा दशरथ, राम, सीता, युधिष्ठिर, विदुर, कृष्ण आदि पात्र रामायण और महाभारत के भी हैं. जातक कथा ईसवी दूसरी शताब्दी में लिखी गयीं थीं. बुद्ध के मूल अऩीश्वरवाद, अनात्मावाद को महासांघिकों और महायानियों द्वारा निकाल दिया गया. बोधिसत्व की अवधारणा महायान पंथ से आयी और जातक कथायें केवल बोधिसत्व की हैं. जातक कथायें बुद्ध के मूल शिक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं. बुद्ध आत्मा में विश्वास नहीं करते थे. तो फिर वे क्यों पुनर्जन्म में विश्वास करने लगे? और जातक कथायें हिंदू धर्म के पुनर्जन्म के सिद्धांत को प्रतिस्थापित करती हैं. बुद्ध से पहले ब्राह्मण धर्म का काफी प्रभाव था. इसी प्रभाव को पूर्णतः खत्म किया जाना ही बुद्ध धम्म क्रांति का आदर्श वाक्य था. ऊंची जाति के लोग जिन्होंने बौद्ध धर्म को गले लगा लिया था, वे बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध की मूल शिक्षाओं पर नहीं चल सके. नतीजन उन्होंने जातक कथायें बनायीं. वृक्ष, देवता, यक्ष, भगवान की पूजा को अधिक महत्व और दर्जा मिला. अवदंशातक और दिव्यावदान पुस्तकों में बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियाँ हैं. ललितवित्सर, जातक कथा, बुद्धचरित और सद्धम्मापुन्डारिक महायान के ग्रंथ हैं.
में सुमेध ब्राह्मण को स्वयं बुद्ध बताया गया. मोक्ष प्राप्ति के लिये वह तपस्या करने हिमालय गया. हवा में उड़ते समय, वह अमरावती कस्बा पहुंचा जहां उसे दीपांकर बुद्ध के दर्शन हुये. दीपांकर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और इस आशीर्वाद से सुमेध ब्राह्मण बोधिसत्व हुआ. कई जन्मों के बाद उन्हें अततः महामाया और शुद्धोधन के माध्यम से जन्म लेने का अवसर मिला. वह गौतम बुद्ध हैं. कुछ कहानी ये शो करने के लिये पैदा की गयीं कि प्रसिद्ध व्यक्ति सिर्फ ब्राह्मण समुदाय से ही पैदा हो सकते हैं. (ब्राह्मण समुदाय द्वारा ये फूहड़ प्रयास भी किया गया कि डी. के. कुलकर्णी शिवाजी के जैविक पिता थे) ब्राह्मणों ने शिवाजी को ब्राह्मण बनाना चाहा था, लेकिन शिवाजी के अनुयाइयों की सतर्कता से वे येसा न कर सके. इसी तरह प्राचीन काल में महायान पंथियों ने बुद्ध को भी ब्राह्मण बना दिया और ब्राह्मणों को सर्वोच्च बताया. उस समय कोई विरोध न कर सका क्योंकि शिक्षा के सारे अधिकार ब्राह्मणों के पास थे, अतः इस षड्यंत्र का किसी को पता नहीं चला.

जातक कथाओं के सभी प्रमेय बुद्ध के मूल उपदेशों से भिन्न हैं. जातक कथायें विज्ञान विरोधी और बुद्ध विरोधी हैं. जातक कथाओं को ब्राह्मण धर्म के प्रभाव और मूल्यों को पुनःस्थापित करने के लिये लिखा गया है. जातक कथाओं की उत्पत्ति महासांघिक लोगों द्वारा की गयी. जातक कथाओं को तब तक लिखा जाता रहा जब तक महासांघिक शक्तिशाली नहीं हो गये. महासांघिकों ने बुद्ध के मूल नास्तिक और अनीश्वरवादी सिद्धान्त के विनाश की आवश्यकता को समझा. बुद्ध के मूल शिष्य संसार को हकीकत समझ रहे थे. जबकि महायानियों ने संसार के अस्तित्व को नकार दिया. उन्होंने कहा आध्यात्मिक ज्ञान के हिसाब से विश्व और उसके सारे भौतिक पदार्थ अस्तित्वहीन हैं, ये संसार वृहद् शून्य है. संसार काल्पनिक और व्यर्थ है. महायान पंथ ने एक जातक कथा में ये दर्शाया है कि ब्राह्मण कैसे बौद्धों से उच्च हैं.

एक जातक कथा में सुमेध ब्राह्मण को स्वयं बुद्ध बताया गया. मोक्ष प्राप्ति के लिये वह तपस्या करने हिमालय गया. हवा में उड़ते समय, वह अमरावती कस्बा पहुंचा जहां उसे दीपांकर बुद्ध के दर्शन हुये. दीपांकर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और इस आशीर्वाद से सुमेध ब्राह्मण बोधिसत्व हुआ. कई जन्मों के बाद उन्हें अततः महामाया और शुद्धोधन के माध्यम से जन्म लेने का अवसर मिला. वह गौतम बुद्ध हैं. कुछ कहानी ये शो करने के लिये पैदा की गयीं कि प्रसिद्ध व्यक्ति सिर्फ ब्राह्मण समुदाय से ही पैदा हो सकते हैं. (ब्राह्मण समुदाय द्वारा ये फूहड़ प्रयास भी किया गया कि डी. के. कुलकर्णी शिवाजी के जैविक पिता थे) ब्राह्मणों ने शिवाजी को ब्राह्मण बनाना चाहा था, लेकिन शिवाजी के अनुयाइयों की सतर्कता से वे येसा न कर सके. इसी तरह प्राचीन काल में महायान पंथियों ने बुद्ध को भी ब्राह्मण बना दिया और ब्राह्मणों को सर्वोच्च बताया. उस समय कोई विरोध न कर सका क्योंकि शिक्षा के सारे अधिकार ब्राह्मणों के पास थे, अतः इस षड्यंत्र का किसी को पता नहीं चला

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https://samaybuddha.wordpress.com/2013/08/08/mahayaan-vs-heenyaan/

बुद्ध शिक्षाएं धर्म के रूप में बहुजनों का भला नहीं कर पाएंगी अगर इससे अपना भला चाहते हो तो अम्बेडकरवादी धम्म के रूप में ही स्वीकारों क्योंकि भारत में बौद्ध धर्म को मार डाला गया है| बौद्ध बनने के मार्ग में धम्म और धर्म में फर्क समझना सबसे पहला पाठ है

One thought on “महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं….लाला बौद्ध (बुद्ध शिक्षाएं धर्म के रूप में बहुजनों का भला नहीं कर पाएंगी अगर इससे अपना भला चाहते हो तो अम्बेडकरवादी धम्म के रूप में ही स्वीकारों क्योंकि भारत में बौद्ध धर्म को मार डाला गया है| बौद्ध बनने के मार्ग में धम्म और धर्म में फर्क समझना सबसे पहला पाठ है)

  1. || नमो बुद्धाय || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब धम्मानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब संघानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते || जम्मुद्वीप (प्राचीन भारत ) की सबसे पुरातन सभ्यता अभी तक जो खोजी गयी है वह सिन्धु घाटी की सभ्यता है | सिन्धु घाटी सभ्यता में बहुत सारी सामग्री प्राप्त हुई है जैसे की मिट्टीके बर्तन , पीपल के पत्ते की चित्रकारी , हाथी ,सांड, टाइगर ,गैंडा आदि पशुओं की seals प्राप्त हुई हैं | एक चित्रकारी में योगिक मुद्रा में एक पुरुष बैठा है उसके चारो ओर ये चार पशु दिखाए गए हैं , उस समय की सभ्यता में जो पुरुष दिखाया गया है वो कोई शिव की मूर्ती नहीं है बल्कि बुद्ध की मूर्ती है , अब आप कहेंगे कि गोतम बुद्ध तो सिन्धु सभ्यता के भी २००० से २५०० वर्ष हुए तो कैसे ये बुद्ध हैं |तो पढ़िए बुद्ध वचन सुत्त पीटक का एक ग्रन्थ दीघनिकाय उसमें भगवान् गोतम बुद्ध ने साफ़-२ कहा है कि मुझसे पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं जिनमें ६ बुद्धों की जीवनी तो स्वयं गोतम बुद्ध ने बतायी है , पढ़ें महापदान सुत्त हिंदी एडिशन २०१० पेज १७६ – २२ वें बुद्ध विपस्सी ,२३ वें सिखी..,वेस्सभू ,ककुसंध ,कोणागमन ,कस्सप ,एवं २८ वाँ मैं स्वयं गोतम बुद्ध | इसमें ९१ कल्प पूर्व विपस्सी बुद्ध हुए थे ऐसा भगवान् ने बताया है | और सिन्धु सभ्यता में सतिया की दो सील हैं १-जो आज प्रचलित है और २ सरी उसकी उल्टी जैसी की जर्मनी के फ्लैग पर है | सतिया शब्द पुरातन प्राकृत भाषा का है जिसे बाद में भगवान् के मुख से सुव्यवस्थित रूप में सुत्तों के रूप में जब कहा गया तो प्राकृत भाषा को पालि कहा गया क्योंकि पालि का अर्थ ही होता है सूत्र | इसी सभ्यता में एक मूर्ती में एक स्त्री ने एक हाथ में चूड़ियाँ ऊपर तक पहनी हैं और एक हाथ में केवल दो , जो कि आज भी निम्न वर्ग की स्त्रियाँ राजस्थान में ऐसे ही चूड़ियाँ पहनती हैं जबकि उच्च जातियों की स्त्रियाँ दोनों हाथों में केवल दो-२ या अधिक पर कोहनी के नीचे तक ही पहनती हैं | इससे भी पता चलता है कि ब्राह्मण लोग सिन्धु सभ्यता को नष्ट करके प्राचीन भारत में आये थे और वे इतने असभ्य थे कि उन्हें ठीक से साज श्रृंगार भी नहीं आता था , जब वे इस देश में वास करने लगे तो हमारी सभ्यता का तो असर आना स्वाभाविक था उनमें भी | वो लोग अग्निपूजक थे और हम सम्मा दृष्टि वाले थे तो अंगारी पर पानी डालकर पूजा करते थे ना कि हवन , जो आज भी हमारे देश में गाम -२ में प्रचलित है | तो भगवान् बुद्ध की ये बात कितनी सटीक है कि उनके पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं | अब बात आती है कि बुद्ध नास्तिक हैं , या अनीश्वरवादी :- तो देखिये पहले आप जानिये कि बुद्ध ना तो नास्तिक्वादी हैं ना ही अनीश्वरवादी बुद्ध हैं अनात्मवादी और विभाज्यवादी वे कहते हैं कि इस संसार(universe) में ३१ आयतन हैं और इन ३१ आयतनों में ३१ वाँ आयतन “न संज्ञा न असंज्ञा आयतन ” कहा जाता है जो materialistic नहीं है यही निराकार अनंत आयतन की लास्ट अवस्था है | भगवान् इससे आगे की अवस्था निब्बान की शिक्षा भी देते हैं जिसे प्राप्त कर योगी अर्हत बन जाता है , फिर उसका कभी जन्म नहीं होता है – सभी दुखों से मुक्त अवस्था है यह | बुद्ध ने कहा पौस्करसाती ब्राह्मण से कि तु क्या जानना चाहता है तो उसने कहा भगवान् मुझे तो आप बस ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये क्योंकि वह हमें पसंद भी है और पैतृक भी , तो भगवान् ने कहा कि पौस्करसाती क्या तूने कभी ब्रह्मा को देखा है या तेरे पुराने किसी ऋषि जैसे अष्टक , वामक, वामदेव , अंगिरा, भरद्वाज, वशिष्ठ , विश्वामित्र आदि ने देखने का वर्णन किया हो | पौस्करसाती कहता है कि नहीं — तो गोतम कहते हैं कि पौस्करसाती मैंने ब्रह्मा को अपनी आंख से देखा है और उस तक पहुँचने का म,आर्ग भी मैं जनता हूँ पर मैं उससे भी ऊपर के लोकों को भी जनता हूँ , पौस्करसाती कहता है बस आप मुझे ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये | तो सुन कह भगवान् कहते हैं कि ब्रह्म लोक को पहुंचाने वाले ४ मार्ग हैं (१) मैत्री (२) करुणा(३) मुदिता(४) उपेक्खा | जब कोई मानुष या देव इन चार मार्गों को सिद्ध कर लेता है तो वह मृत्यु हो ब्रह्म लोक में उत्पन्न होता है ऐसा कहा भगवान् ने | अब जानिये भगवान् कैसे अनात्म वादी और विभज्यवादी हैं — भगवान् कहते हैं यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है (१) अग्नि(२) वायु(३) आपो(४)पृथ्वी(५) आकास (६) विज्ञान (=sense=consciousness) , हे भिक्खुओं मैं इस संसार में इनके अतिरिक्त अन्य कोई धातु नहीं देखता | ref. अंगुत्तर निकाय | ये सारे के सारे धर्म (=धातु) अनित्य हैं (=unstable i.e. they change always there is no stay for a little bit time ) सभी रूप चाहे अदृश्य या दृश्य हों एक fundamental unit = अट्टकलाप से निर्मित हैं इसे ही अभिधम्म में आठ विनिब्भोग रूप कहा गया है | भगवान् जीवित प्राणी को नामरूप कहते हैं , रूप=अग्नि+वायु+जल+पृथ्वी का संयोग है आकाश धातु में और नाम कहा क्योंकि अनात्म वादी हैं i.e. नाम=not+self=वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान | और ये आठ के आठ ही सदा परिवर्तनशील हैं इसलिए भगवान् को अनित्यवादी कहा जाता है और रूप तथा विज्ञान को भी उसके न्यूनतम अवस्थाओं में explain करते हैं इसलिए विभाज्य्वादी कहा जाता है | तो भाईयों क्यों भगवान् की निंदा करते हो उन्हें नास्तिक वादी कहकर या अनीश्वर वादी कहकर | अब आपका कहना है कि लोगों को बौध धर्म धर्म के रूप में नहीं मानना चाहिए ambedkarism के रूप में मानना चाहिए तो भैया कौन से लोक से आये हैं आप और कौन सी दुनिया में रहते हैं कि जो आप इतने मोह से भरे हैं , ये भी नहीं जानते कि बुद्ध ने nonsectorian relegion(=धम्म=धर्म ) बताया है ना कि सम्प्रदाय (= relegion) | भाषाओं के बदल जाने से किसी वस्तु का धर्म(=character=गुण ) थोड़े ही बदल जाता है | तो धम्म कहो या धर्म एक ही बात है , हाँ ये बात और कि आजकल लोग धर्म को सम्प्रदाय और सम्प्रदाय को ही धर्म कहने लगे हैं क्योंकि किसी भी सम्प्रदाय में ज्यादातर लोग मोह-मूढ़ता से भरे हैं और अपने-२ सम्प्रदायों की रूढ़ियों में बंधे हैं बेचारे हैं क्या करें | पर एक बात और धर्म का भी कोई तो सम्प्रदाय बनाना पडेगा ही नहीं तो सारे फूल अलग-२ होंगे और जब कभी भी हवा का झोंखा या आंधी आएगी तो ये मोती बिखर जायेंगे और गर्त में चले जायेंगे , पर जब एक माला में होंगे तो बिखरेंगे नहीं जहां जायेंगे साथ ही जायेंगे और servive करते रहेंगे खुशबू फैलाते रहेंगे | अब लो मूर्ती क्या है ? मूर्ती है अभिव्यक्ति का तीसरा प्रकार –(१) वाणी (२) लिपि(३) चित्रकला=मूर्तिकला | तो भैया जरा देखिये बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ध्यान साधना :- ध्यान के पाँच अंग हैं (१)वितक्क(२) विचार(३) पीति (४)वेदना(५) एकग्गता | और ध्यान को प्राप्त करने दो मार्ग भगवान् ने बताये हैं १-समथ यानिक- जो समथ भावना के मार्ग पर चलकर २सरी – विपस्सना भावना द्वारा अभिज्ञा को प्राप्त करता है | १ली में कसिण साधना की जाती है जब साधक कसिण साधना में पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो वह विपस्सना साधना द्वारा वह रुपावचर (साकार ब्रह्म) अवस्था —अरूपावचर (अरूप ब्रह्म) अवस्था — लोकुत्तर चित्तावस्था(अर्हत) को प्राप्त करता है one bye one . अतः बाद में ध्यान को सरल बनाने हेतु कुछ भिक्खुओं ने कसिण साधना को धर्म कि तीसरी प्रकार वाली व्याख्या (चित्रकला=मूर्ती) पर ध्यान लगवाकर अल्पबुद्धि मानुषों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया था | इसमें भगवान् के मार्ग को दोष देना या उन भिक्खुओं को जो करुणा वश जगत का भला ही कर रहे थे | अब लोग मार्ग पर ना चलें अन्धविश्वासी होकर आरती उतारने लगें मूर्ती की तो कोई भी गुरु या भगवान् क्या करे |

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