भारत का लोकतंत्र खतरे में है क्योंकि इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन विश्वसनीय नहीं ऐसा सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बीच केस चल रहा है| जब जापान अमेरिका जर्मनी जैसे उन्नत देश इ वि एम का इस्तेमाल बंद करके कागज इस्तेमाल करते हैं तो भारत क्यों इ वि एम इस्तेमाल करते है| सुनिए क्या है सारी कहानी इस वीडियो में


 

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  1. जहाँ जहाँ समय है वहां जनम मृत्यु है और भगवान् बुद्ध निब्बान की बात करते हैं न जनम न मृत्यु । तो समय भी अजन्मा नहीं है 0 से शुरू होकर infinite है समय तो ईश्वर तो है पर कर्म के कारण उत्पन्न होता है और कर्म का पिता मन है तो सबसे बड़ा ईश्वर मन है और मन भी व्यय धर्मा है । तो सभी छोटे बड़े ईश्वर नश्वर हैं और निराकार ब्रह्म भी मन ही है जब वेदना संज्ञा रहित विज्ञान केवल कुछ संस्कार वाला है तो वह निराकार ब्रह्म है पर मरणशील है । अतः अत्ता हि अत्तनो नाथो ।। भगवान् ने कहा है ।

  2. Dharm/धर्म तो धर्म है सबका एक है तेरा मेरा क्या इसका उसका क्या पूरी कायनात का एक ही है कण कण का एक ही है जीवित निर्जीव का सबका एक ही है । इसके आगे पीछे अगर कुछ लगा तो समझो धर्म नहीं है वो सम्प्रदाय है जातिवाद है मनुष्यकृत है त्रुटिपूर्ण है । दुक्ख्मय है अविद्या है मूर्खता है मोह है । भगवान् बुद्ध ने धर्म सिखाया है न कि सम्प्रदायवाद जातिवाद । जिस प्रकार सभी नदियाँ विभिन्न दिशाओं से आकर जब समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती हैं ये नहीं पता चलता और उनको कभॆअब अलग अलग नहीं किया जा सकता । र्हीक उसी प्रकार कोई भी जब बुद्ध के धर्म में मिल जाता है उसकी अपनी कोल पूर्व पहचान नहीं रहती उसकी जाति और पूर्व सम्प्रदाय सभी कुछ मिट जाते हैं । कुछ लोग हमारे भारत वर्ष में ये कहते ,बकवास करते नहीं थकते कि बुद्ध को भगवान् मत कहो महात्मा कहो क्योंकि भगवान् शब्द से ही इन्हें नफरत है क्योंकि ये हीन भावना से इतने ग्रस्त हैं कि इन्हें पता भी नहीं की भगवान् कहने में क्या गलत है । अरे भाई पुरातन काल में ब्रह्मा कहा जाता था ईश्वर को फिर कुछ लोगों ने ईश्वर कहा ब्रह्मा को । पर जब भगवान् गोतम बुद्ध हुए तो उन्हें ही सर्वप्रथम भगवान् कहा गया क्योंकि ईश्वर शब्द किसी सर्वशक्तिमान अदृश्य लोकपाल देवता के लिए प्रयुक्त होता था और भगवान् इसलिए कि क्योंकि उन्होंने अपने सभी प्रकार के राग दोस मोह नष्ट कर दिए हैं इसलिए भगवान् कहने लगे उ के शिष्य । जबकि किसी देव या ईश्वर आदि में राग दोस मोह बचा रहता है । इसलिए भगवान् ईश्वर से श्रेष्ठ अवस्था है। आज कालांतर में आते आते पुरोहित धर्मीयों ने बड़ी चालाकी से ये सब किया है और करते रहते हैं कि जब देखा कि भगवान् शब्द ज्यादा प्रचलित हो गया तो अब ईश्वर न कह सीधे ब्रह्म को भी ईश्वर न कह भगवान् कहना आरम्भ किया और साम दाम दंड भेद की नीति द्वारा अपने विचारों को फैलाया । और आज सब ईश्वर का अर्थ भगवान् और भगवान् का अर्थ ईश्वर ही समझते हैं । और जन सामान्य को इससे ज्यादा कुछ लेने देने भी नहीं होता की उन्हें तो बस एक रहनुमा चाहिए । चाहे उसका नाम अध्यात्मिक ज्ञानी कुछ भी रक्खें । तो यदि आपकी श्रद्धा भगवान् बुद्ध में है तो औरों से मतलब नहीं होना चाहिए कि वे लोग क्या रहे हैं । बस हमें तो अपनी श्रद्धैन्द्रिय को बलवान करना है एवं इस जातिवादी व्यवस्था को अलविदा कहना है जिससे आपकी आने वाली नस्लें हीनभावना का शिकार न हो सके और गर्व से कहें की हम बौद्ध हैं कोई पूछेगा भी कि क्या जाति है भाई आपकी तो कहेंगे भैया जातिवाद तो हीन भावना हिन्दु सम्प्रदाय में होती है हमारे सम्प्रदाय में बौद्ध सम्प्रदाय में जातिपाती नहीं है । हम सब केवल बौद्ध कहे जाते हैं । अब कुछ लोगों का ये भी कहना है कि बौद्ध धर्म के रूप में अब्राह्मण वर्ग अर्थात शूद्र वर्ग sc/st/ obc का भला नहीं करेगा बल्कि बुद्ध के विचारों को मानों पर सम्प्रदाय बौद्ध में जाने की जरुरत नहीं । अम्बेडकरवादी बनो तो मान लेते हैं जनाब थोड़ी देर के लिए ,पर कभॆआप्ने सोचा है कि बाबा साहेब ने इस वंचित समाज के अधिकारों को वापस अकेले ही ब्राह्मण लोबी से छीनकर दिलाया और केवल किसी जाति विशेष को नहीं दिलाया जरा देखो बाबा सहेब ने सर्व समाज की स्त्रियों के लिए भीशिक्षा का अधिकार दिया । क्योंकि वे बोधिसत्व हैं और बोधि सत्व किसी सम्प्रदाय विशेष से घृणा नहीं करते बल्कि समाज की बुराइयों को दूर कर देते हैं । इतना सब्ब कुछ करने तक बाबा साहेब के पास इतना समय नहीं था कि वे अध्यात्मिक विषय पर मंथन करते । समानता के अधिकार को प्रतिस्थापित करने के बाद बाबा साहेब ने अध्यात्म / धर्म पर मंथन किया तो बताया कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो उसे अध्यात्म तो चाहिए ही या वह बिना अध्यात्म के नहीं रह सकता । वह एक विचारशील प्राणी है तो विचार तो जरूर करेगा ही और यदि अध्यात्म की वास्तविकता को नहीं ढूंढ पाया स्वयं तो जो प्रचलन में है उसे ही मानने लगेगा । तो व्यक्ति अंधविश्वास का सिकार हो जायेगा और अपना कल्याण करने के बजाय अपने अहित के साथ -२ आने वाली पीढ़ियों का भी अहित कर जायेगा । तो अध्यात्म के लिए कोई सम्प्रदाय तो चेहिये ही ,तो बाबा साहेब ने विश्लेषण किया दुनिया में प्रचलित सम्प्रदायों का तब उन्होंने पाया कि दुनियाँ में एक बौद्ध सम्प्रदाय ही ऐसा है जो आध्यात्मिकता का शुद्ध ज्ञान बताता है और किसी भी प्रकार का भेदभाव लिखित या प्रचलन में इस बौद्ध सम्प्रदाय में नहीं है । तो तब जाकर उन्होंने बौद्ध धर्म में विधिवत दीक्षा ली और उनके 10 लाख अनुयायियों ने भी बाबा साहेब द्वारा दीक्षा प्राप्त की थी । तो भाई सम्प्रदाय भी जरूरी है क्योंकि बिना माला के बनाये जैसे अलग -२ जो भी कितने भी अच्छे फूल हों वे हवा के एक झोंखे से तहस नहस हो जाते हैं । तो एक माला तो बनानी ही पड़ेगी फिर कितना भी तेज झोंखा आये या आंधी आये सब एक सम्प्रदाय में गुंथे हैं तो साथ ही जायेंगे जहाँ भी जायेंगे और एकता में शक्ति है उसके लिए अपने अध्यात्मिक सिद्धांत वाले सम्प्रदाय में जियें और उसे ही कागजों में लिखें । इस बात से भी बौद्ध धर्मी न डरे कि कागजों में बौद्ध लिखने से आपको reservation नहीं मिलेगा । आप अगर बौद्ध धरम लिखकर sc st obc का आरक्षण लेना चाहें तो आपको मिलेगा ही क्योंकि वह धर्म आधारित नहीं जाति आधारित व्यवस्था के तहत है तो जब तक समाज में जातिव्यवस्था है तो आरक्षण रहेगा ही चाहे लिखित या अलिखित । अलिखित आरक्षण पुरोहित वर्ग के पास है कि सभी हिन्दू पूजा स्थलों का वह मालिक होता है और अपनी रोजी रोटी आराम से चला लेता है । okay बाय सी यू later ।। नमो बुद्धाय ।। भवतु सब्ब मंगलं ।।

    अघाते

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