प्रस्तुत कविता “ये शोषितों की बस्ती है” में कवि ने बहुजनों की दुर्दशा और उसके कारणों का बेहद सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है


सारा शहर बुहारा करते, आर्यसमाजी इसी बस्ती में,
अपना ही घर गंदा रखते। वेदों का प्रचार करें
शिक्षा से रहें कोसों दूर, लाल चुनरिया ओढ़े,
दारू पीते रहते चूर।। पंथी वर्णभेद पर बात करें
चुप्पी साधे वर्णभेद पर,
बोतल महँगी है तो क्या हुआ, आधी सदी गुजरती है।
थैली खूब सस्ती है। ये शोषितों की बस्ती है ।
ये शोषितों की बस्ती है ।
शुक्रवार को चौंसर बढ़ती,
यहाँ जन्मते हर बालक को, पकड़ा देते हैं झाडू। सोमवार को मुखलहरी।
वो बैठा, अबे, साले, विलियम पीती मंगलवार को,
परे हट, कहते हैं लालू। शनिवार को नित जह़री।।
नौ दुर्गे में इसी बस्ती में,
गोविंदा और मिथुन बनकर, घर घर ढोलक बजती है।
खोल रहे हैं नाली। ये शोषितों की बस्ती है ।
दूजा काम इन्हें ना भाता इसी काम में मस्ती है।।
ये शोषितों की बस्ती है । नकली बौद्धों की भी सुनलो,
कथनी करनी में अंतर।
सूअर घूमते घर आंगन में, बात करें बौद्ध धम्म की,
झबरा कुत्ता घर द्वारे घर में पढ़ें वेद मंतर।।
वह पीता वह पीती, बाबा साहेब की तस्वीर लगाते,
पीकर डमरू बाजे इनकी मैया मरती है।
भूत उतारें रातभर, ये शोषितों की बस्ती है ।
बस रात ऐसे ही कटती है।
ये शोषितों की बस्ती है । औरों के त्यौहार मनाकर,
व्यर्थ खुशी मनाते हैं।
ब्रह्मा विष्णु इनके घर में, हत्यारों को ईश मानकर,
कदम कदम पर जय श्रीराम। गीत उन्हीं के गाते है।।
रात जगाते शेरोंवाली का, चौदह अप्रैल बुद्ध जयंती,
करते कथा सत्यनारान।। याद ना इनको रहती है।
पुरखों को जिसने मारा ये शोषितों की बस्ती है ।
उसकी ही कैसिट बजती है।
ये शोषितों की बस्ती है । डोरीवाला इसी बस्ती का,
झौंपे से अफसर बन बैठा।
यहाँ बरात बलि चढ़ाते, उसको इनकी क्या पड़ी अब,
मुर्गा घेंटा और बकरा वह दूजों में जा बैठा।।
बेटी का जब नेग करें, बेटा पढ़ लिखकर शर्माजी,
तो माल पकाते देग भरा बेटी बनी अवस्थी है।
जितना ज्यादा देग बनाये ये शोषितों की बस्ती है ।
उसकी उतनी हस्ती है।
ये शोषितों की बस्ती है । भूल गए अपने पुरखों को,
महामही इन्हें याद नहीं।
तू चूहड़ा और मैं चमार हूँ, अम्बेडकर बिरसा बुद्ध,
ये खटीक और कोली। वीर ऊदल की याद नहीं।
एक तो हम कभी बन ना पाये, झलकारी को ये क्या जानें,
बन गई जगह जगह टोली।। इनकी वह क्या लगती है।
अपना मुक्तिदाता भूले, ये शोषितों की बस्ती है ।
गैरों की झांकी सजती है।
ये शोषितों की बस्ती है ।। आत्मकथा चरित्र इतना ही पढ़ते,
ना अपने पिंजरे की चाह।
हर महीने वृंदावन दौड़े, दफ़ा 302 की भांति,
माता वैष्णो छ: छ: बार। वर्दी वाला गुण्डा
गुडगाँवा की जात लगाता, सोमनाथ को अब तैयार।। गुलशन नंदा की सीरीज,
बेटी इसकी चार साल से, ये तो रातदिन पढ़ती है।
दसवीं में ही पढ़ती है। ये शोषितों की बस्ती है ।
ये शोषितों की बस्ती है ।
मैं भी लिखना सीख गया हूँ,
बेटा बजरंगी दल में है, गीत कहानी और कविता।
बाप बना भगवाधारी भैया हिन्दू इनके दु:ख दर्द की बातें, मैं
परिषद में है, बीजेपी में महतारी। भी भला कहाँ लिखता था।।
मंदिर मस्जिद में गोली, कैसे समझाऊँ अपने लोगों को मैं,
इनके कंधे चलती है। चिंता यही खटकती है।
ये शोषितों की बस्ती है । अमित ये शोषितों की बस्ती है।।
      💐जय भीम जय प्रबुद्ध भारत 💐

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