6-Dec-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना:डॉ अम्बेडकर 85 प्रतिशत बहुजन के मसिहा और तारणहार हैं पर उनको केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित करना मनुवादी साजिश है, इतना ही नहीं आज भारत जिस अमन के साथ एक झंडे के नीचे संगठित है और तरक्की कर रहा है उसकी नीव भी बाबा साहब ने रखी है, सोच कर देखो अगर संविधान न होता तब जाती और धर्मों में बंटे इस देश का क्या हाल होता ?


इसका दूरगामी परिणाम ये होना है की ब्राह्मणवाद के सताए दोनों बहुजन और मुसलमान (विशेषकर बहुजन से मुसलमाान बने लोग) आपमे सामने होंगे, जबकि दोनों की तकलीफों का कारन एक ही है
डॉ आंबेडकर महान के विचारों की वजह से ही बौद्ध धम्म आधारित संविधान भारत को मिला, जिसमे बाबा साहब ने समानता और न्याय के राज को स्थापित किया| ब्राह्मणवाद की बहुत बड़ी नीति है की जिसका विरोध करना हो उससे घृणा का दिखावा करके घृणा को प्रचारित करो, इससे धीरे धीरे व्यक्ति और विचारधारा खत्म हो जाती है| बाबा साहब को जिनके व्यक्तित्व में भारत के सबसे बड़े प्रतीक होने की न केवल पूर्ण संभावनाएं हैं बल्कि वास्तविक रूप में भी बाबा साहब ही भारत के भाग्य विधाता हैं| ऐसे महान व्यक्तित्व को शेडूल-कास्ट का नेता और उसमे भी सिर्फ महारों और चमारों के नेता के रूप में मीडिया में प्रचारी किया जा रहा है| कमल है जो देश का नेता है वो वर्ग विशेष का नेता और जो वाकई अपनी कौम के लिए ही काम करता है ऐसे ब्राह्मणवादी हो जाते हैं देश के नेता| मीडिया ने भारत के मूलनिवासी पर एक और शब्द टॉप दिया है “दलित” इसका परनाम ये है की सरे संसार में बहुजन लोग अकेले पद गए हैं| अगर बौद्ध हो गए होते जैसा की बाबा साहब चाहते थे तो आज भारत में मेजोरिटी में ताहि लोग होते| परनाम स्वरुप हर क्षेत्र में इनको न्याय मिलता| काश अब ही ये लोग समझ जाएँ|

भारत में जिस तरह से ब्राह्मणवाद/ पूँजीवाद के काले बदल छाते जा रहे हैं ऐसे में आम जनता के सबसे बड़े सरक्षक बाबा साहब और उनका संविधान ही है| क्या आप भूल गए हो की सदियों से ब्राह्मणवादियों ने आम जनता को न्याय नहीं दिया, आज भी जहाँ तक इनकी चलती है तो आम भारतीय को नया नहीं मिलता| ऐसा इसलिए क्योंकि ये लोग संविधान का सही से पालन नहीं करते|ध्यान रहे संविधान की रक्षा करना हम सब का कर्तव्ये है वार्ना देश में फिर से ब्राह्मणवाद हावी हो जायेगा परिणाम स्वरुप ८५% मूलनिवासी जो कई जाती धर्मों में बनते हैं उनको गुलामी का जीवन बिताना पड़ेगा|

क्या आपने कभी नोट किया की अगर कोई ब्राह्मणवादी नेता बनता है तो उसे देश का नेता कहा जाता है पर अगर कोई    बहुजन-SC/ST/OBC/Minorities  में से नेता बनता है तो उसे उसकी जाती का नेता कहकर उसकी जाती तक ही सीमित कर दिया जाता है| डॉ अम्बेडकर 85 प्रतिशत बहुजन SC/ST/OBC/Minorities  के मसिहा और तारणहार हैं पर उनको केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित करना मनुवादी साजिश है|

बाबा साहेब  डॉ. आम्बेडकर द्वारा किये गए संगर्ष का जो लोग SC/ST/OBC/Minorities लाभ उठा रहे हैं वे अपने मसीहा को दलित के रूप में देखने और नकारने  को मजबूर हैं| आज भी ओबीसी के बुद्धिजिवियो और शिक्षितों को ये पता नहीं है कि बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय के लिए क्या किया है ? बात चली है तो थोडा सा तो लिखना पड़ेगा ,बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय, जो देश में 52% से भी अधिक है उसके उत्थान के लिए:

(१) १९२८ में बोम्बे सरकार ने स्टार्ट कमिटी नियुक्त कि थी जिसमे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर ने Other backward caste यानि कि OBC शब्द का उपयोग किया था.स्टार्ट कमिटी में बाबा साहेब ने कहा था कि, जो जातिया अपर कास्ट और बेकवर्ड के बिच में आती है ऐसी जातियां अन्य पिछड़ी जाति यानी कि ओबीसी है|

(२) देश की संविधान सभा में सिर्फ ६ ही ओबीसी सदस्य थे. जिसकी आवाज दबा कर रख दी थी लेकिन डॉ. बाबा साहेब के कारण ही कलम ३४० का प्रावधान करना पडा और जिनके फलस्वरूप “काका कालेलकर आयोग” (१९५३-५५) तथा “मंडल आयोग” (१९७८-८०) की रचना केन्द्र सरकार को करनी पड़ी थी. दोनों आयोग ओबीसी के लिए थे लेकिन अफसोसजनक है की ओबीसी समुदाय के 99% शिक्षितों को इसके बारे में पता नहीं है|

(३) १९५१ में अपने कानून मंत्री पद से इस्तीफा देते हुवे पत्र में बाबा साहेब ने इस्तीफा का दूसरा कारण ओबीसी जातियों के लिए आयोग की नियुक्ति नहीं करना और ओबीसी की उपेक्षा करना बताया था. क्या ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों को लागु करने के लिए १९४७ से २०११ तक राज्य या केन्द्र सरकार के कोई मंत्री ने इस्तीफा दिया है ?
डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर के इस्तीफा के कारण ही दबाव में आकर सरकार को ओबीसी के लिए “काका कालेलकर आयोग” की रचना करनी पड़ी थी. १९५२ की लोकसभा में ५२% से ज्यादा ओबीसी-समुदाय के सांसदों सिर्फ ४.३९% ही थे. बाबासाहेब ही थे जिन्होंने ओबीसी, एससी-एसटी(अति शुद्र) और महिलाओं के उत्थान के किया आजीवन संघर्ष किया था,

उनको दलितो के उद्धारक के रूप में सिमित कर देना क्या एक षड्यंत्र नहीं है ?

बाबा साहेब का निम्न कथन उनका हमारे लिए अंतिम था:

‘‘मेरे लोगों से कह देना, नानक चन्द! मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेषकर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धेखा दे दिया। मैं बड़ी कठिनाइयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है। कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हे इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा। जाओ जाकर उनसे कह दो जाओ जाकर उनसे कह दो.. जाओ जाकर उनसे कह दो,’’

उन्होंने तीन बार कहा। यह कह कर वह सिसकने लगे, देखते ही देखते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

last6

 

बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस मीडिया की कवरेज और जनता में चेतना न होने के कारन यही दिन बाबरी विध्वंस  के लिए चुना|इसका दूरगामी परिणाम ये होना है की ब्राह्मणवाद के सताए दोनों बहुजन और मुसलमान (विशेषकर बहुजन से मुसलमाान बने लोग) आपमे सामने होंगे, जबकि दोनों की तकलीफों  का कारन एक ही है |
अधिक जानकारी के  लिए निम्न आर्टिकल पढ़ें

 

http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/12/blog-post_5.html

2 thoughts on “6-Dec-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना:डॉ अम्बेडकर 85 प्रतिशत बहुजन के मसिहा और तारणहार हैं पर उनको केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित करना मनुवादी साजिश है, इतना ही नहीं आज भारत जिस अमन के साथ एक झंडे के नीचे संगठित है और तरक्की कर रहा है उसकी नीव भी बाबा साहब ने रखी है, सोच कर देखो अगर संविधान न होता तब जाती और धर्मों में बंटे इस देश का क्या हाल होता ?

  1. भीमराव आंबेडकर के 54वें परिनिर्वाण दिवस पर विशेष- अस्मिता की राजनीति का मसीहा -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

    http://www.pravakta.com/bhimrao-ambedkar-on-54-th-parinirvana-day-the-politics-of-identity-of-the-messiah

    आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे ? गैर अछूत कैसे जीएंगे इसके बारे में कोई विवाद ही नहीं था क्योंकि हम सब जानते थे कि वे कैसे हैं और उन्हें क्या चाहिए ?किंतु अछूत को हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।

    अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।

    भारत एक खोज सभ्यता विमर्श को सामने लाती है,अछूत खोज परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोलती है। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।

    आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया। अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाए।

    क्रांति, आधुनिकता, औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग,राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत सम्सया को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्तिा ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या

    उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।

    अछूत समस्या के पेचोखम- भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।

    आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति कभी मनोवैज्ञानिक चीज नहीं थी। बल्कि जाति का ठोस आर्थिक आधार था। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं था। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों?

    आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

    सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

    आधुनिककाल में पहलीबार शूद्रों को यह बात समझाने में ज्योतिबा फुले को सफलता मिली कि मनुष्य के अस्तित्व की पहचान शिक्षा से होती है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु समान होता है। शूद्रों के लिए शिक्षा का अर्थ वही नहीं था जो सवर्णों के लिए था। शूद्रों के लिए शिक्षा अस्तित्वरक्षा, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और आत्मोध्दार के साथ अस्मिता की स्थापना का उपकरण भी थी। यही वजह है कि शिक्षा का शूद्रों में जितना प्रसार हुआ है अस्मिता की राजनीति का भी उतना ही प्रसार हुआ है।

    ज्योतिबाफुले -आंबेडकर के द्वारा शुरू की गई अस्मिता की राजनीति विदेश से लायी गई चीज नहीं है। साम्राज्यवादी साजिश का अंग नहीं है। बल्कि यह तो भारत के संतुलित विकास के परिप्रेक्ष्य के गर्भ से उपजी राजनीति है। इसका आयातित अस्मिता की मौजूदा राजनीति के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। शूद्रों की शिक्षा का लक्ष्य था, सामाजिक भेदभाव को खत्म करना, मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता पैदा करना और समानता को व्यापक मूल्य के रूप में स्थापित करना।

    अछूत समस्या हमारे देश में कई हजार सालों से है। किंतु इसके खिलाफ कभी सामाजिक आंदोलन नहीं हुए। आखिरकार क्या कारण है कि भारत में विगत ढाई हजार सालों में कभी क्रांति नहीं हुई ? क्या अछूत समस्या को खत्म किए बगैर क्रांति संभव है ? क्या वजह है कि आधुनिककाल में ही अछूत समस्या के खिलाफ सामाजिक आंदोलन संभव हो पाया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में जातिभेद खत्म हो सकता है ? इन सभी सवालों का एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है।

    भारत में जातिव्यवस्था के खिलाफ क्रांति अथवा सामाजिक क्रांति न हो पाने के तीन प्रधान कारण हैं, पहला ,अंधविश्वासों में आस्था, दूसरा, पुनर्जन्म की धारणा में विश्वास और तीसरा,कर्मफल के सिध्दान्त के प्रति विश्वास। इन तीन विचारधारात्मक बाधाओं के कारण भारत में सामाजिक क्रांति नहीं हो पायी। अंधविश्वासों में आस्था के कारण हमने कभी जातिभेद क्यों है? गरीब गरीब क्यों है और अमीर अमीर क्यों है ? क्या पीपल के पेड़ को पूजने से मनोकामना पूरी होती है ? क्या साहित्य में जो रूढ़ियां चलन में हैं वे वास्तव में भी हैं ? इत्यादि चीजों को यथार्थ में कभी परखा नहीं। हम यही मानकर चलते रहे हैं कि मनुष्य गरीब इसलिए है क्योंकि पहले जन्म में कभी बुरे कर्म किए थे। उसका ही फल है कि इस जन्म में गरीब है। अमीर इसलिए अमीर है क्योंकि वह पहले जन्म में पुण्य करके आया है।

    अच्छे कर्म करोगे अच्छे घर में जन्म लोगे। बुरे कर्म करोगे नीच कुल में जन्म होगा। निचली जाति में उन्हीं लोगों का जन्म होता है जिन्होंने पहले बुरे कर्म किए थे। निचली जातियों को नरक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया और एक नए किस्म के प्रचार अभियान की शुरूआत हुई। इससे जातिभेद को वैधता मिली। कर्मफल के सिध्दान्त की सबसे बड़ी किताब है श्रीमद्भगवतगीता इसके आधार पर कर्मफल के सिध्दान्त को खूब प्रचारित किया गया। कर्म किए जा फल की चिन्ता मत कर। उल्लेखनीय है गीता को आदर्श दार्शनिक किताब के रूप में तिलक से लेकर गांधी तक सभी ने प्रधानदर्जा दिया था। गीता आज भी मध्यवर्ग की आदर्श किताब है।

    उल्लेखनीय है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने जातिप्रथा को इन तीनों विचारधारात्मक बाधाओं के दायरे बाहर निकालकर पेश किया। संभवत: बाबासाहेब अकेले बड़े स्वाधीनतासेनानी थे जिनकी कर्मफल के सिध्दान्त,पुनर्जन्म और अंधविश्वासों में आस्था नहीं थी। यदि इन तीनों चीजों में आस्था रही होती तो अछूत समस्या को राष्ट्रीय समस्या बनाना संभव ही न होता। कहने का तात्पर्य यह है अछूत समस्या से मुक्ति के लिए, जातिप्रथा से मुक्ति के लिए चार प्रमुख कार्य किए जाने चाहिए।

    पहला- अंधविश्वासों के खिलाफ जंग।

    दूसरा- पुनर्जन्म की धारणा के खिलाफ जनजागरण।

    तीसरा- कर्मफल के सिध्दान्त के खिलाफ सचेतनता।

    चौथा- अछूत जातियों के साथ रोटी-बेटी के संबंध और पक्की दोस्ती।

    ये चारों कार्यभार एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक को भी त्यागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है शिक्षा ,नौकरी अथवा आरक्षण मात्र से अछूत समस्या का समाधान संभव नहीं है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए आमलोगों में खासकर दलितों में विज्ञानसम्मत चेतना का प्रसार करना बेहद जरूरी है। विज्ञानसम्मतचेतना के अभाव में दलित हमेशा दलित रहेगा। उसकी दलितचेतना से मुक्ति नहीं होगी। जातिभेद कभी खत्म नहीं होगा। हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि हमारी शिक्षा हमें कितना विज्ञानसम्मत विवेक देती है ? सच यही है कि हमारी शिक्षा में कूपमंडूकता कूटकूटकर भरी पड़ी है। पैंतीस साल के शासन के वाबजूद पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में से कूपमंडूकता को पूरी तरह विदा नहीं कर पाए हैं।

    दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिप्रथा एक तरह का पुराने किस्म का सामाजिक अलगाव है। जातिप्रथा को आज नष्ट करने के लिए सामाजिक अलगाव को नष्ट करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव आज के दौर में व्यापक शक्ल में सामने आया है। हम एक-दूसरे के दुख-सुख में साझीदार नहीं बनते। कभी एक-दूसरे के बारे में खबर-सुध नहीं लेते। यही सामाजिक अलगाव पहले जातियों में भी था। खासकर निचली कही जाने वाली जातियों के प्रति सामाजिक अलगाव यकायक पैदा नहीं हुआ। बल्कि इसे पैदा होने में सैंकड़ों साल लगे। सामाजिक अलगाव को अब हमने वैधता प्रदान कर दी है। सामाजिक अलगाव को हम स्वाभाविक मानने लगे हैं। नए युग की विशेषता मानने लगे हैं। नए आधुनिक जीवन संबंधों की अनिवार्य परिणति मानने लगे हैं। सामाजिक अलगाव की अवस्था में जातिभेद और जातिघृणा बढ़ेगी। क्योंकि सामाजिक अलगाव से जातिघृणा को ऊर्जा मिलती है। यह अचानक नहीं है कि सन् 1970 के बाद के वर्षों में पूंजीवादी विकास जितना तेज गति से हुआ है। सामाजिक अलगाव में भी इजाफा हुआ है। जाति संगठनों में भी इजाफा हुआ है। जातिघृणा और जाति संघर्ष बढ़े हैं। जातिघृणा,जातिसंघर्ष और जातिगत तनाव तब ही पैदा होते हैं जब हम अलगाव की अवस्था में होते हैं।

    सामाजिक अलगाव पूंजीवादी विकास की स्वाभाविक परिणति है ,इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए। अचेत रूप से सामाजिक अलगाव को स्वीकार लेने का अर्थ है आपसी अलगाव में इजाफा। अलगाव खत्म होगा तो संगठन की महत्ताा भी समझ में आती है। सामाजिक शिरकत,सामाजिक साझेदारी, व्यक्तिगत और सामाजिक भावनात्मक विनिमय और आर्थिक सहयोग ये चीजें जितनी बढ़ेंगी उतनी ही भेद की दीवार गिरेगी।

    हमें सोचना चाहिए आरक्षण किया,संविधान में संरक्षण दिया, तमाम किस्म के कानून बनाए,सभी दल इन कानूनों के प्रति वचनबध्द हैं,इसके बावजूद जाति उत्पीड़न थमने का नाम नहीं लेरहा। एससी,एसटी का अलगाव कम नहीं हो रहा। उनकी असुरक्षा की भावना कम नहीं हो रही। इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल के उदाहरण से समझाना चाहूँगा।यहां पर जातियाँ हैं। जातिभेद भी है। किंतु निचले स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टियों के संगठनों का तंत्र इस कदर फैला हुआ है कि आप उसकी परिधि के बाहर जा नहीं सकते। यह तंत्र सामाजिक संपर्क,सामाजिक संबंध और आपसी भाईचारा बनाए रखने और विनिमय का काम करता है। इसका सुफल यह निकला है कि आमलोगों में अभी शिरकत और सहयोग का भाव बचा हुआ है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख में सहयोग करते हैं। यही वजह है पश्चिम बंगाल में जातिगत तनाव और जाति संघर्ष नहीं हैं।

    जबकि सच यह है आरक्षण यहां कम लागू हुआ है। राजनीति में दलितों का नहीं सवर्णों का बोलवाला है। इसके बावजूद जातिसंघर्ष नहीं हैं। यथासंभव निचली जातियों को जमीन का हिस्सा भी मिला है। संगठन के कारण उनकी आवाज सुनी भी जाती है। इसके कारण उत्पीडन करने की हिम्मत नहीं होती। आंबेडकर ने स्वयं संगठन को महत्ताा दी थी, संगठन के तौर पर आदर्श सांगठनिक संरचना कम्युनिस्टों के पास है।

    मुश्किल यहां से शुरू होती है। कम्युनिस्ट कतारें अभी भी उपरोक्त तीन विचारधारात्मक बाधाओं को नष्ट नहीं कर पायी हैं। अभी भी कम्युनिस्ट कतारों में अंधविश्वासों में आस्था रखने वाले, पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले,कर्मफल के सिध्दान्त में विश्वास करने वाले बचे हुए हैं। किंतु इनकी संख्या में तुलनात्मक तौर पर गिरावट आयी है।

    किंतु एक चीज जरूर हुई है कि जातिभेद का जितना प्रत्यक्ष तांडव देश के अन्य इलाकों में नजर आता है वैसा यहां नजर नहीं आता। इसका प्रधान कारण है सामाजिक रूप से कम्युनिस्ट संगठनों का सामाजिक संरचनाओं में घुलामिला रहना। आंबेडकर के इस विचार को कि जातिप्रथा को नष्ट करने के लिए जरूरी है कि शूद्रों और गैर शूद्रों में रोटी-बेटी के संबंध हों। यही चीज कमोबेश पश्चिम बंगाल में लागू करने में वामपंथियों को सफलता मिली है। इस अर्थ में वे इस राज्य में सामाजिक क्रांति में एककदम आगे जा पाए हैं। दूसरी बात यह है कि दलितों पर उत्पीडन की घटनाएं इस राज्य में कम से कम होती हैं। यदि कभी दलित उत्पीड़न की कोई घटना प्रकाश में आती है तो प्रशासन से लेकर राजनीतिक स्तर तक ,यहां तक कि मध्यवर्गीय कतारों में भी उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया होती है। यह इस बात का संकेत है कि सामाजिक संवेदनशीलता अभी बची हुई है। अन्य राज्यों में स्थिति बेहद खराब है।

    जिस राज्य में दलित मुख्यमंत्री हो,दलित पार्टी का शासन हो, वहां दलित उत्पीडन की घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गयी हैं। इन घटनाओं के प्रति आम जनता में संवेदनशीलता कहीं पर भी नजर नहीं आती। क्योंकि उन राज्यों में सामाजिक अलगाव को कम करने का कोई भी प्रयास राजनीतिक दल नहीं करते। बल्कि राजनीतिक लाभ और क्षुद्र सांगठनिक लाभ हेतु सामाजिक अलगाव का इस्तेमाल करते हैं।

    एक वाक्य में कहें तो उत्तारप्रदेश,बिहार आदि राज्यों में जातिदलों ने सामाजिक अलगाव को अपनी राजनीतिक पूंजी में तब्दील कर दिया है। वे सामाजिक अलगाव का निहितस्वार्थी लक्ष्यों को अर्जित करने के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। इससे जातिसंघर्ष बढ़े हैं। सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है। सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है। अछूत समस्या बढ़ी है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए सामाजिक अलगाव को खत्म करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव का राजनीतिक दुरूपयोग बंद करना जरूरी है।

    दलित का राजनीतिक दुरूपयोग सामाजिक टकराव और तनावों को बनाए रखता है और विगत साठ सालों में हमारे विभिन्न राजनीतिक दलों ने दलित समस्या के समाधान के नाम पर यही किया है। उनके लिए दलित मनुष्य नहीं है बल्कि वोट है। एक अमूर्त पहचान है। बेजान चीज है। सत्ताा का स्रोत है। यही दलित की आयरनी भी है। अब हम दलित को मनुष्य के तौर पर नहीं वोटबैंक के तौर पर जानते हैं। आरक्षण के नाम से जानते हैं। वोटबैंक और आरक्षण में दलित की पहचान का रूपान्तरण दलित को वर्चुअल बना देता है। दलित का वर्चुअल बनना मूलत: मध्यकाल में लौटना है। वर्चुअल बनने के बाद दलित और भी दुर्लभ हो गया है। हमें दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल बनने का अर्थ है वह है भी और नहीं भी। वर्चुअल दलित मायावती जैसे नेताओं की पूंजी है। ये दोनों एक-दूसरे के चौखटे में फिट बैठते हैं।

    मायावती के यहां दलित वर्चुअल है। ठोस हाड़मांस का इन्सान नहीं है। यही वजह है दलित की किसी भी समस्या को ठोस रूप में मायावती अपने चुनावी घोषणापत्र में व्यक्त नहीं करती। बल्कि यह कहना सही होगा कि मायावती स्वयं वर्चुअल है। उसने कोई भी ठोस चुनावी घोषणापत्र भी जारी नहीं किया। यही हाल दलितों के मसीहा लालू-मुलायम का है। ये दलितों के हैं और दलितों के नहीं भी हैं। दलित इनके यहां वर्चुअल है और दलित के लिए ये वर्चुअल हैं। कहने का तात्पर्य यह है दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुल होने का अर्थ दलित का लोप और यह एक तरह से मध्यकाल की वापसी होगी किंतु बेहद त्रासद और भयावह वापसी होगी ।

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