महामानव गौतम बुद्ध के बताये मार्ग को जनसामान्य तक कैसे पहुंचाएं….डॉ कौशल कुमार

dharm nahin karm acchasamaybuddha.wordpress.com पर ज्ञानवर्धक एवं विश्लेशानात्मक लेख पढ़कर अत्यंत हर्ष भी होता है । परन्तु एक बात जिस पर भारतीय बुद्ध सम्प्रदाय को बड़ा ही गहन मंथन करना चाहिए कि कम से कम ये लोग जो निचले तबके हैं उनमें एक यह भाव जगाना कितना महत्वपूर्ण होगा कि वे समझें इस बात को कि धर्म को जानना कितना महत्वपूर्ण है । क्योकि धर्म को जाने बिना तो मनुष्य दूसरों की अध्यात्मिक (=मानसिक ) गुलामी ही
करने पर मजबूर रहता है और उसकी आनेवाली संतानों में भी उन्नति की कोई अभिलाषा उत्पन्न नहीं होने पाती । मैंने ये अनुभव किया कि व्यक्ति यदि नास्तिक विचार वाला है या हो गया है तो वह इस भौतिक जगत में उन्नति कर सकता है परन्तु इस बात की भी अत्यधिक संभावना है कि उसकी आने वाली पीढियां उसके विचारों पर ना चल पायें और फिर सत्काय दृष्टि वाली मान्यता में फंस जाएँ तथा अन्धविश्वासी हो
अपनी उन्नति को आत्मा-परमात्मा के सिद्धांत वाली दृष्टि में फंसकर भाग्यवादी बन जाएँ । तो विषय ये महत्पूर्ण है कि इन अंधश्रद्धा में फंसी जनता को निकालने का क्या उपाय है हमारे देश भारत में । काफी मंथन के बाद मैंने ये पाया कि इनके भीतर शिक्षा के साथ -२ अध्यात्मिक शिक्षा भी देने की जरूरत है इसका एक तरीका ज्यादा बेहतर ये ही हो सकता है कि लोगों को कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को
बताया जाए और धर्म को धार्मिक कथाओं द्वारा लोगों को समझाएं जैसा कि स्वयं भगवान् बुद्ध किया करते थे । बुद्ध ने अपने विचारों को मनवाने के लिए उपाय कौशल्य का प्रयोग करते हुए तीन प्रकार से धर्म की व्याख्या किया करते थे १-कथा सूत्रों द्वारा २-सूत्रों की व्याख्या को धार्मिक कहानी में परिष्कृत करके ३-धर्म के गूढ़ विषय को बिल्कुल खोलकर सूक्ष्म व्याख्या द्वारा । ऐसा उन्होंने
इसलिए किया क्योंकि संसार में तीन प्रकार की समझ वाले लोग सामान्यतया हैं १-जो समझना नहीं चाहते बस अध्यात्मिक गुरु के मूह से जो शब्द निकल गए वो उनके लिए पूजनीय बन जाते हैं । २-कुछ जो उन सूत्तों को सामान्य व्यवहार जो समाज में प्रचलित हैं उनसे मिलान करके ही मानेंगे । ३-तीसरे वे जो धर्म की वास्तविकता को समझना चाहते है उसके गूढ़ तथ्यों को जाने बिना वे नहीं रह सकते । तो जैसा उपासक
की प्रकृति हो उसको उसी रूप में मार्ग देना चाहिए । किसी नएव्यक्ति को अपने विचार तो बताएं पर उसकी पूर्व श्रद्धा पर एकदम चोट ना करें उसके विचारों को अपने विचारों में लपेट लें और उसे विश्वास दिला दें कि आप जो कह रहे हैं उसका अनुभव किया आपने तो ही कह रहे हैं । तो वो आपकी बात माने उसके लिए एक शांत ,ज्ञानी और अध्यात्म को गहराई से जानने और समझाने वाले गुरु की सहायता तो चाहिए ही
क्योंकि भारत के लोगों में जो सदियों-२ के लम्बे सफ़र के कारण धार्मिक अंधविश्वास के बीज हैं उनको नास्तिक वाद या केवल विज्ञान के बल पर नहीं मिटाया जा सकेगा । और बहुजन ऐसे ही इस पुरोहितवाद के चक्कर में फंसा रहेगा ।  ।। भवतु सब्ब मंगलं ।।

 

वास्तव में मैंने ये देखा अभी तक कि आज के समय में हमारे देश में जो भी ज्यादातर बौद्ध धम्म को मानने वाले लोग हैं वे अधिक्तर नास्तिकवाद की बातें करते हैं | सदैव ही inferiorty काम्प्लेक्स से ग्रसित देखे जाते हैं | सदैव ही धम्म मार्ग को बताने की शुरुवात हिन्दू धम्म सम्प्रदाय अथवा ईश्वरवाद की बुराइयों से करते हैं |

 

अपनी ऊर्जा बिना वजह ही वेदिक विचारधारा को पुनः-२ बतानें में लगाते रहते हैं , सदा ही ब्राह्मण की बुराई करते फिरते हैं और ये भी नहीं समझ पाते की उनमें खुद कितना ब्राह्मणवाद भरा पड़ा है |आपने देखा होगा कि भारत वर्ष क्या दुनिया में कहीं भी लोग अपने नाम के आगे ब्राह्मण शब्द को सर नेम के रूप में प्रयुक्त नहीं करते हैं क्योंकि आपको पता होना चाहिए कि ब्राहमण कोई जाति भी नहीं है वह तो एक अवस्था है और मुझे नहीं लगता कि ब्राह्मण अवस्था को प्राप्त मनुष्य भी यहाँ भारत में कोई है अरहत अवस्था का तो क्या होगा ?और सम्प्रदाय तो सारे के सारे ही मुझे पाखण्डवाद का अड्डा दिखाई देते हैं परन्तु फिर भी मनुष्य को किसी ना किसी सम्प्रदाय में तो रहना ही पड़ता है / जीना है | तो मान लिया कि यदि आप बुद्ध में श्रृद्धावान हो गए हैं तो बौद्ध सम्प्रदाय में चले गए होंगे परन्तु यदि आप बौद्ध सम्प्रदाय की भी सभी बातों पर श्रृद्धावान नहीं हैं तो बुद्ध धम्म को तो बिलकुल भी समझने की चेष्टा कर ही नहीं रहे | यदि किसी को लगे कि यह मार्ग अच्छा है और इससे मेरा भला हो रहा है और में इसे दूसरों को भी बताऊँ तो सोच तो अच्छी है पर यदि बताने का और समझाने में आपके उपायकौशल्य (acceptable representation) नहीं है तो सारी ऊर्जा व्यर्थ ही गवा रहे हो कि आपकी बात को लोग समझ ही नहीं रहे |

महामानव गौतम कहते हैं कि दूसरे क्या गलत मान्यता रखते हैं उस पर बिना वजह बिना किसी के पूछे क्रश भाषा में व्याख्यान नहीं करना चाहिए क्योंकि आपकी बात को पूर्ण रूप से जिसने अभी स्वीकार भी नहीं किया है तो वह अपनी पूर्व श्रृद्धा के प्रति कैसे आपके द्वारा बतायी बुराई स्वीकार करेगा | तो लोगों को उनके अंधविश्वास से बाहर निकालने के लिए सर्वप्रथम अपनी बात को अध्यात्मिक वाक्य से ही शुरू करें तो वो आपकी बातों पर attention जरूर देगा | बहुत सारे लोग जो अपने को बौद्ध कहते फिरते हैं उन लोगों को मुझे नहीं लगता कि बुद्ध में कोई श्रृद्धा है वे तो बस अपनी हीनता वाले भाव को छिपाने के लिए अपनेआप को बौद्ध कहते फिर रहे हैं | और सीधे-२ कटुवाणी हिंदु मूर्तियों पर निकालकर करते हैं |

उन्हें पता नहीं कि ये जो मूर्तियाँ आज दिख रही हैं भारत में तो ये शुरुवात सर्वप्रथम बौद्ध सम्प्रदाय ने ही शुरू की थी | मूर्ती वास्तव में है क्या पहले ये तो पता करें और देखिये पुरोहित वर्ग को कि वो किस प्रकार दूसरों के बनाए महल पर चढ़कर उसे अपना बताने लगता हैं यह भी एक चातुर्य है भाई कि आप लोग तो अपना भी खो देते हो और दुसरे तुम्हारा पैतृक / पुरातन संपदा को अपना बताकर आम जनता को भ्रमित करके उनके गुरु बन जाते हैं क्योंकि वे लोग जानते हैं कि कैसे इस भौतिक संसार में लोगों पर राज किया जाता है उनके मनो को अपना गुलाम बनाकर | जातिवादी परम्परा में पुरोहित को ये पता है कि संख्या मायने नहीं रखती बल्कि ज्ञान मायने रखता है | और किसी सम्प्रदाय के लिए कोई व्यक्ति नहीं महत्वपूर्ण होता है विचार महत्वपूर्ण होता है तो वो लोग कभी भी नहीं बोलते कि क्यों नमस्कार शब्द बोल रहे हो या राम-राम शब्द बोल रहे हो अथवा गुड मॉर्निंग शब्द बोल रहे हो क्योंकि उन्हें पता है कि ये एक persional psychological विषय है अरे कुच्छ भी बोलता फिरे पर अध्यात्मिक राह पर चले तो जैसा हम कहें वैसा ही करे , इसके लिए हमारे देश में पुरोहित वर्ग के कितने ही बुद्धिजीवी अपना पूर्ण जीवन तक समर्पित कर देते हैं |

भारत में कितने ही संघ अहिं जो रात दिन इसी बात पर मंथन करते रहते हैं कि ये जो लोग पुरोहित वर्ग के नहीं हैं ये किसी और सम्प्रदाय में ना चले जाएँ और नए-२ अंधविश्वास apply करते रहते हैं जिससे लोग उनके वाद को आराम से मानते रहें , और पुरोहित वर्ग का हित सधता रहे | वो कभी नहीं कहते ऐसे शब्द जिन शब्दों से जनसामान्य में उनके प्रति विरोध की भावना भड़क जाए – ये समय के अनुसार व्यवहार करते हैं जैसा काल वैसा वास इस सिद्धांत को समझते हैं| ये तो बात ठीक है कि आप जय भीम बोलें और बाबा साहेब की पूजा भी करें परन्तु बौद्ध अभिवादन में तो केवल नमो बुद्धाय ही बोलें क्योंकि अगर बौद्ध धम्म सम्प्रदाय को बढ़ावा यदि भारत में बाबा साहेब ने दिया और आप लोग उनके द्वारा प्रेरित हो बौद्ध धम्म सम्प्रदाय में चले गए हैं तो अच्छी बात है , तो इस प्रकार तो महाराज अशोक को भी नमो बुद्धाय से पूर्व जय अशोक या महाराज अशोक बोलना चाहिए क्योंकि उन्होंने तो अपने पुत्र-पुत्रियों तक को भी धम्म के प्रचार में लगा दिया था | तो psychology को समझो कि अध्यात्मिक गुरु/ महामानव गौतम के साथ आप कुछ बी ना लगाएं ना आगे ना पीछे , फिर आप देखना कि लोग आपके अध्यात्म को जरूर मानने लगेंगे आपकी जाति क्या/ धम्म क्या / अन्य जातियों के लोग भी |

तो महामानव गौतम बुद्ध ने बताया कि धम्म तो सबका एक है पर सम्प्रदाय अलग-२ हैं क्योंकि अविधा है ( unknownness) है | पहले जाने कि ये जीव -जगत है क्या ? ये संसार है क्या ? ये कैसे चल रहा है ? महामानव गौतम ने कहा है कि ये संसार छः धातुओं से निर्मित है (१)अग्नि(२)वायु(३)आपो=तरल(४)पृथ्वी(५)आकाश(६)विज्ञान= consciousness | ref- अंगुत्तर निकाय |

तो अपने सम्प्रदाय को पहल स्वयं जाने और परिपक्व होकर दूसरों को बताएं उल्टा-सीधा धम्म की व्याख्या करने से और सम्प्रदायों की बुराई करने से कोई आपको appreciate नहीं करेगा |

डॉ कौशल

drkaushal96@yahoo.com

http://dharmindia.wordpress.com/2014/12/02/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D/