महामानव गौतम बुद्ध के बताये मार्ग को जनसामान्य तक कैसे पहुंचाएं….डॉ कौशल कुमार


dharm nahin karm acchasamaybuddha.wordpress.com पर ज्ञानवर्धक एवं विश्लेशानात्मक लेख पढ़कर अत्यंत हर्ष भी होता है । परन्तु एक बात जिस पर भारतीय बुद्ध सम्प्रदाय को बड़ा ही गहन मंथन करना चाहिए कि कम से कम ये लोग जो निचले तबके हैं उनमें एक यह भाव जगाना कितना महत्वपूर्ण होगा कि वे समझें इस बात को कि धर्म को जानना कितना महत्वपूर्ण है । क्योकि धर्म को जाने बिना तो मनुष्य दूसरों की अध्यात्मिक (=मानसिक ) गुलामी ही
करने पर मजबूर रहता है और उसकी आनेवाली संतानों में भी उन्नति की कोई अभिलाषा उत्पन्न नहीं होने पाती । मैंने ये अनुभव किया कि व्यक्ति यदि नास्तिक विचार वाला है या हो गया है तो वह इस भौतिक जगत में उन्नति कर सकता है परन्तु इस बात की भी अत्यधिक संभावना है कि उसकी आने वाली पीढियां उसके विचारों पर ना चल पायें और फिर सत्काय दृष्टि वाली मान्यता में फंस जाएँ तथा अन्धविश्वासी हो
अपनी उन्नति को आत्मा-परमात्मा के सिद्धांत वाली दृष्टि में फंसकर भाग्यवादी बन जाएँ । तो विषय ये महत्पूर्ण है कि इन अंधश्रद्धा में फंसी जनता को निकालने का क्या उपाय है हमारे देश भारत में । काफी मंथन के बाद मैंने ये पाया कि इनके भीतर शिक्षा के साथ -२ अध्यात्मिक शिक्षा भी देने की जरूरत है इसका एक तरीका ज्यादा बेहतर ये ही हो सकता है कि लोगों को कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को
बताया जाए और धर्म को धार्मिक कथाओं द्वारा लोगों को समझाएं जैसा कि स्वयं भगवान् बुद्ध किया करते थे । बुद्ध ने अपने विचारों को मनवाने के लिए उपाय कौशल्य का प्रयोग करते हुए तीन प्रकार से धर्म की व्याख्या किया करते थे १-कथा सूत्रों द्वारा २-सूत्रों की व्याख्या को धार्मिक कहानी में परिष्कृत करके ३-धर्म के गूढ़ विषय को बिल्कुल खोलकर सूक्ष्म व्याख्या द्वारा । ऐसा उन्होंने
इसलिए किया क्योंकि संसार में तीन प्रकार की समझ वाले लोग सामान्यतया हैं १-जो समझना नहीं चाहते बस अध्यात्मिक गुरु के मूह से जो शब्द निकल गए वो उनके लिए पूजनीय बन जाते हैं । २-कुछ जो उन सूत्तों को सामान्य व्यवहार जो समाज में प्रचलित हैं उनसे मिलान करके ही मानेंगे । ३-तीसरे वे जो धर्म की वास्तविकता को समझना चाहते है उसके गूढ़ तथ्यों को जाने बिना वे नहीं रह सकते । तो जैसा उपासक
की प्रकृति हो उसको उसी रूप में मार्ग देना चाहिए । किसी नएव्यक्ति को अपने विचार तो बताएं पर उसकी पूर्व श्रद्धा पर एकदम चोट ना करें उसके विचारों को अपने विचारों में लपेट लें और उसे विश्वास दिला दें कि आप जो कह रहे हैं उसका अनुभव किया आपने तो ही कह रहे हैं । तो वो आपकी बात माने उसके लिए एक शांत ,ज्ञानी और अध्यात्म को गहराई से जानने और समझाने वाले गुरु की सहायता तो चाहिए ही
क्योंकि भारत के लोगों में जो सदियों-२ के लम्बे सफ़र के कारण धार्मिक अंधविश्वास के बीज हैं उनको नास्तिक वाद या केवल विज्ञान के बल पर नहीं मिटाया जा सकेगा । और बहुजन ऐसे ही इस पुरोहितवाद के चक्कर में फंसा रहेगा ।  ।। भवतु सब्ब मंगलं ।।

 

वास्तव में मैंने ये देखा अभी तक कि आज के समय में हमारे देश में जो भी ज्यादातर बौद्ध धम्म को मानने वाले लोग हैं वे अधिक्तर नास्तिकवाद की बातें करते हैं | सदैव ही inferiorty काम्प्लेक्स से ग्रसित देखे जाते हैं | सदैव ही धम्म मार्ग को बताने की शुरुवात हिन्दू धम्म सम्प्रदाय अथवा ईश्वरवाद की बुराइयों से करते हैं |

 

अपनी ऊर्जा बिना वजह ही वेदिक विचारधारा को पुनः-२ बतानें में लगाते रहते हैं , सदा ही ब्राह्मण की बुराई करते फिरते हैं और ये भी नहीं समझ पाते की उनमें खुद कितना ब्राह्मणवाद भरा पड़ा है |आपने देखा होगा कि भारत वर्ष क्या दुनिया में कहीं भी लोग अपने नाम के आगे ब्राह्मण शब्द को सर नेम के रूप में प्रयुक्त नहीं करते हैं क्योंकि आपको पता होना चाहिए कि ब्राहमण कोई जाति भी नहीं है वह तो एक अवस्था है और मुझे नहीं लगता कि ब्राह्मण अवस्था को प्राप्त मनुष्य भी यहाँ भारत में कोई है अरहत अवस्था का तो क्या होगा ?और सम्प्रदाय तो सारे के सारे ही मुझे पाखण्डवाद का अड्डा दिखाई देते हैं परन्तु फिर भी मनुष्य को किसी ना किसी सम्प्रदाय में तो रहना ही पड़ता है / जीना है | तो मान लिया कि यदि आप बुद्ध में श्रृद्धावान हो गए हैं तो बौद्ध सम्प्रदाय में चले गए होंगे परन्तु यदि आप बौद्ध सम्प्रदाय की भी सभी बातों पर श्रृद्धावान नहीं हैं तो बुद्ध धम्म को तो बिलकुल भी समझने की चेष्टा कर ही नहीं रहे | यदि किसी को लगे कि यह मार्ग अच्छा है और इससे मेरा भला हो रहा है और में इसे दूसरों को भी बताऊँ तो सोच तो अच्छी है पर यदि बताने का और समझाने में आपके उपायकौशल्य (acceptable representation) नहीं है तो सारी ऊर्जा व्यर्थ ही गवा रहे हो कि आपकी बात को लोग समझ ही नहीं रहे |

महामानव गौतम कहते हैं कि दूसरे क्या गलत मान्यता रखते हैं उस पर बिना वजह बिना किसी के पूछे क्रश भाषा में व्याख्यान नहीं करना चाहिए क्योंकि आपकी बात को पूर्ण रूप से जिसने अभी स्वीकार भी नहीं किया है तो वह अपनी पूर्व श्रृद्धा के प्रति कैसे आपके द्वारा बतायी बुराई स्वीकार करेगा | तो लोगों को उनके अंधविश्वास से बाहर निकालने के लिए सर्वप्रथम अपनी बात को अध्यात्मिक वाक्य से ही शुरू करें तो वो आपकी बातों पर attention जरूर देगा | बहुत सारे लोग जो अपने को बौद्ध कहते फिरते हैं उन लोगों को मुझे नहीं लगता कि बुद्ध में कोई श्रृद्धा है वे तो बस अपनी हीनता वाले भाव को छिपाने के लिए अपनेआप को बौद्ध कहते फिर रहे हैं | और सीधे-२ कटुवाणी हिंदु मूर्तियों पर निकालकर करते हैं |

उन्हें पता नहीं कि ये जो मूर्तियाँ आज दिख रही हैं भारत में तो ये शुरुवात सर्वप्रथम बौद्ध सम्प्रदाय ने ही शुरू की थी | मूर्ती वास्तव में है क्या पहले ये तो पता करें और देखिये पुरोहित वर्ग को कि वो किस प्रकार दूसरों के बनाए महल पर चढ़कर उसे अपना बताने लगता हैं यह भी एक चातुर्य है भाई कि आप लोग तो अपना भी खो देते हो और दुसरे तुम्हारा पैतृक / पुरातन संपदा को अपना बताकर आम जनता को भ्रमित करके उनके गुरु बन जाते हैं क्योंकि वे लोग जानते हैं कि कैसे इस भौतिक संसार में लोगों पर राज किया जाता है उनके मनो को अपना गुलाम बनाकर | जातिवादी परम्परा में पुरोहित को ये पता है कि संख्या मायने नहीं रखती बल्कि ज्ञान मायने रखता है | और किसी सम्प्रदाय के लिए कोई व्यक्ति नहीं महत्वपूर्ण होता है विचार महत्वपूर्ण होता है तो वो लोग कभी भी नहीं बोलते कि क्यों नमस्कार शब्द बोल रहे हो या राम-राम शब्द बोल रहे हो अथवा गुड मॉर्निंग शब्द बोल रहे हो क्योंकि उन्हें पता है कि ये एक persional psychological विषय है अरे कुच्छ भी बोलता फिरे पर अध्यात्मिक राह पर चले तो जैसा हम कहें वैसा ही करे , इसके लिए हमारे देश में पुरोहित वर्ग के कितने ही बुद्धिजीवी अपना पूर्ण जीवन तक समर्पित कर देते हैं |

भारत में कितने ही संघ अहिं जो रात दिन इसी बात पर मंथन करते रहते हैं कि ये जो लोग पुरोहित वर्ग के नहीं हैं ये किसी और सम्प्रदाय में ना चले जाएँ और नए-२ अंधविश्वास apply करते रहते हैं जिससे लोग उनके वाद को आराम से मानते रहें , और पुरोहित वर्ग का हित सधता रहे | वो कभी नहीं कहते ऐसे शब्द जिन शब्दों से जनसामान्य में उनके प्रति विरोध की भावना भड़क जाए – ये समय के अनुसार व्यवहार करते हैं जैसा काल वैसा वास इस सिद्धांत को समझते हैं| ये तो बात ठीक है कि आप जय भीम बोलें और बाबा साहेब की पूजा भी करें परन्तु बौद्ध अभिवादन में तो केवल नमो बुद्धाय ही बोलें क्योंकि अगर बौद्ध धम्म सम्प्रदाय को बढ़ावा यदि भारत में बाबा साहेब ने दिया और आप लोग उनके द्वारा प्रेरित हो बौद्ध धम्म सम्प्रदाय में चले गए हैं तो अच्छी बात है , तो इस प्रकार तो महाराज अशोक को भी नमो बुद्धाय से पूर्व जय अशोक या महाराज अशोक बोलना चाहिए क्योंकि उन्होंने तो अपने पुत्र-पुत्रियों तक को भी धम्म के प्रचार में लगा दिया था | तो psychology को समझो कि अध्यात्मिक गुरु/ महामानव गौतम के साथ आप कुछ बी ना लगाएं ना आगे ना पीछे , फिर आप देखना कि लोग आपके अध्यात्म को जरूर मानने लगेंगे आपकी जाति क्या/ धम्म क्या / अन्य जातियों के लोग भी |

तो महामानव गौतम बुद्ध ने बताया कि धम्म तो सबका एक है पर सम्प्रदाय अलग-२ हैं क्योंकि अविधा है ( unknownness) है | पहले जाने कि ये जीव -जगत है क्या ? ये संसार है क्या ? ये कैसे चल रहा है ? महामानव गौतम ने कहा है कि ये संसार छः धातुओं से निर्मित है (१)अग्नि(२)वायु(३)आपो=तरल(४)पृथ्वी(५)आकाश(६)विज्ञान= consciousness | ref- अंगुत्तर निकाय |

तो अपने सम्प्रदाय को पहल स्वयं जाने और परिपक्व होकर दूसरों को बताएं उल्टा-सीधा धम्म की व्याख्या करने से और सम्प्रदायों की बुराई करने से कोई आपको appreciate नहीं करेगा |

डॉ कौशल

drkaushal96@yahoo.com

http://dharmindia.wordpress.com/2014/12/02/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D/

3 thoughts on “महामानव गौतम बुद्ध के बताये मार्ग को जनसामान्य तक कैसे पहुंचाएं….डॉ कौशल कुमार

  1. महामानव कौन हैं आपकी नजर में क्या आप उन सभी को महामानव नहीं कहते जो भी वैज्ञानिक हैं चिकित्सा विज्ञान के जिन्होंने मनुष्य और अन्य जीवों को उनके शारीरिक दुखों से छुटकारा दिलाने के लिए modern medical science में इतनी खोजें कर डाली और क्या वे भी महामानव नहीं हैं जिन्होने physics , chemistry और जगत को इतना कुछ संसाधन दिया की वो आज पैदल चलने से बच सके और घर बैठे -२ अपने परिवार जनों से बातें कर सके | तो सभी वे महामानव हैं पर ना ही तो वे बुद्ध है और बुद्ध तो क्या ? पच्चेक बुद्ध और बोधिसत्व की श्रेणी में में भी नहीं आ सकते क्योंकि बोधिसत्व , पच्चेक बुद्ध और बुद्ध अपने लिए कुछ भी संग्रह नहीं करते वो तो पूरा जीवन समाज और अन्य जीवों पर करुणा कर उनका उद्धार करने में ही बिता देते हैं |तो एल्बर्ट आइन्स्टीन ,गेलीलियो ,मैकमिलन,जेम्सवाट,कैप्लर,हिप्पोक्रेट्स और आज के दशक के जाने कितने ही वैज्ञानिक जैसे स्टीफन हव्किंस हैं जो महामानव हैं पर वे बोधिसत्व, पच्चेक, बुद्ध और बुद्ध नहीं हो सकते | तो गौतम बुद्ध ही ऐसे हैं जिन्हें सर्वप्रथम भगवान् कहा गया था ,क्योंकि उन्होंने जब बोधि प्राप्त कर ली थी अर्हतावस्था से गुजरते हुए कि निब्बान (नि= नहीं +बान=बनना= पैदा होना ) की खोज की थी एवं यह पता लगाया था कि क्यों जीव जगत दुखों के भव संसार में फंसा है और इससे निकलने का मार्ग उन्होंने खोजा था तो इस लिए तथागत कहे जाते हैं और fully enlightened हैं तो इसलिए बुद्ध कहे जाते हैं क्योंकि उनका अपनी बुद्धि पर पूर्णतः command(=नियंत्रण) हैं , इसीलिये पालि में कहा भी गया है कि ” भग्ग रागों भग्ग भग्ग दोसो भग्ग मोहो इतपि सो भगवा अरहं सम्मा सम्बुद्धस्स || ” तो मुझे ये समझ नहीं आता कि भगवान् शब्द यदि बुद्ध के पूर्व लगाया जाता है तो उसमें बुराई क्या है ? और देखिये कि जो अपने को बौद्ध धर्मवादी बने हैं संस्थाएं चला रहे हैं तो वे क्या प्रयास कर रहे हैं जो लोग उनका बौद्ध धर्म sc /st/ obc वाले भी नहीं अपना रहे कमीं कहां है ? ज़रा समझें | आज जबकि इस्लाम इतना कट्टर सम्प्रदाय है तो भी आगरा में ६० मुस्लिम परिवार ३८७ सदस्य , जिन्होंने धर्म जागरण और बजरंग दल के सदस्यों द्वारा उकसाए जाने पर हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया और यज्ञ हवन में अपनी टोपियों की आहुति दे कर जनेऊ धारण कर लिया क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के धर्म जागरण प्रकोष्ठ और बजरंग दल के कार्यकर्ता 3 महीने से इनके बीच सक्रिय थे | तो क्यों आप के द्वारा रोज-२ अम्बेडकर अम्बेडकर चिल्लाने के बावजूद भी नीच जातियों के लोग भी बौद्ध धर्म नहीं अपना रहे हैं | आपको इसका उत्तर नहीं सूझ रहा ना शायद कभी सूझेगा क्योंकि आपने बुद्ध को नास्तिक बना दिया है और नास्तिकवाद से भारतीय जनता कोशों दूर भागती है , इसीलिये तो उन मुस्लिम परिवारों ने इस्लाम छोड़कर हिन्दू धर्म अपना लिया , क्योंकि उन्हें लगा कि इसको अपनाने से एक तो यह फायदा होगा कि BJP और RSS के चहेते बन जायेंगे तथा उनकी दरिद्रता दूर हो जायेगी | बौद्ध सम्प्रदाय का कोई ऐसा संघ नहीं और ना ही नीच जातियों का कोई ऐसा संघ है जो किसी व्यक्ति के धर्मांतरण पर उनकी मदद करे , सब बस अपना पेट भरने हेतु राजनीति कर रहे हैं वो भी अपने लोगों के साथ ही | तो क्यों लोग आयेंगे बौद्ध धरम में और ऊपर से नास्तिक विचार वो क्यों स्वीकार करें क्योंकि वो ठहरे बड़े वाले धार्मिक वो भी अंधे | तो आपको कोई हक नहीं है बुद्ध को महामानव मात्र सिद्ध करने का मुझे कोई भी अम्बेडकरवादी आज तक ऐसा नहीं दिखा जो केवल अपना हित ना देखता हो और अज्ञानी तो इतने की बस दुनिया को केवल एक ही विषय के आधार पर हांकना चाहते है | वो लोग आपका धर्म नहीं मानते क्योंकि वे नास्तिक नहीं हैं वे मूर्ख और अंधे हैं आरक्षण मिल रहा है आराम से रोजी रोटी मिल रही है और अब समाज वो untouchability भी नहीं रही है | और फिर human सायकोलोजी है परम सत्ता तो किसी ना किसी को मानेंगे ही लोग चाहे वो बुद्ध ही क्यों ना हों | जब कृष्ण जैसे धूर्त व्यक्ति को लोग ईश्वर का साकार रूप मान लेते हैं क्योंकि पुरोहित जानता है कि लोगों को थोड़ी छूट मिले अपने तरीके से सुप्रीम पावर को मानने की तो वे आराम से हमारी बातें स्वीकार कर लेते हैं | अभी तो वे लोग जो अपने को पढ़ा लिखा कहते नहीं अघाते वे ही इतने मूर्ख हैं कि उन्हें भी कोई तो परम सत्ता चाहिए ही , तो नीची जातियों के जो लोग कभी बौद्ध थे गौतम बुद्ध के भी पूर्व सिन्धु सभ्यता से पता चलता है और हमारे भारत के अनपढ़ गरीब जो नीची जातियों के लोग हैं कम से कम वे लोग तो अपने सारे संस्कार उसी पुरातन रीति से करते हैं , पूजा की वही पुरानी सिन्धु की पद्धती और वही भाषा , तो वे लोग डायरेक्ट बोलते हैं कौन हो भाई तो खट से अपनी जाति बता देते हैं कभी हिन्दू नहीं कहते क्योंकि स्वभावतः वे वैदिक या हिन्दू धर्म को नहीं मानते हैं |
    तो महामानव तो कोई भीतर से क्रूर और स्वार्थी व्यक्ति भी हो सकता है और कितने ही मनुष्य अब तक महामानव की श्रेणी में आ चुके हैं पर क्या आपने कभी सूना दुनिया में किसी ने कहा हो कि मैं बुद्ध हूँ, (=क्या बाबा साहेब ही ने कहा कि मैं बुद्ध से भी ज्यादा हूँ , क्योंकि वे बोधिसत्व हैं , उन्हें पता था कि बुद्धत्व अवस्था प्राप्ती के बाद तो कोई दुक्ख रहता ही नहीं उसे जो भगवान् हो गया है , अर्हत हो गया है और जो सम्यक है, सम है , बुद्ध है ) क्योंकि बुद्ध स्वयं को बुद्ध नहीं कहते हैं वे तो स्वयं को सिद्ध कर देते हैं कि बुद्ध आ चुके हैं दुनिया वालों , सभी सम्प्रदाय वालों और धर्म को बदनाम करने वालों लो मैं आ गया अब | तो बुद्ध महामानव मात्र नहीं वे हैं वास्तविक भगवान और वे ईश्वरों के भी अराध्य देव हैं क्योंकी वे ही वास्तविक मुक्ति का रास्ता बताते हैं और निष्कलंक हैं , तो भगवान् कहे जाते हैं , इसलिए ईश्वर नहीं काहे जाते , और भगवान् तो अर्हत भी होते हैं पर वे बुद्ध नहीं होते तो इसीलिये भगवां =भगवान् बुद्ध कहा जाता है |

  2. डा. कौशल जी,
    समय बुद्धा में आपका लेख पढ़ा जो बहुत विशलेषणपूर्ण और प्रभावशाली है | इस लेख में चिंतन
    योग्य तथ्य हैं | हम सबके साथ, इसे साझा करने के लिए, आपका बहुत- बहुत आभारी हूँ |
    डा. कौशल जी आप से मांफी मांगते हुए, मैं इसमें कुछ जोड़ना चाहता हूं कि –
    बुद्ध की ओर –
    भारत में आज़ तक बुद्ध- परम्परा को कायम रखने वाला भी बंगाल का ब्राह्मण ही है | दिल्ली के
    ही एक बौद्ध- विहार में इन ब्राह्मणों के अलावा कोई दूसरा भंते वहां घुस भी नहीं सकता है | बुद्ध
    ने किसी धर्म की बुराई नहीं की थी बल्कि उन धर्मों में क्या अच्छा है क्या बुरा है उस पर जोर
    दिया था | सभी धर्म इंसान की भलाई के लिए बनाये जाते हैं | हमारे नित्य के व्यवहारों के ऊपर
    है कि हम किस प्रकार आचरण करते हैं | तर्क पर सत्‍य है या नहीं |

    बुद्ध के समय में सीलोन (श्रीलंका) कहा जाने वाला देश का नाम भी ब्राह्मणों ने ही बदल दिया
    और २६०० साल तक सुनियोजित करके उसको ब्राह्मणवाद में बदलकर, हीनयान को महायान
    (ब्राह्मणवाद) में परिवर्तित करके रखा | हमारे लोग जो कुछ अब जागे और समझ रहे हैं कि
    बुद्ध क्या हैं? अपनी नौकरी छोड़कर चीवर पहन बैठे हैं | विचारों में परिवर्तन आना जरूरी है |
    बुद्ध को समझना और समझाना इतना आसान नहीं है जबकि अंधविश्वास के चंगुल में पूरा का
    पूरा समाज़ फंस चुका हो | बाबा साहब डा. अम्बेडकर ने जो मार्ग बताया था उसको भी ५९ वर्ष
    के बाद नहीं समझ पाये | जिस दीक्षा- भूमि और चिँचौली ( बाबा साहब का संग्राहलय ) पर,
    मैंने स्त्रियों और पुरुषों को रोते देखा है |

    समाज़ की नारी, इतनी जल्दी यह नारी बुद्ध को कबूल नहीं करेगी | जो सदियों से अंधविश्वास
    के चक्रव्यूह में फंसी है | जब भी उसने निकलने की कोशिश की उस पर अत्याचार हुए, शोषण
    हुआ है | बलात्कार तो पहले भी होते थे किन्तु मीडिया की बजह से आज़ जल्दी मालूम पड जाते हैं |
    साड़ी, घूंघट, सिन्दूर, सात फेरे, कन्यादान, दहेज, करवा-चौथी, नव- रात्रि (राम- नौमी) मंगल-
    -सूत्र, बिछिया, नांक की कील, माथे की बिन्दी आदि किस- किस को नारी समझे कि क्या सही है |
    और क्या गलत है, और फिर क्यों गलत हैं | उन्हें एक समाधान मिलना जरूरी है | जब तक ये नारी
    कुछ न समझे तब तक समाज़ का विकास रूका रहेगा और यह समाज़ अंधविश्वास में लिप्त रहेगा |

    जो लोग भारत से बाहर विदेशों में गये हैं क्या उन्होंने भारत जैसा ये नारी पर किसी प्रकार का
    बिंदिया- घूंघट, सिन्दूर- मंगल-सूत्र पर जोर दिया है | जिसमें लक्ष्मी-पूजन भी है | मेरे प्रश्न हैं-
    – क्या बिल गेट लक्ष्मी कि पूजा करता था जो इतना पैसा रखता है? |
    – क्या वैज्ञानिक आइंस्टीन माथे पर बिन्दी या चंदन का तिलक लगता था जो इतनी बुद्धि है? |
    – क्या संसार में कहीं अन्य देशों की महिलाएं मांग में सिन्दूर भरतीं हैं? |
    – क्या संसार में कहीं अन्य देशों की महिलाएं मंगल-सूत्र पहनतीं हैं? |
    – क्या किसी अन्य देश की महिलाएं घूंघट करतीं हैं?
    – क्या किसी देश में महिला अपने पति की उम्र बढ़ाने के लिए करवा-चौथी ब्रत रखती है? |

    ऐसे कई अन्य सबाल हैं जो केवल भारत में ही लागू होते हैं कहीं अन्य जगह नहीं | मूर्ति- पूजा
    में फंसकर हम अंधविश्वास में फंसे रहे हैं | ब्राह्मण नहीं कह रहा है कि तुम सब ये करो | हम
    तो स्वंय कर रहे हैं फिर आज़ का ब्राह्मण दोषी क्यों है | हम स्वंय दोषी हैं कोई दूसरा नहीं |

    समाज़ में कुछ बदलाव आये इसी कामना के साथ-
    सादर- रामबाबू गौतम, न्यू जर्सी
    gautamrb03@yahoo.com

    This comments have been received on EMAIL

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s