आज भी बहुजनों (SC/ST/OBC/Converted Minorities) में बौद्ध रीती रिवाज़,चलन, परम्पराएँ इतिहास मौजूद है, भारत देश और बौद्ध धम्म दबाया तो गया है पर खत्म नहीं होगा क्योंकि जनता को ज्यादा दिनों तक मूर्ख बनाकर नहीं रखा जा सकता, जनता एक न एक दिन जरूर जागती है …डॉ कौशल कुमार


नमो बुद्धाय || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु ‘ते||                                                                                                                                                                                                          india land of buddha मैंने वास्तव में ये समझा है कि हमारे कुछ बुद्धिजीवी लोग जो पुरातन वास्तविक बुद्ध के सम्प्रदाय के हैं , पर बहुत लम्बे समय तक
शिक्षा दीक्षा से दूर रक्खे जाने के कारण अपने आँप को ब्राह्मण धर्मी / हिन्दू धर्मीं ही मानने लगे हैं |  परन्तु आज भी गांवों में जो ये नीची जातियों के हिन्दू धर्म में माने जाने वाले लोग हैं अर्थात sc/st/obc  आदि , इन लोगों की जो पीढियां अनपढ़ हैं वे अभी तक अपने व्यवहारों में बौद्ध धर्म की बातों को संजोये हैं | जैसे आप कभी देखिये कि जब इन लोगों में कहीं कोई भी संस्कार होता है तो वे अपने संस्कार पुरोहितों से नहीं करवाते बल्कि स्वयं ही करते हैं , आज भी गांवों में जब शादियाँ होती हैओं तो लोग फेरे जरूर लेते हैं पर उन फेरों को लड़के और लडकी पक्ष के दामाद अर्थात दोनों के फूफा दिलवाते हैं , उसका भी एक विशेष तरीका है कि जो छई अर्थात विवाह के पूर्व अपने कुल के द्वारा पूजित किसी वृक्ष के पत्ते लाते हैं और उन पत्तों को फेरों के समय घर के भीतर जहां आनाज कूटते हैं वहाँ रखकर जलाते हैं , जब आग जलने लगती है तब उस पर कुनाली (=मिट्टी की परात ) से ढक देते हैं और  फिर वर वधु को उसके फेरे दिलाकर रस्म पूरी करते हैं | एवं जब आज भी पूजा उपासना करते हैं तो एक अंगारी उपले की रखकर उसके सामने दिया मिट्टी का जलाकर उस अंगारी पर घी या तेल आदि डालते हैं जब उस पर आग प्रकट हो जाती है तो फिर उस पर अन्न / खाना जो बनाया हो तो वो थोडा-२ रख देते हैं फिर उस पर पानी का छींटा लगाते हैं और फिर सभी लोगों को खाना दे दिया जाता है | वास्तव में ये तरीका बहुत ही पुरातन है  गोतम बुद्ध के भी पूर्व से चला आया है और पुरातन सिन्धु सभ्यता का तरीका है क्योंकि ब्राह्मण वादियों का तरीका अग्नी पूजक है जो पारस की खाड़ी में प्रचलित था जैसा कि आज भी पारसी लोग अग्नि की पूजा करते हैं वेदी बनाकर अग्नि के मंदिर में तो बहुत पुरातन काल में जब ब्रह्मंवादियों ने सिन्धु सभ्यता में प्रवेश किया और छल कपट द्वारा अंगेजों की तरह सिन्धु सभ्यता को नष्ट कर डाला धोखे से सिन्धु और सरस्वती नदियों के उद्गम स्थल में जाकर सरस्वती नदी के बहाव को पहाड़ गिराकर अवरुद्ध कर दिया जिससे सिन्धु और सहायक नदियों में बाढ़ आ गयी और सरस्वती सूख गयी , तो उसका इतना भीषण प्रभाव हुआ कि सरस्वती से सिंचित क्षेत्र तो सूखे के कारण बर्बाद हो गए और बाढ़ वाले क्षेत्रों मीन सभ्यता डूब कर बर्बाद हो गयी .. rajasthan, मोहनजोदडो  respectively . पढ़ें ऋग्वेद वृतासुर और इंद्रा का युद्ध आदि |
                                          परन्तु फिर भी सभ्यता तो जरूर बिखर गयी और धीरे-२ पाखंडियों ने सिन्धु घाटी पर कब्जा कर लिया , परन्तु लोग तो छीन-भिन्न हो गए और कालांतर में स्वेदेशी राजाओं के राज्य तो स्थापित हो ही गए जैसे कपिलवस्तु के शाक्य और अन्य लिच्छवी, कोलिय आदि | तब पुनः इस धरती पर शाक्य मुनि भगवान् गोतम बुद्ध हुए उन्होंने फिर से प्राचीन धर्म को स्थापित कर दिया , तथा ब्राह्मणों को भी अपना शिष्य बना डाला | देश फिर से संपन्न हो गया तथा विश्व गुरु बना | इस सबका आधार था धर्म अर्थात उच्च कोटि का अध्यात्म जिसे मध्यम प्रतिपदा से जाना गया , वह था दो अतियों (=तपन एवं भोग) को त्याग कर – सैंतीस बोधिपक्षिय धर्मों द्वारा समझाया भगवान् ने |  तो विषय अब ये है कि बौद्ध सम्प्रदाय को कैसे बढ़ाया जाए जिससे कि लोग स्कूल , कालेजों और आफिसों में भी बौद्ध धर्म लिखने लगें चाहे वे थोड़ी बहुत या प्रचलित पूजा पद्धतियों को ही मानते और करते रहें क्योंकि पुराने आचार व्यवहार इतनी आसानी से किसी का पीछा नहीं छोड़ने वाले हैं , पर जब वे कहते रहेंगे अपनी आने वाली पीढ़ियों से कि हम बौद्ध धर्म वाले लोग हैं और फिर आने  वाली पीढियां सही तरीकों को बौद्ध धर्मानुसार करने लगेंगी जैसे कि इस्लाम धर्म में दीक्षित लोगों में देखने को मिलता है |
                                                     तो धर्म को मनवाने हेतु सर्वप्रथम लोगों की पुरानी प्रचलित मान्यताओं को धता करने की कोशिश करने के बजाय उन्हें अध्यात्मिक देशना द्वारा अपने सम्प्रदाय में बांधें और धीरे-२ एक बहुत बड़ी माला बन जायेगी , फिर जहाँ जायेगी साथ जायेगी कोई भी कुच्छ नहीं कर सकेगा , क्योंकि संघ में शक्ति है इसीलिये भगवान् गोतम बुद्ध ने संघ की स्थापना की थी | बाकी राजनीतिक संगठन अपना काम भी ठीक से करें बौद्ध सम्प्रदाय के हितों में तो एक धार्मिक संघ तो होना ही चाहिए जो अपने लोगों पर भी लगाम कस सके| जैसा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक भारत में ब्राह्मण हितों की रक्षा के लिए सदैव क्रियाशील रहता है |
                                                    जो आज अपने को आंबेडकर वादी कहते फिरते हैं तो वे ज्यादातर तो जातिवादी व्यवस्था के पक्षधर हैं तो कैसे फिर बौद्ध हुए , केवल बौद्ध धर्म ही ऐसा है जहां पूरे विश्व में जातिवाद नहीं हैं , सम्प्रदाय भले ही दो प्रचलित हैं हीनयान और महायान पर बुद्ध को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और तीनो पिटकों को ही मानते हैं | तो धर्म लोग कैसे माने इसका उपाय तो मेरे ख़याल से ये ही होना चाहिए जैसे तथागत बुद्ध ने अध्यात्म द्वारा लोगों और राजाओं ,ब्राह्मण तक को अपनी बात मनवाई | ज्यादा दूर जाने जरूरत नहीं सबसे नया धर्म सम्प्रदाय भारत में सिक्खों का है और देखें कैसे गुरु नानक जी ने गुरुओं को ईश्वर से भी बड़ा सिद्ध करके  गुरुओं को मनवाकर एक सम्प्रदाय बनाया जिसमें रैदास , कबीर और स्वयं नानक जी के वचनों को गुरुग्रंथ में संकलित कर धर्म ग्रन्थ पूजनीय बना दिया , तो वे कितने सक्षम सम्प्रदाय बन गए कि भारत तो क्या कहीं भी उन्हें कोई तिरस्कार नहीं कर पाता | पर गुरु ने सभी पुरानी मान्यताओं को भी बदलने का प्रयास नहीं किया जैदे फेरे शादी के वक़्त सिक्ख भी लेते हैं पर गुरुग्रंथ साहिब के , त्यिहार वे भी मनाते हैं पर अपने गुरु से सम्बन्ध स्थापित करके | क्योंकि सभी त्यौहार , परम्पराएं  ब्राह्मणों द्वारा नहीं स्थापित की गयी हैं इस देश में बल्कि ब्राह्मणों ने परम्पराओं में कोई बदलाव ना करते हुए परम्पराओं को अपने धर्मग्रंथों से जोड़ दिया और लोगों को अध्यात्म के द्वारा ही अंधविश्वास आदि में फंसाकर उनके मनों को अपने सूत्र में बाँध लिया है | तो सम्प्रदाय  या धर्म को बढाने हेतु विभिन्न उपायकौशल्य की आवश्यकता होती है जैसा कि स्वयं भगवान् बुद्ध किया करते थे |                                                                                                                                                   आज के लिए नमो बुद्धाय || भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु ‘ते ||

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